शनिवार, 21 सितंबर 2019

मुनादी हो गयी है

मुनादी हो गयी है

कि
गाय अब हरगिज न पालें
अगर पालते है तो सड़क पर
हरगिज ना निकाले
फिर भी निकले
तो जिम्मेदारी आपकी है
गाय पंर जो भी करेगे
हम करेंगे
काटेगे या कही पंर बेच देगे
देश मे भी
कौन खाये या न खाए
चुनांव देखकर
उसकी इजाजत हम ही देंगे

मुनादी हो गयी है
कि
प्यार पंर पाबंदियां है
गर भाई और बहन हो
या हो मियां और बीबी
तो कागज ले के निकलो
की दोनो सचमुच वही हो

मुनादी हो गयी है
कि
लोकतंत्र की
नई परिभाषा पढ़ लो
जान जाओ
फिर उसी रस्ते पर बढ़ लो 
सत्ता पर कोई उंगली उठाये
उससे पहले जरा ये जान जाए
की
जान का जोखिम बहुत है
बन्दूक की नली से
निकलती है सत्ता
ये तो पढ़ा था
पर सत्ता बंदूक और
हिंसा से है चलती
ये भी पढ़ लो

मुनादी हो गयी है
कि
कोई अखबार हो या हो टी वी
सब सत्ता की भाषा ही बोले
किसी सिद्धांत के बहकावे में आये
उससे पहले ज़रा ये जान जाए
कि सत्ता चीज क्या है
और
सत्ता का संगठन चौकस खड़ा है
कुछ भी हो जाए
तो हमको क्या पता है
वो खुद ही जाने
या फिर बात माने

मुनादी हो गयी है
कि
क्या जरूरी है ये इतिहास पढ़ना
इतिहास अबतक जो भी पढ़ा था
सब कूड़े से भरा था
जो हमको देश का दुश्मन बताता
पढ़ना है तो राष्ट्र गौरव पढ़ो सब
नया इतिहास
जो अब हम समझा रहे है
है वही इतिहास असली
और
इतिहासों के पुरोधा भी वही है
जो जो हम बताए
जो इनको अब नही मानेगा उसको
रास्ते पर लाना भी आता हमे है
फिर काहे का गम 
गांधी से कलबुर्गी तक को
समझा चुके हम

मुनादी हो गयी है
कि
ये आज़ादी बेवजह है
और
ऐसे लोकतंत्र का भी क्या करोगे
ये चुनांव भी तो केवल खर्च ही है
छोड़ो इसको बस हमे ही सत्ता दे दो
जब तलक ये मुल्क जिंदा है
और
जिंदा है लोग कुछ भी
फिर देखो हम क्या करेंगे
पर ये अभी हम क्यो बताए

मुनादी हो गयी है
किअपने मुह सिले सब
और
वो हो बोले जो हम बताए
आंखे बंद कर ले
और वो ही देखे
जो हम दिखाए
कानों में ठूस लो कुछ
सुनना भी क्या जरूरी
दिमागों पर भी कोई जोर क्यो दो
बस उतना जानो
जितना हम जनाये

मुनादी हो गयी है
कि अब सब मांन जाये
कि सबके हम खुदा है
सत्य है हम ,न्याय है हम
शास्वत भी हम ही है

मुनादी हो गयी है
कि
अब कोई चित्र हो या बुत बनाये
पर क्या बनाना है
पहले हमको बताए
जो हम कहे फिर वो ही बनाये

मुनादी हो गयी है
कि
बुध्द ने कुछ भी कहा हो
पर
संघम शरणं गच्छामि
के अब नए मतलब समझ लो
अब हम पर
उंगली उठाना द्रोह होगा
फिर नही कहना कि
तुमने क्या है भोगा
मुनादी हो गयी है ।

शनिवार, 7 सितंबर 2019

लोकतंत्र के खम्भे

सत्ता ने कहा
मीडिया से
थोडा झुक जाओ
पर
कुछ घुटने के बल
चलने लगे
और
आधिकतर तो
लेट कर रेगने लगे ।
और
इस तरह
चौथा खम्भा
लेटकर खुद
सत्ता के रास्ते की
पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा
व्यव्स्थापिका से
हद मे रहो
और वो
संगम की जमुना
हो गयी
और कार्यपालिका
रूपी गंगा मे
विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी
सरस्वती की तरह
भीतर भीतर
घुल-मिल रहा है
अब
सब खम्भो की
जिम्मेदारी
खुद जनता के
कन्धो पर है
क्योकी
आज़ादी
मुफ्त मे नही मिलती
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

शनिवार, 24 अगस्त 2019

मैं मर भी जाऊ तो क्या

मैं मर भी जाऊं
तो क्या होगा
शायद अगर हुआ तो
चार कंधे
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले
कुछ क्षण की
कुच्छ सिसकियाँ
कुछ कहानिया
कुछ शिकायतें
कुछ झूठी अच्छाइयां
बहुत सी बुराइयाँ
क्या किया जीवन में
बेकार था
कुछ न किया
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया
नालायक था
कुछ नहीं किया
बार बार बोर होकर भी
दोहराई जाती वही कहानियां
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ
कुछ कम हुआ
लो तेरही भी आ गयी
ये भी खर्च कवाएगी
कोई रिश्तेदार रुक न जाये
चलो सब चले गए
अब देखो कहां क्या क्या है
बाट लो किसका क्या है
और
चल पड़ेगी जिंदगी
अपने अपने रस्ते पर
एक कोने में टंगी तस्वीर
साल में एक बार शायद
बदलेगी माला
और
हाथ जोड़ कर
भागते हुए लोग
आज तो देर हो गयी
इस चक्कर में
पता नहीं क्यों बने है
ये रिवाज
इसलिए
मेरे लिए मेरी वसीयत है
की
कोई नहीं रोयेगा
बिजली में जला देना मुझे
किसी नदी में
नहीं बहाना मुझे
मैं नहीं मानता
कोई पूजा इसलिए
न कोई पूजा
और
न उठावनी तेरही
अगले ही पल से
सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो
मेरे लिए न कभी
कोई पारेशान हुआ
न किसी को होना है
वर्ना
मैं परेशान हो जाऊंगा
कुछ नहीं है मेरे पास
की
कोई लडे की
किसका क्या
बस मेरी यादे
कभी क्रोध लायेंगी
की
नालायक बाप ने
कुछ नहीं किया
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी
कुछ नहीं होगा
सब जैसे था
वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही
मेरी वसीयत है
जो
किसी काम नही आएगी
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ
कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और
मैं भी चुपचाप
ऐसे ही चला जाऊंगा
शायद लावारिश होकर
की
किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

बुधवार, 21 अगस्त 2019

वो अकेला बुजुर्ग पडोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है

वो अकेले बुजुर्ग इंसान

बहुत दिनो क्या सालो से

जानता हूँ उन्हें मैं

और

बहुत अच्छी है उनसे पहचान

पहले उनका घर भरा भरा था

फिर

धीरे धीरे खाली होता चला गया

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे

अचांनक अकेले हो गए वो
कभी बैठने लगे मेरे साथ

और बताने लगे

अपनी पूरी बात

पहले

उनके पास बहुत लोग आते थे

जब वो कुछ थे

और बहुत लोग

उनकी उंगली पकड़ कर

क्या क्या हो गए

तब तो हालत ये थी

किसी के घर मौत भी

हुयी हो

तो फोन करता था

की आप जल्दी आइये

अर्थी उठने वाली है

आप का ही इन्तजार है

शादी हो या कुछ

कितने लोग बुलाते थे

वो लोग जो कहते थे कि 

आप का ज्ञान रौशनी देता है

और आप के बिना तो

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए

अब कोई नहीं आता
कोई नहीं बुलाता

सबको बना दिया

पर ये जहा के तहा रह

गए

जब कोई उनका अपना

धोखा देता या

कर देता पीठ पर वार

तो ये रहते थे बहुत दुखी

और बेक़रार

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में

पर

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो

मैने देखा है

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने

पर जब अपने साथ थे

क्या मजाल उनके चेहरे पर

शिकन भी आई हो कभी

लेकिन

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे

जब से अकेले हो गए वो

उनके बच्चे भी चले गए दूर

अपनी अपनी जरूरी वजहों से

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ

बहुत प्यार करते है

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी

पर मजबूरिया अपनी जगह है

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में

अक्सर देखता हूँ

उन्हें सुबह बाहर निकल कर
लान से

तुलसी की पत्तियां तोड़ते

बताते है

की उनसे अच्छी चाय

कोई नहीं बना सकता है

सेंक लेते है ब्रेड और

काट लेते है कोई फल

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते

मैंने कहा
क्यों खुद करते है ये सब

और इस उम्र में

बोले कसरत भी है
और पैसे की बचत भी

मैंने पुछा की आप को क्या कमी

तो बस मुस्करा कर रह गए

मंगाते है खाना है कभी कभी

शायद दो दिन में एक बार

मैंने पूछा की आप को तो

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी

बोले खाना ज्यादा होता है

और

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है

और

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा

और

नए नए पकवान खाऊंगा

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न

और

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा

कभी कभी बहुत खुश होते है

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर

और सब तैयारी में लगे रहते है

कई दिन तक

फिर जब तक बच्चे साथ होते है

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक

कुछ गुनगुनाते रहते है

और

बच्चो के यहां से आने के बाद भी

कई दिन उदास होते है

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है

बज जाती है तभी घंटी

कौन देखे की कौन है

और
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है

कभी दूध गर्म करते है

और बाहर कोई आ गया

और दूध गिर जाता है पूरा
चाय भी

कभी सब्जी जल जाती है

तो कभी रोटी खाक हो जाती है

पुछा की फिर क्या करते है आप

बोले अगर दिन में होता है
तब तो हो जाता है

पर जब रात में जल जाती है

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना

या अगर ब्रेड है तो वो

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है

और

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है

हल्का हल्का

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना

की मैं भूखा भी सोता हूँ
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है

परेशांन रहने लगेंगे

उन लोगो के खुश रहने

और मस्त रहने के दिन है

उस दिन बहुत दुखी थे

मैंने पुछा क्या हुआ

बोले

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ

और

फिर जोर से ठठाकर हँसे

और चल दिए

मैंने कहा कहा चले

बोले किसी और को ढूढने

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो

कभी कभी जब बीमार हो जाते है

तो दिखलाई नहीं पड़ते

मिले तो पुछा क्या हो गया था

बोले कुछ नहीं

बताओ और क्या हो रहा है

बहुत कुरेदा

तो बोले मेरा दुःख तो

कोई बाँट नहीं सकता

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख

तो बाँट सकता हूँ

आइये कुछ अच्छी बाते करे

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे

मैंने पुछा आज क्या हुआ

बोले एक चिंता है

मुझे कुछ हो गया तो

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे

और खुला रखना भी मुश्किल है

और

उनकी आँखों से टपक गया कुछ

बाँध जो रुका था काफी दिनों से

शायद टूटना ही चाहता था

कि

वो इधर उधर देखने लगे

और खांसने लगे

खुद को रोकने को

और मुझे भरमाने को

फिर धीरे से उठ कर चले गए

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ

और

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा 

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव

और

सुनुगा उनका खोखला ठहाका

और फिर मैं भी सर झुका कर

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा

अपने घर की तरफ

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

रविवार, 18 अगस्त 2019

ट्रंक काल

ट्रंक काल
---------------
पहले भी होता था फोन
पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी
सुनते सब थे पास बैठे हुए
बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे
और कार्डलेस भी

पर उससे पहले
लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे
लोगो के यहाँ क्या
शहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां
होते थे फोन
और
वो बहुत रईस होने की निशानी था
गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी
नहीं था कोई फोन
और बुक करनी होती थी ट्रंककाल
बहुत से लोग बुक करते
और बुक करने को लाइन में लगे होते
पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात
नहीं मिलता था फोन तब
जिसका मिल जाता था
वो विजयी भाव ओढ़ लेता था
और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे
ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का
और खाने या सोने चला जाता था
जी हां ट्रंककाल लगना भी तब
ईश्वर की कृपा

और किस्मत की बात थी
जब मिल जाता था फ़ोन
तो चीखना पड़ता था
की आवाज वहा तक पंहुच जाये
कई बार तो हेलो हेलो
आप सुन रहे है न
कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी
कई कई बार में बात हो जाती थी
और
नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल
तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल
जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन
और ४ जी तथा ३ जी
उस थ्रिल को बस

महसूस कर सकते हो
अतीत में जाकर

जरा जाकर महसूसो

और सोचो की
अपनो की जिंदगी
कितनी मुश्किल थी पहले
ट्रिन ट्रिन
मिल गया मेरा ट्रंक काल
तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

त्यौहार और व्यवहार

जी हां
त्यौहार अब भी होते है
और पहले भी होते थे
अब गरीब है
तो
बस लोगो को को मनाते देख लेता है
या थोडा बहुत मना भी लेता है
मध्यम वर्ग है तो दिखावे के लिए
बजट बिगाड कर भी मनाता है
उच्च वर्ग है तो कहने ही क्या
किसी पद पर है
तो वो नही मनाता
लोग मनाते है उसका त्यौहार
और
लोगो के सामनो से
भर जाता है घर बार
जिनसे काम है
उनके अलावा
कोई किसी से नहीं मिलता
अब किसी भी त्यौहार में
थोक के मेसेज है न
मन गया त्यौहार
और
मान लिया गया उसे ही मिलना
लोगो का और शुभकामनाओ का
त्यौहार पहले भी होते थे
जो पैसे से नहीं
भावनाओ से मनाये जाते थे
गरीब हो या अमीर
सब खुद इन्तजाम करते थे
त्यौहार मनाने का
इतना फर्क था
की
अमीर के काम नौकर कर देते थे
पर बी अकी सब एक समान थे
होली हो तो रंग सबके पास था
और पिचकारी भी
चाहे पीतल की ,लोहे की
नहीं तो बांस को काट कर बनायीं
गरीब की खुद की
फूहड़ता नहीं
बल्कि सबको सबसे मिलने वाले
आनंद का त्यौहार था होली
गाँव में टी झुण्ड बना कर निकलते थे सब
उम्र के हिसाब से
अपनी अपनी भाभियों से होली खेलने
गुझिया बनाने में पूरा परिवार जुटता था
बच्चे भरते और मोड़ते या काटते थे
माँ बेलती थी तो पिता
बैठ कर सेंकते  थे गुझिया
बेईमानी की भी गुंजाइश थी
किसी किसी गुझिया में
ज्यादा मावा भर कर खुद खा लेने की
और
सेव झाड़ना सेंकना
कई दिनों तक चलता था त्यौहार
दीपावली में पतली डंडिया
जो आप्तौर पर नरगट
या अरहर की होती थी
तीन तीन को इस तरह बांधना
की उस पर दिया रख सके
और दरवाजे के सामने उन्हें सजाना
शहर में पहले तो छोटे छोटे दिए
और बाद में मोम्बत्तिया आया गयी
तब भी कई दिन पहले से
मिठाई जैसी चीजे
अपने ज्ञान और हैसियत के हिसाब से
कई दिनों तक तैयारी होती थी
पर
जो तब था और आज नहीं है
वो था समूह में मनाना या समाज में
तब फोन और मोबाइल नहीं थे
तो लोग मोबाइल रहते थे
खूब मिलते थे एक दूसरे से
त्यौहार में एक परिवार आकर मिला गया
तो इसका मतलब ये नहीं
की मिलन पूरा हो गया
अगले दिन ये पूरा परिवार
उनके घर जाता था
और चलता था कई दिनों तक ये क्रम
और फिर पूरा होता था त्यौहार
जी हां त्यौहार एक परिवार नहीं
पूरा समाज मनाता था
एक दूसरे के साथ 
जो कही खो गया
लील लिया नये ज़माने ने
और आर्थिक दिखावा
हीन भावना पैदा कर देता है आज
बहुतो में
देखा होगा आपने भी
जब आप बहां रहे होते है
सफ़ेद या काला धन
तो बहुत सी उदास आँखे
उसे बस टुकुर टुकुर
देख रही होती है
जो पहले के सादे त्योहारों में
नहीं होता था
और
तब केवल त्यौहार नहीं
सच्चा व्यवहार भी होता था

मेरा पहला फोन

जब लगा था मेरे घर नया नया फोन
---------------------------------------
एक दिन फोन मंत्री मिल गए
और
पूछ लिया घर में फोन है
लागा जैसे कुछ अपराध
या हीनता है
घर में फोन नहीं होना
बहुत मुश्किल से मुह से निकला था
नहीं
हम कैसे रख सकते है फोन
हम तो साधारण आदमी है
कहा से देंगे उसका पैसा
उन्होंने जारी कर दिया एक आदेश
एक कमिटी का सदस्य बनाने का
और
जब आयी थी उसकी चिट्ठी
क्या ख़ुशी थी
जैसे
कितना बड़ा कुछ मिल गया
पिता जी ने
कई लोगो को जाकर बताया था
उसके बारे
कुछ दिन में लगा गया
वो लाल रंग का फोन
ये भी उन दिनों खबर थी
अख़बार के लिए
जानने वालो और
आसपास के मुहल्ले के लिए
मिलने लगी बधाइयाँ
और मांगे जाने लगे नंबर
अपने फोन तो शायद ही कभी आते हो
क्योकि अपनों के पास नहीं थे फोन
पर जब पहली बार घंटी बजी
तो सभी अजीब कशमकश में थे
की क्या करे
पिता जी ने
आगे बढ़कर उठाया था चोगा
बस इतना ही पुछा था
कौन साहब है आप
किसी अपने का फोन था
पूरा परिवार देख रहा था गर्व से
किसी आश्चर्यजनक चीज की तरह
मैंने जब पहली बार उठाया था
तो उठाने से पहले रटता रहा
की हेल्लो कहना है
पर दूसरो के तमाम फोन आने लगे
और बढ़ गयी थी रौनक घर में
कुछ दिन तो
गर्व की अनुभुती होती रही
पर फिर मुसीबत बन गया फोन
जब किसी ने चुपके से
कही बाहर का फोन मिला दिया
और आ गया बड़ा सा बिल
उस ज़माने के हिसाब से
तब ध्यान रखना पड़ता था
की सभी काल को लाक करके रखना है
पर
लोगो के फोन का कोई समय ही नहीं था
अपनी जिंदगी ही अपनी नहीं रह गयी
सुबह से रात तक कोई न कोई
आकार इन्तजार करता था
अपने फोन का
खाना पीना भी मुश्ल्किल
और
अपनी बात करना भी मुश्किल
जी हा
फोन
मुसीबत का सबब भी था तब फोन
पर स्टेटस का सिम्बल था
तो सब कुछ बर्दाश्त करते थे लोग


चिट्ठियां

जी
पहले चिट्ठियां होती थी
सूचना
और
सुख दुःख जानने का साधन
चिट्ठियां भी कई तरह की होती थी
इतना खुला था हमारा जीवन
और हमारा समाज
कि
खुले पोस्ट कार्ड पर
सब कुछ लिख कर भेज देते थे लोग
किसी से कोई धोखा नहीं होता था
क्योकि ये सस्ता होता था
पैसा नहीं होता था लोगो के पास
बस भावनाए और जुडाव होता था
एक चिट्ठी ऐसी भी होती थी
जिस पर टिकेट नहीं लगा होता 
जिसे बैरंग पत्र कहते थे 
और टिकेट का दोगुना देना होता था शायद 
वो भेजने वाले तीन तरह ले लोग होते थे
या तो गरीब रिश्तेदार
या दूर पढ़ रहे छात्र
या फिर वो जो चाहते थे
कि
चिट्ठी हर हालत में मिल जाये उसे
जिसके लिए भेजा है
क्योकि डाक टिकेट का पैसा
उसी से लेना होता था
इसलिए डाकिये की मजबूरी थी
पाने वाले के हाथ में चिट्ठी देना
अंतर्देशीय भी था जो बंद रहता था
पर थोडा महंगा
इसलिए या तो
उसका खर्च वहनं कर कर सकने वाले
लिखते थे इसमें
या फिर कोई गोपनीय बात होने पर
लिखा जाता था ये पत्र
गाँव में तो डाकघर और डाकिया
दोनों वही के होते थे
पर कोई नही झांकता था
किसी के पत्र में
किसी का पत्र तभी पढता था
जब वो खुद पढने को कहता था
रजिस्टर्ड  डाक तो
खैर विरले ही भेजते थे
खास कारणों से
चिट्ठिया भी तरह तरह की होती थी
किसी के कोने पर थोड़ी सी हल्दी का रंग
तो किसी पर लाल रंग
हल्दी किसी शुभ सूचना के लिए
तो लाल रंग
आशिक के दुःख की निशानी था
और ये बताने की कोशिश
की ये खून से लिखा है
गाँव की चिट्ठियों में
सबके हालचाल पूरे गाँव सहित के साथ
गाय बैल उसकी बीमारी
जो बीमार था ठीक हुआ या नहीं
फला गाय या भैस दूध दे रही या नहीं
और कितना दूध दे रही है
कौन कौन पीता है दूध
बाबा भी पीते है या नहीं
और जिसको बच्चा होना है
उसे मिलता है या नहीं
बगीचे का क्या हाल है
कौन कौन सा फल कितना लगा है
किस किस खेत की जुताई हो गयी
किस खेत में पानी लग गया
धन रोपा गया या नहीं
और
कौन सी फसल कितनी होगी
इत्यादि जरूर होता था
कोई बीमार था गाँव में तो क्या हुआ
किसका इलाज हो रहा है
और मर गया तो कैसे
और
सब सुख दुःख बताने के बाद
और
ये बताने के बाद की फला फला मर गए
सुखा पड़ गया या बाढ़ में सब बह गया
भैस या गाय मर गयी
वो बच्चा पैदा होते ही मर गया
अंत में ये जरूर लिखा होता था
अपना ध्यान रखना
यहाँ बाकि सब कुछ ठीक ठाक है
पति पत्नी की चिट्ठिया गोपनीय होती थी
इसलिए उनका ब्यौरा भी लिखना ठीक नहीं
सारे आशिक अंत में जरूर लिखते थे
लिखा है ख़त खून से स्याही न समझाना
शहर की चिट्ठिया इतनी मजेदार नहीं होती थी
इसलिए उन पर भी क्या लिखना
हां तार भी होता था
जो बहुत ही भयानक होता था
तार आने का मतलब ही होता था
की कोई जरूर मर गया
तार खोलते वक्त पढने से पहले ही
रोना धोना शुरू हो जाता था घर में
चाहे किसी ख़ुशी को जल्दी से बताने को
भेज दिया हो किसी अपने ने
तार आने की खबर पूरे गाँव में
और
उस समय के शहरी मुहल्लों में भी
बहुत जल्दी फ़ैल जाती थी
और
लोग मुह लटकाए आने लगते थे
दुःख बांटने
चिट्ठिया सहेज कर राखी जाती थी
किसी कोने में या किसी संदूक में
एक और रिवाज था
चिट्ठी आने पर
पूरे परिवार को इकट्ठा कर पढने का
पढना भी तो
गाँव में कोई कोई ही जानता था
वही सबकी चिट्ठी बांचता था
अगर दूर रह रहे पति की चिट्ठी
पत्नी के लिए होती थी
तो
कुछ पढ़ कर कुछ छोड़ देता था
और कह देता था
की बाकी  बात
वो अपनी मेहरारू को बता देगा
और वो आकर बता देगी
तब कुछ ऐसी ही मर्यादाये होती थी
कोई दुःख का समाचार
चिट्ठी बांचने वाले की अचानक
हिलते हुए ओठो और आँखों से
ही पता लग जाता था
क्योकि कुछ पल वो चुप हो जाता था
दुःख दूसरे का था पर सब रोते थे
जसे
पहले लड़की किसी की भी विदा होती थी
पर रोता पूरा गाँव था
फिर रोना पूरा कर वो बांचता था चिट्ठी
कुछ चिट्ठिया
छुपा कर भी रख देने का रिवाज था
कुछ घर में षड़यंत्र के कारण
और
कुछ हंसी ठिठोली के लिए
इतिहास में तो चिट्ठियों ने
बड़ी बड़ी क्रांतियाँ करवाई है
तो ज्ञान का प्रसार की किया है
बहुत से जाने मने लोगो की चिट्ठिया
तो आज तक रौशनी का काम करती है
अगर प्रकाशित हो गयी है
या पाण्डुलिपि के तौर पर मौजूद है
क्या होता था जब कोई अपना
कही चला जाता था
तो रोज डाकिये का इन्तजार करना
और
अकसर डाकघर तक चले जाना
पूछने के लिए
की
हमारी कोई डाक है क्या
मिल गयी तो नेमत पाने की ख़ुशी
और नहीं तो उदास होकर लौटना
कितना रोमांच था जिंदगी में
बहुत सी चिट्ठिया
असली भावना का प्रवाह होती थी
मन भी भीग जाता था और भावनाए भी
मेरे पास भी है
सहेज कर रखी हुयी कुछ चिट्ठिया
एक अपने पिता की आखिरी चिट्ठी
और कुछ अपने हमसफ़र की
जिन्हें मैं अक्सर पढता हूँ
अक्श उभर आते है हमेशा उनके
जब भी वो चिट्ठियां पढता हूँ
तो काफी दिन का  दर्द
आँखों के रास्ते बह जाता है
जी हाँ चिट्ठिया क्या होती थी
आज के लोग क्या जाने
और क्या जाने
उनके आने के इन्तजार का मज़ा
और
उनको बार बार पढने
तथा सहेजने का मज़ा
हो सके तो चिट्ठिया लिखिए
और
नयी पीढ़ी को लिखना सीखाइए
मोबाइल और फोन अपनी जगह है
और चिट्ठिया अपनी जगह
वाह रे चिट्ठियां




रविवार, 11 अगस्त 2019

हां जीवन इसको कहते है |

जिंदगी

कब होगी पहचान हमारी

इतने सालो से है दूरी

क्या मजबूरी

जिन्दा तो है

पर क्या सचमुच

क्या जीवन इसको कहते है

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू 

नीद नहीं और पेट में हलचल

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ

बस अन्धकार है

क्या जीवन इसको कहते है

जीवन कब हमको मिलना है

या फिर ऐसे ही विदा करोगे

कुछ तो सोचो

हम दोनों क्या जुदा जुदा है

कुछ तो बोलो

और भविष्य के ही पट खोलो

या फिर कह दो

हां जीवन इसको ही कहते है |

जींना है तो हंस कर जी लो

या फिर दर्द गरल को पी लो

तेरे हिस्से में बस ये है

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ

चल अब सो जा

अच्छे सपनो में आज तो खो जा

कल फिर मुझसे ही लड़ना है

हां जीवन इसको कहते है |

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

सपने देखता है

कितना बुद्धू था वो कि सपना देखता था
और सपने मे सबको अपना देखता था
उसे पता नही था कि सपने तो सपने होते है
वो तो सोने मे कल्पनाओ की उड़ान होते है
जागने पर वो कब अपने होते है
ये सपने क्या से क्या बनाते है और कहा ले जाते है
पर जब टूटते है तो किस कदर रुलाते है
इसलिये छोडो सोते हुये सपने मत देखो
हा देखो खुली आंखो से देखो खूब देखो
हकीकत के आसपास देखो
और हकीकत कभी धोखा नही देती
न सपनो का न अपनो का
अपनो की छोडो उस सपनो के पीछे लग जाओ
जो तुम्हे बुलंदी पर ले जाते हो
और तमाम तुमसे नफरत करने वालो को भी तुम्हारा अपना बनाते हो
आप सपना सपना खेले
बनाये सपनो के लिए बुनियाद
और अपनी इमारत बुलंद करने को चाहे जो झेले
पर बुलंदी पर पहुच कर मेहनत और लगन के सफलता का झन्डा फहराए
और ऐसे जंम जाये की फिर नीचे उतर कर न आये ।