शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

अपने जुल्म और हमारे इश्क की ये इन्तहा देखो

अपने जुल्म और हमारे इश्क की ये इन्तहा देखो
की मर गया मैं पर खुली आँखे तुम्हे तलाश रही |

देखना मुझ पर हमला कौन करता है

देखना मुझ पर हमला कौन करता है

अपनों की जेब में ही हैं खंजर छुपे हुए ।

तुम्हारे प्रेम में बर्बाद हो गया है कौन

तुम्हारे प्रेम में बर्बाद हो गया है कौन
कोई चिंता नहीं बंसी बजा रहे हो तुम |

मैं एक पत्ता नहीं हवा में उड़ा दे कोई

मैं एक पत्ता नहीं हवा में उड़ा दे कोई
जमीन में धंसी मेरी जड़े इमान की,
होगी उनके पास ताकत शैतान की
पर मेरे पास है इंसानियत इंसान की |

मैं हमेशा दरवाजा खुला रखता हूँ अपना

मैं हमेशा दरवाजा खुला रखता हूँ अपना
जाने कब कोई हवा का झोका आ जाये ।

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

मैं ढूंढ रहा हूँ खुद को

मैं ढूंढ रहा हूँ खुद को
कुछ दिनों से
पर भटक जाता हूँ
रास्ता तलाश करते करते
केवल अँधेरा हाथ आया है
अब तक
अँधेरे में रास्ता नहीं दीखता
तो कैसे ढूंढ मैं खुद को
रास्ता तलाश करते करते
कितनी बार गिरा मैं
और कितनी बार टकराया हूँ
पता नहीं किस किस चीज से
सर फूट गया है टकरा कर
बह रहा है खून लगातार
केवल सर क्यों ,यहाँ तो
अंग अंग घायल हो गया है
और
दिल तो छलनी हो गया है
मन और अस्तित्व
विलीन हो गए है
कही अनंत में
और मैं ,मैं हूँ ही कहा
मुझे तो ख़त्म कर दिया है
मेरे बहुत अपने ने
तो क्या ढूँढना खुद को
बस घिसट रहा हूँ
अपनी लाश लिए
अब
अपनी लाश के बोझ ने भी
थका दिया है बुरी तरह
नहीं चल पाउँगा और
अपने पैरो पर
पर कोई कंधे भी तो नहीं
जिनका सहरा मिल जाये
या जिनपर लद कर जाऊं मैं ।

सोमवार, 4 नवंबर 2013

नहीं जन्म ले रही है कविता कई दिनों से

नहीं जन्म ले रही है
कविता कई दिनों से
कलम चलती ही नहीं
दिल सूख गया है
कोई हलचल नहीं होती
तो कैसे जन्म ले कविता
कुछ नहीं सूझता अब
लगता ही नहीं कि कुछ जीवन है
और
उसमे कुछ करना भी है
जैसे एक बड़ा ह्रदय आघात
ख़त्म कर देता है सब कुछ
वैसे ही किसी आघात ने
ख़त्म कर दिया है मुझे
और जो ख़त्म ही हो गया
उसकी कैसी हलचल ,क्यों हलचल
बस जिन्दा लाश के सामान
घिसट रहा हूँ बस समय पूरा करने को
तो कहा से कविता पैदा होगी
और कैसे चलेगी कलम ।

मेरी हुंकारों से तुझमे , जोश नहीं आया है क्या

मेरी हुंकारों से तुझमे , जोश नहीं आया है क्या
धनुषी टंकारों से तुझमे जोश नहीं आया है क्या
क्या मैं टेरू अर्जुन को कि गांडीव तुझे पकड़ा जाये
क्या कर्ण का कवच कुंडल ही है तुझको ललचाये 
क्या परशुराम का फरसा ही तुझको अब ताकत देगा
जिससे समुद्र डरा था क्या वो तीर तुझे हिम्मत देगा
क्या चन्द्रगुप्त को ले आऊं मैं तेरी युद्ध कहानी में
चाणक्य और द्रोनाचार्य भरे अब जोश तेरी जवानी में
तू कब उठ कर ललकारेगा बतला अब अर्जुन वीर मुझे
तू दुश्मन को कब मरेगा बतला अब अर्जुन वीर मुझे
तेरी सेना खड़ी तो हुयी गांडीव की टंकार सुनेगी कब
तू कब शंख को फूंकेगा युद्ध की ललकार सुनेगी कब
कब समझेगा युद्ध न्याय का न्याय सभी को देने को
सामने जितने अन्यायी हैं सबको अंतिम गति देने को
तुझको ईश्वर ने भेजा है और जनता ने ये ताकत दी हैं
अब अपना वचन निभाना है सबका कर्जा लौटना है
चल अर्जुन अब मोह छोड़ चल अब गांडीव उठा ले तू
बस जीत का लक्ष्य सामने और इसको लक्ष्य बनाले तू
फिर निश्चित जीत तुम्हारी है हर बाधा तुमसे हारी है
इस बार तुम्हारी बारी है और अब आगे की तैयारी है
अब देख तेरा जयगान यहाँ तेरा है कितना मान यहाँ
कुछ ऐसा कर जा तू अब तो बस तेरा हो सम्मान यहाँ
थोडा कठोर बन जा अर्जुन बस थोडा जोर लगा अर्जुन
फिर हर तम तेरे से हारेगा ,तू हर दुश्मन को मरेगा
लोगो का हक़ दिलवाएगा और आगे बढ़ता जायेगा ।



ये दिया है पर सूरज को भी ललकारेगा

ये दिया है पर सूरज को भी ललकारेगा
अँधेरा हो कैसा भी पर ये उसको मारेगा 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

कुछ खास नहीं है सब आम हो गया

कुछ खास नहीं है सब आम हो गया
आदमी था काम का बेकाम हो गया ।

वो तो आये ही थे बस हाल पूछने मेरा
और मैं तो मुफ्त में बदनाम हो गया |

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

क्या किसी ने भैंसे पर आने वाले मौत के देवता को देखा है ?

क्या किसी ने भैंसे पर आने वाले
मौत के देवता को देखा है ?
क्या किसी ने रावण को या
कंस को देखा है ? नहीं !
पर मैंने तो सबको देखा तो नहीं
पर महसूस किया है हर वक्त
अपने आसपास
और बहुत कोशिश कर भी
इनसे पीछा नहीं छुड़ा पाता हूँ मैं
मैं इनसे दोस्ती करता हूँ
ये मुझे काट लेते है बहुत जोर से
मैं इनसे भागता हूँ
ये मेरा पीछा नहीं छोड़ते हैं
और लगातार
मेरे पीछे जासूस लगाये रखते है
और मौका ढूँढते रहते है की
कब मै जरा सा गाफिल हो जाऊं
और ये मौत बन कर दबोच लें मुझे
कभी देखा है आप ने किसी की मौत को
इस तरह पीछा करते,नहीं ना
तभी तो मैं सबसे अलग हूँ
खुश रहो दुश्मन दोस्तों
क्योकि तुम अमर हो, अजर हो
तुम ही तय करोगे ,पृथ्वी का ख़त्म होना
तुम ही तय करोगे,इंसान की किस्मत
और तुम ही तो तय करोगे
अन्तरिक्ष की  व्यवस्था
कितने महान हो तुम
ये समय तय करेगा

मंगलवार, 18 जून 2013

पर बहुत कुछ टूट जाता है ।

देखा
बादल का फटना .
वैसे ही दिल फटता है
और मच जाती है तबाही
ये जो बारिश है
जिसमे बह रहा है सब कुछ
ये किसी के दर्द का एहसास
किसी के आंसू तो नहीं
देखो कितनी ताकत होती है
आंसू में ,दर्द में ,
की बस
तबाही ही आ जाती है
कही पृथ्वी पर तो
कही जीवन में
किसी को मत तोड़ो इतना
की फिर सम्हाल ही न सको
कुछ भी
अच्छी नहीं होती है तबाही
कैसी भी
जब कोई बहुत अपना
तोड़ देता है तो
आवाज नहीं होती है
पर बहुत कुछ टूट जाता है ।

किसी को ऐसे अपने न मिले ।

कभी कभी ऐसा
कैसे हो जाता है
कोई जो बहुत ही
प्रिय रहा हो आपको
उसी से घृणा हो जाये
आपको अति घृणा
उसको देखते ही
खौलने लगे आप
और ऐसा लगे की
आपका अस्तित्व
ही मिट जायेगा
उसी के कारण
कितना बदकिस्मत
होता है वो
जो अपने बहुत
अपने के द्वारा
ऐसी हालत में
पहुंचा दिया गया हो
क्या आप किसी
ऐसे को जानते है
क्या हाल है उसका
वो जी रहा है या
फिर मरा हुआ सा है
ऐसे अपनों से तो
दुश्मन अच्छे होते है
जो चौकन्ना रखते है
आपको और चेतन भी
ऐसी जिंदगी का क्या
आप घुट घुट कर
न जी रहे और न मर रहे ।
बस कुछ हो जाने का
इन्तजार कर रहे ।
किसी को ऐसे अपने न मिले ।


शनिवार, 15 जून 2013

सच में मैं रो नहीं रहा हूँ

मेरी आँखों से अक्सर 
आंसू आने लगते है
बिना किसी कारण और
दिल से निकलने लगती है
हिचकियाँ
कोई कारण नहीं होता है
सच कह रहा हूँ ।
मैं दबा डेता हूँ हिचकियाँ 
और छुपा लेता हूँ आंसू 
ताकि कोई खुद को 
उनका जिम्मेदार न समझ ले
अभी भी गीला हो गया है
पता नहीं क्या क्या
पर सच में मैं रो नहीं रहा हूँ 
बल्कि शायद मेरी आँख में 
कुछ चला गया होगा
तभी लागतार निकल रहा है 
ये खारा पानी 
जो मेरा स्वाद भी बिगाड़ रहा है ।
अब मैं कस कर भींच ले रहा हूँ खुद को 
फिर आवाज़ कही सुनायी नहीं पड़ेगी 
और ये खारा समुद्र भी सूख ही जायेगा 
थोड़ी देर में ।
सच में सच कह रहा हूँ मैं ।
मैं रो नहीं रहा हूँ ,सच में ।

सोमवार, 6 मई 2013

तुम सूरज हो ? कैसे सूरज ?

सूरज !
तुम सूरज हो ?
कैसे सूरज ?
किसके सूरज ?
तुम जब पूरब से उठते हो 
हमको तुम रोशन करते हो
पर ताप बहुत देते हो 
जिनके पास नहीं है छाया
उनको कितना झुलसाते हो
थोडा पच्छिम को क्या जाते
जाकर वही डूब जाते हो
पूरब पच्छिम का ये अंतर
तुमको भी मालूम नहीं था
पर जब तुम ऊपर होते हो
कितना तुम्हे घमंड होता है
आँख नहीं तुम पर उठती है
तुमने सोचा ,तुम न होगे
तो क्या होगा ?
दुनिया तब कैसे देखेगी
पर देखा तुमने
नन्हा दीपक खड़ा हो गया
तन कर औ, धीरे से बोला
मैं तो हूँ ना ,जाओ सूरज
अन्धकार अब मैं तोडूंगा
सूरज हो या व्यक्ति हो
कोई अंतिम नहीं यहाँ पर 
कुछ न रुकता किसी के कारण
सूरज हो या व्यक्ति हो
घमंड सबका टूटा है
तुम सूरज हो ,कैसे सूरज
सूरज का होना क्या होना
जब गिर जाते हो तुम भी
जाकर उस पच्छिम में
जिसके पीछे जाकर 
इन्सां भी भटका है
तो क्या फर्क है तुममे औ
इन्साँ में सूरज
तुम सूरज हो ,कैसे सूरज । 





रविवार, 21 अप्रैल 2013

छुपी हुयी सिसकियाँ ।

कुछ लोगो को क्यों
घायल करते है अपने ही
पूरी शक्ति भर
पूरे सामर्थ्य भर
वे चाहे वो हो जिनपर
आश्रित होते है आप
चाहे वे हो जो
आपके ही टुकडे हैं 
आप कहा कहा घायल हैं 
आप भी नहीं जानते
बस रिस रहा है कुछ
हर तरफ से
जिसका इलाज नहीं
किसी के पास
हैं ,तो -----बस ------
छुपी हुयी सिसकियाँ ।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

हम गरजे बहुत और वो भी बरसे बहुत

हम गरजे बहुत और वो भी बरसे बहुत
हम तो चुप हो गए, वो भी चुप हो गए ।
जब वो गरजे बहुत हम भी बरसे बहुत
अब वो चुप रह गए हम भी चुप हो गए । 

जिंदगी में क्या किया, पैदा हुए खाया पीया मर गए

जिंदगी में क्या किया, पैदा हुए खाया पीया मर गए
या पैदा हुए,ये किया,वो किया और कुछ तो कर  गए 
जिए तो अपने लिए और मरे तो बस अपनों के लिए 
या कुछ देश,समाज औ इंसानियत के लिए कर गए ।

चमचे चुगलखोर दोनों महान है

चमचे चुगलखोर दोनों  महान है
वाह वाह देखो क्या इनकी शान है

भूखे नंगे थे ये अब करोडो वाले है
सभी को चूस गए मकड़ी के जाले है
बड़े बड़े ज्ञानी इनसे धोखा खा गए
ऐसी खास ताबीज गले में डाले है

जी हाँ सचमुच ये बहुत ही महान है



सोमवार, 1 अप्रैल 2013

बस तुम्हारे लिए, लेकिन

मैं चाँद पर चढूँगा तुम्हारे लिए 
चढूँगा भी, पर
अभी मेरे पैरों में दर्द है
मैं तारे तोड़ लाऊंगा
तुम्हारे लिए ,पर
हाथ थोड़े छोटे पड़ गए है
देखो मेरा दिल धडकता है
बस तुम्हारे लिए, लेकिन
मेरा दिल बहुत बड़ा भी तो है
इसलिए, इसमें समां गए है
बहुत से भांति भांति के लोग
चलना चाहता हूँ, सिद्धांतो पर
याददाश्त, कमजोर हो गयी है
याद ही नहीं रहे ,कोई सिद्धांत
मैंने तुमसे जो वादे किये थे न
वे भी मैं इसीलिए बार बार
भूल जाता हूँ
तुम बुरा मत मानो
मैं तो बहुत अच्छा हूँ
पर इन परेशनियो के कारण
ऐसा  हो गया हूँ
अब जैसा भी हूँ तुम्हारा या
बहुतो का ही हूँ ना
सब मिलकर मेरा कल्याण
करते रहो, क्योकि
तुम सब मेरे लिए हो, न
तुम सब नहीं बल्कि मैं
तुम सब की जिमेदारी हूँ ।
आओ अपना सब कुछ
न्योछावर कर दो मुझे
अपना अभीष्ट मान कर ।


शुक्रवार, 29 मार्च 2013

मजाक मजाक में कह देता हूँ

मजाक मजाक में कह देता हूँ
बहुत कुछ सच ,पर 
वो समझते है कि मजाक है
ये कितना बडा मजाक है
मेरी जिंदगी के साथ
मेरी भावना के साथ
पर खुश रहो मेरे दोस्त
तुम मजाक मान कर भी
बहुत कुछ ऐसा कह जाते हो
जो छू जाता है मेरे मन को
सहला जाता है मेरे वजूद को
और सिहरन पैदा का जाता है
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व में
चलो यही सही
तुम इतना ही करते रहो
ये भी तो एक एहसान है
एक टूटे हुए इंसान के ऊपर
खुदा तुम्हे सलामत रखे
ताकि
तुम मजाक कर सको और उसे
मजाक ही समझते रहो
ज़िन्दगी भर
क्या पता
जिंदगी की डोर कब टूट जाये
कम से कम तब तक । 

सोमवार, 25 मार्च 2013

तुम्हे सब पता है मैं जानता हूँ

तुम्हे सब पता है
मैं जानता हूँ
मुझे सब पता है
तुम जानते हो
हम दोनों सब जानते है
पर दोनों ही चुप हैं
अपने लबों को कसकर
भींच रखा है
हाथो को पकड़ रखा है अपने ही
जज्बातों को बांध रखा है
पर तूफ़ान आता है जब
तटबंध टूट जाते है तब
तो बस चारो तरफ
सैलाब ही सैलाब होता है
और बह जाता है सब कुछ
ये जानते हुए भी
हमने बांध बना रखे है
अन्दर भी बाहर भी
टूट जाये सब कुछ
और आये तबाही
उससे पहले ही क्यों न
खोल दे सारे बंधन
उन्मुक्त होकर उड़ जाये
अनन्त आकाश में
स्वछन्द होकर
न तुम, तुम रहो,
न हम, हम रहे
बस कोई और बन जाये दोनों
जमीन पर आकाश पर
उस नीले पानी के अनन्त छोर तक
जहा जहा भी कुछ भी है वहा तक ।


रविवार, 3 फ़रवरी 2013

दीवारे भी साथ छोड़ देती है उनका ।

कुछ लोग, अकेलापन ढूढने को
भटकते है, कहा कहा और
आनंदित होते है, उसे पाकर
अपने अपने हालात में
पर कुछ, अकेलेपन से डर जाते है
आतंकित होने की हद तक
और शायद यही आतंक
उन्हें और उनके वजूद को, समझ को
झकझोर देता है, इतनी बुरी तरह
की वे, हर पेड़ पौधे,हर दीवार को
पकड़ने की कोशिश करने लगते है
वहशियाना अंदाज में
हाथ कुछ नहीं आता उनके
सिवाय अकेलेपन के, और
दीवारे भी साथ छोड़ने लगती है, उनका ।                                                                                                          

                                                                                                                                                                                                                                                                          

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

मेरा अपना दोस्त ही क्यों न लौटा देते

कितने बदकिस्मत होते है वे
जिनका कोई साथी नहीं होता
उन गिने चुने लोगो में एक मै भी
कभी कोई साथी नहीं मिला मुझे
जब छोटा था तो
गरीब था, इसलिए अमीर नहीं बने
जो गरीब थे, वे अमीर समझ कर
साथी नहीं बनते थे
कितनी दोहरी जिंदगी थी मेरी
मैंने गरीब को दिखाया अपना
बिना जूतों वाला पैर स्कूल में
पर उसने विश्वास नहीं किया
अमीर को दिखाया, पिता का नाम
पर जेब देख कर, वो नहीं माना
इस तरह, मेरा कोई दोस्त नहीं बना
समाज व्यवस्था में, एक दोस्त बना
व्यवस्था की मजबूरी के कारण
वो मेरी पत्नी थी
पर जिसकी किस्मत में, दोस्त न हो
उसे पत्नी दोस्त भी क्यों और
ईश्वर ने छीन लिया, ये दोस्त भी
बिना दोस्त के जिंदगी क्या
पर सवाल तो अपनी जगह है की
मेरा कोई दोस्त नहीं है 
नकली दोस्तों
मै जनता हूँ की, मै बहुत अकेला हूँ
अपनों की भीड़ में भी
मेरा अपना दोस्त ही, क्यों न लौटा देते
जैसा भी था ,पर मुझे तो प्यारा था ।

कल रात वो मुझसे मिली सपने में

कल रात वो मुझसे मिली सपने में
दुनिया से जाने के इतने सालो बाद
कुछ नहीं बोली बस देखती रही
टुकुर टुकर मेरी तरफ
आँखे गीली थी
फिर झरना बन गयी 
फिर भी कुछ नहीं बोली
बस निहारती रही मुझे निरीहता से
मुझे बेबस और टूटता देख कर भी
कुछ नहीं कर पाने ,सहारा नहीं दे पाने
प्यार से सहला नहीं पाने की बेबसी से
फिर कातर निगाहों से मुझे देखा और
मुस्कराने की मुश्किल सी कोशिश की
और फिर हाथ हिलाती चली गयी
मै समझ नहीं पाया देख नहीं पाया की
मजबूत होकर रुकने का इशारा था
या फिर बुला गयी, मुझे भी अपने पास ।

मै सबसे अलग हूँ ।

पता नहीं क्यों आजकल
कुछ बिखरता रहता है हर वक्त 
कुछ टूटता रहता है अंदर अंदर
पता नहीं कहा से पैदा हो गया है
आंसुओ का सैलाब अंदर अंदर
निकलता है तो वेग के साथ
और रोकता हूँ तो उफनता हुआ
बांध बन जाता है
बांध जब सचमुच टूटेगा अंदर का
तो क्या वैसी ही तबाही फैलाएगा
जैसी फैलाता है जमीन पर बांध
बांध को कस कर रोकना ही होगा
चाहे रोकने में खुद को मिटना पड़े
पर बहुत कुछ हर क्षण
ख़त्म हो रहा है, छीज रहा है
अंदर अंदर
क्या सभी के साथ ऐसा ही होता है
क्या सभी अपनों बहुत अपनों
के ही मारे और सताए हुए होते है
नहीं न ! तभी तो लोग कहते है की
मै सबसे अलग हूँ ।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

वो रौंदी गयी बार बार

वो रोयीं थी जब उसको
रौंदा गया था बार बार
उसे लगा की कोई तो होगा
इनमे से, जो बाप या भाई होगा
और, बचा लेगा उसे इस रिश्ते से
पर भाई ही, कसाई हो चुका था 
जो नहीं हुए, वो तमाशबीन थे
वो रौंदी गयी बार बार
जो रौंद रहे थे
थोड़ी देर बाद वही, किसी को
बहन कह कर पुकारेगे
किसी को, माँ कह कर लिपटेगे
किसी को, बेटी कह कर गोद में उठाएगे
और तब, भूल जायेगे की थोड़ी देर पहले
उसने एक माँ ,बेटी और बहन को रौंदा था
आज ही वह किसी मंदिर जायेगा
की उसे इस गुनाह की सजा से बचा लो
माँ ,देवी माँ 
और भूल जायेगा की, थोड़ी देर पहले उसने
इन्ही देवी माँ की अस्मिता को गाली दिया है
क्यों भूल जाते है लोग, आखिर क्यों
क्यों हर पल कोई बेटी बहन या माँ
रौंदी जाती है, अपनों द्वारा ही
क्या कोई कृष्ण नहीं देख रहा इसे
जिसने केवल साड़ी खींचने पर
भारत को, महाभारत दे दिया
क्या कोई राम नहीं है शेष जिसने
सोने की लंका को खाक कर दिया
नहीं ,तो फिर ये मेरा महान भारत नहीं
कही खो गया मेरा वो महान भारत
जवाब कौन देगा ,हिसाब कौन देगा 



गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

मैंने कसम खाई सच पर चलते जाने की

मैंने कसम खाई सच पर चलते जाने की 
लोगो की भी जिद है बस मुझे मिटाने की
चाहे कितनी ताकत हो या आंधियां चले
मेरी जिद फिर भी एक दिया जलाने की ।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

चमचे महान थे ,अब परेशांन है

चमचागिरी चुगलखोरी
ऊपर ऐसी सीना जोरी
राजनीती वाह वाह
चमचे महान है
करतबी इन्सान है
इन्सान है या नहीं
ये बड़ा सवाल है
ये बड़ा बवाल है
जहा कही कुछ मिले
सब चर जाते है
किसी का कुछ भी हो
अपने घर लाते है 
भूख नहीं मिटती है
निष्ठां नहीं टिकती है
मौसी हो मामा हो
सब ही शिकार है
बस पैसा प्यार है
राजनीती ही नहीं
रिश्ते भी व्यापार है 
चमचागिरी जिंदाबाद
चुगलखोरी जिंदाबाद
वफ़ादारी मुर्दाबाद
ईमानदारी मुर्दाबाद
राजनीती का हाल ये
खुद में सवाल ये
पर जवाब कौन दे
इसका हिसाब कौन दे
जो कान का कच्चा है
या मन का मजबूत है
जो सच्चा नेता है
देश का प्रणेता है
राजनीती सत्य हो
सत्य राजनीती हो
बस यही नीति हो ।
चमचे महान थे
अब वो परेशांन है
बस यही विधान है ।



मंगलवार, 20 नवंबर 2012

बड़े ही बेख्याल है, मेरे शहर के लोग

बड़े ही बेख्याल है, मेरे शहर के लोग
खुद में ही सवाल है मेरे शहर के लोग ।

भैये गुरु की आवाजें यहाँ गूंजती रहती
दोस्ती में मालामाल है मेरे शहर के लोग ।

कोई किसी का नहीं और सब सबके है
ये कैसा इंद्रजाल है मेरे शहर के लोग ।

दुनिया को प्रेम सिखाता है ताज का शहर 
नफ़रत से मालामाल है मेरे शहर के लोग ।

ये ताजमहल खा गया लाखो की रोटियां
पर ताज पर निहाल है मेरे शहर के लोग ।

पानी नहीं बिजली नहीं सड़कें नहीं यहाँ
पर खुश है खुशहाल है मेरे शहर के लोग ।

लूटे ,पिटे या गिर ही गए कोई गम नहीं 
चलते  ही मस्त हाल है मेरे शहर के लोग ।

पडोसी के घर डाका या बेटी ही उठ गयी
सुबह पूछते सवाल है मेरे शहर के लोग ।

चाट के दोनो और पीक से भर दिया शहर
हाँ साफ़ सुथरे लाल है मेरे शहर के लोग ।

जुम्मन या रामलाल की बेटी पर चटकारे
हर वक्त रंग गुलाल है मेरे शहर के लोग ।

वोट दिया जाति धर्म या खास वजह से
क्यों  पूछते सवाल है मेरे शहर के लोग ।

चलो तय करे सचमुच बदलेंगे शहर को
पर इसमें सुस्त हाल है मेरे शहर के लोग ।

क्या क्या कहूँ क्या न कहूँ अपने शहर को
मेरे है और मेरी ढाल है मेरे शहर के लोग ।

जिसे भी अपना मान दिल में जगह दे दिया
बने वही जी का जंजाल है मेरे शहर के लोग ।

कवाब ,भंग या शराब संग मस्ती में रहना है
खजाने का करते ख्याल है मेरे शहर के लोग ।

मेरा शहर तो हर  वक्त बस झूमता रहता 
जी हाँ खुद में सुर ताल है मेरे शहर के लोग ।

नाले है घर में बह रहे या घर ही बना नाला
जी हाँ तलैया और ताल है मेरे शहर के लोग ।






गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

क्या रावण जल गया ?



क्या रावण जल गया ?
ख़त्म हो आज रावण ?
जिसे हम कहते हैं रावण
वो बुराइयाँ मिट गयी ?
क्या जीत गया राम
तो कौन सा
जो वन वन भटका
सीता के लिए
और डाल दिया
उन्ही को आग में
भगा दिया किसी के
कहने पर जंगल में
उन बच्चो समेत
जो अभी पेट में थे
क्या रावण ने किया था
इससे बड़ा अपराध
वे अपराध क्या क्या थे ?
कोई ये भी तो बताये
कोई तो समझाए अच्छाई
बुराई की परिभाषा
कौन सी बुराई बड़ी और
कौन सी अच्छाई
हम जलाते रहेंगे रावण
और जिताते रहेंगे राम को
या कभी तय करेंगे ये भी
की क्या होगा दुनिया और
इंसानियत के हित में ?

शनिवार, 22 सितंबर 2012

इतने सालों के बाद दिल्ली को क्या हुआ

इतने सालों के बाद
दिल्ली को क्या हुआ
साठ साल होने पर
परिपक्व होते सब
पर यहाँ तो बचपन
एडियाँ रगड़ता है
आपस में झगड़ता है
रास्ता पता नहीं
वास्ता पता नहीं
अपना पराया हो
कोई खता नहीं
बस खाने का झगडा
फ़ैलाने का झगडा
क्या कमी रह गयी
पालन में पोषण में
संघर्ष में विश्वास में
जो किया जनता ने
इतने सारे सालों में
जो दिया जनता ने
इतने सारे सालों में
दिल्ली सम्हल जाओ
दिल्ली बदल जाओ
वरना इतिहास है
दिल्ली बदलती है
जनता बदलती है
जनता बदल देगी
अपना हक ले लेगी ।



दिल्ली क्या बोलती

दिल्ली क्या बोलती
रहस्य नहीं खोलती
भीतर भीतर खौलती
सबका सब तौलती
क्या होगा अगले पल
दिल्ली नहीं जानती
घनघोर अँधेरा है
ढूँढती सवेरा है
रास्ता दिखाए कौन
वाम तक पहुंचाए कौन
सबके मन में वार है
जेब में कटार है
बस मौका कब मिले
उसका इंतजार है
क्या दिल्ली कल बोलेगी
कुछ मन का खोलेगी
सब कुछ मौन है
रहनुमा कौन है
कोई है या कोई नहीं
ये नयी बात नहीं
दिल्ली बस नाम की 
बेदिल की दिल्ली है
बस मतलब दिल में है
चलाने को हथियार यहाँ
आँखों पर पट्टी बांध
हर कोई है तैयार यहाँ
जिसे चाहे जितना लगे 
पर केवल मेरा भाग्य जगे
दिल्ली का इरादा ये
दिल्ली का वादा ये
दिल्ली खामोश है
अंदर कितना शोर है
सोने का समय है पर
जागरण चारो ओर है
समुन्द्र का मंथन है
विष भी और अमृत भी
जनता को मिले केवल विष
अमृत पी जाते है
भेष बदल राक्षस कुछ
कहानी ये कभी और की
पर दिल्ली में है आज भी
युद्ध अभी जारी है
रक्षस और देवताओं में
दिल्ली और गांवों में ।




सोमवार, 17 सितंबर 2012

कितना बहादुर समझते है

कितना बहादुर समझते है
हम खुद को और सोचते है
कि आसमान पर उड़ेंगे
नाप देंगे समुद्र को
हवाएं हमारी इजाजत से चलेंगी
पहाड़ छोड़ देगा रास्ता
हम जैसे और जहा चाहेंगे
उड़ेंगे खूब उड़ेंगे
हममे आ जाता है भाव
अहम् ब्रह्मास्मि का
पर
एक छोटा सा झटका
एक छोटी सी बीमारी
डरा देती है हमें
जब अबूझ बन जाती है
और हम अचानक
जमीन पर आ जाते है
इन्सान बन जाते है
एक दम उस समय के लिए ।

शनिवार, 25 अगस्त 2012

ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

बारिश आयी
नदिया
खतरे के निशान से
ऊपर हुयी और बह गयी
बाढ आई
बहा दिए लोगो के
घर ,सुख चैन
और ख़त्म हो गयी
बाकी दिनों पूरा देश
पानी को तरसता है
जंतर मंतर और
रामलीला मैदान में
ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

होली नहीं खेलता मै

होली नहीं खेलता मै
बचपन बीतने के बाद से
बचपन कब बीता 
और मै बड़ा हो गया
पता ही नहीं चला
क्योकि 
अपने जिनके कारण हम 
बचपन पकडे रखना चाहते है
वे हाथ छोड़ झटक देते है 
बचपन को
साया देने वाले अधिकार को
खैर 
होली नहीं खेली बहुत साल से
तभी कोई आया 
हवा का झोंका बनकर
खाली जीवन में 
और अपने साथ लायी
एक मुट्ठी बदली और
बंजर जमीन पर नम हवा 
तथा
मुट्ठी भर बदली से निकली 
फुहार ने
उगा दिए कुछ पौधे
होली मै तब भी नहीं खेलता था
परन्तु 
रंगों से सराबोर हो जाता था
अच्छा लगता था
किसी का ठठा कर हँसना
खुद रंगा होकर सबको रंग देना
ठहाकों से तथा अपने रंगों से
मेरी बंजर जमीन पर उगे पौधे
जब एक दिन पहले 
तैयारी करते थे
कपड़ों की रंगों की 
तथा पिचकारी की
अगले सुबह ही उठकर 
शरीर पर मलते थे
तेल या क्रीम ,रंगों से बचने को
फिर रंग फेंकते थे ,बचते थे 
और
खुद रंग भी जाते थे सराबोर
फिर शीशे में खुद को पहचानना 
और
दूसरों को देख कर 
ठठा कर हँसना
फिर प्यार से गोद में बैठ कर 
अपने रंगों से 
सराबोर कर देना मुझे भी
कितना सुखद था ,
कितनी ऊर्जा थी
कितना जीवन था ,
जीवन का अर्थ था
फिर 
अचानक 
बुलावा आ गया किसी का
जहा से आई थी बदली
मै ही भूल गया था 
बादल आते है बरसते है ,
धरती को नमी देते है
कुछ बारिश रुक जाती है
जीवन बन कर 
जीवन के कुए में ,
तालाब में या झील में
और 
कुछ को 
सूरज सोख लेता है वापस
और 
पहुंचा देता है वही हर बूँद को
जहा से उसे दुबारा 
तय करना होता है सफ़र
इस क्रिया को भूल जाना 
और
न पकडे जाने वाली चीज को
पकड़ कर रखने की कोशिश ही 
शायद संबंध है,संवेग है 
और 
अनबूझ पहेली भी
मै फिर अकेला निहार रहा हूँ
लोगो को होली खेलता 
होली की बात करता
मैंने भी सन्देश भेज दिया 
और हो गयी होली
धीरे धीरे मेरे पौधे भी 
अपनी नयी जमीन पा गये
जहा वे विस्तार पा सके
और 
फिर मेरा भी 
सफ़र शुरू हो जायेगा
अपनी बदली को ढूढने और
उसमे समाहित हो जाने को  ।





ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है

ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है 
जीवन में आती है तो जीवन बिगाड़ देती है ।
इतना मत इतराओ अपने दौड़ने पर यारो
ये आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

संसद में ये बहस है कि बड़ा चोर कौन

संसद में ये बहस है
कि बड़ा चोर कौन
संसद भी है मौन
सांसद भी मौन
ये बड़ी बहस है
निर्णय करेगा कौन
वोटर हैरान है
मानस परेशान है
मौन संविधान है
ये कौन सा विधान है
सब लोकतंत्र लोकतंत्र
खेल रहे है
हम तठस्थ बन कर
इन्हें झेल रहे है
फिर सवाल अपनी जगह
ही खड़ा हुआ
हमारी तटस्थता से बड़ा हुआ
कौन बड़ा चोर है
कुछ लोग या हम सब
क्योकि हम तठस्थ है
नून तेल में व्यस्त है
देश चाहे रहे या भाड़ में जाये
जहा कही माल हो
मेरे घर में आये
तब क्या सवाल है
काहे का मलाल है
कौन बड़ा चोर है
तोर है या मोर है
पर अब तय ये रहा
हम सब चोर है
या तो जागो खड़े हो
संसद से भी बड़े हो
या फिर सत्ता सौप दो
राजा रजवाड़े को
और खुद को सौंप दो
भेड़ वाले बाडे को
लोकतंत्र का खेल
हो गया है झेलमझेल
या संविधान बांच ले 
पुरसार्थ मांज ले
अपना ज्ञान जाँच ले
और तिरंगा थाम ले
बापू ,सुभाष नाम ले
देश के सवाल पर
जाति ,धर्म छोड़ दो
बस अपने स्वार्थों
का रुख जरा मोड़ दो
संसद जगा दो तुम 
भ्रस्टों को भगा दो तुम 
देश को मजबूत कर
मत डर ,मत डर ,मत डर  ।


क्या फर्क है माँ और माँ में

आपने देखा है
उस चिड़िया को
परेशान चीखते हुए
और मंडराते हुए
घोसले के आस पास
किसी से अपने बच्चो की
सुरक्षा की चिंता में
जिसका मुकाबला नहीं
सकती है वो
कभी देखा है किसी माँ को
टपकती छत से हर तरह
जतन कर भीगने से बचाती
अपने छोटे बच्चों को
मैंने दोनों को गौर से देखा है
क्या फर्क है माँ और माँ में
चाहे ओ इन्सान हो या चिड़िया
माँ खुद पर ले लेती है
हर मुसीबत
और बचा लेती है बच्चो को
अपनी सामर्थ्य भर
पर क्या बच्चो को याद रह जाता है
ये सब
नहीं न
क्योकि वे तब अबोध बच्चे थे ।

बेटियां खीच लेती है

बेटियां खीच लेती है
सारा प्यार पापा का
और बेटा दीदियों से
प्यार खीच लेता है
और माँ से भी
कभी माँ ही पिता और
पिता ही माँ दोनों हो जाते है
अनचाहे कारणों से
तब प्यार बंट जाता है
बराबर बराबर
पर फिर भी बेटियां
पा जाती है ज्यादा प्यार
और बेटा बन जाता है संबल ।

तन है ,मन है और मस्तिस्क

तन है ,मन है और मस्तिस्क
शरीर है ,दिल है और दिमाग
दोनों एक ही है
तन की तड़प अपनी है
मन की तड़प अपनी है
और मस्तिस्क की अपनी
शरीर, दिल और दिमाग की
भी यही ,दोनों एक है ना ,
शरीर कुछ चाहता है
मन रोक नहीं पाता 
और मस्तिस्क भी
मन कुछ चाहता है
और शरीर साथ नहीं देता
मस्तिस्क विद्रोह कर देता है
कभी कभी
मस्तिस्क रास्ते तय करता है
मन विचलित हो जाता है
और शरीर अलग चला जाता है
लड़ते रहते है तीनो ज्यादातर
कभी कभी ही तीनो एक ही
दिशा में चलते है
और जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

दिल है और दर्द है

दिल है और दर्द है
दिल हँसता है
दर्द रोता है
जब दिल रोता है
तो दर्द हँसता है
और दोनों के बीच
कोई दर्द के कीचड में
धंसता है
वो मै हूँ या आप है
या और कोई
पर कहानी तो सच्ची है
दिल की और दर्द की ।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

इतनी जिंदगी बीत गयी

इतनी जिंदगी बीत गयी
संघर्ष के साथ ,
पर पहली बार लग रहा है
की थकने लगा हूँ और अब बस
और क्या संघर्ष करना
और किसके लिए करना
पर मै फिर खड़ा होऊंगा
और चल पडूंगा
क्यों की मेरा स्वाभाव
थकना और पलायन नहीं है ।

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कितने बदकिस्मत होते है

कितने बदकिस्मत होते है
वे लोग
जिन्हें दूसरे नही अपने ही
मारते है बार बार
वो मार खाकर गिरता है
फिर हिम्मत जुटा कर उठता है
सोचता है अब चलूँगा मै भी
कि फिर कोई बहुत अपना
तोड़ देता है उसके पैर
फोड़ देता है उसकी आँखें
और कुचल देता है
उसके चलने के इरादे
क्या करे ये बदकिस्मत
छोड़ दे हर अपने को
क्योकि
बाहर वाले तो कभी
कुछ बिगाड़ नहीं पाए
वो कैद हो गया है
अपने  जो दुश्मन है
उनकी कैद में ।




शनिवार, 7 जुलाई 2012

हजार बार खुद को अजमाया हमने

हजार बार खुद को अजमाया हमने
हमेशा खुद को मजबूत पाया हमने ,
लोग कहते है  अब की  डूब जाओगे
पर बीच समुंदर  तैरता पाया हमने ।