बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

जिंदगी भी क्या है --

जिंदगी भी क्या है --
धीरे धीरे सब चले जायेंगे
और मैं अकेला हो जाऊँगा
फिर
एक दिन मैं चला जाऊँगा
और सब अकेले हो जायेंगे

हवाए देख कर कितनो ने हम पर धूल फेकी है

हवाए देख कर कितनो ने हम पर धूल फेकी है
हमने बस पीठ फेर ली यारो तो बुरा मान गए ।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

जब चाहो तुम किसी का भी दिल तोड़ दो मालिक हो

जब चाहो तुम किसी का भी दिल तोड़ दो मालिक हो
जब चाहो किसी का भी मुकद्दर फोड़ दो मालिक हो
जब चाहो आसमान पर उडो या जमीन पर झांक लो
जब चाहो तुम जिससे नाता जोड़ लो तुम मालिक हो |

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

कोई सवाल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल

कोई सवाल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल
कोई बवाल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल
पेट  रख दे किसी सिद्धांत की किताब में तू
भूख ,ख्याल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल |

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है
दरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |
हम तो लुटते रहे हर वक्त हर चौराहे पर
वो हर चौराहे पर ही दूकान लिए बैठे है |
हम बने सीढियां तो मीनार तक वो पहुचे
हम सीढ़ी रह गए वो भगवान् बने बैठे है |
बड़े बड़े थे वादे सबकी कहानी बदलेगी
हम पत्थर भी नहीं वो भगवान बने बैठे है |
लावारिश होते कई लोगो को हमने देखा है
स्वयंभू भगवान आज बे पहचान बने बैठे है |

इतना भी मत इतराओ की आज सूरज हो
सब दफ्न होते है वो शमसान हमने देखा है |
हमारा क्या जमी पर गिर के वही रह जायेंगे
आसमां से गिरे को लहूलुहान हमने देखा है |
कर सको तो नीव की ईंटो की भी क़द्र करो
वर्ना जमीदोज होते कई मकान हमने देखा है |


रविवार, 24 अगस्त 2014

एक चापलूस ने एक सरकार को जमीदोज किया

एक चापलूस ने एक सरकार को जमीदोज किया
लोग कहते है बहुत ख़ास है हमेशा साथ रहता है ।

मैं मर भी जाऊं तो क्या होगा

मैं मर भी जाऊं तो क्या होगा
शायद अगर हुआ तो
चार कंधे
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले
कुछ क्षण की
कुच्छ सिसकियाँ
कुछ कहानिया
कुछ शिकायतें
कुछ झूठी अच्छाइयां
बहुत सी बुराइयाँ
क्या किया जीवन में
बेकार था कुछ न किया
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया
नालायक था कुछ नहीं किया
बार बार बोर होकर भी
दोहराई जाती वही कहानियां
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ कुछ कम हुआ
लो तेरही भी आ गयी
ये भी खर्च कवाएगी
कोई रिश्तेदार रुक न जाये
चलो सब चले गए
अब देखो कहां क्या क्या है
बाट लो किसका क्या है
और
चल पड़ेगी जिंदगी
अपने अपने रस्ते पर
एक कोने में टंगी तस्वीर
साल में एक बार शायद
बदलेगी माला
और हाथ जोड़ कर भागते हुए लोग
आज तो देर हो गयी इस चक्कर में
पता नहीं क्यों बने है ये रिवाज
इसलिए
मेरे लिए मेरी वसीयत है
की
कोई नहीं रोयेगा
बिजली में जला देना मुझे
किसी नदी में नहीं बहाना मुझे
मैं नहीं मानता कोई पूजा इसलिए
न कोई पूजा और न उठावनी तेरही
अगले ही पल से सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो
मेरे लिए न कभी कोई पारेशान हुआ
न किसी को होना है
वर्ना मैं परेशान हो जाऊंगा
कुछ नहीं है मेरे पास
की कोई लडे की किसका क्या
बस मेरी यादे कभी क्रोध लायेंगी
की नालायक बाप ने कुछ नहीं किया
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी
कुछ नहीं होगा
सब जैसे था वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही मेरी वसीयत है
जो किसी काम नही आएगी
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ
कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और मैं भी चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा
शायद लावारिश होकर
की किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

बुधवार, 16 जुलाई 2014

अन्दर इतना तूफ़ान सा क्यो है

अन्दर इतना तूफ़ान सा क्यो है
मन इतना परेशांन सा क्यो  है
न कोई बात है,न कोई भाव ही
दर्द इतना मेहरबान सा क्यो है |

दर्द मन में,दिमाग में,लहू में भी
दर्द तन में,दिल औ वजूद में भी
दर्द साँस ,धड़कन औ रूह में भी
ये दर्द हुआ आसमान सा क्यूं है |







शनिवार, 12 जुलाई 2014

लो अब मैं चला तुम खुश तो हो

लो अब मैं चला तुम खुश तो हो
आज सूरज ढला तुम खुश तो हो
देखो बंद हुयी मेरी जुबान आज
बोलने से परेशांन थे खुश तो हो|

सच दो लफ्ज और झूठ भारी है
झूठ हुआ आसमान खुश तो हो
झूठ और लुट तुम्हारे मेहमान है
और जनता बेजुबान खुश तो हो|

ये आदमी नागिन बन गया यारो
नाग है परेशांन तुम खुश क्यों हो
मैं चला तुम्हारी दुनिया छोड़ कर
न जहर न एहसान तुम खुश तो हो

रविवार, 15 जून 2014

जहा केवल एक कमाता हो बाकी सब केवल खाते और फैलाते हो

जहा केवल एक कमाता हो बाकी सब केवल खाते और फैलाते हो
कितना भी भरा पूरा घर हो और हो आमदनी उसे कौन बचाएगा |

ईमानदारी वफ़ादारी और शर्म कही मैं टांग आया हूँ

ईमानदारी वफ़ादारी और शर्म कही मैं टांग आया हूँ
तेरी मेहनत तेरी कुर्बानिया मेरे किस काम आएँगी |

तू मेहनत कर संघर्ष कर और सरकार बनाता जा
मैं खाता जाऊंगा तेरी खेती बस तू हल चलता जा |

इरादे देख कर तेरे अब चौकन्ना हो गया हूँ मैं

1-इरादे देख कर तेरे अब चौकन्ना हो गया हूँ मैं
  या तू  मुझको मरेगा या अगला युद्ध हारेगा |


2-छल एक जीत दे सकती पर स्थाई नहीं होती
  टिकने के लिए तो सबका ही विश्वास चाहिए |


3-अभिमन्यु को मारा था तो क्या युद्ध जीता था
   कभी कुछ भेडिये मिल कर शेर को भी मार देते है


4-जितने लोग तेरे यहाँ व्यापार करते है ,
    उतने तो हमारे सीमा पर कुर्बान होते है | 

5-जितना तूने सबका खून बहा दिया  ,
  उससे कई गुना हमने दान कर दिया  | 

6-जितना तेरे घर में सब कुछ होता है ,
   उतना तो हम खेत में ही छोड़ देते है | 

७- लकीरें साथ है जिनकी जब तक
    बुरे करम भी नहीं मार सकते है |  

शनिवार, 31 मई 2014

मौन मेरा कैसा लगेगा दोस्तों औ दुश्मनों को

मौन मेरा कैसा लगेगा दोस्तों औ दुश्मनों को
मैं जब मौन हो जाऊंगा तभी सब जान पावोगे
न हम होंगे न शब्द होंगे न भाषण और बहस
न दिखलायी पडूंगा तब हमें पहचान जाओगे |

शनिवार, 24 मई 2014

कोई जिंदगी से क्या गया कि नीद भी साथ ले गया ।

१-कोई जिंदगी से क्या गया
  कि नीद भी साथ ले गया ।


२-
कहा हो तुम कहते थे, अब कोई नहीं
पर देखो लोग तुमसे मुझे छीन रहे है ।


३-

देखो हमारी अनुभुतियां बड़ी हो गयी
मैं ,तुम नहीं पर पैरो पर खड़ी हो गयी ।


४-

देखो ये आँखों का पानी आंसू तो नहीं है
कुछ गिर गया इसमें और बह रहा है वो ।


५-

मैं सोने की कोशिश करता हूँ, तुम्हे भूलकर
तुम्हे गलतफहमी है की तुम ही मेरी नीद हो ।


६-

साथ चलने का वादा गर दोनों ने ही निभाया होता
तो चिता दोनों की ही ज़माने ने साथ सजाया होता ।


७-

दोनों साथ गए होते दोनों ही साथ रोते
अनुभूतिया मिट जाती जिंदगी को ढोते ।


८-

देखो मजाक बहुत हो गया तुम कहा हो अब आवाज तो दो
मैं तो वही हूँ जहा तुम छोड़ गए थे अपनो के साथ देखो तो ।


९-

मैं अब हार रहा हूँ कर्त्तव्य निभा नहीं पाया
अकेला हो अपनों को राह दिखा नहीं पाया ।


१०-

अच्छा थक गए न अब तुम आराम करो
अपनी सारी तकलीफे मेरे ही नाम करो ।


गुरुवार, 20 मार्च 2014

कह देता हूँ किसी से कि जरा हाथ बढ़ाना

कह देता हूँ किसी से कि जरा हाथ बढ़ाना
नासमझ मुझको अपाहिज ही मान लेते हैं ,
मान कर कमजोर मुझको वे उपदेश देते है
अज्ञानी मान कर मुझको पूरा ज्ञान देते है | 

मेरी आँखे गीली क्यों है ?

मेरी आँखे गीली क्यों है ?
और
नदी क्यों बहने लगी  ?
गलत न समझ ले आप
मैं कभी नहीं रोता हूँ
कभी नहीं रोया हूँ मैं
और
क्यों रोऊँ मैं
मेरी आँखों में पानी ही
बहुत ज्यादा है
बस छलक पड़ता है वो
जब भारी हो जाता है मन
और बैठने लगता है दिल
तो छलक पड़ता है
आँखों का खारा पानी
सच रोता नहीं हूँ मैं ।

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

मैं रबड़ का पेड़ हूँ कितना गिरा दो और दबा दो

मैं रबड़ का पेड़ हूँ कितना गिरा दो और दबा दो
नहीं होगी मौत मेरी फिर से मैं खड़ा हो जाऊंगा |

अपने जुल्म और हमारे इश्क की ये इन्तहा देखो

अपने जुल्म और हमारे इश्क की ये इन्तहा देखो
की मर गया मैं पर खुली आँखे तुम्हे तलाश रही |

देखना मुझ पर हमला कौन करता है

देखना मुझ पर हमला कौन करता है

अपनों की जेब में ही हैं खंजर छुपे हुए ।

तुम्हारे प्रेम में बर्बाद हो गया है कौन

तुम्हारे प्रेम में बर्बाद हो गया है कौन
कोई चिंता नहीं बंसी बजा रहे हो तुम |

मैं एक पत्ता नहीं हवा में उड़ा दे कोई

मैं एक पत्ता नहीं हवा में उड़ा दे कोई
जमीन में धंसी मेरी जड़े इमान की,
होगी उनके पास ताकत शैतान की
पर मेरे पास है इंसानियत इंसान की |

मैं हमेशा दरवाजा खुला रखता हूँ अपना

मैं हमेशा दरवाजा खुला रखता हूँ अपना
जाने कब कोई हवा का झोका आ जाये ।

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

मैं ढूंढ रहा हूँ खुद को

मैं ढूंढ रहा हूँ खुद को
कुछ दिनों से
पर भटक जाता हूँ
रास्ता तलाश करते करते
केवल अँधेरा हाथ आया है
अब तक
अँधेरे में रास्ता नहीं दीखता
तो कैसे ढूंढ मैं खुद को
रास्ता तलाश करते करते
कितनी बार गिरा मैं
और कितनी बार टकराया हूँ
पता नहीं किस किस चीज से
सर फूट गया है टकरा कर
बह रहा है खून लगातार
केवल सर क्यों ,यहाँ तो
अंग अंग घायल हो गया है
और
दिल तो छलनी हो गया है
मन और अस्तित्व
विलीन हो गए है
कही अनंत में
और मैं ,मैं हूँ ही कहा
मुझे तो ख़त्म कर दिया है
मेरे बहुत अपने ने
तो क्या ढूँढना खुद को
बस घिसट रहा हूँ
अपनी लाश लिए
अब
अपनी लाश के बोझ ने भी
थका दिया है बुरी तरह
नहीं चल पाउँगा और
अपने पैरो पर
पर कोई कंधे भी तो नहीं
जिनका सहरा मिल जाये
या जिनपर लद कर जाऊं मैं ।

सोमवार, 4 नवंबर 2013

नहीं जन्म ले रही है कविता कई दिनों से

नहीं जन्म ले रही है
कविता कई दिनों से
कलम चलती ही नहीं
दिल सूख गया है
कोई हलचल नहीं होती
तो कैसे जन्म ले कविता
कुछ नहीं सूझता अब
लगता ही नहीं कि कुछ जीवन है
और
उसमे कुछ करना भी है
जैसे एक बड़ा ह्रदय आघात
ख़त्म कर देता है सब कुछ
वैसे ही किसी आघात ने
ख़त्म कर दिया है मुझे
और जो ख़त्म ही हो गया
उसकी कैसी हलचल ,क्यों हलचल
बस जिन्दा लाश के सामान
घिसट रहा हूँ बस समय पूरा करने को
तो कहा से कविता पैदा होगी
और कैसे चलेगी कलम ।

मेरी हुंकारों से तुझमे , जोश नहीं आया है क्या

मेरी हुंकारों से तुझमे , जोश नहीं आया है क्या
धनुषी टंकारों से तुझमे जोश नहीं आया है क्या
क्या मैं टेरू अर्जुन को कि गांडीव तुझे पकड़ा जाये
क्या कर्ण का कवच कुंडल ही है तुझको ललचाये 
क्या परशुराम का फरसा ही तुझको अब ताकत देगा
जिससे समुद्र डरा था क्या वो तीर तुझे हिम्मत देगा
क्या चन्द्रगुप्त को ले आऊं मैं तेरी युद्ध कहानी में
चाणक्य और द्रोनाचार्य भरे अब जोश तेरी जवानी में
तू कब उठ कर ललकारेगा बतला अब अर्जुन वीर मुझे
तू दुश्मन को कब मरेगा बतला अब अर्जुन वीर मुझे
तेरी सेना खड़ी तो हुयी गांडीव की टंकार सुनेगी कब
तू कब शंख को फूंकेगा युद्ध की ललकार सुनेगी कब
कब समझेगा युद्ध न्याय का न्याय सभी को देने को
सामने जितने अन्यायी हैं सबको अंतिम गति देने को
तुझको ईश्वर ने भेजा है और जनता ने ये ताकत दी हैं
अब अपना वचन निभाना है सबका कर्जा लौटना है
चल अर्जुन अब मोह छोड़ चल अब गांडीव उठा ले तू
बस जीत का लक्ष्य सामने और इसको लक्ष्य बनाले तू
फिर निश्चित जीत तुम्हारी है हर बाधा तुमसे हारी है
इस बार तुम्हारी बारी है और अब आगे की तैयारी है
अब देख तेरा जयगान यहाँ तेरा है कितना मान यहाँ
कुछ ऐसा कर जा तू अब तो बस तेरा हो सम्मान यहाँ
थोडा कठोर बन जा अर्जुन बस थोडा जोर लगा अर्जुन
फिर हर तम तेरे से हारेगा ,तू हर दुश्मन को मरेगा
लोगो का हक़ दिलवाएगा और आगे बढ़ता जायेगा ।



ये दिया है पर सूरज को भी ललकारेगा

ये दिया है पर सूरज को भी ललकारेगा
अँधेरा हो कैसा भी पर ये उसको मारेगा 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

कुछ खास नहीं है सब आम हो गया

कुछ खास नहीं है सब आम हो गया
आदमी था काम का बेकाम हो गया ।

वो तो आये ही थे बस हाल पूछने मेरा
और मैं तो मुफ्त में बदनाम हो गया |

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

क्या किसी ने भैंसे पर आने वाले मौत के देवता को देखा है ?

क्या किसी ने भैंसे पर आने वाले
मौत के देवता को देखा है ?
क्या किसी ने रावण को या
कंस को देखा है ? नहीं !
पर मैंने तो सबको देखा तो नहीं
पर महसूस किया है हर वक्त
अपने आसपास
और बहुत कोशिश कर भी
इनसे पीछा नहीं छुड़ा पाता हूँ मैं
मैं इनसे दोस्ती करता हूँ
ये मुझे काट लेते है बहुत जोर से
मैं इनसे भागता हूँ
ये मेरा पीछा नहीं छोड़ते हैं
और लगातार
मेरे पीछे जासूस लगाये रखते है
और मौका ढूँढते रहते है की
कब मै जरा सा गाफिल हो जाऊं
और ये मौत बन कर दबोच लें मुझे
कभी देखा है आप ने किसी की मौत को
इस तरह पीछा करते,नहीं ना
तभी तो मैं सबसे अलग हूँ
खुश रहो दुश्मन दोस्तों
क्योकि तुम अमर हो, अजर हो
तुम ही तय करोगे ,पृथ्वी का ख़त्म होना
तुम ही तय करोगे,इंसान की किस्मत
और तुम ही तो तय करोगे
अन्तरिक्ष की  व्यवस्था
कितने महान हो तुम
ये समय तय करेगा

मंगलवार, 18 जून 2013

पर बहुत कुछ टूट जाता है ।

देखा
बादल का फटना .
वैसे ही दिल फटता है
और मच जाती है तबाही
ये जो बारिश है
जिसमे बह रहा है सब कुछ
ये किसी के दर्द का एहसास
किसी के आंसू तो नहीं
देखो कितनी ताकत होती है
आंसू में ,दर्द में ,
की बस
तबाही ही आ जाती है
कही पृथ्वी पर तो
कही जीवन में
किसी को मत तोड़ो इतना
की फिर सम्हाल ही न सको
कुछ भी
अच्छी नहीं होती है तबाही
कैसी भी
जब कोई बहुत अपना
तोड़ देता है तो
आवाज नहीं होती है
पर बहुत कुछ टूट जाता है ।

किसी को ऐसे अपने न मिले ।

कभी कभी ऐसा
कैसे हो जाता है
कोई जो बहुत ही
प्रिय रहा हो आपको
उसी से घृणा हो जाये
आपको अति घृणा
उसको देखते ही
खौलने लगे आप
और ऐसा लगे की
आपका अस्तित्व
ही मिट जायेगा
उसी के कारण
कितना बदकिस्मत
होता है वो
जो अपने बहुत
अपने के द्वारा
ऐसी हालत में
पहुंचा दिया गया हो
क्या आप किसी
ऐसे को जानते है
क्या हाल है उसका
वो जी रहा है या
फिर मरा हुआ सा है
ऐसे अपनों से तो
दुश्मन अच्छे होते है
जो चौकन्ना रखते है
आपको और चेतन भी
ऐसी जिंदगी का क्या
आप घुट घुट कर
न जी रहे और न मर रहे ।
बस कुछ हो जाने का
इन्तजार कर रहे ।
किसी को ऐसे अपने न मिले ।


शनिवार, 15 जून 2013

सच में मैं रो नहीं रहा हूँ

मेरी आँखों से अक्सर 
आंसू आने लगते है
बिना किसी कारण और
दिल से निकलने लगती है
हिचकियाँ
कोई कारण नहीं होता है
सच कह रहा हूँ ।
मैं दबा डेता हूँ हिचकियाँ 
और छुपा लेता हूँ आंसू 
ताकि कोई खुद को 
उनका जिम्मेदार न समझ ले
अभी भी गीला हो गया है
पता नहीं क्या क्या
पर सच में मैं रो नहीं रहा हूँ 
बल्कि शायद मेरी आँख में 
कुछ चला गया होगा
तभी लागतार निकल रहा है 
ये खारा पानी 
जो मेरा स्वाद भी बिगाड़ रहा है ।
अब मैं कस कर भींच ले रहा हूँ खुद को 
फिर आवाज़ कही सुनायी नहीं पड़ेगी 
और ये खारा समुद्र भी सूख ही जायेगा 
थोड़ी देर में ।
सच में सच कह रहा हूँ मैं ।
मैं रो नहीं रहा हूँ ,सच में ।

सोमवार, 6 मई 2013

तुम सूरज हो ? कैसे सूरज ?

सूरज !
तुम सूरज हो ?
कैसे सूरज ?
किसके सूरज ?
तुम जब पूरब से उठते हो 
हमको तुम रोशन करते हो
पर ताप बहुत देते हो 
जिनके पास नहीं है छाया
उनको कितना झुलसाते हो
थोडा पच्छिम को क्या जाते
जाकर वही डूब जाते हो
पूरब पच्छिम का ये अंतर
तुमको भी मालूम नहीं था
पर जब तुम ऊपर होते हो
कितना तुम्हे घमंड होता है
आँख नहीं तुम पर उठती है
तुमने सोचा ,तुम न होगे
तो क्या होगा ?
दुनिया तब कैसे देखेगी
पर देखा तुमने
नन्हा दीपक खड़ा हो गया
तन कर औ, धीरे से बोला
मैं तो हूँ ना ,जाओ सूरज
अन्धकार अब मैं तोडूंगा
सूरज हो या व्यक्ति हो
कोई अंतिम नहीं यहाँ पर 
कुछ न रुकता किसी के कारण
सूरज हो या व्यक्ति हो
घमंड सबका टूटा है
तुम सूरज हो ,कैसे सूरज
सूरज का होना क्या होना
जब गिर जाते हो तुम भी
जाकर उस पच्छिम में
जिसके पीछे जाकर 
इन्सां भी भटका है
तो क्या फर्क है तुममे औ
इन्साँ में सूरज
तुम सूरज हो ,कैसे सूरज । 





रविवार, 21 अप्रैल 2013

छुपी हुयी सिसकियाँ ।

कुछ लोगो को क्यों
घायल करते है अपने ही
पूरी शक्ति भर
पूरे सामर्थ्य भर
वे चाहे वो हो जिनपर
आश्रित होते है आप
चाहे वे हो जो
आपके ही टुकडे हैं 
आप कहा कहा घायल हैं 
आप भी नहीं जानते
बस रिस रहा है कुछ
हर तरफ से
जिसका इलाज नहीं
किसी के पास
हैं ,तो -----बस ------
छुपी हुयी सिसकियाँ ।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

हम गरजे बहुत और वो भी बरसे बहुत

हम गरजे बहुत और वो भी बरसे बहुत
हम तो चुप हो गए, वो भी चुप हो गए ।
जब वो गरजे बहुत हम भी बरसे बहुत
अब वो चुप रह गए हम भी चुप हो गए । 

जिंदगी में क्या किया, पैदा हुए खाया पीया मर गए

जिंदगी में क्या किया, पैदा हुए खाया पीया मर गए
या पैदा हुए,ये किया,वो किया और कुछ तो कर  गए 
जिए तो अपने लिए और मरे तो बस अपनों के लिए 
या कुछ देश,समाज औ इंसानियत के लिए कर गए ।

चमचे चुगलखोर दोनों महान है

चमचे चुगलखोर दोनों  महान है
वाह वाह देखो क्या इनकी शान है

भूखे नंगे थे ये अब करोडो वाले है
सभी को चूस गए मकड़ी के जाले है
बड़े बड़े ज्ञानी इनसे धोखा खा गए
ऐसी खास ताबीज गले में डाले है

जी हाँ सचमुच ये बहुत ही महान है



सोमवार, 1 अप्रैल 2013

बस तुम्हारे लिए, लेकिन

मैं चाँद पर चढूँगा तुम्हारे लिए 
चढूँगा भी, पर
अभी मेरे पैरों में दर्द है
मैं तारे तोड़ लाऊंगा
तुम्हारे लिए ,पर
हाथ थोड़े छोटे पड़ गए है
देखो मेरा दिल धडकता है
बस तुम्हारे लिए, लेकिन
मेरा दिल बहुत बड़ा भी तो है
इसलिए, इसमें समां गए है
बहुत से भांति भांति के लोग
चलना चाहता हूँ, सिद्धांतो पर
याददाश्त, कमजोर हो गयी है
याद ही नहीं रहे ,कोई सिद्धांत
मैंने तुमसे जो वादे किये थे न
वे भी मैं इसीलिए बार बार
भूल जाता हूँ
तुम बुरा मत मानो
मैं तो बहुत अच्छा हूँ
पर इन परेशनियो के कारण
ऐसा  हो गया हूँ
अब जैसा भी हूँ तुम्हारा या
बहुतो का ही हूँ ना
सब मिलकर मेरा कल्याण
करते रहो, क्योकि
तुम सब मेरे लिए हो, न
तुम सब नहीं बल्कि मैं
तुम सब की जिमेदारी हूँ ।
आओ अपना सब कुछ
न्योछावर कर दो मुझे
अपना अभीष्ट मान कर ।


शुक्रवार, 29 मार्च 2013

मजाक मजाक में कह देता हूँ

मजाक मजाक में कह देता हूँ
बहुत कुछ सच ,पर 
वो समझते है कि मजाक है
ये कितना बडा मजाक है
मेरी जिंदगी के साथ
मेरी भावना के साथ
पर खुश रहो मेरे दोस्त
तुम मजाक मान कर भी
बहुत कुछ ऐसा कह जाते हो
जो छू जाता है मेरे मन को
सहला जाता है मेरे वजूद को
और सिहरन पैदा का जाता है
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व में
चलो यही सही
तुम इतना ही करते रहो
ये भी तो एक एहसान है
एक टूटे हुए इंसान के ऊपर
खुदा तुम्हे सलामत रखे
ताकि
तुम मजाक कर सको और उसे
मजाक ही समझते रहो
ज़िन्दगी भर
क्या पता
जिंदगी की डोर कब टूट जाये
कम से कम तब तक । 

सोमवार, 25 मार्च 2013

तुम्हे सब पता है मैं जानता हूँ

तुम्हे सब पता है
मैं जानता हूँ
मुझे सब पता है
तुम जानते हो
हम दोनों सब जानते है
पर दोनों ही चुप हैं
अपने लबों को कसकर
भींच रखा है
हाथो को पकड़ रखा है अपने ही
जज्बातों को बांध रखा है
पर तूफ़ान आता है जब
तटबंध टूट जाते है तब
तो बस चारो तरफ
सैलाब ही सैलाब होता है
और बह जाता है सब कुछ
ये जानते हुए भी
हमने बांध बना रखे है
अन्दर भी बाहर भी
टूट जाये सब कुछ
और आये तबाही
उससे पहले ही क्यों न
खोल दे सारे बंधन
उन्मुक्त होकर उड़ जाये
अनन्त आकाश में
स्वछन्द होकर
न तुम, तुम रहो,
न हम, हम रहे
बस कोई और बन जाये दोनों
जमीन पर आकाश पर
उस नीले पानी के अनन्त छोर तक
जहा जहा भी कुछ भी है वहा तक ।


रविवार, 3 फ़रवरी 2013

दीवारे भी साथ छोड़ देती है उनका ।

कुछ लोग, अकेलापन ढूढने को
भटकते है, कहा कहा और
आनंदित होते है, उसे पाकर
अपने अपने हालात में
पर कुछ, अकेलेपन से डर जाते है
आतंकित होने की हद तक
और शायद यही आतंक
उन्हें और उनके वजूद को, समझ को
झकझोर देता है, इतनी बुरी तरह
की वे, हर पेड़ पौधे,हर दीवार को
पकड़ने की कोशिश करने लगते है
वहशियाना अंदाज में
हाथ कुछ नहीं आता उनके
सिवाय अकेलेपन के, और
दीवारे भी साथ छोड़ने लगती है, उनका ।                                                                                                          

                                                                                                                                                                                                                                                                          

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

मेरा अपना दोस्त ही क्यों न लौटा देते

कितने बदकिस्मत होते है वे
जिनका कोई साथी नहीं होता
उन गिने चुने लोगो में एक मै भी
कभी कोई साथी नहीं मिला मुझे
जब छोटा था तो
गरीब था, इसलिए अमीर नहीं बने
जो गरीब थे, वे अमीर समझ कर
साथी नहीं बनते थे
कितनी दोहरी जिंदगी थी मेरी
मैंने गरीब को दिखाया अपना
बिना जूतों वाला पैर स्कूल में
पर उसने विश्वास नहीं किया
अमीर को दिखाया, पिता का नाम
पर जेब देख कर, वो नहीं माना
इस तरह, मेरा कोई दोस्त नहीं बना
समाज व्यवस्था में, एक दोस्त बना
व्यवस्था की मजबूरी के कारण
वो मेरी पत्नी थी
पर जिसकी किस्मत में, दोस्त न हो
उसे पत्नी दोस्त भी क्यों और
ईश्वर ने छीन लिया, ये दोस्त भी
बिना दोस्त के जिंदगी क्या
पर सवाल तो अपनी जगह है की
मेरा कोई दोस्त नहीं है 
नकली दोस्तों
मै जनता हूँ की, मै बहुत अकेला हूँ
अपनों की भीड़ में भी
मेरा अपना दोस्त ही, क्यों न लौटा देते
जैसा भी था ,पर मुझे तो प्यारा था ।

कल रात वो मुझसे मिली सपने में

कल रात वो मुझसे मिली सपने में
दुनिया से जाने के इतने सालो बाद
कुछ नहीं बोली बस देखती रही
टुकुर टुकर मेरी तरफ
आँखे गीली थी
फिर झरना बन गयी 
फिर भी कुछ नहीं बोली
बस निहारती रही मुझे निरीहता से
मुझे बेबस और टूटता देख कर भी
कुछ नहीं कर पाने ,सहारा नहीं दे पाने
प्यार से सहला नहीं पाने की बेबसी से
फिर कातर निगाहों से मुझे देखा और
मुस्कराने की मुश्किल सी कोशिश की
और फिर हाथ हिलाती चली गयी
मै समझ नहीं पाया देख नहीं पाया की
मजबूत होकर रुकने का इशारा था
या फिर बुला गयी, मुझे भी अपने पास ।

मै सबसे अलग हूँ ।

पता नहीं क्यों आजकल
कुछ बिखरता रहता है हर वक्त 
कुछ टूटता रहता है अंदर अंदर
पता नहीं कहा से पैदा हो गया है
आंसुओ का सैलाब अंदर अंदर
निकलता है तो वेग के साथ
और रोकता हूँ तो उफनता हुआ
बांध बन जाता है
बांध जब सचमुच टूटेगा अंदर का
तो क्या वैसी ही तबाही फैलाएगा
जैसी फैलाता है जमीन पर बांध
बांध को कस कर रोकना ही होगा
चाहे रोकने में खुद को मिटना पड़े
पर बहुत कुछ हर क्षण
ख़त्म हो रहा है, छीज रहा है
अंदर अंदर
क्या सभी के साथ ऐसा ही होता है
क्या सभी अपनों बहुत अपनों
के ही मारे और सताए हुए होते है
नहीं न ! तभी तो लोग कहते है की
मै सबसे अलग हूँ ।