इतनी घृणा
और
इतना जहर
कहाँ रखते है लोग
की
उगलते भी नही
और
निगलते भी नही
और
अपनो को
पराया बना लेते है ।
पहचान उन सभी का मंच है जो जिंदगी को जीते नहीं जीने का निर्वाह करते है .वे उन लोगो में नहीं है जिन्हें जीवन मिला है या जीने का मकसद उनके साथ रहता है .बस जीने और घिसटने के बीच दिल वालो की कलम से और दिल से जो निकल जाता है वही कविता है .पहली कविता भी तों आंसू से निकली थी .आंसू अपने दर्द के हो या समाज के ,वे निकलेंगे तों कविता भी निकलेगी और वही दिलवालो की ;पहचान ;है
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018
घृणा
बेतार संदेश
पिता हो ,माँ हो
बेटा या बेटी
पता नही कैसे
समझ जाते है
एक दूसरे का दर्द
और
अंदर अंदर छटपटाते है
एक दूसरे के लिए
कोई पैथी नही पहचानती
न कोई विज्ञान
इस बेतार संदेश को
गर
दर्द में शामिल रहे हो
कभी या ज्यादातर
और
दर्द भोगे हो साथ साथ
मजबूत चट्टान बनकर
एक दूसरे के लिए
और
जुड़े हो दिल और आत्मा से ।
मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !
रातें
कितनी स्याह होतीहै
क्यो होती है
इतनी स्याह रातें
ज्यो ही सूरज
पच्छिमी की खोह में
डुबकी लगाता है
पूरब से फैलने लगती है
स्याह रात
टिमटिमाते हुई
रोशनियां भी
जुगनू से ज्यादा
कुछ नही होती
कितनी भयानकता
समेटे होती है स्याह रात
जिंदगी गर्त हो जाती है
धीरे धीरे इसके आगोश में
और
कितना अकेलापन
तारी हो जाता है
जिसमे जिंदगी
सवाल बन जाती है
इन सवालो का
कोई जवाब नही होता
खुद से ही बाते करना
खुद को तसल्ली देना
खुद के अकेलेपन से लड़ना
और लड़ते लड़ते
नीद के लिए लड़ना
ताकि आंख बंद कर
अनदेखा कर सके
इस स्याह अंधेरे को
और अकेलेपन को
पर
कितना स्याह है सब कुछ
चलो आंखे बंद कर लेते है
और
सोच लेते है
की
अकेले नही है हम
तमाम सूरज उग गए है
हमारी जिंदगी में ।
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !
कुछ सवाल है जो अनुत्तरित है
कुछ सवाल है
जो अनुत्तरित है
कुछ जवाब है
जो खुद
सवाल बन गए है
सिलसिला टूटता ही नही
न सवालो का न जवाबो का
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है
पर कही तो कोई दीवार होगी
या
होगा इस सफर का डेड एंड
जो रोक देगा क्रिया को
और प्रतिक्रिया को भी
और
फिर सब होगा शांत शांत ।
सोमवार, 15 अक्टूबर 2018
घृणा की इंतहा
वर्दी पहन कर
कहाँ से आती है
इतनी घृणा
कि
जिन्हें जानते भी नही
पहचानते भी नही
जिन्होंने
कुछ बिगाड़ा भी नही
उतार देते है गोलियां
उनके सीनो में
उनके सर में
वो औरत हो ,बच्चा हो
बूढ़ा या मासूम बेटी
क्या
हाथ नही कांपते विल्कुल
और
नही दिखता इन चेहरों में
चेहरा अपनी बहन , बेटे ,बेटी
या भाई , बाप या बाबा का
और तब भी जब
कोई छोटी से बेटी भी
तन कर खड़ी हो जाती है
रायफल के सामने निहत्थी
कहाँ से आती है ये नफरत
और
कब खत्म होगी ये नफरत
ये हथियारों और मौत का खेल
इसे बंद करना ही होगा
और
बोना हीं होगा
इंसानों की जिंदगी में
प्रेम का गुलाब ,चंपा और चमेली ।
मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018
ये अंधेरा कितना अंधेरा
ये अंधेरा कितना अंधेरा
चारो ओर केवल अंधेरा
नही कही से सूरज दिखता
नही रोशनी कैसी भी
आगे जाए , कैसे जाए
कदम बढ़ाए गिर ना जाये
ठिठके ठिठके कब तक रहना
अनिश्चितता कब तक सहना
कोई तो हो जो राह दिखाये
वो स्वर्ग हो या नरक हो
वो भी मेरे साथ मे जाए
पर अब ऐसा कौन मिलेगा
जीवन मे कब कमल खिलेगा
जो था वो तो बिला गया
ना जाने वो कहा गया
अब तो बस जो है हम है
चाहे अंधेरा मिटा सकें
या खुद को ही गंवा सके
इसको तय करेगा कौन
प्रकृति मौन हम भी मौन ।
रविवार, 23 सितंबर 2018
सबको कल इस मिटटी में मिटटी हो जाना है ।
सो जाता हूँ आखिर कल भी तो सो जाना है
इस धरती से दूर कही अम्बर में खो जाना है
धरती पर चलते सोते खाट पे कुछ धरती पर
सबको कल इस मिटटी में मिटटी हो जाना है ।
अक्सर आंखे खुद ही खुद को धो लेती है ।
अक्सर आंखे खुद ही खुद को धो लेती है ।
खुश हो तो हंस लेती है दुखी हो तो रो लेती है ।
बेटे हो या बेटियां मुस्कुरा कर देख ले हम थोड़ा और भी जी जाना चाहते है ।
बेटे हो या बेटियां मुस्कुरा कर देख ले
हम थोड़ा और भी जी जाना चाहते है ।
शनिवार, 22 सितंबर 2018
रविवार, 16 सितंबर 2018
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या
नहीं निकल पाए इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के अवरोध को
बना लो
फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और
अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को
पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |
रविवार, 2 सितंबर 2018
बहुत दिनों पर गांव गया था
पर ये मेरा गाँव नहीं था .
कहा गया वो?
सब कुछ बदला नया नया था
सुनते थे सड़के बननी है ,
पूरे गाँव को वो जोड़ेगी .
वो चकरोड बहुत चौड़ा था ,
पगडण्डी सा अब दिखता है .
वो मेरा चकरोड कहा है ?
वो पोखर ,तालाब ,गड़हिया
जो गाँव के तीन तरफ थे
उनसे पूरा गाँव हरा था ,
पशु नहाते ,सभी तैरते ,
मछली पर सबका ही हक़ था .
अब तों वहा मकान बने है
या फिर है रास्ते लोगो के .
सबके घर को तों रास्ते थे ,
सबके पास मकान थे अपने .
फिर ये सब क्या नया नया है .
वो रास्ते और तालाब कहा है ?
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
वो पाकड़ का पेड़ जहा खेला करते थे
और खुला खलिहान या दालान किसी का,
सब सबका था .
एक बार पड़ा था सूखा ,
कई घरो में अन्न नही था
पर जिनके घर हुआ था
आलू वो भून पंहुचा देता था
जिसका भी गन्ना पेरा जाता
भरी बाल्टी गन्ने का रस
उस घर वो भिजवा देता था .
कोई नहीं मरा था भूखा
नहीं रुका था काम किसी का .
बसवारी के बांस सभी के ,
छानी मड़ैया ,सरपत सबका . .
सब थे छवाते साथ उठाते
और मड़ैया उठ जाती थी.
वो मिले जुले स्वर और हाथ कहा है,
मिलके उठाना की आवाजे
कहा गयी वो .
पहले जब थे शहर से आते
पूरा गाँव अपना लगता था
बहुत लोग मिलने आते थे ,
हाल पूछते ,साथ बैठते ,
घर आने को कह जाते थे .
जिसका भी जो रिश्ता था कह जाता था
भाभी ,चाची,आजी बुला रही है ,
बहुत दिनों से नही है देखा,.
आजी कहती दुबले क्यों हो ,
दूध नही मिलता है ,पीलो!
गाँव के चारो ओर बगीचे लदे आम से ,
मेरे घर आम नहीं था
तब काका ने भिजवाया था .
कहा गए वे लोग जो ऐसा करते थे,
वे सारे बाग़ कहा है ?
सबके घर एक चारपाई ,
बिस्तर अलग रखा था ,
गाँव कि बारातो और मेहमानों को .
जिसके घर भी दूध दही या सब्जी होती ,
आ जाती थी सब मेहमान सभी के थे तब
+ + + + + + ++++++++++++++++. .
और
अब खुली गई दूकाने सब चीजो की,
कोई किसी को कुछ ना देता ,
सब बाजार से आ जाता है .
वो अपनापन और वे रिश्ते,
मेहमानों के लिए रखे सामान
कहा गए वो ?
सबने रास्ता बंद कर दिया,
खोदे गड्ढे कि भाई को राह मिले ना . .
सबकी नाली बंद कर दिया
या मुह उल्टा मोड़ दिया है
सबके दरवाजे पर कीचड़ ,
राह में कीचड़ ,मन में कीचड़
सबका घर जाना मुश्किल है .
पर संतोष सभी को ये है ,
अपना पडोसी परेशान है ,
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया
वो था गाँव जहा बाराते
शादी वाले घर तक जाती थी ..
जिस गाँव में सबकी बिटिया सबकी थी ,
कहा गया वो ?
कल सुना की फला की बबुनी भाग गयी,
गाँव के लिए बात नयी थी .
वो शहर में ,
पढ़ी थी कम और बढ़ी थी ज्यादा ,
खूब सिनेमा देख रही थी .
हिरोइन बनने चली गयी
या फिर रिश्तो में ही छली गई वो .
कुछ आदर्श गाँव के ,
बिना बड़ो के पांव नहीं बाहर जाते थे ,
कहा गए वो ?
पहले भी बजार लगता था
और लगती थी कुछ दूकाने ,
बढ़ते बढ़ते गाँव मुहाने आ पहुची है .
पूरा गाँव बाजार बन गया ,
कही खो गया,ढूढ़ रहा हूँ
कहा गया वो ?
सबकी शान इसी में
मुक़दमे किसके कितने कैसे जीते ,
सब कुछ हो बर्बाद हमारा पर
पडोसी कि बर्बादी मजा आ गया . .
पहले तों गाँव के बूढ़े ही सब कुछ थे,
उनका ही फरमान बड़ा था
पहले शाम बैठके पर बैठक होती थी.
कुछ बुजुर्ग मानस गाते थे .
बड़े चाव से रामचरित वे समझाते थे .
वे बैठके चाय कि दूकान खा गई .
अब गाँव मुहाने देशी की दुकान खुल गई
और पूरा गाँव तरन्नुम में है .
अब बहस है लाल पारी की,
किसमे मजा है ज्यादा देशी में या अंग्रेजी में .
वो किस्से ,वो मानस ,वो चौपाई
और बुजुर्गो कि वे बहसे
कहा गए वे ?
वही गाँव है पर भूतो का लगता डेरा
गाँव तों है पर इंसानों का नहीं बसेरा .
चौबे जी का घर कितनी रौनक रहती थी,
घास उग गई .दीवार गिर गई
छत पर है जाले ही जाले
और भी घर है ,मेरा भी है
जिनमे लटके है बस ताले.
शहर में दो कमरे सपना है
यहाँ बीस कमरों का घर अपना है
लेकिन कुछ है जो बिला गया है
ढूढ़ रहा हूँ जिसकी खतिर
बार बार हम गाँव आते थे,
कहा गया वो ?
+++++++++++++++++++++++
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ मेरे गाँव को ,
खलिहानों को ,मछली वाले तालाबो को .
बूढ़े बरगद और मौलश्री कि छाव को ,
बर्फ से ठंढे मीठे पानी वाले उस कुए को
भुट्टे तोड़ते थे खेतो में फूट ,ककड़ी खा जाते थे .
वो जामुन वाला पेड़ ,बगीचा आम कि डाली ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ '
जांघिया नाच दिखाने वाली उस टोली को ,
रामायण हो या शादी हो ,
गैस जलाते ,तम्बू लगाते ,
बाजा बजाते इस्माइल को ढूढ़ रहा हूँ .
लाज हया और हसी ठिठोली में मर्यादा ,
शादी में गाली भी तों गायी जाती थी '
थोडा कहा समझाना ज्यादा वाली भाषा ,
पंचायत पर दंड बैठको वाला अखाडा ,
लाखी पाती वाले खेले ,
कभी कही ,कभी कही के मेले ,
सुथनी और जलेबी गुड की ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कोई मुझे मेरा गाँव बता दो ,
कहा रुक गए पाव बता दो .
बहुत दिनों पर गाँव गया था
ढूढ़ ना पाया मेरे गाँव को ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
कहा गया वो |
शुक्रवार, 17 अगस्त 2018
दुनिया से गया कोई लौट कर नही आता
सात जन्म का रिश्ता कोई नही निभाता
ये सब बातें है किदवंतियाँ है कहे जाओ
जितना भी दुख हो अकेले ही सहे जाओ
बुधवार, 8 अगस्त 2018
कुर्सियां और आदमी
आज भी काठ से भी बनती है
पहले भी आदमी होते थे
और
आज भी आदमी होते है
पहले भी आदमी ही
कुर्सी पर बैठते थे
और
कभी कभी कुत्ते भी
आज भी कुर्सी पर
आदमी ही बैठते है
पर पहले कुर्सियों पर बैठकर भी
आदमी आदमी ही रहता था
और कुत्ता कुत्ता ही
पर अब कुर्सियों पर बैठकर
आदमी खुद काठ बन गया है
पर कुत्ते तो कुत्ते ही रह गए ।
क्या बदल गया कुर्सियों में
या आदमी में
खोज होनी ही चाहिए
और ये भी
की
पहले कुर्सियां खत्म होंगी
या आदमी खत्म हो जाएंगे ।
शनिवार, 28 जुलाई 2018
ये दिल्ली ने कहा है
ये जमीन आसमान नदिया
हवाए सब हमने दिया है
ये दिल्ली ने कहा है
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
मुनादी हो गयी है
कि
गाय अब हरगिज न पालें
अगर पालते है तो सड़क पर
हरगिज ना निकाले
फिर भी निकले
तो जिम्मेदारी आपकी है
गाय पंर जो भी करेगे
हम करेंगे
काटेगे या कही पंर बेच देगे
देश मे भी
चुनांव देखकर
उसकी इजाजत हम ही देंगे
कि
प्यार पंर पाबंदियां है
गर भाई और बहन हो
या हो मियां और बीबी
तो कागज ले के निकलो
की दोनो सचमुच वही हो
मुनादी हो गयी है
कि
लोकतंत्र की
सत्ता पर कोई उंगली उठाये
उससे पहले जरा ये जान जाए
की
बन्दूक की नली से
ये तो पढ़ा था
पर सत्ता बंदूक और
ये भी पढ़ लो
कि
कोई अखबार हो या हो टी वी
सब सत्ता की भाषा ही बोले
किसी सिद्धांत के बहकावे में आये
उससे पहले ज़रा ये जान जाए
कि सत्ता चीज क्या है
और
सत्ता का संगठन चौकस खड़ा है
कुछ भी हो जाए
तो हमको क्या पता है
वो खुद ही जाने
कि
क्या जरूरी है ये इतिहास पढ़ना
इतिहास अबतक जो भी पढ़ा था
सब कूड़े से भरा था
जो हमको देश का दुश्मन बताता
पढ़ना है तो राष्ट्र गौरव पढ़ो सब
नया इतिहास
जो अब हम समझा रहे है
है वही इतिहास असली
और
इतिहासों के पुरोधा भी वही है
जो जो हम बताए
जो इनको अब नही मानेगा उसको
रास्ते पर लाना भी आता हमे है
गांधी से कलबुर्गी तक को
समझा चुके हम
कि
ये आज़ादी बेवजह है
और
ऐसे लोकतंत्र का भी क्या करोगे
ये चुनांव भी तो केवल खर्च ही है
छोड़ो इसको बस हमे ही सत्ता दे दो
जब तलक ये मुल्क जिंदा है
और
जिंदा है लोग कुछ भी
फिर देखो हम क्या करेंगे
पर ये अभी हम क्यो बताए
मुनादी हो गयी है
किअपने मुह सिले सब
और
आंखे बंद कर ले
और वो ही देखे
जो हम दिखाए
कानों में ठूस लो कुछ
सुनना भी क्या जरूरी
दिमागों पर भी कोई जोर क्यो दो
बस उतना जानो
जितना हम जनाये
मुनादी हो गयी है
कि अब सब मांन जाये
कि सबके हम खुदा है
सत्य है हम ,न्याय है हम
शास्वत भी हम ही है
कि
अब कोई चित्र हो या बुत बनाये
पर क्या बनाना है
पहले हमको बताए
जो हम कहे फिर वो ही बनाये
कि
बुध्द ने कुछ भी कहा हो
पर
संघम शरणं गच्छामि
के अब नए मतलब समझ लो
अब हम पर
फिर नही कहना कि
शनिवार, 21 जुलाई 2018
बारिश
बारिश
बारिश के मतलब कैसे कैसे
जिसके जो हालात है वैसे
किसकी खातिर गीत बनाये
वो सैनिक सीमा पर गया है
वो किसान जिसको कुछ बोना
या जिसका बाहर अन्न पड़ा है
आ गयी तो बाढ़ ले आयी
ये अमृत है खेत की खातिर
पर आफत भी खेत मे आयी
किसकी खातिर गीत बनाये
पूरे साल भूख से लड़ना
कैसे पढ़ाई कैसे दवाई
बिटिया का भी ब्याह था होना
अच्छी बारिश खेत मे सोना
वाह वाह भाई फिर क्या कहना
जरा उससे पूछो इसका मतलब
बाल्टी भगौने भर गए सब
अब बिस्तर को कैसे बचाये
पर बच्चों को कहा सुलाये
छप्प छप्प करते आते जाते
तैर रहे है वो मस्ती में
ये बचपन है मौज मनाए
उस छत पर कोई आंख लगाए
भीग गया आँचल यौवन का
फिर फिर देखे और शरमाये
कैसा पानी जो अगन लगाए
जिसपर जो बीते वो जाने
दूजा क्या अंदाज लगाए
सोमवार, 9 जुलाई 2018
एकाकीपन
पर
भीड़ और मेरे बीच इतनी दूरी है
कि
न मेरी आवाज उसे सुनाई पड़ती है
और न मैं उसे दिखाई पड़ता हूँ
मुझे भी नही दीखती है वो भीड़
बस सुनाई पड़ती है कानो में आवाज़
कही दूर से अपुष्ट ,अस्पष्ट
और
में ढूढने लगता हूँ उसे पागल जैसे
पर
भीड़ ने लगातार दूरी को कायम रखा है
और मुझे धलेक रही है लगातार
एकाकीपन की तरफ ।
गुरुवार, 21 जून 2018
चलो सपने देखे सुबह होने तक ।
सपने देखे सुबह होने तक ।
सूरज निकलेगा और ग्रस लेगा
इस अँधेरे को शाम होने तक ।
फिर शाम आयेगी और
सूरज गर्त हो जायेगा उसके अन्दर
यही क्रम जीवन को चलाता रहेगा
उठाता रहेगा गिराता रहेगा
हम नियति का सड़क पर पड़ा
पत्थर बन लोगो की ठोकरों से
इधर उधर उछलते और गिरते रहेंगे
कुचलते रहेंगे स्वार्थो के टायर हमें
जब तक कही जमीन में
दफन नहीं हो जायेंगे हम ।
फिर भी तब सपने देखना तो
हमारी नियति भी है और अधिकार भी ।
क्या अब इतने ताकतवर हो गए है
कुछ लोग की
वो हमारे सपने भी
हँमसे छीन लेना चाहते है
पर पत्थर चाहे बेजान क्यों न हो
कभी ठोकर दे सकता है
तो कभी किसी उछाल से
घायल भी कर सकता है
इसलिए मुझ बेजान से भी खेलो मत
मुझे सपने देखने दो ।
चलो सपने देखे सुबह होने तक ।
बुधवार, 20 जून 2018
क्या दुनिया से जाने के बाद सुनाई नहीं पड़ता
सुनो ना
क्यों नहीं सुनते हो
क्या दुनिया से जाने के बाद
सुनाई नहीं पड़ता
और
दिखाई भी नहीं पड़ता
कि
कोई कितना परेशांन है
कभी भी जवाब नहीं देते हो
पुकार पुकार कर थक गया मैं
न दिखते हो ,न बोलते हो
तो
अब मैं भी क्यों बोलू
चलो मैं भी बेवफा हो जाता हूँ
तुम्हारी ही तरह
और भूल जाता हूँ तुम्हे
अब
मैं भी क्यों बोलू
क्यों पुकारूँ
थक गया हूँ पुकार पुकार कर
जब तुम्हे मेरी कोई चिंता नहीं
तो मैं ही क्यों करूँ
पर जरूर
तुम्हारी कोई मजबूरी होगी
वर्ना ऐसी तो नहीं थी तुम
कैसे भूल जाऊं तुम्हे
और
कैसे पुकारना बंद कर दू
पता नहीं कब चमत्कार हो जाये
और
आ खड़े हो तुम सामने
चलो अभी तुम भी सो जाओ
और मैं भी
जरी रहेगा ये जद्दोजहद
पाने और खोंने के बीच संघर्ष का
जो सच है वो सच ही रहेगा
पर उम्मीद और सपने
जीने की उमंग भरे रहते है
सोमवार, 18 जून 2018
मेरे अंदर के अँधेरे
खिड़कियाँ
कमरे की
और मन की भी
चिंतन की
और आँखों की भी
बुझा देता हूँ रौशनी
ताकि छा जाये अँधेरा
अंदर भी और बाहर भी
क्योकि
अँधेरा हमें सुकून देता है
और
हर चीज से
आँख बंद कर लेने का बहाना
सो जाता हूँ मैं भी
सोने दो लोगो को भूखे पेट
या फुटपाथ के थपेड़ों
और बारिश में
लगने दो आग
किसी की आबरू में
लूटने दो इज्जत या असबाब
मुझे क्या
मैंने तो गर्त कर लिया है
खुद को अँधेरे में
और बंद कर ली है खिड़कियाँ
ताकि
कोई चीख सुनाई न पड़े
और न दिखाई दे
बाहर के अँधेरे
मेरे अंदर के अँधेरे
अब मेरे साथी बन गए है न
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो
इस व्यवस्था की तरह ।
शुक्रवार, 18 मई 2018
दमघोटू कविता
की
बाहर घनघोर सन्नाटा हो
और
अंदर दमघोटू और इतना शोर
की
लगता है नसे ही नही
शरीर की कोशिकाएँ भी
फट पड़ेंगी
नही हो सकती इससे बड़ी सज़ा
फांसी में
एक झटके से मुक्ति मिल जाती हैं
और
अजीवन कारावास में भी
लोगो का साथ
पर ऐसी सज़ा कल्पनातीत है
पता नही
किसी को इस सज़ा का एहसास है
या नही
इससे ज्यादा लिखा नही जा सकता
इस विषय पर
जेल से भी पेरोल मिल जाती है
जिंदगी में भी
कोई पेरोल की व्यवस्था हो सकती है
कौन मुक्ति देगा इससे
मुक्ति मिलेगी भी या नही ।
या
सन्नाटा और
अथाह लहू में बहता शोर
साथ साथ चलते रहेंगे
जब तक
फट न जाये अस्तित्व ही ।
शनिवार, 12 मई 2018
मैं दिल से जिया,दिल से किया और दिल से कहा पर दिमागों की लड़ाई में मैं अक्सर हार जाता हूँ ।
पर दिमागों की लड़ाई में मैं अक्सर हार जाता हूँ ।
शुक्रवार, 11 मई 2018
मौत और अकेलापन
________________
मौत कितनी
खूबसूरत चीज होती है
हो जाता है
सब कुछ शांत शांत
गहरी नींद
तनावमुक्त ,शांत शांत
न किसी का लेना
न किसी का देना
कोई भाव ही नही
कोई इच्छा ही नही
न डर ,न भूख ,न छल
न काम न क्रोध
बस शांति ही शांति
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा
और सब देख रहे है
न रोटी की चिंता
न बेटे और बेटी की
न घर की चिंता
न बिजलो और पानी की
न बैंक की चिंता
न टैक्स जमा करने की
न काम की चिंता
और न किसी छुट्टी की
न किसी खुशी की चिंता
न किसी की नाराजगी की
निर्विकार ,स्थूल
हल्का हल्का सब कुछ
देखो
कितना सपाट हो गया है चेहरा
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को
गजब का तेज लग रहा है
बहुत कुछ है खूबसूरत
पर मौत से तो कम
और मुझे तो
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन
सन्नाटा ही सन्नाटा
कोई आवाज ही नही
खुद की सांसो के सिवाय
कोई भी नही खुद के सिवाय
पंखे के आवाज तो
कभी कभी फोन की
और
हा दब गया रिमोट
तो टी वी की भी आवाज
तोड़ देती है सन्नाटा
और
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर
गजब का मुकाबला है
मौत और अकेलेपन का
हा
एक फर्क तो है दोनो में
मौत खूबसूरत होती है
पर अकेलापन बदसूरत
मौत शांत होती है
पर अकेलापन
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में
लौट कर किसी ने नही बताया
उसका अनुभव
पर
अकेलेपन को तो
मैं जानता भी हैं
और पहचानता भी हूँ
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है
और
अकेलेपन का अंत मौत ।
इसलिए
मौत से डरो मत उसे प्यार करो
अकेलेपन से हो सके तो भागो
और
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।
बुधवार, 2 मई 2018
झमाझम बारिश
और
आदतन बाहर बैठा हूँ
अकेला में
नही बन रही कोई कविता
नही आ रहे है कोई विचार
तारी है
अकेलेपन का आतंक
कलम और कीबोर्ड असहाय
ताक रहे है टुकुर टुकुर
पर उंगलियां जम गई है
उठ रही है मिट्टी की महक
सोंधी सोंधी सी
कुछ कूड़े करकट की बदबू भी
बीच बीच मे
चमक उठती है बिजली
शायद कहती हुई
कि
मुझे देख बस चमकती हूँ
और
खत्म हो जाती हूँ
या गिर जाती हूँ
कही बर्बादी बन कर
क्या ये कोई जीना है
तू तो बैठा निहार रहा है
अपनी आंखों से सब
और
अनुभूतिक तो होता होगा
प्रकृति से ,बारिश से हरियाली से
उठ खड़ा हो
और
बैठ जा अपनी उस मेज पर
जहा बैठते ही बन जाता है
तू कवि और लेखक
उंगलियां चलती ही
तो कुछ रच ही देती है
चल उठा गिलास
और हंस दे ठठा कर
और
मैं भी बदली से कहती हूँ
और तू भी बोल चियर्स ।
रविवार, 10 दिसंबर 2017
लौट के आओ
तुम कहा हो
खुश तो हो ना
तुम जहा हो
याद आते हो
दिन रात में
याद आते हो
हर बात में
आज ही तो
जीवन बने थे
उसके लिए
कितना सजे थे
सजा देकर जाने को
फिर
लौट नहीं आने को
आ सकते हो
तो आओ ना
इतना अब
तरसाओ ना
तुम भी अकेले
हम भी अकेले
कैसे चलेगा
जीवन इतना
कैसे कटेगा
तो आओ ना
तुम कहा हो
कुछ तो बताओ ना
मैं आँखे बंद करता हूँ
मुझे वैसे ही सुलाओ ना
मंगलवार, 14 नवंबर 2017
क्रांति का ये नया अंदाज होगा
शनिवार, 28 अक्टूबर 2017
मन रही है दीवाली
हर साल की तरह
कम होते गए घर से लोग
अब रह गए हम दो
लोगो के घरो में
बने है पकवान
मेरा बेटा भी होटल से
लाया है पकवान
लोगो के घरो में
सजी है रंगोली
मेरे बेटे ने भी
कुछ रख दिया है
जमीन पर
लोगो के बच्चे और बड़े भी
छोड़ रहे है पटाखे
मैं बिस्तर पर पड़ा
सुन रहा हूँ आवाजे
और
मेरा बेटा बाहर खड़ा
देख रहा है सबको फोड़ते
मेरे घर भी आई है मिठाई
पर पता नहीं क्यों
मिलने आने वालो की तादात
घट जाती हैं बुरी तरह
जब किसी पद पर नहीं होता हूँ मैं
हमने खरीदा है कुम्हार के बनाये
दिए और लक्ष्मी गणेश
थोड़ी सी खील और बतासे भी
ताकि इनको बनाने वालो की
कुछ मदद हो जाये
और
हार न जाये ये
देश के दुश्मन चीन से
और मन गयी
मेरी और मेरे बेटे की भी दीवाली
गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017
सब मरे थे
चारो तरफ सैनिक ही सैनिक थे ,
हुँकार थी ,
शोर था
टंकार थी
पंर
सन्नाटा था गहरा
और
कृष्ण ने रहस्य खोला
देखो सब मरे हुए है ।
कुछ ऐसा ही
शुक्रवार, 15 सितंबर 2017
जब और जितनी बार भी
अपने घर लौटता हूँ
और
दरवाजा खोलता हूँ
बिजली सी कौंध जाती है
और
दीवारो पर बन जाती है
अंनगिनत तस्वीरें
और
मन का बादल बरस उठता है ।
लहरो पर तैर जाती है
यादो की कितनी कागजी नावें
और कागज की नाव
तो कागज की ही होती है
खो जाती है अथाह पानी में
और
पसर जाता है सन्नाटा
दीवारो से छत तक
और
बैठक से बिस्तर तक ।
सोमवार, 11 सितंबर 2017
कौन कंगाल है
और
पिता के दर्द और तकलीफ में
क्या खूब संतुलन बैठाती हुई बेटी
पिता के दुख में मरहम लगाती हुई बेटी
दूर नौकरी की मजबूरी
फिर भी भाग कर आती हुई बेटी
पिता के दर्द से छटपटाती हुई बेटी
नौकरी , कैरियर और पिता की तड़प
में संतुलन बैठाता हुआ बेटा
पिता की तकलीफ को कम करने को
फड़फड़ाता हुआ बेटा
अपनी नींद और भूख भूल
पिता ही पिता में पूरा मन लगाता हुआ बेटा
नही हो धन दौलत ,पद और प्रतिष्ठा
पर ऐसा पिता तो कितना मालामाल है
होंगे उनके और उनके बच्चो के पास
धन, दौलत, पद ,प्रतिष्ठा ,सब कुछ
पर
ये सब नही है
तो
वो बाप किस कदर कंगाल है ।
गुरुवार, 10 अगस्त 2017
हां जीवन इसको कहते है |
रविवार, 23 जुलाई 2017
खुद से कौन लड़ पाया है |
मैं लड़ रहा हूँ
उम्र से
बीमारियों से
और
अकेलेपन से
दूसरे से लड़ना तो आसान है
पर खुद में
और
खुद से कौन लड़ पाया है |
गुरुवार, 29 जून 2017
कल सपने थे आंखों में आगे ही बढ़ते जाएंगे
जितने भी पीछे थे कल हम आगे चढ़ते जायेंगे |
जिसने दर्द नहीं झेला था आजादी की जंग का
जिसका नज़रिया इस पर इतना ज्यादा तंग था
झूल रहे थे फंसी पर जब ये मुखबिरी कराते थे
वतन के लड़ने वालो को ये जेल जेल पहुचाते थे |
कहा कल्पना की थी हमने केि ये शासन में आयेंगे
तब गद्दारी की थी देश से अब ये ही देश मिटायेंगे |
शनिवार, 17 जून 2017
चलो अब बंद करता हूँ खिड़कियाँ
खिड़कियाँ
कमरे की
और मन की भी
चिंतन की
और आँखों की भी
बुझा देता हूँ रौशनी
ताकि छा जाये अँधेरा
अंदर भी और बाहर भी
क्योकि
अँधेरा हमें सुकून देता है
और
हर चीज से
आँख बंद कर लेने का बहाना
सो जाता हूँ मैं भी
सोने दो लोगो को भूखे पेट
या फुटपाथ के थपेड़ों
और बारिश में
लगने दो आग
किसी की आबरू में
लूटने दो इज्जत या असबाब
मुझे क्या
मैंने तो गर्त कर लिया है
खुद को अँधेरे में
और बंद कर ली है खिड़कियाँ
ताकि
कोई चीख सुनाई न पड़े
और न दिखाई दे
बाहर के अँधेरे
मेरे अंदर के अँधेरे
अब मेरे साथी बन गए है न
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो
इस व्यवस्था की तरह ।
गुरुवार, 15 जून 2017
टीवी की क्या मजबूरी है ?
सुबह बाबा और रात भी बाबा
और
तरह तरह की दवाई वाले जरूरी है
ऐसा नहीं हो सकता कि
सुबह भी
मुहब्बत के गीत सुनाओ
और तरह तरह से हँसाओ
और
रात भी ऐसे ही गीत सुनाओ
और हंसा कर सुलाओ
फिर दिन भर खूब लाशे
या लाशे बनाने की
फैक्टरियां दिखाओ ।
बुधवार, 14 जून 2017
मैं खुद ही बरबाद हो गया तेरी खातिर वर्ना तेरी क्या हस्ती थी मेरी निगाहों में ।
वर्ना तेरी क्या हस्ती थी मेरी निगाहों में ।
गुरुवार, 25 मई 2017
बाप के कंधे पर चढ़ कर कुछ बनने वाले और होते है हम तो संघर्षों और अपनी कूवत से जमी पर चलते है ।
हम तो संघर्षों और अपनी कूवत से जमी पर चलते है ।
शुक्रवार, 19 मई 2017
फट न जाये अस्तित्व ही ।
की
बाहर घनघोर सन्नाटा हो
और
अंदर दमघोटू और इतना शोर
की
लगता है नसे ही नही
शरीर की कोशिकाएँ भी
फट पड़ेंगी
नही हो सकती इससे बड़ी सज़ा
फांसी में
एक झटके से मुक्ति मिल जाती हैं
और
अजीवन कारावास में भी
लोगो का साथ
पर ऐसी सज़ा कल्पनातीत है
पता नही
किसी को इस सज़ा का एहसास है
या नही
इससे ज्यादा लिखा नही जा सकता
इस विषय पर
जेल से भी पेरोल मिल जाती है
जिंदगी में भी
कोई पेरोल की व्यवस्था हो सकती है
कौन मुक्ति देगा इससे
मुक्ति मिलेगी भी या नही ।
या
सन्नाटा और
अथाह लहू में बहता शोर
साथ साथ चलते रहेंगे
जब तक
फट न जाये अस्तित्व ही ।
पहले हमसे यारी कर मिल करके गद्दारी करमैं हारूं और जीते तू ऐसी साज़िश भारी कर ।
मिल करके गद्दारी कर
मैं हारूं और जीते तू
ऐसी साज़िश भारी कर ।
कुछ सवाल है तेरे मेरे दरमियाँ जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।
जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।
हम किस कदर लड़ते थे तुम्हारे लिए फिर तुमने निगाहों से गिरा क्यो लिया ।
फिर तुमने निगाहों से गिरा क्यो लिया ।
गुरुवार, 18 मई 2017
कुछ सवाल है तेरे मेरे दरमियाँ जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।
जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।
बुधवार, 17 मई 2017
लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा
मुझे बचपन से गुस्सा आता था
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के संबोधन से
मुझे गुस्सा आता था
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक
मैं ट्रेन के दरवाजे पर
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था
की
भीड़ ज्यादा है तो
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते
मुझे गुस्सा आता था जब कोई
दूसरों के मैले को उठा कर
सर पर लेकर जाता था
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर
किसी को खाना दिया जाता था
गुस्सा आता था
जब सायकिल के हैंडिल पर
दो बाल्टियां
और
पीछे कैरियर पर मटका रख
दो मील दूर पानी लेने जाता था
शहर में
गुस्सा आता था
जब गांव जाने के लिए
मीलो सर पर बक्सा रख कर
चलना पड़ता था अंधेरे ने
गुस्सा आता था
जब गांव में बिजली भी नही थी
गुस्सा आता था
जब पुलिस अंकल किसी को
बिना कारण बांध कर ले जाते थे
माँ बहन की गालियां देते हुए
और
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था
पर किसी भी चीज को
बदल सकने की ताकत नही थी
इस बच्चे में
उसके बाद भी
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था
पर खुद शिकार हो गया
हर बात पर जिस पर
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए
मुझे तो गुस्सा आता रहा
और
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर
और
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया
पर
ताली पिटती भीड़ में
खो गया मेरा गुस्सा
और में भी खो गया साथ साथ
पानी पीकर या पानी के बिना
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा
संसद हो या मुम्बई
मेरा गुस्सा सड़क पर आया
लॉटरी हो या शहादत
सड़क पर फूटा गुस्सा
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी
नही रोक सकी मेरे गुस्से को
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता
भी बने मेरे गुस्से के कारण
मुझे आज भी गुस्सा आता है
बार बार बदलते कपड़ो पर
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर
पिटती विदेश नीति
और अर्थव्यवस्था पर
रोज शहीद होते सैनिको पर
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर
रोज के बलात्कार पर
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर
इंच इंच में होते अपराध पर
थाने से तहसील होते हुये
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर
भाषणों के खेप पर
आसमान छूती महंगाई पर
न जाने कितनी चीजे है
गुस्सा होने को
पर अब
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता
और
आवाज के दबने पर उफान मारता है
पर
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद
और साधारण आवाज
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर
और दीवारों के बीच
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए
जो मेरे पास नही है
और
चाहिए धन काफी धन
जो मंच सज़ा सके
,रथ बना सके
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने
कोई कविता या कुछ विचार
ताकि गुस्सा
समय के थपेड़े में मर न जाये ।
मंगलवार, 16 मई 2017
रोज की जिंदगी और ये घर ।
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एक घर है
जिसके बाहर एक गेट
और
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ
जब शहर कर बाहर जाना हो
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी
फिर एक लान है
जहा अब कभी नही बैठता
किसी के जाने के बाद
फिर एक बरामदा
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था
जब बेटियाँ घर पर थी
और बारिश हुई थी
और
मेरा शौक बारिश होने पर
बरामदे में बैठ कर हलुवा
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना
और अदरक की चाय
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है
वही बीतता है ज्यादा समय
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप
और
वो खिड़की
जिससे बाहर आते जाते लोग एहसास किराते है
की आसपास इंसान और भी है
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर
जहा सुबह क्या दोपहर तक बीत जाती है
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन और फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में
पता नही चलता कैसे बिना नहाए शाम भी हो जाती हूं उस कोने में
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा
अब कौन याद करे
रसोई में जाना जरूरी है
और बाथरूम में भी
थोड़ा लट लो वाकर पर
और खुद को बेवकूफ बना लो
की हमने भी फिटनेस किया
पांच बदाम भी कहा लो
कपड़े गंदे हो गए मशीन है
बस डालना और निकलना ही तो है
नाश्ता और खाना
और कुछ अबूझ लिखने की कोशिश
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से
जिंदगी बिगड़ दिया इन्होंने
पर बेमन से पढने की कोशिश
कभी कभी आ जाता है कोई
भूला भटका , उसकी और अपनी चिंता चाय
और
बिना विषय के समय काटना
लो हो गयी शाम
है एक साथ कर ले सुरमई उसके साथ
और
कुछ पेट मे भी चला ही जाए
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है
जीभ के नीचे दबावो
और सो जाओ बेफिकर
अब कल की कल देखेंगे
छोटा पडने वाला घर
किंतना बड़ा हो गया है
और
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है
पर बीत जाता है हर दिन भी
और घर के कोने में सिमट कर
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे
आज भी बीत गया एक दिन
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ
कही से बजी कोई पायल
नही रात को एक बजे का भ्रम
सो जाता हूँ
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा
ओढ़कर ।
गुरुवार, 11 मई 2017
मौत और अकेलापन ________________
________________
मौत कितनी
खूबसूरत चीज होती है
हो जाता है
सब कुछ शांत शांत
गहरी नींद
तनावमुक्त ,शांत शांत
न किसी का लेना
न किसी का देना
कोई भाव ही नही
कोई इच्छा ही नही
न डर ,न भूख ,न छल
न काम न क्रोध
बस शांति ही शांति
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा
और सब देख रहे है
न रोटी की चिंता
न बेटे और बेटी की
न घर की चिंता
न बिजलो और पानी की
न बैंक की चिंता
न टैक्स जमा करने की
न काम की चिंता
और न किसी छुट्टी की
न किसी खुशी की चिंता
न किसी की नाराजगी की
निर्विकार ,स्थूल
हल्का हल्का सब कुछ
देखो
कितना सपाट हो गया है चेहरा
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को
गजब का तेज लग रहा है
बहुत कुछ है खूबसूरत
पर मौत से तो कम
और मुझे तो
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन
सन्नाटा ही सन्नाटा
कोई आवाज ही नही
खुद की सांसो के सिवाय
कोई भी नही खुद के सिवाय
पंखे के आवाज तो
कभी कभी फोन की
और
हा दब गया रिमोट
तो टी वी की भी आवाज
तोड़ देती है सन्नाटा
और
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर
गजब का मुकाबला है
मौत और अकेलेपन का
हा
एक फर्क तो है दोनो में
मौत खूबसूरत होती है
पर अकेलापन बदसूरत
मौत शांत होती है
पर अकेलापन
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में
लौट कर किसी ने नही बताया
उसका अनुभव
पर
अकेलेपन को तो
मैं जानता भी हैं
और पहचानता भी हूँ
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है
और
अकेलेपन का अंत मौत ।
इसलिए
मौत से डरो मत उसे प्यार करो
अकेलेपन से हो सके तो भागो
और
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।
बुधवार, 10 मई 2017
पहले भी नवाबो और राजाओं की रक्काशा और गणिकाएँ होती थी
रक्काशा और गणिकाएँ होती थी
पर उनकी भी कुछ सीमाएं होती थी
आज की राजनीति में
सिर्फ रक्काशा और गणिकाएँ होती है
उसकी कुछ भी सीमाएं नही होती है ।
तब के राजा अपना काम खत्म कर महफ़िल जमाते थे
आज के हर वक्त सिर्फ काम की महफ़िल जमाते है
तबके राजा आमसभा से अलग पर्दे में हरम बनाते थे
आज के आमसभा को ही हरम बना देते है
तब कोई खासियत होती थी गणिका और रक्काशा बनने की
आज बस औरत जो जाना ही काफी है
तब गणिका और रक्काशा भी कर्मच्युत नही होने देती थी ज्यादातर
अब कर्म लायक ही नही रहने देती है
तब की गणिकाओं ने युद्ध भी लड़े और जौहर भी किये
अब के राजाओं में गणिकाओं के लिए युद्ध हो रहे और कर्मो का जौहर भी ।
हा बहुत फर्क हो गया है समय के साथ आदत और अंदाज़ में
बड़े से बड़े राजा के यहां आप का हुनर और बेबसी दोनों मार खा जाएंगे
फिर जरा हुस्न को आजमाइए जब तीर निशाने पर ही जायेंगे ।
हमसे कहते है हमारी इज्जत करो और जय जय कार करो
हा और तुम अस्मत ,दौलत और सत्ता का केवल और केवल व्यापार करो ।
वैसे जिनकी अजेय और व्यापक सत्ताएं थी और बड़े बड़े हरम थे उनके भी निशा कहा है
फिर आज वाले तो लोकतन्त्र के जमूरे है
इनकी निशानी भी कहा होगी ।
गणिका से गणिका तक ही पूरा हो जायेगा सफर पूरा जिन्दगी का ।