पापा की
कितनी चिंता करती है
बेटियाँ
की
क्या कहा रखा है ,
क्या क्या
कैसे कैसे
कर लीजियेगा ,
क्या खा लीजियेगा
इत्यादि इत्यादि ।
मन और आंखे
भिगो देती है बेटियाँ
और
खुद पर
पता नही कैसे
काबू रख पाती है
बेटियाँ
या फिर
आंखे छुपा लेती है
बेटियाँ ।
पहचान उन सभी का मंच है जो जिंदगी को जीते नहीं जीने का निर्वाह करते है .वे उन लोगो में नहीं है जिन्हें जीवन मिला है या जीने का मकसद उनके साथ रहता है .बस जीने और घिसटने के बीच दिल वालो की कलम से और दिल से जो निकल जाता है वही कविता है .पहली कविता भी तों आंसू से निकली थी .आंसू अपने दर्द के हो या समाज के ,वे निकलेंगे तों कविता भी निकलेगी और वही दिलवालो की ;पहचान ;है
बहुत उदास है दिन
राते तो उदास ही है
काफी दिनों से
पर आगोश में नीद के
उदासी खो जाती है कही
पर दिन की उदासियाँ
और एकाकीपन
इनसे जूझना नहीं आता
अपने से भाग जाने की
कला नहीं सीख पाया मैं
अभिमन्यु की तरह
एक कला से महरूम
रह गया मैं भी
वो चक्रव्यूह तोड़ने को
था आतुर
और मैं तलाश रहा हूँ
कोई चक्रव्यूह
जिसमें एकाकीपन और
उदासी का एहसास न हो ।
दर्द है
कि जाता ही नही
न मन का न तन का
न अपनी जलन का
न अपनी लगन का
न अपने कहन का
न उनके सुनन का
न उनके कहन का
न अपने सुनन का
न दिल की व्यथा का
न अपनी कथा का
न यादो का अपने
न वादो का अपने
इरादो का अपने
दवा भी नही है
दुवा भी नही है
ये किससे बताये
किसे हम सुनाये
आँसू छुपाये
या हिचकी दबाए
कटी जीभ अपनी
निकलता जो खू है
ये कैसे छुपाये
न आहो मे कोई
न चाहो मे कोई
निगाहो मे कोई
न राहो मे कोई
ये गम हम दबाए
कहा तक अब जाये
ये दर्द जो खू मे
कतरे कतरे लहू मे
चमड़ी के अंदर
औ चमड़ी के बाहर
ये जाता नही है ।
अभिशप्त आत्माएं
अभिशप्त वजूद
अभिशप्त वादे
अभिशप्त इरादे
अभिशप्त इच्छाये
अभिशप्त भविष्य
अभिशप्त रिश्ते
अभिशप्त भावनाए
सपोले ही चहुँ ओर
आस्तीन कैसे बचाए
अभिशप्त सब कुछ
ये सब
जाकर किसे दिखाये ।
जिन्दगी
खूबसूरत और खुशबूदार
फूलो की
रंग बिरंगी क्यारी है ।
कुछ पौधो मे काँटे है
तो क्या हुआ ?
रंग अपने जीवन मे भरो
और
खुशबू अपने दिलो-दिमाग मे ।
वाह क्या खूब जिन्दगी है ।
सब बादल छँट गये
सूरज निकल आया
उनकी कैद से
अब सब कुछ
साफ साफ दिख रहा है
गद्ढे भी ,पत्थर भी
रस्ते भी और मंजिल भी ।
ऐसा क्यो होता है अक्सर
कुछ लोगो के साथ
कि
जिस जमीन पर आप
बुनियाद बनाना चाहते है
वही दलदल निकल आती है
और
धंस जाता है खुद का वजूद
जिस पेड़ को मजबूत समझ
छप्पर का आधार बनाना चाहते है
वही इतना कमजोर निकल जाता है
कि
तनिक सा बोझ पडते ही
लचक जाता है
और
सब कुछ जमीदोज हो जाता है
पहाडी पर चढ़ते वक्त
पहला ही पत्थर
कमजोर निकल जाता है
और
पहले ही कदम पर घायल कर
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर
हिम्मत तब भी नही हारते लोग
और
जारी रखते है खोज
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की
पूरी तरह लम्बे समय तक
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की
और
पहाडी पर घायल होकर भी
अन्तिम चोटी तक पहुचने के
सही मार्ग की ।
आज होली है ,
रंग लगाना है ,
लगा लो,
अच्छे अच्छे रंग डालो,
ये लाल रंग है ,
लहू का भी लाल होता है,
फैसला तुम्हारा,
किसी के लिए रक्तदान करो
या
बेगुनाहों का रक्त बहालो,
या रुके हर तरह का रक्तपात
ऐसी कोई व्यवस्था बनालो
और आप हरा रंग लाये हो ,
लगता है कीचड में नहाये हो,
आओ पूरी धरती को
फिर हरा भरा बनाये,
हों भरपूर फसलें,
फलों के बगीचे ,
फूलो की क्यारी
नहीं तों गमले ही लगाये,
और नीला ,
नीला आसमान
नीला समुद्र
साफ हो नदियाँ,
साँस लेने लायक हवा ,
पीने लायक हो पानी
नहीं तों ,
खुद ही मिट जाओगे
तों होली कैसे मानोगे
पीला है तुम्हारा रंग
होली का अपनाओ नया ढंग,
गरीबी और बेबसी के कारण
जो बेटी आत्महत्या करने या,
बिकने को तत्पर है ,
उसे बचाने का
तुम्हे एक अवसर है,
उसके हाथ पीले कर,
कफ़न से बचा लो
पीली चुनरी ओढा दो ,
जीवन में खुशहाली
और उसके घर में
पीली होली सजादो |
तुम काला रंग ही लाये हो
या
तुम्हारा मन भी है काला ,
अपना इरादा बतादो ,
अपना असली चेहरा तो दिखादो ,
हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं
समाज के दुश्मनों पर डालो,
उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो
काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,
ये
राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ
सुभाष का हिंदुस्तान
काला रंग और काला इरादा
लेकर आओगे
तों पछताओगे,
रंग के साथ हम
खून की होली भी
खेलना जानते है,
भूले तों नही ७१ और कारगिल ,
अब आओगे तों मिट जाओगे, .
बाहर आसान पर अन्दर छिपे
काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,
वे हमारे बीच छिपे
ना पहचाने जाने वाले
गुलाल और अबीर है,
आओ
मिल कर सफाई का पानी डाले ,
उन्हें ढूढ़ कर निकाले,
सियार का रंग उतर जायेगा ,
समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा
फिर सभी रंगों को मिला कर
इन्द्रधनुषी रंग बनाये,
उसी की होली खेलें,
पूरे भारत को वही रंग लगायें,
अपना देश महान होगा
जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,
विश्व को रास्ता दिखायेगा
फिर विश्व गुरु कहलायेगा,
आओ इन इरादों की
चन्दन और रोली लगाओ,
हाथ का खंजर फेंक दो
और गले से लग जाओ |
यहाँ वहा आज देखो होली हो रही
वहा पे हंसी यहाँ ठिठोली हो रही
तय था होली एक दिन मनाई जाएगी
होली में बुराई सब जलाई जाएँगी
खुशियों से खेलेंगे हम रंग औ गुलाल
गले मिल कर दोस्ती बढाई जाएगी
एक दिन नही अब तों रोज होली है
जी हा आज कि ये नई सोच होली है
होली गुजरात कि कश्मीर कि होली
सड़क हो या रेल बस होली होली है
होली में जलाये भी तों कौन लकड़ियाँ
मिल रही है मुफ्त में तमाम लड़कियां
रेल, बस, घर जलाने का अधिकार है
रोके कौन सबने बंद की है खिड़कियाँ
होली का हुड़दंग हो या लोगो की चीख
यहाँ वहा जो भी मिले पहले उसे खींच
आग में जलादे चाहे खंजर पर उछाल
पानी से नही अब जमी लहू से ही सींच
देखो कही बम तों कही गोली चल रही
चारो ओर खून की बस होली चल रही
हम नहला रहे है अपनी माँ को लहू से
नफ़रत की ही बस यहाँ बोली चल रही
ऐसी होली भारत में और कब तक चलेगी
नफरत की कहानी भला कब तक पलेगी
जले राम का हवेली या रहीम का मकान
इंसानियत की होली ऐसी कब तक जलेगी
आओ ऐसी होली पर विराम लगाये
भाई चारे की कहानी फिर से सुनाये
आओ इंसानी जज्बे को हम जगाये
नफरतो को होली में इस बार जलाये
उन्होने पढाया था
हज़ारो को
इसलिये बस गये थे
उसी शहर मे
और
उनकी कविताओ पर
कितनी तालिया बजती थी
और
उनके भाषण
लगता था क्रांती कर देंगे
और
वो कितना अच्छा अभिनय
करता था / करती थी
किसी ने नही देखा
उसके दरवाजे की तरफ कभी
जब वो वो नही रहे
जब बदबू परेशान करने लगी
तब पडोसी परेशान हुये
और
शिकायत किया पुलिस को
तब दरवाजा तोड
निकाला गया कई दिन की
सडी लाश को
उस दिन लोगो ने भी कहा
और अखबार ने भी लिखा
कि
ये वो थे / थी
ऐसे थे और वैसे थे
और
लग गयी गिद्ध निगाहे
उनके घर पर ।
कितनी कहानियां
पसरी पडी है चारो ओर ।
पेड़ से टूटता है पत्ता
उड़ता है इधर से उधर
गिरता है जमीन पर
हरा होता है
तो
कोई जानवर खा जाता है
सूख जाता है
तो
रौद दिया जाता है पैरो से
और
मिट्टी मे मिल जाता है
पेड़ से टूटती है डाल
सूख जाती है कुछ दिन मे
पतली होती है
या कमजोर होती है
तो जला दी जाती है
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है
बना दी जाती है
कुछ न कुछ
किसी के बैठने को
या
सजावट की चीज बन जाती है
घर से भागने वालो
और
इस पत्ते या डाल मे
क्या फर्क होता है
कुछ भी नही न ।
मैं बंट गया हूँ कितने खानो मे
पर मेरा ही कोई मेरे साथ नही ।
तवायफ भी कभीं शरम से पेशा छोड़ देती है
कभी गुस्से में होती हैं तो घुंघरू तोड़ देती है
सियासत की बेशर्मी का आलम देखिये साहेब
ये अपने कर्मो से तवायफ को पीछे छोड़ देती है ।
कुछ लोगों के शरीर ही नही
बल्कि आत्मा तक पर
इतने बाण लग चुके होते है
जमाने के
कि
कोई और बाण
लगने की जगह ही
नही बची होती है ।
अगर कोई चलेगा
तो
बाण पर ही लगेगा
और
उसे और गहरे तक
पैबस्त ही कर देगा न
घाव
और
कितना गहरा हो जाता है
ऐसे में
और
दर्द भी कितना बढ़ जाता है
उस बाण से ।
ये देश जागीर है किसकी
जनता की ,सत्ता की
या पूंजीपति नौकरशाहो की
तय होना अभी भी बाकी
बहाता है किसान पसीना
और
मोटा हों जाता है बनिया
उसके श्रम पर
व्यापारी और बिचौलिया
बहाता है मजदूर पसीना
और
तिजोरी भरती इनकी
सीमा पर मरता जवान है
और
सीना नेता का नपता है
नेता नेता सब जपता है
आखिर कौन है मुल्क का मालिक
ये सब
या
फिर सब ,सारी जनता
क्यों नहीं मिलता सबको सबका
वाजिब हक
कब बदलेगी ये सड़ी व्यवस्था
और
सचमुच का लोकतंत्र मिलेगा
संभव बराबर सब होंगे जब
समान शिक्षा सबको मिलेगी
सामान चिकित्सा होगी सबको
और
सामान अवसर भी होगा तब
जरूरत है सम्पूर्ण क्रांति की
गाँधी के रस्ते पर चल कर
रक्तहीन हो पर समीचीन हो
फैसलाकुन क्रांति की
कब आएगी कौन करेगा
मैं निकलूं तुम भी निकलो
सबको ही हम साथ मिला
चलो हाथ से हाथ मिला ले
जो शोषक है मिलकर उनको
इस क्रांति का मर्म बता दे
हर अंतिम का दर्द दिखा दे
शायद वो भी समझ ही जाये
वो भी हमसे हाथ मिलाये
वर्ना हमको तो उठना ही
हर अंतिम को तो जगना ही
मुट्ठी भींच अधिकार मांग लो
हो सबका ही प्यार मांग लो
वर्ना हक तो लेना ही है
जिनके पास है देना ही है
पांच गाँव जब न देता हो
लड़कर अपना हिस्सा लेना
पर उसका उसको दे देना
नयी क्रांति का आगाज होगा
सबका अपना कल भी होगा
सबका अपना आज होगा
क्रांति का ये नया अंदाज होगा
कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन
बचाने को उन लोगो को
जिनको खड़ा कर दिया था
सबसे बडी सत्ता के खिलाफ
बस यही तो कहा था कृष्ण ने
कि
उसे क्यो भोग लगाते हो
जो खाता ही नही है
जिसे भूख ही नही है
और
उदर भी नही है
केवल वास लेता है वो
उसे खिलाओ
जिसे भूख है
जिसे जरूरत है
लाओ मुझे खिलाओ
मैं खाऊंगा
कितना कमजोर था देवत्व
की
तुरन्त हिल जाता था उनका आसन
और
कितना क्रोध भरा था इनमें
कैसे और क्यो देवता माने इन्हें
जो सहज इंसान भी नही
बरसा दिया क्रोध
उन सभी पंर
जिन्हें खड़ा किया था कृष्ण ने
सत्य के साथ
पर
कृष्ण भी तो कृष्ण थे
प्रेम किया तो खूब किया
राजनीति किया तो खूब किया
युध्द भी खूब करवाया
खूब मरवाया
और
खूब बचाया
खड़े हो गए यहाँ भी कृष्ण
अपनो के साथ
और
उठा लिया गोवर्धन
अपनी छोटी सी उंगली पर
वो छोटी सी उंगली
और
उतना बड़ा पहाड़
कैसे टिक पाया होगा
और
कैसे उठाया होगा
कितनी दुखी होगी
उनकी उंगली
शायद आज भी दर्द
हो रही वो उंगली
पर
असम्भव को संभव करने का नाम
ही
कृष्ण है शायद
लगता है
की वो पहाड़ नही
बल्कि पुरुसार्थ रहा होगा
संकल्प रहा होगा
इरादा रहा होगा
और
अडिगता रही होगी
और
आंख में आंख डाल कर
खड़े हो गए होंगे कृष्ण
सबसे आगे
उंगली उठाकर चुनौती देते हुए
और
उनके संकल्प के सामने
नही टिक पाया होगा
इतना उथला से इंद्र
और
भाग खड़ा हुआ होगा
खूब तालियां बजी होंगी
नाचे होंगे लोग
कृष्ण को उठा कर कंधे पर
गोपिया रीझ गयी होंगी कितनी
और
देख रही होंगी कनंखियो से
कृष्ण को
कृष्ण ने भी जरूर देखा होगा
अठखेलियाँ
और
मंद मंद मुस्कराए होंगे कृष्ण
पर
कृष तुम कितने लंबे विश्राम पर हो
या
अपने गुण , अपनी जिम्मेदारी
भूल गयो हो
देखो
कितने नकली देव
क्या क्या जुल्म कर रहे है
तुम्हारे लोगों पर
तुम्हारी गोपिकाओं
तुम्हारे बच्चो से
क्या क्या सलूक हो रहा है कृष्ण
तुम इतने बेदर्द तो नही हो सकते
की
लोगो का दर्द ही भूल जाओ
आ जाओ न कृष्ण
भारत ही नही दुनिया को
एक और महाभारत की जरूरत है
और
जरूरत हैं
आज के संदर्भ में
एक नए ज्ञान और उपदेश की
कब आवोगे कृष्ण
और
ये महापर्वत कब उठावोगे
अपने इरादे और न्याय की
उंगली पर ।
आओ न कृष्ण , अब उठ जाओ
आ भी जाओ न कृष्ण ।
लोग कल रात दिए
और
मोमबत्तियां जलाएंगे
पटाके भी चलाएंगे
और
कुछ बच्चे
परसो सुबह उठ कर
बची मोबत्तियाँ , दिए
और
बिना जले पटाके बीनेगे
जहाँ काम करते होंगे
उनके माँ बाप
उनको वहाँ से मिलेगा
खील बतासा मिठाईयां
कपड़े
और
इनाम में कुछ पैसे भी
मालिक के
दिल के बड़प्पन के अनुसार
और
दीपावली के अगले दिन होगी
एक बड़ी आबादी की दीवाली
कल तो
ये बच्चे
बस टुकुर टुकुर ताकेंगे
किसी
दूसरी दुनिया के लोगो
का वैभव
उनके घरो का उजाला
उनकी धमक
और पटाको कि चमक
उनके घर आते जाते डिब्बे
और सूंघेगे
उनके घर की
रसोई से निकलती
पकवानों की खुशबू
जो उसकी दुनिया मे
नही होती ।
और
बीत जाएगी दीपावली
दो दुनिया एक बार
फिर स्थापित कर
और
सब का उत्थान
और
संघर्ष भुला देगा
कि
कल क्या हुआ था ।
यही समाज की
बनावटी सतत यात्रा हैं
जिसमें
बहा जा रहा है समाज
न जाने कितनी सदियों से
क्या कभी दूरी मिट पाएगी
ये दो दिन की
और
दो तरह की दीपवाली की ?
ये समंदर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं
और
पानी हां पानी भी बहुत है
प्यास है खूब प्यास
पर पी सकते नहीं है ।
किस लिए फिर
इसकी चाहत
क्या मिलेगा
इन लहरों को गिनकर
या
इनसे टकरा कर
क्या मिलता है
इस रेत से दिल लगाकर
क्यों जाते है हम
इतनी दूर दूर
बस ये रेत देखने
लहरे गिनने
या
लहरों में गिर जाने को
मुझको तो
कुछ समझ न आया
सब माया है केवल माया ।
ये किनारा ,ये लहरे औ ये पानी
जो खारा है
आखो के पानी से भी क्या
ये बालू कितनी निर्मम है
मेरे जीवन से भी क्या ।
ये समन्दर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं ।
इतनी घृणा
और
इतना जहर
कहाँ रखते है लोग
की
उगलते भी नही
और
निगलते भी नही
और
अपनो को
पराया बना लेते है ।
पिता हो ,माँ हो
बेटा या बेटी
पता नही कैसे
समझ जाते है
एक दूसरे का दर्द
और
अंदर अंदर छटपटाते है
एक दूसरे के लिए
कोई पैथी नही पहचानती
न कोई विज्ञान
इस बेतार संदेश को
गर
दर्द में शामिल रहे हो
कभी या ज्यादातर
और
दर्द भोगे हो साथ साथ
मजबूत चट्टान बनकर
एक दूसरे के लिए
और
जुड़े हो दिल और आत्मा से ।
रातें
कितनी स्याह होतीहै
क्यो होती है
इतनी स्याह रातें
ज्यो ही सूरज
पच्छिमी की खोह में
डुबकी लगाता है
पूरब से फैलने लगती है
स्याह रात
टिमटिमाते हुई
रोशनियां भी
जुगनू से ज्यादा
कुछ नही होती
कितनी भयानकता
समेटे होती है स्याह रात
जिंदगी गर्त हो जाती है
धीरे धीरे इसके आगोश में
और
कितना अकेलापन
तारी हो जाता है
जिसमे जिंदगी
सवाल बन जाती है
इन सवालो का
कोई जवाब नही होता
खुद से ही बाते करना
खुद को तसल्ली देना
खुद के अकेलेपन से लड़ना
और लड़ते लड़ते
नीद के लिए लड़ना
ताकि आंख बंद कर
अनदेखा कर सके
इस स्याह अंधेरे को
और अकेलेपन को
पर
कितना स्याह है सब कुछ
चलो आंखे बंद कर लेते है
और
सोच लेते है
की
अकेले नही है हम
तमाम सूरज उग गए है
हमारी जिंदगी में ।
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !
कुछ सवाल है
जो अनुत्तरित है
कुछ जवाब है
जो खुद
सवाल बन गए है
सिलसिला टूटता ही नही
न सवालो का न जवाबो का
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है
पर कही तो कोई दीवार होगी
या
होगा इस सफर का डेड एंड
जो रोक देगा क्रिया को
और प्रतिक्रिया को भी
और
फिर सब होगा शांत शांत ।
वर्दी पहन कर
कहाँ से आती है
इतनी घृणा
कि
जिन्हें जानते भी नही
पहचानते भी नही
जिन्होंने
कुछ बिगाड़ा भी नही
उतार देते है गोलियां
उनके सीनो में
उनके सर में
वो औरत हो ,बच्चा हो
बूढ़ा या मासूम बेटी
क्या
हाथ नही कांपते विल्कुल
और
नही दिखता इन चेहरों में
चेहरा अपनी बहन , बेटे ,बेटी
या भाई , बाप या बाबा का
और तब भी जब
कोई छोटी से बेटी भी
तन कर खड़ी हो जाती है
रायफल के सामने निहत्थी
कहाँ से आती है ये नफरत
और
कब खत्म होगी ये नफरत
ये हथियारों और मौत का खेल
इसे बंद करना ही होगा
और
बोना हीं होगा
इंसानों की जिंदगी में
प्रेम का गुलाब ,चंपा और चमेली ।
ये अंधेरा कितना अंधेरा
चारो ओर केवल अंधेरा
नही कही से सूरज दिखता
नही रोशनी कैसी भी
आगे जाए , कैसे जाए
कदम बढ़ाए गिर ना जाये
ठिठके ठिठके कब तक रहना
अनिश्चितता कब तक सहना
कोई तो हो जो राह दिखाये
वो स्वर्ग हो या नरक हो
वो भी मेरे साथ मे जाए
पर अब ऐसा कौन मिलेगा
जीवन मे कब कमल खिलेगा
जो था वो तो बिला गया
ना जाने वो कहा गया
अब तो बस जो है हम है
चाहे अंधेरा मिटा सकें
या खुद को ही गंवा सके
इसको तय करेगा कौन
प्रकृति मौन हम भी मौन ।
सो जाता हूँ आखिर कल भी तो सो जाना है
इस धरती से दूर कही अम्बर में खो जाना है
धरती पर चलते सोते खाट पे कुछ धरती पर
सबको कल इस मिटटी में मिटटी हो जाना है ।
अक्सर आंखे खुद ही खुद को धो लेती है ।
खुश हो तो हंस लेती है दुखी हो तो रो लेती है ।
बेटे हो या बेटियां मुस्कुरा कर देख ले
हम थोड़ा और भी जी जाना चाहते है ।