बुधवार, 17 जुलाई 2019

अपनो को बहलाता है ।

जो दिन भर हंसी
चेहरे पर चिपकाता है
अकेले मे रात को रोता
फिर
सुबह से मुस्कराता है
वो भी एक इन्सा है
जो खुद को
और
अपनो को बहलाता है ।
क्या कोई जानता है
कि
वो क्या कहलाता है ।

रविवार, 7 जुलाई 2019

अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की

निकल पड़ें जब भी आज़ाद झोंके की तरह
हाँ शोर मचाएंगे और मशहूर हो जायेंगे हम
ये दस्तक है हमारी सुन लो गर बहरे भी हो
वर्ना बेचैन करने वाला शोर बन जायेंगे हम ।

हमें मुर्दा समझते हो निकलेंगे मुट्ठिया बांधे हुए
तुम देखते रह जावोगे और झंडा फहराएंगे हम
हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा
हाँ देखोगे उदासी से जब शोला बन जायेंगे हम ।

अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो खेत की
अभी आगाज़ है फुटपाथो पर अब  नजर कर लो
जमीन पर जब गिरोगे तुम खुश हो मुस्करायेंगे हम ।

मंगलवार, 25 जून 2019

राम तुम मत आना

राम तुम मत आना

उन्होने कहा
जय श्रीराम बोल
वो बोला
जय श्रीराम
उन्होने कहा
हनुमान की जय बोल
वो बोला
हनुमान की जय
वो जो कहते रहे
वो बोलता रहा
वो बोलता रहा
जय श्रीराम
और
हनुमान की जय
और
राम के भक्त
उसे
लगातार पीटते रहे
जब तक
वो बोलता रहा
कितना दर्द हुआ होगा न
जब
इतने लोगो ने
इतने घंटो तक
मारा होगा उसे
क्या दर्द का
बिल्कुल भी एहसास
नही हुआ होगा
उन लोगो को
जो खुद को
हिन्दू कहते है
क्या सचमुच
ये लोग हिन्दू है
हिन्दू तो चींटी को
बचा कर चलता है
की
कही मर न जाये
ये कौन से हिन्दू है
अब वो अब
सांस ही नही ले रहा था
तो
उन्होने भी
बोलना बन्द कर दिया
जय श्रीराम
और
हनुमान की जय
वो तो
बोलने लायक ही नही बचा था
भाग खड़े हुये
राम का नाम लेकर
वध करने वाले
हा वध शब्द का ही
प्रयोग किया था
गांधी को मारने वालो ने
और
गोली खाकर
गांधी ने भी तो कहा था
हे राम हे राम
नही
ये अब हे राम नही
बल्कि
जय श्रीराम बोलते है
ताकी कही गांधी के
अनुयायी न कहलाये
पर
वो तो
भाग ही नही पाया 
बिन बुलायी मौत से
जो
उस राम के नाम से आई
जिसने
अधर्म को खत्म किया
धर्म के लिए
पर धर्म के नाम पर भी
कभी अधर्म होगा
कहा सोचा होगा
राम ने
जीते राज
उन्होने युद्द मे
पर
दे दिये
वही के लोगो को
राज पाने के लिए
उनके नाम का उपयोग होगा
कहा सोचा होगा
राम ने
अब उसकी विधवा
जो अभी
जल्दी ही
ब्याही गयी थी
अहिल्या की तरह
पत्थर बन गयी है
की
कौन होगा
अब सहारा
किसके साथ बीतेगा जीवन
कितना चीखी होगी वो
उसकी बेजान लाश देखकर
कई बार तो
बेहोश हो गयी होगी
फिर पानी डाल कर
उठाया गया होगा उसे
वो फिर पछाड़ मार मार
गिर जाती होगी
क्या
उसे मारने वालो ने
ऐसे दृश्य नही देखा होगा
अपने घरो पर
और
नही देखा होगा
विधवा हुयी किसी
बहन और बेटी को
अचानक
और बूढे हो गये मा बाप को
बेसहारा हो गये
अबोध बच्चो को
क्या नही आते वो दृश्य
कभी
इन लोगो की आंखो मे
राम को भी तो
बाँट दिया इन लोगो ने
जो
उसके खाने मे
आते ही नही
कि
उम्मीद करे की
इस युग मे भी
आयेंगे राम
और
उद्धार कर देंगे
उसकी बुत बन गयी
विधवा का ।
वैसे भी राम
अब आते ही कहा है
चाहे
कितना भी अधर्म हो
पर
अब तो राम
खुद ही खतरे मे है
क्या पता
कि
वो पढाये पाठ
सही और गलत का
धर्म और अधर्म का
और
उनका नाम लेने वाले
उन्हे ही राम विरोधी
और
राष्ट्र विरोधी बता दे
और
जय श्रीराम का नारा लगाती हुयी भीड
राम का ही बध कर दे
इसलिये राम
तुम बिल्कुल मत आना
अपने भक्तो वाले
इस देश मे
और इस युग मे ।

मंगलवार, 18 जून 2019

सो जाने दो इस व्यवस्था की तरह ।

चलो अब बंद करता हूँ
खिड़कियाँ
कमरे की
और
मन की भी
चिंतन की
और
आँखों की भी
बुझा देता हूँ रौशनी
ताकि
छा जाये अँधेरा
अंदर भी और बाहर भी
क्योकि
अँधेरा हमें सुकून देता है
और
हर चीज से
आँख बंद कर लेने का बहाना
सो जाता हूँ मैं भी
सोने दो लोगो को भूखे पेट
या फुटपाथ के थपेड़ों
और
बारिश में
लगने दो आग
किसी की आबरू में
लूटने दो इज्जत
या असबाब
मुझे क्या
मैंने तो गर्त कर लिया है
खुद को अँधेरे में
और
बंद कर ली है खिड़कियाँ
ताकि
कोई चीख सुनाई न पड़े
और
न दिखाई दे
बाहर के अँधेरे
मेरे अंदर के अँधेरे
अब
मेरे साथी बन गए है न
चलो मुझे गहरी नीद
सो जाने दो
इस व्यवस्था की तरह ।

रविवार, 16 जून 2019

बेटियाँ

घर से जाते जाते भी 
पापा की 
कितनी चिंता करती है
बेटियाँ 
की 
क्या कहा रखा है ,
क्या क्या
कैसे कैसे
कर लीजियेगा ,
क्या खा लीजियेगा
इत्यादि इत्यादि ।
मन और आंखे
भिगो देती है बेटियाँ
और
खुद पर
पता नही कैसे
काबू रख पाती है
बेटियाँ
या फिर
आंखे छुपा लेती है
बेटियाँ ।

शुक्रवार, 31 मई 2019

बहुत उदास है दिन

बहुत उदास है दिन
राते तो उदास ही है
काफी दिनों से
पर आगोश में नीद के
उदासी खो जाती है कही
पर दिन की उदासियाँ
और एकाकीपन
इनसे जूझना नहीं आता
अपने से भाग जाने की
कला नहीं सीख पाया मैं
अभिमन्यु की तरह
एक कला से महरूम
रह गया मैं भी
वो चक्रव्यूह तोड़ने को
था आतुर
और मैं तलाश रहा हूँ
कोई चक्रव्यूह
जिसमें एकाकीपन और
उदासी का एहसास न हो ।

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दर्द है कि जाता ही नही

दर्द है
कि जाता ही नही
न मन का न तन का
न अपनी जलन का
न अपनी लगन का
न अपने कहन का
न उनके सुनन का
न उनके कहन का
न अपने सुनन का
न दिल की व्यथा का
न अपनी कथा का
न यादो का अपने
न वादो का अपने
इरादो का अपने
दवा भी नही है
दुवा भी नही है
ये किससे बताये
किसे हम सुनाये
आँसू छुपाये
या हिचकी दबाए
कटी जीभ अपनी
निकलता जो खू है
ये कैसे छुपाये
न आहो मे कोई
न चाहो मे कोई
निगाहो मे कोई
न राहो मे कोई
ये गम हम दबाए
कहा तक अब जाये
ये दर्द जो खू मे
कतरे कतरे लहू मे
चमड़ी के अंदर
औ चमड़ी के बाहर
ये जाता नही है ।

रविवार, 7 अप्रैल 2019

अभिशप्त सब कुछ

अभिशप्त आत्माएं
अभिशप्त वजूद
अभिशप्त वादे
अभिशप्त इरादे
अभिशप्त इच्छाये
अभिशप्त भविष्य
अभिशप्त रिश्ते
अभिशप्त भावनाए
सपोले ही चहुँ ओर
आस्तीन कैसे बचाए
अभिशप्त सब कुछ
ये सब
जाकर किसे दिखाये ।

वाह क्या खूब जिन्दगी है ।

जिन्दगी
खूबसूरत और खुशबूदार
फूलो की
रंग बिरंगी क्यारी है ।
कुछ पौधो मे काँटे है
तो क्या हुआ ?
रंग अपने जीवन मे भरो
और
खुशबू अपने दिलो-दिमाग मे ।
वाह क्या खूब जिन्दगी है ।

सब बादल छँट गये

सब बादल छँट गये
सूरज निकल आया
उनकी कैद से
अब सब कुछ
साफ साफ दिख रहा है
गद्ढे भी ,पत्थर भी
रस्ते भी और मंजिल भी ।

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

ऐसा क्यो होता है अक्सर

ऐसा क्यो होता है अक्सर
कुछ लोगो के साथ
कि
जिस जमीन पर आप
बुनियाद बनाना चाहते है
वही दलदल निकल आती है
और
धंस जाता है खुद का वजूद
जिस पेड़ को मजबूत समझ
छप्पर का आधार बनाना चाहते है
वही इतना कमजोर निकल जाता है
कि
तनिक सा बोझ पडते ही
लचक जाता है
और
सब कुछ जमीदोज हो जाता है
पहाडी पर चढ़ते वक्त
पहला ही पत्थर
कमजोर निकल जाता है
और
पहले ही कदम पर घायल कर
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर
हिम्मत तब भी नही हारते लोग
और
जारी रखते है खोज
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की
पूरी तरह लम्बे समय तक
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की
और
पहाडी पर घायल होकर भी
अन्तिम चोटी तक पहुचने के
सही मार्ग की ।

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

आज होली है

आज होली है ,
रंग लगाना है ,
लगा लो,
अच्छे अच्छे रंग डालो,

ये लाल रंग है ,
लहू का भी लाल होता है,
फैसला तुम्हारा,

किसी  के लिए रक्तदान करो
या
बेगुनाहों का रक्त बहालो,

या रुके हर तरह का रक्तपात
ऐसी कोई व्यवस्था बनालो

और आप हरा रंग लाये हो ,
लगता है कीचड में नहाये हो,

आओ पूरी धरती को
फिर हरा भरा बनाये,
हों भरपूर फसलें,

फलों के बगीचे ,
फूलो की क्यारी
नहीं तों गमले ही लगाये,

और नीला ,
नीला आसमान
नीला समुद्र
साफ हो नदियाँ,

साँस लेने लायक हवा ,
पीने लायक हो पानी
नहीं तों ,

खुद ही मिट जाओगे 
तों होली कैसे मानोगे

पीला है तुम्हारा रंग
होली का अपनाओ नया ढंग,

गरीबी और बेबसी के कारण
जो बेटी आत्महत्या करने या,

बिकने को तत्पर है ,
उसे बचाने का
तुम्हे  एक अवसर है,

उसके हाथ पीले कर,
कफ़न से बचा लो
पीली चुनरी ओढा दो ,                                                                

जीवन में खुशहाली 
और उसके घर में
पीली होली सजादो |

तुम काला रंग ही लाये हो
या
तुम्हारा मन भी है काला ,

अपना  इरादा बतादो ,
अपना असली चेहरा तो दिखादो ,

हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं
समाज के दुश्मनों पर डालो,

उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो
काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,

ये
राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ
सुभाष का हिंदुस्तान

काला रंग और काला इरादा
लेकर आओगे
तों पछताओगे,

रंग के साथ हम
खून की होली भी
खेलना जानते है,

भूले तों नही ७१ और कारगिल ,
अब आओगे तों मिट जाओगे, .

बाहर आसान पर अन्दर छिपे
काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,

वे हमारे बीच छिपे
ना पहचाने जाने वाले
गुलाल और अबीर है,

आओ
मिल कर सफाई का पानी डाले ,
उन्हें ढूढ़ कर निकाले,

सियार का रंग उतर जायेगा ,
समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा

फिर सभी रंगों को मिला कर
इन्द्रधनुषी रंग बनाये,

उसी की होली खेलें,
पूरे भारत को वही रंग लगायें,

अपना देश महान होगा
जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,

विश्व को रास्ता दिखायेगा
फिर विश्व गुरु कहलायेगा,

आओ इन इरादों की
चन्दन और रोली लगाओ,

हाथ का खंजर फेंक दो
और गले से  लग जाओ |

होली हो रही

यहाँ वहा आज देखो होली हो रही

वहा पे हंसी  यहाँ ठिठोली हो रही

तय था होली एक दिन मनाई जाएगी

होली में  बुराई  सब  जलाई  जाएँगी

खुशियों से खेलेंगे हम रंग औ गुलाल

गले मिल कर दोस्ती  बढाई  जाएगी

एक दिन नही अब तों  रोज होली है

जी हा आज कि ये नई सोच होली है

होली गुजरात कि कश्मीर कि होली

सड़क हो या रेल बस होली  होली है

होली में जलाये भी तों कौन लकड़ियाँ

मिल रही है मुफ्त में तमाम लड़कियां

रेल, बस, घर  जलाने का अधिकार है

रोके कौन सबने बंद की है खिड़कियाँ 

होली का हुड़दंग हो या लोगो की चीख

यहाँ वहा जो भी मिले पहले उसे  खींच

आग में जलादे  चाहे खंजर पर उछाल

पानी से नही अब जमी लहू से ही सींच

देखो कही बम तों कही गोली चल रही

चारो ओर खून की बस होली चल रही

हम नहला रहे है अपनी माँ को लहू से

नफ़रत की ही बस यहाँ बोली चल रही

ऐसी होली भारत में और कब तक चलेगी

नफरत की कहानी भला कब तक  पलेगी

जले राम का हवेली या रहीम  का मकान

इंसानियत की होली ऐसी कब तक जलेगी

आओ ऐसी होली पर विराम लगाये

भाई चारे की कहानी फिर से सुनाये

आओ इंसानी जज्बे  को हम जगाये

नफरतो को होली में इस बार जलाये

बुधवार, 20 मार्च 2019

वो जब वो नही रहे

उन्होने पढाया था
हज़ारो को
इसलिये बस गये थे
उसी शहर मे
और
उनकी कविताओ पर
कितनी तालिया बजती थी
और
उनके भाषण
लगता था क्रांती कर देंगे
और
वो कितना अच्छा अभिनय
करता था / करती थी
किसी ने नही देखा
उसके दरवाजे की तरफ कभी
जब वो वो नही रहे
जब बदबू परेशान करने लगी
तब पडोसी परेशान हुये
और
शिकायत किया पुलिस को
तब दरवाजा तोड
निकाला गया कई दिन की
सडी लाश को
उस दिन लोगो ने भी कहा
और अखबार ने भी लिखा
कि
ये वो थे / थी
ऐसे थे और वैसे थे
और
लग गयी गिद्ध निगाहे
उनके घर पर ।
कितनी कहानियां
पसरी पडी है चारो ओर ।

पेड़ से टूटता है पत्ता

पेड़ से टूटता है पत्ता
उड़ता है इधर से उधर
गिरता है जमीन पर
हरा होता है
तो
कोई जानवर खा जाता है
सूख जाता है
तो
रौद दिया जाता है पैरो से
और
मिट्टी मे मिल जाता है
पेड़ से टूटती है डाल
सूख जाती है कुछ दिन मे
पतली होती है
या कमजोर होती है
तो जला दी जाती है
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है
बना दी जाती है
कुछ न कुछ
किसी के बैठने को
या
सजावट की चीज बन जाती है
घर से भागने वालो
और
इस पत्ते या डाल मे
क्या फर्क होता है
कुछ भी नही न ।

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

तवायफ और सियासत

तवायफ भी कभीं शरम से पेशा छोड़ देती है
कभी गुस्से में होती हैं तो घुंघरू तोड़ देती है
सियासत की बेशर्मी का आलम देखिये साहेब
ये अपने कर्मो से तवायफ को पीछे छोड़ देती है ।

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

बाण पर बाण

कुछ लोगों के शरीर ही नही
बल्कि आत्मा तक पर
इतने बाण लग चुके होते है
जमाने के
कि
कोई और बाण
लगने की जगह ही
नही बची होती है ।
अगर कोई चलेगा
तो
बाण पर ही लगेगा
और
उसे और गहरे तक
पैबस्त ही कर देगा न
घाव
और
कितना गहरा हो जाता है
ऐसे में
और
दर्द भी कितना बढ़ जाता है
उस बाण से ।

बेचारा हिरन ।

कभी कभी
कोई दर्द
अचानक
आप को
कितना
बेचैन कर देता है
खाने भी नही देता
और
सोने भी नही देता
और
कितना जगा देता है
रात तक
या
पूरी रात
और
बेचारे निरीह
उस
हिरन की तरह
जिसे
बाण लगा हो
या लगी हो गोली
और
वो
पलट कर
उसी को
चाटता है
अज्ञानता से
बिना जाने
की
ये
उसकी मौत है
बेचारा हिरन
और
बेचारा
अगर
भावुक इंसान हो
तो बोली
गोली से ज्यादा
लगती है न
कितना दर्द देती है
सहा भी नही जाता
रहा भी नही जाता ।
खैर
वेचारा हिरन ।
और बेचारा
??..????

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

कहो राम तब क्यो आये थे


तब राम तुम क्यो आये थे
अब चुप होकर क्यो बैठे हो
बहुत थके हो तुम लंका से
या फिर क्यो रूठे रूठे हो
रूठे हो खुद से या कैकेयी से
या मंथरा से या अपनी माँ से
जो तुम्हरी खातिर लड़ी नही
और राजपाठ को अड़ी नही
यदि खुद से रूठे तो अच्छा है
ये  रूठना  फिर  सच्चा  है
फिर मर्यादित कैसे होते
ये सवाल भी बहुत बड़ा है 
तब तो केवल एक था रावण
अब रावण की फौज खड़ी हैं
तब तो थी  छोटी  सी लंका
अब की लंका बहुत बड़ी है
तब क्या सब बहुत बुरा था
अब क्या रामराज्य आ गया 
सोचो तब क्यो तुम आये थे
और अब क्यो उदासीन हो
आते तो तुम अब भी लेकिन
मंदिर मस्जिद पर आते हो
या  त्यौहार में आ जाते हो
या फिर प्रचार में आ जाते हो

क्या कमाल था वो पत्थर थी 
तुमने उसमे जान डाल दी
बहुत डरा था नाव लिए वो
वो नाव जो वही खड़ी थी 


मंगलवार, 13 नवंबर 2018

क्रांति का ये नया अंदाज होगा

ये देश जागीर है किसकी
जनता की ,सत्ता की
या पूंजीपति नौकरशाहो की
तय होना अभी भी बाकी
बहाता है किसान पसीना
और
मोटा हों जाता है बनिया
उसके श्रम पर
व्यापारी और बिचौलिया
बहाता है मजदूर पसीना
और
तिजोरी भरती इनकी
सीमा पर मरता जवान है
और
सीना नेता का नपता है
नेता नेता सब जपता है
आखिर कौन है मुल्क का मालिक
ये सब
या
फिर सब ,सारी जनता
क्यों नहीं मिलता सबको सबका
वाजिब हक
कब बदलेगी ये सड़ी व्यवस्था
और
सचमुच का लोकतंत्र मिलेगा
संभव बराबर सब होंगे जब
समान शिक्षा सबको मिलेगी
सामान चिकित्सा होगी सबको
और
सामान अवसर भी होगा तब
जरूरत है सम्पूर्ण क्रांति की
गाँधी के रस्ते पर चल कर
रक्तहीन हो पर समीचीन हो
फैसलाकुन क्रांति की
कब आएगी कौन करेगा
मैं निकलूं तुम भी निकलो
सबको ही हम साथ मिला
चलो हाथ से हाथ मिला ले
जो शोषक है मिलकर उनको
इस क्रांति का मर्म बता दे
हर अंतिम का दर्द दिखा दे
शायद वो भी समझ ही जाये
वो भी हमसे हाथ मिलाये
वर्ना हमको तो उठना ही
हर अंतिम को तो जगना ही
मुट्ठी भींच अधिकार मांग लो
हो सबका ही प्यार मांग लो
वर्ना हक तो लेना ही है
जिनके पास है देना ही है
पांच गाँव जब न देता हो
लड़कर अपना हिस्सा लेना
पर उसका उसको दे देना
नयी क्रांति का आगाज होगा
सबका अपना कल भी होगा
सबका अपना आज होगा
क्रांति का ये नया अंदाज होगा

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

कृष्ण का गोवर्धन

कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन
बचाने को उन लोगो को
जिनको खड़ा कर दिया था
सबसे बडी सत्ता के खिलाफ
बस यही तो कहा था कृष्ण ने
कि
उसे क्यो भोग लगाते हो
जो खाता ही नही है
जिसे भूख ही नही है
और
उदर भी नही है
केवल वास लेता है वो
उसे खिलाओ
जिसे भूख है
जिसे जरूरत है
लाओ मुझे खिलाओ
मैं खाऊंगा
कितना कमजोर था देवत्व
की
तुरन्त हिल जाता था उनका आसन
और
कितना क्रोध भरा था इनमें
कैसे और क्यो देवता माने इन्हें
जो सहज इंसान भी नही
बरसा दिया क्रोध
उन सभी पंर
जिन्हें खड़ा किया था कृष्ण ने
सत्य के साथ
पर
कृष्ण भी तो कृष्ण थे
प्रेम किया तो खूब किया
राजनीति किया तो खूब किया
युध्द भी खूब करवाया
खूब मरवाया
और
खूब बचाया
खड़े हो गए यहाँ भी कृष्ण
अपनो के साथ
और
उठा लिया गोवर्धन
अपनी छोटी सी उंगली पर
वो छोटी सी उंगली
और
उतना बड़ा पहाड़
कैसे टिक पाया होगा
और
कैसे उठाया होगा
कितनी दुखी होगी
उनकी उंगली
शायद आज भी दर्द
हो रही वो उंगली
पर
असम्भव को संभव करने का नाम
ही
कृष्ण है शायद
लगता है
की वो पहाड़ नही
बल्कि पुरुसार्थ रहा होगा
संकल्प रहा होगा
इरादा रहा होगा
और
अडिगता रही होगी
और
आंख में आंख डाल कर
खड़े हो गए होंगे कृष्ण
सबसे आगे
उंगली उठाकर चुनौती देते हुए
और
उनके संकल्प के सामने
नही टिक पाया होगा
इतना उथला से इंद्र
और
भाग खड़ा हुआ होगा
खूब तालियां बजी होंगी
नाचे होंगे लोग
कृष्ण को उठा कर कंधे पर
गोपिया रीझ गयी होंगी कितनी
और
देख रही होंगी कनंखियो से
कृष्ण को
कृष्ण ने भी जरूर देखा होगा
अठखेलियाँ
और
मंद मंद मुस्कराए होंगे कृष्ण
पर
कृष तुम कितने लंबे विश्राम पर हो
या
अपने गुण , अपनी जिम्मेदारी
भूल गयो हो
देखो
कितने नकली देव
क्या क्या जुल्म कर रहे है
तुम्हारे लोगों पर
तुम्हारी गोपिकाओं
तुम्हारे बच्चो से
क्या क्या सलूक हो रहा है कृष्ण
तुम इतने बेदर्द तो नही हो सकते
की
लोगो का दर्द ही भूल जाओ
आ जाओ न कृष्ण
भारत ही नही दुनिया को
एक और महाभारत की जरूरत है
और
जरूरत हैं
आज के संदर्भ में
एक नए ज्ञान और उपदेश की
कब आवोगे कृष्ण
और
ये महापर्वत कब उठावोगे
अपने इरादे और न्याय की
उंगली पर ।
आओ न कृष्ण , अब उठ जाओ
आ भी जाओ न कृष्ण ।

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

दो तरह की दीपावली

लोग कल रात दिए
और 

मोमबत्तियां जलाएंगे 

पटाके भी चलाएंगे
और
कुछ बच्चे
परसो सुबह उठ कर
बची मोबत्तियाँ , दिए
और
बिना जले पटाके बीनेगे
जहाँ काम करते होंगे
उनके माँ बाप
उनको वहाँ से मिलेगा
खील बतासा मिठाईयां 

कपड़े 

और
इनाम में कुछ पैसे भी
मालिक के 

दिल के बड़प्पन के अनुसार
और
दीपावली के अगले दिन होगी
एक बड़ी आबादी की दीवाली
कल तो
ये बच्चे
बस टुकुर टुकुर ताकेंगे
किसी 

दूसरी दुनिया के लोगो 

का वैभव
उनके घरो का उजाला
उनकी धमक 

और पटाको कि चमक
उनके घर आते जाते डिब्बे
और सूंघेगे 
उनके घर की 

रसोई से निकलती
पकवानों की खुशबू
जो उसकी दुनिया मे 

नही होती ।
और
बीत जाएगी दीपावली
दो दुनिया एक बार 

फिर स्थापित कर
और
सब का उत्थान
और
संघर्ष भुला देगा
कि
कल क्या हुआ था ।
यही समाज की 

बनावटी सतत यात्रा हैं
जिसमें 

बहा जा रहा है समाज
न जाने कितनी सदियों से
क्या कभी दूरी मिट पाएगी
ये दो दिन की
और
दो तरह की दीपवाली की ?

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

ये समन्दर का किनारा रेत है और कुछ नहीं ।

ये समंदर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं
और
पानी हां पानी भी बहुत है
प्यास है खूब प्यास
पर पी सकते नहीं है ।
किस लिए फिर
इसकी चाहत
क्या मिलेगा
इन लहरों को गिनकर
या
इनसे टकरा कर
क्या मिलता है
इस रेत से दिल लगाकर
क्यों जाते है हम
इतनी दूर दूर
बस ये रेत देखने
लहरे गिनने
या
लहरों में गिर जाने को
मुझको तो
कुछ समझ न आया
सब माया है केवल माया ।
ये किनारा ,ये लहरे औ ये पानी
जो खारा है
आखो के पानी से भी क्या
ये बालू कितनी निर्मम है
मेरे जीवन से भी क्या ।
ये समन्दर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं ।

घृणा

इतनी घृणा
और
इतना जहर
कहाँ रखते है लोग
की
उगलते भी नही
और
निगलते भी नही
और
अपनो को
पराया बना लेते है ।

बेतार संदेश

पिता हो ,माँ हो
बेटा या बेटी
पता नही कैसे
समझ जाते है
एक दूसरे का दर्द
और
अंदर अंदर छटपटाते है
एक दूसरे के लिए
कोई पैथी नही पहचानती
न कोई विज्ञान
इस बेतार संदेश को
गर
दर्द में शामिल रहे हो
कभी या ज्यादातर
और
दर्द भोगे हो साथ साथ
मजबूत चट्टान बनकर
एक दूसरे के लिए
और
जुड़े हो दिल और आत्मा से ।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रातें
कितनी स्याह होतीहै
क्यो होती है
इतनी स्याह रातें
ज्यो ही सूरज
पच्छिमी की खोह में
डुबकी लगाता है
पूरब से फैलने लगती है
स्याह रात
टिमटिमाते हुई
रोशनियां भी
जुगनू से ज्यादा
कुछ नही होती
कितनी भयानकता
समेटे होती है स्याह रात
जिंदगी गर्त हो जाती है
धीरे धीरे इसके आगोश में
और
कितना अकेलापन
तारी हो जाता है
जिसमे जिंदगी
सवाल बन जाती है
इन सवालो का
कोई जवाब नही होता
खुद से ही बाते करना
खुद को तसल्ली देना
खुद के अकेलेपन से लड़ना
और लड़ते लड़ते
नीद के लिए लड़ना
ताकि आंख बंद कर
अनदेखा कर सके
इस स्याह अंधेरे को
और अकेलेपन को
पर
कितना स्याह है सब कुछ
चलो आंखे बंद कर लेते है
और
सोच लेते है
की
अकेले नही है हम
तमाम सूरज उग गए है
हमारी जिंदगी में ।
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

कुछ सवाल है जो अनुत्तरित है

कुछ सवाल है
जो अनुत्तरित है
कुछ जवाब है
जो खुद
सवाल बन गए है
सिलसिला टूटता ही नही
न सवालो का न जवाबो का
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है
पर कही तो कोई दीवार होगी
या
होगा इस सफर का डेड एंड
जो रोक देगा क्रिया को
और प्रतिक्रिया को भी
और
फिर सब होगा शांत शांत ।

सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

घृणा की इंतहा

वर्दी पहन कर
कहाँ से आती है
इतनी घृणा
कि
जिन्हें जानते भी नही
पहचानते भी नही
जिन्होंने
कुछ बिगाड़ा भी नही
उतार देते है गोलियां
उनके सीनो में
उनके सर में
वो औरत हो ,बच्चा हो
बूढ़ा या मासूम बेटी
क्या
हाथ नही कांपते विल्कुल
और
नही दिखता इन चेहरों में
चेहरा अपनी बहन , बेटे ,बेटी
या भाई , बाप या बाबा का
और तब भी जब
कोई छोटी से बेटी भी
तन कर खड़ी हो जाती है
रायफल के सामने निहत्थी
कहाँ से आती है ये नफरत
और
कब खत्म होगी ये नफरत
ये हथियारों और मौत का खेल
इसे बंद करना ही होगा
और
बोना हीं होगा
इंसानों की जिंदगी में
प्रेम का गुलाब ,चंपा और चमेली ।

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

ये अंधेरा कितना अंधेरा

ये अंधेरा कितना अंधेरा
चारो ओर केवल अंधेरा
नही कही से सूरज दिखता
नही रोशनी कैसी भी
आगे जाए , कैसे जाए
कदम बढ़ाए गिर ना जाये
ठिठके ठिठके कब तक रहना
अनिश्चितता कब तक सहना
कोई तो हो जो राह दिखाये
वो स्वर्ग हो या नरक हो
वो भी मेरे साथ मे जाए
पर अब ऐसा कौन मिलेगा
जीवन मे कब कमल खिलेगा
जो था वो तो बिला गया
ना जाने वो कहा गया
अब तो बस जो है हम है
चाहे अंधेरा मिटा सकें
या खुद को ही गंवा सके
इसको तय करेगा कौन
प्रकृति मौन हम भी मौन ।

रविवार, 23 सितंबर 2018

सबको कल इस मिटटी में मिटटी हो जाना है ।

सो जाता हूँ आखिर कल भी तो सो जाना है
इस धरती से दूर कही अम्बर में खो जाना है
धरती पर चलते सोते खाट पे कुछ धरती पर
सबको कल इस मिटटी में मिटटी हो जाना है ।

अक्सर आंखे खुद ही खुद को धो लेती है ।

अक्सर आंखे खुद ही खुद को धो लेती है ।
खुश हो तो हंस लेती है दुखी हो तो रो लेती है ।

बेटे हो या बेटियां मुस्कुरा कर देख ले हम थोड़ा और भी जी जाना चाहते है ।

बेटे हो या बेटियां मुस्कुरा कर देख ले
हम थोड़ा और भी जी जाना चाहते है ।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

भारत की जनता सुन लो जरा भारत की
इस देश का हाल , कहा कैसा बवाल
जरा सुन लो भारत की जनता सुन लो


बहुतो ने मिल कर उन्हें नेता बनाया
ताकत लगाया औ कुर्सी पर बैठाया
वो हैं नेता महाँन देखो उनकी शान 
हम सब नीचे उनकी कुर्सी बनी मचान
जरा सुन लो भारत की जनता सुन लो

देखो पसीना बहाए अपना किसान



रविवार, 16 सितंबर 2018

तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

किसी के लिए मुझ सहित बहुतो के लिए मेरी लिखी ये कविता ---------------
आप कितने भी मजबूत हो
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या
नहीं निकल पाए इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के अवरोध को
बना लो
फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और
अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को
पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

रविवार, 2 सितंबर 2018

बहुत दिनों पर गांव गया था

बहुत दिनों पर गाँव गया था
बहुत दिनों पर गाँव गया था
पर ये मेरा गाँव नहीं था .
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कहा गया वो?
सब कुछ बदला नया नया था
सुनते थे सड़के बननी है ,
पूरे गाँव को वो जोड़ेगी .
वो चकरोड बहुत चौड़ा था ,
पगडण्डी सा अब दिखता है .
वो मेरा चकरोड कहा है ?
वो पोखर ,तालाब ,गड़हिया
जो गाँव के तीन तरफ थे
उनसे पूरा गाँव हरा था ,
पशु नहाते ,सभी तैरते ,
मछली पर सबका ही हक़ था .
अब तों वहा मकान बने है
या फिर है रास्ते लोगो के .
सबके घर को तों रास्ते थे ,
सबके पास मकान थे अपने .
फिर ये सब क्या नया नया है .
वो रास्ते और तालाब कहा  है ?
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
वो पाकड़ का पेड़ जहा खेला करते थे
और खुला खलिहान या दालान किसी का,
सब सबका था .
एक बार पड़ा था सूखा ,
कई घरो में अन्न नही था
पर जिनके घर हुआ था
आलू वो भून पंहुचा देता था
जिसका भी गन्ना पेरा जाता
भरी बाल्टी गन्ने का रस
उस घर वो भिजवा देता था .
कोई नहीं मरा था भूखा
नहीं रुका था काम किसी का .
बसवारी के बांस सभी के ,
छानी मड़ैया ,सरपत सबका . .
सब थे छवाते साथ उठाते
और मड़ैया उठ जाती थी.
वो मिले जुले स्वर और हाथ कहा है,
मिलके उठाना की आवाजे
कहा गयी वो .
पहले जब थे शहर से आते
पूरा गाँव अपना लगता था
बहुत लोग मिलने आते थे ,
हाल पूछते ,साथ बैठते ,
घर आने को कह जाते थे .
जिसका भी जो रिश्ता था कह जाता था
भाभी ,चाची,आजी बुला रही है ,
बहुत दिनों से नही है देखा,.
आजी कहती दुबले क्यों हो ,
दूध नही मिलता है ,पीलो!
गाँव के चारो ओर बगीचे लदे आम से ,
मेरे घर आम नहीं था
तब काका ने भिजवाया था .
कहा गए वे  लोग जो ऐसा करते थे,
वे सारे बाग़ कहा है ?
सबके घर एक चारपाई ,
बिस्तर अलग रखा था ,
गाँव कि बारातो और मेहमानों को .
जिसके घर भी दूध दही या सब्जी होती ,
आ जाती थी सब मेहमान सभी के थे तब
+ + + + + + ++++++++++++++++. .
और
अब खुली गई दूकाने सब चीजो की,
कोई किसी को कुछ ना देता ,
सब बाजार से आ जाता है .
वो अपनापन और वे रिश्ते,
मेहमानों के लिए रखे सामान
कहा गए वो ?
सबने रास्ता बंद कर दिया,
खोदे गड्ढे कि भाई को राह मिले ना  . .
सबकी  नाली  बंद कर दिया
या मुह उल्टा मोड़ दिया है
सबके दरवाजे पर कीचड़ ,
राह में कीचड़ ,मन में कीचड़
सबका घर जाना मुश्किल है .
पर संतोष सभी को ये है ,
अपना पडोसी परेशान है ,
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
वो था गाँव जहा बाराते
शादी वाले घर तक जाती थी ..
जिस गाँव में सबकी बिटिया सबकी थी ,
कहा गया वो ?
कल सुना की फला की बबुनी भाग गयी,
गाँव के लिए बात नयी थी   .
वो शहर में ,
पढ़ी थी कम और बढ़ी थी ज्यादा ,
खूब सिनेमा देख रही थी .
हिरोइन बनने चली गयी
या फिर रिश्तो में ही छली गई वो .
कुछ आदर्श गाँव के ,
बिना बड़ो के पांव नहीं बाहर जाते थे ,
कहा गए वो ?
पहले भी बजार लगता था
और लगती  थी कुछ दूकाने ,
बढ़ते बढ़ते गाँव मुहाने आ पहुची  है .
पूरा गाँव बाजार बन गया ,
कही खो गया,ढूढ़ रहा हूँ
कहा गया वो ?
सबकी शान इसी में
मुक़दमे किसके कितने  कैसे  जीते ,
सब कुछ हो बर्बाद हमारा पर
पडोसी कि बर्बादी मजा आ गया . .
पहले तों गाँव के बूढ़े ही सब कुछ थे,
उनका ही फरमान बड़ा था
पहले शाम बैठके पर बैठक होती थी.
कुछ बुजुर्ग मानस गाते थे .
बड़े चाव से रामचरित वे समझाते थे .
वे बैठके चाय कि दूकान खा गई .
अब गाँव मुहाने देशी की दुकान खुल गई
और पूरा गाँव तरन्नुम में है .
अब बहस है लाल पारी की,
किसमे मजा है ज्यादा देशी में या अंग्रेजी में .
वो किस्से ,वो मानस ,वो चौपाई
और बुजुर्गो कि वे बहसे
कहा गए वे ?
वही गाँव है पर भूतो का लगता डेरा
गाँव तों है पर इंसानों का नहीं बसेरा .
चौबे जी का घर कितनी रौनक रहती थी,
घास उग गई .दीवार गिर गई
छत पर है जाले ही जाले
और भी घर है ,मेरा भी है
जिनमे लटके है बस ताले.
शहर में दो कमरे सपना है
यहाँ बीस कमरों का घर अपना है
लेकिन कुछ है जो बिला गया है
ढूढ़ रहा हूँ जिसकी खतिर
बार बार हम गाँव आते थे,
कहा गया वो ?
+++++++++++++++++++++++
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ मेरे गाँव को ,
खलिहानों को ,मछली वाले तालाबो को .
बूढ़े बरगद और मौलश्री कि छाव को ,
बर्फ से ठंढे मीठे पानी वाले उस कुए को
भुट्टे तोड़ते थे खेतो में फूट ,ककड़ी खा जाते थे .
वो जामुन वाला पेड़ ,बगीचा आम कि डाली ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ '
जांघिया नाच दिखाने वाली उस टोली को ,
रामायण हो या शादी हो ,
गैस जलाते ,तम्बू लगाते ,
बाजा बजाते इस्माइल को ढूढ़ रहा हूँ .
लाज हया और हसी ठिठोली में मर्यादा ,
शादी में गाली भी तों गायी  जाती थी '
थोडा कहा समझाना ज्यादा वाली भाषा ,
पंचायत पर दंड बैठको वाला अखाडा ,
लाखी पाती वाले खेले ,
कभी कही ,कभी कही के मेले ,
सुथनी और जलेबी गुड की ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कोई मुझे मेरा गाँव बता दो ,
कहा रुक गए पाव बता दो .
बहुत दिनों पर गाँव गया था
ढूढ़ ना पाया मेरे गाँव को ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
कहा गया वो |