पहचान उन सभी का मंच है जो जिंदगी को जीते नहीं जीने का निर्वाह करते है .वे उन लोगो में नहीं है जिन्हें जीवन मिला है या जीने का मकसद उनके साथ रहता है .बस जीने और घिसटने के बीच दिल वालो की कलम से और दिल से जो निकल जाता है वही कविता है .पहली कविता भी तों आंसू से निकली थी .आंसू अपने दर्द के हो या समाज के ,वे निकलेंगे तों कविता भी निकलेगी और वही दिलवालो की ;पहचान ;है
रविवार, 18 अगस्त 2019
ट्रंक काल
त्यौहार और व्यवहार
त्यौहार अब भी होते है
और पहले भी होते थे
अब गरीब है
तो
बस लोगो को को मनाते देख लेता है
या थोडा बहुत मना भी लेता है
मध्यम वर्ग है तो दिखावे के लिए
बजट बिगाड कर भी मनाता है
उच्च वर्ग है तो कहने ही क्या
किसी पद पर है
तो वो नही मनाता
लोग मनाते है उसका त्यौहार
और
लोगो के सामनो से
भर जाता है घर बार
जिनसे काम है
उनके अलावा
कोई किसी से नहीं मिलता
अब किसी भी त्यौहार में
थोक के मेसेज है न
मन गया त्यौहार
और
मान लिया गया उसे ही मिलना
लोगो का और शुभकामनाओ का
त्यौहार पहले भी होते थे
जो पैसे से नहीं
भावनाओ से मनाये जाते थे
गरीब हो या अमीर
सब खुद इन्तजाम करते थे
त्यौहार मनाने का
इतना फर्क था
की
अमीर के काम नौकर कर देते थे
पर बी अकी सब एक समान थे
होली हो तो रंग सबके पास था
और पिचकारी भी
चाहे पीतल की ,लोहे की
नहीं तो बांस को काट कर बनायीं
गरीब की खुद की
फूहड़ता नहीं
बल्कि सबको सबसे मिलने वाले
आनंद का त्यौहार था होली
गाँव में टी झुण्ड बना कर निकलते थे सब
उम्र के हिसाब से
अपनी अपनी भाभियों से होली खेलने
गुझिया बनाने में पूरा परिवार जुटता था
बच्चे भरते और मोड़ते या काटते थे
माँ बेलती थी तो पिता
बैठ कर सेंकते थे गुझिया
बेईमानी की भी गुंजाइश थी
किसी किसी गुझिया में
ज्यादा मावा भर कर खुद खा लेने की
और
सेव झाड़ना सेंकना
कई दिनों तक चलता था त्यौहार
दीपावली में पतली डंडिया
जो आप्तौर पर नरगट
या अरहर की होती थी
तीन तीन को इस तरह बांधना
की उस पर दिया रख सके
और दरवाजे के सामने उन्हें सजाना
शहर में पहले तो छोटे छोटे दिए
और बाद में मोम्बत्तिया आया गयी
तब भी कई दिन पहले से
मिठाई जैसी चीजे
अपने ज्ञान और हैसियत के हिसाब से
कई दिनों तक तैयारी होती थी
पर
जो तब था और आज नहीं है
वो था समूह में मनाना या समाज में
तब फोन और मोबाइल नहीं थे
तो लोग मोबाइल रहते थे
खूब मिलते थे एक दूसरे से
त्यौहार में एक परिवार आकर मिला गया
तो इसका मतलब ये नहीं
की मिलन पूरा हो गया
अगले दिन ये पूरा परिवार
उनके घर जाता था
और चलता था कई दिनों तक ये क्रम
और फिर पूरा होता था त्यौहार
जी हां त्यौहार एक परिवार नहीं
पूरा समाज मनाता था
एक दूसरे के साथ
जो कही खो गया
लील लिया नये ज़माने ने
और आर्थिक दिखावा
हीन भावना पैदा कर देता है आज
बहुतो में
देखा होगा आपने भी
जब आप बहां रहे होते है
सफ़ेद या काला धन
तो बहुत सी उदास आँखे
उसे बस टुकुर टुकुर
देख रही होती है
जो पहले के सादे त्योहारों में
नहीं होता था
और
तब केवल त्यौहार नहीं
सच्चा व्यवहार भी होता था
मेरा पहला फोन
---------------------------------------
एक दिन फोन मंत्री मिल गए
और
पूछ लिया घर में फोन है
लागा जैसे कुछ अपराध
या हीनता है
घर में फोन नहीं होना
बहुत मुश्किल से मुह से निकला था
नहीं
हम कैसे रख सकते है फोन
हम तो साधारण आदमी है
कहा से देंगे उसका पैसा
उन्होंने जारी कर दिया एक आदेश
एक कमिटी का सदस्य बनाने का
और
जब आयी थी उसकी चिट्ठी
क्या ख़ुशी थी
जैसे
कितना बड़ा कुछ मिल गया
पिता जी ने
कई लोगो को जाकर बताया था
उसके बारे
कुछ दिन में लगा गया
वो लाल रंग का फोन
ये भी उन दिनों खबर थी
अख़बार के लिए
जानने वालो और
आसपास के मुहल्ले के लिए
मिलने लगी बधाइयाँ
और मांगे जाने लगे नंबर
अपने फोन तो शायद ही कभी आते हो
क्योकि अपनों के पास नहीं थे फोन
पर जब पहली बार घंटी बजी
तो सभी अजीब कशमकश में थे
की क्या करे
पिता जी ने
आगे बढ़कर उठाया था चोगा
बस इतना ही पुछा था
कौन साहब है आप
किसी अपने का फोन था
पूरा परिवार देख रहा था गर्व से
किसी आश्चर्यजनक चीज की तरह
मैंने जब पहली बार उठाया था
तो उठाने से पहले रटता रहा
की हेल्लो कहना है
पर दूसरो के तमाम फोन आने लगे
और बढ़ गयी थी रौनक घर में
कुछ दिन तो
गर्व की अनुभुती होती रही
पर फिर मुसीबत बन गया फोन
जब किसी ने चुपके से
कही बाहर का फोन मिला दिया
और आ गया बड़ा सा बिल
उस ज़माने के हिसाब से
तब ध्यान रखना पड़ता था
की सभी काल को लाक करके रखना है
पर
लोगो के फोन का कोई समय ही नहीं था
अपनी जिंदगी ही अपनी नहीं रह गयी
सुबह से रात तक कोई न कोई
आकार इन्तजार करता था
अपने फोन का
खाना पीना भी मुश्ल्किल
और
अपनी बात करना भी मुश्किल
जी हा
फोन
मुसीबत का सबब भी था तब फोन
पर स्टेटस का सिम्बल था
तो सब कुछ बर्दाश्त करते थे लोग
चिट्ठियां
पहले चिट्ठियां होती थी
सूचना
और
सुख दुःख जानने का साधन
चिट्ठियां भी कई तरह की होती थी
इतना खुला था हमारा जीवन
और हमारा समाज
कि
खुले पोस्ट कार्ड पर
सब कुछ लिख कर भेज देते थे लोग
किसी से कोई धोखा नहीं होता था
क्योकि ये सस्ता होता था
पैसा नहीं होता था लोगो के पास
बस भावनाए और जुडाव होता था
एक चिट्ठी ऐसी भी होती थी
जिस पर टिकेट नहीं लगा होता
या दूर पढ़ रहे छात्र
या फिर वो जो चाहते थे
कि
चिट्ठी हर हालत में मिल जाये उसे
जिसके लिए भेजा है
क्योकि डाक टिकेट का पैसा
उसी से लेना होता था
इसलिए डाकिये की मजबूरी थी
पाने वाले के हाथ में चिट्ठी देना
अंतर्देशीय भी था जो बंद रहता था
पर थोडा महंगा
इसलिए या तो
उसका खर्च वहनं कर कर सकने वाले
लिखते थे इसमें
या फिर कोई गोपनीय बात होने पर
लिखा जाता था ये पत्र
गाँव में तो डाकघर और डाकिया
दोनों वही के होते थे
पर कोई नही झांकता था
किसी के पत्र में
किसी का पत्र तभी पढता था
जब वो खुद पढने को कहता था
रजिस्टर्ड डाक तो
खैर विरले ही भेजते थे
खास कारणों से
चिट्ठिया भी तरह तरह की होती थी
किसी के कोने पर थोड़ी सी हल्दी का रंग
तो किसी पर लाल रंग
हल्दी किसी शुभ सूचना के लिए
तो लाल रंग
आशिक के दुःख की निशानी था
और ये बताने की कोशिश
की ये खून से लिखा है
गाँव की चिट्ठियों में
सबके हालचाल पूरे गाँव सहित के साथ
गाय बैल उसकी बीमारी
जो बीमार था ठीक हुआ या नहीं
फला गाय या भैस दूध दे रही या नहीं
और कितना दूध दे रही है
कौन कौन पीता है दूध
बाबा भी पीते है या नहीं
और जिसको बच्चा होना है
उसे मिलता है या नहीं
बगीचे का क्या हाल है
कौन कौन सा फल कितना लगा है
किस किस खेत की जुताई हो गयी
किस खेत में पानी लग गया
धन रोपा गया या नहीं
और
कौन सी फसल कितनी होगी
इत्यादि जरूर होता था
कोई बीमार था गाँव में तो क्या हुआ
किसका इलाज हो रहा है
और मर गया तो कैसे
और
सब सुख दुःख बताने के बाद
और
ये बताने के बाद की फला फला मर गए
सुखा पड़ गया या बाढ़ में सब बह गया
भैस या गाय मर गयी
वो बच्चा पैदा होते ही मर गया
अंत में ये जरूर लिखा होता था
अपना ध्यान रखना
यहाँ बाकि सब कुछ ठीक ठाक है
पति पत्नी की चिट्ठिया गोपनीय होती थी
इसलिए उनका ब्यौरा भी लिखना ठीक नहीं
सारे आशिक अंत में जरूर लिखते थे
लिखा है ख़त खून से स्याही न समझाना
शहर की चिट्ठिया इतनी मजेदार नहीं होती थी
इसलिए उन पर भी क्या लिखना
हां तार भी होता था
जो बहुत ही भयानक होता था
तार आने का मतलब ही होता था
की कोई जरूर मर गया
तार खोलते वक्त पढने से पहले ही
रोना धोना शुरू हो जाता था घर में
चाहे किसी ख़ुशी को जल्दी से बताने को
भेज दिया हो किसी अपने ने
तार आने की खबर पूरे गाँव में
और
उस समय के शहरी मुहल्लों में भी
बहुत जल्दी फ़ैल जाती थी
और
लोग मुह लटकाए आने लगते थे
दुःख बांटने
चिट्ठिया सहेज कर राखी जाती थी
किसी कोने में या किसी संदूक में
एक और रिवाज था
चिट्ठी आने पर
पूरे परिवार को इकट्ठा कर पढने का
पढना भी तो
गाँव में कोई कोई ही जानता था
वही सबकी चिट्ठी बांचता था
अगर दूर रह रहे पति की चिट्ठी
पत्नी के लिए होती थी
तो
कुछ पढ़ कर कुछ छोड़ देता था
और कह देता था
की बाकी बात
वो अपनी मेहरारू को बता देगा
और वो आकर बता देगी
तब कुछ ऐसी ही मर्यादाये होती थी
कोई दुःख का समाचार
चिट्ठी बांचने वाले की अचानक
हिलते हुए ओठो और आँखों से
ही पता लग जाता था
क्योकि कुछ पल वो चुप हो जाता था
दुःख दूसरे का था पर सब रोते थे
जसे
पहले लड़की किसी की भी विदा होती थी
पर रोता पूरा गाँव था
फिर रोना पूरा कर वो बांचता था चिट्ठी
कुछ चिट्ठिया
छुपा कर भी रख देने का रिवाज था
कुछ घर में षड़यंत्र के कारण
और
कुछ हंसी ठिठोली के लिए
इतिहास में तो चिट्ठियों ने
बड़ी बड़ी क्रांतियाँ करवाई है
तो ज्ञान का प्रसार की किया है
बहुत से जाने मने लोगो की चिट्ठिया
तो आज तक रौशनी का काम करती है
अगर प्रकाशित हो गयी है
या पाण्डुलिपि के तौर पर मौजूद है
क्या होता था जब कोई अपना
कही चला जाता था
तो रोज डाकिये का इन्तजार करना
और
अकसर डाकघर तक चले जाना
पूछने के लिए
की
हमारी कोई डाक है क्या
मिल गयी तो नेमत पाने की ख़ुशी
और नहीं तो उदास होकर लौटना
कितना रोमांच था जिंदगी में
बहुत सी चिट्ठिया
असली भावना का प्रवाह होती थी
मन भी भीग जाता था और भावनाए भी
मेरे पास भी है
सहेज कर रखी हुयी कुछ चिट्ठिया
एक अपने पिता की आखिरी चिट्ठी
और कुछ अपने हमसफ़र की
जिन्हें मैं अक्सर पढता हूँ
अक्श उभर आते है हमेशा उनके
जब भी वो चिट्ठियां पढता हूँ
तो काफी दिन का दर्द
आँखों के रास्ते बह जाता है
जी हाँ चिट्ठिया क्या होती थी
आज के लोग क्या जाने
और क्या जाने
उनके आने के इन्तजार का मज़ा
और
उनको बार बार पढने
तथा सहेजने का मज़ा
हो सके तो चिट्ठिया लिखिए
और
नयी पीढ़ी को लिखना सीखाइए
मोबाइल और फोन अपनी जगह है
और चिट्ठिया अपनी जगह
वाह रे चिट्ठियां
रविवार, 11 अगस्त 2019
हां जीवन इसको कहते है |
जिंदगी
कब होगी पहचान हमारी
इतने सालो से है दूरी
क्या मजबूरी
जिन्दा तो है
पर क्या सचमुच
क्या जीवन इसको कहते है
पांव में छाले भाव में थिरकन
गले में हिचकी आँख में आंसू
नीद नहीं और पेट में हलचल
ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ
बस अन्धकार है
क्या जीवन इसको कहते है
जीवन कब हमको मिलना है
या फिर ऐसे ही विदा करोगे
कुछ तो सोचो
हम दोनों क्या जुदा जुदा है
कुछ तो बोलो
और भविष्य के ही पट खोलो
या फिर कह दो
हां जीवन इसको ही कहते है |
जींना है तो हंस कर जी लो
या फिर दर्द गरल को पी लो
तेरे हिस्से में बस ये है
मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ
तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ
चल अब सो जा
अच्छे सपनो में आज तो खो जा
कल फिर मुझसे ही लड़ना है
हां जीवन इसको कहते है |
गुरुवार, 18 जुलाई 2019
सपने देखता है
कितना बुद्धू था वो कि सपना देखता था
और सपने मे सबको अपना देखता था
उसे पता नही था कि सपने तो सपने होते है
वो तो सोने मे कल्पनाओ की उड़ान होते है
जागने पर वो कब अपने होते है
ये सपने क्या से क्या बनाते है और कहा ले जाते है
पर जब टूटते है तो किस कदर रुलाते है
इसलिये छोडो सोते हुये सपने मत देखो
हा देखो खुली आंखो से देखो खूब देखो
हकीकत के आसपास देखो
और हकीकत कभी धोखा नही देती
न सपनो का न अपनो का
अपनो की छोडो उस सपनो के पीछे लग जाओ
जो तुम्हे बुलंदी पर ले जाते हो
और तमाम तुमसे नफरत करने वालो को भी तुम्हारा अपना बनाते हो
आप सपना सपना खेले
बनाये सपनो के लिए बुनियाद
और अपनी इमारत बुलंद करने को चाहे जो झेले
पर बुलंदी पर पहुच कर मेहनत और लगन के सफलता का झन्डा फहराए
और ऐसे जंम जाये की फिर नीचे उतर कर न आये ।
बुधवार, 17 जुलाई 2019
अपनो को बहलाता है ।
जो दिन भर हंसी
चेहरे पर चिपकाता है
अकेले मे रात को रोता
फिर
सुबह से मुस्कराता है
वो भी एक इन्सा है
जो खुद को
और
अपनो को बहलाता है ।
क्या कोई जानता है
कि
वो क्या कहलाता है ।
रविवार, 7 जुलाई 2019
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की
निकल पड़ें जब भी आज़ाद झोंके की तरह
हाँ शोर मचाएंगे और मशहूर हो जायेंगे हम
ये दस्तक है हमारी सुन लो गर बहरे भी हो
वर्ना बेचैन करने वाला शोर बन जायेंगे हम ।
हमें मुर्दा समझते हो निकलेंगे मुट्ठिया बांधे हुए
तुम देखते रह जावोगे और झंडा फहराएंगे हम
हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा
हाँ देखोगे उदासी से जब शोला बन जायेंगे हम ।
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो खेत की
अभी आगाज़ है फुटपाथो पर अब नजर कर लो
जमीन पर जब गिरोगे तुम खुश हो मुस्करायेंगे हम ।
मंगलवार, 25 जून 2019
राम तुम मत आना
राम तुम मत आना
उन्होने कहा
जय श्रीराम बोल
वो बोला
जय श्रीराम
उन्होने कहा
हनुमान की जय बोल
वो बोला
हनुमान की जय
वो जो कहते रहे
वो बोलता रहा
वो बोलता रहा
जय श्रीराम
और
हनुमान की जय
और
राम के भक्त
उसे
लगातार पीटते रहे
जब तक
वो बोलता रहा
कितना दर्द हुआ होगा न
जब
इतने लोगो ने
इतने घंटो तक
मारा होगा उसे
क्या दर्द का
बिल्कुल भी एहसास
नही हुआ होगा
उन लोगो को
जो खुद को
हिन्दू कहते है
क्या सचमुच
ये लोग हिन्दू है
हिन्दू तो चींटी को
बचा कर चलता है
की
कही मर न जाये
ये कौन से हिन्दू है
अब वो अब
सांस ही नही ले रहा था
तो
उन्होने भी
बोलना बन्द कर दिया
जय श्रीराम
और
हनुमान की जय
वो तो
बोलने लायक ही नही बचा था
भाग खड़े हुये
राम का नाम लेकर
वध करने वाले
हा वध शब्द का ही
प्रयोग किया था
गांधी को मारने वालो ने
और
गोली खाकर
गांधी ने भी तो कहा था
हे राम हे राम
नही
ये अब हे राम नही
बल्कि
जय श्रीराम बोलते है
ताकी कही गांधी के
अनुयायी न कहलाये
पर
वो तो
भाग ही नही पाया
बिन बुलायी मौत से
जो
उस राम के नाम से आई
जिसने
अधर्म को खत्म किया
धर्म के लिए
पर धर्म के नाम पर भी
कभी अधर्म होगा
कहा सोचा होगा
राम ने
जीते राज
उन्होने युद्द मे
पर
दे दिये
वही के लोगो को
राज पाने के लिए
उनके नाम का उपयोग होगा
कहा सोचा होगा
राम ने
अब उसकी विधवा
जो अभी
जल्दी ही
ब्याही गयी थी
अहिल्या की तरह
पत्थर बन गयी है
की
कौन होगा
अब सहारा
किसके साथ बीतेगा जीवन
कितना चीखी होगी वो
उसकी बेजान लाश देखकर
कई बार तो
बेहोश हो गयी होगी
फिर पानी डाल कर
उठाया गया होगा उसे
वो फिर पछाड़ मार मार
गिर जाती होगी
क्या
उसे मारने वालो ने
ऐसे दृश्य नही देखा होगा
अपने घरो पर
और
नही देखा होगा
विधवा हुयी किसी
बहन और बेटी को
अचानक
और बूढे हो गये मा बाप को
बेसहारा हो गये
अबोध बच्चो को
क्या नही आते वो दृश्य
कभी
इन लोगो की आंखो मे
राम को भी तो
बाँट दिया इन लोगो ने
जो
उसके खाने मे
आते ही नही
कि
उम्मीद करे की
इस युग मे भी
आयेंगे राम
और
उद्धार कर देंगे
उसकी बुत बन गयी
विधवा का ।
वैसे भी राम
अब आते ही कहा है
चाहे
कितना भी अधर्म हो
पर
अब तो राम
खुद ही खतरे मे है
क्या पता
कि
वो पढाये पाठ
सही और गलत का
धर्म और अधर्म का
और
उनका नाम लेने वाले
उन्हे ही राम विरोधी
और
राष्ट्र विरोधी बता दे
और
जय श्रीराम का नारा लगाती हुयी भीड
राम का ही बध कर दे
इसलिये राम
तुम बिल्कुल मत आना
अपने भक्तो वाले
इस देश मे
और इस युग मे ।
मंगलवार, 18 जून 2019
सो जाने दो इस व्यवस्था की तरह ।
खिड़कियाँ
कमरे की
और
मन की भी
चिंतन की
और
आँखों की भी
बुझा देता हूँ रौशनी
ताकि
छा जाये अँधेरा
अंदर भी और बाहर भी
क्योकि
अँधेरा हमें सुकून देता है
और
हर चीज से
आँख बंद कर लेने का बहाना
सो जाता हूँ मैं भी
सोने दो लोगो को भूखे पेट
या फुटपाथ के थपेड़ों
और
बारिश में
लगने दो आग
किसी की आबरू में
लूटने दो इज्जत
या असबाब
मुझे क्या
मैंने तो गर्त कर लिया है
खुद को अँधेरे में
और
बंद कर ली है खिड़कियाँ
ताकि
कोई चीख सुनाई न पड़े
और
न दिखाई दे
बाहर के अँधेरे
मेरे अंदर के अँधेरे
अब
मेरे साथी बन गए है न
चलो मुझे गहरी नीद
सो जाने दो
इस व्यवस्था की तरह ।
रविवार, 16 जून 2019
बेटियाँ
पापा की
कितनी चिंता करती है
बेटियाँ
की
क्या कहा रखा है ,
क्या क्या
कैसे कैसे
कर लीजियेगा ,
क्या खा लीजियेगा
इत्यादि इत्यादि ।
मन और आंखे
भिगो देती है बेटियाँ
और
खुद पर
पता नही कैसे
काबू रख पाती है
बेटियाँ
या फिर
आंखे छुपा लेती है
बेटियाँ ।
शुक्रवार, 31 मई 2019
बहुत उदास है दिन
बहुत उदास है दिन
राते तो उदास ही है
काफी दिनों से
पर आगोश में नीद के
उदासी खो जाती है कही
पर दिन की उदासियाँ
और एकाकीपन
इनसे जूझना नहीं आता
अपने से भाग जाने की
कला नहीं सीख पाया मैं
अभिमन्यु की तरह
एक कला से महरूम
रह गया मैं भी
वो चक्रव्यूह तोड़ने को
था आतुर
और मैं तलाश रहा हूँ
कोई चक्रव्यूह
जिसमें एकाकीपन और
उदासी का एहसास न हो ।
सोमवार, 29 अप्रैल 2019
दर्द है कि जाता ही नही
दर्द है
कि जाता ही नही
न मन का न तन का
न अपनी जलन का
न अपनी लगन का
न अपने कहन का
न उनके सुनन का
न उनके कहन का
न अपने सुनन का
न दिल की व्यथा का
न अपनी कथा का
न यादो का अपने
न वादो का अपने
इरादो का अपने
दवा भी नही है
दुवा भी नही है
ये किससे बताये
किसे हम सुनाये
आँसू छुपाये
या हिचकी दबाए
कटी जीभ अपनी
निकलता जो खू है
ये कैसे छुपाये
न आहो मे कोई
न चाहो मे कोई
निगाहो मे कोई
न राहो मे कोई
ये गम हम दबाए
कहा तक अब जाये
ये दर्द जो खू मे
कतरे कतरे लहू मे
चमड़ी के अंदर
औ चमड़ी के बाहर
ये जाता नही है ।
रविवार, 7 अप्रैल 2019
अभिशप्त सब कुछ
अभिशप्त आत्माएं
अभिशप्त वजूद
अभिशप्त वादे
अभिशप्त इरादे
अभिशप्त इच्छाये
अभिशप्त भविष्य
अभिशप्त रिश्ते
अभिशप्त भावनाए
सपोले ही चहुँ ओर
आस्तीन कैसे बचाए
अभिशप्त सब कुछ
ये सब
जाकर किसे दिखाये ।
वाह क्या खूब जिन्दगी है ।
जिन्दगी
खूबसूरत और खुशबूदार
फूलो की
रंग बिरंगी क्यारी है ।
कुछ पौधो मे काँटे है
तो क्या हुआ ?
रंग अपने जीवन मे भरो
और
खुशबू अपने दिलो-दिमाग मे ।
वाह क्या खूब जिन्दगी है ।
सब बादल छँट गये
सब बादल छँट गये
सूरज निकल आया
उनकी कैद से
अब सब कुछ
साफ साफ दिख रहा है
गद्ढे भी ,पत्थर भी
रस्ते भी और मंजिल भी ।
शनिवार, 6 अप्रैल 2019
ऐसा क्यो होता है अक्सर
ऐसा क्यो होता है अक्सर
कुछ लोगो के साथ
कि
जिस जमीन पर आप
बुनियाद बनाना चाहते है
वही दलदल निकल आती है
और
धंस जाता है खुद का वजूद
जिस पेड़ को मजबूत समझ
छप्पर का आधार बनाना चाहते है
वही इतना कमजोर निकल जाता है
कि
तनिक सा बोझ पडते ही
लचक जाता है
और
सब कुछ जमीदोज हो जाता है
पहाडी पर चढ़ते वक्त
पहला ही पत्थर
कमजोर निकल जाता है
और
पहले ही कदम पर घायल कर
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर
हिम्मत तब भी नही हारते लोग
और
जारी रखते है खोज
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की
पूरी तरह लम्बे समय तक
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की
और
पहाडी पर घायल होकर भी
अन्तिम चोटी तक पहुचने के
सही मार्ग की ।
शुक्रवार, 22 मार्च 2019
आज होली है
आज होली है ,
रंग लगाना है ,
लगा लो,
अच्छे अच्छे रंग डालो,
ये लाल रंग है ,
लहू का भी लाल होता है,
फैसला तुम्हारा,
किसी के लिए रक्तदान करो
या
बेगुनाहों का रक्त बहालो,
या रुके हर तरह का रक्तपात
ऐसी कोई व्यवस्था बनालो
और आप हरा रंग लाये हो ,
लगता है कीचड में नहाये हो,
आओ पूरी धरती को
फिर हरा भरा बनाये,
हों भरपूर फसलें,
फलों के बगीचे ,
फूलो की क्यारी
नहीं तों गमले ही लगाये,
और नीला ,
नीला आसमान
नीला समुद्र
साफ हो नदियाँ,
साँस लेने लायक हवा ,
पीने लायक हो पानी
नहीं तों ,
खुद ही मिट जाओगे
तों होली कैसे मानोगे
पीला है तुम्हारा रंग
होली का अपनाओ नया ढंग,
गरीबी और बेबसी के कारण
जो बेटी आत्महत्या करने या,
बिकने को तत्पर है ,
उसे बचाने का
तुम्हे एक अवसर है,
उसके हाथ पीले कर,
कफ़न से बचा लो
पीली चुनरी ओढा दो ,
जीवन में खुशहाली
और उसके घर में
पीली होली सजादो |
तुम काला रंग ही लाये हो
या
तुम्हारा मन भी है काला ,
अपना इरादा बतादो ,
अपना असली चेहरा तो दिखादो ,
हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं
समाज के दुश्मनों पर डालो,
उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो
काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,
ये
राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ
सुभाष का हिंदुस्तान
काला रंग और काला इरादा
लेकर आओगे
तों पछताओगे,
रंग के साथ हम
खून की होली भी
खेलना जानते है,
भूले तों नही ७१ और कारगिल ,
अब आओगे तों मिट जाओगे, .
बाहर आसान पर अन्दर छिपे
काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,
वे हमारे बीच छिपे
ना पहचाने जाने वाले
गुलाल और अबीर है,
आओ
मिल कर सफाई का पानी डाले ,
उन्हें ढूढ़ कर निकाले,
सियार का रंग उतर जायेगा ,
समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा
फिर सभी रंगों को मिला कर
इन्द्रधनुषी रंग बनाये,
उसी की होली खेलें,
पूरे भारत को वही रंग लगायें,
अपना देश महान होगा
जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,
विश्व को रास्ता दिखायेगा
फिर विश्व गुरु कहलायेगा,
आओ इन इरादों की
चन्दन और रोली लगाओ,
हाथ का खंजर फेंक दो
और गले से लग जाओ |
होली हो रही
यहाँ वहा आज देखो होली हो रही
वहा पे हंसी यहाँ ठिठोली हो रही
तय था होली एक दिन मनाई जाएगी
होली में बुराई सब जलाई जाएँगी
खुशियों से खेलेंगे हम रंग औ गुलाल
गले मिल कर दोस्ती बढाई जाएगी
एक दिन नही अब तों रोज होली है
जी हा आज कि ये नई सोच होली है
होली गुजरात कि कश्मीर कि होली
सड़क हो या रेल बस होली होली है
होली में जलाये भी तों कौन लकड़ियाँ
मिल रही है मुफ्त में तमाम लड़कियां
रेल, बस, घर जलाने का अधिकार है
रोके कौन सबने बंद की है खिड़कियाँ
होली का हुड़दंग हो या लोगो की चीख
यहाँ वहा जो भी मिले पहले उसे खींच
आग में जलादे चाहे खंजर पर उछाल
पानी से नही अब जमी लहू से ही सींच
देखो कही बम तों कही गोली चल रही
चारो ओर खून की बस होली चल रही
हम नहला रहे है अपनी माँ को लहू से
नफ़रत की ही बस यहाँ बोली चल रही
ऐसी होली भारत में और कब तक चलेगी
नफरत की कहानी भला कब तक पलेगी
जले राम का हवेली या रहीम का मकान
इंसानियत की होली ऐसी कब तक जलेगी
आओ ऐसी होली पर विराम लगाये
भाई चारे की कहानी फिर से सुनाये
आओ इंसानी जज्बे को हम जगाये
नफरतो को होली में इस बार जलाये
बुधवार, 20 मार्च 2019
वो जब वो नही रहे
उन्होने पढाया था
हज़ारो को
इसलिये बस गये थे
उसी शहर मे
और
उनकी कविताओ पर
कितनी तालिया बजती थी
और
उनके भाषण
लगता था क्रांती कर देंगे
और
वो कितना अच्छा अभिनय
करता था / करती थी
किसी ने नही देखा
उसके दरवाजे की तरफ कभी
जब वो वो नही रहे
जब बदबू परेशान करने लगी
तब पडोसी परेशान हुये
और
शिकायत किया पुलिस को
तब दरवाजा तोड
निकाला गया कई दिन की
सडी लाश को
उस दिन लोगो ने भी कहा
और अखबार ने भी लिखा
कि
ये वो थे / थी
ऐसे थे और वैसे थे
और
लग गयी गिद्ध निगाहे
उनके घर पर ।
कितनी कहानियां
पसरी पडी है चारो ओर ।
पेड़ से टूटता है पत्ता
पेड़ से टूटता है पत्ता
उड़ता है इधर से उधर
गिरता है जमीन पर
हरा होता है
तो
कोई जानवर खा जाता है
सूख जाता है
तो
रौद दिया जाता है पैरो से
और
मिट्टी मे मिल जाता है
पेड़ से टूटती है डाल
सूख जाती है कुछ दिन मे
पतली होती है
या कमजोर होती है
तो जला दी जाती है
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है
बना दी जाती है
कुछ न कुछ
किसी के बैठने को
या
सजावट की चीज बन जाती है
घर से भागने वालो
और
इस पत्ते या डाल मे
क्या फर्क होता है
कुछ भी नही न ।
गुरुवार, 14 मार्च 2019
मैं बंट गया हूँ कितने खानो मे पर मेरा ही कोई मेरे साथ नही ।
मैं बंट गया हूँ कितने खानो मे
पर मेरा ही कोई मेरे साथ नही ।
मंगलवार, 8 जनवरी 2019
तवायफ और सियासत
तवायफ भी कभीं शरम से पेशा छोड़ देती है
कभी गुस्से में होती हैं तो घुंघरू तोड़ देती है
सियासत की बेशर्मी का आलम देखिये साहेब
ये अपने कर्मो से तवायफ को पीछे छोड़ देती है ।
गुरुवार, 3 जनवरी 2019
बाण पर बाण
कुछ लोगों के शरीर ही नही
बल्कि आत्मा तक पर
इतने बाण लग चुके होते है
जमाने के
कि
कोई और बाण
लगने की जगह ही
नही बची होती है ।
अगर कोई चलेगा
तो
बाण पर ही लगेगा
और
उसे और गहरे तक
पैबस्त ही कर देगा न
घाव
और
कितना गहरा हो जाता है
ऐसे में
और
दर्द भी कितना बढ़ जाता है
उस बाण से ।
बेचारा हिरन ।
कोई दर्द
अचानक
आप को
कितना
बेचैन कर देता है
खाने भी नही देता
और
सोने भी नही देता
और
कितना जगा देता है
रात तक
या
पूरी रात
और
बेचारे निरीह
उस
हिरन की तरह
जिसे
बाण लगा हो
या लगी हो गोली
और
वो
पलट कर
उसी को
चाटता है
अज्ञानता से
बिना जाने
की
ये
उसकी मौत है
बेचारा हिरन
और
बेचारा
अगर
भावुक इंसान हो
तो बोली
गोली से ज्यादा
लगती है न
कितना दर्द देती है
सहा भी नही जाता
रहा भी नही जाता ।
खैर
वेचारा हिरन ।
और बेचारा
??..????
शनिवार, 22 दिसंबर 2018
कहो राम तब क्यो आये थे
तब राम तुम क्यो आये थे
अब चुप होकर क्यो बैठे हो
बहुत थके हो तुम लंका से
या फिर क्यो रूठे रूठे हो
या मंथरा से या अपनी माँ से
जो तुम्हरी खातिर लड़ी नही
और राजपाठ को अड़ी नही
ये रूठना फिर सच्चा है
फिर मर्यादित कैसे होते
ये सवाल भी बहुत बड़ा है
अब रावण की फौज खड़ी हैं
तब तो थी छोटी सी लंका
अब की लंका बहुत बड़ी है
अब क्या रामराज्य आ गया
सोचो तब क्यो तुम आये थे
और अब क्यो उदासीन हो
मंदिर मस्जिद पर आते हो
या त्यौहार में आ जाते हो
या फिर प्रचार में आ जाते हो
बहुत डरा था नाव लिए वो
वो नाव जो वही खड़ी थी
मंगलवार, 13 नवंबर 2018
क्रांति का ये नया अंदाज होगा
ये देश जागीर है किसकी
जनता की ,सत्ता की
या पूंजीपति नौकरशाहो की
तय होना अभी भी बाकी
बहाता है किसान पसीना
और
मोटा हों जाता है बनिया
उसके श्रम पर
व्यापारी और बिचौलिया
बहाता है मजदूर पसीना
और
तिजोरी भरती इनकी
सीमा पर मरता जवान है
और
सीना नेता का नपता है
नेता नेता सब जपता है
आखिर कौन है मुल्क का मालिक
ये सब
या
फिर सब ,सारी जनता
क्यों नहीं मिलता सबको सबका
वाजिब हक
कब बदलेगी ये सड़ी व्यवस्था
और
सचमुच का लोकतंत्र मिलेगा
संभव बराबर सब होंगे जब
समान शिक्षा सबको मिलेगी
सामान चिकित्सा होगी सबको
और
सामान अवसर भी होगा तब
जरूरत है सम्पूर्ण क्रांति की
गाँधी के रस्ते पर चल कर
रक्तहीन हो पर समीचीन हो
फैसलाकुन क्रांति की
कब आएगी कौन करेगा
मैं निकलूं तुम भी निकलो
सबको ही हम साथ मिला
चलो हाथ से हाथ मिला ले
जो शोषक है मिलकर उनको
इस क्रांति का मर्म बता दे
हर अंतिम का दर्द दिखा दे
शायद वो भी समझ ही जाये
वो भी हमसे हाथ मिलाये
वर्ना हमको तो उठना ही
हर अंतिम को तो जगना ही
मुट्ठी भींच अधिकार मांग लो
हो सबका ही प्यार मांग लो
वर्ना हक तो लेना ही है
जिनके पास है देना ही है
पांच गाँव जब न देता हो
लड़कर अपना हिस्सा लेना
पर उसका उसको दे देना
नयी क्रांति का आगाज होगा
सबका अपना कल भी होगा
सबका अपना आज होगा
क्रांति का ये नया अंदाज होगा
गुरुवार, 8 नवंबर 2018
कृष्ण का गोवर्धन
कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन
बचाने को उन लोगो को
जिनको खड़ा कर दिया था
सबसे बडी सत्ता के खिलाफ
बस यही तो कहा था कृष्ण ने
कि
उसे क्यो भोग लगाते हो
जो खाता ही नही है
जिसे भूख ही नही है
और
उदर भी नही है
केवल वास लेता है वो
उसे खिलाओ
जिसे भूख है
जिसे जरूरत है
लाओ मुझे खिलाओ
मैं खाऊंगा
कितना कमजोर था देवत्व
की
तुरन्त हिल जाता था उनका आसन
और
कितना क्रोध भरा था इनमें
कैसे और क्यो देवता माने इन्हें
जो सहज इंसान भी नही
बरसा दिया क्रोध
उन सभी पंर
जिन्हें खड़ा किया था कृष्ण ने
सत्य के साथ
पर
कृष्ण भी तो कृष्ण थे
प्रेम किया तो खूब किया
राजनीति किया तो खूब किया
युध्द भी खूब करवाया
खूब मरवाया
और
खूब बचाया
खड़े हो गए यहाँ भी कृष्ण
अपनो के साथ
और
उठा लिया गोवर्धन
अपनी छोटी सी उंगली पर
वो छोटी सी उंगली
और
उतना बड़ा पहाड़
कैसे टिक पाया होगा
और
कैसे उठाया होगा
कितनी दुखी होगी
उनकी उंगली
शायद आज भी दर्द
हो रही वो उंगली
पर
असम्भव को संभव करने का नाम
ही
कृष्ण है शायद
लगता है
की वो पहाड़ नही
बल्कि पुरुसार्थ रहा होगा
संकल्प रहा होगा
इरादा रहा होगा
और
अडिगता रही होगी
और
आंख में आंख डाल कर
खड़े हो गए होंगे कृष्ण
सबसे आगे
उंगली उठाकर चुनौती देते हुए
और
उनके संकल्प के सामने
नही टिक पाया होगा
इतना उथला से इंद्र
और
भाग खड़ा हुआ होगा
खूब तालियां बजी होंगी
नाचे होंगे लोग
कृष्ण को उठा कर कंधे पर
गोपिया रीझ गयी होंगी कितनी
और
देख रही होंगी कनंखियो से
कृष्ण को
कृष्ण ने भी जरूर देखा होगा
अठखेलियाँ
और
मंद मंद मुस्कराए होंगे कृष्ण
पर
कृष तुम कितने लंबे विश्राम पर हो
या
अपने गुण , अपनी जिम्मेदारी
भूल गयो हो
देखो
कितने नकली देव
क्या क्या जुल्म कर रहे है
तुम्हारे लोगों पर
तुम्हारी गोपिकाओं
तुम्हारे बच्चो से
क्या क्या सलूक हो रहा है कृष्ण
तुम इतने बेदर्द तो नही हो सकते
की
लोगो का दर्द ही भूल जाओ
आ जाओ न कृष्ण
भारत ही नही दुनिया को
एक और महाभारत की जरूरत है
और
जरूरत हैं
आज के संदर्भ में
एक नए ज्ञान और उपदेश की
कब आवोगे कृष्ण
और
ये महापर्वत कब उठावोगे
अपने इरादे और न्याय की
उंगली पर ।
आओ न कृष्ण , अब उठ जाओ
आ भी जाओ न कृष्ण ।
मंगलवार, 6 नवंबर 2018
दो तरह की दीपावली
लोग कल रात दिए
और
मोमबत्तियां जलाएंगे
पटाके भी चलाएंगे
और
कुछ बच्चे
परसो सुबह उठ कर
बची मोबत्तियाँ , दिए
और
बिना जले पटाके बीनेगे
जहाँ काम करते होंगे
उनके माँ बाप
उनको वहाँ से मिलेगा
खील बतासा मिठाईयां
कपड़े
और
इनाम में कुछ पैसे भी
मालिक के
दिल के बड़प्पन के अनुसार
और
दीपावली के अगले दिन होगी
एक बड़ी आबादी की दीवाली
कल तो
ये बच्चे
बस टुकुर टुकुर ताकेंगे
किसी
दूसरी दुनिया के लोगो
का वैभव
उनके घरो का उजाला
उनकी धमक
और पटाको कि चमक
उनके घर आते जाते डिब्बे
और सूंघेगे
उनके घर की
रसोई से निकलती
पकवानों की खुशबू
जो उसकी दुनिया मे
नही होती ।
और
बीत जाएगी दीपावली
दो दुनिया एक बार
फिर स्थापित कर
और
सब का उत्थान
और
संघर्ष भुला देगा
कि
कल क्या हुआ था ।
यही समाज की
बनावटी सतत यात्रा हैं
जिसमें
बहा जा रहा है समाज
न जाने कितनी सदियों से
क्या कभी दूरी मिट पाएगी
ये दो दिन की
और
दो तरह की दीपवाली की ?