पहचान उन सभी का मंच है जो जिंदगी को जीते नहीं जीने का निर्वाह करते है .वे उन लोगो में नहीं है जिन्हें जीवन मिला है या जीने का मकसद उनके साथ रहता है .बस जीने और घिसटने के बीच दिल वालो की कलम से और दिल से जो निकल जाता है वही कविता है .पहली कविता भी तों आंसू से निकली थी .आंसू अपने दर्द के हो या समाज के ,वे निकलेंगे तों कविता भी निकलेगी और वही दिलवालो की ;पहचान ;है
शुक्रवार, 24 जुलाई 2020
बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग
बुधवार, 22 जुलाई 2020
बारिश
शनिवार, 18 जुलाई 2020
वो क्या कहलाता है ।
शुक्रवार, 10 जुलाई 2020
एकाकीपन की तरफ ।
रविवार, 5 जुलाई 2020
ऐसे चित्रो से डर लगता है
मंगलवार, 23 जून 2020
जो लिखा ही नही
सोमवार, 22 जून 2020
व्यव्स्था की तरह
गुरुवार, 18 जून 2020
बच्चा बनिये
व्यव्स्था की तरह
चारदीवारी
सोमवार, 15 जून 2020
बेटियाँ
आत्महत्या
सोमवार, 11 मई 2020
हालचाल ठीक ठाक है
बुधवार, 6 मई 2020
आस्तीन में सांप पालना
बुधवार, 29 अप्रैल 2020
ऊपर वाला
जो रोज लिखते है
जिंदगी का बोझ
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020
मंगलवार, 7 अप्रैल 2020
बादल छँट गए
रविवार, 5 अप्रैल 2020
डमरू मदारी और बन्दर
मंगलवार, 31 मार्च 2020
जब कोई मजदूर लिखता है
सोमवार, 23 मार्च 2020
जो तेरी छत पर बैठ गया वो मुझको मंजूर नहीं
गुरुवार, 19 मार्च 2020
टूटा पत्ता
इसीलिए आज बाजार मे हूँ
सड़ी लाश
शुक्रवार, 13 मार्च 2020
होली
रविवार, 8 मार्च 2020
होली है
शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020
झाँक मत लेना
गुरुवार, 30 जनवरी 2020
सोमवार, 27 जनवरी 2020
वो हमको मंजूर नही
मंगलवार, 21 जनवरी 2020
संघर्षो का अन्त ।
शनिवार, 18 जनवरी 2020
कुहरा
शनिवार, 11 जनवरी 2020
जिन्दगी क्या है
बुधवार, 18 दिसंबर 2019
मुनादी हो गयी है
मंगलवार, 10 दिसंबर 2019
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
रविवार, 8 दिसंबर 2019
आग
बुधवार, 4 दिसंबर 2019
रिमझिम फुहारों के साथ
शनिवार, 30 नवंबर 2019
घर के बीच की दीवारों के दिल होता तो कैसा होता
सोमवार, 11 नवंबर 2019
दीवाली
बुधवार, 30 अक्टूबर 2019
जिन्दगी फुटबाल है
मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019
एक ही देश मे दो है
बुधवार, 16 अक्टूबर 2019
कुछ सवाल है जो अनुत्तरित है
कुछ सवाल है
जो अनुत्तरित है
कुछ जवाब है
जो खुद
सवाल बन गए है
सिलसिला टूटता ही नही
न सवालो का न जवाबो का
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है
पर कही तो कोई दीवार होगी
या
होगा इस सफर का डेड एंड
जो रोक देगा क्रिया को
और प्रतिक्रिया को भी
और
फिर सब होगा शांत शांत ।
गुरुवार, 26 सितंबर 2019
क्या सचमुच वो बादलो पर रहता है ?
क्या सचमुच वो
बादलो पर रहता है ?
क्या सचमुच वो हमे
देखता रहता है ?
क्या
ये उसके ही आँसू है
जो
बारिश की शक्ल मे जमीन पर आते है ?
और
हमे भिगोकर
छू लेना चाहते है ?
क्या सचमुच ?
तो छू क्यो नही लेते आकर
हमारे पास सचमुच ?
जब तुम थे
जब तुम थे
जब तुम थे न
सब सुबह उठ जाते थे
और
मैं भी अलसाया सा
पर
अब तो
दोपहर हो जाती है
कइ बार
जब तुम थे ना
घर
कितना साफ रहता था
रहता तो
अब भी साफ ही है
पर
जब तुम थे न
तो
डायनिंग टेबल
खाली रह्ती थी
जब तक खाना न लगे
पर
अब वो भरी है
हर उस चीज से
जिसकी
मुझे जरूरत होती है
और
तुम्हारे बिना
भूलने का डर रहता है
जब तुम थे न
किचेन
कितना भरा होता था
तमाम सामान से
पर
अब बस चाय की पत्ती
और
चीनी
या
कुछ
बहुत दिनो के रखी चीजे
जब तुम थे न
सुबह के नाश्ते से
रात तक
रोज
कुछ नया मिलता था
भूखा
अब भी नही रहता हूँ मैं
बस अक्सर
खाना भूल जाता हूँ
दोपहर को
और
कभी रात मे भी
जब तुम थे न
बिस्तर की चादर
बदल जाती थी
कितना एस यू एस टी हूँ ना
कि
नही बदल पाता हूँ
काफी दिन तक
बाकी सब कुछ वही है
जहा तुम छोडकर गये थे
मैं भी और मेरी आदते भी
और सब यादे भी
तुम्हारा तकिया भी
बिस्तर पर वही रखा है
बस सुबह उठना
और
अपना ध्यान रखना ही
भूल गया हूँ मैं ।
जब तुम थे न
अच्छे भले ठहाके गूजते थे
पता नही क्यो
सन्नाटा ही सन्नाटा है
जब तुम थे न
कितने सक्रिय और
जीवन्त थे तुम
पर
ईश्वर ने दीवार पर
टांग दिया
और
तस्वीर को आधा फ़ाड़ कर ।
बारिश की छुवन
बारिश की छुवन
सुबह से हो रही है
लगातार
मूसलाधार बारिश
नही निकला
मैं घर से आज
झाँक रहा हूँ
खिडकी से लगातार
कभी जाकर
खड़ा हो जाता हूँ
दरवाजे पर
और
हाथ बाहर निकाल कर
महसूसता हूँ
बारिश की छुवन को
और
यादो की
किसी छुवन को भी
बारिश ने भिगो दिया है
यादो की चादर को
कभी कांन मे
एक आवाज आती है
अब तो आप को
गरम हलुवा
और
पकौड़ी चाहिये न
कितने कप बना दूँ
चाय या काफी
वरना फिर कहेंगे
कि
हलुवा खाते खाते
और
उसके बाद कहेंगे
कि
पकौड़ी खाते खाते
ठंडी हो गयी चाय तो !
इसलिए एक बार ही
बना कर ले आते है
थर्मस मे
और
पकौड़ी आलू की
या
और चीजो की भी ?
चौक कर देखता हूँ
कांन बेकार हो गये है
आप के जाने के बाद
हर वक्त जब तक
सो नही जाता हूँ
आप की तमाम आहटे
पर सच तो
वैसे
आप के जाने के बाद
बेटी ने भी पूरी तरह
आप का सिखाया निभाया
जब भी बारिश होती
वही बरामदा वही कुर्सिया
और
वो लेकर आ जाती
वही सब कुछ
कुछ कुछ वही स्वाद
खुली आंखो का सपना
टूट गया
उठा धीरे से
डगमगते कदमो से
और
बिजली के केतली मे
गरम कर दिया पानी
उसमे डाल दिया
एक रेडीमेड चाय का पाउच
ले लिया
एक मुट्ठी मे चना
और
आकर बैठ गया हूँ
बारिश के सामने
दरवाजा खोल कर
और
महसूस कर रहा हूँ
वही सब
कितनी यादो के थपेडे
दस्तक दे रहे है आज ।
बिल्कुल चिंता मत करिये
हम बहुत अच्छी तरह है
और
बहुत खुश है ।
देखिये न बारिश मे
चाय लिए बैठे है
पकौडे और हलुवा
अब अच्छा नही लगता
वरना
वो भी बना ही लेते ।
आइये
थोडा बारिश मे भीगा जाये
नही नही
नुक्सान कर देगी ये बारिश
बीमार कर देगी
एक ही बीमारी क्या कम है
जो छीन ले गयी
जिन्दगी से जिन्दगी ।
शनिवार, 7 सितंबर 2019
लोकतंत्र के खम्भे
सत्ता ने कहा
मीडिया से
थोडा झुक जाओ
पर
कुछ घुटने के बल
चलने लगे
और
आधिकतर तो
लेट कर रेगने लगे ।
और
इस तरह
चौथा खम्भा
लेटकर खुद
सत्ता के रास्ते की
पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा
व्यव्स्थापिका से
हद मे रहो
और वो
संगम की जमुना
हो गयी
और कार्यपालिका
रूपी गंगा मे
विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी
सरस्वती की तरह
भीतर भीतर
घुल-मिल रहा है
अब
सब खम्भो की
जिम्मेदारी
खुद जनता के
कन्धो पर है
क्योकी
आज़ादी
मुफ्त मे नही मिलती
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।
शनिवार, 24 अगस्त 2019
मैं मर भी जाऊ तो क्या
मैं मर भी जाऊं
तो क्या होगा
शायद अगर हुआ तो
चार कंधे
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले
कुछ क्षण की
कुच्छ सिसकियाँ
कुछ कहानिया
कुछ शिकायतें
कुछ झूठी अच्छाइयां
बहुत सी बुराइयाँ
क्या किया जीवन में
बेकार था
कुछ न किया
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया
नालायक था
कुछ नहीं किया
बार बार बोर होकर भी
दोहराई जाती वही कहानियां
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ
कुछ कम हुआ
लो तेरही भी आ गयी
ये भी खर्च कवाएगी
कोई रिश्तेदार रुक न जाये
चलो सब चले गए
अब देखो कहां क्या क्या है
बाट लो किसका क्या है
और
चल पड़ेगी जिंदगी
अपने अपने रस्ते पर
एक कोने में टंगी तस्वीर
साल में एक बार शायद
बदलेगी माला
और
हाथ जोड़ कर
भागते हुए लोग
आज तो देर हो गयी
इस चक्कर में
पता नहीं क्यों बने है
ये रिवाज
इसलिए
मेरे लिए मेरी वसीयत है
की
कोई नहीं रोयेगा
बिजली में जला देना मुझे
किसी नदी में
नहीं बहाना मुझे
मैं नहीं मानता
कोई पूजा इसलिए
न कोई पूजा
और
न उठावनी तेरही
अगले ही पल से
सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो
मेरे लिए न कभी
कोई पारेशान हुआ
न किसी को होना है
वर्ना
मैं परेशान हो जाऊंगा
कुछ नहीं है मेरे पास
की
कोई लडे की
किसका क्या
बस मेरी यादे
कभी क्रोध लायेंगी
की
नालायक बाप ने
कुछ नहीं किया
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी
कुछ नहीं होगा
सब जैसे था
वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही
मेरी वसीयत है
जो
किसी काम नही आएगी
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ
कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और
मैं भी चुपचाप
ऐसे ही चला जाऊंगा
शायद लावारिश होकर
की
किसी को कोई कष्ट ही न हो ।
बुधवार, 21 अगस्त 2019
वो अकेला बुजुर्ग पडोसी
वो अकेले बुजुर्ग पडोसी
__________________
मेरे पड़ोस में रहते है
वो अकेले बुजुर्ग इंसान
बहुत दिनो क्या सालो से
जानता हूँ उन्हें मैं
और
बहुत अच्छी है उनसे पहचान
पहले उनका घर भरा भरा था
फिर
धीरे धीरे खाली होता चला गया
कुछ चाहे और कुछ अनचाहे
अचांनक अकेले हो गए वो
कभी बैठने लगे मेरे साथ
और बताने लगे
अपनी पूरी बात
पहले
उनके पास बहुत लोग आते थे
जब वो कुछ थे
और बहुत लोग
उनकी उंगली पकड़ कर
क्या क्या हो गए
तब तो हालत ये थी
किसी के घर मौत भी
हुयी हो
तो फोन करता था
की आप जल्दी आइये
अर्थी उठने वाली है
आप का ही इन्तजार है
शादी हो या कुछ
कितने लोग बुलाते थे
वो लोग जो कहते थे कि
आप का ज्ञान रौशनी देता है
और आप के बिना तो
कार्यक्रम हो ही नहीं
सकता
पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए
अब कोई नहीं आता
कोई नहीं बुलाता
सबको बना दिया
पर ये जहा के तहा रह
गए
जब कोई उनका अपना
धोखा देता या
कर देता पीठ पर वार
तो ये रहते थे बहुत दुखी
और बेक़रार
फिर झाड कर गम की धूल
लग जाते थे फिर उसी काम में
पर
तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो
मैने देखा है
बहुत ही संघर्ष किया उन्होने
पर जब अपने साथ थे
क्या मजाल उनके चेहरे पर
शिकन भी आई हो कभी
लेकिन
बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे
जब से अकेले हो गए वो
उनके बच्चे भी चले गए दूर
अपनी अपनी जरूरी वजहों से
उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ
बहुत प्यार करते है
उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी
पर मजबूरिया अपनी जगह है
ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में
अक्सर देखता हूँ
उन्हें सुबह बाहर निकल कर
लान से
तुलसी की पत्तियां तोड़ते
बताते है
की उनसे अच्छी चाय
कोई नहीं बना सकता है
सेंक लेते है ब्रेड और
काट लेते है कोई फल
हो जाता है उनका नाश्ता
बताते है
की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है
नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा
अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते
मैंने कहा
क्यों खुद करते है ये सब
और इस उम्र में
बोले कसरत भी है
और पैसे की बचत भी
मैंने पुछा की आप को क्या कमी
तो बस मुस्करा कर रह गए
मंगाते है खाना है कभी कभी
शायद दो दिन में एक बार
मैंने पूछा की आप को तो
ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी
बोले खाना ज्यादा होता है
और
फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है
कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है
और
क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में
अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है
मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे
रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा
और
नए नए पकवान खाऊंगा
तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न
और
अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता
और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा
कभी कभी बहुत खुश होते है
जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा
घर की सफाई ,बिस्तर की चादर
और सब तैयारी में लगे रहते है
कई दिन तक
फिर जब तक बच्चे साथ होते है
दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन
बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक
कुछ गुनगुनाते रहते है
और
बच्चो के यहां से आने के बाद भी
कई दिन उदास होते है
तब पूछना पड़ता है क्या हुआ
बोले की एक तो अकेला होने के कारण
न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है
बज जाती है तभी घंटी
कौन देखे की कौन है
और
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है
कभी दूध गर्म करते है
और बाहर कोई आ गया
और दूध गिर जाता है पूरा
चाय भी
कभी सब्जी जल जाती है
तो कभी रोटी खाक हो जाती है
पुछा की फिर क्या करते है आप
बोले अगर दिन में होता है
तब तो हो जाता है
पर जब रात में जल जाती है
तो खा लेते है मुट्ठी भर चना
या अगर ब्रेड है तो वो
नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है
और
बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है
हल्का हल्का
पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना
की मैं भूखा भी सोता हूँ
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है
परेशांन रहने लगेंगे
उन लोगो के खुश रहने
और मस्त रहने के दिन है
उस दिन बहुत दुखी थे
मैंने पुछा क्या हुआ
बोले
पता नहीं मैंने पिछले जन्म में
कितनो के साथ बुरा किया है
की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ
वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है
जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ
और
फिर जोर से ठठाकर हँसे
और चल दिए
मैंने कहा कहा चले
बोले किसी और को ढूढने
जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो
कभी कभी जब बीमार हो जाते है
तो दिखलाई नहीं पड़ते
मिले तो पुछा क्या हो गया था
बोले कुछ नहीं
बताओ और क्या हो रहा है
बहुत कुरेदा
तो बोले मेरा दुःख तो
कोई बाँट नहीं सकता
लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख
तो बाँट सकता हूँ
आइये कुछ अच्छी बाते करे
एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे
मैंने पुछा आज क्या हुआ
बोले एक चिंता है
मुझे कुछ हो गया तो
दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का
कितनी दिक्कत होगी न बच्चो को
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे
और खुला रखना भी मुश्किल है
और
उनकी आँखों से टपक गया कुछ
बाँध जो रुका था काफी दिनों से
शायद टूटना ही चाहता था
कि
वो इधर उधर देखने लगे
और खांसने लगे
खुद को रोकने को
और मुझे भरमाने को
फिर धीरे से उठ कर चले गए
कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग
मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है
मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ
और
झांक आता हूँ उनके घर की तरफ
लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा
मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव
और
सुनुगा उनका खोखला ठहाका
और फिर मैं भी सर झुका कर
कुछ छुपा कर चला जाऊंगा
अपने घर की तरफ
जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।