शनिवार, 14 नवंबर 2020

क्रांति का ये नया अंदाज होगा

ये देश जागीर है किसकी 
जनता की ,सत्ता की 
या 
पूंजीपति नौकरशाहो की 
तय होना अभी भी बाकी 
बहाता है किसान पसीना 
और 
मोटा हों जाता है बनिया
उसके श्रम पर 
व्यापारी और बिचौलिया 
बहाता है मजदूर पसीना 
और 
तिजोरी भरती इनकी 
सीमा पर मरता जवान है 
और 
सीना नेता का नपता है 
नेता नेता सब जपता है 
आखिर कौन है 
मुल्क का मालिक 
ये सब 
या 
फिर सब ,सारी जनता 
क्यों नहीं मिलता सबको सबका वाजिब हक 
कब बदलेगी 
ये सड़ी व्यवस्था 
और 
सचमुच का लोकतंत्र मिलेगा 
संभव बराबर सब होंगे जब 
समान शिक्षा सबको मिलेगी 
सामान चिकित्सा होगी सबको 
और 
सामान अवसर भी होगा तब
जरूरत है सम्पूर्ण क्रांति की 
गाँधी के रस्ते पर चल कर 
रक्तहीन हो पर समीचीन हो 
फैसलाकुन क्रांति 
कब आएगी 
कौन करेगा 
मैं निकलूं तुम भी निकलो 
सबको ही हम साथ मिला 
चलो हाथ से हाथ मिला ले 
जो शोषक है मिलकर उनको 
इस क्रांति का मर्म बता दे 
हर अंतिम का दर्द दिखा दे 
शायद वो भी समझ ही जाये 
वो भी हमसे हाथ मिलाये
वर्ना हमको तो उठना ही 
हर अंतिम को तो जगना ही 
मुट्ठी भींच अधिकार मांग लो 
हो सबका ही प्यार मांग लो 
वर्ना हक तो लेना ही है 
जिनके पास है देना ही है 
पांच गाँव जब न देता हो 
लड़कर अपना हिस्सा लेना 
पर उसका उसको दे देना 
नयी क्रांति का आगाज होगा 
सबका अपना कल भी होगा 
सबका अपना आज होगा 
क्रांति का ये नया अंदाज होगा

दीपक बन जलते रहना है ।



कहा अकेला हूँ मैं देखो
सूरज चाँद सितारे  मेरे
चिड़ियों का कलरव है मेरा
धूप है मेरी धूल है मेरी
बादल मेरे बारिश मेरी
घर की गर वीरानी मेरी
तो सडंको के शोर भी मेरे
बाज़ारों की हलचल मेरी
और नाचता मोर भी मेरा
छत मेरी दीवारें मेरी
घर में जो है सारे मेरे
बातें मेरी और राते मेरी
वादे मेरे और यादें मेरी
और किसी को क्या चाहिए
इतना तो सब कुछ घेरे है
जीवन क्या है बस डेरा है
आज यहाँ है और कही कल
कुछ साँसों का बस फेरा है
सभी अकेले ही आते है
सभी अकेले ही जाते है
कौन अकेला नहीं यह पर
भीड़ में है पर बहुत अकेले
मैं अकेला घिरा हूँ कितना
इतना सब कुछ पास है मेरे
लोगों के जीवन में देखो
विकट अंधेरे बहुत अंधेरे
उन सबसे तो मैं अच्छा हूँ
जीवन को अब क्या चाहिए
थोड़ी ख़ुशियाँ थोड़ी साँसे
मैं तो अब भी एक बच्चा हूँ
जल्द बड़ा भी हो जाऊँगा
फिर से खड़ा भी हो जाऊँगा
कैसा अकेला कौन अकेला
दूर खड़ा अब मौन अकेला
मेरे गीत और मेरे ठहाके
दूर रुकेंगे कही पे जाके
तब तक तो चलते रहना है
दीपक बन जलते रहना है ।

सोमवार, 9 नवंबर 2020

हिंदुस्तान सब का है ।

दंगे करने कराने वाला
एक छोटा सा तबका है 
अदालत ने कहा है कि 
ये हिंदुस्तान सब का है ।

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

वो अकेले बुजुर्ग पड़ोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी 
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है

वो अकेले बुजुर्ग इंसान

बहुत दिनो क्या सालो से

जानता हूँ उन्हें मैं

और

बहुत अच्छी है उनसे पहचान

पहले उनका घर भरा भरा था

फिर

धीरे धीरे खाली होता चला गया

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे

अचांनक अकेले हो गए वो 
कभी बैठने लगे मेरे साथ

और बताने लगे

अपनी पूरी बात

पहले

उनके पास बहुत लोग आते थे

जब वो कुछ थे

और बहुत लोग

उनकी उंगली पकड़ कर

क्या क्या हो गए

तब तो हालत ये थी

किसी के घर मौत भी

हुयी हो

तो फोन करता था

की आप जल्दी आइये

अर्थी उठने वाली है

आप का ही इन्तजार है

शादी हो या कुछ

कितने लोग बुलाते थे

वो लोग जो कहते थे कि 

आप का ज्ञान रौशनी देता है

और आप के बिना तो

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए

अब कोई नहीं आता 
कोई नहीं बुलाता

सबको बना दिया

पर ये जहा के तहा रह

गए

जब कोई उनका अपना

धोखा देता या

कर देता पीठ पर वार

तो ये रहते थे बहुत दुखी

और बेक़रार

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में

पर

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो

मैने देखा है

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने

पर जब अपने साथ थे

क्या मजाल उनके चेहरे पर

शिकन भी आई हो कभी

लेकिन

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे

जब से अकेले हो गए वो

उनके बच्चे भी चले गए दूर

अपनी अपनी जरूरी वजहों से

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ

बहुत प्यार करते है

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी 

पर मजबूरिया अपनी जगह है

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में

अक्सर देखता हूँ

उन्हें सुबह बाहर निकल कर 
लान से

तुलसी की पत्तियां तोड़ते

बताते है

की उनसे अच्छी चाय

कोई नहीं बना सकता है

सेंक लेते है ब्रेड और

काट लेते है कोई फल

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते

मैंने कहा 
क्यों खुद करते है ये सब

और इस उम्र में

बोले कसरत भी है 
और पैसे की बचत भी

मैंने पुछा की आप को क्या कमी

तो बस मुस्करा कर रह गए

मंगाते है खाना है कभी कभी

शायद दो दिन में एक बार

मैंने पूछा की आप को तो

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी

बोले खाना ज्यादा होता है

और

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है

और

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा

और

नए नए पकवान खाऊंगा

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न

और

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा

कभी कभी बहुत खुश होते है

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर

और सब तैयारी में लगे रहते है

कई दिन तक

फिर जब तक बच्चे साथ होते है

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक

कुछ गुनगुनाते रहते है

और

बच्चो के यहां से आने के बाद भी

कई दिन उदास होते है

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है

बज जाती है तभी घंटी

कौन देखे की कौन है

और 
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है

कभी दूध गर्म करते है

और बाहर कोई आ गया

और दूध गिर जाता है पूरा 
चाय भी

कभी सब्जी जल जाती है

तो कभी रोटी खाक हो जाती है

पुछा की फिर क्या करते है आप

बोले अगर दिन में होता है 
तब तो हो जाता है

पर जब रात में जल जाती है

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना

या अगर ब्रेड है तो वो

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है

और

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है

हल्का हल्का

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना

की मैं भूखा भी सोता हूँ 
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है

परेशांन रहने लगेंगे

उन लोगो के खुश रहने

और मस्त रहने के दिन है

उस दिन बहुत दुखी थे

मैंने पुछा क्या हुआ

बोले

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ

और

फिर जोर से ठठाकर हँसे

और चल दिए

मैंने कहा कहा चले

बोले किसी और को ढूढने

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो

कभी कभी जब बीमार हो जाते है

तो दिखलाई नहीं पड़ते

मिले तो पुछा क्या हो गया था

बोले कुछ नहीं

बताओ और क्या हो रहा है

बहुत कुरेदा

तो बोले मेरा दुःख तो

कोई बाँट नहीं सकता

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख

तो बाँट सकता हूँ

आइये कुछ अच्छी बाते करे

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे

मैंने पुछा आज क्या हुआ

बोले एक चिंता है

मुझे कुछ हो गया तो

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को 
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे

और खुला रखना भी मुश्किल है

और

उनकी आँखों से टपक गया कुछ

बाँध जो रुका था काफी दिनों से

शायद टूटना ही चाहता था

कि

वो इधर उधर देखने लगे

और खांसने लगे

खुद को रोकने को

और मुझे भरमाने को

फिर धीरे से उठ कर चले गए

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ

और

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा 

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव

और

सुनुगा उनका खोखला ठहाका

और फिर मैं भी सर झुका कर

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा

अपने घर की तरफ

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।=================

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

कृष्ण ने कहा सब मरे है

एक मैदान था । 
चारो तरफ 
सैनिक ही सैनिक थे ,
हुँकार थी ,
शोर था 
टंकार थी 
पंर 
सन्नाटा था गहरा 
और 
कृष्ण ने रहस्य खोला 
देखो सब मरे हुए है ।
कुछ ऐसा ही हैं 
बस यूं ही ।

शनिवार, 26 सितंबर 2020

छीन लिया जिन्दगी से जिन्दगी

बारिश की छुवन 

सुबह से हो रही है 
लगातार 
मूसलाधार बारिश 
नही निकला 
मैं घर से आज 
झाँक रहा हूँ 
खिडकी से लगातार 
कभी जाकर 
खड़ा हो जाता हूँ 
दरवाजे पर 
और 
हाथ बाहर निकाल कर 
महसूसता हूँ 
बारिश की छुवन को 
और 
यादो की 
किसी छुवन को भी 
बारिश ने भिगो दिया है 
यादो की चादर को 
कभी कांन मे 
एक आवाज आती है 
अब तो आप को 
गरम हलुवा 
और 
पकौड़ी चाहिये न 
कितने कप बना दूँ 
चाय या काफी 
वरना फिर कहेंगे 
कि 
हलुवा खाते खाते 
और 
उसके बाद कहेंगे 
कि 
पकौड़ी खाते खाते 
ठंडी हो गयी चाय तो !
इसलिए एक बार ही 
बना कर ले आते है 
थर्मस मे 
और 
पकौड़ी आलू की 
या 
और चीजो की भी ? 
चौक कर देखता हूँ 
कांन बेकार हो गये है 
आप के जाने के बाद 
हर वक्त जब तक 
सो नही जाता हूँ 
आप की तमाम आहटे 
पर सच तो 
वैसे 
आप के जाने के बाद 
बेटी ने भी पूरी तरह 
आप का सिखाया निभाया 
जब भी बारिश होती 
वही बरामदा वही कुर्सिया 
और 
वो लेकर आ जाती 
वही सब कुछ
कुछ कुछ वही स्वाद 
खुली आंखो का सपना 
टूट गया 
उठा धीरे से 
डगमगते कदमो से 
और 
बिजली के केतली मे 
गरम कर दिया पानी 
उसमे डाल दिया 
एक रेडीमेड चाय का पाउच 
ले लिया 
एक मुट्ठी मे चना 
और 
आकर बैठ गया हूँ 
बारिश के सामने 
दरवाजा खोल कर 
और 
महसूस कर रहा हूँ 
वही सब 
कितनी यादो के थपेडे 
दस्तक दे रहे है आज ।
बिल्कुल चिंता मत करिये 
हम बहुत अच्छी तरह है
और 
बहुत खुश है ।
देखिये न बारिश मे 
चाय लिए बैठे है 
पकौडे और हलुवा 
अब अच्छा नही लगता 
वरना 
वो भी बना ही लेते ।
आइये 
थोडा बारिश मे भीगा जाये 
नही नही 
नुक्सान कर देगी ये बारिश 
बीमार कर देगी 
एक ही बीमारी क्या कम 
जो छीन ले गयी 
जिन्दगी से जिन्दगी ।

जब तुम थे ना

जब तुम थे 

जब तुम थे न 
सब सुबह उठ जाते थे 
और 
मैं भी अलसाया सा 
पर 
अब तो 
दोपहर हो जाती है 
कइ बार 
जब तुम थे ना 
घर 
कितना साफ रहता था 
रहता तो 
अब भी साफ ही है 
पर 
जब तुम थे न 
तो 
डायनिंग टेबल 
खाली रह्ती थी 
जब तक खाना न लगे 
पर 
अब वो भरी है 
हर उस चीज से 
जिसकी 
मुझे जरूरत होती है 
और 
तुम्हारे बिना 
भूलने का डर रहता है 
जब तुम थे न 
किचेन 
कितना भरा होता था 
तमाम सामान से 
पर 
अब बस चाय की पत्ती 
और 
चीनी 
या 
कुछ 
बहुत दिनो के रखी चीजे 
जब तुम थे न 
सुबह के नाश्ते से 
रात तक 
रोज 
कुछ नया मिलता था 
भूखा 
अब भी नही रहता हूँ मैं 
बस अक्सर 
खाना भूल जाता हूँ 
दोपहर को 
और 
कभी रात मे भी 
जब तुम थे न 
बिस्तर की चादर 
बदल जाती थी 
कितना एस यू एस टी हूँ ना 
कि 
नही बदल पाता हूँ 
काफी दिन तक 
बाकी सब कुछ वही है
जहा तुम छोडकर गये थे 
मैं भी और मेरी आदते भी 
और सब यादे भी 
तुम्हारा तकिया भी 
बिस्तर पर वही रखा है 
बस सुबह उठना 
और 
अपना ध्यान रखना ही 
भूल गया हूँ मैं ।
जब तुम थे न 
अच्छे भले ठहाके गूजते थे 
पता नही क्यो 
सन्नाटा ही सन्नाटा है 
जब तुम थे न 
कितने सक्रिय और 
जीवन्त थे तुम 
पर 
ईश्वर ने दीवार पर 
टांग दिया 
तस्वीर को आधा फ़ाड़ कर ।

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

बहुतो के लिए मेरी लिखी ये कविता ---------------

आप कितने भी मजबूत हो
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या 
नहीं निकल पाए इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के अवरोध को
बना लो 
फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और 
अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को 
पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

रविवार, 6 सितंबर 2020

फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

सत्ता ने कहा
मीडिया से 
थोडा झुक जाओ 
पर 
कुछ घुटने के बल 
चलने लगे 
और 
आधिकतर तो 
लेट कर रेगने लगे ।
और 
इस तरह 
चौथा खम्भा 
लेटकर खुद 
सत्ता के रास्ते की 
पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा 
व्यव्स्थापिका से 
हद मे रहो 
और वो 
संगम की जमुना 
हो गयी 
और कार्यपालिका
रूपी गंगा मे 
विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी 
सरस्वती की तरह 
भीतर भीतर 
घुल-मिल रहा है 
अब 
सब खम्भो की 
जिम्मेदारी 
खुद जनता के 
कन्धो पर है 
क्योकी 
आज़ादी 
मुफ्त मे नही मिलती 
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

बुधवार, 19 अगस्त 2020

वो अकेले बुजुर्ग पड़ोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी 
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है 

वो अकेले बुजुर्ग इंसान 

बहुत दिनो क्या सालो से 

जानता हूँ उन्हें मैं 

और 

बहुत अच्छी है उनसे पहचान 

पहले उनका घर भरा भरा था 

फिर 

धीरे धीरे खाली होता चला गया 

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे 

अचांनक अकेले हो गए वो 
कभी बैठने लगे मेरे साथ 

और बताने लगे 

अपनी पूरी बात 

पहले 

उनके पास बहुत लोग आते थे 

जब वो कुछ थे 

और बहुत लोग 

उनकी उंगली पकड़ कर 

क्या क्या हो गए 

तब तो हालत ये थी 

किसी के घर मौत भी
 
हुयी हो 

तो फोन करता था 

की आप जल्दी आइये 

अर्थी उठने वाली है 

आप का ही इन्तजार है 

शादी हो या कुछ 

कितने लोग बुलाते थे 

वो लोग जो कहते थे कि  

आप का ज्ञान रौशनी देता है 

और आप के बिना तो 

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता 

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए 

अब कोई नहीं आता 
कोई नहीं बुलाता 

सबको बना दिया 

पर ये जहा के तहा रह 

गए 

जब कोई उनका अपना 

धोखा देता या 

कर देता पीठ पर वार 

तो ये रहते थे बहुत दुखी 

और बेक़रार 

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में 

पर 

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो 

मैने देखा है 

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने 

पर जब अपने साथ थे 

क्या मजाल उनके चेहरे पर 

शिकन भी आई हो कभी 

लेकिन 

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे 

जब से अकेले हो गए वो 

उनके बच्चे भी चले गए दूर 

अपनी अपनी जरूरी वजहों से 

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ 

बहुत प्यार करते है 

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी 

पर मजबूरिया अपनी जगह है 

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में 

अक्सर देखता हूँ 

उन्हें सुबह बाहर निकल कर 
लान से 

तुलसी की पत्तियां तोड़ते 

बताते है 

की उनसे अच्छी चाय 

कोई नहीं बना सकता है 

सेंक लेते है ब्रेड और 

काट लेते है कोई फल 

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है 

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है 

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा 

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते 

मैंने कहा 
क्यों खुद करते है ये सब 

और इस उम्र में 

बोले कसरत भी है 
और पैसे की बचत भी 

मैंने पुछा की आप को क्या कमी 

तो बस मुस्करा कर रह गए 

मंगाते है खाना है कभी कभी 

शायद दो दिन में एक बार 

मैंने पूछा की आप को तो 

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी 

बोले खाना ज्यादा होता है

और 

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है 

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है 

और 

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में 

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है 

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे 

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा 

और 

नए नए पकवान खाऊंगा 

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न 

और 

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता 

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा 

कभी कभी बहुत खुश होते है 

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा 

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर 

और सब तैयारी में लगे रहते है 

कई दिन तक 

फिर जब तक बच्चे साथ होते है 

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन 

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक 

कुछ गुनगुनाते रहते है 

और 

बच्चो के यहां से आने के बाद भी 

कई दिन उदास होते है 

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ 

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है 

बज जाती है तभी घंटी 

कौन देखे की कौन है 

और 
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है 

कभी दूध गर्म करते है 

और बाहर कोई आ गया 

और दूध गिर जाता है पूरा 
चाय भी 

कभी सब्जी जल जाती है 

तो कभी रोटी खाक हो जाती है 

पुछा की फिर क्या करते है आप 

बोले अगर दिन में होता है 
तब तो हो जाता है 

पर जब रात में जल जाती है 

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना 

या अगर ब्रेड है तो वो 

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है 

और 

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है 

हल्का हल्का 

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना 

की मैं भूखा भी सोता हूँ 
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है 

परेशांन रहने लगेंगे 

उन लोगो के खुश रहने 

और मस्त रहने के दिन है 

उस दिन बहुत दुखी थे 

मैंने पुछा क्या हुआ 

बोले 

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है 

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ 

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है 

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ 

और 

फिर जोर से ठठाकर हँसे 

और चल दिए 

मैंने कहा कहा चले 

बोले किसी और को ढूढने 

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो 

कभी कभी जब बीमार हो जाते है 

तो दिखलाई नहीं पड़ते 

मिले तो पुछा क्या हो गया था 

बोले कुछ नहीं 

बताओ और क्या हो रहा है 

बहुत कुरेदा 

तो बोले मेरा दुःख तो 

कोई बाँट नहीं सकता 

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख 

तो बाँट सकता हूँ 

आइये कुछ अच्छी बाते करे 

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे 

मैंने पुछा आज क्या हुआ 

बोले एक चिंता है 

मुझे कुछ हो गया तो 

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को 
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे 

और खुला रखना भी मुश्किल है 

और 

उनकी आँखों से टपक गया कुछ 

बाँध जो रुका था काफी दिनों से 

शायद टूटना ही चाहता था 

कि

वो इधर उधर देखने लगे 

और खांसने लगे 

खुद को रोकने को 

और मुझे भरमाने को 

फिर धीरे से उठ कर चले गए 

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग 

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है 

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ 

और 

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा  

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव 

और 

सुनुगा उनका खोखला ठहाका 

और फिर मैं भी सर झुका कर 

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा 

अपने घर की तरफ 

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

कुर्सी और पेड़

क्यों 
इतना अंतर होता है 
कुर्सी और पेड़ में ?
जबकि कुर्सियां भी 
पेड़ो से ही बनती है 
पेड़ देते है छाया 
और 
कुर्सी देती है ताप 
पेड़ देते है हरियाली 
और 
कुर्सी नखलिस्तान 
पेड़ देता है 
साँस लेने को वायु
और 
कुर्सी दम घोट  देती है 
पेड़ देता है फल 
और 
कुर्सी सबका सब खा जाती है 
पेड़ देता है सुखद एहसास
और 
कुर्सी केवल दुःख ही दुःख 
क्यों इतना अंतर होता है 
पेड़ में और कुर्सी में 
जबकि कुर्सियां भी 
पेड़ से ही बनती है 
शायद कभी कोई शोध हो 
और 
कारण पता लगे 
और 
ये अंतर मिट जाये 
कुर्सी और पेड़ का ।

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

एक जंग जारी है

एक जंग जारी है 
अन्दर भी बाहर भी
जब हम सुख भोग रहे होते है 
तन्मयता से
अधिकार और गौरव के नशे के साथ
उस वक्त हम 
रंचमात्र भी नही महसूसते है 
की 
उसी वक्त तैयार हो रहा होता है
किसी दुःख का अनचाहा शिलालेख
उस शिलालेख को देखते है हम अचानक
तब 
ऐसा लगता है सुन्दर स्वप्न देखते देखते
खतरनाक सांप ने जीभ से हमें छू लिया
दुःख और विषाद जब हमें तोड़ रहा होता है
और लगता है की हम जंग हार गए है
अपने ही अस्तित्व को 
स्वीकारने को तैयार नही होते है हम 
उस वक्त भी हमें सबक देकर 
तैयार हो रहा होता है
एक स्वर्णिम भविष्य का सूरज
वह हमें ललकार रहा होता है 
उठ खड़े होने कोऔर कह रह होता है 
की यह पास में ही मै हू
आओ मुझे छू लो ,चाहो तों पा लो
अपनी सामर्थ्य भर,अपनी उत्कंठा भर,
अपने पुरसार्थ भर
मै स्वय तों हू इस कथानक का पात्र
एक जंग के साथ ,
जो भीतर भी है और बाहर भी
की कुछ छण के सुखद सूर्य को 
कैसे और कितना सहेजू
और 
किस तरह बिना सहमे और ठिठके
पार कर जाऊ अन्धेरेपन को
यह जंग लगातार जारी है ,
अन्दर भी और बाहर भी
और 
मै सामने दीवार पार लिखा 
गीता सन्देश वाला चित्र देखकर 
कलम रख देता हूँ
और 
मजबूत कदमो से चल पड़ता हूँ  .

घर या दीवारें

कुछ लोगो को 
कितने लम्बे समय तक कितनी तकलीफ़ो के साथ 
कितना कुछ करना पड़ता है 
एक छोटा सा अपना घर बनाने के लिए ।
फिर एक दिन पता चलता है 
की 
ये तो सिर्फ ईंट गारे की बेजान दीवारे और छत है ।
क्योकी 
घर तो घर वालो से होता है ।

चिट्ठियाँ

जी हाँ 

पहले चिट्ठियां होती थी

सूचना

और

सुख दुःख जानने का साधन

चिट्ठियां भी कई तरह की होती थी

इतना खुला था हमारा जीवन

और हमारा समाज

कि

खुले पोस्ट कार्ड पर

सब कुछ लिख कर भेज देते थे लोग

किसी से कोई धोखा नहीं होता था

क्योकि ये सस्ता होता था

पैसा नहीं होता था लोगो के पास

बस भावनाए और जुडाव होता था

एक चिट्ठी ऐसी भी होती थी

जिस पर टिकेट नहीं लगा होता था

वो भेजने वाले तीन तरह ले लोग होते थे

या तो गरीब रिश्तेदार

या दूर पढ़ रहे छात्र

या फिर वो जो चाहते थे

कि

चिट्ठी हर हालत में मिल जाये उसे

जिसके लिए भेजा है

क्योकि डाक टिकेट का पैसा

उसी से लेना होता था

इसलिए डाकिये की मजबूरी थी

पाने वाले के हाथ में चिट्ठी देना

अंतर्देशीय भी था जो बंद रहता था

पर थोडा महंगा

इसलिए या तो

उसका खर्च वहनं कर कर सकने वाले

लिखते थे इसमें

या फिर कोई गोपनीय बात होने पर

लिखा जाता था ये पत्र

गाँव में तो डाकघर और डाकिया

दोनों वही के होते थे

पर कोई नही झांकता था

किसी के पत्र में

किसी का पत्र तभी पढता था

जब वो खुद पढने को कहता था

रजिस्टर्ड  डाक तो

खैर विरले ही भेजते थे

खास कारणों से

चिट्ठिया भी तरह तरह की होती थी

किसी के कोने पर थोड़ी सी हल्दी का रंग

तो किसी पर लाल रंग

हल्दी किसी शुभ सूचना के लिए

तो लाल रंग

आशिक के दुःख की निशानी था

और ये बताने की कोशिश

की ये खून से लिखा है

गाँव की चिट्ठियों में

सबके हालचाल पूरे गाँव सहित के साथ

गाय बैल उसकी बीमारी

जो बीमार था ठीक हुआ या नहीं

फला गाय या भैस दूध दे रही या नहीं

और कितना दूध दे रही है

कौन कौन पीता है दूध

बाबा भी पीते है या नहीं

और जिसको बच्चा होना है

उसे मिलता है या नहीं

बगीचे का क्या हाल है

कौन कौन सा फल कितना लगा है

किस किस खेत की जुताई हो गयी

किस खेत में पानी लग गया

धन रोपा गया या नहीं

और 

कौन सी फसल कितनी होगी

इत्यादि जरूर होता था

कोई बीमार था गाँव में तो क्या हुआ

किसका इलाज हो रहा है

और मर गया तो कैसे

और

सब सुख दुःख बताने के बाद

और

ये बताने के बाद की फला फला मर गए

सुखा पड़ गया या बाढ़ में सब बह गया

भैस या गाय मर गयी

वो बच्चा पैदा होते ही मर गया

अंत में ये जरूर लिखा होता था

अपना ध्यान रखना 

यहाँ बाकि सब कुछ ठीक ठाक है

पति पत्नी की चिट्ठिया गोपनीय होती थी

इसलिए उनका ब्यौरा भी लिखना ठीक नहीं

सारे आशिक अंत में जरूर लिखते थे

लिखा है ख़त खून से स्याही न समझाना

शहर की चिट्ठिया इतनी मजेदार नहीं होती थी

इसलिए उन पर भी क्या लिखना

हां तार भी होता था

जो बहुत ही भयानक होता था

तार आने का मतलब ही होता था

की कोई जरूर मर गया

तार खोलते वक्त पढने से पहले ही

रोना धोना शुरू हो जाता था घर में

चाहे किसी ख़ुशी को जल्दी से बताने को

भेज दिया हो किसी अपने ने

तार आने की खबर पूरे गाँव में

और

उस समय के शहरी मुहल्लों में भी

बहुत जल्दी फ़ैल जाती थी

और 

लोग मुह लटकाए आने लगते थे

दुःख बांटने

चिट्ठिया सहेज कर राखी जाती थी

किसी कोने में या किसी संदूक में

एक और रिवाज था

चिट्ठी आने पर

पूरे परिवार को इकट्ठा कर पढने का

पढना भी तो 

गाँव में कोई कोई ही जानता था

वही सबकी चिट्ठी बांचता था

अगर दूर रह रहे पति की चिट्ठी

पत्नी के लिए होती थी

तो 

कुछ पढ़ कर कुछ छोड़ देता था

और कह देता था

की बाकी  बात

वो अपनी मेहरारू को बता देगा

और वो आकर बता देगी

तब कुछ ऐसी ही मर्यादाये होती थी

कोई दुःख का समाचार

चिट्ठी बांचने वाले की अचानक

हिलते हुए ओठो और आँखों से

ही पता लग जाता था

क्योकि कुछ पल वो चुप हो जाता था

दुःख दूसरे का था पर सब रोते थे

जसे

पहले लड़की किसी की भी विदा होती थी

पर रोता पूरा गाँव था

फिर रोना पूरा कर वो बांचता था चिट्ठी

कुछ चिट्ठिया 

छुपा कर भी रख देने का रिवाज था

कुछ घर में षड़यंत्र के कारण

और 

कुछ हंसी ठिठोली के लिए

इतिहास में तो चिट्ठियों ने

बड़ी बड़ी क्रांतियाँ करवाई है

तो ज्ञान का प्रसार की किया है

बहुत से जाने मने लोगो की चिट्ठिया

तो आज तक रौशनी का काम करती है

अगर प्रकाशित हो गयी है

या पाण्डुलिपि के तौर पर मौजूद है

क्या होता था जब कोई अपना

कही चला जाता था

तो रोज डाकिये का इन्तजार करना

और

अकसर डाकघर तक चले जाना

पूछने के लिए

की

हमारी कोई डाक है क्या

मिल गयी तो नेमत पाने की ख़ुशी

और नहीं तो उदास होकर लौटना

कितना रोमांच था जिंदगी में

बहुत सी चिट्ठिया

असली भावना का प्रवाह होती थी

मन भी भीग जाता था और भावनाए भी

मेरे पास भी है

सहेज कर रखी हुयी कुछ चिट्ठिया

एक अपने पिता की आखिरी चिट्ठी

और कुछ अपने हमसफ़र की

जिन्हें मैं अक्सर पढता हूँ

अक्श उभर आते है हमेशा उनके

जब भी वो चिट्ठियां पढता हूँ

तो काफी दिन का  दर्द

आँखों के रास्ते बह जाता है

जी हाँ चिट्ठिया क्या होती थी

आज के लोग क्या जाने

और क्या जाने

उनके आने के इन्तजार का मज़ा 

और

उनको बार बार पढने

तथा सहेजने का मज़ा

हो सके तो चिट्ठिया लिखिए

और 

नयी पीढ़ी को लिखना सीखाइए

मोबाइल और फोन अपनी जगह है

और चिट्ठिया अपनी जगह

वाह रे चिट्ठियां

जब लगा था मेरे घर फ़ोन

जब लगा था मेरे घर नया नया फोन

---------------------------------------

एक दिन फोन मंत्री मिल गए

और पूछ लिया घर में फोन है

लागा जैसे कुछ अपराध या हीनता है

घर में फोन नहीं होना

बहुत मुश्किल से मुह से निकला था

नहीं हम कैसे रख सकते है फोन

हम तो साधारण आदमी है 

कहा से देंगे उसका पैसा 

उन्होंने जारी कर दिया एक आदेश

एक कमिटी का सदस्य बनाने का

और जब आयी थी उसकी चिट्ठी 

क्या ख़ुशी थी 

जैसे कितना बड़ा कुछ मिल गया 

पिता जी ने 

कई लोगो को जाकर बताया था 

उसके बारे 

कुछ दिन में लग गया वो लाल रंग का फोन

ये भी उन दिनों खबर थी अख़बार के लिए

जानने वालो और आसपास के मुहल्ले के लिए

मिलने लगी बधाइयाँ और मांगे जाने लगे नंबर

अपने फोन तो शायद ही कभी आते हो

क्योकि अपनों के पास नहीं थे फोन

पर जब पहली बार घंटी बजी 

तो सभी अजीब कशमकश में थे की क्या करे 

पिता जी ने आगे बढ़कर उठाया था चोगा 

बस इतना ही पुछा था कौन साहब है आप 

किसी अपने का फोन था 

पूरा परिवार देख रहा था गर्व से 

किसी आश्चर्यजनक चीज की तरह 

मैंने जब पहली बार उठाया था 

तो उठाने से पहले रटता रहा की हेल्लो कहना है 

पर दूसरो के तमाम फोन आने लगे

और बढ़ गयी थी रौनक घर में

कुछ दिन तो गर्व की अनुभुती होती रही 

पर फिर मुसीबत बन गया फोन 

जब किसी ने बाहर का फोन मिला दिया 

और आ गया बड़ा सा बिल 

उस ज़माने के हिसाब से 

तब ध्यान रखना पड़ता था 

की सभी काल को लाक करके रखना है 

पर 

लोगो के फोन का कोई समय ही नहीं था 

अपनी जिंदगी ही अपनी नहीं रह गयी 

सुबह से रात तक कोई न कोई 

आकार इन्तजार करता था अपने फोन का 

खाना पीना भी मुश्ल्किल 

और अपनी बात करना भी मुश्किल 

जी हा फोन 

मुसीबत का सबब भी था तब फोन  

पर स्टेटस का सिम्बल था 

तो सब कुछ बर्दाश्त करते थे लोग

ट्रंक काल

ट्रंक काल 
---------------
पहले भी होता था फोन 

पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी

सुनते सब थे पास बैठे हुए

बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे

और कार्डलेस भी

पर उससे पहले

लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे

लोगो के यहाँ क्याशहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां होते थे फोन

और

वो बहुत रईस होने की निशानी था

गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी

नहीं था कोई फोन

और बुक करनी होती थी ट्रंककाल

बहुत से लोग बुक करते

और बुक करने को लाइन में लगे होते

पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात

नहीं मिलता था फोन तब

जिसका मिल जाता था

वो विजयी भाव ओढ़ लेता था

और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे

ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का

और दूसरा खाने या सोने चला जाता था

जी हां ट्रंककाल लगना भी तब

इश्वर की कृपा और किस्मत की बात थी

जब मिल जाता था फ़ोन

तो चीखना पड़ता था

की आवाज वहा तक पंहुच जाये

कई बार तो हेलो हेलो आप सुन रहे है न

कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी

कई कई बार में बात हो जाती थी

और नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल

तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल

जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन

और ४ जी तथा ३ जी

उस थ्रिल को बस महसूस कर सकते हो

अतीत में जाकर जरा महसूसो और सोचो 

की अपनो की जिंदगी कितनी मुश्किल थी

ट्रिन ट्रिन

मिल गया मेरा ट्रंक काल

तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

त्यौहार और व्यवहार

त्यौहार और व्यवहार 
————————

जी हां 

त्यौहार अब भी होते है पहले भी होते थे 
अब गरीब है तो 
बस लोगो को को मनाते देख लेता है 
या थोडा बहुत मना भी लेता है 
मध्यम वर्ग है तो दिखावे के लिए 
बजट बिगाड कर भी मनाता है 
उच्च वर्ग है तो कहने ही क्या 
किसी पद पर है तो वो नही मनाता 
लोग मनाते है उसका त्यौहार 
और लोगो के दिए सामानो  से 
भर जाता है घर का कमरा
जिनसे काम है उनके अलावा 
कोई किसी से नहीं मिलता 
अब किसी भी त्यौहार में 
मेसेज है न मन गया त्यौहार 
और 
मान लिया गया उसे ही मिलना 
लोगो का और शुभकामनाओ का 
त्यौहार पहले भी होते थे जो पैसे से नहीं 
भावनाओ से मनाये जाते थे 
गरीब अमीर सब खुद इन्तजाम करते थे 
त्यौहार मनाने का 
इतना फर्क था कि
अमीर के काम नौकर कर देते थे 
पर बाकी सब एक समान थे 
होली हो तो रंग सबके पास था 
और पिचकारी भी चाहे पीतल की ,लोहे की 
नहीं तो बांस को काट कर बनायीं 
गरीब की खुद की 
फूहड़ता नहीं 
बल्कि सबको सबसे मिलने वाले 
आनंद का त्यौहार था होली 
गाँव में तो झुण्ड बना कर निकलते थे सब 
उम्र के हिसाब से 
अपनी अपनी भाभियों से होली खेलने 
गुझिया बनाने में पूरा परिवार जुटता था 
बच्चे भरते और मोड़ते या काटते थे 
माँ बेलती थी तो पिता सेंकते थे गुझिया 
बेईमानी की भी गुंजाइश थी 
किसी किसी गुझिया में 
ज्यादा मावा भर कर खुद खा लेने की 
और सेव झाड़ना सेंकना 
कई दिनों तक चलता था त्यौहार 
दीपावली में पतली डंडियो 
जो आम तौर  पर नरगट 
या अरहर की होती थी 
तीन तीन को इस तरह बांधना 
की उस पर दिया रख सके 
और दरवाजे के सामने उन्हें सजाना 
शहर में पहले तो छोटे छोटे दिए 
और बाद में मोम्बत्तिया आया गयी 
तब भी कई दिन पहले से 
मिठाई जैसी चीजे बनती 
अपने ज्ञान और हैसियत के हिसाब से 
कई दिनों तक तैयारी होती थी 
पर जो तब था और आज नहीं है 
वो था समूह में मनाना या समाज में 
तब फोन और मोबाइल नहीं थे 
तो लोग मोबाइल रहते थे 
खूब मिलते थे एक दूसरे से 
त्यौहार में एक परिवार आकर मिला गया 
तो इसका मतलब ये नहीं की मिलन पूरा हो गया 
अगले दिन ये पूरा परिवार उनके घर जाता था 
और चलता था कई दिनों तक ये क्रम 
और फिर पूरा होता था त्यौहार 
जी हां त्यौहार एक परिवार नहीं 
पूरा समाज मनाता था एक दूसरे के साथ  
जो कही खो गया लील लिया नये ज़माने ने 
औरआर्थिक दिखावा 
हीन भावना पैदा कर देता है आज बहुतो में 
देखा होगा आपने भी 
जब आप बहां रहे होते है सफ़ेद या काला धन 
तो बहुत सी उदास आँखे 
उसे बस टुकुर टुकुर देख रही होती है 
जो पहले के सादे त्योहारों में नहीं होता था 
और तब केवल त्यौहार नहीं 
सच्चा व्यवहार भी होता था

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

हा जीवन इसको कहते है

चाहे तो मेरी ये कविता पढिए -

जिंदगी 

कब होगी पहचान हमारी 

इतने सालो से है दूरी 

क्या मजबूरी 

जिन्दा तो है 

पर क्या सचमुच 

क्या जीवन इसको कहते है 

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू  

नीद नहीं और पेट में हलचल 

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ 

बस अन्धकार है 

क्या जीवन इसको कहते है 

जीवन कब हमको मिलना है 

या फिर ऐसे ही विदा करोगे 

कुछ तो सोचो 

हम दोनों क्या जुदा जुदा है 

कुछ तो बोलो 

और भविष्य के ही पट खोलो 

या फिर कह दो 

हां जीवन इसको ही कहते है | 

जींना है तो हंस कर जी लो 

या फिर दर्द गरल को पी लो 

तेरे हिस्से में बस ये है 

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ 

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ 

चल अब सो जा 

अच्छे सपनो में आज तो खो जा 

कल फिर मुझसे ही लड़ना है 

हां जीवन इसको कहते है |

बुधवार, 5 अगस्त 2020

जहा भी झुका सर

जिसके भी सामने 
झुका ये सर 
वो बस वो ही 
जानता है 
अपना घाव और पीड़ा 
संसद की सीढियो के सामने 
लेटा था कोई 
तब से 
संसद और उसकी परम्पराएं 
सिसक रही है
सुना है कि 
टूटने वाली है 
वह भव्य संसद 
जिसने देखा है 
भारत की आज़ादी का उगता सूरज 
और सारा इतिहास 
अब 
फिर लेट गया कोई 
भारत की आस्था 
और 
विश्वास के सामने ?

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

शनिवार, 25 जुलाई 2020

कुम्भकरण

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकरण है ।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग

चलो अब मैं चुप हो जाता हूँ 
और
भींच लेता हूँ ओठो को 
चाहे खून क्यो न निकल पडे 
कुछ भी हो जाये मेरे सामने 
आंख मूद लूँगा मैं कस कर 
चाहे फिर दुखती रहे देर तक 
या दिखना कम क्यो न हो जाये 
कुछ भी हो हत्या अपहरण 
बलत्कार भ्रष्टचार 
हो जाये चीर हरण व्यव्स्था का 
या आ जाये तानाशाही 
मिटा दिया जाये संविधान 
पर 
मैं कुछ नही लिखूंगा 
कुछ नही बोलूंगा 
बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग 
और 
शामिल हो जाऊंगा उन्ही मे 
निकाल कर फेंक दूंगा अपनी रीढ 
दफना दूंगा दिल दिमाग 
और चिंतन ।

बुधवार, 22 जुलाई 2020

बारिश

मेरी कविता  ——

बारिश

बारिश  नहीं आयी
उफ़्फ़ कितनी गरमी है 
सूरज जला देगा क्या 
ये बारिश क्या करेगी 
आफ़त बन कर आयी है 
सब कुछ बहा देगी क्या 
देखो गिर गए 
कितनो के कच्चे घर 
और 
झोपड़ियाँ भी जवाब दे गयी 
अबकी बारिश समय पर आयी 
और उतनी ही आयी 
की अबकी खेत सोना उगलेंगे 
अभी बारिश तो आफ़त है 
भीग गया खेत और खलिहानों में सब 
अब साल कैसे बीतेगा 
कैसे होगी उसकी पढ़ाई और दवाई 
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
बारिश आयी स्कूल की छुट्टी 
छप्प छप्प करते वो पानी में 
वो काग़ज़ की नाव बहाते 
वो बचपन कितना प्यारा लगता है 
उससे पूछो जो अभी है ब्याही 
और पति सीमा पर बैठा 
उन दोनो के मन की सोचो 
और 
वो दोनो भीग रहे है छत पर 
दोनो देख रहे दोनो को 
भीगा आँचल भीगा यौवन 
दोनो को है कितना जलाए 
वो मछरदानी पर प्लास्टिक बिछा रही है 
बालटी भगौने सब बिस्तर पर सज़ा रही है 
ख़ुद बैठी है पर बच्चों को 
इस कोने और उस कोने कर 
वो बारिश से बचा रही है 
पूरी रात नहीं वो सोयी 
सब झेला 
पर कभी नहीं क़िस्मत पर रोयी 
बारिश का मतलब उससे पूछो 
जो पूरा घर अब सुखा रही है 
बारिश तो अब ख़त्म हो गयी 
चरो तरफ हरियाली छायी

फूलों से अब लदी डालियाँ 
सबको ही अच्छी लगती है 
भूल गए सब क्या झेला था 
वो अच्छा या बहुत बुरा था 
फिर जीवन पटरी पर आया  
उफ़्फ़ 
ये बारिश कैसी बारिश ।

शनिवार, 18 जुलाई 2020

वो क्या कहलाता है ।

जो दिन भर हंसी 
चेहरे पर चिपकाता है 
अकेले मे रात को रोता 
फिर 
सुबह से मुस्कराता है 
वो भी एक इन्सा है 
जो खुद को 
और 
अपनो को बहलाता है ।
क्या कोई जानता है 
कि 
वो क्या कहलाता है ।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

एकाकीपन की तरफ ।

मैं भीड़ में गुम हो जाना चाहता हूँ 
पर 
भीड़ और मेरे बीच इतनी दूरी है 
कि 
न मेरी आवाज उसे सुनाई पड़ती है 
और न मैं उसे दिखाई पड़ता हूँ 
मुझे भी नही दीखती है वो भीड़ 
बस सुनाई पड़ती है कानो में आवाज़ 
कही दूर से अपुष्ट ,अस्पष्ट 
और 
में ढूढने लगता हूँ उसे पागल जैसे 
पर 
भीड़ ने लगातार दूरी को कायम रखा है 
और मुझे धलेक रही है लगातार 
एकाकीपन की तरफ ।

रविवार, 5 जुलाई 2020

ऐसे चित्रो से डर लगता है

ऐसे चित्रो से डर लगता है
  
ऐसे ही बहुत से चित्र 
तो देखे थे हमने 
तालिबान के यहाँ के 
इसी रंग के कपड़ो मे 
जिनकी गर्दने रेत रहे थे 
ऐसे ही मासूम बच्चे 
और 
वो सब मुल्क 
जहा ऐसे चित्र दिखे
चीथड़ों से दिख रहे है 
वीरान खंडहर वाले भुतहा 
भागते हुये लोग
चीखते हुये लोग 
कटते और धमाको मे
उडते हुये लोग 
चारो तरफ 
शोर ही शोर 
धुवा ही धुवा 
लाशे ही लाशे 
और खंडहर मे 
तब्दील हो गए 
वो खूबसूरत शहर 
लाशो मे तब्दील वो
खूबसूरत शक्ले 
चीखो और धमाको मे तब्दील 
वो अच्छी आवाजे 
सचमुच 
बहुत डर लगता है 
ऐसे चित्रो से 
वो चाहे जिसके हो 
और चाहे जहा
चाहे जिसने खीचे हो
मत बनाओ ऐसे चित्र 
इन बच्चो के हाथो मे
थमाओ किताबे 
खेलने की चीजे 
और 
बजाने को वाद्ययंत्र 
लोहे से बनी ये किताबे 
इन्हे मत पढावो
लोहे के ये वाद्ययंत्र 
इनसे मत बजवावो
इन्हे इन्सांन ही रहने दो 
इन्हे मौत बेचने वाला 
शैतान मत बनाओ 
बहुत डर लगाता है 
इन चित्रो से अब ।
नोट -( यह तस्वीर कही की हो और किसी की हो बस उसका उपयोग अपनी बात समझाने के लिए किया गया है )

मंगलवार, 23 जून 2020

जो लिखा ही नही

तुम पढ़ लो  
वो कविता 
जो 
मैंने लिखा ही नही 
तुम देख लो 
वो चित्र 
जो 
मैंने बनाया ही नही 
तुम बस जाओ 
उन साँसों में 
जो 
मैंने ली ही नही 
तुम आ जाओ 
मेरे घर में 
जो 
कही है ही नही 
पर 
तुम आ सकते हो 
सपने में मेरे 
जिसकी 
सुबह याद नही रहती 
छोटी सब 
आ जाओ 
और बैठ जाओ 
मेरे सामने ताकि 
निहार सकूँ मैं तुम्हें 
जब तक 
मैं मैं हुँ और तुम तुम हो । 

सोमवार, 22 जून 2020

व्यव्स्था की तरह

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ 
कमरे की 
और 
मन की भी 
चिंतन की 
और 
आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि 
छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और 
हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और 
बारिश में 
लगने दो आग 
किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत 
या असबाब 
मुझे क्या 
मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और 
बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि 
कोई चीख सुनाई न पड़े 
और 
न दिखाई दे 
बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब 
मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद 
सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

गुरुवार, 18 जून 2020

बच्चा बनिये

घर मे परिवार होता है 
तभी वो घर होता है 
वर्ना तो बेजान दीवारे है
जिनमे आप कैदी है 
पर 
घर मे कोई छोटा सा बच्चा हो 
और 
बन जाइये बच्चा उसके साथ 
वाह 
क्या जिंदगी हो जाती है 
फिर मिल जाती जिंदगी 
और 
बचपन पोंछ देता है सारे गम 
सारी तकलीफे , बीमारी और वेचारगी 
बन गया हूँ मैं बच्चा आजकल 
सचमुच खूब जी रहा हूँ मैं 
भरपूर जी रहा हूँ मैं 
चुरा लेना चाहता हूँ खुशिया 
और इसकी यादे 
अगली बार फिर मिलने तक के लिए ।
आह जिंदगी वाह जिंदगी ।
बच्चा बन कर देखिये 
बच्चो से प्यार करिये 
खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

व्यव्स्था की तरह

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ 
कमरे की 
और 
मन की भी 
चिंतन की 
और 
आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि 
छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और 
हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और 
बारिश में 
लगने दो आग 
किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत 
या असबाब 
मुझे क्या 
मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और 
बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि 
कोई चीख सुनाई न पड़े 
और 
न दिखाई दे 
बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब 
मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद 
सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

चारदीवारी

घर की चारदीवारी मे 
कैद रहने पर 
लगता है कितना अकेलापन 
सडक पर निकल पडे  
तो  
दीखने और मिलने लगे 
हजारो लोग अपने ही ।
इसलिये तोड दी दीवार की सीमाये 
निकल पडे  
फिर 
सब जग अपना लगा
शामिल हो गये 
लोगो के दुख मे 
और सुख मे भी 
और 
भूल गये 
की 
दुख भी कुछ होता है

सोमवार, 15 जून 2020

बेटियाँ

घर से जाते जाते भी 
पापा की           
कितनी चिंता करती है
बेटियाँ 
की 
क्या कहा रखा है ,
क्या क्या 
कैसे कैसे 
कर लीजियेगा ,
क्या खा लीजियेगा                
इत्यादि इत्यादि ।
मन और आंखे 
भिगो देती है बेटियाँ 
और 
खुद पर 
पता नही कैसे 
काबू रख पाती है 
बेटियाँ 
या फिर 
आंखे छुपा लेती है 
बेटियाँ ।

आत्महत्या

आत्महत्या 

अच्छा चढ़ गए 
कुर्सी या स्टूल पर 
बाँध लिया 
पंखे मे रस्सी 
फिर 
थोडी दे रुके थे क्या 
पंखे मे 
रस्सी बाँधने से पहले ?
कुछ रुक कर सोचा क्या 
और 
जब बांधा था 
या 
गले मे डाली थी रस्सी 
तो 
आंखे नम थी क्या 
या 
बह रहा था पनाला 
आंखो से या खून 
फिर 
कैसे कसा होगा गले मे 
उस वक्त क्या था मन मे 
मां पिता भाई बहन 
कोई दोस्त या प्रेमिका 
या सर्फ गुस्सा 
पर किससे ? 
खुद से या ?
पर एक पल भी 
नही आया ख्याल 
बहुत अपनो का
या फिर अपना ?
बहुत नशे मे थे क्या 
की 
कुछ होश ही नही था 
या फिर 
मौत 
खुद नशा बन गई थी
उस पलायन के वक्त  
कसा था फंदा 
तो विचलित हुये क्या 
अच्छा 
सच सच बताओ 
अन्तिम विचार क्या
आया था मन मे 
माँ की चीखे 
सुनाई पडी क्या 
और 
टूटा हुआ पिता 
और भी सब 
सचमुच वाले अपने 
अच्छा 
जब सरका दिया स्टूल 
और झूल गये 
पर मरे नही थे 
क्या 
तब मन मे आया 
काश अब बच जाते 
वो 
अन्तिम इच्छा क्या थी 
कायर कही के 
तुम पैदा ही क्यो हुये 
जब लड़ नही सकते थे 
जीवन के लिए 
जीवन से 
अपने पिता अपनी माँ 
और 
अपनो के लिए खुद से ।

सोमवार, 11 मई 2020

हालचाल ठीक ठाक है

सब कुछ ठीक ठाक है 
हालचाल ठीक ठाक है 
थोड़े बलात्कार है 
थोड़ी सी लूट है 
कुछ भी जला दो 
सबको ही छूट है 
थोड़ा सा दंगा  है 
कानून नंगा है 
बाकी सब ठीक ठाक है 
हाल चाल ठीक ठाक है 
( बाकी कल )

बुधवार, 6 मई 2020

आस्तीन में सांप पालना

हा 
आस्तीन में सांप पालना 
हमारी आदत है 
और 
उनसे कटवाना भी
तुम भी फुफकार लो 
और 
काट लिया पहले भी 
फिर भी बार बार काट लो ।

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

ऊपर वाला

ये #ऊपर_वाला 
हमेशा से मुसीबतरहाहै
इन्सानो के लिए 
खासकर आम इन्सानो के लिए 
इतिहास उठा कर दे लो 
ये आम इन्सानो को 
सिर्फ कष्ट देता है 
और
खुद के लिए लेताहै
अच्छी अच्छी चीजे 
अभी भी जो आज है 
ये भी तो 
ऊपर वालो की देन है 
और 
नीचे वाले बदहाल है ।

जो रोज लिखते है

ये जो लोग 
रोज पढते है 
नई किताबे 
रोज लिखते है 
कोई कविता 
गजल या कहानी 
और 
नये नये किस्से भी 
कितने 
सुखी लोग है वो
कितने निश्चिंत 
कितने बेपरवाह 
और 
रच देते है 
रोज कुछ नया
पर 
जो खुद को ही 
जिन्दा रखने 
के जतन मे 
बिता देते है दिन 
वो जिन्दा है 
ये भी तो रचना है । 

जिंदगी का बोझ

बंद दरवाजो के पीछे 
छिपे होते है कितने राज 
कितनी सिसकिया 
और 
कितनी चीखे 
कुछ तो 
निकल ही नही पाती है 
बस घुट कर रह जाती है 
कहने को तो 
सब अपने ही होते है 
पर 
कुछ ऊर्जा देते है 
और 
देते है जीने की तमन्ना 
और 
कुछ गला घोट कर 
मार देते है 
या 
बना देते है मरने जैसा 
बाहर निकल कर 
कितना नकली हंसी                           हँसते है लोग 
और 
कितनी खोखली होती है                  उनकी मुस्कराहट 
दर असल इस हंसी मे
एक चीख होती है 
बहुत डरावनी सी             
और 
मुस्कराहट बिल्कुल वही              
जो 
फाँसी पर चढ़ने वाले के
चेहरे पर होती है 
रिश्ते भी कितने 
बोझिल हो जाते है 
जब कोई खुद को
बोझ बना लेता है 
अपने ही ऐतिहासिक
कामो से 
और 
फिर अपने ही वर्तमान से      
क्यो नही जीवन उतना ही हो 
की 
आप ऐश करे अपनी मर्जी का 
और 
फिर छोड दे शरीर 
उसके बाद जीवन का
मतलब भी क्या है 
जब तक आप जरूरी हो
दूनिया और समाज के लिए जिए 
या अपने लिए 
वर्ना क्यो शर्मिंदा हो रोज 
बेहतर है कि आप फिर चले ।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

बादल छँट गए

सब बादल छँट गये 
सूरज निकल आया 
उनकी कैद से 
अब सब कुछ 
साफ साफ दिख रहा है 
गद्ढे भी ,पत्थर भी 
रस्ते भी और मंजिल भी ।

रविवार, 5 अप्रैल 2020

डमरू मदारी और बन्दर

डमरु मदारी और बंदर 
—————————
इधर कुछ साल पहले तक
पता नहीं क्या हो गया 
कि
मदारी दिखने बंद हो गए थे 
क्या उनको नचाने को 
बंदर नहीं मिल रहे थे ?
या दर्शकों ने 
देखना बंद कर दिया था ?
अब समस्या दूर हो गयी है 
बंदर काफ़ी मिल गये है 
और 
दर्शक तो हमेशा से है ही 
जो तटस्थ है । 
बजा डमरु बजाओ ताली 
बंदरिया 
जी मालिक 
नाच दिखाएगी 
हा दिखाऊँगी 
क्या कह रही है 
पहले पैसे फेंको
अरे अब क्यों रुठी है 
पैसे कम आए 
मेहरबान और फेंको 
फिर तमाशा देखो 
डमरु बजने लगता है 
और 
अभ्यस्त बंदर बंदरिया 
खेला दोहराने लगते है 
वही पुराना वही बासी सा 
फिर भी 
डमरु की आवाज पर 
नाचना ही नियति है 
बंदरो  की आज तक ।

मंगलवार, 31 मार्च 2020

जब कोई मजदूर लिखता है

जब कोई मजदूर लिखता है 
तो मुझको मजबूर दिखता है 
गठरी या बच्चा है नहीं मालूम 
सत्ता से तो बहुत दूर दीखता है 
फोटो में जो केला लेके खड़ा है  
वो तो बहुत मशहूर दिखता है 
वो बच्चा रो रहा है भूख से देखो 
उसका बाप भी मजबूर दीखता है 

सोमवार, 23 मार्च 2020

जो तेरी छत पर बैठ गया वो मुझको मंजूर नहीं

जो तेरी छत पर बैठ गया वो मुझको मंजूर नहीं 
चाहे वो एक परिंदा है 
पर मेरी छत से दूर रहे 
तू मुसलमान मैं हिन्दू हूँ मेरा धर्म भ्रष्ट हो जायेगा 
वो तेरी छत पर बैठा है तो तेरे धर्म को लायेगा 
रे खबरदार तू रोक उसे उड़ने से पहले टोक उसे 
या गंगाजल मुझे लाने दे पहले उसको नहलाने दे 
बोला पक्षी कातर होकर तू किस किस को नहलाएगा 
गंगा में वजू किया उसने और मैंने भी डुबकी मारी है 
क्या गंगा को नहलाएगा या दूजी गंगा लायेगा 
पानी ,धूप ,हवा और फसले,
पक्षी ,चौपायो  की नस्ले 
इनमे हिन्दू पहचान जरा तय कर दे मुसलमान जरा 
तू लहू का मजहब तय कर दे 
किरणों में अपने रंग भर दे 
सारे ग्रंथो को पढ़ के बता तेरे इश्वर की जाति है क्या 
तू अज्ञानी टोकेगा क्या उड़ने से तू रोकेगा क्या 
प्रकृति जब खेल दिखाएगी 
तू खुद कही उड़ जायेगा 
किस जगह गिरेगा तू जाकर 
क्या तू बतला ये पायेगा 
खुद का तुझको कुछ पता नहीं 
तू दुनिया को क्या साधेगा 
अपनी सांसो का पता नहीं 
तू प्रकृति को क्या बांधेगा 
सबको स्वतंत्र ही जीने दे ये नदिया सूरज सब सबके है 
ये पृथ्वी जंगल और पहाड़ 
सब तूने नहीं बनाये है 
ये इतने थलचर और जलचर 
सब तूने नहीं बसाये है 
इनमे से तू भी एक अदद ये सब है तब ही तू भी है 
ये आसमान भी सबका है ये विधि विधान भी सबका है 
सब तेरे है तू सबका है गर इतना तू पहचान  गया 
तू भी कुछ पल का किस्सा है 
बस इतना ही तू जान गया 
तो अमन चैन छा जायेगा दुनिया खुशहाल बनाएगा 
तो अब बस तू इंसा बन जा नफरत की मत बीन बजा 
आ दुनिया को खुशहाल करे 
बस प्रेम से मालामाल करे ।
तेरी छत या उसकी छत सब झटके में गिर जाती है 
जब पृथ्वी करवट लेती है उसकी छाती फट जाती है 
तू देख चूका तब क्या होता 
सब वही दफ़न हो जाते है 
सब जाति धर्म या धन दौलत 
सब के सब मिट जाते है ।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

टूटा पत्ता

पेड़ से टूटता है पत्ता 
उड़ता है इधर से उधर 
गिरता है जमीन पर 
हरा होता है 
तो 
कोई जानवर खा जाता है 
सूख जाता है 
तो 
रौद दिया जाता है पैरो से 
और 
मिट्टी मे मिल जाता है 
पेड़ से टूटती है डाल 
सूख जाती है कुछ दिन मे 
पतली होती है 
या कमजोर होती है 
तो जला दी जाती है 
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है 
बना दी जाती है 
कुछ न कुछ 
किसी के बैठने को 
या 
सजावट की चीज बन जाती है 
घर से भागने वालो 
और 
इस पत्ते या डाल मे 
क्या फर्क होता है ?
कुछ भी नही न ।

इसीलिए आज बाजार मे हूँ

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

सुनो सुनो सुनो ,
कोई मुझे भी खरीद लो 
जी बिकाऊ हूँ मैं 
जैसा भी हूँ
पर आज बाजार में हूँ 
बाजार का युग है 
इतना खोटा भी नहीं कि 
मेरी कुछ भी कीमत न ही 
बोली तो लगाओ 
कही से तो शुरू करो 
चलो तुम रोटी से शुरू करो 
चुपड़ी नहीं रूखी ही सही 
और तुम कपडे से 
उतरन भी चलेगी 
तुम नीद की जगह दोगे 
पर नीद कौन देगा 
पर बोलो ,जो चाहो बोलो 
इतना सस्ता इमांन कहा मिलेगा 
इतना सस्ता ज्ञान कहा मिलेगा 
और 
आज इंसान कहा मिलेगा 
तो बताओ कौन खरीदेगा मुझे 
जी हा
कसम खुदा की मैं बाजार में हूँ 
खरीद रहे हो बेपनाह हुस्न 
लोगो के इमांन 
लोगो के रहनुमा 
तो मुझमे क्या बुराई है 
इस ईमान से डर लगता है 
या फिर इंसान से डर लगता है 
अरे नहीं 
बिकाऊ है आज ये भी 
कोई तो बोलो 
मेरे इंसान और ईमान को 
कोई तो सिक्को में तोलो 
कोई नहीं बोलोगे 
तो रो पडूंगा मैं बेबसी पर 
फिर 
आंसू तो बिलकूल नहीं खरीदोगे 
अब हुस्न कहा से लाऊँ 
मैं भी दल्ला हो सकता हूँ 
ये कैसे समझाऊँ 
या फिर ये बनी हुयी इमेज 
मिटा के कैसे आऊँ 
तो उसके लिए 
किस लॉन्ड्री में जाऊं ।
कोई तो खरीद लो न मुझे ।
जी हां मैं आज बिकाऊ हूँ 
और 
इसीलिए आज बाजार में हूँ ।
और 
बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

सड़ी लाश

वो जब वो नही रहे-                                                     

उन्होने पढाया था 
हज़ारो को 
इसलिये बस गये थे 
उसी शहर मे 
और
उनकी कविताओ पर 
कितनी तालिया बजती थी 
और
उनके भाषण 
लगता था क्रांती कर देंगे 
और
वो कितना अच्छा अभिनय 
करता था / करती थी 
फिर ये सब गुम हो गये 
किसी ने नही देखा 
उसके दरवाजे की तरफ कभी 
जब वो नही रहे ओह्दो पर 
एक दिन 
जब बदबू परेशान करने लगी 
तब पडोसी परेशान हुये 
और 
शिकायत किया पुलिस को 
तब दरवाजा तोड 
निकाला गया कई दिन की 
सडी लाश को 
उस दिन लोगो ने भी कहा 
और अखबार ने भी लिखा 
कि 
ये वो थे / थी 
ऐसे थे और वैसे थे 
और 
लग गयी गिद्ध निगाहे 
उनके घर पर ।
कितनी कहानियां 
पसरी पडी है चारो ओर 
अपने अपने एवरेस्ट पर होने की 
और 
अज्ञातवास मे मिटने की ।

शुक्रवार, 13 मार्च 2020

होली

मेरी एक पुरानी कविता -

होली नहीं खेलता मै

होली नहीं खेलता मै
बचपन बीतने के बाद से
बचपन कब बीता और मै बड़ा हो गया
पता ही नहीं चला
क्योकि अपने जिनके कारण
हम बचपन पकडे रखना चाहते है
वे हाथ छोड़ झटक देते है बचपन को
साया देने वाले अधिकार को
खैर होली नहीं खेली बहुत साल से
तभी कोई आया हवा का झोंका बनकर
खाली जीवन में और अपने साथ लायी
एक मुट्ठी बदली और
बंजर जमीन पर नम हवा तथा
मुट्ठी भर बदली से निकली फुहार ने
उगा दिए कुछ पौधे
होली मै तब भी नहीं खेलता था
परन्तु रंगों से सराबोर हो जाता था
अच्छा लगता था
किसी का ठठा कर हँसना
खुद रंगा होकर सबको रंग देना
ठहाकों से तथा अपने रंगों से
मेरी बंजर जमीन पर उगे पौधे
जब एक दिन पहले तैयारी करते थे
कपड़ों की रंगों की तथा पिचकारी की
अगले सुबह ही उठकर शरीर पर मलते थे
तेल या क्रीम ,रंगों से बचने को
फिर रंग फेंकते थे ,बचते थे और
खुद रंग भी जाते थे सराबोर
फिर शीशे में खुद को पहचानना और
दूसरों को देख कर ठठा कर हँसना
फिर प्यार से गोद में बैठ कर अपने रंगों
से सराबोर कर  देना मुझे भी
कितना सुखद था ,कितनी ऊर्जा थी
कितना जीवन था ,जीवन का अर्थ था
फिर अचानक बुलावा आ गया किसी का
जहा से आई थी बदली
मै ही भूल गया था बादल आते है
बरसते है ,धरती को नमी देते है
कुछ बारिश रुक जाती है
जीवन बन कर जीवन के कुए में ,
तालाब में या  झील में
और कुछ को सूरज सोख लेता है वापस
और पहुंचा देता है वही हर बूँद को
जहा से उसे दुबारा तय करना होता है सफ़र
इस क्रिया को भूल जाना और
न पकडे जाने वाली चीज को
पकड़ कर रखने की कोशिश ही शायद
संबंध है ,संवेग है और अनबूझ पहेली भी
मै फिर अकेला निहार रहा हूँ
लोगो को होली खेलता होली की बात करता
मैंने भी सन्देश भेज दिया और हो गयी होली
धीरे धीरे मेरे पौधे भी अपनी नयी जमीन
तलाश लेंगे जहा वे विस्तार पा सके
और फिर मेरा भी सफ़र शुरू हो जायेगा
अपनी बदली को ढूढने और
उसमे समाहित हो जाने का  ।

रविवार, 8 मार्च 2020

होली है

आज होली है ,रंग लगाना है, लगालो, अच्छे अच्छे रंग डालो,

ये लाल रंग है ,लहू का भी लाल होता है, फैसला तुम्हारा,

किसी को बचाने के लिए रक्तदान करो या बेगुनाहों का रक्त बहालो,

या रुक जाये हर तरह का रक्तपात ऐसी कोई  व्यवस्था बनालो|

और  आप हरा रंग लाये हो ,लगता है कीचड में नहाये हो,

आओ पूरी धरती को फिर हरा भरा बनाये,हों भरपूर फसलें,

फलों के बगीचे ,फूलो की क्यारी नहीं तों गमले ही लगाये,

और नीला , नीला आसमान नीला समुद्र साफ हो नदियाँ,

साँस लेने लायक हवा ,पीने लायक हो पानी नहीं तों ,

खुद ही मिट जाओगे  तों होली कैसे मानोगे |

पीला है तुम्हारा रंग होली का अपनाओ नया ढंग,

गरीबी और बेबसी के कारण जो बेटी आत्महत्या करने या,

बिकने को तत्पर है ,उसे बचाने का तुम्हे  एक अवसर है,

उसके हाथ पीले कर,कफ़न से बचा लो पीली चुनरी ओढा दो ,                                                                 

जीवन में खुशहाली  और उसके घर में पीली होली सजादो |

तुम काला रंग ही लाये हो या तुम्हारा मन भी है काला ,

अपना  इरादा बतादो ,अपना असली चेहरा तो दिखादो ,

हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं समाज के दुश्मनों पर डालो,

उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,

ये राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ सुभाष का हिंदुस्तान |

काला रंग और काला इरादा लेकर आओगे तों पछताओगे,

रंग के साथ हम खून की होली भी खेलना जानते है,

भूले तों नही ७१ और कारगिल ,अब आओगे तों मिट जाओगे, .

बाहर आसान पर अन्दर छिपे काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,

वे हमारे बीच छिपे ना पहचाने जाने वाले गुलाल और अबीर है,

आओ मिल कर सफाई का पानी डाले ,उन्हें ढूढ़ कर निकाले,

सियार का रंग उतर जायेगा ,समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा |

फिर सभी रंगों को मिला कर इन्द्रधनुषी रंग बनाये,

उसी की होली खेलें, पूरे भारत को वही रंग लगायें,

अपना देश महान होगा जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,

विश्व को रास्ता दिखायेगा फिर विश्व गुरु कहलायेगा,

आओ इन इरादों की चन्दन और रोली लगाओ,

हाथ का खंजर फेंक दो और गले से  लग जाओ | .

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

झाँक मत लेना

देशभक्ति की बात कितनी अच्छी लगती है 
पर फाइलो मे उनकी तुम ताक मत लेना 
वेश्याओ के घर बस बदनाम बहुत है 
पर शरीफो की खिड़कियो मे झाँक मत लेना ।