मंगलवार, 11 मई 2021

नदी में लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

शनिवार, 8 मई 2021

ईश्वर है भी या नही ?

ईश्वर है भी या नही ?

जिनके घर से 
कम हो जा रहे है लोग 
वो पूछ रहे है कि 
हमने क्या बुरा किया था 
या जाने वाले ने क्या किया था 
बता तो दो ईश्वर 
पर ईश्वर है मौन 
हजारो सालो से 
सब तो किया इश्वर को खुश करने को 
फिर भी इतने जुल्म 
तब सवाल पूछते है सब 
कौन सा ईश्वर  
जो कभी नही आया किसी के भी पुकारे 
शायद आया हो किसी युग मे 
और 
पता नही अब है भी या नही 
होता तो क्या ऐसा होता 
होता तो क्या ये सब होता ।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

बेहतर है क़ि आप फिर चले

बंद दरवाज़े के पीछे 
छिपे होते है कितने राज 
कितनी सिसकिया 
और 
कितनी चीखे 
कुछ तो 
निकल ही नही पाती है 
बस घुट कर रह जाती है 
कहने को तो 
सब अपने ही होते है 
पर 
कुछ ऊर्जा देते है 
और 
देते है जीने की तमन्ना 
और 
कुछ गला घोट कर 
मार देते है 
या 
बना देते है मरने जैसा 
बाहर निकल कर 
कितना नकली हंसी हँसते है लोग 
और 
कितनी खोखली होती है उनकी मुस्कराहट 
दर असल इस हंसी मे
एक चीख होती है 
बहुत डरावनी सी             
और 
मुस्कराहट बिल्कुल वही              
जो 
फाँसी पर चढ़ने वाले के
चेहरे पर होती है 
रिश्ते भी कितने 
बोझिल हो जाते है 
जब कोई खुद को
बोझ बना लेता है 
अपने ही ऐतिहासिक
कामो से 
और 
फिर अपने ही वर्तमान से      
क्यो नही जीवन उतना ही हो 
की 
आप ऐश करे अपनी मर्जी का 
और 
फिर छोड दे शरीर 
उसके बाद जीवन का
मतलब भी क्या है 
जब तक आप जरूरी हो
दूनिया और समाज के लिए जिए 
या अपने लिए 
वर्ना क्यो शर्मिंदा हो रोज 
बेहतर है कि आप फिर चले ।

रच देते है कविता

ये जो लोग 
रोज पढते है 
नई किताबे 
रोज लिखते है 
कोई कविता 
गजल या कहानी 
और 
नये नये किस्से भी 
कितने 
सुखी लोग है वो
कितने निश्चिंत 
कितने बेपरवाह 
और 
रच देते है 
रोज कुछ नया
पर 
जो खुद को ही 
जिन्दा रखने 
के जतन मे 
बिता देते है दिन 
वो जिन्दा है 
ये भी तो रचना है ।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

प्रकृति ही ईश्वर

ईश्वर और कोई नहीं 
प्रकृति ही ईश्वर है 

हमने पत्थरों, पेड़ों और 
पशुओं की पूजा की 
जिससे हम डरे उसकी पूजा की  
बाद में लोगों को डराने के लिए 
गढ़ने लगे अपने-अपने ईश्वर 
वह बन गया हमारा हथियार 
अधिकार और व्यापार

कूटरचित माताओं और बाबाओं के 
वेश में फैल गया ईश्वर  
पाखंडियों ने स्वार्थ में 
गली-गली बैठा दिये ईश्वर 
धर्म के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
पाप करो और बहती गंगा में हाथ धो लो
बुरा करो और मानस-पाठ करा लो

कहते हैं पाप बढ़ेगा तो जन्म लेगा ईश्वर 
पर आज के पापियों से डरकर 
कहीं छिप गया है ईश्वर 

हमने काट डाले जंगल
कुपित है प्रकृति
मंदिर-मस्जिद छोड़ो
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला से नाता तोड़ो 
बचने के ठिकाने बनाओ

बन सको तो भगीरथ बनो 
नदियों को बचाओ 
पहाड़ों, जंगलों को बचाओ
आओ, आक्सीजन बढ़ाओ
जानें बचाओ

सन्नाटा

क्या वक्त है 
चारो तरफ 
या तो सन्नाटा है 
या 
सन्नाटा टूटता है 
तो 
आर्द्र स्वर मे जिंदगी
बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है 
गहन सन्नाटा ।

इश्वर क्या है

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

सन्नाटा

क्या वक्त है चारो तरफ या तो सन्नाटा है 
या सन्नाटा टूटता है तो आर्द्र स्वर मे जिंदगी बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है गहन सन्नाटा ।

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? जो अज्ञात है 
या प्रकृति ही ईश्वर है 
पत्थर पेड़ पक्षी को माना ईश्वर
जिससे डरे उसे माना ईश्वर
फिर हम समझदार हो गए 
तो खुद गढ़ने लगे ईश्वर
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने ईश्वर
जीने की इच्छा या मौत का डर है 
जो हथियार बन गया हमारा 
जो व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने न देखा ना मिला ईश्वर 
पर डीह बाबा , सम्मो माई 
संतोषी माता से साई बाबा तक
तमाम पत्थरों मे फैल गया ईश्वर 
फिर इंसानो बनने लगे ईश्वर
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब अज्ञात और दूर था ईश्वर
जबसे चौराहो पर आ गया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
निकाल दिये रास्ते पाप धोने के 
जब एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार लिया था ईश्वर ने 
पर अब इनकी फ़ौज हो गयी 
तो बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो
हवा आज ईश्वर है उसके लिए पेड़
पानी भी,जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
मंदिर मस्जिद नही प्रकृति बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर शक्ति है तो डरो पाप मत करो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियो और जंगल को बचाओ 
देवस्थल नही जीवन स्थलो बनाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

हमारा हुक्म है

हमारा हुक्म है कि 
घर से निकलना मना है 
कोरोना काट लेगा 
हुक्म है 
खिडकी दरवाजे बन्द रखो 
हुक्म की आज निकलो ,
यहा निकलो , वहा निकलो 
रैली हमारी , भाषण हमारा 
कोरोना से मुक्त है ये 
मगर बाकी जगह 
मुह भी खोला तो जेल होगी 
सूइयां सबके लगेगी 
फिर चाहे मरो चाहे जियो 
ये भगवान जाने 
पर कोरोना 
भगवान के बस का नही है 
उसका इलाज तो 
बस पुलिस के पास है 
खबरदार 
जो बाकी जगह बाहर भी निकले ।
हुक्म है कि हुक्मनामा पढते रहो 
हुक्म है कि हुक्म पर चलते रहो ।

माफ करता हूँ तुम्हे

हे 
चलो  
मैं 
तुम्हे 
माफ़ करता हूँ ।
ताकि 
तुम 
दगा दे सको 
और 
छल सको 
बहुतो को 
और 
इस्तेमाल कर 
मार सको 
पीठ में खंजर ।
पर 
तुम तो एक 
खंजर रखते हो 
पर
बहुत से धोखे 
और 
खंजर है 
तुम्हारे सामने भी 
आने वाले 
हम तो 
मजबूत हो चुके 
तुम्हारे घाव से 
पर 
तुम तो 
बहुत कमजोर हो 
अपनी 
कमजोरियों के कारण ।

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

जारी रखते है खोज

ऐसा क्यो होता है अक्सर
कि 
जिस जमीन पर आप 
बुनियाद बनाना चाहते है 
वही दलदल निकल आती है 
और 
धंस जाता है खुद का वजूद 
जिस पेड़ को मजबूत समझ 
छप्पर का आधार बनाना चाहते है 
वही इतना कमजोर निकल जाता है 
कि 
तनिक सा बोझ पडते ही 
लचक जाता है 
और 
सब कुछ जमीदोज हो जाता है 
पहाडी पर चढ़ते वक्त 
पहला ही पत्थर 
कमजोर निकल जाता है 
और 
पहले ही कदम पर घायल कर 
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर 
हिम्मत तब भी नही हारते लोग 
और 
जारी रखते है खोज 
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की 
पूरी तरह लम्बे समय तक 
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की 
और 
पहाडी पर घायल होकर भी 
अन्तिम चोटी तक पहुचने के 
सही मार्ग की ।

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

डमरू मदारी और बन्दर

डमरु मदारी और बंदर 
—————————
इधर कुछ साल पहले तक
पता नहीं क्या हो गया 
कि
मदारी दिखने बंद हो गए थे 
क्या उनको नचाने को 
बंदर नहीं मिल रहे थे ?
या दर्शकों ने 
देखना बंद कर दिया था ?
अब समस्या दूर हो गयी है 
बंदर काफ़ी मिल गये है 
और 
दर्शक तो हमेशा से है ही 
जो तटस्थ है । 
बजा डमरु बजाओ ताली 
बंदरिया 
जी मालिक 
नाच दिखाएगी 
हा दिखाऊँगी 
क्या कह रही है 
पहले पैसे फेंको
अरे अब क्यों रुठी है 
पैसे कम आए 
मेहरबान और फेंको 
फिर तमाशा देखो 
डमरु बजने लगता है 
और 
अभ्यस्त बंदर बंदरिया 
खेला दोहराने लगते है 
वही पुराना वही बासी सा 
फिर भी 
डमरु की आवाज पर 
नाचना ही नियति है 
बंदरों का आज तक ।

शनिवार, 27 मार्च 2021

दोस्त बिला जाते है

हमारे कुछ दोस्त होते है जो बिला जाते है 
जब जब जिंदगी मुश्किलो मे आती है ।

और 

जरा सी जिंदगी मे रौनक तो आने दो 
दोस्तो से मेरा घर भी भर जाएगा  ।

मीठा होता तो आंखे भी इसको पी गयी होती ।

आंखो से निकलता है वो खारा जल होता है 
क्या खारे जल से कोई आंखो को धोता है 

खारा था तो निकल गया कोई खास बात नही 
मीठा होता तो आंखे भी इसको पी गयी होती ।

इन्सान हो तो उट्ठो

चलो हँसते है 
अपनी बेबसी पर 
किसी की सिसकियो पर 
चलो हसते है 
किसी की मौत पर 
किसी की बर्बादियो पर 
चलो हसते है 
उस बेटी की लूटी आबरू  पर 
उस माँ के गये सहारे पर 
चलो हँसते है 
उस बेवा के रूदन पर 
बहन की सूनी कलाई पर 
चली हसते है 
पथराई आंखो पर पिता की 
बच्चों के अंधरे मुस्तकबिल पर 
क्योकी हंसना ही जिंदगी है ।
यही गर फ़लसफ़ा है जिंदगी का 
तो ऐसे फलसफे को गर्त कर दो 
उठ सको तो उठो 
चल सको तो चलो 
वर्ना बस हुंकार भरो 
हर बेबसी और हर रूदन पर 
हर जुल्म पर जो ढाये जा रहे हो 
और 
हर कफन पर 
जो यूँ ही पहनाए जा रहे है ।
अगर इन्सान हो तो उट्ठो 
हर गली से हर खेत 
और खलिहान से उट्ठो 
और चल पडो 
जुल्म खुद ब खुद मिट जायेगा
अंधेरा खुद ब खुद छट जायेगा 
सूरज खुद ही मुस्करायेगा ।
(अभी बन गयी कविता ) किसी का भी संशोधन मान्य ।

गोलिया पैरो मे लगने लगी है

बन्दूके भी अब खुद को छलने लगी है 
गोलिया अब पैरो मे लगने लगी है ।
वो बदमाश गायब था लापता था 
इनाम बढते ही शिनाख्त मिलने लगी है 
इनाम इकराम मिला जान बची दोनो खुश 
ये रिश्तों की गर्मी  पिघलने लगी है । 

शनिवार, 20 मार्च 2021

डरा दो सबको

किसी भी तरह से 
सबको डराओ 
क्योकी 
जो नही डरते 
वो सत्ता के लिए 
खतरा बन जाते है 
और 
डरे हुये लोग 
गुलामी मान लेते है 
बस यूँ ही 
इसलिये ऐसे या वैसे 
कैसे भी 
आवाम को डराओ 
उन्हे जीता जागता 
इन्सान मत रहने दो 
उन्हे 
हांके पर चलने वाली 
भेडे बनाओ 
और फिर जैसा चाहो
वैसा राज चलाओ ।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

ना पहले रुका था ना अब भी रुकूँगा

ना मैं थकूंगा न मैं हरगिज झुकूँगा 
खुशफहमी न पालो नहीं मैं रुकुंगा 
न जाने कितने झंझावातो को देखा 
कितनी कठिन दिन रातो को देखा 
न पहले रुका न अब मैं रुकुंगा
न पहले थका न अब मैं थकूंगा ।
चोटी  पर चढ़ कौन बसता वहां है 
समन्दर में जा कौन रुकता वहां है 
मैं भी सैलानी हूँ मैं क्यों बसूँगा 
मेरा भी सफ़र है मैं क्यों रुकूंगा 
ये जीवन है जब तक चलते ही जाना 
आसमा पर उड़ना जमी पर भी आना 
अंतिम सफ़र आसमा पर बसूँगा 
जमी घूम ली तो यहाँ क्यों रुकूंगा ।
इश्वर होने की ग़लतफ़हमी है तुमको 
मैं इंसा हूँ  खुद पर भरोसा है मुझको 
हैं मेरे पांव अपने मैं उनसे चलूँगा 
न पहले रुक था न अब मैं रुकुंगा
कोई खुद को भगवान माने तो माने 
अपनी सारी शक्ति मुझ पर ही ताने 
ऐसी शक्ति से मैं न हरगिज डरूंगा 
न पहले रुका था न अब मैं रुकुंगा ।

बुधवार, 27 जनवरी 2021

वो हमको मंज़ूर नही

गाना चाहे तो गाइये और मिलकर समूह मे गाइये-

गांधी पर गोली चलवाया वो हमको मंजूर नही 
अंग्रेजो के तलवे चाटे देशभक्तो को जेल भिजवाया वो हमको मंजूर नही 
अंगेजो से माफी मांगी 
अंग्रेजो से पेंशन खाया वो हमको मंजूर नही 
आज़ादी मंजूर न जिनको वो हमको मंजूर नही 
जिसने देश का झन्डा जलाया वो हमको मंजूर नही 
सालो झन्डा ना फहराया वो हमको मंजूर नही 
गाय के नाम पे था मरवाया वो हमको मंजूर नही 
राम के नाम पे दंगा कराया वो हमको मंजूर नही 
आग लगायी घर जलवाया वो हमको मंजूर नही 
तलवारो पर बच्चे उछाले कांच पर बहनो को नचवाया वो हमको मंजूर नही 
श्रीराम का नारा लगाकर बहनो के कपडे नुचवाया वो हमको मंजूर 
इज्जत लूटी और जलाया वो हमको मंजूर नही 
संविधान को नही मानता वो हमको मंजूर नही 
लोकतंत्र को नही जानता वो हमको मंजूर नही 
बेटे बेटी को पिटवाये वो हमको मंजूर नही 
रोटी छीने सब बिकवाये वो हमको मंजूर नही 
नफरत का करोबार फैलाये वो हमको मंजूर नही 
सीमा पर बेटे मरवाए वो हमको मंजूर 
दुश्मन के घर जाये बिना बुलाये वो हमको मंजूर नही 
बिरयानी खाए साड़ी पहुचाये वो हमको मंजूर 
फिर अपने बच्चे मरवाए वो हमको मंजूर नही 
अपनो पे इतने केस लगाये वो हमको मंजूर नही 
आओ मिलकर इन्हे भगाये ये हमको मंजूर 
आओ मिल आवाज लगाये ये हमको मंजूर नही 
फासीवाद से पिण्ड छुड़ाए ये हमको मंजूर नही ।

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

मिल गया चुनांव को राशन

बस रँगते जाओ 
अपनी सोच ,
अपने कर्म , 
अपनी नाक़ामियाँ, 
अपनी अयोग्यता 
और 
दृष्टिहीनता 
और 
उसके नीचे सुलगाते जाओ 
आग नफरत की , 
दंगो की ,चीखों की ।
बस हो गया शासन 
और 
मिल गया चुनांव को राशन 
रंग ही लोकतन्त्र ,
रंग ही संविधान
रंग ही इंसानियत
रंग ही रोटी 
रंग ही कपड़ा 
और 
रंग ही मकान 
और क्या ?

जंग जारी है जमीन की कमीन से

अपनी अपनी किस्मत 
कि 
जिस किसी को गड्ढे से 
या जमीन से 
और 
अंनपहचानेपन से उठा कर 
उंगली पकड़ कर 
कही बैठा दिया 
वही खंजर छुपा कर बैठ गया 
पीठ पर वार करने को 
उसी ने कोशिश की 
कि 
अस्तित्व ही खत्म कर दे 
हमारा 
कितने कमीन मा बाप
और             
शिक्षक रहे होगे 
जिन्होने 
ये शिक्षा दी होगी इन्हे 
पता नही 
कही पहला दाव 
इन्होने अपने मा बाप
और                
शिक्षक पर ही 
आजमाया होगा 
तब 
इतना कमीन बनने
का हुनर आया होगा 
मुझे इनसे घाव खाने का 
इतना चस्का लग गया है 
कि 
मैं खुद को बदलने को तैयार नही 
और 
ये लोग भी कमीनपने की नाव से 
उतरने को तैयार नही 
जंग जारी है लगातार 
कमीन मे और जमीन मे 
दोगलेपन मे और जमीर मे 
मुझे पता है 
मैं फिर हार जाऊंगा 
इनसे 
पर मेरी जिद है 
की 
एक दिन इन्हे हराउंगा ।
शायद 
तब तक दुनिया से
कूच कर जाऊंगा ।

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

मिल गया चुनांव को राशन

बस रँगते जाओ 
अपनी सोच ,
अपने कर्म , 
अपनी नाक़ामियाँ, 
अपनी अयोग्यता 
और 
दृष्टिहीनता 
और 
उसके नीचे सुलगाते जाओ 
आग नफरत की , 
दंगो की ,चीखों की ।
बस हो गया शासन 
और 
मिल गया चुनांव को राशन 
रंग ही लोकतन्त्र ,
रंग ही संविधान
रंग ही इंसानियत
रंग ही रोटी 
रंग ही कपड़ा 
और 
रंग ही मकान 
और क्या ?

रविवार, 3 जनवरी 2021

बेचारा हिरन

कभी कभी 
कोई दर्द
अचानक 
आप को
कितना 
बेचैन कर देता है 
खाने भी नही देता
और 
सोने भी नही देता 
और
कितना जगा देता है 
रात तक 
या 
पूरी रात 
और 
बेचारे निरीह 
उस
हिरन की तरह 
जिसे
बाण लगा हो 
या लगी हो गोली 
और 
वो 
पलट कर 
उसी को 
चाटता है 
अज्ञानता से
बिना जाने 
की 
ये 
उसकी मौत है 
बेचारा हिरन 
और 
बेचारा
अगर 
भावुक इंसान हो 
तो बोली
गोली से ज्यादा 
लगती है न 
कितना दर्द देती है
सहा भी नही जाता 
रहा भी नही जाता ।
खैर 
वेचारा हिरन ।
और बेचारा 
??..????

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

दिल्ली को घेरे गांधी

दिल्ली की सीमाओ पर
गांधी खुद खड़े है
गांधी जी के हत्यारे हत्प्रभ है 
कि 
वो अभी तक जिन्दा कैसे 
और 
फिर मारने की ताक मे है 
गांधी जी से नफरत करने वाले 
उन्हे असफल कर देना चाहते है 
पर गांधी तब नही हारे 
तो 
अब क्या हारेंगे 
जब फैल गये है 
पूरी दुनिया मे 
इंसानियत का सूर्य बन कर 
इन्कलाब की आवाज बन कर 
अहिंसा का मंत्र बन कर 
सत्याग्रह का हथियार बन कर ।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

चल पडूंगा पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ--

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और 
अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और 
अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए 
खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना 
वक्त से
और 
अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और 
बुरी का आहत कर देना 
और 
चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और 
कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और 
कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

नशा गिरने का

उसे ऐसा क्यों लगता है 
कि 
वो गिर गया है 
और 
खुद में एक सवाल बन गया है 
जिसे सुलझाने का कोई यंत्र नहीं 
सुलझाते सुलझाते 
और उलझ जाता है वो 
अपने बनाये सवाल में 
फिर सोचता है कि 
वो अकेला तो नहीं गिरा 
खाई थी तभी तो गिरा 
पर खाई से 
दूरी भी तो हो सकती थी 
कितना दोगला है वो 
वो खुद गिरना चाहता है 
और गिरना चाहता है 
फिर भी 
खुद को धोखा देता है 
शर्मिंदा होने के अभिनय से 
और 
खुद को सवाल बना कर 
गिरना
उसका नशा बन गया गया है 
और 
उसकी नियति भी ।
पर कही तो ठहरेगा 
उस दिन सवाल भी ठहर जायेंगे 
और 
उसके द्वन्द भी ।

शनिवार, 14 नवंबर 2020

क्रांति का ये नया अंदाज होगा

ये देश जागीर है किसकी 
जनता की ,सत्ता की 
या 
पूंजीपति नौकरशाहो की 
तय होना अभी भी बाकी 
बहाता है किसान पसीना 
और 
मोटा हों जाता है बनिया
उसके श्रम पर 
व्यापारी और बिचौलिया 
बहाता है मजदूर पसीना 
और 
तिजोरी भरती इनकी 
सीमा पर मरता जवान है 
और 
सीना नेता का नपता है 
नेता नेता सब जपता है 
आखिर कौन है 
मुल्क का मालिक 
ये सब 
या 
फिर सब ,सारी जनता 
क्यों नहीं मिलता सबको सबका वाजिब हक 
कब बदलेगी 
ये सड़ी व्यवस्था 
और 
सचमुच का लोकतंत्र मिलेगा 
संभव बराबर सब होंगे जब 
समान शिक्षा सबको मिलेगी 
सामान चिकित्सा होगी सबको 
और 
सामान अवसर भी होगा तब
जरूरत है सम्पूर्ण क्रांति की 
गाँधी के रस्ते पर चल कर 
रक्तहीन हो पर समीचीन हो 
फैसलाकुन क्रांति 
कब आएगी 
कौन करेगा 
मैं निकलूं तुम भी निकलो 
सबको ही हम साथ मिला 
चलो हाथ से हाथ मिला ले 
जो शोषक है मिलकर उनको 
इस क्रांति का मर्म बता दे 
हर अंतिम का दर्द दिखा दे 
शायद वो भी समझ ही जाये 
वो भी हमसे हाथ मिलाये
वर्ना हमको तो उठना ही 
हर अंतिम को तो जगना ही 
मुट्ठी भींच अधिकार मांग लो 
हो सबका ही प्यार मांग लो 
वर्ना हक तो लेना ही है 
जिनके पास है देना ही है 
पांच गाँव जब न देता हो 
लड़कर अपना हिस्सा लेना 
पर उसका उसको दे देना 
नयी क्रांति का आगाज होगा 
सबका अपना कल भी होगा 
सबका अपना आज होगा 
क्रांति का ये नया अंदाज होगा

दीपक बन जलते रहना है ।



कहा अकेला हूँ मैं देखो
सूरज चाँद सितारे  मेरे
चिड़ियों का कलरव है मेरा
धूप है मेरी धूल है मेरी
बादल मेरे बारिश मेरी
घर की गर वीरानी मेरी
तो सडंको के शोर भी मेरे
बाज़ारों की हलचल मेरी
और नाचता मोर भी मेरा
छत मेरी दीवारें मेरी
घर में जो है सारे मेरे
बातें मेरी और राते मेरी
वादे मेरे और यादें मेरी
और किसी को क्या चाहिए
इतना तो सब कुछ घेरे है
जीवन क्या है बस डेरा है
आज यहाँ है और कही कल
कुछ साँसों का बस फेरा है
सभी अकेले ही आते है
सभी अकेले ही जाते है
कौन अकेला नहीं यह पर
भीड़ में है पर बहुत अकेले
मैं अकेला घिरा हूँ कितना
इतना सब कुछ पास है मेरे
लोगों के जीवन में देखो
विकट अंधेरे बहुत अंधेरे
उन सबसे तो मैं अच्छा हूँ
जीवन को अब क्या चाहिए
थोड़ी ख़ुशियाँ थोड़ी साँसे
मैं तो अब भी एक बच्चा हूँ
जल्द बड़ा भी हो जाऊँगा
फिर से खड़ा भी हो जाऊँगा
कैसा अकेला कौन अकेला
दूर खड़ा अब मौन अकेला
मेरे गीत और मेरे ठहाके
दूर रुकेंगे कही पे जाके
तब तक तो चलते रहना है
दीपक बन जलते रहना है ।

सोमवार, 9 नवंबर 2020

हिंदुस्तान सब का है ।

दंगे करने कराने वाला
एक छोटा सा तबका है 
अदालत ने कहा है कि 
ये हिंदुस्तान सब का है ।

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

वो अकेले बुजुर्ग पड़ोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी 
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है

वो अकेले बुजुर्ग इंसान

बहुत दिनो क्या सालो से

जानता हूँ उन्हें मैं

और

बहुत अच्छी है उनसे पहचान

पहले उनका घर भरा भरा था

फिर

धीरे धीरे खाली होता चला गया

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे

अचांनक अकेले हो गए वो 
कभी बैठने लगे मेरे साथ

और बताने लगे

अपनी पूरी बात

पहले

उनके पास बहुत लोग आते थे

जब वो कुछ थे

और बहुत लोग

उनकी उंगली पकड़ कर

क्या क्या हो गए

तब तो हालत ये थी

किसी के घर मौत भी

हुयी हो

तो फोन करता था

की आप जल्दी आइये

अर्थी उठने वाली है

आप का ही इन्तजार है

शादी हो या कुछ

कितने लोग बुलाते थे

वो लोग जो कहते थे कि 

आप का ज्ञान रौशनी देता है

और आप के बिना तो

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए

अब कोई नहीं आता 
कोई नहीं बुलाता

सबको बना दिया

पर ये जहा के तहा रह

गए

जब कोई उनका अपना

धोखा देता या

कर देता पीठ पर वार

तो ये रहते थे बहुत दुखी

और बेक़रार

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में

पर

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो

मैने देखा है

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने

पर जब अपने साथ थे

क्या मजाल उनके चेहरे पर

शिकन भी आई हो कभी

लेकिन

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे

जब से अकेले हो गए वो

उनके बच्चे भी चले गए दूर

अपनी अपनी जरूरी वजहों से

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ

बहुत प्यार करते है

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी 

पर मजबूरिया अपनी जगह है

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में

अक्सर देखता हूँ

उन्हें सुबह बाहर निकल कर 
लान से

तुलसी की पत्तियां तोड़ते

बताते है

की उनसे अच्छी चाय

कोई नहीं बना सकता है

सेंक लेते है ब्रेड और

काट लेते है कोई फल

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते

मैंने कहा 
क्यों खुद करते है ये सब

और इस उम्र में

बोले कसरत भी है 
और पैसे की बचत भी

मैंने पुछा की आप को क्या कमी

तो बस मुस्करा कर रह गए

मंगाते है खाना है कभी कभी

शायद दो दिन में एक बार

मैंने पूछा की आप को तो

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी

बोले खाना ज्यादा होता है

और

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है

और

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा

और

नए नए पकवान खाऊंगा

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न

और

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा

कभी कभी बहुत खुश होते है

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर

और सब तैयारी में लगे रहते है

कई दिन तक

फिर जब तक बच्चे साथ होते है

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक

कुछ गुनगुनाते रहते है

और

बच्चो के यहां से आने के बाद भी

कई दिन उदास होते है

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है

बज जाती है तभी घंटी

कौन देखे की कौन है

और 
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है

कभी दूध गर्म करते है

और बाहर कोई आ गया

और दूध गिर जाता है पूरा 
चाय भी

कभी सब्जी जल जाती है

तो कभी रोटी खाक हो जाती है

पुछा की फिर क्या करते है आप

बोले अगर दिन में होता है 
तब तो हो जाता है

पर जब रात में जल जाती है

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना

या अगर ब्रेड है तो वो

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है

और

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है

हल्का हल्का

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना

की मैं भूखा भी सोता हूँ 
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है

परेशांन रहने लगेंगे

उन लोगो के खुश रहने

और मस्त रहने के दिन है

उस दिन बहुत दुखी थे

मैंने पुछा क्या हुआ

बोले

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ

और

फिर जोर से ठठाकर हँसे

और चल दिए

मैंने कहा कहा चले

बोले किसी और को ढूढने

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो

कभी कभी जब बीमार हो जाते है

तो दिखलाई नहीं पड़ते

मिले तो पुछा क्या हो गया था

बोले कुछ नहीं

बताओ और क्या हो रहा है

बहुत कुरेदा

तो बोले मेरा दुःख तो

कोई बाँट नहीं सकता

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख

तो बाँट सकता हूँ

आइये कुछ अच्छी बाते करे

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे

मैंने पुछा आज क्या हुआ

बोले एक चिंता है

मुझे कुछ हो गया तो

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को 
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे

और खुला रखना भी मुश्किल है

और

उनकी आँखों से टपक गया कुछ

बाँध जो रुका था काफी दिनों से

शायद टूटना ही चाहता था

कि

वो इधर उधर देखने लगे

और खांसने लगे

खुद को रोकने को

और मुझे भरमाने को

फिर धीरे से उठ कर चले गए

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ

और

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा 

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव

और

सुनुगा उनका खोखला ठहाका

और फिर मैं भी सर झुका कर

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा

अपने घर की तरफ

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।=================

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

कृष्ण ने कहा सब मरे है

एक मैदान था । 
चारो तरफ 
सैनिक ही सैनिक थे ,
हुँकार थी ,
शोर था 
टंकार थी 
पंर 
सन्नाटा था गहरा 
और 
कृष्ण ने रहस्य खोला 
देखो सब मरे हुए है ।
कुछ ऐसा ही हैं 
बस यूं ही ।

शनिवार, 26 सितंबर 2020

छीन लिया जिन्दगी से जिन्दगी

बारिश की छुवन 

सुबह से हो रही है 
लगातार 
मूसलाधार बारिश 
नही निकला 
मैं घर से आज 
झाँक रहा हूँ 
खिडकी से लगातार 
कभी जाकर 
खड़ा हो जाता हूँ 
दरवाजे पर 
और 
हाथ बाहर निकाल कर 
महसूसता हूँ 
बारिश की छुवन को 
और 
यादो की 
किसी छुवन को भी 
बारिश ने भिगो दिया है 
यादो की चादर को 
कभी कांन मे 
एक आवाज आती है 
अब तो आप को 
गरम हलुवा 
और 
पकौड़ी चाहिये न 
कितने कप बना दूँ 
चाय या काफी 
वरना फिर कहेंगे 
कि 
हलुवा खाते खाते 
और 
उसके बाद कहेंगे 
कि 
पकौड़ी खाते खाते 
ठंडी हो गयी चाय तो !
इसलिए एक बार ही 
बना कर ले आते है 
थर्मस मे 
और 
पकौड़ी आलू की 
या 
और चीजो की भी ? 
चौक कर देखता हूँ 
कांन बेकार हो गये है 
आप के जाने के बाद 
हर वक्त जब तक 
सो नही जाता हूँ 
आप की तमाम आहटे 
पर सच तो 
वैसे 
आप के जाने के बाद 
बेटी ने भी पूरी तरह 
आप का सिखाया निभाया 
जब भी बारिश होती 
वही बरामदा वही कुर्सिया 
और 
वो लेकर आ जाती 
वही सब कुछ
कुछ कुछ वही स्वाद 
खुली आंखो का सपना 
टूट गया 
उठा धीरे से 
डगमगते कदमो से 
और 
बिजली के केतली मे 
गरम कर दिया पानी 
उसमे डाल दिया 
एक रेडीमेड चाय का पाउच 
ले लिया 
एक मुट्ठी मे चना 
और 
आकर बैठ गया हूँ 
बारिश के सामने 
दरवाजा खोल कर 
और 
महसूस कर रहा हूँ 
वही सब 
कितनी यादो के थपेडे 
दस्तक दे रहे है आज ।
बिल्कुल चिंता मत करिये 
हम बहुत अच्छी तरह है
और 
बहुत खुश है ।
देखिये न बारिश मे 
चाय लिए बैठे है 
पकौडे और हलुवा 
अब अच्छा नही लगता 
वरना 
वो भी बना ही लेते ।
आइये 
थोडा बारिश मे भीगा जाये 
नही नही 
नुक्सान कर देगी ये बारिश 
बीमार कर देगी 
एक ही बीमारी क्या कम 
जो छीन ले गयी 
जिन्दगी से जिन्दगी ।

जब तुम थे ना

जब तुम थे 

जब तुम थे न 
सब सुबह उठ जाते थे 
और 
मैं भी अलसाया सा 
पर 
अब तो 
दोपहर हो जाती है 
कइ बार 
जब तुम थे ना 
घर 
कितना साफ रहता था 
रहता तो 
अब भी साफ ही है 
पर 
जब तुम थे न 
तो 
डायनिंग टेबल 
खाली रह्ती थी 
जब तक खाना न लगे 
पर 
अब वो भरी है 
हर उस चीज से 
जिसकी 
मुझे जरूरत होती है 
और 
तुम्हारे बिना 
भूलने का डर रहता है 
जब तुम थे न 
किचेन 
कितना भरा होता था 
तमाम सामान से 
पर 
अब बस चाय की पत्ती 
और 
चीनी 
या 
कुछ 
बहुत दिनो के रखी चीजे 
जब तुम थे न 
सुबह के नाश्ते से 
रात तक 
रोज 
कुछ नया मिलता था 
भूखा 
अब भी नही रहता हूँ मैं 
बस अक्सर 
खाना भूल जाता हूँ 
दोपहर को 
और 
कभी रात मे भी 
जब तुम थे न 
बिस्तर की चादर 
बदल जाती थी 
कितना एस यू एस टी हूँ ना 
कि 
नही बदल पाता हूँ 
काफी दिन तक 
बाकी सब कुछ वही है
जहा तुम छोडकर गये थे 
मैं भी और मेरी आदते भी 
और सब यादे भी 
तुम्हारा तकिया भी 
बिस्तर पर वही रखा है 
बस सुबह उठना 
और 
अपना ध्यान रखना ही 
भूल गया हूँ मैं ।
जब तुम थे न 
अच्छे भले ठहाके गूजते थे 
पता नही क्यो 
सन्नाटा ही सन्नाटा है 
जब तुम थे न 
कितने सक्रिय और 
जीवन्त थे तुम 
पर 
ईश्वर ने दीवार पर 
टांग दिया 
तस्वीर को आधा फ़ाड़ कर ।

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

बहुतो के लिए मेरी लिखी ये कविता ---------------

आप कितने भी मजबूत हो
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या 
नहीं निकल पाए इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के अवरोध को
बना लो 
फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और 
अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को 
पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

रविवार, 6 सितंबर 2020

फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

सत्ता ने कहा
मीडिया से 
थोडा झुक जाओ 
पर 
कुछ घुटने के बल 
चलने लगे 
और 
आधिकतर तो 
लेट कर रेगने लगे ।
और 
इस तरह 
चौथा खम्भा 
लेटकर खुद 
सत्ता के रास्ते की 
पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा 
व्यव्स्थापिका से 
हद मे रहो 
और वो 
संगम की जमुना 
हो गयी 
और कार्यपालिका
रूपी गंगा मे 
विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी 
सरस्वती की तरह 
भीतर भीतर 
घुल-मिल रहा है 
अब 
सब खम्भो की 
जिम्मेदारी 
खुद जनता के 
कन्धो पर है 
क्योकी 
आज़ादी 
मुफ्त मे नही मिलती 
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

बुधवार, 19 अगस्त 2020

वो अकेले बुजुर्ग पड़ोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी 
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है 

वो अकेले बुजुर्ग इंसान 

बहुत दिनो क्या सालो से 

जानता हूँ उन्हें मैं 

और 

बहुत अच्छी है उनसे पहचान 

पहले उनका घर भरा भरा था 

फिर 

धीरे धीरे खाली होता चला गया 

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे 

अचांनक अकेले हो गए वो 
कभी बैठने लगे मेरे साथ 

और बताने लगे 

अपनी पूरी बात 

पहले 

उनके पास बहुत लोग आते थे 

जब वो कुछ थे 

और बहुत लोग 

उनकी उंगली पकड़ कर 

क्या क्या हो गए 

तब तो हालत ये थी 

किसी के घर मौत भी
 
हुयी हो 

तो फोन करता था 

की आप जल्दी आइये 

अर्थी उठने वाली है 

आप का ही इन्तजार है 

शादी हो या कुछ 

कितने लोग बुलाते थे 

वो लोग जो कहते थे कि  

आप का ज्ञान रौशनी देता है 

और आप के बिना तो 

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता 

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए 

अब कोई नहीं आता 
कोई नहीं बुलाता 

सबको बना दिया 

पर ये जहा के तहा रह 

गए 

जब कोई उनका अपना 

धोखा देता या 

कर देता पीठ पर वार 

तो ये रहते थे बहुत दुखी 

और बेक़रार 

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में 

पर 

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो 

मैने देखा है 

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने 

पर जब अपने साथ थे 

क्या मजाल उनके चेहरे पर 

शिकन भी आई हो कभी 

लेकिन 

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे 

जब से अकेले हो गए वो 

उनके बच्चे भी चले गए दूर 

अपनी अपनी जरूरी वजहों से 

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ 

बहुत प्यार करते है 

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी 

पर मजबूरिया अपनी जगह है 

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में 

अक्सर देखता हूँ 

उन्हें सुबह बाहर निकल कर 
लान से 

तुलसी की पत्तियां तोड़ते 

बताते है 

की उनसे अच्छी चाय 

कोई नहीं बना सकता है 

सेंक लेते है ब्रेड और 

काट लेते है कोई फल 

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है 

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है 

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा 

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते 

मैंने कहा 
क्यों खुद करते है ये सब 

और इस उम्र में 

बोले कसरत भी है 
और पैसे की बचत भी 

मैंने पुछा की आप को क्या कमी 

तो बस मुस्करा कर रह गए 

मंगाते है खाना है कभी कभी 

शायद दो दिन में एक बार 

मैंने पूछा की आप को तो 

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी 

बोले खाना ज्यादा होता है

और 

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है 

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है 

और 

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में 

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है 

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे 

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा 

और 

नए नए पकवान खाऊंगा 

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न 

और 

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता 

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा 

कभी कभी बहुत खुश होते है 

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा 

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर 

और सब तैयारी में लगे रहते है 

कई दिन तक 

फिर जब तक बच्चे साथ होते है 

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन 

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक 

कुछ गुनगुनाते रहते है 

और 

बच्चो के यहां से आने के बाद भी 

कई दिन उदास होते है 

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ 

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है 

बज जाती है तभी घंटी 

कौन देखे की कौन है 

और 
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है 

कभी दूध गर्म करते है 

और बाहर कोई आ गया 

और दूध गिर जाता है पूरा 
चाय भी 

कभी सब्जी जल जाती है 

तो कभी रोटी खाक हो जाती है 

पुछा की फिर क्या करते है आप 

बोले अगर दिन में होता है 
तब तो हो जाता है 

पर जब रात में जल जाती है 

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना 

या अगर ब्रेड है तो वो 

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है 

और 

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है 

हल्का हल्का 

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना 

की मैं भूखा भी सोता हूँ 
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है 

परेशांन रहने लगेंगे 

उन लोगो के खुश रहने 

और मस्त रहने के दिन है 

उस दिन बहुत दुखी थे 

मैंने पुछा क्या हुआ 

बोले 

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है 

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ 

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है 

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ 

और 

फिर जोर से ठठाकर हँसे 

और चल दिए 

मैंने कहा कहा चले 

बोले किसी और को ढूढने 

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो 

कभी कभी जब बीमार हो जाते है 

तो दिखलाई नहीं पड़ते 

मिले तो पुछा क्या हो गया था 

बोले कुछ नहीं 

बताओ और क्या हो रहा है 

बहुत कुरेदा 

तो बोले मेरा दुःख तो 

कोई बाँट नहीं सकता 

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख 

तो बाँट सकता हूँ 

आइये कुछ अच्छी बाते करे 

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे 

मैंने पुछा आज क्या हुआ 

बोले एक चिंता है 

मुझे कुछ हो गया तो 

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को 
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे 

और खुला रखना भी मुश्किल है 

और 

उनकी आँखों से टपक गया कुछ 

बाँध जो रुका था काफी दिनों से 

शायद टूटना ही चाहता था 

कि

वो इधर उधर देखने लगे 

और खांसने लगे 

खुद को रोकने को 

और मुझे भरमाने को 

फिर धीरे से उठ कर चले गए 

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग 

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है 

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ 

और 

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा  

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव 

और 

सुनुगा उनका खोखला ठहाका 

और फिर मैं भी सर झुका कर 

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा 

अपने घर की तरफ 

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

कुर्सी और पेड़

क्यों 
इतना अंतर होता है 
कुर्सी और पेड़ में ?
जबकि कुर्सियां भी 
पेड़ो से ही बनती है 
पेड़ देते है छाया 
और 
कुर्सी देती है ताप 
पेड़ देते है हरियाली 
और 
कुर्सी नखलिस्तान 
पेड़ देता है 
साँस लेने को वायु
और 
कुर्सी दम घोट  देती है 
पेड़ देता है फल 
और 
कुर्सी सबका सब खा जाती है 
पेड़ देता है सुखद एहसास
और 
कुर्सी केवल दुःख ही दुःख 
क्यों इतना अंतर होता है 
पेड़ में और कुर्सी में 
जबकि कुर्सियां भी 
पेड़ से ही बनती है 
शायद कभी कोई शोध हो 
और 
कारण पता लगे 
और 
ये अंतर मिट जाये 
कुर्सी और पेड़ का ।

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

एक जंग जारी है

एक जंग जारी है 
अन्दर भी बाहर भी
जब हम सुख भोग रहे होते है 
तन्मयता से
अधिकार और गौरव के नशे के साथ
उस वक्त हम 
रंचमात्र भी नही महसूसते है 
की 
उसी वक्त तैयार हो रहा होता है
किसी दुःख का अनचाहा शिलालेख
उस शिलालेख को देखते है हम अचानक
तब 
ऐसा लगता है सुन्दर स्वप्न देखते देखते
खतरनाक सांप ने जीभ से हमें छू लिया
दुःख और विषाद जब हमें तोड़ रहा होता है
और लगता है की हम जंग हार गए है
अपने ही अस्तित्व को 
स्वीकारने को तैयार नही होते है हम 
उस वक्त भी हमें सबक देकर 
तैयार हो रहा होता है
एक स्वर्णिम भविष्य का सूरज
वह हमें ललकार रहा होता है 
उठ खड़े होने कोऔर कह रह होता है 
की यह पास में ही मै हू
आओ मुझे छू लो ,चाहो तों पा लो
अपनी सामर्थ्य भर,अपनी उत्कंठा भर,
अपने पुरसार्थ भर
मै स्वय तों हू इस कथानक का पात्र
एक जंग के साथ ,
जो भीतर भी है और बाहर भी
की कुछ छण के सुखद सूर्य को 
कैसे और कितना सहेजू
और 
किस तरह बिना सहमे और ठिठके
पार कर जाऊ अन्धेरेपन को
यह जंग लगातार जारी है ,
अन्दर भी और बाहर भी
और 
मै सामने दीवार पार लिखा 
गीता सन्देश वाला चित्र देखकर 
कलम रख देता हूँ
और 
मजबूत कदमो से चल पड़ता हूँ  .

घर या दीवारें

कुछ लोगो को 
कितने लम्बे समय तक कितनी तकलीफ़ो के साथ 
कितना कुछ करना पड़ता है 
एक छोटा सा अपना घर बनाने के लिए ।
फिर एक दिन पता चलता है 
की 
ये तो सिर्फ ईंट गारे की बेजान दीवारे और छत है ।
क्योकी 
घर तो घर वालो से होता है ।

चिट्ठियाँ

जी हाँ 

पहले चिट्ठियां होती थी

सूचना

और

सुख दुःख जानने का साधन

चिट्ठियां भी कई तरह की होती थी

इतना खुला था हमारा जीवन

और हमारा समाज

कि

खुले पोस्ट कार्ड पर

सब कुछ लिख कर भेज देते थे लोग

किसी से कोई धोखा नहीं होता था

क्योकि ये सस्ता होता था

पैसा नहीं होता था लोगो के पास

बस भावनाए और जुडाव होता था

एक चिट्ठी ऐसी भी होती थी

जिस पर टिकेट नहीं लगा होता था

वो भेजने वाले तीन तरह ले लोग होते थे

या तो गरीब रिश्तेदार

या दूर पढ़ रहे छात्र

या फिर वो जो चाहते थे

कि

चिट्ठी हर हालत में मिल जाये उसे

जिसके लिए भेजा है

क्योकि डाक टिकेट का पैसा

उसी से लेना होता था

इसलिए डाकिये की मजबूरी थी

पाने वाले के हाथ में चिट्ठी देना

अंतर्देशीय भी था जो बंद रहता था

पर थोडा महंगा

इसलिए या तो

उसका खर्च वहनं कर कर सकने वाले

लिखते थे इसमें

या फिर कोई गोपनीय बात होने पर

लिखा जाता था ये पत्र

गाँव में तो डाकघर और डाकिया

दोनों वही के होते थे

पर कोई नही झांकता था

किसी के पत्र में

किसी का पत्र तभी पढता था

जब वो खुद पढने को कहता था

रजिस्टर्ड  डाक तो

खैर विरले ही भेजते थे

खास कारणों से

चिट्ठिया भी तरह तरह की होती थी

किसी के कोने पर थोड़ी सी हल्दी का रंग

तो किसी पर लाल रंग

हल्दी किसी शुभ सूचना के लिए

तो लाल रंग

आशिक के दुःख की निशानी था

और ये बताने की कोशिश

की ये खून से लिखा है

गाँव की चिट्ठियों में

सबके हालचाल पूरे गाँव सहित के साथ

गाय बैल उसकी बीमारी

जो बीमार था ठीक हुआ या नहीं

फला गाय या भैस दूध दे रही या नहीं

और कितना दूध दे रही है

कौन कौन पीता है दूध

बाबा भी पीते है या नहीं

और जिसको बच्चा होना है

उसे मिलता है या नहीं

बगीचे का क्या हाल है

कौन कौन सा फल कितना लगा है

किस किस खेत की जुताई हो गयी

किस खेत में पानी लग गया

धन रोपा गया या नहीं

और 

कौन सी फसल कितनी होगी

इत्यादि जरूर होता था

कोई बीमार था गाँव में तो क्या हुआ

किसका इलाज हो रहा है

और मर गया तो कैसे

और

सब सुख दुःख बताने के बाद

और

ये बताने के बाद की फला फला मर गए

सुखा पड़ गया या बाढ़ में सब बह गया

भैस या गाय मर गयी

वो बच्चा पैदा होते ही मर गया

अंत में ये जरूर लिखा होता था

अपना ध्यान रखना 

यहाँ बाकि सब कुछ ठीक ठाक है

पति पत्नी की चिट्ठिया गोपनीय होती थी

इसलिए उनका ब्यौरा भी लिखना ठीक नहीं

सारे आशिक अंत में जरूर लिखते थे

लिखा है ख़त खून से स्याही न समझाना

शहर की चिट्ठिया इतनी मजेदार नहीं होती थी

इसलिए उन पर भी क्या लिखना

हां तार भी होता था

जो बहुत ही भयानक होता था

तार आने का मतलब ही होता था

की कोई जरूर मर गया

तार खोलते वक्त पढने से पहले ही

रोना धोना शुरू हो जाता था घर में

चाहे किसी ख़ुशी को जल्दी से बताने को

भेज दिया हो किसी अपने ने

तार आने की खबर पूरे गाँव में

और

उस समय के शहरी मुहल्लों में भी

बहुत जल्दी फ़ैल जाती थी

और 

लोग मुह लटकाए आने लगते थे

दुःख बांटने

चिट्ठिया सहेज कर राखी जाती थी

किसी कोने में या किसी संदूक में

एक और रिवाज था

चिट्ठी आने पर

पूरे परिवार को इकट्ठा कर पढने का

पढना भी तो 

गाँव में कोई कोई ही जानता था

वही सबकी चिट्ठी बांचता था

अगर दूर रह रहे पति की चिट्ठी

पत्नी के लिए होती थी

तो 

कुछ पढ़ कर कुछ छोड़ देता था

और कह देता था

की बाकी  बात

वो अपनी मेहरारू को बता देगा

और वो आकर बता देगी

तब कुछ ऐसी ही मर्यादाये होती थी

कोई दुःख का समाचार

चिट्ठी बांचने वाले की अचानक

हिलते हुए ओठो और आँखों से

ही पता लग जाता था

क्योकि कुछ पल वो चुप हो जाता था

दुःख दूसरे का था पर सब रोते थे

जसे

पहले लड़की किसी की भी विदा होती थी

पर रोता पूरा गाँव था

फिर रोना पूरा कर वो बांचता था चिट्ठी

कुछ चिट्ठिया 

छुपा कर भी रख देने का रिवाज था

कुछ घर में षड़यंत्र के कारण

और 

कुछ हंसी ठिठोली के लिए

इतिहास में तो चिट्ठियों ने

बड़ी बड़ी क्रांतियाँ करवाई है

तो ज्ञान का प्रसार की किया है

बहुत से जाने मने लोगो की चिट्ठिया

तो आज तक रौशनी का काम करती है

अगर प्रकाशित हो गयी है

या पाण्डुलिपि के तौर पर मौजूद है

क्या होता था जब कोई अपना

कही चला जाता था

तो रोज डाकिये का इन्तजार करना

और

अकसर डाकघर तक चले जाना

पूछने के लिए

की

हमारी कोई डाक है क्या

मिल गयी तो नेमत पाने की ख़ुशी

और नहीं तो उदास होकर लौटना

कितना रोमांच था जिंदगी में

बहुत सी चिट्ठिया

असली भावना का प्रवाह होती थी

मन भी भीग जाता था और भावनाए भी

मेरे पास भी है

सहेज कर रखी हुयी कुछ चिट्ठिया

एक अपने पिता की आखिरी चिट्ठी

और कुछ अपने हमसफ़र की

जिन्हें मैं अक्सर पढता हूँ

अक्श उभर आते है हमेशा उनके

जब भी वो चिट्ठियां पढता हूँ

तो काफी दिन का  दर्द

आँखों के रास्ते बह जाता है

जी हाँ चिट्ठिया क्या होती थी

आज के लोग क्या जाने

और क्या जाने

उनके आने के इन्तजार का मज़ा 

और

उनको बार बार पढने

तथा सहेजने का मज़ा

हो सके तो चिट्ठिया लिखिए

और 

नयी पीढ़ी को लिखना सीखाइए

मोबाइल और फोन अपनी जगह है

और चिट्ठिया अपनी जगह

वाह रे चिट्ठियां

जब लगा था मेरे घर फ़ोन

जब लगा था मेरे घर नया नया फोन

---------------------------------------

एक दिन फोन मंत्री मिल गए

और पूछ लिया घर में फोन है

लागा जैसे कुछ अपराध या हीनता है

घर में फोन नहीं होना

बहुत मुश्किल से मुह से निकला था

नहीं हम कैसे रख सकते है फोन

हम तो साधारण आदमी है 

कहा से देंगे उसका पैसा 

उन्होंने जारी कर दिया एक आदेश

एक कमिटी का सदस्य बनाने का

और जब आयी थी उसकी चिट्ठी 

क्या ख़ुशी थी 

जैसे कितना बड़ा कुछ मिल गया 

पिता जी ने 

कई लोगो को जाकर बताया था 

उसके बारे 

कुछ दिन में लग गया वो लाल रंग का फोन

ये भी उन दिनों खबर थी अख़बार के लिए

जानने वालो और आसपास के मुहल्ले के लिए

मिलने लगी बधाइयाँ और मांगे जाने लगे नंबर

अपने फोन तो शायद ही कभी आते हो

क्योकि अपनों के पास नहीं थे फोन

पर जब पहली बार घंटी बजी 

तो सभी अजीब कशमकश में थे की क्या करे 

पिता जी ने आगे बढ़कर उठाया था चोगा 

बस इतना ही पुछा था कौन साहब है आप 

किसी अपने का फोन था 

पूरा परिवार देख रहा था गर्व से 

किसी आश्चर्यजनक चीज की तरह 

मैंने जब पहली बार उठाया था 

तो उठाने से पहले रटता रहा की हेल्लो कहना है 

पर दूसरो के तमाम फोन आने लगे

और बढ़ गयी थी रौनक घर में

कुछ दिन तो गर्व की अनुभुती होती रही 

पर फिर मुसीबत बन गया फोन 

जब किसी ने बाहर का फोन मिला दिया 

और आ गया बड़ा सा बिल 

उस ज़माने के हिसाब से 

तब ध्यान रखना पड़ता था 

की सभी काल को लाक करके रखना है 

पर 

लोगो के फोन का कोई समय ही नहीं था 

अपनी जिंदगी ही अपनी नहीं रह गयी 

सुबह से रात तक कोई न कोई 

आकार इन्तजार करता था अपने फोन का 

खाना पीना भी मुश्ल्किल 

और अपनी बात करना भी मुश्किल 

जी हा फोन 

मुसीबत का सबब भी था तब फोन  

पर स्टेटस का सिम्बल था 

तो सब कुछ बर्दाश्त करते थे लोग

ट्रंक काल

ट्रंक काल 
---------------
पहले भी होता था फोन 

पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी

सुनते सब थे पास बैठे हुए

बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे

और कार्डलेस भी

पर उससे पहले

लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे

लोगो के यहाँ क्याशहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां होते थे फोन

और

वो बहुत रईस होने की निशानी था

गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी

नहीं था कोई फोन

और बुक करनी होती थी ट्रंककाल

बहुत से लोग बुक करते

और बुक करने को लाइन में लगे होते

पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात

नहीं मिलता था फोन तब

जिसका मिल जाता था

वो विजयी भाव ओढ़ लेता था

और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे

ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का

और दूसरा खाने या सोने चला जाता था

जी हां ट्रंककाल लगना भी तब

इश्वर की कृपा और किस्मत की बात थी

जब मिल जाता था फ़ोन

तो चीखना पड़ता था

की आवाज वहा तक पंहुच जाये

कई बार तो हेलो हेलो आप सुन रहे है न

कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी

कई कई बार में बात हो जाती थी

और नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल

तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल

जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन

और ४ जी तथा ३ जी

उस थ्रिल को बस महसूस कर सकते हो

अतीत में जाकर जरा महसूसो और सोचो 

की अपनो की जिंदगी कितनी मुश्किल थी

ट्रिन ट्रिन

मिल गया मेरा ट्रंक काल

तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

त्यौहार और व्यवहार

त्यौहार और व्यवहार 
————————

जी हां 

त्यौहार अब भी होते है पहले भी होते थे 
अब गरीब है तो 
बस लोगो को को मनाते देख लेता है 
या थोडा बहुत मना भी लेता है 
मध्यम वर्ग है तो दिखावे के लिए 
बजट बिगाड कर भी मनाता है 
उच्च वर्ग है तो कहने ही क्या 
किसी पद पर है तो वो नही मनाता 
लोग मनाते है उसका त्यौहार 
और लोगो के दिए सामानो  से 
भर जाता है घर का कमरा
जिनसे काम है उनके अलावा 
कोई किसी से नहीं मिलता 
अब किसी भी त्यौहार में 
मेसेज है न मन गया त्यौहार 
और 
मान लिया गया उसे ही मिलना 
लोगो का और शुभकामनाओ का 
त्यौहार पहले भी होते थे जो पैसे से नहीं 
भावनाओ से मनाये जाते थे 
गरीब अमीर सब खुद इन्तजाम करते थे 
त्यौहार मनाने का 
इतना फर्क था कि
अमीर के काम नौकर कर देते थे 
पर बाकी सब एक समान थे 
होली हो तो रंग सबके पास था 
और पिचकारी भी चाहे पीतल की ,लोहे की 
नहीं तो बांस को काट कर बनायीं 
गरीब की खुद की 
फूहड़ता नहीं 
बल्कि सबको सबसे मिलने वाले 
आनंद का त्यौहार था होली 
गाँव में तो झुण्ड बना कर निकलते थे सब 
उम्र के हिसाब से 
अपनी अपनी भाभियों से होली खेलने 
गुझिया बनाने में पूरा परिवार जुटता था 
बच्चे भरते और मोड़ते या काटते थे 
माँ बेलती थी तो पिता सेंकते थे गुझिया 
बेईमानी की भी गुंजाइश थी 
किसी किसी गुझिया में 
ज्यादा मावा भर कर खुद खा लेने की 
और सेव झाड़ना सेंकना 
कई दिनों तक चलता था त्यौहार 
दीपावली में पतली डंडियो 
जो आम तौर  पर नरगट 
या अरहर की होती थी 
तीन तीन को इस तरह बांधना 
की उस पर दिया रख सके 
और दरवाजे के सामने उन्हें सजाना 
शहर में पहले तो छोटे छोटे दिए 
और बाद में मोम्बत्तिया आया गयी 
तब भी कई दिन पहले से 
मिठाई जैसी चीजे बनती 
अपने ज्ञान और हैसियत के हिसाब से 
कई दिनों तक तैयारी होती थी 
पर जो तब था और आज नहीं है 
वो था समूह में मनाना या समाज में 
तब फोन और मोबाइल नहीं थे 
तो लोग मोबाइल रहते थे 
खूब मिलते थे एक दूसरे से 
त्यौहार में एक परिवार आकर मिला गया 
तो इसका मतलब ये नहीं की मिलन पूरा हो गया 
अगले दिन ये पूरा परिवार उनके घर जाता था 
और चलता था कई दिनों तक ये क्रम 
और फिर पूरा होता था त्यौहार 
जी हां त्यौहार एक परिवार नहीं 
पूरा समाज मनाता था एक दूसरे के साथ  
जो कही खो गया लील लिया नये ज़माने ने 
औरआर्थिक दिखावा 
हीन भावना पैदा कर देता है आज बहुतो में 
देखा होगा आपने भी 
जब आप बहां रहे होते है सफ़ेद या काला धन 
तो बहुत सी उदास आँखे 
उसे बस टुकुर टुकुर देख रही होती है 
जो पहले के सादे त्योहारों में नहीं होता था 
और तब केवल त्यौहार नहीं 
सच्चा व्यवहार भी होता था

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

हा जीवन इसको कहते है

चाहे तो मेरी ये कविता पढिए -

जिंदगी 

कब होगी पहचान हमारी 

इतने सालो से है दूरी 

क्या मजबूरी 

जिन्दा तो है 

पर क्या सचमुच 

क्या जीवन इसको कहते है 

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू  

नीद नहीं और पेट में हलचल 

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ 

बस अन्धकार है 

क्या जीवन इसको कहते है 

जीवन कब हमको मिलना है 

या फिर ऐसे ही विदा करोगे 

कुछ तो सोचो 

हम दोनों क्या जुदा जुदा है 

कुछ तो बोलो 

और भविष्य के ही पट खोलो 

या फिर कह दो 

हां जीवन इसको ही कहते है | 

जींना है तो हंस कर जी लो 

या फिर दर्द गरल को पी लो 

तेरे हिस्से में बस ये है 

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ 

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ 

चल अब सो जा 

अच्छे सपनो में आज तो खो जा 

कल फिर मुझसे ही लड़ना है 

हां जीवन इसको कहते है |

बुधवार, 5 अगस्त 2020

जहा भी झुका सर

जिसके भी सामने 
झुका ये सर 
वो बस वो ही 
जानता है 
अपना घाव और पीड़ा 
संसद की सीढियो के सामने 
लेटा था कोई 
तब से 
संसद और उसकी परम्पराएं 
सिसक रही है
सुना है कि 
टूटने वाली है 
वह भव्य संसद 
जिसने देखा है 
भारत की आज़ादी का उगता सूरज 
और सारा इतिहास 
अब 
फिर लेट गया कोई 
भारत की आस्था 
और 
विश्वास के सामने ?

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

शनिवार, 25 जुलाई 2020

कुम्भकरण

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकरण है ।