शनिवार, 17 जुलाई 2021

रिश्ते या बुलबुले

छोटे शहरो के 
शहद जैसे रिश्ते 
बड़े शहरो की 
जमीन पाते ही 
कड़वे हो गये
जो फेविकाल से
जुडे लगते थे 
बुलबुले हो गये ।

दीवारे

बहुत ही अपने 
जब संपन्न हो जाते है 
या चढ़ जाते है 
ऊंची पायदाने 
उग आती है 
ऊंची दीवारे 
अपनो के बीच 
रिश्तो मे,भावो मे ।

छोटे शहर और बड़े शहर

वही लोग 
जो छोटे शहरो मे  
कितने घनिष्ट 
और 
कितने अपने लगते है 
क्योकी खूब मिलते है 
सुख और दुख मे 
पर 
बड़े शहर मे आते ही 
बहुत दूर हो जाते है 
और बिला जाते है 
सारे रिश्ते और भावनायें 
नही मिलते सालो साल 
या 
संपन्न ज्यादा हो जाये 
तो 
छोटे शहर मे भी 
दीवारे उग जाती है 
रिश्तो के बीच ।

बुधवार, 14 जुलाई 2021

आसमान कुछ कह रहा है

आसमान कुछ कह रहा है 
अपनी बोली अपनी भाषा में 
ज़रा सुनिए इसका गीत 
इसका संगीत 
कितना मनभावन है 
कितना शीतल है 
इंतज़ार था इसी का 
कितने दिन से 
पृथ्वी को और हमको भी 
कि 
बादल झूम कर आए 
खूब झूम कर गाए 
हम सब झूम कर नहाए 
और पृथ्वी भी तृप्त हो जाए । 


शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

गुरुवार, 17 जून 2021

सो जाओ व्यवस्था की तरह

सो जाओ इस व्यवस्था की तरह:

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ कमरे की 
और मन की भी चिंतन की 
और आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और बारिश में 
लगने दो आग किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत या असबाब 
मुझे क्या मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि कोई चीख सुनाई न पड़े 
और न दिखाई दे बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

बच्चा बन जाइए

घर मे परिवार होता है 
तभी वो घर होता है 
वर्ना तो बेजान दीवारे है
जिनमे आप कैदी है 
पर 
घर मे कोई छोटा सा बच्चा हो 
और 
बन जाइये बच्चा उसके साथ 
वाह 
क्या जिंदगी हो जाती है 
फिर मिल जाती जिंदगी 
और 
बचपन पोंछ देता है सारे गम 
सारी तकलीफे , बीमारी और वेचारगी 
बन गया हूँ मैं बच्चा आजकल 
सचमुच खूब जी रहा हूँ मैं 
भरपूर जी रहा हूँ मैं 
चुरा लेना चाहता हूँ खुशिया 
और इसकी यादे 
अगली बार फिर मिलने तक के लिए ।
आह जिंदगी वाह जिंदगी ।
बच्चा बन कर देखिये 
बच्चो से प्यार करिये 
खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

सो जाओ व्यवस्था की तरह

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ 
कमरे की 
और 
मन की भी 
चिंतन की 
और 
आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि 
छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और 
हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और 
बारिश में 
लगने दो आग 
किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत 
या असबाब 
मुझे क्या 
मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और 
बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि 
कोई चीख सुनाई न पड़े 
और 
न दिखाई दे 
बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब 
मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद 
सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

मंगलवार, 15 जून 2021

प्रकृती को ईश्वर माने

इस दौर मे कितने लोग 
थे हो गये 
कितने नंबर 
अब कभी नही मिलेंगे 
पर 
मिटाने की हिम्मत नही होती 
कि 
शायद फोन आ ही जाये 
कितनो से बात किया 
जो आखिरी थी 
कितनो को चाह कर भी
देख नही पाये 
कितनो को चाह कर भी
कन्धा नही दे पाये 
जी 
ये कहानी सिर्फ मेरी नही
घर घर की है 
जो फैली है
कन्याकुमारी से कश्मीर तक 
कैसे नाची मौत
और 
कितना लाचार कर दिया
मानवता को 
ना भगवान काम आये
ना अल्ला ना ईसा 
ना मंदिर काम आया 
ना मस्जिद ना कोई धर्म
फिर भी लड़े जा रहे है
सब उसके लिये 
जिसे किसी ने देखा नही
जो काम आया नही
इन्सान बन जाये तो
इंसानियत बचेगी 
और 
बचेगी शोध से
आविष्कारो से
और 
प्रकृति की रक्षा से 
इसलिए मानना है तो
प्रकृती को ईश्वर माने 
और 
इन्सान लड़ने के लिये
प्रेम से रहने के लिये है 
ये बात जाने ।

गुरुवार, 3 जून 2021

बारूद बोने वाले किसान

खेतो और बगीचो में 
बारूद बोने वाले 
ये नए किसान 
कहा से आ गए 
इन खेतो और बगीचो में 
यहाँ तो पैदा होती थी फसले 
और 
भरती थी पेट इन्सानों का 
और
होते थे फल मौसम के अनुसार 
और 
पेट भरने के साथ साथ
लड़ते थे इंसान में बीमारियो से 
पर ये पेट क्या पूरा शरीर 
उडा देने वाले 
और साँसे छीन लेने वाले 
मौत बाँटने वाले 
खेतिहर किसने पैदा कर दिया 
इसी समाज में और खेत में
रोकना ही होगा 
इन नए किसानो को 
और बचाना ही होगा
इंसानियत को 
चाहे उसके लिए 
बारूद से इन 
नए बारूद बोने वाले 
किसानो को ही 
क्यों न उड़ा दिया जाये 
इंसानियत बचाने को ।

सोमवार, 24 मई 2021

मगरूर होना चाहता हूं ।

मैं भी 
मगरूर होना चाहता हूं ।
महसूस करना चाहता हूं
रावण के अहंकार को 
अपने अंदर
इसलिए मुझे भी 
कुछ दिन सत्ता दे दो 
हे ईश्वर ।

मंगलवार, 18 मई 2021

गहन सन्नाटा

आप ने कभी
कोई बाँध टूटता हुआ देखा है 
शायद हाँ भी और ना भी 
वैसे ही 
कभी कभी फुट पड़ता है 
इंसान पूरे वेग से 
और बह जाता है 
वर्षो से रुका हुआ पानी 
और फिर 
छा जाता है गहन सन्नाटा ।

मंगलवार, 11 मई 2021

नदी में लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

शनिवार, 8 मई 2021

ईश्वर है भी या नही ?

ईश्वर है भी या नही ?

जिनके घर से 
कम हो जा रहे है लोग 
वो पूछ रहे है कि 
हमने क्या बुरा किया था 
या जाने वाले ने क्या किया था 
बता तो दो ईश्वर 
पर ईश्वर है मौन 
हजारो सालो से 
सब तो किया इश्वर को खुश करने को 
फिर भी इतने जुल्म 
तब सवाल पूछते है सब 
कौन सा ईश्वर  
जो कभी नही आया किसी के भी पुकारे 
शायद आया हो किसी युग मे 
और 
पता नही अब है भी या नही 
होता तो क्या ऐसा होता 
होता तो क्या ये सब होता ।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

बेहतर है क़ि आप फिर चले

बंद दरवाज़े के पीछे 
छिपे होते है कितने राज 
कितनी सिसकिया 
और 
कितनी चीखे 
कुछ तो 
निकल ही नही पाती है 
बस घुट कर रह जाती है 
कहने को तो 
सब अपने ही होते है 
पर 
कुछ ऊर्जा देते है 
और 
देते है जीने की तमन्ना 
और 
कुछ गला घोट कर 
मार देते है 
या 
बना देते है मरने जैसा 
बाहर निकल कर 
कितना नकली हंसी हँसते है लोग 
और 
कितनी खोखली होती है उनकी मुस्कराहट 
दर असल इस हंसी मे
एक चीख होती है 
बहुत डरावनी सी             
और 
मुस्कराहट बिल्कुल वही              
जो 
फाँसी पर चढ़ने वाले के
चेहरे पर होती है 
रिश्ते भी कितने 
बोझिल हो जाते है 
जब कोई खुद को
बोझ बना लेता है 
अपने ही ऐतिहासिक
कामो से 
और 
फिर अपने ही वर्तमान से      
क्यो नही जीवन उतना ही हो 
की 
आप ऐश करे अपनी मर्जी का 
और 
फिर छोड दे शरीर 
उसके बाद जीवन का
मतलब भी क्या है 
जब तक आप जरूरी हो
दूनिया और समाज के लिए जिए 
या अपने लिए 
वर्ना क्यो शर्मिंदा हो रोज 
बेहतर है कि आप फिर चले ।

रच देते है कविता

ये जो लोग 
रोज पढते है 
नई किताबे 
रोज लिखते है 
कोई कविता 
गजल या कहानी 
और 
नये नये किस्से भी 
कितने 
सुखी लोग है वो
कितने निश्चिंत 
कितने बेपरवाह 
और 
रच देते है 
रोज कुछ नया
पर 
जो खुद को ही 
जिन्दा रखने 
के जतन मे 
बिता देते है दिन 
वो जिन्दा है 
ये भी तो रचना है ।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

प्रकृति ही ईश्वर

ईश्वर और कोई नहीं 
प्रकृति ही ईश्वर है 

हमने पत्थरों, पेड़ों और 
पशुओं की पूजा की 
जिससे हम डरे उसकी पूजा की  
बाद में लोगों को डराने के लिए 
गढ़ने लगे अपने-अपने ईश्वर 
वह बन गया हमारा हथियार 
अधिकार और व्यापार

कूटरचित माताओं और बाबाओं के 
वेश में फैल गया ईश्वर  
पाखंडियों ने स्वार्थ में 
गली-गली बैठा दिये ईश्वर 
धर्म के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
पाप करो और बहती गंगा में हाथ धो लो
बुरा करो और मानस-पाठ करा लो

कहते हैं पाप बढ़ेगा तो जन्म लेगा ईश्वर 
पर आज के पापियों से डरकर 
कहीं छिप गया है ईश्वर 

हमने काट डाले जंगल
कुपित है प्रकृति
मंदिर-मस्जिद छोड़ो
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला से नाता तोड़ो 
बचने के ठिकाने बनाओ

बन सको तो भगीरथ बनो 
नदियों को बचाओ 
पहाड़ों, जंगलों को बचाओ
आओ, आक्सीजन बढ़ाओ
जानें बचाओ

सन्नाटा

क्या वक्त है 
चारो तरफ 
या तो सन्नाटा है 
या 
सन्नाटा टूटता है 
तो 
आर्द्र स्वर मे जिंदगी
बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है 
गहन सन्नाटा ।

इश्वर क्या है

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

सन्नाटा

क्या वक्त है चारो तरफ या तो सन्नाटा है 
या सन्नाटा टूटता है तो आर्द्र स्वर मे जिंदगी बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है गहन सन्नाटा ।

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? जो अज्ञात है 
या प्रकृति ही ईश्वर है 
पत्थर पेड़ पक्षी को माना ईश्वर
जिससे डरे उसे माना ईश्वर
फिर हम समझदार हो गए 
तो खुद गढ़ने लगे ईश्वर
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने ईश्वर
जीने की इच्छा या मौत का डर है 
जो हथियार बन गया हमारा 
जो व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने न देखा ना मिला ईश्वर 
पर डीह बाबा , सम्मो माई 
संतोषी माता से साई बाबा तक
तमाम पत्थरों मे फैल गया ईश्वर 
फिर इंसानो बनने लगे ईश्वर
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब अज्ञात और दूर था ईश्वर
जबसे चौराहो पर आ गया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
निकाल दिये रास्ते पाप धोने के 
जब एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार लिया था ईश्वर ने 
पर अब इनकी फ़ौज हो गयी 
तो बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो
हवा आज ईश्वर है उसके लिए पेड़
पानी भी,जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
मंदिर मस्जिद नही प्रकृति बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर शक्ति है तो डरो पाप मत करो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियो और जंगल को बचाओ 
देवस्थल नही जीवन स्थलो बनाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

हमारा हुक्म है

हमारा हुक्म है कि 
घर से निकलना मना है 
कोरोना काट लेगा 
हुक्म है 
खिडकी दरवाजे बन्द रखो 
हुक्म की आज निकलो ,
यहा निकलो , वहा निकलो 
रैली हमारी , भाषण हमारा 
कोरोना से मुक्त है ये 
मगर बाकी जगह 
मुह भी खोला तो जेल होगी 
सूइयां सबके लगेगी 
फिर चाहे मरो चाहे जियो 
ये भगवान जाने 
पर कोरोना 
भगवान के बस का नही है 
उसका इलाज तो 
बस पुलिस के पास है 
खबरदार 
जो बाकी जगह बाहर भी निकले ।
हुक्म है कि हुक्मनामा पढते रहो 
हुक्म है कि हुक्म पर चलते रहो ।

माफ करता हूँ तुम्हे

हे 
चलो  
मैं 
तुम्हे 
माफ़ करता हूँ ।
ताकि 
तुम 
दगा दे सको 
और 
छल सको 
बहुतो को 
और 
इस्तेमाल कर 
मार सको 
पीठ में खंजर ।
पर 
तुम तो एक 
खंजर रखते हो 
पर
बहुत से धोखे 
और 
खंजर है 
तुम्हारे सामने भी 
आने वाले 
हम तो 
मजबूत हो चुके 
तुम्हारे घाव से 
पर 
तुम तो 
बहुत कमजोर हो 
अपनी 
कमजोरियों के कारण ।

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

जारी रखते है खोज

ऐसा क्यो होता है अक्सर
कि 
जिस जमीन पर आप 
बुनियाद बनाना चाहते है 
वही दलदल निकल आती है 
और 
धंस जाता है खुद का वजूद 
जिस पेड़ को मजबूत समझ 
छप्पर का आधार बनाना चाहते है 
वही इतना कमजोर निकल जाता है 
कि 
तनिक सा बोझ पडते ही 
लचक जाता है 
और 
सब कुछ जमीदोज हो जाता है 
पहाडी पर चढ़ते वक्त 
पहला ही पत्थर 
कमजोर निकल जाता है 
और 
पहले ही कदम पर घायल कर 
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर 
हिम्मत तब भी नही हारते लोग 
और 
जारी रखते है खोज 
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की 
पूरी तरह लम्बे समय तक 
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की 
और 
पहाडी पर घायल होकर भी 
अन्तिम चोटी तक पहुचने के 
सही मार्ग की ।

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

डमरू मदारी और बन्दर

डमरु मदारी और बंदर 
—————————
इधर कुछ साल पहले तक
पता नहीं क्या हो गया 
कि
मदारी दिखने बंद हो गए थे 
क्या उनको नचाने को 
बंदर नहीं मिल रहे थे ?
या दर्शकों ने 
देखना बंद कर दिया था ?
अब समस्या दूर हो गयी है 
बंदर काफ़ी मिल गये है 
और 
दर्शक तो हमेशा से है ही 
जो तटस्थ है । 
बजा डमरु बजाओ ताली 
बंदरिया 
जी मालिक 
नाच दिखाएगी 
हा दिखाऊँगी 
क्या कह रही है 
पहले पैसे फेंको
अरे अब क्यों रुठी है 
पैसे कम आए 
मेहरबान और फेंको 
फिर तमाशा देखो 
डमरु बजने लगता है 
और 
अभ्यस्त बंदर बंदरिया 
खेला दोहराने लगते है 
वही पुराना वही बासी सा 
फिर भी 
डमरु की आवाज पर 
नाचना ही नियति है 
बंदरों का आज तक ।

शनिवार, 27 मार्च 2021

दोस्त बिला जाते है

हमारे कुछ दोस्त होते है जो बिला जाते है 
जब जब जिंदगी मुश्किलो मे आती है ।

और 

जरा सी जिंदगी मे रौनक तो आने दो 
दोस्तो से मेरा घर भी भर जाएगा  ।

मीठा होता तो आंखे भी इसको पी गयी होती ।

आंखो से निकलता है वो खारा जल होता है 
क्या खारे जल से कोई आंखो को धोता है 

खारा था तो निकल गया कोई खास बात नही 
मीठा होता तो आंखे भी इसको पी गयी होती ।

इन्सान हो तो उट्ठो

चलो हँसते है 
अपनी बेबसी पर 
किसी की सिसकियो पर 
चलो हसते है 
किसी की मौत पर 
किसी की बर्बादियो पर 
चलो हसते है 
उस बेटी की लूटी आबरू  पर 
उस माँ के गये सहारे पर 
चलो हँसते है 
उस बेवा के रूदन पर 
बहन की सूनी कलाई पर 
चली हसते है 
पथराई आंखो पर पिता की 
बच्चों के अंधरे मुस्तकबिल पर 
क्योकी हंसना ही जिंदगी है ।
यही गर फ़लसफ़ा है जिंदगी का 
तो ऐसे फलसफे को गर्त कर दो 
उठ सको तो उठो 
चल सको तो चलो 
वर्ना बस हुंकार भरो 
हर बेबसी और हर रूदन पर 
हर जुल्म पर जो ढाये जा रहे हो 
और 
हर कफन पर 
जो यूँ ही पहनाए जा रहे है ।
अगर इन्सान हो तो उट्ठो 
हर गली से हर खेत 
और खलिहान से उट्ठो 
और चल पडो 
जुल्म खुद ब खुद मिट जायेगा
अंधेरा खुद ब खुद छट जायेगा 
सूरज खुद ही मुस्करायेगा ।
(अभी बन गयी कविता ) किसी का भी संशोधन मान्य ।

गोलिया पैरो मे लगने लगी है

बन्दूके भी अब खुद को छलने लगी है 
गोलिया अब पैरो मे लगने लगी है ।
वो बदमाश गायब था लापता था 
इनाम बढते ही शिनाख्त मिलने लगी है 
इनाम इकराम मिला जान बची दोनो खुश 
ये रिश्तों की गर्मी  पिघलने लगी है । 

शनिवार, 20 मार्च 2021

डरा दो सबको

किसी भी तरह से 
सबको डराओ 
क्योकी 
जो नही डरते 
वो सत्ता के लिए 
खतरा बन जाते है 
और 
डरे हुये लोग 
गुलामी मान लेते है 
बस यूँ ही 
इसलिये ऐसे या वैसे 
कैसे भी 
आवाम को डराओ 
उन्हे जीता जागता 
इन्सान मत रहने दो 
उन्हे 
हांके पर चलने वाली 
भेडे बनाओ 
और फिर जैसा चाहो
वैसा राज चलाओ ।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

ना पहले रुका था ना अब भी रुकूँगा

ना मैं थकूंगा न मैं हरगिज झुकूँगा 
खुशफहमी न पालो नहीं मैं रुकुंगा 
न जाने कितने झंझावातो को देखा 
कितनी कठिन दिन रातो को देखा 
न पहले रुका न अब मैं रुकुंगा
न पहले थका न अब मैं थकूंगा ।
चोटी  पर चढ़ कौन बसता वहां है 
समन्दर में जा कौन रुकता वहां है 
मैं भी सैलानी हूँ मैं क्यों बसूँगा 
मेरा भी सफ़र है मैं क्यों रुकूंगा 
ये जीवन है जब तक चलते ही जाना 
आसमा पर उड़ना जमी पर भी आना 
अंतिम सफ़र आसमा पर बसूँगा 
जमी घूम ली तो यहाँ क्यों रुकूंगा ।
इश्वर होने की ग़लतफ़हमी है तुमको 
मैं इंसा हूँ  खुद पर भरोसा है मुझको 
हैं मेरे पांव अपने मैं उनसे चलूँगा 
न पहले रुक था न अब मैं रुकुंगा
कोई खुद को भगवान माने तो माने 
अपनी सारी शक्ति मुझ पर ही ताने 
ऐसी शक्ति से मैं न हरगिज डरूंगा 
न पहले रुका था न अब मैं रुकुंगा ।

बुधवार, 27 जनवरी 2021

वो हमको मंज़ूर नही

गाना चाहे तो गाइये और मिलकर समूह मे गाइये-

गांधी पर गोली चलवाया वो हमको मंजूर नही 
अंग्रेजो के तलवे चाटे देशभक्तो को जेल भिजवाया वो हमको मंजूर नही 
अंगेजो से माफी मांगी 
अंग्रेजो से पेंशन खाया वो हमको मंजूर नही 
आज़ादी मंजूर न जिनको वो हमको मंजूर नही 
जिसने देश का झन्डा जलाया वो हमको मंजूर नही 
सालो झन्डा ना फहराया वो हमको मंजूर नही 
गाय के नाम पे था मरवाया वो हमको मंजूर नही 
राम के नाम पे दंगा कराया वो हमको मंजूर नही 
आग लगायी घर जलवाया वो हमको मंजूर नही 
तलवारो पर बच्चे उछाले कांच पर बहनो को नचवाया वो हमको मंजूर नही 
श्रीराम का नारा लगाकर बहनो के कपडे नुचवाया वो हमको मंजूर 
इज्जत लूटी और जलाया वो हमको मंजूर नही 
संविधान को नही मानता वो हमको मंजूर नही 
लोकतंत्र को नही जानता वो हमको मंजूर नही 
बेटे बेटी को पिटवाये वो हमको मंजूर नही 
रोटी छीने सब बिकवाये वो हमको मंजूर नही 
नफरत का करोबार फैलाये वो हमको मंजूर नही 
सीमा पर बेटे मरवाए वो हमको मंजूर 
दुश्मन के घर जाये बिना बुलाये वो हमको मंजूर नही 
बिरयानी खाए साड़ी पहुचाये वो हमको मंजूर 
फिर अपने बच्चे मरवाए वो हमको मंजूर नही 
अपनो पे इतने केस लगाये वो हमको मंजूर नही 
आओ मिलकर इन्हे भगाये ये हमको मंजूर 
आओ मिल आवाज लगाये ये हमको मंजूर नही 
फासीवाद से पिण्ड छुड़ाए ये हमको मंजूर नही ।

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

मिल गया चुनांव को राशन

बस रँगते जाओ 
अपनी सोच ,
अपने कर्म , 
अपनी नाक़ामियाँ, 
अपनी अयोग्यता 
और 
दृष्टिहीनता 
और 
उसके नीचे सुलगाते जाओ 
आग नफरत की , 
दंगो की ,चीखों की ।
बस हो गया शासन 
और 
मिल गया चुनांव को राशन 
रंग ही लोकतन्त्र ,
रंग ही संविधान
रंग ही इंसानियत
रंग ही रोटी 
रंग ही कपड़ा 
और 
रंग ही मकान 
और क्या ?

जंग जारी है जमीन की कमीन से

अपनी अपनी किस्मत 
कि 
जिस किसी को गड्ढे से 
या जमीन से 
और 
अंनपहचानेपन से उठा कर 
उंगली पकड़ कर 
कही बैठा दिया 
वही खंजर छुपा कर बैठ गया 
पीठ पर वार करने को 
उसी ने कोशिश की 
कि 
अस्तित्व ही खत्म कर दे 
हमारा 
कितने कमीन मा बाप
और             
शिक्षक रहे होगे 
जिन्होने 
ये शिक्षा दी होगी इन्हे 
पता नही 
कही पहला दाव 
इन्होने अपने मा बाप
और                
शिक्षक पर ही 
आजमाया होगा 
तब 
इतना कमीन बनने
का हुनर आया होगा 
मुझे इनसे घाव खाने का 
इतना चस्का लग गया है 
कि 
मैं खुद को बदलने को तैयार नही 
और 
ये लोग भी कमीनपने की नाव से 
उतरने को तैयार नही 
जंग जारी है लगातार 
कमीन मे और जमीन मे 
दोगलेपन मे और जमीर मे 
मुझे पता है 
मैं फिर हार जाऊंगा 
इनसे 
पर मेरी जिद है 
की 
एक दिन इन्हे हराउंगा ।
शायद 
तब तक दुनिया से
कूच कर जाऊंगा ।

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

मिल गया चुनांव को राशन

बस रँगते जाओ 
अपनी सोच ,
अपने कर्म , 
अपनी नाक़ामियाँ, 
अपनी अयोग्यता 
और 
दृष्टिहीनता 
और 
उसके नीचे सुलगाते जाओ 
आग नफरत की , 
दंगो की ,चीखों की ।
बस हो गया शासन 
और 
मिल गया चुनांव को राशन 
रंग ही लोकतन्त्र ,
रंग ही संविधान
रंग ही इंसानियत
रंग ही रोटी 
रंग ही कपड़ा 
और 
रंग ही मकान 
और क्या ?

रविवार, 3 जनवरी 2021

बेचारा हिरन

कभी कभी 
कोई दर्द
अचानक 
आप को
कितना 
बेचैन कर देता है 
खाने भी नही देता
और 
सोने भी नही देता 
और
कितना जगा देता है 
रात तक 
या 
पूरी रात 
और 
बेचारे निरीह 
उस
हिरन की तरह 
जिसे
बाण लगा हो 
या लगी हो गोली 
और 
वो 
पलट कर 
उसी को 
चाटता है 
अज्ञानता से
बिना जाने 
की 
ये 
उसकी मौत है 
बेचारा हिरन 
और 
बेचारा
अगर 
भावुक इंसान हो 
तो बोली
गोली से ज्यादा 
लगती है न 
कितना दर्द देती है
सहा भी नही जाता 
रहा भी नही जाता ।
खैर 
वेचारा हिरन ।
और बेचारा 
??..????

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

दिल्ली को घेरे गांधी

दिल्ली की सीमाओ पर
गांधी खुद खड़े है
गांधी जी के हत्यारे हत्प्रभ है 
कि 
वो अभी तक जिन्दा कैसे 
और 
फिर मारने की ताक मे है 
गांधी जी से नफरत करने वाले 
उन्हे असफल कर देना चाहते है 
पर गांधी तब नही हारे 
तो 
अब क्या हारेंगे 
जब फैल गये है 
पूरी दुनिया मे 
इंसानियत का सूर्य बन कर 
इन्कलाब की आवाज बन कर 
अहिंसा का मंत्र बन कर 
सत्याग्रह का हथियार बन कर ।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

चल पडूंगा पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ--

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और 
अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और 
अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए 
खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना 
वक्त से
और 
अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और 
बुरी का आहत कर देना 
और 
चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और 
कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और 
कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

नशा गिरने का

उसे ऐसा क्यों लगता है 
कि 
वो गिर गया है 
और 
खुद में एक सवाल बन गया है 
जिसे सुलझाने का कोई यंत्र नहीं 
सुलझाते सुलझाते 
और उलझ जाता है वो 
अपने बनाये सवाल में 
फिर सोचता है कि 
वो अकेला तो नहीं गिरा 
खाई थी तभी तो गिरा 
पर खाई से 
दूरी भी तो हो सकती थी 
कितना दोगला है वो 
वो खुद गिरना चाहता है 
और गिरना चाहता है 
फिर भी 
खुद को धोखा देता है 
शर्मिंदा होने के अभिनय से 
और 
खुद को सवाल बना कर 
गिरना
उसका नशा बन गया गया है 
और 
उसकी नियति भी ।
पर कही तो ठहरेगा 
उस दिन सवाल भी ठहर जायेंगे 
और 
उसके द्वन्द भी ।

शनिवार, 14 नवंबर 2020

क्रांति का ये नया अंदाज होगा

ये देश जागीर है किसकी 
जनता की ,सत्ता की 
या 
पूंजीपति नौकरशाहो की 
तय होना अभी भी बाकी 
बहाता है किसान पसीना 
और 
मोटा हों जाता है बनिया
उसके श्रम पर 
व्यापारी और बिचौलिया 
बहाता है मजदूर पसीना 
और 
तिजोरी भरती इनकी 
सीमा पर मरता जवान है 
और 
सीना नेता का नपता है 
नेता नेता सब जपता है 
आखिर कौन है 
मुल्क का मालिक 
ये सब 
या 
फिर सब ,सारी जनता 
क्यों नहीं मिलता सबको सबका वाजिब हक 
कब बदलेगी 
ये सड़ी व्यवस्था 
और 
सचमुच का लोकतंत्र मिलेगा 
संभव बराबर सब होंगे जब 
समान शिक्षा सबको मिलेगी 
सामान चिकित्सा होगी सबको 
और 
सामान अवसर भी होगा तब
जरूरत है सम्पूर्ण क्रांति की 
गाँधी के रस्ते पर चल कर 
रक्तहीन हो पर समीचीन हो 
फैसलाकुन क्रांति 
कब आएगी 
कौन करेगा 
मैं निकलूं तुम भी निकलो 
सबको ही हम साथ मिला 
चलो हाथ से हाथ मिला ले 
जो शोषक है मिलकर उनको 
इस क्रांति का मर्म बता दे 
हर अंतिम का दर्द दिखा दे 
शायद वो भी समझ ही जाये 
वो भी हमसे हाथ मिलाये
वर्ना हमको तो उठना ही 
हर अंतिम को तो जगना ही 
मुट्ठी भींच अधिकार मांग लो 
हो सबका ही प्यार मांग लो 
वर्ना हक तो लेना ही है 
जिनके पास है देना ही है 
पांच गाँव जब न देता हो 
लड़कर अपना हिस्सा लेना 
पर उसका उसको दे देना 
नयी क्रांति का आगाज होगा 
सबका अपना कल भी होगा 
सबका अपना आज होगा 
क्रांति का ये नया अंदाज होगा

दीपक बन जलते रहना है ।



कहा अकेला हूँ मैं देखो
सूरज चाँद सितारे  मेरे
चिड़ियों का कलरव है मेरा
धूप है मेरी धूल है मेरी
बादल मेरे बारिश मेरी
घर की गर वीरानी मेरी
तो सडंको के शोर भी मेरे
बाज़ारों की हलचल मेरी
और नाचता मोर भी मेरा
छत मेरी दीवारें मेरी
घर में जो है सारे मेरे
बातें मेरी और राते मेरी
वादे मेरे और यादें मेरी
और किसी को क्या चाहिए
इतना तो सब कुछ घेरे है
जीवन क्या है बस डेरा है
आज यहाँ है और कही कल
कुछ साँसों का बस फेरा है
सभी अकेले ही आते है
सभी अकेले ही जाते है
कौन अकेला नहीं यह पर
भीड़ में है पर बहुत अकेले
मैं अकेला घिरा हूँ कितना
इतना सब कुछ पास है मेरे
लोगों के जीवन में देखो
विकट अंधेरे बहुत अंधेरे
उन सबसे तो मैं अच्छा हूँ
जीवन को अब क्या चाहिए
थोड़ी ख़ुशियाँ थोड़ी साँसे
मैं तो अब भी एक बच्चा हूँ
जल्द बड़ा भी हो जाऊँगा
फिर से खड़ा भी हो जाऊँगा
कैसा अकेला कौन अकेला
दूर खड़ा अब मौन अकेला
मेरे गीत और मेरे ठहाके
दूर रुकेंगे कही पे जाके
तब तक तो चलते रहना है
दीपक बन जलते रहना है ।

सोमवार, 9 नवंबर 2020

हिंदुस्तान सब का है ।

दंगे करने कराने वाला
एक छोटा सा तबका है 
अदालत ने कहा है कि 
ये हिंदुस्तान सब का है ।

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

वो अकेले बुजुर्ग पड़ोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी 
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है

वो अकेले बुजुर्ग इंसान

बहुत दिनो क्या सालो से

जानता हूँ उन्हें मैं

और

बहुत अच्छी है उनसे पहचान

पहले उनका घर भरा भरा था

फिर

धीरे धीरे खाली होता चला गया

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे

अचांनक अकेले हो गए वो 
कभी बैठने लगे मेरे साथ

और बताने लगे

अपनी पूरी बात

पहले

उनके पास बहुत लोग आते थे

जब वो कुछ थे

और बहुत लोग

उनकी उंगली पकड़ कर

क्या क्या हो गए

तब तो हालत ये थी

किसी के घर मौत भी

हुयी हो

तो फोन करता था

की आप जल्दी आइये

अर्थी उठने वाली है

आप का ही इन्तजार है

शादी हो या कुछ

कितने लोग बुलाते थे

वो लोग जो कहते थे कि 

आप का ज्ञान रौशनी देता है

और आप के बिना तो

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए

अब कोई नहीं आता 
कोई नहीं बुलाता

सबको बना दिया

पर ये जहा के तहा रह

गए

जब कोई उनका अपना

धोखा देता या

कर देता पीठ पर वार

तो ये रहते थे बहुत दुखी

और बेक़रार

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में

पर

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो

मैने देखा है

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने

पर जब अपने साथ थे

क्या मजाल उनके चेहरे पर

शिकन भी आई हो कभी

लेकिन

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे

जब से अकेले हो गए वो

उनके बच्चे भी चले गए दूर

अपनी अपनी जरूरी वजहों से

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ

बहुत प्यार करते है

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी 

पर मजबूरिया अपनी जगह है

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में

अक्सर देखता हूँ

उन्हें सुबह बाहर निकल कर 
लान से

तुलसी की पत्तियां तोड़ते

बताते है

की उनसे अच्छी चाय

कोई नहीं बना सकता है

सेंक लेते है ब्रेड और

काट लेते है कोई फल

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते

मैंने कहा 
क्यों खुद करते है ये सब

और इस उम्र में

बोले कसरत भी है 
और पैसे की बचत भी

मैंने पुछा की आप को क्या कमी

तो बस मुस्करा कर रह गए

मंगाते है खाना है कभी कभी

शायद दो दिन में एक बार

मैंने पूछा की आप को तो

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी

बोले खाना ज्यादा होता है

और

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है

और

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा

और

नए नए पकवान खाऊंगा

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न

और

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा

कभी कभी बहुत खुश होते है

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर

और सब तैयारी में लगे रहते है

कई दिन तक

फिर जब तक बच्चे साथ होते है

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक

कुछ गुनगुनाते रहते है

और

बच्चो के यहां से आने के बाद भी

कई दिन उदास होते है

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है

बज जाती है तभी घंटी

कौन देखे की कौन है

और 
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है

कभी दूध गर्म करते है

और बाहर कोई आ गया

और दूध गिर जाता है पूरा 
चाय भी

कभी सब्जी जल जाती है

तो कभी रोटी खाक हो जाती है

पुछा की फिर क्या करते है आप

बोले अगर दिन में होता है 
तब तो हो जाता है

पर जब रात में जल जाती है

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना

या अगर ब्रेड है तो वो

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है

और

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है

हल्का हल्का

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना

की मैं भूखा भी सोता हूँ 
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है

परेशांन रहने लगेंगे

उन लोगो के खुश रहने

और मस्त रहने के दिन है

उस दिन बहुत दुखी थे

मैंने पुछा क्या हुआ

बोले

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ

और

फिर जोर से ठठाकर हँसे

और चल दिए

मैंने कहा कहा चले

बोले किसी और को ढूढने

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो

कभी कभी जब बीमार हो जाते है

तो दिखलाई नहीं पड़ते

मिले तो पुछा क्या हो गया था

बोले कुछ नहीं

बताओ और क्या हो रहा है

बहुत कुरेदा

तो बोले मेरा दुःख तो

कोई बाँट नहीं सकता

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख

तो बाँट सकता हूँ

आइये कुछ अच्छी बाते करे

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे

मैंने पुछा आज क्या हुआ

बोले एक चिंता है

मुझे कुछ हो गया तो

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को 
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे

और खुला रखना भी मुश्किल है

और

उनकी आँखों से टपक गया कुछ

बाँध जो रुका था काफी दिनों से

शायद टूटना ही चाहता था

कि

वो इधर उधर देखने लगे

और खांसने लगे

खुद को रोकने को

और मुझे भरमाने को

फिर धीरे से उठ कर चले गए

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ

और

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा 

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव

और

सुनुगा उनका खोखला ठहाका

और फिर मैं भी सर झुका कर

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा

अपने घर की तरफ

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।=================

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

कृष्ण ने कहा सब मरे है

एक मैदान था । 
चारो तरफ 
सैनिक ही सैनिक थे ,
हुँकार थी ,
शोर था 
टंकार थी 
पंर 
सन्नाटा था गहरा 
और 
कृष्ण ने रहस्य खोला 
देखो सब मरे हुए है ।
कुछ ऐसा ही हैं 
बस यूं ही ।

शनिवार, 26 सितंबर 2020

छीन लिया जिन्दगी से जिन्दगी

बारिश की छुवन 

सुबह से हो रही है 
लगातार 
मूसलाधार बारिश 
नही निकला 
मैं घर से आज 
झाँक रहा हूँ 
खिडकी से लगातार 
कभी जाकर 
खड़ा हो जाता हूँ 
दरवाजे पर 
और 
हाथ बाहर निकाल कर 
महसूसता हूँ 
बारिश की छुवन को 
और 
यादो की 
किसी छुवन को भी 
बारिश ने भिगो दिया है 
यादो की चादर को 
कभी कांन मे 
एक आवाज आती है 
अब तो आप को 
गरम हलुवा 
और 
पकौड़ी चाहिये न 
कितने कप बना दूँ 
चाय या काफी 
वरना फिर कहेंगे 
कि 
हलुवा खाते खाते 
और 
उसके बाद कहेंगे 
कि 
पकौड़ी खाते खाते 
ठंडी हो गयी चाय तो !
इसलिए एक बार ही 
बना कर ले आते है 
थर्मस मे 
और 
पकौड़ी आलू की 
या 
और चीजो की भी ? 
चौक कर देखता हूँ 
कांन बेकार हो गये है 
आप के जाने के बाद 
हर वक्त जब तक 
सो नही जाता हूँ 
आप की तमाम आहटे 
पर सच तो 
वैसे 
आप के जाने के बाद 
बेटी ने भी पूरी तरह 
आप का सिखाया निभाया 
जब भी बारिश होती 
वही बरामदा वही कुर्सिया 
और 
वो लेकर आ जाती 
वही सब कुछ
कुछ कुछ वही स्वाद 
खुली आंखो का सपना 
टूट गया 
उठा धीरे से 
डगमगते कदमो से 
और 
बिजली के केतली मे 
गरम कर दिया पानी 
उसमे डाल दिया 
एक रेडीमेड चाय का पाउच 
ले लिया 
एक मुट्ठी मे चना 
और 
आकर बैठ गया हूँ 
बारिश के सामने 
दरवाजा खोल कर 
और 
महसूस कर रहा हूँ 
वही सब 
कितनी यादो के थपेडे 
दस्तक दे रहे है आज ।
बिल्कुल चिंता मत करिये 
हम बहुत अच्छी तरह है
और 
बहुत खुश है ।
देखिये न बारिश मे 
चाय लिए बैठे है 
पकौडे और हलुवा 
अब अच्छा नही लगता 
वरना 
वो भी बना ही लेते ।
आइये 
थोडा बारिश मे भीगा जाये 
नही नही 
नुक्सान कर देगी ये बारिश 
बीमार कर देगी 
एक ही बीमारी क्या कम 
जो छीन ले गयी 
जिन्दगी से जिन्दगी ।

जब तुम थे ना

जब तुम थे 

जब तुम थे न 
सब सुबह उठ जाते थे 
और 
मैं भी अलसाया सा 
पर 
अब तो 
दोपहर हो जाती है 
कइ बार 
जब तुम थे ना 
घर 
कितना साफ रहता था 
रहता तो 
अब भी साफ ही है 
पर 
जब तुम थे न 
तो 
डायनिंग टेबल 
खाली रह्ती थी 
जब तक खाना न लगे 
पर 
अब वो भरी है 
हर उस चीज से 
जिसकी 
मुझे जरूरत होती है 
और 
तुम्हारे बिना 
भूलने का डर रहता है 
जब तुम थे न 
किचेन 
कितना भरा होता था 
तमाम सामान से 
पर 
अब बस चाय की पत्ती 
और 
चीनी 
या 
कुछ 
बहुत दिनो के रखी चीजे 
जब तुम थे न 
सुबह के नाश्ते से 
रात तक 
रोज 
कुछ नया मिलता था 
भूखा 
अब भी नही रहता हूँ मैं 
बस अक्सर 
खाना भूल जाता हूँ 
दोपहर को 
और 
कभी रात मे भी 
जब तुम थे न 
बिस्तर की चादर 
बदल जाती थी 
कितना एस यू एस टी हूँ ना 
कि 
नही बदल पाता हूँ 
काफी दिन तक 
बाकी सब कुछ वही है
जहा तुम छोडकर गये थे 
मैं भी और मेरी आदते भी 
और सब यादे भी 
तुम्हारा तकिया भी 
बिस्तर पर वही रखा है 
बस सुबह उठना 
और 
अपना ध्यान रखना ही 
भूल गया हूँ मैं ।
जब तुम थे न 
अच्छे भले ठहाके गूजते थे 
पता नही क्यो 
सन्नाटा ही सन्नाटा है 
जब तुम थे न 
कितने सक्रिय और 
जीवन्त थे तुम 
पर 
ईश्वर ने दीवार पर 
टांग दिया 
तस्वीर को आधा फ़ाड़ कर ।

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

बहुतो के लिए मेरी लिखी ये कविता ---------------

आप कितने भी मजबूत हो
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या 
नहीं निकल पाए इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के अवरोध को
बना लो 
फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और 
अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को 
पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

रविवार, 6 सितंबर 2020

फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

सत्ता ने कहा
मीडिया से 
थोडा झुक जाओ 
पर 
कुछ घुटने के बल 
चलने लगे 
और 
आधिकतर तो 
लेट कर रेगने लगे ।
और 
इस तरह 
चौथा खम्भा 
लेटकर खुद 
सत्ता के रास्ते की 
पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा 
व्यव्स्थापिका से 
हद मे रहो 
और वो 
संगम की जमुना 
हो गयी 
और कार्यपालिका
रूपी गंगा मे 
विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी 
सरस्वती की तरह 
भीतर भीतर 
घुल-मिल रहा है 
अब 
सब खम्भो की 
जिम्मेदारी 
खुद जनता के 
कन्धो पर है 
क्योकी 
आज़ादी 
मुफ्त मे नही मिलती 
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।