बुधवार, 21 जून 2023

मंगलवार, 20 जून 2023

औरत आदमी की सरहद

सरहदे तय कर दी घरों की
सरहदे तय कर दी देशों की 
पर सरहद नही तय कर पाए 
औरत और आदमी के रिश्तों की 
जब चाहा ,जहा चाहा 
तोड़ देते है सरहद और सीमाएं ।

शनिवार, 17 जून 2023

दुख भी कुछ होता है

घर की चारदीवारी मे 
कैद रहने पर 
लगता है कितना अकेलापन 
सडक पर निकल पडे  
तो  
दीखने और मिलने लगे 
हजारो लोग अपने ही ।
इसलिये तोड दी दीवार की सीमाये 
निकल पडे  
फिर 
सब जग अपना लगा
शामिल हो गये 
लोगो के दुख मे 
और सुख मे भी 
और 
भूल गये 
की 
दुख भी कुछ होता है

खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

घर मे परिवार होता है 
तभी वो घर होता है 
वर्ना तो बेजान दीवारे है
जिनमे आप कैदी है 
पर 
घर मे कोई छोटा सा बच्चा हो 
और 
बन जाइये बच्चा उसके साथ 
वाह 
क्या जिंदगी हो जाती है 
फिर मिल जाती जिंदगी 
और 
बचपन पोंछ देता है सारे गम 
सारी तकलीफे , बीमारी और वेचारगी 
बन गया हूँ मैं बच्चा आजकल 
सचमुच खूब जी रहा हूँ मैं 
भरपूर जी रहा हूँ मैं 
चुरा लेना चाहता हूँ खुशिया 
और इसकी यादे 
अगली बार फिर मिलने तक के लिए ।
आह जिंदगी वाह जिंदगी ।
बच्चा बन कर देखिये 
बच्चो से प्यार करिये 
खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

शुक्रवार, 16 जून 2023

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

मेरी कविता 

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा  

हा 
मुझे बचपन से गुस्सा आता था 
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से 
मुझे गुस्सा आता था 
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक 
मैं ट्रेन के दरवाजे पर 
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था 
की
भीड़ ज्यादा है तो  
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते 
मुझे गुस्सा आता था जब कोई 
दूसरों के मैले को उठा कर 
सर पर लेकर जाता था 
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर 
किसी को खाना दिया जाता था 
गुस्सा आता था 
जब सायकिल के हैंडिल पर 
दो बाल्टियां 
और 
पीछे कैरियर पर मटका रख 
दो मील दूर पानी लेने जाता था 
शहर में 
गुस्सा आता था 
जब गांव जाने के लिए 
मीलो सर पर बक्सा रख कर 
चलना पड़ता था अंधेरे ने 
गुस्सा आता था 
जब गांव में बिजली भी नही थी 
गुस्सा आता था 
जब पुलिस अंकल किसी को 
बिना कारण बांध कर ले जाते थे 
माँ बहन की गालियां देते हुए 
और 
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था 
पर किसी भी चीज को 
बदल सकने की ताकत नही थी 
इस बच्चे में 
उसके बाद भी 
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज 
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ 
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं 
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था 
पर खुद शिकार हो गया 
हर बात पर जिस पर 
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए 
मुझे तो गुस्सा आता रहा 
और 
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया 
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर 
और 
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया 
पर 
ताली पिटती भीड़ में 
खो गया मेरा गुस्सा 
और में भी खो गया साथ साथ 
पानी पीकर या पानी के बिना 
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा 
संसद हो या मुम्बई 
मेरा गुस्सा सड़क पर आया 
लॉटरी हो या शहादत 
सड़क पर फूटा गुस्सा 
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी 
नही रोक सकी मेरे गुस्से को 
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता 
भी बने मेरे गुस्से के कारण 
मुझे आज भी गुस्सा आता है 
बार बार बदलते कपड़ो पर 
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर 
पिटती विदेश नीति 
और अर्थव्यवस्था पर 
रोज शहीद होते सैनिको पर 
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर 
रोज के बलात्कार पर 
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर 
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर 
इंच इंच में होते अपराध पर 
थाने से तहसील होते हुये 
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर 
भाषणों के खेप पर 
आसमान छूती महंगाई पर 
न जाने कितनी चीजे है 
गुस्सा होने को 
पर अब 
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और 
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता 
और 
आवाज के दबने पर उफान मारता है 
पर 
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद 
और साधारण आवाज 
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर 
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर 
और दीवारों के बीच 
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए 
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी 
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए 
जो मेरे पास नही है 
और 
चाहिए धन काफी धन 
जो मंच सज़ा सके 
,रथ बना सके 
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है 
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने 
कोई कविता या कुछ विचार 
ताकि गुस्सा 
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

मुनादी हो गयी है

मुनादी हो गयी है 

कि 
गाय अब हरगिज न पालें 
अगर पालते है तो सड़क पर 
हरगिज ना निकाले 
फिर भी निकले 
तो जिम्मेदारी आपकी है 
गाय पंर जो भी करेगे
हम करेंगे 
काटेगे या कही पंर बेच देगे
देश मे भी 
कौन खाये या न खाए 
चुनांव देखकर 
उसकी इजाजत हम ही देंगे

मुनादी हो गयी है 
कि 
प्यार पंर पाबंदियां है 
गर भाई और बहन हो 
या हो मियां और बीबी 
तो कागज ले के निकलो 
की दोनो सचमुच वही हो 

मुनादी हो गयी है 
कि 
लोकतंत्र की 
नई परिभाषा पढ़ लो
जान जाओ 
फिर उसी रस्ते पर बढ़ लो  
सत्ता पर कोई उंगली उठाये 
उससे पहले जरा ये जान जाए 
की 
जान का जोखिम बहुत है 
बन्दूक की नली से 
निकलती है सत्ता
ये तो पढ़ा था 
पर सत्ता बंदूक और 
हिंसा से है चलती 
ये भी पढ़ लो

मुनादी हो गयी है 
कि 
कोई अखबार हो या हो टी वी 
सब सत्ता की भाषा ही बोले 
किसी सिद्धांत के बहकावे में आये 
उससे पहले ज़रा ये जान जाए 
कि सत्ता चीज क्या है 
और 
सत्ता का संगठन चौकस खड़ा है 
कुछ भी हो जाए 
तो हमको क्या पता है
वो खुद ही जाने
या फिर बात माने 

मुनादी हो गयी है 
कि
क्या जरूरी है ये इतिहास पढ़ना 
इतिहास अबतक जो भी पढ़ा था 
सब कूड़े से भरा था 
जो हमको देश का दुश्मन बताता 
पढ़ना है तो राष्ट्र गौरव पढ़ो सब 
नया इतिहास 
जो अब हम समझा रहे है 
है वही इतिहास असली 
और 
इतिहासों के पुरोधा भी वही है 
जो जो हम बताए 
जो इनको अब नही मानेगा उसको 
रास्ते पर लाना भी आता हमे है
फिर काहे का गम  
गांधी से कलबुर्गी तक को 
समझा चुके हम 

मुनादी हो गयी है 
कि
ये आज़ादी बेवजह है 
और 
ऐसे लोकतंत्र का भी क्या करोगे 
ये चुनांव भी तो केवल खर्च ही है 
छोड़ो इसको बस हमे ही सत्ता दे दो 
जब तलक ये मुल्क जिंदा है 
और 
जिंदा है लोग कुछ भी 
फिर देखो हम क्या करेंगे 
पर ये अभी हम क्यो बताए 

मुनादी हो गयी है
किअपने मुह सिले सब 
और 
वो हो बोले जो हम बताए 
आंखे बंद कर ले 
और वो ही देखे 
जो हम दिखाए 
कानों में ठूस लो कुछ 
सुनना भी क्या जरूरी 
दिमागों पर भी कोई जोर क्यो दो 
बस उतना जानो 
जितना हम जनाये 

मुनादी हो गयी है 
कि अब सब मांन जाये 
कि सबके हम खुदा है 
सत्य है हम ,न्याय है हम
शास्वत भी हम ही है 

मुनादी हो गयी है 
कि 
अब कोई चित्र हो या बुत बनाये 
पर क्या बनाना है 
पहले हमको बताए 
जो हम कहे फिर वो ही बनाये

मुनादी हो गयी है 
कि 
बुध्द ने कुछ भी कहा हो 
पर 
संघम शरणं गच्छामि 
के अब नए मतलब समझ लो 
अब हम पर 
उंगली उठाना द्रोह होगा 
फिर नही कहना कि 
तुमने क्या है भोगा
मुनादी हो गयी है ।

गुरुवार, 15 जून 2023

आत्महत्या

आत्महत्या 

अच्छा चढ़ गए कुर्सी या स्टूल पर 
बाँध लिया पंखे मे रस्सी 
फिर थोडी दे रुके थे क्या 
पंखे मे रस्सी बाँधने से पहले ?
कुछ रुक कर सोचा क्या 
और जब बांधा था 
या गले मे डाली थी रस्सी 
तो आँखे नम थी क्या 
या बह रहा था पनाला आंखो से
फिर कैसे कसा होगा गले मे 
उस वक्त क्या था मन मे 
मां पिता भाई बहन कोई दोस्त 
या प्रेमिका या सिर्फ़ गुस्सा 
पर किससे ? खुद से या ?
पर एक पल भी नही आया ख्याल 
बहुत अपनो काया फिर अपना ?
बहुत नशे मे थे क्या 
की कुछ होश ही नही था 
या फिर मौत खुद नशा बन गई थी
उस पलायन के वक्त  
कसा था फंदा तो विचलित हुये क्या 
अच्छा सच सच बताओ 
अन्तिम विचार क्या आया था मन मे 
माँ की चीखे सुनाई पडी क्या 
और टूटा हुआ पिता और भी सब 
सचमुच वाले अपने 
अच्छा जब सरका दिया स्टूल 
और झूल गये पर मरे नही थे 
क्या तब मन मे आया 
काश अब बच जाते 
वो अन्तिम इच्छा क्या थी 
कायर कही के 
तुम पैदा ही क्यो हुये 
जब लड़ नही सकते थे 
जीवन के लिए जीवन से 
अपने पिता अपनी माँ 
और अपनो के लिए खुद से ।

बेटियाँ

बेटियाँ 

घर से जाते जाते भी 
पापा की           
कितनी चिंता करती है
बेटियाँ 
की 
क्या कहा रखा है ,
क्या क्या 
कैसे कैसे 
कर लीजियेगा ,
क्या खा लीजियेगा                
इत्यादि इत्यादि ।
मन और आंखे 
भिगो देती है बेटियाँ 
और 
खुद पर 
पता नही कैसे 
काबू रख पाती है 
बेटियाँ 
या फिर 
आंखे छुपा लेती है 
बेटियाँ ।

इस दौर मे कितने लोग थे हो गये

इस दौर मे कितने लोग 
थे हो गये 
कितने नंबर 
अब कभी नही मिलेंगे 
पर 
मिटाने की हिम्मत नही होती 
कि 
शायद फोन आ ही जाये 
कितनो से बात किया 
जो आखिरी थी 
कितनो को चाह कर भी
देख नही पाये 
कितनो को चाह कर भी
कन्धा नही दे पाये 
जी 
ये कहानी सिर्फ मेरी नही
घर घर की है 
जो फैली है
कन्याकुमारी से कश्मीर तक 
कैसे नाची मौत
और 
कितना लाचार कर दिया
मानवता को 
ना भगवान काम आये
ना अल्ला ना ईसा 
ना मंदिर काम आया 
ना मस्जिद ना कोई धर्म
फिर भी लड़े जा रहे है
सब उसके लिये 
जिसे किसी ने देखा नही
जो काम आया नही
इन्सान बन जाये तो
इंसानियत बचेगी 
और 
बचेगी शोध से
आविष्कारो से
और 
प्रकृति की रक्षा से 
इसलिए मानना है तो
प्रकृती को ईश्वर माने 
और 
इन्सान लड़ने के लिये नही 
प्रेम से रहने के लिये है 
ये बात जाने  ।

शुक्रवार, 9 जून 2023

इंसान से अच्छा तो कांच है

इंसान से अच्छा तो कांच है 
जब टूटता है 
तो आवाज तो आती है 
और 
उफ़ निकली है 
किसी की 
कोई दौड़ता है उधर 
कि क्या टूट गया 
आवाज तो थी 
पर किसके टूटने की 
और 
इंसान टूट जाता है 
बुरी तरह 
चूँकि कोई आवाज 
नहीं आती 
तो कोई नहीं दौड़ता 
उसकी तरफ 
उसका टूटना 
उसके चेहरे पर 
उभर आता है 
पर किसके पास है वक्त 
की चेहरे देखता रहे 
और 
रख दे पीठ पर हाथ सहारे को 
और 
सहला दे इतनी गहरी 
चोट को 
हा इंसान से अच्छा 
और 
खुशकिस्मत तो कांच है ।

शनिवार, 3 जून 2023

ये बारूद वाले किसान

मेरी कविता --

खेतो और बगीचो में 
बारूद बोने वाले 
ये नए किसान 
कहा से आ गए 
इन खेतो और बगीचो में 
यहाँ तो पैदा होती थी फसले 
और 
भरती थी पेट इन्सानों का 
और
होते थे फल मौसम के अनुसार 
और 
पेट भरने के साथ साथ
लड़ते थे इंसान में बीमारियो से 
पर ये पेट क्या पूरा शरीर 
उडा देने वाले 
और साँसे छीन लेने वाले 
मौत बाँटने वाले 
खेतिहर किसने पैदा कर दिया 
इसी समाज में और खेत में
रोकना ही होगा 
इन नए किसानो को 
और बचाना ही होगा
इंसानियत को 
चाहे उसके लिए 
बारूद से इन 
नए बारूद बोने वाले 
किसानो को ही 
क्यों न उड़ा दिया जाये 
इंसानियत बचाने को ।

शनिवार, 27 मई 2023

आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है 

जीवन में आती है तो जीवन बिगाड़ देती है ।

इतना मत इतराओ अपने दौड़ने पर यारो

ये आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

चलते ही जाना चलते ही जाना है ।

एक कविता आप सभी के लिए --

पांव है थके थके पर दूर बहुत जाना है 

पर चलने की उमंग है मन में उत्साह है  

चलना ही जीवन है रुक जाना अंत है 

चल रहा हूँ मै लेकिन रास्ता अनंत है ।

जीवन संघर्ष है, पहाड़ की चढ़ाई है 

अपने पुरसार्थ क़ी ह़ी ये कमाई है 

चलना है,रुकना नहीं चलते ही जाना है ।

रास्ते  में कांटे हो, जंगल हो, पहाड़ हो 

रास्ते में बाधा कोई सिंह की दहाड़ हो 

चलते ही जाना है चलते ही जाना है  ।

आते है तो रोते हुए और सब हंसते है 

रास्ते में कभी मौन,हंसना भी रोना भी 

जाते हुए मौन खुद, बाकी सब रोते है 

कौन परवाह करे हंसने की रोने की 

मंजिल को पाना है चलते ही जाना है ।

मंजिल नहीं मंजिलें है जैसे हो सीढियाँ 

हौसले बनाये रख कदम कदम चलना है 

चलते ही जाना है चलते ही जाना है ।

रास्ता दिखाया था बड़ों ने आगे कभी 

वो तो चले गए अपनी अनंत यात्रा पर 

अब आगे चलना है रास्ता दिखाना है 

पीछे है हमारे जो उन्हें रास्ता बताना है 

मंजिलें दिखाना उन्हें काँटों से बचाना है 

यही है कर्त्तव्य बस यही वो आयाम है 

अपनों को धीरे धीरे वाम पर पहुँचाना है 

चलते हमें जाना है चलते हमें जाना है ।

गिरे, उठे ,चल दिए, पार की खाइयाँ 

लडखडाये फिसले भी पार की पहाड़ियां 

काँटों के चुभने की कभी परवाह नहीं 

बहुत तेज गिरे भी पर निकली आह नहीं  

पैर हो जमीन पर अहंकार दूर रहे 

किसको परवाह तब कौन कौन क्या कहे 

बस यही सत्य है ,यही विकल्प है और संकल्प है

सारे सोपानों को ,मंजिलों को पाना है 

एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है 

चलते ही जाना है चलते ही जाना चलते ही जाना है ।

गुरुवार, 18 मई 2023

कोई नही है कोई नही है कोई नही है

अपनी चाहत अपनी तमन्ना बस उनकी है 
इसमें अपना कुछ भी नही है
ये उनको बतलाए कौन
कोई नही है कोई नही है कोई नही है 
अपने आंसू ,अपनी तडपन बस अपना है 
इसमें उनका कुछ भी नही है 
मेरा दर्द दिखाए कौन 
कोई नही है कोई नही है कोई नही है 
किसको जाकर गीत सुनाऊं 
किससे अपना मन बहलाऊ 
किसको दामन चाक दिखाऊं 
कोई नही है कोई नही कोई नही है 
उनको ये सब बतलाए कौन
उनको पता बताए कौन 
या उनके घर पहुंचाए कौन 
कोई नही है कोई नही है कोई नही है 

( बाद में पूरा करने की कोशिश करता हूं)

बुधवार, 17 मई 2023

बांध का टूटना

आप ने कभी
कोई बाँध टूटता हुआ देखा है 
शायद हाँ भी और ना भी 
वैसे ही 
कभी कभी फूट पड़ता है 
इंसान पूरे वेग से 
और बह जाता है 
वर्षो से रुका हुआ पानी 
और फिर 
छा जाता है गहन सन्नाटा ।

फट न जाये अस्तित्व ही ।

चाहे तो दमघोटू कविता पढ़िए ----

क्या कभी आपने महसूसा है 
की 
बाहर घनघोर सन्नाटा हो 
और 
अंदर दमघोटू और इतना शोर 
की 
लगता है नसे ही नही 
शरीर की कोशिकाएँ भी 
फट पड़ेंगी 
नही हो सकती इससे बड़ी सज़ा 
फांसी में 
एक झटके से मुक्ति मिल जाती हैं 
और 
अजीवन कारावास में भी 
लोगो का साथ 
पर ऐसी सज़ा कल्पनातीत है 
पता नही 
किसी को इस सज़ा का एहसास है 
या नही 
इससे ज्यादा लिखा नही जा सकता 
इस विषय पर 
जेल से भी पेरोल मिल जाती है 
जिंदगी में भी 
कोई पेरोल की व्यवस्था हो सकती है 
कौन मुक्ति देगा इससे 
मुक्ति मिलेगी भी या नही ।
या 
सन्नाटा और 
अथाह लहू में बहता शोर 
साथ साथ चलते रहेंगे 
जब तक 
फट न जाये अस्तित्व ही ।

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा  

हा 
मुझे बचपन से गुस्सा आता था 
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से 
मुझे गुस्सा आता था 
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक 
मैं ट्रेन के दरवाजे पर 
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था 
की
भीड़ ज्यादा है तो  
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते 
मुझे गुस्सा आता था जब कोई 
दूसरों के मैले को उठा कर 
सर पर लेकर जाता था 
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर 
किसी को खाना दिया जाता था 
गुस्सा आता था 
जब सायकिल के हैंडिल पर 
दो बाल्टियां 
और 
पीछे कैरियर पर मटका रख 
दो मील दूर पानी लेने जाता था 
शहर में 
गुस्सा आता था 
जब गांव जाने के लिए 
मीलो सर पर बक्सा रख कर 
चलना पड़ता था अंधेरे ने 
गुस्सा आता था 
जब गांव में बिजली भी नही थी 
गुस्सा आता था 
जब पुलिस अंकल किसी को 
बिना कारण बांध कर ले जाते थे 
माँ बहन की गालियां देते हुए 
और 
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था 
पर किसी भी चीज को 
बदल सकने की ताकत नही थी 
इस बच्चे में 
उसके बाद भी 
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज 
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ 
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं 
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था 
पर खुद शिकार हो गया 
हर बात पर जिस पर 
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए 
मुझे तो गुस्सा आता रहा 
और 
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया 
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर 
और 
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया 
पर 
ताली पिटती भीड़ में 
खो गया मेरा गुस्सा 
और में भी खो गया साथ साथ 
पानी पीकर या पानी के बिना 
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा 
संसद हो या मुम्बई 
मेरा गुस्सा सड़क पर आया 
लॉटरी हो या शहादत 
सड़क पर फूटा गुस्सा 
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी 
नही रोक सकी मेरे गुस्से को 
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता 
भी बने मेरे गुस्से के कारण 
मुझे आज भी गुस्सा आता है 
बार बार बदलते कपड़ो पर 
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर 
पिटती विदेश नीति 
और अर्थव्यवस्था पर 
रोज शहीद होते सैनिको पर 
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर 
रोज के बलात्कार पर 
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर 
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर 
इंच इंच में होते अपराध पर 
थाने से तहसील होते हुये 
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर 
भाषणों के खेप पर 
आसमान छूती महंगाई पर 
न जाने कितनी चीजे है 
गुस्सा होने को 
पर अब 
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और 
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता 
और 
आवाज के दबने पर उफान मारता है 
पर 
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद 
और साधारण आवाज 
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर 
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर 
और दीवारों के बीच 
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए 
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी 
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए 
जो मेरे पास नही है 
और 
चाहिए धन काफी धन 
जो मंच सज़ा सके 
,रथ बना सके 
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है 
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने 
कोई कविता या कुछ विचार 
ताकि गुस्सा 
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

रविवार, 14 मई 2023

घुमन्तू

आपने क्या ये नाम सुने है और इन लोगो को देखा है ? 
घुमन्तूआपने क्या ये नाम सुने है और इन लोगो को देखा है ? 
घुमन्तू, लोहा पीटना, खानाबदोश इत्यादि इत्यादि 
इन सभी के पास या तो घर नही होता 
या 
घर के चूल्हे जलाने का साधन नही होता 
पर 
कुछ ऐसे लोग भी होते है 
जिनके पास घर भी होता है 
और घर चलाने का साधन भी होता है 
पर
वो शामिल हो जाते है इन वर्गों में 
और बेचैनी से कभी यहा ,कभी वहाँ मंडराते रहते है 
ऐसे लोगो को क्या नाम दे ? 
शब्दो के चितेरे कोई नाम दे । लोहा पीटना, खानाबदोश इत्यादि इत्यादि 
इन सभी के पास या तो घर नही होता 
या 
घर के चूल्हे जलाने का साधन नही होता 
पर 
कुछ ऐसे लोग भी होते है 
जिनके पास घर भी होता है 
और घर चलाने का साधन भी होता है 
पर
वो शामिल हो जाते है इन वर्गों में 
और बेचैनी से कभी यहा ,कभी वहाँ मंडराते रहते है 
ऐसे लोगो को क्या नाम दे ? 
शब्दो के चितेरे कोई नाम दे ।

शुक्रवार, 12 मई 2023

सज़ा हुआ घर

सज़ा हुआ घर 
कितना अच्छा लगता है 
पर 
जब आओ कराते है 
मरम्मत और रंग रोगन 
और 
बिखर जाता है सब कुछ 
कितना बदसूरत लगने लगता है 
अपना ही घर 
ऐसे ही इन्सानो के चेहरे 
और चारित्र होते है 
जब तक ढके है 
तो क्या लगते है वाह 
पर 
ज्यो ही 
प्याज के छिलके की तरह 
उतरने लगती है परते 
और 
निकल आता है 
अंदर का सच 
कितना भयावह लगता है 
सब कुछ ।
किसी ने लिखा तो है 
कि 
हर आदमी मे होते है दो चार आदमी ।

बुधवार, 10 मई 2023

मौत और अकेलापन

मेरी कविता ,
इसे केवल कविता समझ कर ही पढे कृपया -

मौत और अकेलापन 
________________
मौत कितनी 
खूबसूरत चीज होती है 
हो जाता है 
सब कुछ शांत शांत 
गहरी नींद 
तनावमुक्त ,शांत शांत 
न किसी का लेना 
न किसी का देना 
कोई भाव ही नही 
कोई इच्छा ही नही 
न डर ,न भूख ,न छल 
न काम न क्रोध 
बस शांति ही शांति 
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा 
और सब देख रहे है 
न रोटी की चिंता 
न बेटे और बेटी की 
न घर की चिंता 
न बिजलो और पानी की 
न बैंक की चिंता 
न टैक्स जमा करने की 
न काम की चिंता 
और न किसी छुट्टी की 
न किसी खुशी की चिंता 
न किसी की नाराजगी की 
निर्विकार ,स्थूल 
हल्का हल्का सब कुछ 
देखो 
कितना सपाट हो गया है चेहरा 
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को 
गजब का तेज लग रहा है 
बहुत कुछ है खूबसूरत 
पर मौत से तो कम 
और मुझे तो 
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन 
सन्नाटा ही सन्नाटा 
कोई आवाज ही नही 
खुद की सांसो के सिवाय 
कोई भी नही खुद के सिवाय 
पंखे के आवाज तो 
कभी कभी फोन की 
और 
हा दब गया रिमोट 
तो टी वी की भी आवाज 
तोड़ देती है सन्नाटा 
और 
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर 
गजब का मुकाबला है 
मौत और अकेलेपन का 
हा
एक फर्क तो है दोनो में 
मौत खूबसूरत होती है 
पर अकेलापन बदसूरत 
मौत शांत होती है 
पर अकेलापन 
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में 
लौट कर किसी ने नही बताया 
उसका अनुभव 
पर 
अकेलेपन को तो 
मैं जानता भी हैं 
और पहचानता भी हूँ 
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है 
और 
अकेलेपन का अंत मौत । 
इसलिए 
मौत से डरो मत उसे प्यार करो 
अकेलेपन से हो सके तो भागो 
और 
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।

नदी में तैरती लाशें

मेरी कविता 

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

सोमवार, 8 मई 2023

ईश्वर है भी या नही ?

ईश्वर है भी या नही ?

जिनके घर से 
कम हो जा रहे है लोग 
वो पूछ रहे है कि 
हमने क्या बुरा किया था 
या 
जाने वाले ने क्या किया था 
बता तो दो ईश्वर 
पर ईश्वर है मौन 
हजारो सालो से 
सब तो किया
ईश्वर को खुश करने को 
फिर भी इतने जुल्म 
तब सवाल पूछते है सब 
कौन सा ईश्वर  
जो कभी नही आया
किसी के भी पुकारे 
शायद आया हो किसी युग मे 
और 
पता नही अब है भी या नही 
होता तो क्या ऐसा होता 
होता तो क्या ये सब होता ।

शुक्रवार, 5 मई 2023

फ़्रीडम इज़ नाट फ़्री

#फ़्रीडम_इस_नाट_फ़्री —-

सत्ता ने कहा मीडिया से 
थोडा झुक जाओ 
पर कुछ घुटने के बल चलने लगे 
और 
आधिकतर तो लेट कर रेगने लगे ।
और 
इस तरह चौथा खम्भा लेटकर खुद 
सत्ता के रास्ते की पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा व्यव्स्थापिका से 
हद मे रहो 
और 
वो संगम की जमुना हो गयी 
और 
कार्यपालिका रूपी गंगा मे विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी सरस्वती की तरह 
भीतर भीतर घुल-मिल रहा है 
अब सब खम्भो की जिम्मेदारी 
खुद जनता के कन्धो पर है 
क्योकी आज़ादी मुफ्त मे नही मिलती 
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

गुरुवार, 4 मई 2023

बात चीत जारी है



#बातचीत जारी है ,
#निंदा जारी है ,
विशेस #दर्जा जरी है ,
#कवाब और #बिरयानी जरी है ,
#अदानी की #बिजली जारी है 
#सर #काटना जारी है ,
बातचीत के लिए बातचीत जारी है , 
अगली मुलाकात के लिए बातचीत जारी है ,
अगली मुलाकात के मुद्दे के लिए
 बातचीत जारी है 
सीमा पर गोलीबारी भी जारी है ,
सैनिको को मरना जारी है ,
मोदी से राजनाथ तक के बयान जारी है ,
जी हाँ सब जारी है |
कुछ होगा 
इन्तजार है २०१९ के चुनाव का | 
तब तक आप भी इन्तजार करिए 
और 
तब तक मरने दिए गरीबो के बच्चो को 
और 
भरने दीजिये अदानी का खजाना 
आने दीजिये शाल ,बिरयानी और कवाब | 
और 
उलझे रहिये #भारत_माता ,
#बन्दे_मातरम और ऐसे ही फालतू मामलों में 
अगले चुनाव में फिर खा लीजियेगा 
#धर्म की #अफीम 
और
हिन्दुस्तानी बन कर नहीं 
धर्म बन कर वोट डाल दीजियेगा | 
सब जारी है 
ये भी जारी रहने दीजिये | 

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

दर्द है कि जाता ही नही है

दर्द है 
कि जाता ही नही है
न मन का न तन का 
न अपनी जलन का 
न अपनी लगन का 
न अपने कहन का 
न उनके सुनन का 
न उनके कहन का 
न अपने सुनन का 
न दिल की व्यथा का 
न अपनी कथा का 
न यादो का अपने 
न वादो का अपने 
इरादो का अपने 
दवा भी नही है 
दुवा भी नही है 
ये किससे बताये 
किसे हम सुनाये 
आँसू छुपाये 
या हिचकी दबाए 
कटी जीभ अपनी 
निकलता जो खू है 
ये कैसे छुपाये 
न आहो मे कोई 
न चाहो मे कोई 
निगाहो मे कोई 
न राहो मे कोई 
ये गम हम दबाए 
कहा तक अब जाये 
ये दर्द जो है खू मे 
कतरे कतरे लहू मे 
है चमड़ी के अंदर 
औ चमड़ी के बाहर 
ये जाता नही है ।

गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

गर मैं डूब जाऊंगा कभी मयखाने मेहै कोई हाथ जो आये मुझे बचाने मे ।

गर मैं डूब जाऊंगा कभी मयखाने मे
है कोई हाथ जो आये मुझे बचाने मे ।

तुम्हारे पास कुछ मेरा भी है

ये ये देखो गिर नहीं जाना 
तुम्हारे पास कुछ मेरा भी है 
वो भी तो टूट जायेगा 
या वही छूट जायेगा ।

सोचता हूँ कि कई कहानियां लिखू डरता हूँ लोग तुम्हारी तरफ देखेंगे ।

सोचता हूँ कि कई कहानियां लिखू 
डरता हूँ लोग तुम्हारी तरफ देखेंगे ।

शनिवार, 8 अप्रैल 2023

हाँ तो हा, ना तो ना ।

आये दिन ये जो
हुक्मनामे फेंके जा रहे है 
आप के वजूद पर
आप के चिन्तन पर  
ताकि 
सीख जाओ आप 
तानाशाही मे जीना 
अंधे और मूर्खतापूर्ण
आदेशो को मानना 
और 
जब जब आका कहे 
घरो मे कैद रहना 
शायद खिड़किया भी
सील हो जाये एक दिन
और दरवाजे भी 
आका के बटन दबाने से
ही खुले सब 
दिमाग मत चलाओ 
जुबान मत हिलाओ 
पर सर हिलाओ 
जैसे आका कहे 
हाँ तो हा, ना तो ना ।

हुक्म है कि हुक्म पर चलते रहो ।

हमारा हुक्म है कि 

घर से निकलना मना है 

कोरोना काट लेगा 

हुक्म है 

खिडकी दरवाजे बन्द रखो 

हुक्म की आज निकलो ,

यहा निकलो , वहा निकलो 

रैली हमारी , भाषण हमारा 

कोरोना से मुक्त है ये 

मगर बाकी जगह 

मुह भी खोला तो जेल होगी 

सूइयां सबके लगेगी 

फिर चाहे मरो चाहे जियो 

ये भगवान जाने 

पर कोरोना 

भगवान के बस का नही है 

उसका इलाज तो 

बस पुलिस के पास है 

खबरदार 

जो बाकी जगह बाहर भी निकले ।

हुक्म है कि हुक्मनामा पढते रहो 

हुक्म है कि हुक्म पर चलते रहो ।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

अभिशप्त

अभिशप्त आत्माएं 
अभिशप्त वजूद 
अभिशप्त वादे 
अभिशप्त इरादे 
अभिशप्त इच्छाये 
अभिशप्त भविष्य
अभिशप्त रिश्ते
अभिशप्त भावनाए 
सपोले ही चहुँ ओर
आस्तीन कैसे बचाए
अभिशप्त सब कुछ 
ये सब 
जाकर किसे दिखाये ।

आप का वहम ही ईश्वर है ।

किसी ने पूछा 
ईश्वर क्या है ?
मेरा जवाब है 
की 
आप खुद है ईश्वर 
नही तो 
आप का वहम ही ईश्वर है ।

गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

अज्ञात से युद्ध ?



अज्ञात से युद्ध  ?

बम,मिसाइल ,गोलियां ,गोले 
और 
संगीन किसी को नहीं पहचानती है 
क्योंकि उनके दिल नही होता 
उनके दिमाग नही होता 
वो खुद से कुछ नही करती 
कोई और चलाता है इन्हे 
ये गुलाम है किसी दिमाग के 
ये गुलाम है किसी उंगली के 
पर इंसान चाहे किसी देश का हो 
चाहे कोई भाषा बोलता हो 
और 
चाहे जिस बिल्ले वाली वर्दी पहने हो 
उसके तो आंखे होती है 
दिल और दिमाग भी होता है 
फिर कैसे कहर बन टूट पड़ता है
दूसरे इंसान पर 
जिसे खुद जानता भी नहीं 
जिससे उसकी दुश्मनी भी नही ?
फिर कैसे चलनी कर देता है उसे 
कैसे घोप देता है संगीन 
या उड़ा देता है बम से
बिना विचलित हुए 
क्या नही दिखता सामने उसे 
अपना भाई या बेटा 
नही कर पाता है कल्पना 
एक उजड़े घर की 
एक विधवा पत्नी , टूटे मां बाप
और अनाथ बच्चों की
चाहे सामने वालो के हो 
या ख़ुद के 
कैसे इतना बेदर्द और क्रूर हो जाता है 
कोई भी हाड़ मांस का जीवित इंसान ? 
युद्ध में कोई नहीं जीतता 
सब केवल हारते है 
और बर्बाद हो जाते है मुल्क 
उससे ज्यादा इंसानियत
युद्ध जमीन पर नही 
औरत की  देह 
और 
बच्चो के जीवन पर लड़ा जाता है 
और अंत में खत्म हो जाता है युद्ध 
एक मेज पर चाय के साथ वार्ता से 
तो पहले ही क्यों न 
रख दी जाए ये मेज और चाय 
इंसान की मौत और युद्ध के बीच में ।
आइए मेज पर बात करे हर दिन हर वक्त ।

ऐसा क्यो होता है अक्सर

ऐसा क्यो होता है अक्सर
कि 
जिस जमीन पर आप 
बुनियाद बनाना चाहते है 
वही दलदल निकल आती है 
और 
धंस जाता है खुद का वजूद 
जिस पेड़ को मजबूत समझ 
छप्पर का आधार बनाना चाहते है 
वही इतना कमजोर निकल जाता है 
कि 
तनिक सा बोझ पडते ही 
लचक जाता है 
और 
सब कुछ जमीदोज हो जाता है 
पहाडी पर चढ़ते वक्त 
पहला ही पत्थर 
कमजोर निकल जाता है 
और 
पहले ही कदम पर घायल कर 
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर 
हिम्मत तब भी नही हारते लोग 
और 
जारी रखते है खोज 
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की 
पूरी तरह लम्बे समय तक 
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की 
और 
पहाडी पर घायल होकर भी 
अन्तिम चोटी तक पहुचने के 
सही मार्ग की ।

गुरुवार, 30 मार्च 2023

पत्थरों को खूब खिलाओ अगर वो खा सके ?

क्या हम एक दिया उन घरों में जला सकते है 
जहा अंधेरा है हमेशा से 
और 
रोशनी पहुंची ही नहीं आजतक ?
क्या हम उनका पेट भरने में मदद कर सकते है 
जो बीनते है कूड़े से खाना जानवरो के साथ 
मनुष्य होकर भी 
जो चाटते है 
हमारी फेंकी हुई पत्तल 
हमारे जैसा और उसी की संतान होकर 
जिसकी हम है ? 
फिर जब कोई ऐसा न बचे 
तो 
पत्थरों और दीवारों पर खूब रोशनी करो 
पत्थरों को खूब खिलाओ अगर वो खा सके ?

दोनो कुत्ते

लोग आवारा कुत्तों से बहुत परेशान है :
आवारा कुत्तों से जो जानवर तो है ही 
मनुष्यो में भी हो गए है । 
चाहे जहा, चाहे जिसको 
चाहे जैसे काट लेते है ,
और कपड़े फाड़ देते है, 
देखा होगा कई वीडियो 
बच्चो बच्चियों को झिझोड़ते हुए 
दोनो तरह के कुत्तों का  
और 
दोनो का ही कोई इलाज नहीं  है 
क्योंकि ये सब कुत्ते हमारी पैदाइश है ।

उनको उनके घर में फिर से बसाए

अब क्यों परेशान है हम बंदरो से 
की वो उजाडे जा रहे है 
हमारा बगीचा हमारी फुलवारी
खा जाते है हमारी चीज छीन कर 
काट लेते है हमको आक्रमण कर 
हमने भी तो उजाड़ दिए उनके घर 
उनका बगीचा और जंगल 
खत्म कर दिया उनके भोजन के साधन  
बदर वही कर रहे है हमारे साथ 
जो हमने किया है लगातार उनके साथ 
आज बंदर है तो कल बाकी जानवर भी 
आक्रमण करेंगे इंसानी आबादी पर 
उनसे परेशान है 
तो 
उनको उनके घर में फिर से बसाए 
उनके लिए फिर से जंगल उगाए ।

सोमवार, 27 मार्च 2023

सूरज कल खुद ही मुस्करायेगा ।

सूरज कल खुद ही मुस्करायेगा ।

चलो हँसते है 
अपनी बेबसी पर 
किसी की सिसकियो पर 
चलो हसते है 
किसी की मौत पर 
किसी की बर्बादियो पर 
चलो हसते है 
उस बेटी की लूटी आबरू  पर 
उस माँ के गये सहारे पर 
चलो हँसते है 
उस बेवा के रूदन पर 
बहन की सूनी कलाईयो  पर 
चलो हसते है 
पथराई आंखो पर पिता की 
बच्चों के अंधेरे  मुस्तकबिल पर 
क्योकी हंसना ही जिंदगी है ।
यही गर फ़लसफ़ा है जिंदगी का 
तो ऐसे फलसफे को गर्त कर दो 
उठ सको तो उठो
चल सको तो चलो 
वर्ना घर से ही हुंकार भरो 
हर बेबसी और हर रूदन पर 
हर जुल्म पर जो ढाये जा रहे हो 
और हर कफन पर जो यूँ ही पहनाए जा रहे हो ।
अगर इन्सान हो तो उट्ठो 
हर गली से हर खेत और खलिहान से उट्ठो 
मुट्ठियाँ बांध लो और चल पडो 
बस 
जुल्म खुद ब खुद मिट जायेगा
अंधेरा खुद ब खुद छट जायेगा 
सूरज कल खुद ही मुस्करायेगा ।

शुक्रवार, 24 मार्च 2023

सिर्फ सन्नाटा और हिचकी ।

आहट सुनाई पड़ रही है ?
आपातकाल की 
या समय पूर्व चुनाव की 
और 
किसी भी तरह ,किसी भी हालत में 
जीत ,जीत और केवल जीत 
ताकि फिर सब स्थाई हो सके
मनमानापन हो या तानाशाही 
कोई सामने नहीं हो 
ना विपक्ष ,न संविधान और लोकतंत्र 
महात्मा से लेकर शहीदे आजम तक 
नेता जी से लेकर बिस्मिल तक 
सब की आत्माएं 
बस टुकुर टुकुर ताक रही है 
पर आंखो में आसू के कारण 
कुछ साफ साफ दिख नही रहा है 
तो एक दूसरे से पूछ रहे है 
कि कुछ देखा क्या कुछ सुना क्या 
अपने भारत का हाल 
पर जवाब में सिर्फ सन्नाटा और हिचकी ।

सोमवार, 20 मार्च 2023

सबको भेड़ बनाओ

किसी भी तरह से 
सबको डराओ 
क्योकी 
जो नही डरते 
वो सत्ता के लिए 
खतरा बन जाते है 
और 
डरे हुये लोग 
गुलामी मान लेते है 
बस यूँ ही 
इसलिये ऐसे या वैसे 
कैसे भी 
आवाम को डराओ 
उन्हे जीता जागता 
इन्सान मत रहने दो 
उन्हे 
हांके पर चलने वाली 
भेडे बनाओ 
और फिर जैसा चाहो
वैसा राज चलाओ ।

रविवार, 19 मार्च 2023

पकिस्तान के नाम पत्र आओ बैठो बात करे

पकिस्तान के नाम पत्र 

छोटी छोटी बाते छोडो 
ओछी हरकत 
बिना बात की नफरत छोडो 
आओ बैठो बात करे
सैतालिस से बहुत लड़ लिया 
हमसे नफरत बहुत कर लिया ,
आओ नई शुरुआत करे
  
इन सालो में क्या पाया है 
अमरीका की भीख पर जीना 
पाक बना क्या इसीलिए था   
आजादी से अब तक केवल 
मौत और बन्दूक का शासन 
देश बटा क्या इसीलिए था 
बटवारे से घटे ही हो तुम 
और हमने खुद आकाश छू लिया 
सारी दुनिया मान रही है
बंदूके दे भेज रहे अपने बच्चे 
की वे मेरे बच्चो को मारे 
बटवारा क्या इसीलिए था
  
याद करो हम लड़े रहे थे अंग्रेजो से 
हिन्दू ,मुस्लिम सिख, ईसाई 
तब  क्या सपने थे
उन अंग्रेजो के पैसो से 
हर बार लड़े तुम मुह की खाई 
पर मरने वाले दोनों ही अपने थे
तुमने तों घायल कर डाला 
अपने तन को मेरे मन को 
क्या मिला तुम्हे बस कुछ डालर
गर ना लड़ते ना बटते 
दोनों बाजू ना कटते 
कितनी ताकत होती 
अपनी क्या कहने थे

टैंक नहीं उस पैसे से 
नहरे बांध और टंकी बनाये 
जो प्यासे हो खेत औ घर 
पानी पहुचाये
जो भी पैसा खर्च हो रहा  
सेनाओ पर 
इससे बनें स्कूल फैक्ट्री 
जीवन को आसान बनाये
भूख गरीबी और बेकारी 
उधर है तो इधर भी 
दुनिया की सारी बीमारी 
उधर है तों इधर भी
लड़ना छोडो 
आओ मिल कर इन्हें भगाए 
जर्मनी ने तोड़ दिया 
अब हम भी दीवार गिराए

हमने हाथ बढाया है 
दिल से आवाज लगाया है 
तय कर के आओ 
आओ मिल कर  बात करे 
अब न समय बर्बाद करे ।

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

सुनो सुनो सुनो ,
कोई मुझे भी खरीद लो 
जी बिकाऊ हूँ मैं 
जैसा भी हूँ
पर आज बाजार में हूँ 
बाजार का युग है 
इतना खोटा भी नहीं कि 
मेरी कुछ भी कीमत न ही 
बोली तो लगाओ 
कही से तो शुरू करो 
चलो तुम रोटी से शुरू करो 
चुपड़ी नहीं रूखी ही सही 
और तुम कपडे से 
उतरन भी चलेगी 
तुम नीद की जगह दोगे 
पर नीद कौन देगा 
पर बोलो ,जो चाहो बोलो 
इतना सस्ता इमांन कहा मिलेगा 
इतना सस्ता ज्ञान कहा मिलेगा 
और 
आज इंसान कहा मिलेगा 
तो बताओ कौन खरीदेगा मुझे 
जी हा
कसम खुदा की मैं बाजार में हूँ 
खरीद रहे हो बेपनाह हुस्न 
लोगो के इमांन 
लोगो के रहनुमा 
तो मुझमे क्या बुराई है 
इस ईमान से डर लगता है 
या फिर इंसान से डर लगता है 
अरे नहीं 
बिकाऊ है आज ये भी 
कोई तो बोलो 
मेरे इंसान और ईमान को 
कोई तो सिक्को में तोलो 
कोई नहीं बोलोगे 
तो रो पडूंगा मैं बेबसी पर 
फिर 
आंसू तो बिलकूल नहीं खरीदोगे 
अब हुस्न कहा से लाऊँ 
मैं भी दल्ला हो सकता हूँ 
ये कैसे समझाऊँ 
या फिर ये बनी हुयी इमेज 
मिटा के कैसे आऊँ 
तो उसके लिए 
किस लॉन्ड्री में जाऊं ।
कोई तो खरीद लो न मुझे ।
जी हां मैं आज बिकाऊ हूँ 
और 
इसीलिए आज बाजार में हूँ ।
और 
बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

सारे रंगों का नाम ही हिंदुस्तान है

सभी रंग अपने है 
वो लाल हो ,केसरिया हो 
हरा हो या नीला 
बैगनी हो या पीला 
या जो भी हो 
जिसे जो पसंद 
वो लगालो 
दूसरे को पसंद 
तो उसपर भी डालो 
पर 
उसमें कोई खतरनाक चीज न हो 
और न इरादे हो खतरनाक 
जी हां 
खूब खेलो रंग और गुलाल 
पर न हो धरती खून से लाल 
ऐसा समाज बना लो 
जी हां 
ये इतने सारे रंगों का नाम ही 
हिंदुस्तान है 
जहा एक ही रंग है वो मिस्र ,
अफगानिस्तान और पाकिस्तान है ।
क्या वो एक रंग पसंद है 
या 
ये हिंदुस्तानियत का रंगारंग 
आप गले मिलो 
पर नफरत के खंजर को 
फेंक कर आओ 
हां आओ 
सभी रंगों को मिला कर 
होली मनाओ

वो जब वो नही रहे-

वो जब वो नही रहे-                                                     

उन्होने पढाया था 
हज़ारो को 
इसलिये बस गये थे 
उसी शहर मे 
और
उनकी कविताओ पर 
कितनी तालिया बजती थी 
और
उनके भाषण 
लगता था क्रांती कर देंगे 
और
वो कितना अच्छा अभिनय 
करता था / करती थी 
फिर ये सब गुम हो गये 
किसी ने नही देखा 
उसके दरवाजे की तरफ कभी 
जब वो नही रहे ओह्दो पर 
एक दिन 
जब बदबू परेशान करने लगी 
तब पडोसी परेशान हुये 
और 
शिकायत किया पुलिस को 
तब दरवाजा तोड 
निकाला गया कई दिन की 
सडी लाश को 
उस दिन लोगो ने भी कहा 
और अखबार ने भी लिखा 
कि 
ये वो थे / थी 
ऐसे थे और वैसे थे 
और 
लग गयी गिद्ध निगाहे 
उनके घर पर ।
कितनी कहानियां 
पसरी पडी है चारो ओर 
अपने अपने एवरेस्ट पर होने की 
और 
अज्ञातवास मे मिटने की ।

पूरा उपदेश देते है

कह देता हूँ किसी से कि जरा हाथ बढ़ाना 
नासमझ मुझको अपाहिज ही मान लेते हैं , 
मान कर कमजोर मुझको वे उपदेश देते है 
अज्ञानी मान कर मुझको पूरा ज्ञान देते है |

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

वो सामान्य भी नहीं हो पाते

मेरी कविता -

क्यों ! 
कुछ लोगो के जिम्मे होताहै
केवल विष पीना,
गोली खाना ,
सूली चढ़ना
या 
केवल आलोचित होना 
बार बार
उनमे से कुछ तों 
महान हो जाते है
इतिहास के पन्नो में
परन्तु ऐसा भी तों होता है 
की कुछ लोग
रोज खाते है 
गोली लोगो के इरादों की
पीते है विष 
लोगो की भावना की
चढते है सूली 
लोगो की निगाहों की
खाते है केवल 
आलोचना का खाना
पीते है गाली का पानी
सम्हल भी नहीं पाते है 
की
दोहराई जाती है 
यही कहानी
और 
बार बार 
दोहराई जाती रहती है
उसके जीवन भर
और 
महान क्या 
सामान्य भी नहीं हो पाते है
कोई विज्ञानं या मनोविज्ञान
इनकी कहानी 
सुलझा नहीं पाता है
और 
वे अपनी जिंदगी
सुलझाते सुलझाते 
इतने उलझ जाते है
की 
मकड़ी के जाले में 
फसे नजर आते है
और 
वह क्या उसका भविष्य भी
भविष्य के गर्भ में होता है
ऐसा गर्भ !
जिसे 
अल्ट्रासाऊंड भी नहीं बता पाता है .

ईश्वर क्या है

मेरी कविता : 

ईश्वर क्या है ? 

जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।