गुरुवार, 12 मई 2016

घर से निकलो तो बहुत दूर ना चले जाना यहाँ घर में भी तो कोई इन्तजार करता है ।

घर से निकलो तो बहुत दूर ना चले जाना
यहाँ घर में भी तो कोई इन्तजार करता है ।

मैं दिल से जिया,दिल से किया और दिल से कहा पर दिमागों की लड़ाई में मैं अक्सर हार जाता हूँ ।

मैं दिल से जिया,दिल से किया और दिल से कहा
पर दिमागों की लड़ाई में मैं अक्सर हार जाता हूँ ।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

पेड़ भी जड़ होता है ।

पेड़ भी जड़ होता है
पर अपनी जड़ो
और पत्तो के साथ
और कोई कोई
फल के भी साथ
वो देता है छाया
भरता है पेट
और सूख जाता है
तब भी
बन जाता है ईंधन
पर जब कोई इंसान
जड़ हो जाता है
तो
न बन पता है सहारा
न सम्बल
और न ही प्रेरणा ।
न छाया ,न फल ,न ईंधन
कितना बेकार होता है ।
ऐसा इंसा
और
मैं ऐसे कई इंसानो को
जानता हूँ
जो पेड़ से जलते है
और अपने आप में भी ।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

कभी समन्दर के किनारे

कभी
समन्दर के किनारे
खड़े होकर
दूर देखा है आप ने
लगता है कि
कुछ ही दूर पर
आसमान मिल रहा है
समन्दर से
पर जब आगे बढ़ते है
नाव से या जहाज से
तो वो मिलन
और दूर चला जाता है
वैसी ही होती है
कुछ जिंदगियां
और कुछ के भविष्य
इच्छाये ,खुशियाँ और आशाएं ।
मैं भी
ताक रहा हूँ टुकुर टुकुर
दूर से दूर तक
बहुत दिनों से
और
भाग रहा हूँ लगातार
की
आसमान कहा छू लूंगा ।
और
या तो
आसमान छल कर गया
या
मेरा पुरुषार्थ ही जवाब दे गया
और
हाथ भी तो छोटे पड़ जाते है मेरे ।

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

सुनो सुनो सुनो ,
कोई मुझे भी खरीद लो
जी बिकौऊ हूँ मैं
जैसा भी हूँ
पर आज बाजार में हूँ
बाजार का युग है
इतना खोटा भी नहीं कि
मेरी कुछ भी कीमत न ही
बोली तो लगाओ
कही से तो शुरू करो
चलो तुम रोटी से शुरू करो
चुपड़ी नहीं रूखी ही सही
और तुम कपडे से
उतरन भी चलेगी
तुम नीद की जगह दोगे
पर नीद कौन देगा
पर बोलो ,जो चाहो बोलो
इतना सस्ता इमांन कहा मिलेगा
इतना सस्ता ज्ञान कहा मिलेगा
और
आज इंसान कहा मिलेगा
तो बताओ कौन खरीदेगा मुझे
जी हा
कसम खुदा की मैं बाजार में हूँ
खरीद रहे हो बेपनाह हुस्न
लोगो के इमांन
लोगो के रहनुमा
तो मुझमे क्या बुराई है
इस ईमान से डर लगता है
या फिर इंसान से डर लगता है
अरे नहीं
बिकाऊ है आज ये भी
कोई तो बोलो
मेरे इंसान और ईमान को
कोई तो सिक्को में तोलो
कोई नहीं बोलोगे
तो रो पडूंगा मैं बेबसी पर
फिर
आंसू तो बिलकूल नहीं खरीदोगे
अब हुस्न कहा से लाऊँ
मैं भी दल्ला हो सकता हूँ
ये कैसे समझाऊँ
या फिर ये बनी हुयी इमेज
मिटा के आऊँ
तो उसके लिए
किस लॉन्ड्री में जाऊं ।
कोई तो खरीद लो न मुझे ।
जी हां मैं आज बिकाऊ हूँ
और
इसीलिए आज बाजार में हूँ ।
और
बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

काफी दिनों से खुद से ही बात कर रहा हूँ या तो बात नहीं होती या लफ्ज नहीं होते ।

काफी दिनों से खुद से ही बात कर रहा हूँ
या तो बात नहीं होती या लफ्ज नहीं होते ।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

तुमने खंजर छुपा के रखा था

मैं तो बस प्रेम से मिला तुमसे
तुमने खंजर छुपा के रखा था ।

चलो धूल डालते है

चलो धूल डालते है
कुछ विचारो पर
भावनाओ पर
रिश्तों पर
और ढक देते है
बहुत सी यादे ।
भूल जाते है वो कदम
जो हम साथ चले थे
लिखते है नयी इबारत
और नया भविष्य ।

शनिवार, 19 मार्च 2016

जातियों के खंडहर में

जातियों के खंडहर में
विकास और भविष्य
तलाशते लोग
मुझे
कस्तूरी मृग जैसे लगते है
जिनमे है
बहुत कुछ दौड़ने को
और पा लेने को
मेहनत और मर्यादा से
उत्कंठा और संकल्प से
पर
बिना कुछ किये
सब पा लेने की चाहत
उन्हें पागल बनाये रहती है
देखें कब मिलती है
मृग को कस्तूरी
और ऐसी जातियों
को वो सब
जो वो ढूढ़ रहे है
नफरतें और छल
के हथियार लेकर |

सोमवार, 14 मार्च 2016

मुझे मेरी जिंदगी चुरा कर

मुझे मेरी जिंदगी चुरा कर
क्यों इतराता कोई खुदा है

ये सच है कंगाल हो गया मैं
पर खुदा तुझे भी क्या मिला
देख मैं तुझसेतेरे सामने
आँखे मिला कर जी रहा हूँ
और तू तिलमिला रहा है
क्यों तूने छीना मेरी जिंदगी
और क्यों साँसे छोड़ दिया फिर
बेरहम तू और तेरी खुदाई
देखा है और देखेगे भी
हम भी तो तेरे ही कुछ है
ऐसे माने
और तू ताकतवर है
कैसे माने
तू लौटा दे मेरी जिंदगी
मुझको सब कुछ दे दे मेरा
तब मानेंगे
वर्ना होगा तू कुछ
हम भी है कुछ
तू जान ले
या हमको जीवन दे दे
या फिर हमसे हार मान ले |



रविवार, 13 मार्च 2016

सालो साल नागो को मैं दूध पिलाता रहां
काट लिया तब जाना कितना जहरीला है ।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

क्या बताये हम अब उपलब्धियों के नाम पर
मौज शौक नफरत और दौलत का भण्डार है ।

रविवार, 10 जनवरी 2016

दूरबीन लगा कर मुझमे कमियां ढ़ूढ़ते है लोग
कमिया नहीं होती तो क्या मैं देवता नहीं होता ।

सोमवार, 4 जनवरी 2016

गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

कल बना कर रहूँगा अपने जैसा |

हो जाती है कुछ गलतियाँ
भूल जाओ उन्हें आगे बढ़ो
कुरेदोगे तो गलती ही होगी
ख़ुश रहना है तो आगे बढ़ो

कभी बहुत बीमार हो गए थे
कभी लगी थी बहुत सी चोटें
क्लास में फेल हो गए कभी
कभी छूट गयी थी ट्रेन कही

तो क्या सब याद रखते हो सब
घुटते रहते हो उन सब के लिए
क्या वापस ला सकते हो वो सब
पलट सकते हो घड़ी की सूइयां 

नहीं न, तो आगे बढ़ो जीत लो
हर वो किला अपने इरादों का
पहन लो अपने धुले हुए कपडे
और कस कर जूते निकल पडो

बना लो जिंदगी को यूँ खुशनुमा
भूल कर की कहा और कब गिरे
और सोच कर की कल तो मेरा है
कल बना कर रहूँगा अपने जैसा | 

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

आप कितने भी मजबूत हो
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या नहीं निकल पाए
इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के वरोध को
बना लो फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना वक्त से
और अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और बुरी का आहत कर देता
और चील देता आत्मा को
सचमुच कसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंध खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 6 दिसंबर 2015

मेरे घर मे झांक झांक मुझको शर्मिंदा मत करना

मेरे घर में झाँक झाँक मुझको शर्मिंदा मत करना
मैंने खुद को मार दिया मुझको जिन्दा मत करना
देखो फटी है जेब औ डिब्बे खाली है
फ्रिज जैसा कुछ सारे खाने खाली है
भूख लगी जब अपने गम खा लेता हूँ
प्यास लगे तो आँखो में इतना पानी है ।
आँखो में यूँ झांक झांक मुझको शर्मिंदा मत करना
मैंने खुद को मार दिया है मुझको जिन्दा मत करना
हम तो संग चले थे पंख लग गए तुमको ही
मेरे छालो को कब मुड़ कर तुमने देखा ही
तुम दौड़े और तुमने तो आसमान छू लिया
मैं ऐसे गिरा मुझको कोई जमीन मिली ना
मेरे फटे चीथडो में झाँक अब शर्मिंदा मत करना

मैंने खुद को मार दिया                

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

मैं तो सूरज का बेटा हूँ तो ऐसे कैसे हारू मैं
तुझ जुगनू के हाथो खुद को ऐसे कैसे मारू मैं   |
मेरी राहे है पथरीली पड जायेंगे तुम्हारे पांव में छाले 
तुम्हारे पांव मखमल के लिए है तुम उस तरफ जाओ |





तुमने ही किसे बख्शा जब कोई सूरज तुम्हे नजर आया
की मैं सूरज छोड़ दूँ और तुम्हारे साथ सड़ता ऐसे ही रहूँ
तुमने तो सरो पर पाँव रख कर सारी ही मंजिले तय की
चाहते हो मैं अपने पाँव पर चल कर भी सूरज नहीं पाऊं |
वो देखो न दूर किस कदर वो सूरज चमकता है
मैं तुमको छोड़कर सूरज के साथ जाने वाला हूँ
मत कहना की मैंने भी तो धोखा दे दिया तुमकों
मैं भी अँधेरा छोड़ रौशनी से मन बहलाने वाला हूँ |

साथ चलने की कसम खाये हुये है

जो मेरे साथ चलने की कसम खाए हुए हैं
वो खुद ही बर्बादी के करीब आये हुए है |
मैं तुम्हारी महफ़िल से कुछ यूँ निकल जाऊंगा कल
जैसे सूरज चमकता है और फिर कही डूब जाता है |

सोमवार, 14 सितंबर 2015

जब और जितनी बार भी अपने घर लौटता हूँ और दरवाजा खोलता हूँ बिजली सी कौंध जाती है और दीवारो पर बन जाती है अंनगिनत तस्वीरें और मन का बादल बरस उठता है । लहरो पर तैर जाती है यादो की कितनी कागजी नावें और कागज की नाव तो कागज की ही होती है खो जाती है अथाह पानी में और सन्नाटा पसर जाता है दीवारो से छत तक और बैठक से बिस्तर तक जब और जितनी बार भी अपने घर लौटता हूँ और दरवाजा खोलता हूँ बिजली सी कौंध जाती है और दीवारो पर बन जाती है अंनगिनत तस्वीरें और मन का बादल बरस उठता है । लहरो पर तैर जाती है यादो की कितनी कागजी नावें और कागज की नाव तो कागज की ही होती है खो जाती है अथाह पानी में और सन्नाटा पसर जाता है दीवारो से छत तक और बैठक से बिस्तर तक ।

जब और जितनी बार भी
अपने घर लौटता हूँ
और
दरवाजा खोलता हूँ
बिजली सी कौंध जाती है
और
दीवारो पर बन जाती है
अंनगिनत तस्वीरें
और
मन का बादल बरस उठता है
लहरो पर तैर जाती है
यादो की कितनी कागजी नावें
और
कागज की नाव
तो कागज की ही होती है
खो जाती है अथाह पानी में
और
सन्नाटा पसर जाता है
दीवारो से छत तक
और
बैठक से बिस्तर तक

रविवार, 6 सितंबर 2015

किसी ने पूछा था भूल तो न जावोगे
हमारा सवाल था लौट के आ पावोगे ।
चलता हूँ गर चाहो तो मुझे याद रखो
याद की बात बस राख ही रह जाती है ।
जितना आसान है यहाँ ईश्वर कहलाना
उतना मुश्किल है यहाँ इंसान बन पाना ।
ये क्या मजबूरी है खुद में तन्हा रहना
बहुत लोग है हमें तन्हा करने के लिए ।
ज़माने को हमने खुद को सौंपा था
ज़माने ने हमसे हमको छीन लिया ।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

उस बच्चे को पता नहीं है जाति और मजहब क्या है
नफरत की खेती में इसको हम बैल बना कर जोतेंगे ।

सोमवार, 31 अगस्त 2015

कितने जतन करते हैं लोग बुलाने के लिए
कौन आता है फिर लौट कर जाने के लिए ।

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

बस इतना बयांन देकर उसने ख़ुदकुशी कर ली
कहते बड़ी जाति पर भूखा बीमार बेरोजगार हूँ |
बस इतना बयांन देकर उसने ख़ुदकुशी कर ली
हाँ मैं बड़ी जाति हूँ पर भूखा बीमार बेरोजगार हूँ |

बुधवार, 19 अगस्त 2015

कुर्सी और पेड़

क्यों इतना अंतर होता है
कुर्सी और पेड़ में ?
जबकि कुर्सियां भी
पेड़ो से ही बनती है
पेड़ देते है छाया
और कुर्सी देती है ताप
पेड़ देते है हरियाली
और कुर्सी नखलिस्तान
पेड़ देता है साँस लेने को वायु
और कुर्सी दमखोट देती है
पेड़ देता है फल
और कुर्सी सबका सब खा जाती है
पेड़ देता है सुखद एहसास
और कुर्सी केवल दुःख ही दुःख
क्यों इतना अंतर होता है
पेड़ में और कुर्सी में
जबकि कुर्सियां भी
पेड़ से ही बनती है
शायद कभी कोई शोध हो
और कारण पता लगे
और ये अंतर मिट जाये
कुर्सी और पेड़ का ।

रविवार, 9 अगस्त 2015

एक शख्स हरदम मेरे साथ रहता है

एक शख्स है जो हरदम मेरे ही साथ रहता है
गलत होता मुझसे कुछ तो वो जरूर कहता है
उसे दरगुज़र कर मैं ही अपनी मस्ती में रहता हूँ
अंदर वो मरता रहता है और सब कुछ सहता है।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

जिनके सामने सर झुकता है अदब से

जिनके सामने सर झुकता है अदब से 
गर लोग इस कदर मगरूर हो जायेंगे 
यकीन जानिए कितनी भी हो मुहब्बत 
हम फैसले करने को मजबूर हो जायेंगे ।

रविवार, 12 जुलाई 2015

लो अब मैं चला तुम खुश तो हो आज सूरज ढला तुम खुश तो हो देखो बंद हुयी मेरी जुबान आज बोलने से थे परेशांन खुश तो हो|


सच दो लफ्ज और झूठ भारी है झूठ हुआ आसमान खुश तो हो झूठ और लुट तुम्हारे मेहमान है और जनता बेजुबान खुश तो हो|


ये आदमी नागिन बन गया यारो नाग है परेशांन तुम खुश क्यों हो मैं चला तुम्हारी दुनिया छोड़ कर न जहर न एहसान तुम खुश तो हो


मंगलवार, 7 जुलाई 2015

आँखों में मूरत वसायी थी तेरी अच्छी से

आँखों में मूरत वसायी थी तेरी अच्छी से
आखो से गिरकर तूमने ही उसे तोड़ दिया
अपने घर से तेरे घर को मैंने ही जोड़ा था
दीवार खड़ी करके तूने ही हमें छोड़ दिया ।