रविवार, 12 मार्च 2017

सभी रंग अपने है

सभी रंग अपने है
वो लाल हो ,केसरिया हो
हरा हो या नीला
बैगनी हो या पीला
या जो भी हो
जिसे जो पसंद
वो लगालो
दूसरे को पसंद
तो उसपर भी डालो
पर
उसमें कोई खतरनाक चीज न हो
और न इरादे हो खतरनाक
जी हां 
खूब खेलो रंग और गुलाल
पर न हो धरती खून से लाल
ऐसा समाज बना लो
जी हां
ये इतने सारे रंगों का नाम ही
हिंदुस्तान है
जहा एक ही रंग है वो मिस्र ,
अफगानिस्तान और पाकिस्तान है ।
क्या वो एक रंग पसंद है
या 
ये हिंदुस्तानियत का रंगारंग
आप गले मिलो
पर नफरत के खंजर को 
फेंक कर आओ
हां आओ 
सभी रंगों को मिला कर 
होली मनाओ 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

उसे गिरना अच्छा लगता है

उसे ऐसा क्यों लगता है
कि
वो गिर गया है
और
खुद में एक बड़ा सवाल बन गया है
जिसे सुलझाने का कोई यंत्र नहीं
सुलझाते सुलझाते
और उलझ जाता है वो
अपने बनाये सवाल में
फिर सोचता है कि
वो अकेला तो नहीं गिरा
खाई थी
तभी तो गिरा
कितना दोगला है वो
वो खुद गिरना चाहता है
और गिरना चाहता है
फिर भी
खुद को धोखा देता है
शर्मिंदा होने के अभिनय से
और
खुद को सवाल बना कर
गिरना
उसका नशा बन गया गया है
और
उसकी नियति भी ।
पर कही तो ठहरेगा
उस दिन सवाल भी ठहर जायेंगे
और
उसके द्वन्द भी ।

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

मन गयी मेरी भी दीवाली

मन रही है दीवाली 
हर साल की तरह 
कम होते गए घर से लोग 
अब रह गए हम दो
लोगो के घरो में 
बने है पकवान 
मेरा बेटा भी होटल से 
लाया है पकवान 
लोगो के घरो में 
सजी है रंगोली 
मेरे बेटे ने भी 
कुछ रख दिया है
जमीन पर 
लोगो के बच्चे और बड़े भी 
छोड़ रहे है पटाखे 
मैं बिस्तर पर पड़ा 
सुन रहा हूँ आवाजे 
और 
मेरा बेटा बाहर खड़ा 
देख रहा है सबको फोड़ते 
मेरे घर भी आई है मिठाई 
पर  पता नहीं क्यों 
मिलने आने वालो की तादात 
घट जाती हैं बुरी तरह 
जब किसी पद पर नहीं होता हूँ मैं 
हमने खरीदा है कुम्हार के बनाये 
दिए और लक्ष्मी गणेश 
थोड़ी सी खील और बतासे भी 
ताकि इनको बनाने वालो की 
कुछ मदद हो जाये
और
हार न जाये ये 
देश के दुश्मन चीन से 
और मन गयी 
मेरी और मेरे बेटे की भी दीवाली

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

ये समंदर का किनारा

ये समंदर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं
और
पानी हां पानी भी बहुत है
प्यास है खूब प्यास
पर पी सकते नहीं है ।
किस लिए फिर
इसकी चाहत
क्या मिलेगा
इन लहरों को गिनकर
या
इनसे टकरा कर
क्या मिलता है
इस रेत से दिल लगाकर
क्यों जाते है हम
इतनी दूर दूर
बस ये रेत देखने
लहरे गिनने
या
लहरों में गिर जाने को
मुझको तो
कुछ समझ न आया
सब माया है केवल माया ।
ये किनारा ,ये लहरे औ ये पानी
जो खारा है
आखो के पानी से भी क्या
ये बालू कितनी निर्मम है
मेरे जीवन से भी क्या ।
ये समन्दर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं ।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

जयप्रकाश

जयप्रकाश जयप्रकाश रट रट के लोग यहाँ
देश के प्रधान और मंत्री बन आये  थे,
साथ साथ चीखते थे क्रांति क्रांति उनके वे
चौहत्तर में क्रांति का शंख जो बजाये थे
समझी थी जानता कुछ भला करे देश का ये
इसीलिए वोट उनको ही डाल आये थे,
पर पता चला की एक सत्ता को हटा के यारो
सत्तालोलुपो  की पूरी फ़ौज ले आये थे  ।
(1977  में लिखा था ये मैंने )

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मैं मर भी जाऊं तो

मैं मर भी जाऊं तो क्या होगा
शायद अगर हुआ तो
चार कंधे
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले
कुछ क्षण की
कुच्छ सिसकियाँ
कुछ कहानिया
कुछ शिकायतें
कुछ झूठी अच्छाइयां
बहुत सी बुराइयाँ
क्या किया जीवन में
बेकार था कुछ न किया
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया
नालायक था कुछ नहीं किया
बार बार बोर होकर भी
दोहराई जाती वही कहानियां
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ कुछ कम हुआ
लो तेरही भी आ गयी
ये भी खर्च कवाएगी
कोई रिश्तेदार रुक न जाये
चलो सब चले गए
अब देखो कहां क्या क्या है
बाट लो किसका क्या है
और
चल पड़ेगी जिंदगी
अपने अपने रस्ते पर
एक कोने में टंगी तस्वीर
साल में एक बार शायद
बदलेगी माला
और हाथ जोड़ कर भागते हुए लोग
आज तो देर हो गयी इस चक्कर में
पता नहीं क्यों बने है ये रिवाज
इसलिए
मेरे लिए मेरी वसीयत है
की
कोई नहीं रोयेगा
बिजली में जला देना मुझे
किसी नदी में नहीं बहाना मुझे
मैं नहीं मानता कोई पूजा इसलिए
न कोई पूजा और न उठावनी तेरही
अगले ही पल से सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो
मेरे लिए न कभी कोई पारेशान हुआ
न किसी को होना है
वर्ना मैं परेशान हो जाऊंगा
कुछ नहीं है मेरे पास
की कोई लडे की किसका क्या
बस मेरी यादे कभी क्रोध लायेंगी
की नालायक बाप ने कुछ नहीं किया
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी
कुछ नहीं होगा
सब जैसे था वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही मेरी वसीयत है
जो किसी काम नही आएगी
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ
कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और मैं भी चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा
शायद लावारिश होकर
की किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

हां जीवन इसको कहते है |

जिंदगी
कब होगी पहचान हमारी
इतने सालो से है दूरी
क्या मजबूरी
जिन्दा तो है
पर क्या सचमुच
क्या जीवन इसको कहते है
पांव में छाले भाव में थिरकन
गले में हिचकी आँख में आंसू
नीद नहीं और पेट में हलचल
ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ
बस अन्धकार है
क्या जीवन इसको कहते है
जीवन कब हमको मिलना है
या फिर ऐसे ही विदा करोगे
कुछ तो सोचो
हम दोनों क्या जुदा जुदा है
कुछ तो बोलो
और भविष्य के ही पट खोलो
या फिर कह दो
हां जीवन इसको ही कहते है |
जींना है तो हंस कर जी लो
या फिर दर्द गरल को पी लो
तेरे हिस्से में बस ये है
मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ
तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ
चल अब सो जा
अच्छे सपनो में आज तो खो जा
कल फिर मुझसे ही लड़ना है
हां जीवन इसको कहते है |



शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मैं भी टूट जाऊँगा

मैं तुमसे रूठ जाऊं
चलो मैं रूठ जाता हूँ
मैं जानता हूँ
तुम मना लोगे मुझे
तुम मुझसे रूठ जाओ
चलो फिर मैं मानता हूँ
मगर दोनों जो रूठे
तो गजब हो जायेगा
न तुमको मैं मनाउंगा
न मुझको तुम मानवोगे
मैं भी टूट जाऊँगा
तुम भी टूट जावोगे ।

मंगलवार, 28 जून 2016

रोटियों में आग है और आग से है रोटियां

रोटियों में आग है और आग से है रोटियां
आग में ही जल रही है ढेर सारी बोटियाँ
बोटियों और रोटियों की ये लड़ाई आम है
इस लड़ाई में राजनीती चलती है गोटियाँ ।
पेट में जब आग हो तो काम आये रोटियां
दिल में जब आग हो तो जल जाएँ बोटियाँ ।
क्रांति क्रांति का घोष गूंजता जब जनता में
ना रहती है रोटियां और न रहती है बोटियाँ ।
(पूरा कल करने की कोशिश होगी )

वो मुझसे मेरी धूप और सवेरा ले गया नीद की ख्वाईश थी तो अँधेरा ले गया ।

वो मुझसे मेरी धूप और सवेरा ले गया
नीद की ख्वाईश थी तो अँधेरा ले गया ।

शुक्रवार, 24 जून 2016

इस राजनीती की मंडी में ।

क्या कहा,किसने कहा और कब कहा,किससे कहा
क्यूँ याद करते हो साहब, इस राजनीती की मंडी में ।

शुक्रवार, 17 जून 2016

चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो ।

चलो अब बंद करता हूँ
खिड़कियाँ
कमरे की
और मन की भी
चिंतन की
और आँखों की भी
बुझा देता हूँ रौशनी
ताकि छा जाये अँधेरा
अंदर भी और बाहर भी
क्योकि
अँधेरा हमें सुकून देता है
और
हर चीज से
आँख बंद कर लेने का बहाना
सो जाता हूँ मैं भी
सोने दो लोगो को भूखे पेट
या फुटपाथ के थपेड़ों
और बारिश में
लगने दो आग
किसी की आबरू में
लूटने दो इज्जत या असबाब
मुझे क्या
मैंने तो गर्त कर लिया है
खुद को अँधेरे में
और बंद कर ली है खिड़कियाँ
ताकि
कोई चीख सुनाई न पड़े
और न दिखाई दे
बाहर के अँधेरे
मेरे अंदर के अँधेरे
अब मेरे साथी बन गए है न
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो ।

रविवार, 12 जून 2016

अदानी अम्बानी के महलो में ठहाके लगा रहा था

मोदी जी ने डुगडुगी बजवाया
पूरे देश में मुनादी करवाया
की अब तो अच्छे दिन आ गए है
चारो और ख़ुशी के बादल छा गए हैं
सब पंद्रह पंद्रह लाख पा गए है
खाने से लेकर सब्जी तक और
डालर के दाम बहुत नीचे आ गए है
चीन हमारी जमीन छोड़ भाग गया है
पाक ने उस कश्मीर से बिस्तर बांध लिया है
क्या क्या बताऊ और क्या क्या दिखाऊ
बाहर निकलिए देखिये और
अपने हिस्से का अच्छा दिन ले जाइये
हमारे ऊपर अब सवाल मत उठाइए
ये सुन कर सब गरीब और बेकार जागे
अपना अपना थैला उठा कर बाहर भागे
पूछ आये हर संघी और भाजपाई दुकान पर
हर संघी और भाजपाई के मकान पर
कि भाई जी अच्छा दिन कहा है
सचमुच किसी को कही दिखा है                  
हर कोई कुटिलता से मुस्करा रहा था
बेचारा गरीब उदास हो वापस जा रहा था
और अच्छा दिन
अदानी अम्बानी के महलो में ठहाके लगा रहा था

बुधवार, 8 जून 2016

इंसान से अच्छा तो कांच है

इंसान से अच्छा तो कांच है
जब टूटता है
तो आवाज तो आती है
और
उफ़ निकली है
किसी की
कोई दौड़ता है उधर
कि क्या टूट गया
आवाज तो थी
पर किसके टूटने की
और
इंसान टूट जाता है
बुरी तरह
चूँकि कोई आवाज
नहीं आती
तो कोई नहीं दौड़ता
उसकी तरफ
उसका टूटना
उसके चेहरे पर
उभर आता है
पर किसके पास है वक्त
की चेहरे देखता रहे
और
रख दे पीठ पर हाथ सहारे को
और
सहला दे इतनी गहरी
चोट को
हा इंसान से अच्छा
और
खुशकिस्मत तो कांच है ।

अच्छा अब मैं इतिहास को मिटाता हूँ

अच्छा अब मैं इतिहास को मिटाता हूँ
जमी पे जमी और सच को बिछाता हूँ
कल आप को मैं भविष्य दिखलाता हूँ
दुश्मनो के सामने इक आइना लगाता हूँ ।

शुक्रवार, 3 जून 2016

खेतो और बगीचो में बारूद बोने वाले

खेतो और बगीचो में
बारूद बोने वाले
ये नए किसान
कहा से आ गए
इन खेतो और बगीचो में
यहाँ तो पैदा होती थी फसले
और
भारती थी पेट इन्सानों का
और
फलते थे फल मौसम के अनुसार
और
पेट भरने के साथ साथ
लड़ते थे इंसान में बीमारियो से
पर ये पेट क्या पूरा शरीर
उडा देने वाले
और साँसे छीन लेने वाले
मौत बाँटने वाले
खेतिहर किसने पैदा कर दिया
इसी समाज में और खेत में
रोकना ही होगा
इन नए किसानो को
और बचाना ही होगा
इंसानियत को
चाहे उसके लिए
बारूद से इन नए किसानो को ही
क्यों न उड़ा दिया जाये ।

गुरुवार, 12 मई 2016

घर से निकलो तो बहुत दूर ना चले जाना यहाँ घर में भी तो कोई इन्तजार करता है ।

घर से निकलो तो बहुत दूर ना चले जाना
यहाँ घर में भी तो कोई इन्तजार करता है ।

मैं दिल से जिया,दिल से किया और दिल से कहा पर दिमागों की लड़ाई में मैं अक्सर हार जाता हूँ ।

मैं दिल से जिया,दिल से किया और दिल से कहा
पर दिमागों की लड़ाई में मैं अक्सर हार जाता हूँ ।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

पेड़ भी जड़ होता है ।

पेड़ भी जड़ होता है
पर अपनी जड़ो
और पत्तो के साथ
और कोई कोई
फल के भी साथ
वो देता है छाया
भरता है पेट
और सूख जाता है
तब भी
बन जाता है ईंधन
पर जब कोई इंसान
जड़ हो जाता है
तो
न बन पता है सहारा
न सम्बल
और न ही प्रेरणा ।
न छाया ,न फल ,न ईंधन
कितना बेकार होता है ।
ऐसा इंसा
और
मैं ऐसे कई इंसानो को
जानता हूँ
जो पेड़ से जलते है
और अपने आप में भी ।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

कभी समन्दर के किनारे

कभी
समन्दर के किनारे
खड़े होकर
दूर देखा है आप ने
लगता है कि
कुछ ही दूर पर
आसमान मिल रहा है
समन्दर से
पर जब आगे बढ़ते है
नाव से या जहाज से
तो वो मिलन
और दूर चला जाता है
वैसी ही होती है
कुछ जिंदगियां
और कुछ के भविष्य
इच्छाये ,खुशियाँ और आशाएं ।
मैं भी
ताक रहा हूँ टुकुर टुकुर
दूर से दूर तक
बहुत दिनों से
और
भाग रहा हूँ लगातार
की
आसमान कहा छू लूंगा ।
और
या तो
आसमान छल कर गया
या
मेरा पुरुषार्थ ही जवाब दे गया
और
हाथ भी तो छोटे पड़ जाते है मेरे ।

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

सुनो सुनो सुनो ,
कोई मुझे भी खरीद लो
जी बिकौऊ हूँ मैं
जैसा भी हूँ
पर आज बाजार में हूँ
बाजार का युग है
इतना खोटा भी नहीं कि
मेरी कुछ भी कीमत न ही
बोली तो लगाओ
कही से तो शुरू करो
चलो तुम रोटी से शुरू करो
चुपड़ी नहीं रूखी ही सही
और तुम कपडे से
उतरन भी चलेगी
तुम नीद की जगह दोगे
पर नीद कौन देगा
पर बोलो ,जो चाहो बोलो
इतना सस्ता इमांन कहा मिलेगा
इतना सस्ता ज्ञान कहा मिलेगा
और
आज इंसान कहा मिलेगा
तो बताओ कौन खरीदेगा मुझे
जी हा
कसम खुदा की मैं बाजार में हूँ
खरीद रहे हो बेपनाह हुस्न
लोगो के इमांन
लोगो के रहनुमा
तो मुझमे क्या बुराई है
इस ईमान से डर लगता है
या फिर इंसान से डर लगता है
अरे नहीं
बिकाऊ है आज ये भी
कोई तो बोलो
मेरे इंसान और ईमान को
कोई तो सिक्को में तोलो
कोई नहीं बोलोगे
तो रो पडूंगा मैं बेबसी पर
फिर
आंसू तो बिलकूल नहीं खरीदोगे
अब हुस्न कहा से लाऊँ
मैं भी दल्ला हो सकता हूँ
ये कैसे समझाऊँ
या फिर ये बनी हुयी इमेज
मिटा के आऊँ
तो उसके लिए
किस लॉन्ड्री में जाऊं ।
कोई तो खरीद लो न मुझे ।
जी हां मैं आज बिकाऊ हूँ
और
इसीलिए आज बाजार में हूँ ।
और
बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

काफी दिनों से खुद से ही बात कर रहा हूँ या तो बात नहीं होती या लफ्ज नहीं होते ।

काफी दिनों से खुद से ही बात कर रहा हूँ
या तो बात नहीं होती या लफ्ज नहीं होते ।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

तुमने खंजर छुपा के रखा था

मैं तो बस प्रेम से मिला तुमसे
तुमने खंजर छुपा के रखा था ।

चलो धूल डालते है

चलो धूल डालते है
कुछ विचारो पर
भावनाओ पर
रिश्तों पर
और ढक देते है
बहुत सी यादे ।
भूल जाते है वो कदम
जो हम साथ चले थे
लिखते है नयी इबारत
और नया भविष्य ।

शनिवार, 19 मार्च 2016

जातियों के खंडहर में

जातियों के खंडहर में
विकास और भविष्य
तलाशते लोग
मुझे
कस्तूरी मृग जैसे लगते है
जिनमे है
बहुत कुछ दौड़ने को
और पा लेने को
मेहनत और मर्यादा से
उत्कंठा और संकल्प से
पर
बिना कुछ किये
सब पा लेने की चाहत
उन्हें पागल बनाये रहती है
देखें कब मिलती है
मृग को कस्तूरी
और ऐसी जातियों
को वो सब
जो वो ढूढ़ रहे है
नफरतें और छल
के हथियार लेकर |

सोमवार, 14 मार्च 2016

मुझे मेरी जिंदगी चुरा कर

मुझे मेरी जिंदगी चुरा कर
क्यों इतराता कोई खुदा है

ये सच है कंगाल हो गया मैं
पर खुदा तुझे भी क्या मिला
देख मैं तुझसेतेरे सामने
आँखे मिला कर जी रहा हूँ
और तू तिलमिला रहा है
क्यों तूने छीना मेरी जिंदगी
और क्यों साँसे छोड़ दिया फिर
बेरहम तू और तेरी खुदाई
देखा है और देखेगे भी
हम भी तो तेरे ही कुछ है
ऐसे माने
और तू ताकतवर है
कैसे माने
तू लौटा दे मेरी जिंदगी
मुझको सब कुछ दे दे मेरा
तब मानेंगे
वर्ना होगा तू कुछ
हम भी है कुछ
तू जान ले
या हमको जीवन दे दे
या फिर हमसे हार मान ले |



रविवार, 13 मार्च 2016

सालो साल नागो को मैं दूध पिलाता रहां
काट लिया तब जाना कितना जहरीला है ।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

क्या बताये हम अब उपलब्धियों के नाम पर
मौज शौक नफरत और दौलत का भण्डार है ।

रविवार, 10 जनवरी 2016

दूरबीन लगा कर मुझमे कमियां ढ़ूढ़ते है लोग
कमिया नहीं होती तो क्या मैं देवता नहीं होता ।

सोमवार, 4 जनवरी 2016

गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

कल बना कर रहूँगा अपने जैसा |

हो जाती है कुछ गलतियाँ
भूल जाओ उन्हें आगे बढ़ो
कुरेदोगे तो गलती ही होगी
ख़ुश रहना है तो आगे बढ़ो

कभी बहुत बीमार हो गए थे
कभी लगी थी बहुत सी चोटें
क्लास में फेल हो गए कभी
कभी छूट गयी थी ट्रेन कही

तो क्या सब याद रखते हो सब
घुटते रहते हो उन सब के लिए
क्या वापस ला सकते हो वो सब
पलट सकते हो घड़ी की सूइयां 

नहीं न, तो आगे बढ़ो जीत लो
हर वो किला अपने इरादों का
पहन लो अपने धुले हुए कपडे
और कस कर जूते निकल पडो

बना लो जिंदगी को यूँ खुशनुमा
भूल कर की कहा और कब गिरे
और सोच कर की कल तो मेरा है
कल बना कर रहूँगा अपने जैसा | 

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

आप कितने भी मजबूत हो
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या नहीं निकल पाए
इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के वरोध को
बना लो फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना वक्त से
और अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और बुरी का आहत कर देता
और चील देता आत्मा को
सचमुच कसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंध खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 6 दिसंबर 2015

मेरे घर मे झांक झांक मुझको शर्मिंदा मत करना

मेरे घर में झाँक झाँक मुझको शर्मिंदा मत करना
मैंने खुद को मार दिया मुझको जिन्दा मत करना
देखो फटी है जेब औ डिब्बे खाली है
फ्रिज जैसा कुछ सारे खाने खाली है
भूख लगी जब अपने गम खा लेता हूँ
प्यास लगे तो आँखो में इतना पानी है ।
आँखो में यूँ झांक झांक मुझको शर्मिंदा मत करना
मैंने खुद को मार दिया है मुझको जिन्दा मत करना
हम तो संग चले थे पंख लग गए तुमको ही
मेरे छालो को कब मुड़ कर तुमने देखा ही
तुम दौड़े और तुमने तो आसमान छू लिया
मैं ऐसे गिरा मुझको कोई जमीन मिली ना
मेरे फटे चीथडो में झाँक अब शर्मिंदा मत करना

मैंने खुद को मार दिया                

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

मैं तो सूरज का बेटा हूँ तो ऐसे कैसे हारू मैं
तुझ जुगनू के हाथो खुद को ऐसे कैसे मारू मैं   |
मेरी राहे है पथरीली पड जायेंगे तुम्हारे पांव में छाले 
तुम्हारे पांव मखमल के लिए है तुम उस तरफ जाओ |