बुधवार, 18 दिसंबर 2019

मुनादी हो गयी है



मुनादी हो गयी है 
कि 
घर से बिल्कुल न निकले 
फिर भी निकले 
तो जिम्मेदारी आप की है 
क्योकी 
लाठी ,बदूके लिए सत्ता खडी है 
जेल के फाटक अब  खुलेंगे 
देश की जनता की खातिर 
किया होगा गांधी ने                   सत्याग्रह या प्रदर्शन 
पर गांधी नही 
गोडसे ही खड़ा है 
चुकी अब ये सत्ता मे है 
इसलिए ये जनता से बडा है 
लोकतंत्र और आज़ादी 
या संविधान ये क्या जाने 
उसे ये क्यो माने 
जब दी जा रही थी               
कुर्बानियां इनकी खातिर 
तो 
ये गांधी के खिलाफ खड़े थे 
अब भी जेहन वही है 
अब भी इनका मन वही है 
भूल मत जाना जलियावाला
और भी सब 
सत्ता के पास अब भी                         ताकत वही है 
वर्दी और बन्दूके वही है 
मुनादी हो गयी है                  
मुह अब हर्गिज न खोले
और          
कलम भी तोड दे सब 
वरना !
मुनादी हो गयी है ।

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना वक्त से
और अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और बुरी का आहत कर देना 
और चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 8 दिसंबर 2019

आग

#आग#

आग!
जब 
मनुष्य को मिली 
तों
बदल गया 
उसका जीवन.                                                                                
बदली 
मानव सभ्यता ,
होती गई तरक्की 
उतरोत्तर
आग जली 
मिला लोहा ,
अविष्कार दर 
अविष्कार
जीवन का 
सब कुछ पानी 
और
आग के 
इर्द गिर्द ही तों है
वही आग आज 
दावानल बनी 
और
मचा दिया कोहराम
कुछ देर पहले 
जो बहा रहे थे 
पसीना
कि 
घर के चूल्हों में 
आग जल सके  
उसकी तैयारी थी 
बेटी के विवाह की,
बच्चा दवाई का 
इंतजार कर रहा था
इंतजार था 
किताबो का 
और
बूढी अम्मा को  
दर्शन को जाने का
इन्ही सपनो
संघर्षो के लिए
वे 
बहा रहे थे पसीना
कि !
नागिन तरह लपकी आग ,
जहर कि तरह 
उगल दिया 
ढेर सा धुआं
पसीना बहा 
और सूख गया 
लहू ने 
संघर्ष किया 
और जल गया
हाथ पैर 
आग के लिए 
संघर्ष करना जानते थे
लेकिन 
आग से 
बिलकुल नहीं
लेकिन 
अब स्कूल नहीं 
जा पायेगा बचपन
अब कब मिलेगी रोटी 
ऐसे क्यों जली आग 
कि
कई घरो में 
नहीं जलेगी 
कई दिन तक
समय से 
पहले सज गई चिता ,
ये थी
किस बात कि सजा ,
पसीना बहाने की?
अपना बहा रहे थे ,
दूसरे का
अपनी तिजोरी में तों 
नहीं भर रहे थे 
यदि 
लगनी ही थी आग 
तों लगती 
काले धन वाले कि                
तिजोरी में
जिसमे बंद है 
किसी के ख्वाब               
किसी कि रोटी 
किसी की बेटी  
या लग जाती                                  इन्सान के 
अनत संघर्ष में ,
नफ़रत ,अज्ञान ,
भूख ,अशिक्षा,
आतंक,भ्रस्टाचार ,
व्यभिचार ,बेकारी                  लाचारी ,बीमारी 
और बदकारी में
पर किसे जला दिया ?
जो खुद संघर्षरत थे 
और
बहुतो के संघर्ष को                          व्यापकता दे दी .
आग भी आज कि                          व्यवस्था हो गई है
जो गरीब को                        
मारती ,दुत्कारती                                         
और देती अपमान
बेईमानो को धन
गौरव, कुर्सी,सत्ता
मान और सम्मान
इस आग से तों 
बिना आग भले ,
विकास चले 
ना चले 
पर 
ऐसे कोई ना जले।

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

रिमझिम फुहारों के साथ

काश 
रिमझिम फुहारों के साथ 
हम भी बह जाते
या 
लगती एक मेज बाहर 
और
सज जाती उस पर 
पकौड़ियाँ तरह तरह की 
सूजी का हलवा 
और 
अदरक वाली चाय 
फुहारों की बूंदे 
आती चेहरे पर 
या नंगे पैरों पर 
और 
सिहरन दौड़ जाती 
सिमट जाता अस्तित्व 
पिघल जाने को 
काश !

शनिवार, 30 नवंबर 2019

घर के बीच की दीवारों के दिल होता तो कैसा होता



घर के बीच की दीवारों के दिल होता तो कैसा होता
भाई के दुःख पर तब दीवार भी रोती औ दिल रोता ।

पत्थर की दीवारे है पर इन्सान भी पत्थर बनते क्यों 
इक माँ की ही कोख से पैदा नफरत के छाते तनते क्यों 
घर और जमीन तो बंट जाएगी  पर माँ को कैसे बाँटोगे 
नफरत इतनी सब बटना है पर माँ को कहा से  काटोगे

सोमवार, 11 नवंबर 2019

दीवाली

दीपो का त्यौहार आ गया, दीप जलेंगे

दीपो का त्यौहार आ गया ,
दीप  जलेंगे
कही मोम के,कुछ मिट्टी के ,
दीप जलेंगे ,सदा जले है ,
फिर जलने है,
दीपो का त्यौहार जो आया,
बालक बच्चे इंतजार में,
उनकी खातिर खुशिया लाया,
मिठाई ,खील बतासे खायेंगे वे,
दीप जलेंगे ,
बम फुलझड़िया खूब दगेंगी,
पर मिट्टी का दीपक कुछ उदास है,
हंस रही है चीन से आई ही सब चीजे,
जिसके लिए अफीम धर्म था,
उसी चीन से बन कर आये ,
सभी देवता है बाजार में,
भारत के दिए और और देवता,
बस बैठे है इंतजार में,
कोई तों ले लो,आखिर वे अपने है,
कुछ अपनों का पेट भरेगा 
देखो वो गरीब का बच्चा,
टुकुर टुकुर ताक रहा है सब चीजो को,
उसका पिता हिसाब लगाकर ,
खील,बतासे,एक फुलझड़ी ले लेता है
ये कह कर की हम चालाक है  
औरो को खर्चा करने दो
हम मुफ्त में मजे करेंगे,
सुबह सुबह जल्दी जग उसका बेटा बीनेगा,
बची मोमबत्तियां और पटाखे,
अगले दिन वो उनको फोड़ेगा,
जहा काम करती उसकी माँ,
वहा से आई आज मिठाई,
मन रही इस घर में आज दीवाली,
दीवाली आई और ख़त्म हो गयी,
अब लगता है की कल क्या बदला था ,
हम दुनिया कि बुराइयों से,
लड़ने की कसम खाये तों कैसा हो,
तब दीवाली मनाये तों कैसा हो,
दीवाली मनाये,सीमा से कोई लाश नही आई,
इस साल किसी ने अपनी बहू नही जलाई,
जब कोई रात न होगी काली, तब होगी असली दीवाली |

बुधवार, 30 अक्टूबर 2019

जिन्दगी फुटबाल है

एक उम्र के बाद 
आप 
उपयोगी नही होते 
किसी के लिए 
बल्कि 
लोगो की जरूरत 
होती है आप को 
तब !
क्या आप ने कभी 
फुटबाल खेला है 
हर खिलाडी 
फुटबाल को 
सरका देता है 
दूसरे की तरफ 
एक रणनीति से 
गोल करने की रणनीति 
पर 
जिन्दगी के मैदान पर 
लोग फुटबाल 
फेंकते रहते है 
दूसरे की तरफ 
बला समझ कर 
खेल का मैदान हो 
या 
जिन्दगी का 
फुटबाल पैरो से 
ठोकर खाने के 
ही काम आती है
और 
घिस जाने 
पुरानी हो जाने 
पर फेंक दी जाती है 
कूड़ेदान मे 
और 
हवा ही निकल जाये 
अनुपयोगी हो जाये 
तो कभी भी 
कूड़ेदान की चीज 
बन ही जाती है ।
इसलिए कुछ भी करो 
पर उपयोगी बने रहो ।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

एक ही देश मे दो है

दीपावली पर 
बड़े शहरो मे 
दुकानो पर 
महंगी गाडिया 
कम पड़ जाती है 
और 
दिये उदास 
पडे रहते है 
जमीन पर 
गरीब 
एक दिया भी 
नही खरीद पाता है 
सेंसेक्स और शेयर 
उछल रहा है 
और 
सोना चाँदी भी 
पर 
एक और चीज 
उछल रही है 
किसानो और 
बेकारो की 
आत्महत्या की संख्या 
सचमुच आज भी 
एक ही देश मे दो है 
एक 
10 फीसदी इंडिया 
वैभव से संपन्न 
जिन्हे देख कर 
तय होती है योजनाये 
और आँकड़े 
दूसरा 
90 फीसदी भारत 
बदहाल और उपेक्षित
मिली थी रात को 
12 बजे आज़ादी 
पर 
90 फीसदी भारत 
की जिन्दगी मे 
आज भी अन्धेरा है ।
कौन लाएगा उजाला 
भारत की जिन्दगी मे । 

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

कुछ सवाल है जो अनुत्तरित है

कुछ सवाल है
जो अनुत्तरित है
कुछ जवाब है
जो खुद
सवाल बन गए है
सिलसिला टूटता ही नही
न सवालो का न जवाबो का
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है
पर कही तो कोई दीवार होगी
या
होगा इस सफर का डेड एंड
जो रोक देगा क्रिया को
और प्रतिक्रिया को भी
और
फिर सब होगा शांत शांत ।

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

क्या सचमुच वो बादलो पर रहता है ?

क्या सचमुच वो
बादलो पर रहता है ?
क्या सचमुच वो हमे                              
देखता रहता है ?
क्या
ये उसके ही आँसू है
जो
बारिश की शक्ल मे                      जमीन पर आते है ?
और
हमे भिगोकर
छू लेना चाहते है ?
क्या सचमुच ?
तो छू क्यो नही लेते आकर
हमारे पास सचमुच ?

जब तुम थे

जब तुम थे

जब तुम थे न
सब सुबह उठ जाते थे
और
मैं भी अलसाया सा
पर
अब तो
दोपहर हो जाती है
कइ बार
जब तुम थे ना
घर
कितना साफ रहता था
रहता तो
अब भी साफ ही है
पर
जब तुम थे न
तो
डायनिंग टेबल
खाली रह्ती थी
जब तक खाना न लगे
पर
अब वो भरी है
हर उस चीज से
जिसकी
मुझे जरूरत होती है
और
तुम्हारे बिना
भूलने का डर रहता है
जब तुम थे न
किचेन
कितना भरा होता था
तमाम सामान से
पर
अब बस चाय की पत्ती
और
चीनी
या
कुछ
बहुत दिनो के रखी चीजे
जब तुम थे न
सुबह के नाश्ते से
रात तक
रोज
कुछ नया मिलता था
भूखा
अब भी नही रहता हूँ मैं
बस अक्सर
खाना भूल जाता हूँ
दोपहर को
और
कभी रात मे भी
जब तुम थे न
बिस्तर की चादर
बदल जाती थी
कितना एस यू एस टी हूँ ना
कि
नही बदल पाता हूँ
काफी दिन तक
बाकी सब कुछ वही है
जहा तुम छोडकर गये थे
मैं भी और मेरी आदते भी
और सब यादे भी
तुम्हारा तकिया भी
बिस्तर पर वही रखा है
बस सुबह उठना
और
अपना ध्यान रखना ही
भूल गया हूँ मैं ।
जब तुम थे न
अच्छे भले ठहाके गूजते थे
पता नही क्यो
सन्नाटा ही सन्नाटा है
जब तुम थे न
कितने सक्रिय और
जीवन्त थे तुम
पर
ईश्वर ने दीवार पर
टांग दिया
और
तस्वीर को आधा फ़ाड़ कर ।

बारिश की छुवन


बारिश की छुवन

सुबह से हो रही है
लगातार
मूसलाधार बारिश
नही निकला
मैं घर से आज
झाँक रहा हूँ
खिडकी से लगातार
कभी जाकर
खड़ा हो जाता हूँ
दरवाजे पर
और
हाथ बाहर निकाल कर
महसूसता हूँ
बारिश की छुवन को
और
यादो की
किसी छुवन को भी
बारिश ने भिगो दिया है
यादो की चादर को
कभी कांन मे
एक आवाज आती है
अब तो आप को
गरम हलुवा
और
पकौड़ी चाहिये न
कितने कप बना दूँ
चाय या काफी
वरना फिर कहेंगे
कि
हलुवा खाते खाते
और
उसके बाद कहेंगे
कि
पकौड़ी खाते खाते
ठंडी हो गयी चाय तो !
इसलिए एक बार ही
बना कर ले आते है
थर्मस मे
और
पकौड़ी आलू की
या
और चीजो की भी ?
चौक कर देखता हूँ
कांन बेकार हो गये है
आप के जाने के बाद
हर वक्त जब तक
सो नही जाता हूँ
आप की तमाम आहटे
पर सच तो
वैसे
आप के जाने के बाद
बेटी ने भी पूरी तरह
आप का सिखाया निभाया
जब भी बारिश होती
वही बरामदा वही कुर्सिया
और
वो लेकर आ जाती
वही सब कुछ
कुछ कुछ वही स्वाद
खुली आंखो का सपना
टूट गया
उठा धीरे से
डगमगते कदमो से
और
बिजली के केतली मे
गरम कर दिया पानी
उसमे डाल दिया
एक रेडीमेड चाय का पाउच
ले लिया
एक मुट्ठी मे चना
और
आकर बैठ गया हूँ
बारिश के सामने
दरवाजा खोल कर
और
महसूस कर रहा हूँ
वही सब
कितनी यादो के थपेडे
दस्तक दे रहे है आज ।
बिल्कुल चिंता मत करिये
हम बहुत अच्छी तरह है
और
बहुत खुश है ।
देखिये न बारिश मे
चाय लिए बैठे है
पकौडे और हलुवा
अब अच्छा नही लगता
वरना
वो भी बना ही लेते ।
आइये
थोडा बारिश मे भीगा जाये
नही नही
नुक्सान कर देगी ये बारिश
बीमार कर देगी
एक ही बीमारी क्या कम है
जो छीन ले गयी
जिन्दगी से जिन्दगी ।

शनिवार, 7 सितंबर 2019

लोकतंत्र के खम्भे

सत्ता ने कहा
मीडिया से
थोडा झुक जाओ
पर
कुछ घुटने के बल
चलने लगे
और
आधिकतर तो
लेट कर रेगने लगे ।
और
इस तरह
चौथा खम्भा
लेटकर खुद
सत्ता के रास्ते की
पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा
व्यव्स्थापिका से
हद मे रहो
और वो
संगम की जमुना
हो गयी
और कार्यपालिका
रूपी गंगा मे
विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी
सरस्वती की तरह
भीतर भीतर
घुल-मिल रहा है
अब
सब खम्भो की
जिम्मेदारी
खुद जनता के
कन्धो पर है
क्योकी
आज़ादी
मुफ्त मे नही मिलती
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

शनिवार, 24 अगस्त 2019

मैं मर भी जाऊ तो क्या

मैं मर भी जाऊं
तो क्या होगा
शायद अगर हुआ तो
चार कंधे
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले
कुछ क्षण की
कुच्छ सिसकियाँ
कुछ कहानिया
कुछ शिकायतें
कुछ झूठी अच्छाइयां
बहुत सी बुराइयाँ
क्या किया जीवन में
बेकार था
कुछ न किया
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया
नालायक था
कुछ नहीं किया
बार बार बोर होकर भी
दोहराई जाती वही कहानियां
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ
कुछ कम हुआ
लो तेरही भी आ गयी
ये भी खर्च कवाएगी
कोई रिश्तेदार रुक न जाये
चलो सब चले गए
अब देखो कहां क्या क्या है
बाट लो किसका क्या है
और
चल पड़ेगी जिंदगी
अपने अपने रस्ते पर
एक कोने में टंगी तस्वीर
साल में एक बार शायद
बदलेगी माला
और
हाथ जोड़ कर
भागते हुए लोग
आज तो देर हो गयी
इस चक्कर में
पता नहीं क्यों बने है
ये रिवाज
इसलिए
मेरे लिए मेरी वसीयत है
की
कोई नहीं रोयेगा
बिजली में जला देना मुझे
किसी नदी में
नहीं बहाना मुझे
मैं नहीं मानता
कोई पूजा इसलिए
न कोई पूजा
और
न उठावनी तेरही
अगले ही पल से
सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो
मेरे लिए न कभी
कोई पारेशान हुआ
न किसी को होना है
वर्ना
मैं परेशान हो जाऊंगा
कुछ नहीं है मेरे पास
की
कोई लडे की
किसका क्या
बस मेरी यादे
कभी क्रोध लायेंगी
की
नालायक बाप ने
कुछ नहीं किया
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी
कुछ नहीं होगा
सब जैसे था
वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही
मेरी वसीयत है
जो
किसी काम नही आएगी
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ
कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और
मैं भी चुपचाप
ऐसे ही चला जाऊंगा
शायद लावारिश होकर
की
किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

बुधवार, 21 अगस्त 2019

वो अकेला बुजुर्ग पडोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है

वो अकेले बुजुर्ग इंसान

बहुत दिनो क्या सालो से

जानता हूँ उन्हें मैं

और

बहुत अच्छी है उनसे पहचान

पहले उनका घर भरा भरा था

फिर

धीरे धीरे खाली होता चला गया

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे

अचांनक अकेले हो गए वो
कभी बैठने लगे मेरे साथ

और बताने लगे

अपनी पूरी बात

पहले

उनके पास बहुत लोग आते थे

जब वो कुछ थे

और बहुत लोग

उनकी उंगली पकड़ कर

क्या क्या हो गए

तब तो हालत ये थी

किसी के घर मौत भी

हुयी हो

तो फोन करता था

की आप जल्दी आइये

अर्थी उठने वाली है

आप का ही इन्तजार है

शादी हो या कुछ

कितने लोग बुलाते थे

वो लोग जो कहते थे कि 

आप का ज्ञान रौशनी देता है

और आप के बिना तो

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए

अब कोई नहीं आता
कोई नहीं बुलाता

सबको बना दिया

पर ये जहा के तहा रह

गए

जब कोई उनका अपना

धोखा देता या

कर देता पीठ पर वार

तो ये रहते थे बहुत दुखी

और बेक़रार

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में

पर

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो

मैने देखा है

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने

पर जब अपने साथ थे

क्या मजाल उनके चेहरे पर

शिकन भी आई हो कभी

लेकिन

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे

जब से अकेले हो गए वो

उनके बच्चे भी चले गए दूर

अपनी अपनी जरूरी वजहों से

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ

बहुत प्यार करते है

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी

पर मजबूरिया अपनी जगह है

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में

अक्सर देखता हूँ

उन्हें सुबह बाहर निकल कर
लान से

तुलसी की पत्तियां तोड़ते

बताते है

की उनसे अच्छी चाय

कोई नहीं बना सकता है

सेंक लेते है ब्रेड और

काट लेते है कोई फल

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते

मैंने कहा
क्यों खुद करते है ये सब

और इस उम्र में

बोले कसरत भी है
और पैसे की बचत भी

मैंने पुछा की आप को क्या कमी

तो बस मुस्करा कर रह गए

मंगाते है खाना है कभी कभी

शायद दो दिन में एक बार

मैंने पूछा की आप को तो

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी

बोले खाना ज्यादा होता है

और

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है

और

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा

और

नए नए पकवान खाऊंगा

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न

और

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा

कभी कभी बहुत खुश होते है

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर

और सब तैयारी में लगे रहते है

कई दिन तक

फिर जब तक बच्चे साथ होते है

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक

कुछ गुनगुनाते रहते है

और

बच्चो के यहां से आने के बाद भी

कई दिन उदास होते है

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है

बज जाती है तभी घंटी

कौन देखे की कौन है

और
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है

कभी दूध गर्म करते है

और बाहर कोई आ गया

और दूध गिर जाता है पूरा
चाय भी

कभी सब्जी जल जाती है

तो कभी रोटी खाक हो जाती है

पुछा की फिर क्या करते है आप

बोले अगर दिन में होता है
तब तो हो जाता है

पर जब रात में जल जाती है

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना

या अगर ब्रेड है तो वो

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है

और

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है

हल्का हल्का

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना

की मैं भूखा भी सोता हूँ
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है

परेशांन रहने लगेंगे

उन लोगो के खुश रहने

और मस्त रहने के दिन है

उस दिन बहुत दुखी थे

मैंने पुछा क्या हुआ

बोले

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ

और

फिर जोर से ठठाकर हँसे

और चल दिए

मैंने कहा कहा चले

बोले किसी और को ढूढने

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो

कभी कभी जब बीमार हो जाते है

तो दिखलाई नहीं पड़ते

मिले तो पुछा क्या हो गया था

बोले कुछ नहीं

बताओ और क्या हो रहा है

बहुत कुरेदा

तो बोले मेरा दुःख तो

कोई बाँट नहीं सकता

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख

तो बाँट सकता हूँ

आइये कुछ अच्छी बाते करे

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे

मैंने पुछा आज क्या हुआ

बोले एक चिंता है

मुझे कुछ हो गया तो

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे

और खुला रखना भी मुश्किल है

और

उनकी आँखों से टपक गया कुछ

बाँध जो रुका था काफी दिनों से

शायद टूटना ही चाहता था

कि

वो इधर उधर देखने लगे

और खांसने लगे

खुद को रोकने को

और मुझे भरमाने को

फिर धीरे से उठ कर चले गए

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ

और

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा 

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव

और

सुनुगा उनका खोखला ठहाका

और फिर मैं भी सर झुका कर

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा

अपने घर की तरफ

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

रविवार, 18 अगस्त 2019

ट्रंक काल

ट्रंक काल
---------------
पहले भी होता था फोन
पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी
सुनते सब थे पास बैठे हुए
बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे
और कार्डलेस भी

पर उससे पहले
लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे
लोगो के यहाँ क्या
शहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां
होते थे फोन
और
वो बहुत रईस होने की निशानी था
गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी
नहीं था कोई फोन
और बुक करनी होती थी ट्रंककाल
बहुत से लोग बुक करते
और बुक करने को लाइन में लगे होते
पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात
नहीं मिलता था फोन तब
जिसका मिल जाता था
वो विजयी भाव ओढ़ लेता था
और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे
ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का
और खाने या सोने चला जाता था
जी हां ट्रंककाल लगना भी तब
ईश्वर की कृपा

और किस्मत की बात थी
जब मिल जाता था फ़ोन
तो चीखना पड़ता था
की आवाज वहा तक पंहुच जाये
कई बार तो हेलो हेलो
आप सुन रहे है न
कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी
कई कई बार में बात हो जाती थी
और
नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल
तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल
जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन
और ४ जी तथा ३ जी
उस थ्रिल को बस

महसूस कर सकते हो
अतीत में जाकर

जरा जाकर महसूसो

और सोचो की
अपनो की जिंदगी
कितनी मुश्किल थी पहले
ट्रिन ट्रिन
मिल गया मेरा ट्रंक काल
तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

त्यौहार और व्यवहार

जी हां
त्यौहार अब भी होते है
और पहले भी होते थे
अब गरीब है
तो
बस लोगो को को मनाते देख लेता है
या थोडा बहुत मना भी लेता है
मध्यम वर्ग है तो दिखावे के लिए
बजट बिगाड कर भी मनाता है
उच्च वर्ग है तो कहने ही क्या
किसी पद पर है
तो वो नही मनाता
लोग मनाते है उसका त्यौहार
और
लोगो के सामनो से
भर जाता है घर बार
जिनसे काम है
उनके अलावा
कोई किसी से नहीं मिलता
अब किसी भी त्यौहार में
थोक के मेसेज है न
मन गया त्यौहार
और
मान लिया गया उसे ही मिलना
लोगो का और शुभकामनाओ का
त्यौहार पहले भी होते थे
जो पैसे से नहीं
भावनाओ से मनाये जाते थे
गरीब हो या अमीर
सब खुद इन्तजाम करते थे
त्यौहार मनाने का
इतना फर्क था
की
अमीर के काम नौकर कर देते थे
पर बी अकी सब एक समान थे
होली हो तो रंग सबके पास था
और पिचकारी भी
चाहे पीतल की ,लोहे की
नहीं तो बांस को काट कर बनायीं
गरीब की खुद की
फूहड़ता नहीं
बल्कि सबको सबसे मिलने वाले
आनंद का त्यौहार था होली
गाँव में टी झुण्ड बना कर निकलते थे सब
उम्र के हिसाब से
अपनी अपनी भाभियों से होली खेलने
गुझिया बनाने में पूरा परिवार जुटता था
बच्चे भरते और मोड़ते या काटते थे
माँ बेलती थी तो पिता
बैठ कर सेंकते  थे गुझिया
बेईमानी की भी गुंजाइश थी
किसी किसी गुझिया में
ज्यादा मावा भर कर खुद खा लेने की
और
सेव झाड़ना सेंकना
कई दिनों तक चलता था त्यौहार
दीपावली में पतली डंडिया
जो आप्तौर पर नरगट
या अरहर की होती थी
तीन तीन को इस तरह बांधना
की उस पर दिया रख सके
और दरवाजे के सामने उन्हें सजाना
शहर में पहले तो छोटे छोटे दिए
और बाद में मोम्बत्तिया आया गयी
तब भी कई दिन पहले से
मिठाई जैसी चीजे
अपने ज्ञान और हैसियत के हिसाब से
कई दिनों तक तैयारी होती थी
पर
जो तब था और आज नहीं है
वो था समूह में मनाना या समाज में
तब फोन और मोबाइल नहीं थे
तो लोग मोबाइल रहते थे
खूब मिलते थे एक दूसरे से
त्यौहार में एक परिवार आकर मिला गया
तो इसका मतलब ये नहीं
की मिलन पूरा हो गया
अगले दिन ये पूरा परिवार
उनके घर जाता था
और चलता था कई दिनों तक ये क्रम
और फिर पूरा होता था त्यौहार
जी हां त्यौहार एक परिवार नहीं
पूरा समाज मनाता था
एक दूसरे के साथ 
जो कही खो गया
लील लिया नये ज़माने ने
और आर्थिक दिखावा
हीन भावना पैदा कर देता है आज
बहुतो में
देखा होगा आपने भी
जब आप बहां रहे होते है
सफ़ेद या काला धन
तो बहुत सी उदास आँखे
उसे बस टुकुर टुकुर
देख रही होती है
जो पहले के सादे त्योहारों में
नहीं होता था
और
तब केवल त्यौहार नहीं
सच्चा व्यवहार भी होता था