बुधवार, 15 सितंबर 2021

यादो की कागजी नावें

जब और जितनी बार भी 
अपने घर लौटता हूँ 
और 
दरवाजा खोलता हूँ 
बिजली सी कौंध जाती है 
और 
दीवारो पर बन जाती है 
अंनगिनत तस्वीरें 
और 
मन का बादल बरस उठता है 
लहरो पर तैर जाती है 
यादो की कितनी कागजी नावें 
और कागज की नाव 
तो कागज की ही होती है 
खो जाती है अथाह पानी में 
और 
पसर जाता है सन्नाटा
दीवारो से छत तक 
और 
बैठक से बिस्तर तक ।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

बहुत दिनो बाद आज

बहुत दिनो के बाद 
आज फिर उदासी ने घेर लिया 
बहुत दिनो के बाद 
आज अकेलेपन का एहसास हुआ  
बहुत दिनो के बाद 
आज मौन बहुत भारी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज किताबे कितना काट रही है 
बहुत दिनो के बाद 
आज किबोर्ड पर उंगली सुन्न हुयी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज आइना जैसे डर रहा है 
बहुत दिनो के बाद 
आज दीवारे कस कर बैठ गयी 
बहुत दिनो के बाद 
आज छत सर पर कितनी भारी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज पौधे जलते से लगते है 
बहुत दिनो के बाद 
आज पांव घास मे झुलसे है 
बहुत दिनो के बाद 
आज खुद की लडाई खुद से है 
बहुत दिनो के बाद 
आज खुद से कितनी नफरत है 
पर जाये भी तो कहा कहा 
हर जगह यही सब होगा ना 
खालीपन बेबसी बेचारगी 
मरुस्थल का हिरन बन 
भागे भी तो कहा कहा 
संबल की प्यास लिये 
सब जगह बस बालू है 
झूठी सी आस लिये 
भागे भी तो कहा कहा 
बहुत दिनो के बाद 
आज बहुत अधीर हो 
थोडा सा रो लेगे 
बहुत दिनो के बाद आज 
थक कर कुछ सो लेंगे 
बस इस उम्मीद से कि
कल शायद अच्छा हो ।

सोमवार, 23 अगस्त 2021

दिल और दर्द

दिल है और दर्द है

दिल हँसता है

दर्द रोता है

जब दिल रोता है

तो दर्द हँसता है

और दोनों के बीच

कोई दर्द के कीचड में

धंसता है

वो मै हूँ या आप है

या और कोई

पर कहानी तो सच्ची है

दिल की और दर्द की ।

जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

तन है ,मन है और मस्तिस्क 

शरीर है ,दिल है और दिमाग 

दोनों एक ही है 

तन की तड़प अपनी है 

मन की तड़प अपनी है 

और मस्तिस्क की अपनी 

शरीर, दिल और दिमाग की 

भी यही ,दोनों एक है ना ,

शरीर कुछ चाहता है 

मन रोक नहीं पाता 

और मस्तिस्क भी 

मन कुछ चाहता है 

और शरीर साथ नहीं देता 

मस्तिस्क विद्रोह कर देता है 

कभी कभी 

मस्तिस्क रास्ते तय करता है 

मन विचलित हो जाता है 

और शरीर अलग चला जाता है 

लड़ते रहते है तीनो ज्यादातर 

कभी कभी ही तीनो एक ही 

दिशा में चलते है 

और जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा

मैं मर भी जाऊं तो क्या होगा 
शायद अगर हुआ तो 
चार कंधे 
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले 
कुछ क्षण की 
कुछ सिसकियाँ 
कुछ कहानिया 
कुछ शिकायतें 
कुछ झूठी अच्छाइयां 
बहुत सी बुराइयाँ 
क्या किया जीवन में 
बेकार था कुछ न किया 
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया 
नालायक था कुछ नहीं किया 
बार बार बोर होकर भी 
दोहराई जाती वही कहानियां 
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ कुछ कम हुआ 
लो तेरही भी आ गयी 
ये भी खर्च कवाएगी 
कोई रिश्तेदार रुक न जाये 
चलो सब चले गए 
अब देखो कहां क्या क्या है 
बाट लो किसका क्या है 
और 
चल पड़ेगी जिंदगी 
अपने अपने रस्ते पर 
एक कोने में टंगी तस्वीर 
साल में एक बार शायद 
बदलेगी माला 
और हाथ जोड़ कर भागते हुए लोग 
आज तो देर हो गयी इस चक्कर में 
पता नहीं क्यों बने है ये रिवाज 
इसलिए 
मेरे लिए मेरी वसीयत है 
की 
कोई नहीं रोयेगा 
बिजली में जला देना मुझे 
किसी नदी में नहीं बहाना मुझे 
मैं नहीं मानता कोई पूजा इसलिए 
न कोई पूजा और न उठावनी तेरही 
अगले ही पल से सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो 
मेरे लिए न कभी कोई पारेशान हुआ 
न किसी को होना है 
वर्ना मैं परेशान हो जाऊंगा 
कुछ नहीं है मेरे पास
की कोई लडे की किसका क्या 
बस मेरी यादे कभी क्रोध लायेंगी
की नालायक बाप ने कुछ नहीं किया 
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी 
कुछ नहीं होगा 
सब जैसे था वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही मेरी वसीयत है 
जो किसी काम नही आएगी 
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ 
कोई फर्क नहीं पड़ता 
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और मैं भी चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा 
शायद लावारिश होकर 
की किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

शनिवार, 7 अगस्त 2021

हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा

निकल पड़ें जब भी आज़ाद झोंके की तरह 
हाँ शोर मचाएंगे और मशहूर हो जायेंगे हम 
ये दस्तक है हमारी सुन लो गर बहरे भी हो 
वर्ना बेचैन करने वाला शोर बन जायेंगे हम ।

हमें मुर्दा समझते हो निकलेंगे मुट्ठिया बांधे हुए 
तुम देखते रह जावोगे और झंडा फहराएंगे हम 
हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा 
हाँ देखोगे उदासी से जब शोला बन जायेंगे हम ।

अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की 
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो खेत की 
अभी आगाज़ है फुटपाथो पर अब  नजर कर लो 
जमीन पर जब गिरोगे तुम खुश हो मुस्करायेंगे हम ।

रविवार, 25 जुलाई 2021

ईश्वर कैसा होता है

कितने महान है वो लोग
जो पत्थरो से सर मारते है 
और 
मानते है कि  
पत्थर चमत्कार करता है 
हा 
सच है की पहली आग 
लकड़ियो की रगड़ से 
या 
पत्थरो के टकराने से ही पैदा हुई 
पर 
उसका कारण तो वैज्ञानिक है 
उसमे चमत्कार कुछ भी नही 
और 
किसी अन्य लोक की
ताकत भी कुछ भी नही
मेरी दुवा है आप सबको कि 
सर टकराते रहो 
पर जरा सम्हाल कर
सर से खूँन निकलता है और
फिर उसे रोकने को
दवाई ,मरहम पट्टी 
और 
डाक्टर की जरूरत पडती है 
अगर अधिक निकल गया 
तो 
शायद कही और जाकर
हो सकता है 
दर्शन हो ही जाता हो परमात्मा का
पर तय नही 
क्योकि 
किसी ने लौट कर बताया नही 
कि ईश्वर कैसा होता है ।

जमाने जैसा हो गया हूँ

मिटा दिए है वो तमाम नम्बर 
जो नही उठे मेरी ज़रूरत में 
या 
यूँ ही जब हाल जानना चाहा 
भुला दिए है तमाम वो नाम 
जिन्हें मैं याद नही आया कब से 
वो चेहरे भी धुंधले कर दिए मैंने
जिन्होंने फेर ली निगाहें मुझसे 
हा 
अब मैं भी जमाने जैसा हो गया हूँ ?

हम कुम्भकर्ण है

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकर्ण है  ।

शनिवार, 24 जुलाई 2021

शनिवार, 17 जुलाई 2021

जहाँ कुछ प्यार है

चलो चले वहाँ 
दूर कही दूर ,
जहाँ कुछ आस है 
कुछ प्यार है 
और उम्मीदें कुछ ।

रिश्ते या बुलबुले

छोटे शहरो के 
शहद जैसे रिश्ते 
बड़े शहरो की 
जमीन पाते ही 
कड़वे हो गये
जो फेविकाल से
जुडे लगते थे 
बुलबुले हो गये ।

दीवारे

बहुत ही अपने 
जब संपन्न हो जाते है 
या चढ़ जाते है 
ऊंची पायदाने 
उग आती है 
ऊंची दीवारे 
अपनो के बीच 
रिश्तो मे,भावो मे ।

छोटे शहर और बड़े शहर

वही लोग 
जो छोटे शहरो मे  
कितने घनिष्ट 
और 
कितने अपने लगते है 
क्योकी खूब मिलते है 
सुख और दुख मे 
पर 
बड़े शहर मे आते ही 
बहुत दूर हो जाते है 
और बिला जाते है 
सारे रिश्ते और भावनायें 
नही मिलते सालो साल 
या 
संपन्न ज्यादा हो जाये 
तो 
छोटे शहर मे भी 
दीवारे उग जाती है 
रिश्तो के बीच ।

बुधवार, 14 जुलाई 2021

आसमान कुछ कह रहा है

आसमान कुछ कह रहा है 
अपनी बोली अपनी भाषा में 
ज़रा सुनिए इसका गीत 
इसका संगीत 
कितना मनभावन है 
कितना शीतल है 
इंतज़ार था इसी का 
कितने दिन से 
पृथ्वी को और हमको भी 
कि 
बादल झूम कर आए 
खूब झूम कर गाए 
हम सब झूम कर नहाए 
और पृथ्वी भी तृप्त हो जाए । 


शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

गुरुवार, 17 जून 2021

सो जाओ व्यवस्था की तरह

सो जाओ इस व्यवस्था की तरह:

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ कमरे की 
और मन की भी चिंतन की 
और आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और बारिश में 
लगने दो आग किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत या असबाब 
मुझे क्या मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि कोई चीख सुनाई न पड़े 
और न दिखाई दे बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

बच्चा बन जाइए

घर मे परिवार होता है 
तभी वो घर होता है 
वर्ना तो बेजान दीवारे है
जिनमे आप कैदी है 
पर 
घर मे कोई छोटा सा बच्चा हो 
और 
बन जाइये बच्चा उसके साथ 
वाह 
क्या जिंदगी हो जाती है 
फिर मिल जाती जिंदगी 
और 
बचपन पोंछ देता है सारे गम 
सारी तकलीफे , बीमारी और वेचारगी 
बन गया हूँ मैं बच्चा आजकल 
सचमुच खूब जी रहा हूँ मैं 
भरपूर जी रहा हूँ मैं 
चुरा लेना चाहता हूँ खुशिया 
और इसकी यादे 
अगली बार फिर मिलने तक के लिए ।
आह जिंदगी वाह जिंदगी ।
बच्चा बन कर देखिये 
बच्चो से प्यार करिये 
खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

सो जाओ व्यवस्था की तरह

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ 
कमरे की 
और 
मन की भी 
चिंतन की 
और 
आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि 
छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और 
हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और 
बारिश में 
लगने दो आग 
किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत 
या असबाब 
मुझे क्या 
मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और 
बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि 
कोई चीख सुनाई न पड़े 
और 
न दिखाई दे 
बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब 
मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद 
सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

मंगलवार, 15 जून 2021

प्रकृती को ईश्वर माने

इस दौर मे कितने लोग 
थे हो गये 
कितने नंबर 
अब कभी नही मिलेंगे 
पर 
मिटाने की हिम्मत नही होती 
कि 
शायद फोन आ ही जाये 
कितनो से बात किया 
जो आखिरी थी 
कितनो को चाह कर भी
देख नही पाये 
कितनो को चाह कर भी
कन्धा नही दे पाये 
जी 
ये कहानी सिर्फ मेरी नही
घर घर की है 
जो फैली है
कन्याकुमारी से कश्मीर तक 
कैसे नाची मौत
और 
कितना लाचार कर दिया
मानवता को 
ना भगवान काम आये
ना अल्ला ना ईसा 
ना मंदिर काम आया 
ना मस्जिद ना कोई धर्म
फिर भी लड़े जा रहे है
सब उसके लिये 
जिसे किसी ने देखा नही
जो काम आया नही
इन्सान बन जाये तो
इंसानियत बचेगी 
और 
बचेगी शोध से
आविष्कारो से
और 
प्रकृति की रक्षा से 
इसलिए मानना है तो
प्रकृती को ईश्वर माने 
और 
इन्सान लड़ने के लिये
प्रेम से रहने के लिये है 
ये बात जाने ।

गुरुवार, 3 जून 2021

बारूद बोने वाले किसान

खेतो और बगीचो में 
बारूद बोने वाले 
ये नए किसान 
कहा से आ गए 
इन खेतो और बगीचो में 
यहाँ तो पैदा होती थी फसले 
और 
भरती थी पेट इन्सानों का 
और
होते थे फल मौसम के अनुसार 
और 
पेट भरने के साथ साथ
लड़ते थे इंसान में बीमारियो से 
पर ये पेट क्या पूरा शरीर 
उडा देने वाले 
और साँसे छीन लेने वाले 
मौत बाँटने वाले 
खेतिहर किसने पैदा कर दिया 
इसी समाज में और खेत में
रोकना ही होगा 
इन नए किसानो को 
और बचाना ही होगा
इंसानियत को 
चाहे उसके लिए 
बारूद से इन 
नए बारूद बोने वाले 
किसानो को ही 
क्यों न उड़ा दिया जाये 
इंसानियत बचाने को ।

सोमवार, 24 मई 2021

मगरूर होना चाहता हूं ।

मैं भी 
मगरूर होना चाहता हूं ।
महसूस करना चाहता हूं
रावण के अहंकार को 
अपने अंदर
इसलिए मुझे भी 
कुछ दिन सत्ता दे दो 
हे ईश्वर ।

मंगलवार, 18 मई 2021

गहन सन्नाटा

आप ने कभी
कोई बाँध टूटता हुआ देखा है 
शायद हाँ भी और ना भी 
वैसे ही 
कभी कभी फुट पड़ता है 
इंसान पूरे वेग से 
और बह जाता है 
वर्षो से रुका हुआ पानी 
और फिर 
छा जाता है गहन सन्नाटा ।

मंगलवार, 11 मई 2021

नदी में लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

शनिवार, 8 मई 2021

ईश्वर है भी या नही ?

ईश्वर है भी या नही ?

जिनके घर से 
कम हो जा रहे है लोग 
वो पूछ रहे है कि 
हमने क्या बुरा किया था 
या जाने वाले ने क्या किया था 
बता तो दो ईश्वर 
पर ईश्वर है मौन 
हजारो सालो से 
सब तो किया इश्वर को खुश करने को 
फिर भी इतने जुल्म 
तब सवाल पूछते है सब 
कौन सा ईश्वर  
जो कभी नही आया किसी के भी पुकारे 
शायद आया हो किसी युग मे 
और 
पता नही अब है भी या नही 
होता तो क्या ऐसा होता 
होता तो क्या ये सब होता ।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

बेहतर है क़ि आप फिर चले

बंद दरवाज़े के पीछे 
छिपे होते है कितने राज 
कितनी सिसकिया 
और 
कितनी चीखे 
कुछ तो 
निकल ही नही पाती है 
बस घुट कर रह जाती है 
कहने को तो 
सब अपने ही होते है 
पर 
कुछ ऊर्जा देते है 
और 
देते है जीने की तमन्ना 
और 
कुछ गला घोट कर 
मार देते है 
या 
बना देते है मरने जैसा 
बाहर निकल कर 
कितना नकली हंसी हँसते है लोग 
और 
कितनी खोखली होती है उनकी मुस्कराहट 
दर असल इस हंसी मे
एक चीख होती है 
बहुत डरावनी सी             
और 
मुस्कराहट बिल्कुल वही              
जो 
फाँसी पर चढ़ने वाले के
चेहरे पर होती है 
रिश्ते भी कितने 
बोझिल हो जाते है 
जब कोई खुद को
बोझ बना लेता है 
अपने ही ऐतिहासिक
कामो से 
और 
फिर अपने ही वर्तमान से      
क्यो नही जीवन उतना ही हो 
की 
आप ऐश करे अपनी मर्जी का 
और 
फिर छोड दे शरीर 
उसके बाद जीवन का
मतलब भी क्या है 
जब तक आप जरूरी हो
दूनिया और समाज के लिए जिए 
या अपने लिए 
वर्ना क्यो शर्मिंदा हो रोज 
बेहतर है कि आप फिर चले ।

रच देते है कविता

ये जो लोग 
रोज पढते है 
नई किताबे 
रोज लिखते है 
कोई कविता 
गजल या कहानी 
और 
नये नये किस्से भी 
कितने 
सुखी लोग है वो
कितने निश्चिंत 
कितने बेपरवाह 
और 
रच देते है 
रोज कुछ नया
पर 
जो खुद को ही 
जिन्दा रखने 
के जतन मे 
बिता देते है दिन 
वो जिन्दा है 
ये भी तो रचना है ।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

प्रकृति ही ईश्वर

ईश्वर और कोई नहीं 
प्रकृति ही ईश्वर है 

हमने पत्थरों, पेड़ों और 
पशुओं की पूजा की 
जिससे हम डरे उसकी पूजा की  
बाद में लोगों को डराने के लिए 
गढ़ने लगे अपने-अपने ईश्वर 
वह बन गया हमारा हथियार 
अधिकार और व्यापार

कूटरचित माताओं और बाबाओं के 
वेश में फैल गया ईश्वर  
पाखंडियों ने स्वार्थ में 
गली-गली बैठा दिये ईश्वर 
धर्म के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
पाप करो और बहती गंगा में हाथ धो लो
बुरा करो और मानस-पाठ करा लो

कहते हैं पाप बढ़ेगा तो जन्म लेगा ईश्वर 
पर आज के पापियों से डरकर 
कहीं छिप गया है ईश्वर 

हमने काट डाले जंगल
कुपित है प्रकृति
मंदिर-मस्जिद छोड़ो
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला से नाता तोड़ो 
बचने के ठिकाने बनाओ

बन सको तो भगीरथ बनो 
नदियों को बचाओ 
पहाड़ों, जंगलों को बचाओ
आओ, आक्सीजन बढ़ाओ
जानें बचाओ

सन्नाटा

क्या वक्त है 
चारो तरफ 
या तो सन्नाटा है 
या 
सन्नाटा टूटता है 
तो 
आर्द्र स्वर मे जिंदगी
बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है 
गहन सन्नाटा ।

इश्वर क्या है

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

सन्नाटा

क्या वक्त है चारो तरफ या तो सन्नाटा है 
या सन्नाटा टूटता है तो आर्द्र स्वर मे जिंदगी बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है गहन सन्नाटा ।

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? जो अज्ञात है 
या प्रकृति ही ईश्वर है 
पत्थर पेड़ पक्षी को माना ईश्वर
जिससे डरे उसे माना ईश्वर
फिर हम समझदार हो गए 
तो खुद गढ़ने लगे ईश्वर
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने ईश्वर
जीने की इच्छा या मौत का डर है 
जो हथियार बन गया हमारा 
जो व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने न देखा ना मिला ईश्वर 
पर डीह बाबा , सम्मो माई 
संतोषी माता से साई बाबा तक
तमाम पत्थरों मे फैल गया ईश्वर 
फिर इंसानो बनने लगे ईश्वर
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब अज्ञात और दूर था ईश्वर
जबसे चौराहो पर आ गया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
निकाल दिये रास्ते पाप धोने के 
जब एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार लिया था ईश्वर ने 
पर अब इनकी फ़ौज हो गयी 
तो बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो
हवा आज ईश्वर है उसके लिए पेड़
पानी भी,जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
मंदिर मस्जिद नही प्रकृति बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर शक्ति है तो डरो पाप मत करो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियो और जंगल को बचाओ 
देवस्थल नही जीवन स्थलो बनाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

हमारा हुक्म है

हमारा हुक्म है कि 
घर से निकलना मना है 
कोरोना काट लेगा 
हुक्म है 
खिडकी दरवाजे बन्द रखो 
हुक्म की आज निकलो ,
यहा निकलो , वहा निकलो 
रैली हमारी , भाषण हमारा 
कोरोना से मुक्त है ये 
मगर बाकी जगह 
मुह भी खोला तो जेल होगी 
सूइयां सबके लगेगी 
फिर चाहे मरो चाहे जियो 
ये भगवान जाने 
पर कोरोना 
भगवान के बस का नही है 
उसका इलाज तो 
बस पुलिस के पास है 
खबरदार 
जो बाकी जगह बाहर भी निकले ।
हुक्म है कि हुक्मनामा पढते रहो 
हुक्म है कि हुक्म पर चलते रहो ।

माफ करता हूँ तुम्हे

हे 
चलो  
मैं 
तुम्हे 
माफ़ करता हूँ ।
ताकि 
तुम 
दगा दे सको 
और 
छल सको 
बहुतो को 
और 
इस्तेमाल कर 
मार सको 
पीठ में खंजर ।
पर 
तुम तो एक 
खंजर रखते हो 
पर
बहुत से धोखे 
और 
खंजर है 
तुम्हारे सामने भी 
आने वाले 
हम तो 
मजबूत हो चुके 
तुम्हारे घाव से 
पर 
तुम तो 
बहुत कमजोर हो 
अपनी 
कमजोरियों के कारण ।

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

जारी रखते है खोज

ऐसा क्यो होता है अक्सर
कि 
जिस जमीन पर आप 
बुनियाद बनाना चाहते है 
वही दलदल निकल आती है 
और 
धंस जाता है खुद का वजूद 
जिस पेड़ को मजबूत समझ 
छप्पर का आधार बनाना चाहते है 
वही इतना कमजोर निकल जाता है 
कि 
तनिक सा बोझ पडते ही 
लचक जाता है 
और 
सब कुछ जमीदोज हो जाता है 
पहाडी पर चढ़ते वक्त 
पहला ही पत्थर 
कमजोर निकल जाता है 
और 
पहले ही कदम पर घायल कर 
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर 
हिम्मत तब भी नही हारते लोग 
और 
जारी रखते है खोज 
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की 
पूरी तरह लम्बे समय तक 
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की 
और 
पहाडी पर घायल होकर भी 
अन्तिम चोटी तक पहुचने के 
सही मार्ग की ।

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

डमरू मदारी और बन्दर

डमरु मदारी और बंदर 
—————————
इधर कुछ साल पहले तक
पता नहीं क्या हो गया 
कि
मदारी दिखने बंद हो गए थे 
क्या उनको नचाने को 
बंदर नहीं मिल रहे थे ?
या दर्शकों ने 
देखना बंद कर दिया था ?
अब समस्या दूर हो गयी है 
बंदर काफ़ी मिल गये है 
और 
दर्शक तो हमेशा से है ही 
जो तटस्थ है । 
बजा डमरु बजाओ ताली 
बंदरिया 
जी मालिक 
नाच दिखाएगी 
हा दिखाऊँगी 
क्या कह रही है 
पहले पैसे फेंको
अरे अब क्यों रुठी है 
पैसे कम आए 
मेहरबान और फेंको 
फिर तमाशा देखो 
डमरु बजने लगता है 
और 
अभ्यस्त बंदर बंदरिया 
खेला दोहराने लगते है 
वही पुराना वही बासी सा 
फिर भी 
डमरु की आवाज पर 
नाचना ही नियति है 
बंदरों का आज तक ।

शनिवार, 27 मार्च 2021

दोस्त बिला जाते है

हमारे कुछ दोस्त होते है जो बिला जाते है 
जब जब जिंदगी मुश्किलो मे आती है ।

और 

जरा सी जिंदगी मे रौनक तो आने दो 
दोस्तो से मेरा घर भी भर जाएगा  ।

मीठा होता तो आंखे भी इसको पी गयी होती ।

आंखो से निकलता है वो खारा जल होता है 
क्या खारे जल से कोई आंखो को धोता है 

खारा था तो निकल गया कोई खास बात नही 
मीठा होता तो आंखे भी इसको पी गयी होती ।

इन्सान हो तो उट्ठो

चलो हँसते है 
अपनी बेबसी पर 
किसी की सिसकियो पर 
चलो हसते है 
किसी की मौत पर 
किसी की बर्बादियो पर 
चलो हसते है 
उस बेटी की लूटी आबरू  पर 
उस माँ के गये सहारे पर 
चलो हँसते है 
उस बेवा के रूदन पर 
बहन की सूनी कलाई पर 
चली हसते है 
पथराई आंखो पर पिता की 
बच्चों के अंधरे मुस्तकबिल पर 
क्योकी हंसना ही जिंदगी है ।
यही गर फ़लसफ़ा है जिंदगी का 
तो ऐसे फलसफे को गर्त कर दो 
उठ सको तो उठो 
चल सको तो चलो 
वर्ना बस हुंकार भरो 
हर बेबसी और हर रूदन पर 
हर जुल्म पर जो ढाये जा रहे हो 
और 
हर कफन पर 
जो यूँ ही पहनाए जा रहे है ।
अगर इन्सान हो तो उट्ठो 
हर गली से हर खेत 
और खलिहान से उट्ठो 
और चल पडो 
जुल्म खुद ब खुद मिट जायेगा
अंधेरा खुद ब खुद छट जायेगा 
सूरज खुद ही मुस्करायेगा ।
(अभी बन गयी कविता ) किसी का भी संशोधन मान्य ।

गोलिया पैरो मे लगने लगी है

बन्दूके भी अब खुद को छलने लगी है 
गोलिया अब पैरो मे लगने लगी है ।
वो बदमाश गायब था लापता था 
इनाम बढते ही शिनाख्त मिलने लगी है 
इनाम इकराम मिला जान बची दोनो खुश 
ये रिश्तों की गर्मी  पिघलने लगी है । 

शनिवार, 20 मार्च 2021

डरा दो सबको

किसी भी तरह से 
सबको डराओ 
क्योकी 
जो नही डरते 
वो सत्ता के लिए 
खतरा बन जाते है 
और 
डरे हुये लोग 
गुलामी मान लेते है 
बस यूँ ही 
इसलिये ऐसे या वैसे 
कैसे भी 
आवाम को डराओ 
उन्हे जीता जागता 
इन्सान मत रहने दो 
उन्हे 
हांके पर चलने वाली 
भेडे बनाओ 
और फिर जैसा चाहो
वैसा राज चलाओ ।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

ना पहले रुका था ना अब भी रुकूँगा

ना मैं थकूंगा न मैं हरगिज झुकूँगा 
खुशफहमी न पालो नहीं मैं रुकुंगा 
न जाने कितने झंझावातो को देखा 
कितनी कठिन दिन रातो को देखा 
न पहले रुका न अब मैं रुकुंगा
न पहले थका न अब मैं थकूंगा ।
चोटी  पर चढ़ कौन बसता वहां है 
समन्दर में जा कौन रुकता वहां है 
मैं भी सैलानी हूँ मैं क्यों बसूँगा 
मेरा भी सफ़र है मैं क्यों रुकूंगा 
ये जीवन है जब तक चलते ही जाना 
आसमा पर उड़ना जमी पर भी आना 
अंतिम सफ़र आसमा पर बसूँगा 
जमी घूम ली तो यहाँ क्यों रुकूंगा ।
इश्वर होने की ग़लतफ़हमी है तुमको 
मैं इंसा हूँ  खुद पर भरोसा है मुझको 
हैं मेरे पांव अपने मैं उनसे चलूँगा 
न पहले रुक था न अब मैं रुकुंगा
कोई खुद को भगवान माने तो माने 
अपनी सारी शक्ति मुझ पर ही ताने 
ऐसी शक्ति से मैं न हरगिज डरूंगा 
न पहले रुका था न अब मैं रुकुंगा ।

बुधवार, 27 जनवरी 2021

वो हमको मंज़ूर नही

गाना चाहे तो गाइये और मिलकर समूह मे गाइये-

गांधी पर गोली चलवाया वो हमको मंजूर नही 
अंग्रेजो के तलवे चाटे देशभक्तो को जेल भिजवाया वो हमको मंजूर नही 
अंगेजो से माफी मांगी 
अंग्रेजो से पेंशन खाया वो हमको मंजूर नही 
आज़ादी मंजूर न जिनको वो हमको मंजूर नही 
जिसने देश का झन्डा जलाया वो हमको मंजूर नही 
सालो झन्डा ना फहराया वो हमको मंजूर नही 
गाय के नाम पे था मरवाया वो हमको मंजूर नही 
राम के नाम पे दंगा कराया वो हमको मंजूर नही 
आग लगायी घर जलवाया वो हमको मंजूर नही 
तलवारो पर बच्चे उछाले कांच पर बहनो को नचवाया वो हमको मंजूर नही 
श्रीराम का नारा लगाकर बहनो के कपडे नुचवाया वो हमको मंजूर 
इज्जत लूटी और जलाया वो हमको मंजूर नही 
संविधान को नही मानता वो हमको मंजूर नही 
लोकतंत्र को नही जानता वो हमको मंजूर नही 
बेटे बेटी को पिटवाये वो हमको मंजूर नही 
रोटी छीने सब बिकवाये वो हमको मंजूर नही 
नफरत का करोबार फैलाये वो हमको मंजूर नही 
सीमा पर बेटे मरवाए वो हमको मंजूर 
दुश्मन के घर जाये बिना बुलाये वो हमको मंजूर नही 
बिरयानी खाए साड़ी पहुचाये वो हमको मंजूर 
फिर अपने बच्चे मरवाए वो हमको मंजूर नही 
अपनो पे इतने केस लगाये वो हमको मंजूर नही 
आओ मिलकर इन्हे भगाये ये हमको मंजूर 
आओ मिल आवाज लगाये ये हमको मंजूर नही 
फासीवाद से पिण्ड छुड़ाए ये हमको मंजूर नही ।

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

मिल गया चुनांव को राशन

बस रँगते जाओ 
अपनी सोच ,
अपने कर्म , 
अपनी नाक़ामियाँ, 
अपनी अयोग्यता 
और 
दृष्टिहीनता 
और 
उसके नीचे सुलगाते जाओ 
आग नफरत की , 
दंगो की ,चीखों की ।
बस हो गया शासन 
और 
मिल गया चुनांव को राशन 
रंग ही लोकतन्त्र ,
रंग ही संविधान
रंग ही इंसानियत
रंग ही रोटी 
रंग ही कपड़ा 
और 
रंग ही मकान 
और क्या ?

जंग जारी है जमीन की कमीन से

अपनी अपनी किस्मत 
कि 
जिस किसी को गड्ढे से 
या जमीन से 
और 
अंनपहचानेपन से उठा कर 
उंगली पकड़ कर 
कही बैठा दिया 
वही खंजर छुपा कर बैठ गया 
पीठ पर वार करने को 
उसी ने कोशिश की 
कि 
अस्तित्व ही खत्म कर दे 
हमारा 
कितने कमीन मा बाप
और             
शिक्षक रहे होगे 
जिन्होने 
ये शिक्षा दी होगी इन्हे 
पता नही 
कही पहला दाव 
इन्होने अपने मा बाप
और                
शिक्षक पर ही 
आजमाया होगा 
तब 
इतना कमीन बनने
का हुनर आया होगा 
मुझे इनसे घाव खाने का 
इतना चस्का लग गया है 
कि 
मैं खुद को बदलने को तैयार नही 
और 
ये लोग भी कमीनपने की नाव से 
उतरने को तैयार नही 
जंग जारी है लगातार 
कमीन मे और जमीन मे 
दोगलेपन मे और जमीर मे 
मुझे पता है 
मैं फिर हार जाऊंगा 
इनसे 
पर मेरी जिद है 
की 
एक दिन इन्हे हराउंगा ।
शायद 
तब तक दुनिया से
कूच कर जाऊंगा ।

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

मिल गया चुनांव को राशन

बस रँगते जाओ 
अपनी सोच ,
अपने कर्म , 
अपनी नाक़ामियाँ, 
अपनी अयोग्यता 
और 
दृष्टिहीनता 
और 
उसके नीचे सुलगाते जाओ 
आग नफरत की , 
दंगो की ,चीखों की ।
बस हो गया शासन 
और 
मिल गया चुनांव को राशन 
रंग ही लोकतन्त्र ,
रंग ही संविधान
रंग ही इंसानियत
रंग ही रोटी 
रंग ही कपड़ा 
और 
रंग ही मकान 
और क्या ?

रविवार, 3 जनवरी 2021

बेचारा हिरन

कभी कभी 
कोई दर्द
अचानक 
आप को
कितना 
बेचैन कर देता है 
खाने भी नही देता
और 
सोने भी नही देता 
और
कितना जगा देता है 
रात तक 
या 
पूरी रात 
और 
बेचारे निरीह 
उस
हिरन की तरह 
जिसे
बाण लगा हो 
या लगी हो गोली 
और 
वो 
पलट कर 
उसी को 
चाटता है 
अज्ञानता से
बिना जाने 
की 
ये 
उसकी मौत है 
बेचारा हिरन 
और 
बेचारा
अगर 
भावुक इंसान हो 
तो बोली
गोली से ज्यादा 
लगती है न 
कितना दर्द देती है
सहा भी नही जाता 
रहा भी नही जाता ।
खैर 
वेचारा हिरन ।
और बेचारा 
??..????

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

दिल्ली को घेरे गांधी

दिल्ली की सीमाओ पर
गांधी खुद खड़े है
गांधी जी के हत्यारे हत्प्रभ है 
कि 
वो अभी तक जिन्दा कैसे 
और 
फिर मारने की ताक मे है 
गांधी जी से नफरत करने वाले 
उन्हे असफल कर देना चाहते है 
पर गांधी तब नही हारे 
तो 
अब क्या हारेंगे 
जब फैल गये है 
पूरी दुनिया मे 
इंसानियत का सूर्य बन कर 
इन्कलाब की आवाज बन कर 
अहिंसा का मंत्र बन कर 
सत्याग्रह का हथियार बन कर ।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

चल पडूंगा पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ--

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और 
अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और 
अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए 
खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना 
वक्त से
और 
अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और 
बुरी का आहत कर देना 
और 
चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और 
कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और 
कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |