गुरुवार, 30 मार्च 2023

पत्थरों को खूब खिलाओ अगर वो खा सके ?

क्या हम एक दिया उन घरों में जला सकते है 
जहा अंधेरा है हमेशा से 
और 
रोशनी पहुंची ही नहीं आजतक ?
क्या हम उनका पेट भरने में मदद कर सकते है 
जो बीनते है कूड़े से खाना जानवरो के साथ 
मनुष्य होकर भी 
जो चाटते है 
हमारी फेंकी हुई पत्तल 
हमारे जैसा और उसी की संतान होकर 
जिसकी हम है ? 
फिर जब कोई ऐसा न बचे 
तो 
पत्थरों और दीवारों पर खूब रोशनी करो 
पत्थरों को खूब खिलाओ अगर वो खा सके ?

दोनो कुत्ते

लोग आवारा कुत्तों से बहुत परेशान है :
आवारा कुत्तों से जो जानवर तो है ही 
मनुष्यो में भी हो गए है । 
चाहे जहा, चाहे जिसको 
चाहे जैसे काट लेते है ,
और कपड़े फाड़ देते है, 
देखा होगा कई वीडियो 
बच्चो बच्चियों को झिझोड़ते हुए 
दोनो तरह के कुत्तों का  
और 
दोनो का ही कोई इलाज नहीं  है 
क्योंकि ये सब कुत्ते हमारी पैदाइश है ।

उनको उनके घर में फिर से बसाए

अब क्यों परेशान है हम बंदरो से 
की वो उजाडे जा रहे है 
हमारा बगीचा हमारी फुलवारी
खा जाते है हमारी चीज छीन कर 
काट लेते है हमको आक्रमण कर 
हमने भी तो उजाड़ दिए उनके घर 
उनका बगीचा और जंगल 
खत्म कर दिया उनके भोजन के साधन  
बदर वही कर रहे है हमारे साथ 
जो हमने किया है लगातार उनके साथ 
आज बंदर है तो कल बाकी जानवर भी 
आक्रमण करेंगे इंसानी आबादी पर 
उनसे परेशान है 
तो 
उनको उनके घर में फिर से बसाए 
उनके लिए फिर से जंगल उगाए ।

सोमवार, 27 मार्च 2023

सूरज कल खुद ही मुस्करायेगा ।

सूरज कल खुद ही मुस्करायेगा ।

चलो हँसते है 
अपनी बेबसी पर 
किसी की सिसकियो पर 
चलो हसते है 
किसी की मौत पर 
किसी की बर्बादियो पर 
चलो हसते है 
उस बेटी की लूटी आबरू  पर 
उस माँ के गये सहारे पर 
चलो हँसते है 
उस बेवा के रूदन पर 
बहन की सूनी कलाईयो  पर 
चलो हसते है 
पथराई आंखो पर पिता की 
बच्चों के अंधेरे  मुस्तकबिल पर 
क्योकी हंसना ही जिंदगी है ।
यही गर फ़लसफ़ा है जिंदगी का 
तो ऐसे फलसफे को गर्त कर दो 
उठ सको तो उठो
चल सको तो चलो 
वर्ना घर से ही हुंकार भरो 
हर बेबसी और हर रूदन पर 
हर जुल्म पर जो ढाये जा रहे हो 
और हर कफन पर जो यूँ ही पहनाए जा रहे हो ।
अगर इन्सान हो तो उट्ठो 
हर गली से हर खेत और खलिहान से उट्ठो 
मुट्ठियाँ बांध लो और चल पडो 
बस 
जुल्म खुद ब खुद मिट जायेगा
अंधेरा खुद ब खुद छट जायेगा 
सूरज कल खुद ही मुस्करायेगा ।

शुक्रवार, 24 मार्च 2023

सिर्फ सन्नाटा और हिचकी ।

आहट सुनाई पड़ रही है ?
आपातकाल की 
या समय पूर्व चुनाव की 
और 
किसी भी तरह ,किसी भी हालत में 
जीत ,जीत और केवल जीत 
ताकि फिर सब स्थाई हो सके
मनमानापन हो या तानाशाही 
कोई सामने नहीं हो 
ना विपक्ष ,न संविधान और लोकतंत्र 
महात्मा से लेकर शहीदे आजम तक 
नेता जी से लेकर बिस्मिल तक 
सब की आत्माएं 
बस टुकुर टुकुर ताक रही है 
पर आंखो में आसू के कारण 
कुछ साफ साफ दिख नही रहा है 
तो एक दूसरे से पूछ रहे है 
कि कुछ देखा क्या कुछ सुना क्या 
अपने भारत का हाल 
पर जवाब में सिर्फ सन्नाटा और हिचकी ।

सोमवार, 20 मार्च 2023

सबको भेड़ बनाओ

किसी भी तरह से 
सबको डराओ 
क्योकी 
जो नही डरते 
वो सत्ता के लिए 
खतरा बन जाते है 
और 
डरे हुये लोग 
गुलामी मान लेते है 
बस यूँ ही 
इसलिये ऐसे या वैसे 
कैसे भी 
आवाम को डराओ 
उन्हे जीता जागता 
इन्सान मत रहने दो 
उन्हे 
हांके पर चलने वाली 
भेडे बनाओ 
और फिर जैसा चाहो
वैसा राज चलाओ ।

रविवार, 19 मार्च 2023

पकिस्तान के नाम पत्र आओ बैठो बात करे

पकिस्तान के नाम पत्र 

छोटी छोटी बाते छोडो 
ओछी हरकत 
बिना बात की नफरत छोडो 
आओ बैठो बात करे
सैतालिस से बहुत लड़ लिया 
हमसे नफरत बहुत कर लिया ,
आओ नई शुरुआत करे
  
इन सालो में क्या पाया है 
अमरीका की भीख पर जीना 
पाक बना क्या इसीलिए था   
आजादी से अब तक केवल 
मौत और बन्दूक का शासन 
देश बटा क्या इसीलिए था 
बटवारे से घटे ही हो तुम 
और हमने खुद आकाश छू लिया 
सारी दुनिया मान रही है
बंदूके दे भेज रहे अपने बच्चे 
की वे मेरे बच्चो को मारे 
बटवारा क्या इसीलिए था
  
याद करो हम लड़े रहे थे अंग्रेजो से 
हिन्दू ,मुस्लिम सिख, ईसाई 
तब  क्या सपने थे
उन अंग्रेजो के पैसो से 
हर बार लड़े तुम मुह की खाई 
पर मरने वाले दोनों ही अपने थे
तुमने तों घायल कर डाला 
अपने तन को मेरे मन को 
क्या मिला तुम्हे बस कुछ डालर
गर ना लड़ते ना बटते 
दोनों बाजू ना कटते 
कितनी ताकत होती 
अपनी क्या कहने थे

टैंक नहीं उस पैसे से 
नहरे बांध और टंकी बनाये 
जो प्यासे हो खेत औ घर 
पानी पहुचाये
जो भी पैसा खर्च हो रहा  
सेनाओ पर 
इससे बनें स्कूल फैक्ट्री 
जीवन को आसान बनाये
भूख गरीबी और बेकारी 
उधर है तो इधर भी 
दुनिया की सारी बीमारी 
उधर है तों इधर भी
लड़ना छोडो 
आओ मिल कर इन्हें भगाए 
जर्मनी ने तोड़ दिया 
अब हम भी दीवार गिराए

हमने हाथ बढाया है 
दिल से आवाज लगाया है 
तय कर के आओ 
आओ मिल कर  बात करे 
अब न समय बर्बाद करे ।

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

सुनो सुनो सुनो ,
कोई मुझे भी खरीद लो 
जी बिकाऊ हूँ मैं 
जैसा भी हूँ
पर आज बाजार में हूँ 
बाजार का युग है 
इतना खोटा भी नहीं कि 
मेरी कुछ भी कीमत न ही 
बोली तो लगाओ 
कही से तो शुरू करो 
चलो तुम रोटी से शुरू करो 
चुपड़ी नहीं रूखी ही सही 
और तुम कपडे से 
उतरन भी चलेगी 
तुम नीद की जगह दोगे 
पर नीद कौन देगा 
पर बोलो ,जो चाहो बोलो 
इतना सस्ता इमांन कहा मिलेगा 
इतना सस्ता ज्ञान कहा मिलेगा 
और 
आज इंसान कहा मिलेगा 
तो बताओ कौन खरीदेगा मुझे 
जी हा
कसम खुदा की मैं बाजार में हूँ 
खरीद रहे हो बेपनाह हुस्न 
लोगो के इमांन 
लोगो के रहनुमा 
तो मुझमे क्या बुराई है 
इस ईमान से डर लगता है 
या फिर इंसान से डर लगता है 
अरे नहीं 
बिकाऊ है आज ये भी 
कोई तो बोलो 
मेरे इंसान और ईमान को 
कोई तो सिक्को में तोलो 
कोई नहीं बोलोगे 
तो रो पडूंगा मैं बेबसी पर 
फिर 
आंसू तो बिलकूल नहीं खरीदोगे 
अब हुस्न कहा से लाऊँ 
मैं भी दल्ला हो सकता हूँ 
ये कैसे समझाऊँ 
या फिर ये बनी हुयी इमेज 
मिटा के कैसे आऊँ 
तो उसके लिए 
किस लॉन्ड्री में जाऊं ।
कोई तो खरीद लो न मुझे ।
जी हां मैं आज बिकाऊ हूँ 
और 
इसीलिए आज बाजार में हूँ ।
और 
बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

सारे रंगों का नाम ही हिंदुस्तान है

सभी रंग अपने है 
वो लाल हो ,केसरिया हो 
हरा हो या नीला 
बैगनी हो या पीला 
या जो भी हो 
जिसे जो पसंद 
वो लगालो 
दूसरे को पसंद 
तो उसपर भी डालो 
पर 
उसमें कोई खतरनाक चीज न हो 
और न इरादे हो खतरनाक 
जी हां 
खूब खेलो रंग और गुलाल 
पर न हो धरती खून से लाल 
ऐसा समाज बना लो 
जी हां 
ये इतने सारे रंगों का नाम ही 
हिंदुस्तान है 
जहा एक ही रंग है वो मिस्र ,
अफगानिस्तान और पाकिस्तान है ।
क्या वो एक रंग पसंद है 
या 
ये हिंदुस्तानियत का रंगारंग 
आप गले मिलो 
पर नफरत के खंजर को 
फेंक कर आओ 
हां आओ 
सभी रंगों को मिला कर 
होली मनाओ

वो जब वो नही रहे-

वो जब वो नही रहे-                                                     

उन्होने पढाया था 
हज़ारो को 
इसलिये बस गये थे 
उसी शहर मे 
और
उनकी कविताओ पर 
कितनी तालिया बजती थी 
और
उनके भाषण 
लगता था क्रांती कर देंगे 
और
वो कितना अच्छा अभिनय 
करता था / करती थी 
फिर ये सब गुम हो गये 
किसी ने नही देखा 
उसके दरवाजे की तरफ कभी 
जब वो नही रहे ओह्दो पर 
एक दिन 
जब बदबू परेशान करने लगी 
तब पडोसी परेशान हुये 
और 
शिकायत किया पुलिस को 
तब दरवाजा तोड 
निकाला गया कई दिन की 
सडी लाश को 
उस दिन लोगो ने भी कहा 
और अखबार ने भी लिखा 
कि 
ये वो थे / थी 
ऐसे थे और वैसे थे 
और 
लग गयी गिद्ध निगाहे 
उनके घर पर ।
कितनी कहानियां 
पसरी पडी है चारो ओर 
अपने अपने एवरेस्ट पर होने की 
और 
अज्ञातवास मे मिटने की ।

पूरा उपदेश देते है

कह देता हूँ किसी से कि जरा हाथ बढ़ाना 
नासमझ मुझको अपाहिज ही मान लेते हैं , 
मान कर कमजोर मुझको वे उपदेश देते है 
अज्ञानी मान कर मुझको पूरा ज्ञान देते है |

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

वो सामान्य भी नहीं हो पाते

मेरी कविता -

क्यों ! 
कुछ लोगो के जिम्मे होताहै
केवल विष पीना,
गोली खाना ,
सूली चढ़ना
या 
केवल आलोचित होना 
बार बार
उनमे से कुछ तों 
महान हो जाते है
इतिहास के पन्नो में
परन्तु ऐसा भी तों होता है 
की कुछ लोग
रोज खाते है 
गोली लोगो के इरादों की
पीते है विष 
लोगो की भावना की
चढते है सूली 
लोगो की निगाहों की
खाते है केवल 
आलोचना का खाना
पीते है गाली का पानी
सम्हल भी नहीं पाते है 
की
दोहराई जाती है 
यही कहानी
और 
बार बार 
दोहराई जाती रहती है
उसके जीवन भर
और 
महान क्या 
सामान्य भी नहीं हो पाते है
कोई विज्ञानं या मनोविज्ञान
इनकी कहानी 
सुलझा नहीं पाता है
और 
वे अपनी जिंदगी
सुलझाते सुलझाते 
इतने उलझ जाते है
की 
मकड़ी के जाले में 
फसे नजर आते है
और 
वह क्या उसका भविष्य भी
भविष्य के गर्भ में होता है
ऐसा गर्भ !
जिसे 
अल्ट्रासाऊंड भी नहीं बता पाता है .

ईश्वर क्या है

मेरी कविता : 

ईश्वर क्या है ? 

जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

आँखो में नाखून

मेरी कविता 

आँखो में नाखून 

औरत को देखते ही 
आँखो में नाखून उगना कब से शुरू हुआ 
जब हम असभ्य और नंगे थे
या जब सभ्य हो गए 
और कपड़े पहनने लगे 
औरत को देखते ही 
उसे घायल कर देने के प्रवृति कब से आयी 
जब हमारे पास शब्द नहीं थे 
या जब भाषा गढ़ ली गयी 
औरत को देखते जी 
उसकी काया में प्रवेश कर जाने की उत्कंठा 
कब से हिलोरे लेने लगी 
जब हम कुछ नहीं जानते थे 
या जब गढ़ लिया था ईश्वर हमने 
औरत को अकेले पाते ही 
उसपर आक्रमण कर विजय पाने की इच्छा 
कब से बलवती हो गयी और कैसे 
किसी हिंसक पशु को देखकर 
या इंसान में ही पटकाया प्रवेश हो गया था 
हिंसक पशु का 
हिंसक पशु का इलाज तो पिंजरा है या मौत 
पर इनका ? 

तुम सूरज हो ?


मेरी कविता 

तुम सूरज हो ? 

तुम सूरज हो किसके सूरज 
कैसे सूरज क्यों अकड़े हो 
मुझमें तुममे क्या अंतर हैं
तुम कहा खड़े हो कैसे बड़े हो 
मैं भी अंधकार में सो जाता हूं
तुम भी तो कही खो जाते हो 
सुबह निकलता मैं बिस्तर से 
तुम भी कूद कर आ जाते हो 
पूरब में तुम कहा छुपे 
पश्चिम से आकर 
कल शाम तुम लाल हुए 
पश्चिम में जाकर 
मैने सोचा जल गए तुम 
डूब गए हो किसी खोह में 
या फिर गुस्से में लाल हो गए 
किस बिछोह में 
दीपक ने तुमको कल ललकारा 
अहंकार था उसने उतारा 
बोला था तुमसे वो 
तुम जाओ जाओ
जहां कही भी चाहो 
तुम अब घूम के आओ 
अंधकार पर में चढ़ लूंगा 
उसकी ताकत से लड़ लूंगा 
क्या तब तुम कुछ शर्माए थे 
उसकी लाली तब तुमपर थी 
मैं तो दर्शक बस दोनो का 
दोनो से आनंद है मेरा 
रात में दीपक साथ में रहता 
तुम्हरे संग हो जाता सवेरा 
मैं तुमको ना पूजू तो फिर तुम क्या हो 
तुम साथ में नही रहो तो मैं क्या हूं 
हम दोनो की तकदीर है कैसी 
पश्चिम की तासीर है कैसी 
पश्चिम में जाकर तुम भी डूब रहे हो 
पश्चिम को अपना कर मैं भी डूब रहा हूं 
चलो बहस अब खत्म करे मैं क्या तुम क्या 
जब तक मेरा साथ दे सको साथ रहो तुम 
अर्घ मेरा स्वीकार करो मेरे रहो तुम 
तुम ना होगे तो जीवन भी तो ना होगा 
चांद सितारे जुगनू दीपक सब बच्चे तेरे 
तुम हो तो वो सब भी है साथी मेरे 
तुम जाते हो तब ही हमको नीद है आती 
तुम आते हो सारी दुनिया तब जग जाती 
आने जाने का ये फेरा ही जीवन है 
उगने डूबने का क्रम ही तो जीवन है 
अच्छा सूरज बहुत काम है मैं चलता हूं 
फिर मैं तुमसे बात करूंगा 
अपनी आंखे नही तरेरो
क्योंकि अब हम दोस्त हो गए
मैं अब तुमसे नही डरूंगा ।



बुधवार, 15 मार्च 2023

बहुत दिनो के बाद चांद से बात हुयी ।



बहुत दिनो के बाद चांद से बात हुयी ।

शाम ढली थी और थोडी सी रात हुयी 
बहुत दिनो के बाद चांद से बात हुयी ।
कुछ रूठा सा चाँद अकड के बैठ गया 
कितना निहारा करता था चन्दा को  मैं 
गाँव देहरी या शहर का का आंगन था 
पर जाने फिर क्या हुआ दोस्ती टूट गयी 
जीवन के संघर्ष या फिर टूटा मन था 
याद किसे आती है चांद सितारो की 
जब रोटी ही चांद दिखाई पडती हो 
और सितारे नमक मे पड़े  दिखते हो 
जब भूख पेट की ख़ुद से याचना करती हो 
बच्चो की फीस उन्हे अपमानित करती हो 
पत्नी की कोशिश फटी साड़ियाँ ढकने की 
पूरा दिन जब मुफ्त इलाज खा जाता हो 
जब धक्कों से अपने जीवन का नाता हो 
छत भी छीनने का खतरा सर पर लटका हो 
तो कौन देखता चांद तुम्हे और कब देखे 
तुमने भी क्या किया अपने इस प्रेमी का 
जो बड़े देवता बने हुये तुम फिरते हो 
नही शिकायत का हक तुमको बिल्कुल है 
कहा देखना था तुमको थे तुम याद कहा 
वो तो यूँ ही बस नजर उठ गयी ऊपर को 
कि बादल मे क्या चमक रहा है देखो तो 
आंख मिल गयी तुमसे तो तुम ऐंठ गये 
लेके किस्सा देखा देखी का बैठ गये 
जाओ जाओ हमको भी अब परवाह नही 
एक चांद उगा देंगे हम चाहे जहा कही 
अब तुम नही मेरे बच्चे है चांद मेरे
तुम भी हो पर मेरे बच्चो के बाद मेरे ।

रविवार, 12 मार्च 2023

वो सब आगे निकल गए

वो सब आगे निकल गए 

जो जो काफ़ी दिन साथ चले 
गलबहिया करते हुए
एक दिन अचानक थोड़ा ठिठके
उनके पीछे होते ही 
मैं लहूलुहान हो गया 
छटपटाया और गिर गया 
और मुझे तड़पता छोड़ 
वो तेजी से आगे निकल गए 
ये कहानी आख़िरी कभी नहीं हुयी 
और गिनती अब तक नहीं रुकी ।

बुधवार, 1 मार्च 2023

धुप अन्धेरा है

धुप अन्धेरा है 
चारो ओर 
जमीन से आसमान तक 
क्या आसमान के परे भी
कुछ होगा 
जहा कुछ रोशनी होगी 
हमारे हिस्से की भी ।

सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

युद्ध की त्रासदी "

मेरी कविता -
"युद्ध की त्रासदी "

युद्ध खत्म होगा
और बैठ जायेगा
एक मेज पर 
हमेशा खत्म हुआ है 
कोई युद्ध नही चला 
अनंत काल तक
पर 
उसकी त्रासदी रहती है
अनंत काल तक 
मा पिता की आंख
सूनी रहती है 
अनंत काल तक 
पत्नी की मांग 
उजडी रहती है 
अनंत काल तक
बच्चो का सर 
बिना साये के रहता है 
अनंत काल तक 
मानवता ही नही 
लहू से सिंचित जमी 
रोती है अनंत काल तक ।

युद्ध

मेरी कविता 
"युद्ध "

राम कृष्ण बुद्ध 
मुहम्मद और ईसा 
नही खत्म कर पाये 
मानव के विनाश का युद्ध
ईसा को छोड सब 
खुद भी तो युद्धरत रहे 
और बो गये 
भले बुरे के नाम पर 
युद्ध की खेती 
जो हजारो साल से
फैलती ही जा रही है 
कौन मिटायेगा 
हर भाषा से 
ये शब्द "युद्ध "?

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

जो सत्ता के स्वर में बोलने लगूंगा ।

राजा ने मुनादी करवाया 
सबको बताया 
कि
आज से बिना इजाजत कोई मुंह नही खोलेगा 
और 
अगर खोलेगा तो केवल सत्ता के स्वर में ही बोलेगा 
अगले दिन राजा के दरबार में एक कुत्ता लाया गया 
उसपर बिना इजाजत मुंह खोलने और सत्ता के स्वर में न बोलने का इलाज लगाया गया 
हाकिम ने पूछा कि तूने मुंह क्यों खोला 
और सत्ता के स्वर में क्यों नही बोला 
कुत्ता बोला हुजूर मैं कुत्ता हूं 
जब भी बोलूंगा अपने स्वर में ही बोलूंगा 
भारत का सुपारी मीडिया और डरा हुआ आदमी नही हूं जो सत्ता के स्वर में बोलने लगूंगा । 

जीवन केवल मृग मरीचिका है

जीवन केवल मृग मरीचिका है 
विचार कुलांचे भरते रहते है 
रेगिस्तान के पानी के 
एहसास के साथ 
भागता रहता है इंसान 
और 
पानी के लिए तड़प 
दौड़ाती रहती है 
यहां से वहां तक
वहां से वहाँ तक ।
कोई साथी हो 
जो चिकोटी काट कर 
यथार्थ के धरातल पर उतार दे 
और 
वो भी नही है 
तो भटकन अनन्त है ।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

हिंदू कौन ?

हिंदू कौन ? 
और 
हिंदुस्तानी कौन ? 
जो इंसान हो 
और 
कर्म करे ईमानदारी से 
या कुछ न करे 
या 
लूट घूस झूठ सब करे 
इसपर सब मौन ।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

भेड़ों का झुंड या संगठन

पहले नेता विचार फैलाते थे 
फिर 
नेता वैचारिक संगठन बनाते थे ।
फिर नेता संगठन बनाने लगे 
जाती और धर्म आधारित ।
और 
अब नेता भेड़ो के झुण्ड बनाने लगे 
उनकी आवाज को विचार 
और 
उनकी रेवड़ को दल कहने लगे हैं ।

नियति के चौखट पर

मैं भी चाहता था कुलांचे भरना 
हिरन बन कर 
पर वक्त का शेर खा गया 
बहुत कोशिश की उड़ने की 
पंख लगा पक्षी बन कर 
पर 
बाज झपट पड़े हर बार 
फिर कोशिश की चलने की 
अपने पैरो से अपने पुरषार्थ भर 
पर 
खाईयां खोद दी गई 
और 
बार बार उसमे लोगो ने गिरा दिया 
अब 
हमने भी नियति के चौखट पर 
सर अपना रख दिया है ।

शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

खुद की लाश

कुछ लाशे कितनी भारी होती है 
उठाना मुश्किल हो जाता है 
और 
बार बार कंधे बदलने पडते है 
या 
फिर गाडी पर ले जाना पडता है 
पर 
खुद की लाश को ढोना तो 
कितना मुश्किल होता है ।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

मैं रबड़ का पेड़ हूँ कितना गिरा दो और दबा दो

मैं रबड़ का पेड़ हूँ कितना गिरा दो और दबा दो 

नहीं होगी मौत मेरी फिर से मैं खड़ा हो जाऊंगा

मजबूत हो गर आप चाहे जो खरीद लो कलम हो जुबान हो या फिर जमीर हो ।

मजबूत हो गर आप चाहे जो खरीद लो 
कलम हो जुबान हो या फिर जमीर हो ।

क्या बताये लोग अब उपलब्धियों के नाम पर मौज शौक नफरत और दौलत का भण्डार है ।

क्या बताये लोग अब  उपलब्धियों के नाम पर 
मौज शौक नफरत और दौलत का भण्डार है ।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

मन में ये तूफ़ान सा क्यों है

भीड़ इतनी है आसपास पर 
मन में ये तूफ़ान सा क्यों है 
मुस्कराते हुए चेहरे है सब है
हर कोई अनजान सा क्यों है ।
कोई अपना सा लगा ही क्यों
फिर ये बियाबान सा क्यों है 
आशंकाए इतनी क्यों तारी है
मन में ये शमसान सा क्यों है ।
छोड़ कर लौट चला है आशिक
टूटा हुवा और बेजान सा क्यों है ।
कोई तो अपना सहारा भी होगा
दिल हुवा ये असमान सा क्यों है ।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

न पहले रुका था न अब मैं रुकुंगा ।ना मैं थकूंगा न मैं हरगिज झुकूँगा

ना मैं थकूंगा न मैं हरगिज झुकूँगा 
खुशफहमी न पालो नहीं मैं रुकुंगा 
न जाने कितने झंझावातो को देखा 
कितनी कठिन दिन रातो को देखा 
न पहले रुका न अब मैं रुकुंगा
न पहले थका न अब मैं थकूंगा ।
चोटी  पर चढ़ कौन बसता वहां है 
समन्दर में जा कौन रुकता वहां है 
मैं भी सैलानी हूँ मैं क्यों बसूँगा 
मेरा भी सफ़र है मैं क्यों रुकूंगा 
ये जीवन है जब तक चलते ही जाना 
आसमा पर उड़ना जमी पर भी आना 
अंतिम सफ़र आसमा पर बसूँगा 
जमी घूम ली तो यहाँ क्यों रुकूंगा 
इश्वर होने की ग़लतफ़हमी है तुमको 
मैं इंसा हूँ  खुद पर भरोसा है मुझको 
हैं मेरे पांव अपने मैं उनसे चलूँगा 
न पहले रुक था न अब मैं रुकुंगा
कोई खुद को भगवान माने तो माने 
अपनी सारी शक्ति मुझ पर ही ताने 
ऐसी शक्ति से मैं न हरगिज डरूंगा 
न पहले रुका था न अब मैं रुकुंगा ।

शनिवार, 21 जनवरी 2023

पेड़ और पिता

पेड़ और पिता 

पेड़ पर चहचाहती है चिड़िया 
उछलती है फुदकती है 
और बंदर भी इस डाल से उस डाल पर 
धमाचौकड़ी करते रहते है 
और 
पिता के शरीर पर भी कूदते है बच्चे 
पेड़ पर थक कर सो जाती है चिड़िया 
और बंदर भी 
पिता के पेट पर भी लेटते ही सो जाते है बच्चे 
कभी पिता कुर्सी बन जाता है तो कभी घोड़ा 
कभी पिता बिस्तर बन जाता है
और पेड़ भी तो
बच्चो के लिए छाया होता है पिता 
और चिड़िया के लिए पेड़ 
कभी देखा है बंदर के बच्चे का दुस्साहस
और कूद पड़ने का प्रयास डालियों पर 
उसे विश्वास है मां सम्हाल लेगी 
पर इस कूद फांद में 
पेड़ की कितनी पत्तियां और टहनियां टूट जाती है 
बच्चे भी तो बिस्तर या कही भी ऊंचाई से 
बस हाथ फैला कर कूद पड़ते है पिता के ऊपर 
कि पिता गिरने नही देगा 
बच्चो का विश्वास टूटने नही देता पिता
तभी तो 
जब पिता उछाल देता है आसमान की तरफ
तो बच्चा डरता नहीं रोता नही हंसता है 
जानता है कि पिता गिरने नही देगा 
कहा से आता है बच्चो में ये आत्मविश्वास 
और स्पर्श का भी कुछ होता है 
कि पेट पर सुला कर थपकी देते ही सो जाते है बच्चे 
पिता का हाथ हो या पांव झूला बन जाते है अक्सर 
पेड़ की डाल की तरह ही 
पिता फलदार पेड़ होता है
जब चाहा हाथ बढ़ाया और पा लिया खा लिया 
पर जब फल हाथ नही आता है 
तो पेड़ पत्थर की मार भी सहता है 
बच्चे मारते नही पत्थर ,बस फल तोड़ते है 
जब फल नही मिलता 
तो पेड़ की तरफ कौन देखता है 
उसे छोड़ दिया जाता है उपेक्षित 
या काट कर कोने में डाल दिया जाता है 
की कभी शायद किसी काम आ जाए । 

संघर्षो का अन्त ।

सुना है कि 
कृष्ण ने 
द्रौपदी की साड़ी 
इतनी लम्बी कर दी 
कि 
उसका छोर ही नही था 
सुना है कि 
हनुमान की पूँछ का भी                       
कोई छोर नही था         
पर 
कही तो अन्त हुआ ही होगा 
उनका उस दिन नही 
तो अगले दिन 
लेकिन 
कुछ लोगो के संघर्षो का                              
कोई अन्त ही नही होता 
वो लड़ते रहते है 
बचपन से बुढापे तक 
और 
नितांत अकेले 
एक दिन थक कर सो जाते है 
चिरनिद्रा मे 
तभी होता है उनके                             
संघर्षो का अन्त ।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

औरत

औरत 


औरत 

औरत क्या  कोई पहाड़ है 
जिस पर चढ़ जाना चाहते हो 
औरत क्या कोई नदी है  
जिसमें नहा लेना चाहते हो 
औरत क्या कोई दुश्मन का क़िला है 
जिसे जीत लेना चाहते हो 
दुश्मन का क़िला तो तुम्हारे भीतर है 
जीत सको तो उसे जीतो । 

गुरुवार, 19 जनवरी 2023

स्वेटर जो तुमने बुना था

स्वेटर 
तुमने बुना था अपने हाथ से वो सफेद स्वेटर 
उसे आज भी पहनता हूं मैं 
सबसे ज्यादा गर्म है वो स्वेटर 
जिसका फंदा डालते वक्त तुमने कुछ नापा था
और फिर गिनकर डाल दिए थे उतने ही फंदे
वो सलाई थी जो बुन रही थी स्वेटर 
या तुम्हारी जिद मुझे ठंड से बचाने की 
तुमने नाप लिया था शरीर नीचे से ऊपर 
और आगे से पीछे 
नही नापते तब भी स्वेटर सही ही बनता
आज मैं सबसे ज्यादा पहनता हूं वही स्वेटर 
ऊन नही तुम्हारी गर्मी भरी है इस स्वेटर में 
अभी भी पहन रखा है मैने वही सफेद स्वेटर 
लगता है तुमने कस कर जकड़ रखा है मुझे 
अपनी बाहों के घेरे में 
हां बहुत सम्हाल कर रखता हूं मैं ये स्वेटर 
और कोशिश करता हूँ 
कि जिंदगी के अंतिम दिन तक पहनू
मैं तुम्हारा बनाया हुआ सफेद स्वेटर 
तुम जहा भी हो क्या देख पाते हो अपना स्वेटर
या महसूस करते हो मेरे शरीर की गर्माहट 
क्या खुश हो पाते हो
कि मैने स्वेटर को 
ये  समझ कर पहन रखा है हर वक्त 
ये स्वेटर नही हैं तुम हो 
और तुम्हारी महक भी है इसमें 
याद तो गई ही नहीं कभी 
कि इसे तुम्हारी याद कहूं।
इसकी छुवन रोमांचित करती रहती हैं मुझे 
हां मैंने पहन रखा है वही सफेद स्वेटर।

सोमवार, 16 जनवरी 2023

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ 

मैं भारत राजा  राम का हूँ

मैं भारत कृष्ण कन्हाई का 

मैं भारत राधा मीरा का 

मैं भारत सीता माई का 

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ 


 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

रुक जाना जीवन नही मरना है

शरीर कहता है जरा उम्र तो देख 
रुक जा या धीरे चल गिर जाएगा 
मन कहता है अभी तो जवान हूं मैं 
दोनो की बहस खत्म ही नहीं होती 
शरीर कहता है बहुत परेशान हूं मैं 
शरीर कहता है तू अकेला रहता है 
मन कहता है सारा जहांन अपना है 
शरीर को जब झेलना पड़ता है अकेले 
तो पता लगता है जहां एक सपना है 
मैं परेशान हूं किसकी मानू ना मानू 
सवाल ये है कि दोनो ही अपना है । 
जीते है वो मान कर जिससे सुख मिले 
जिंदगी भी तो चार पल का सपना है 
शरीर भी मन का साथ जरूर देगा 
और मन भी शरीर को चला देगा 
जिंदगी कुछ भी नही एक फरेब है
एक पल रोना है अगले पल हसना है । 
चलो चलते है चलो चलते है चलो चलते है 
क्योंकि रुक जाना जीवन नही मरना है । 
(अभी अभी )

गुरुवार, 12 जनवरी 2023

आदमी या पिट्ठू

निकल पडते है 
सुबह ही पिटठू टागे 
न जाने कितने लोग 
कन्धे झुके पीठ झुकी 
चेहरा सपाट भावहीन 
पिटठू मे ही होता है 
उनका पूरा ऑफिस 
उनका टिफिन 
और पानी 
उनके अरमान
उनका भविष्य 
उनकी जवाबदेही 
घर से बाहर तक की
कही पैदल 
तो 
कही साइकिल पर 
कही बाइक पर 
तो कही बस मे 
कही लोकल मे 
कभी 
इन्हे गौर से निहारो 
क्या ये आप के अपनो जैसे ही है 
कभी 
इन्हे प्यार से पुकारो 
क्या ये सुन पाते है आवाज 
या बस भाग रहे है 
जिन्दगी की जद्दो-जहद मे 
मजदूर भी हंस लेता है पर ये नही 
मजदूर गा लेता है 
पर ये नही 
मजदूर अपने मन से भी जी लेता है 
पर ये नही 
कौन है ये लोग 
जिनकी पीठ पर 
लाद दिया है भारी बोझ 
नई अर्थव्यवस्था ने 
नई पढाई ने 
और 
आज के परिवारो ने 
बस किसी तरह 
इतना तो कमा लो 
कि 
शाम को लौट कर 
दो रोटी खिला दो 
और खुद भी खा लो 
इनकी पहचान क्या है 
ये आदमी है या पिटठू ?

बुधवार, 11 जनवरी 2023

अभियुक्त

देश के मालिक नागरिक 
कभी भी बन सकते है अभियुक्त
आजादी मिल गई तो क्या मतलब 
हक भी मांगोगे ?
मांगोगे रोटी और रोजगार 
कपड़ा और मकान 
और इतने बड़े अपराध में भी 
अभियुक्त नही बनोगे ?
निकलोगे सड़क पर हाथ लहराते हुए
और नारे लगाते हुए
और डालोगे खलल 
साहब बहादुर की नीद में 
फिर भी अभियुक्त नही बनोगे ? 
गीता में पढ़ाया है 
सिर्फ कर्म करो सत्ताधीशों के लिए 
और कोई इच्छा मत करो 
और 
ये नही मानने वाले को द्रोही माना जायेगा 
देशद्रोही ,धर्मद्रोही और राजद्रोही ।
अभियुक्त अभियुक्त और अभियुक्त । 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

सैकडो प्रणाम जयप्रकाश तेरे नाम रे दुनिया जहांन सब आकाश तेरे नाम रे ।

जयप्रकाश नारायण जी के निधन के बाद लिखी मेरी कविता -

सैकडो प्रणाम जयप्रकाश तेरे नाम रे 
दुनिया जहांन सब आकाश तेरे नाम रे ।

तुझको दुख तो होता होगा स्वर्ग की उस उंचाई पर 
हंसी तो तुझको आती होगी इस सारी सच्चाई पर 
तुझको तेरे बेटो ने ही तिल तिल कर के मारा है 
कौन जनम के पाप की बेटे आये इस नीचाई पर 
कैसी ऊबड़ खाबड़ बीती जिन्दगी की शाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ----

सन 42 का योद्धा अब कैसा मजबूर हुआ 
77 के आते आते सारे जहां मशहूर हुआ 
पर अपने बेटो बेटी के हाथो दुर्दिन क्या आये 
एक ने दे दी काल कोठरी 
दूसरो से दूर हुआ 
घोड़े तूने साधे पर लगाई ना लगाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ---

तूने देश की खातिर तोडी थी जेल की दीवारे 
47 के पहले तेरी गूजती थी हुन्कारे 
पर बाद मे तुझको लगा की देश अभी आज़ाद नही 
इसिलिए 75 मे गूजे थे तेरे फिर नारे 
आज़ाद कराया था जो देश था गुलाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ---

पर तुझको भी पता नही था फिर वही सब होना है 
अपने गान्धी की तरह तुझे भी अन्धकार मे खोना है 
देश की जनता को फिर वही व्यव्स्था शासन ढोना है 
रामराज के कर्णधारो को फिर गद्दी पर सोना है 
कहते थे प्रधान की खुदा ना वो इंसान रे 
सैकड़ो प्रणाम ----

अब तेरे बेटे तेरा इक स्मारक बनवाएंगे 
आंसू वही बहायेंगे और कसमे भी वही खायेंगे 
गंगाजल से धोए कोई कोई पत्थर मारेगा 
अपने अपने झंडे मे सब तुझको अब चिपकायेंगे 
गलियो गलियो बिकोगे तुम वोटो के दाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ---

देश के नवयुवको मिल बोलो गांधी लोहिया जयप्रकाश 
गूजे सारी धरती और गूंज उठे सारा आकाश 
जो भुनाते गाँधी लोहिया और जयप्रकाश को 
आओ मिलकर अब हमे करना है उनका सत्यानाश 
एक व्यव्स्था नई बनाये सब मिल खासो आम रे 
सैकड़ो प्रणाम जयप्रकाश तेरे नाम रे ।

रविवार, 25 दिसंबर 2022

पिछले कई दिनो से

पिछले कई दिनो से 
गले की आवाज फंस गयी है 
ठीक से निकलती ही नही
पिछले कई दिनो से 
कलम चलती ही नही 
लगता है पन्ना फ़ट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
किबोर्ड पर उंगली टिकती ही नही 
लगता है 
किबोर्ड जोर से दब कर टूट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
नीद ठीक से आई ही नही 
पूरी रात कुछ खौलता रहता है 
पिछ्ली कई दिनो से 
खाने मे स्वाद नही है 
किसी तरह ठूस लेता हूँ
और निगल लेता हूँ 
मैं लड़ रहा हूँ जंग खुद से 
पिछले कूछ दिनो से 
कब खत्म होगी ये जंग ?

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

आवो न कृष्ण ।

कृष्ण आज तुम्हारे घर पर हूँ
और
ढूढ रहा हूँ 
कृष्ण तुम कहा हो 
ना मथुरा मे मिले 
ना गोवर्धन के आसपास 
ना यमुना के किनारे 
और 
ना गोकुल ,ना नन्दगाँव ,
ना बरसाने मे 
तब कहा हो कृष्ण 
निधिवन और मधुवन भी सूना है 
भागकर गये थे द्वारका 
क्या वही कही बिला गये कृष्ण 
पर लोग तो तुम्हे यहा ढूढ रहे है 
कब आवोगे कृष्ण 
या 
अब तुम हो ही नही 
तुमने रचा था महाभारत 
या तुम सचमुच नही चाहते थे वो युद्द 
तो फिर हुआ कैसे वो युद्ध 
क्या सिर्फ तन्हारे उस उपदेश के लिये 
कि 
सामने जो भी है मत देखो कौन है 
बस उसे मारो 
और 
लाशो से पटी धरती को देख 
शायद युधिष्ठिर कांप उठे थे 
तुम भी कांपे थे क्या कृष्ण 
तुम तो इश्वर थे 
अवतार थे विष्णू के 
फिर क्यो नही रोक पाये 
अपनो का ही वीभत्स वध 
क्यो नही रोक पाये धूत क्रीड़ा 
क्यो नही रोक पाये एक नेत्रहीन का अपमान 
क्यो नही रोक पाये भरी सभा मे स्त्री का अपमान 
क्यो नही रोक पाये वो वध 
चाहे अभिमन्यु का हो या जयद्रथ का 
वो छल से किया गया वध 
तो क्या तुम भी सर्फ दर्शक थे 
या मिथ्या है कि तुम इश्वर हो 
वरना !
तो क्या तुम इन अनैतिकताओ के सारथी बनकर 
खो बैठे थे अपना देवत्व 
और शक्तिया 
और हो गये थे अशक्त ।तभी तो भागना पड़ा तुम्हे अपनी प्यारी नगरी छोडकर 
क्या तभी तुम शिकार हो गये एक बहेलिए के 
अगर हा तो एक बार प्रकट होकर ये बता दो 
ताकी करोदो लोगो का भ्रम टूट सके 
अगर ना 
तो भी प्रकट होकर बता दो कि तक क्यो हुआ वो सब 
और 
एलान कर दो 
कि 
अब वैसा कुछ भी नही होगा कृष्ण ।
तुम्हारी नगरी मे मुझे इन्तजार है तुम्हारे आने 
और एलान करने का ।
आवो न कृष्ण ।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

वो दिन हमारे कारण आएगा

एक दिन 
आसमान बहेगा
जमीन पर 
समुद्र उड़ेगा
आसमान पर
पहाड नाचेगा
पत्तो पर 
पेड उगेगे 
आसमान पर
चिडिया खायेगी
हाथियो को 
चीटियो के डर से 
शेर भालू भागेगे 
बस केवल इंसान 
कही नही होगा 
वो दिन हँ वो दिन 
हमारे कारण आएगा । 

सोमवार, 14 नवंबर 2022

वो दिन संघ की जीत का होगा ।

एक दिन 
आसमान बहेगा
जमीन पर 
समुद्र उड़ेगा
आसमान पर
पहाड नाचेगा
पत्तो पर 
पेड उगेगे 
आसमान पर
चिडिया खायेगी
हाथियो को 
चीटियो के डर से 
शेर भालू भागेगे 
बस केवल इंसान 
कही नही होगा 
वो दिन हँ वो दिन 
संघ की जीत का होगा ।

सोमवार, 7 नवंबर 2022

दिए जलाओ खूब जलाओ

दिए जलाओ खूब जलाओ 
इतने जलाओ कि डूब जाओ 
और भूल जाओ भूख अपनी 
दर्द अपना औ चीख अपनी 
जहां भी मिले जगह कोई भी 
मंदिर कोई या नदी किनारा 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
और हर बारी गिनते जाओ 
पिछली बारी जितने जले थे 
उससे ज़्यादा अबकी जलाओ 
फिर नया कीर्तिमान बनाओ 
कैसी ग़रीबी कौन है भूखा 
कैसी बेबसी और बेकारी 
ये सब बाते बेमतलब की 
चकाचौंध में इन्हें भुलाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
सीमा पर जो शहीद हुए है 
वो सब है गरीब के बच्चे 
सुरसतिया की लाज लूटी 
या गौहरबानो उठा ली गयी 
पेड़ो पर लटके किसान हो 
या फ़ुटपाथो की आबादी 
इन सबसे तो आँख फेर लो 
धन्नासेठो को चमकाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
उसके घर में तेल नही है 
कल दिए से तेल वो लेगा 
और वो है पत्तों पर खाता 
कल दिए वो के जाएगा 
ये भी तो एहसान बहुत है 
इन एहसानों को छपवाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
घर में अंधेरा है लाखो के 
उनको उजाला ख़ुश कर देगा 
पेट में जिनके आग जल रही 
उनके पेटो को भर देगा 
जो क़िस्मत में वही हो रहा 
उन सबको ये पाठ पढ़ाओ 
राम जी अग़ला जन्म बनाए 
ऐसा भाव उनमें जगाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ । 


मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

दर्द भोगे हो साथ साथ

पिता हो ,माँ हो 
बेटा या बेटी 
पता नही कैसे 
समझ जाते है 
एक दूसरे का दर्द 
और 
अंदर अंदर छटपटाते है
एक दूसरे के लिए 
कोई पैथी नही पहचानती 
न कोई विज्ञान 
इस बेतार संदेश को 
गर 
दर्द में शामिल रहे हो 
कभी या ज्यादातर 
और 
दर्द भोगे हो साथ साथ 
मजबूत चट्टान बनकर 
एक दूसरे के लिए 
और 
जुड़े हो दिल और आत्मा से ।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रातें 
कितनी स्याह होतीहै 
क्यो होती है 
इतनी स्याह रातें 
ज्यो ही सूरज 
पच्छिमी की खोह में 
डुबकी लगाता है 
पूरब से फैलने लगती है 
स्याह रात 
टिमटिमाते हुई 
रोशनियां भी 
जुगनू से ज्यादा 
कुछ नही होती 
कितनी भयानकता 
समेटे होती है स्याह रात 
जिंदगी गर्त हो जाती है 
धीरे धीरे इसके आगोश में 
और 
कितना अकेलापन 
तारी हो जाता है 
जिसमे जिंदगी 
सवाल बन जाती है 
इन सवालो का 
कोई जवाब नही होता 
खुद से ही बाते करना 
खुद को तसल्ली देना 
खुद के अकेलेपन से लड़ना 
और लड़ते लड़ते 
नीद के लिए लड़ना 
ताकि आंख बंद कर 
अनदेखा कर सके 
इस स्याह अंधेरे को 
और अकेलेपन को 
पर 
कितना स्याह है सब कुछ 
चलो आंखे बंद कर लेते है 
और 
सोच लेते है 
की 
अकेले नही है हम 
तमाम सूरज उग गए है 
हमारी जिंदगी में ।
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

फिर सब होगा शांत

कुछ सवाल है 
जो अनुत्तरित है 
कुछ जवाब है 
जो खुद 
सवाल बन गए है 
सिलसिला टूटता ही नही 
न सवालो का न जवाबो का 
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है 
पर कही तो कोई दीवार होगी 
या 
होगा इस सफर का डेड एंड 
जो रोक देगा क्रिया को 
और प्रतिक्रिया को भी 
और 
फिर सब होगा शांत शांत ।

बुधवार, 21 सितंबर 2022

तुम कुर्सी हो मुझे मालूम है तुम्हारे पांव नहीं

इतनी दूर क्यों हो तुम कभी मिल जाया करो 
न हकीकत में तो सपने में ही आ जाया करो 
तुम कुर्सी हो मुझे मालूम है तुम्हारे पांव नहीं 
मेरे तक आने को कोई तो दाव लगाया करो |

रविवार, 18 सितंबर 2022

बाते बस बाते बनाये जा रहे है

बाते बस बाते बनाये जा रहे है
मुल्क को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम कर दिया चंद दिन में 
फिर भी मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से
पर अब किस्से सुनाये जा रहे है

कोविड कभी डेंगू से मर गये है 
और ये भाषण सुनाये जा रहे है
 
लाखो मजदूर निकले थे घरो से 
उन पर डंडा बजाये जा रहे है
 
चेहरे पर शिकन नहीं है जरा भी
मौत के कारण गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना
ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।