रविवार, 30 जुलाई 2023

आतंकित है मानवता

क्या सत्ता और न्याय मिलकर 
ऐसी नई सज़ाये शुरु कर सकते है ? 
जीभ काट देने की सज़ा ? 
आंख फोड देने की सज़ा ? 
कलम तोड़ देने की सज़ा ? 
कीबोर्ड हटा देने की सज़ा?  
अक्षर खत्म कर देने की सज़ा ?
अशिक्षित रहने की सज़ा ?
दिमाग निकाल लेने की सज़ा ? 
वो सत्ता किसकी होगी 
वो न्याय किसका होगा 
आतंकित है मानवता 
उसकी कल्पना से भी 
उसकी सम्भावना से भी ।

रहम कर रहम कर रहम कर ।

दिल ,दिमाग़ ,कलम कीबोर्ड
साथ नही दे रहा है कुछ भी 
बहुत कुछ बोलना चाहता हूँ 
पर आवाज फँस जा रही है 
जब भी कलम उठाता हूँ 
अपने बोझ से गिर पडती है
दिल में जो झांकता  हूँ 
तो बस अंधेरा दिखता है 
दिमाग़ पर ज़ोर देता हूँ 
सर ज़ोर से फटने लगता है 
कीबोर्ड पर उँगलिया रखता हूँ 
तो उँगलियाँ झुलस जाती है 
ये क्या दौर आ गया है मौला 
रहम कर रहम कर रहम कर ।

गुरुवार, 27 जुलाई 2023

किस-किस को अब शीश झुकाना पड़ता है,

किस-किस को अब शीश झुकाना पड़ता है, 
दिल पर कितना बोझ उठाना पड़ता है 
काम नहीं चलता अब दीप जलाने से, 
हर पत्त्थर को भोग लगाना पड़ता है 
रूह बहुत दुख पाती इस जीने से, 
यारो जीते जी मर जाना पड़ता है. 
मौज उडाते हैं राजा के अधिकारी, 
पर जनता को कर्ज़ चुकाना पड़ता है 
हमने भी देखे हैं रंग सियासत के, 
भाई सबका साथ निभाना पड़ता है ।

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

चलो अब मैं चुप हो जाता हूँ और

चलो अब मैं चुप हो जाता हूँ 
और
भींच लेता हूँ ओठो को 
चाहे खून क्यो न निकल पडे 
कुछ भी हो जाये मेरे सामने 
आंख मूद लूँगा मैं कस कर 
चाहे फिर दुखती रहे देर तक 
या 
दिखना कम क्यो न हो जाये 
कुछ भी हो हत्या अपहरण 
बलत्कार भ्रश्टाचार  
हो जाये चीर हरण व्यव्स्था का 
या आ जाये तानाशाही 
मिटा दिया जाये संविधान 
पर 
मैं कुछ नही लिखूंगा 
कुछ नही बोलूंगा 
बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग 
और 
शामिल हो जाऊंगा उन्ही मे 
निकाल कर फेंक दूंगा अपनी रीढ 
दफना दूंगा दिल दिमाग 
और चिंतन ।

हम इन्सांन नही कुम्भकरण है ।

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकरण है ।

मैं भी जमाने जैसा हो गया हूँ ?

मिटा दिए है वो तमाम नम्बर 
जो नही उठे मेरी ज़रूरत में 
या 
यूँ ही जब हाल जानना चाहा 
भुला दिए है तमाम वो नाम 
जिन्हें मैं याद नही आया कब से 
वो चेहरे भी धुंधले कर दिए मैंने
जिन्होंने फेर ली निगाहें मुझसे 
हा 
मैं भी जमाने जैसा हो गया हूँ ?

ईश्वर कैसा होता है ।

कितने महान है वो लोग
जो पत्थरो से सर मारते है 
और 
मानते है कि  
पत्थर चमत्कार करता है 
हा 
सच है की पहली आग 
लकड़ियो की रगड़ से 
या 
पत्थरो के टकराने से ही पैदा हुई 
पर 
उसका कारण तो वैज्ञानिक है 
उसमे चमत्कार कुछ भी नही 
और 
किसी अन्य लोक की
ताकत भी कुछ भी नही
मेरी दुवा है आप सबको कि 
सर टकराते रहो 
पर जरा सम्हाल कर
सर से खूँन निकलता है और
फिर उसे रोकने को
दवाई ,मरहम पट्टी 
और 
डाक्टर की जरूरत पडती है 
अगर अधिक निकल गया 
तो 
शायद कही और जाकर
हो सकता है 
दर्शन हो ही जाता हो परमात्मा का
पर तय नही 
क्योकि 
किसी ने लौट कर बताया नही 
कि ईश्वर कैसा होता है ।

रविवार, 23 जुलाई 2023

एलान कर दो कि डर गए हो



एलान कर दो कि डर गए हो 

ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने ग़ुलामी मान ली है 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सब डर गए हो  
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने सोचना बंद कर दिया है 
ख़ुद ही एलान का दो 
कि अब कोई सवाल नही पूछेगा 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि अब कोई चुनाव नही चाहिए 
चुन लिया है इसी आका को 
जब तक वो चाहे तब तक के लिए 
तुम्हारे पास और कोई चारा नही है 
तमाम क़ानूनी ग़ैर क़ानूनी हाथ 
लपकने को तैयार है
और कसने को तुम्हारी गर्दनो को 
मार दिए जागोगे तुम 
या सड़ा दिए जागोगे 
किसी काल कोठरी में 
इसलिए एलान कर दो 
अपनी गर्दनो को टूटने से पहले 
किसी काल कोठरी में जाने से पहले 
कि सब लोग डर गए हो 
और तैयार हो 
साहब हुज़ूर के रास्ते का 
पावड़ा बनने को सदा के लिए ।
(सुधार के सुझावों का स्वागत है )

गुरुवार, 20 जुलाई 2023

ये बारिश कैसी बारिश ।

मेरी कविता  ——

बारिश

बारिश  नहीं आयी
उफ़्फ़ कितनी गरमी है 
सूरज जला देगा क्या 
ये बारिश क्या करेगी 
आफ़त बन कर आयी है 
सब कुछ बहा देगी क्या 
देखो गिर गए 
कितनो के कच्चे घर 
और 
झोपड़ियाँ भी जवाब दे गयी 
अबकी बारिश समय पर आयी 
और उतनी ही आयी 
की अबकी खेत सोना उगलेंगे 
अभी बारिश तो आफ़त है 
भीग गया खेत और खलिहानों में सब 
अब साल कैसे बीतेगा 
कैसे होगी उसकी पढ़ाई और दवाई 
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
बारिश आयी स्कूल की छुट्टी 
छप्प छप्प करते वो पानी में 
वो काग़ज़ की नाव बहाते 
वो बचपन कितना प्यारा लगता है 
उससे पूछो जो अभी है ब्याही 
और पति सीमा पर बैठा 
उन दोनो के मन की सोचो 
और 
वो दोनो भीग रहे है छत पर 
दोनो देख रहे दोनो को 
भीगा आँचल भीगा यौवन 
दोनो को है कितना जलाए 
वो मछरदानी पर प्लास्टिक बिछा रही है 
बालटी भगौने सब बिस्तर पर सज़ा रही है 
ख़ुद बैठी है पर बच्चों को 
इस कोने और उस कोने कर 
वो बारिश से बचा रही है 
पूरी रात नहीं वो सोयी 
सब झेला 
पर कभी नहीं क़िस्मत पर रोयी 
बारिश का मतलब उससे पूछो 
जो पूरा घर अब सुखा रही है 
बारिश तो अब ख़त्म हो गयी 
चरो तरफ हरियाली छायी

फूलों से अब लदी डालियाँ 
सबको ही अच्छी लगती है 
भूल गए सब क्या झेला था 
वो अच्छा या बहुत बुरा था 
फिर जीवन पटरी पर आया  
उफ़्फ़ 
ये बारिश कैसी बारिश ।

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

वो रास्ता वो सफर बहुत ही मुश्किल था पर कैसे भी पहुंचना है ये हमारा दिल था ।

वो रास्ता वो सफर बहुत ही मुश्किल था 
पर कैसे भी पहुंचना है ये हमारा दिल था ।

वो क्या कहलाता है ।

जो दिन भर हंसी 
चेहरे पर चिपकाता है 
अकेले मे रात को रोता 
फिर 
सुबह से मुस्कराता है 
वो भी एक इन्सा है 
जो खुद को 
और 
अपनो को बहलाता है ।
क्या कोई जानता है 
कि 
वो क्या कहलाता है ।

सोमवार, 17 जुलाई 2023

दीवारे उग जाती है रिश्तो के बीच ।

वही लोग 
जो छोटे शहरो मे  
कितने घनिष्ट 
और 
कितने अपने लगते है 
क्योकी खूब मिलते है 
सुख और दुख मे 
पर 
बड़े शहर मे आते ही 
बहुत दूर हो जाते है 
और बिला जाते है 
सारे रिश्ते और भावनायें 
नही मिलते सालो साल 
या 
संपन्न ज्यादा हो जाये 
तो 
छोटे शहर मे भी 
दीवारे उग जाती है 
रिश्तो के बीच ।

ऊंची दीवारे अपनो के बीच

बहुत ही अपने 
जब संपन्न हो जाते है 
या चढ़ जाते है 
ऊंची पायदाने 
उग आती है 
ऊंची दीवारे 
अपनो के बीच 
रिश्तो मे,भावो मे ।

बुलबुले हो गये रिश्ते

छोटे शहरो के 
शहद जैसे रिश्ते 
बड़े शहरो की 
जमीन पाते ही 
कड़वे हो गये
जो फेविकाल से
जुडे लगते थे 
बुलबुले हो गये ।

सोमवार, 10 जुलाई 2023

भीड़ और मैं

मैं भीड़ में गुम हो जाना चाहता हूँ 
पर 
भीड़ और मेरे बीच इतनी दूरी है 
कि 
न मेरी आवाज उसे सुनाई पड़ती है 
और न मैं उसे दिखाई पड़ता हूँ 
मुझे भी नही दीखती है वो भीड़ 
बस सुनाई पड़ती है कानो में आवाज़ 
कही दूर से अपुष्ट ,अस्पष्ट 
और 
में ढूढने लगता हूँ उसे पागल जैसे 
पर 
भीड़ ने लगातार दूरी को कायम रखा है 
और मुझे धलेक रही है लगातार 
एकाकीपन की तरफ ।

रविवार, 2 जुलाई 2023

पकौड़े खाओ चाय पियो ग़म भुलाओ

हार गये 
कोई बात नहीं 
थोड़ी नीद सो लो 
फिर 
पकौड़े बनावावो
और 
अच्छी सी चाय 
उसमे हार डाल दो 
और फिर पी जाओ 
परशुराम,विष्णू का
मंदिर बनाओ 
काशी जाओ जल चढाओ
गांधी लोहिया जेपी से
मुह छुपाओ
अब 
जय श्री राम का नारा 
उनसे ज्यादा जोर से लगाओ ।

शनिवार, 1 जुलाई 2023

दोस्तीयाँ ऐसी ही होती है ।

कुछ सम्बंध और दोस्तीयाँ               
ओस की बूंद की तरह होते है 
बहुत ही अच्छे लगते है 
पर 
हालात के बदलते ही 
यानी 
तेज धूप मे अचानक कही खो जाते है 
हा 
कुछ सम्बंध या दोस्तीयाँ          
तवे पर गिरी 
पानी की बूँद की तरह होती है 
तवे से मिलते ही 
छन्न से आवाज करती है 
और 
विलीन हो जाती है 
और 
आजकल के सम्बंध 
और दोस्तीयाँ ऐसी ही होती है ।

सरकार सरकार

सरकार सरकार 
जी सरकार 
मेरी सरकार 
जी सरकार 
तेरी सरकार 
जी सरकार 
क्या सरकार
हाँ सरकार 
कुछ कर दो सरकार 
कर दिया जा 
नहीं हुआ सरकार 
कोई बात नहीं जा 
नारा लगा और बटन दबा
फिर सरकार बना
जी सरकार 
क्या सरकार 
कुछ नहीं सरकार 
बाबू ने पैसे लिए 
काम हो गया सरकार 
आप को वोट दिया 
आप की नही चलती सरकार 
चुप हो जा स्वार्थी
जी सरकार 
कुछ पूछू सरकार 
हाँ पूछ ढोल गंवार 
आप बोले की
आप की सरकार 
ये भी बोले की 
हमारी भी सरकार 
पर र र र
क्या अररर र मुह खोल 
कुछ तो बोल 
नहीं सरकार 
मर जाऊंगा सरकार 
बोल जल्दी बोल 
वर्ना मरेगा 
सरकार 
आप तो कुछ नहीं 
आप की बात भी नहीं
आप की कलम भी नहीं 
आप बेकार 
किस बात की सरकार 
सब बेकार 
न कोई सरकार 
नौकर है सरदार 
हाँ क्या सच है 
फिर से बना सरकार 
फिर देख सरकार 
ना सरकार ना सरकार ।

बुधवार, 28 जून 2023

रोटियों में आग है और आग से है रोटियां



रोटियों में आग है और आग से है रोटियां 
आग में ही जल रही है ढेर सारी बोटियाँ 
बोटियों और रोटियों की ये लड़ाई आम है 
इस लड़ाई में राजनीती चलती है गोटियाँ ।
पेट में जब आग हो तो काम आये रोटियां 
दिल में जब आग हो तो जल जाएँ बोटियाँ ।
क्रांति क्रांति का घोष गूंजता जब जनता में 
ना रहती है रोटियां और न रहती है बोटियाँ ।

रविवार, 25 जून 2023

राम तुम मत आना

राम तुम मत आना

उन्होने कहा 
जय श्रीराम बोल
वो बोला 
जय श्रीराम 
उन्होने कहा 
हनुमान की जय बोल 
वो बोला 
हनुमान की जय 
वो जो कहते रहे 
वो बोलता रहा 
वो बोलता रहा
जय श्रीराम 
और 
हनुमान की जय 
और 
राम के भक्त 
उसे 
लगातार पीटते रहे 
जब तक 
वो बोलता रहा 
कितना दर्द हुआ होगा न
जब 
इतने लोगो ने 
इतने घंटो तक 
मारा होगा उसे 
क्या दर्द का 
बिल्कुल भी एहसास 
नही हुआ होगा 
उन लोगो को 
जो खुद को 
हिन्दू कहते है 
क्या सचमुच 
ये लोग हिन्दू है 
हिन्दू तो चींटी को 
बचा कर चलता है 
की 
कही मर न जाये 
ये कौन से हिन्दू है 
अब वो अब 
सांस ही नही ले रहा था 
तो 
उन्होने भी 
बोलना बन्द कर दिया 
जय श्रीराम 
और 
हनुमान की जय 
वो तो 
बोलने लायक ही नही बचा था 
भाग खड़े हुये 
राम का नाम लेकर 
वध करने वाले 
हा वध शब्द का ही 
प्रयोग किया था 
गांधी को मारने वालो ने 
और 
गोली खाकर 
गांधी ने भी तो कहा था 
हे राम हे राम 
नही 
ये अब हे राम नही 
बल्कि 
जय श्रीराम बोलते है 
ताकी कही गांधी के 
अनुयायी न कहलाये 
पर 
वो तो 
भाग ही नही पाया  
बिन बुलायी मौत से 
जो 
उस राम के नाम से आई 
जिसने 
अधर्म को खत्म किया 
धर्म के लिए 
पर धर्म के नाम पर भी 
कभी अधर्म होगा 
कहा सोचा होगा 
राम ने
जीते राज 
उन्होने युद्द मे 
पर 
दे दिये 
वही के लोगो को 
राज पाने के लिए 
उनके नाम का उपयोग होगा 
कहा सोचा होगा 
राम ने 
अब उसकी विधवा 
जो अभी 
जल्दी ही 
ब्याही गयी थी
अहिल्या की तरह 
पत्थर बन गयी है 
की 
कौन होगा 
अब सहारा 
किसके साथ बीतेगा जीवन 
कितना चीखी होगी वो 
उसकी बेजान लाश देखकर 
कई बार तो 
बेहोश हो गयी होगी 
फिर पानी डाल कर 
उठाया गया होगा उसे 
वो फिर पछाड़ मार मार 
गिर जाती होगी 
क्या 
उसे मारने वालो ने 
ऐसे दृश्य नही देखा होगा 
अपने घरो पर 
और 
नही देखा होगा 
विधवा हुयी किसी 
बहन और बेटी को 
अचानक 
और बूढे हो गये मा बाप को 
बेसहारा हो गये 
अबोध बच्चो को 
क्या नही आते वो दृश्य 
कभी 
इन लोगो की आंखो मे 
राम को भी तो 
बाँट दिया इन लोगो ने 
जो 
उसके खाने मे 
आते ही नही 
कि 
उम्मीद करे की 
इस युग मे भी 
आयेंगे राम 
और 
उद्धार कर देंगे 
उसकी बुत बन गयी 
विधवा का ।
वैसे भी राम 
अब आते ही कहा है 
चाहे 
कितना भी अधर्म हो 
पर 
अब तो राम 
खुद ही खतरे मे है 
क्या पता 
कि 
वो पढाये पाठ 
सही और गलत का 
धर्म और अधर्म का 
और 
उनका नाम लेने वाले 
उन्हे ही राम विरोधी 
और
राष्ट्र विरोधी बता दे
और 
जय श्रीराम का नारा
लगाती हुयी भीड़  
राम का ही बध कर दे 
इसलिये राम !
तुम बिल्कुल मत आना 
अपने भक्तो वाले 
इस देश मे 
और इस युग मे ।

बुधवार, 21 जून 2023

मंगलवार, 20 जून 2023

औरत आदमी की सरहद

सरहदे तय कर दी घरों की
सरहदे तय कर दी देशों की 
पर सरहद नही तय कर पाए 
औरत और आदमी के रिश्तों की 
जब चाहा ,जहा चाहा 
तोड़ देते है सरहद और सीमाएं ।

शनिवार, 17 जून 2023

दुख भी कुछ होता है

घर की चारदीवारी मे 
कैद रहने पर 
लगता है कितना अकेलापन 
सडक पर निकल पडे  
तो  
दीखने और मिलने लगे 
हजारो लोग अपने ही ।
इसलिये तोड दी दीवार की सीमाये 
निकल पडे  
फिर 
सब जग अपना लगा
शामिल हो गये 
लोगो के दुख मे 
और सुख मे भी 
और 
भूल गये 
की 
दुख भी कुछ होता है

खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

घर मे परिवार होता है 
तभी वो घर होता है 
वर्ना तो बेजान दीवारे है
जिनमे आप कैदी है 
पर 
घर मे कोई छोटा सा बच्चा हो 
और 
बन जाइये बच्चा उसके साथ 
वाह 
क्या जिंदगी हो जाती है 
फिर मिल जाती जिंदगी 
और 
बचपन पोंछ देता है सारे गम 
सारी तकलीफे , बीमारी और वेचारगी 
बन गया हूँ मैं बच्चा आजकल 
सचमुच खूब जी रहा हूँ मैं 
भरपूर जी रहा हूँ मैं 
चुरा लेना चाहता हूँ खुशिया 
और इसकी यादे 
अगली बार फिर मिलने तक के लिए ।
आह जिंदगी वाह जिंदगी ।
बच्चा बन कर देखिये 
बच्चो से प्यार करिये 
खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

शुक्रवार, 16 जून 2023

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

मेरी कविता 

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा  

हा 
मुझे बचपन से गुस्सा आता था 
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से 
मुझे गुस्सा आता था 
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक 
मैं ट्रेन के दरवाजे पर 
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था 
की
भीड़ ज्यादा है तो  
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते 
मुझे गुस्सा आता था जब कोई 
दूसरों के मैले को उठा कर 
सर पर लेकर जाता था 
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर 
किसी को खाना दिया जाता था 
गुस्सा आता था 
जब सायकिल के हैंडिल पर 
दो बाल्टियां 
और 
पीछे कैरियर पर मटका रख 
दो मील दूर पानी लेने जाता था 
शहर में 
गुस्सा आता था 
जब गांव जाने के लिए 
मीलो सर पर बक्सा रख कर 
चलना पड़ता था अंधेरे ने 
गुस्सा आता था 
जब गांव में बिजली भी नही थी 
गुस्सा आता था 
जब पुलिस अंकल किसी को 
बिना कारण बांध कर ले जाते थे 
माँ बहन की गालियां देते हुए 
और 
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था 
पर किसी भी चीज को 
बदल सकने की ताकत नही थी 
इस बच्चे में 
उसके बाद भी 
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज 
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ 
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं 
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था 
पर खुद शिकार हो गया 
हर बात पर जिस पर 
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए 
मुझे तो गुस्सा आता रहा 
और 
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया 
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर 
और 
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया 
पर 
ताली पिटती भीड़ में 
खो गया मेरा गुस्सा 
और में भी खो गया साथ साथ 
पानी पीकर या पानी के बिना 
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा 
संसद हो या मुम्बई 
मेरा गुस्सा सड़क पर आया 
लॉटरी हो या शहादत 
सड़क पर फूटा गुस्सा 
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी 
नही रोक सकी मेरे गुस्से को 
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता 
भी बने मेरे गुस्से के कारण 
मुझे आज भी गुस्सा आता है 
बार बार बदलते कपड़ो पर 
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर 
पिटती विदेश नीति 
और अर्थव्यवस्था पर 
रोज शहीद होते सैनिको पर 
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर 
रोज के बलात्कार पर 
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर 
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर 
इंच इंच में होते अपराध पर 
थाने से तहसील होते हुये 
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर 
भाषणों के खेप पर 
आसमान छूती महंगाई पर 
न जाने कितनी चीजे है 
गुस्सा होने को 
पर अब 
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और 
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता 
और 
आवाज के दबने पर उफान मारता है 
पर 
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद 
और साधारण आवाज 
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर 
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर 
और दीवारों के बीच 
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए 
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी 
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए 
जो मेरे पास नही है 
और 
चाहिए धन काफी धन 
जो मंच सज़ा सके 
,रथ बना सके 
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है 
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने 
कोई कविता या कुछ विचार 
ताकि गुस्सा 
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

मुनादी हो गयी है

मुनादी हो गयी है 

कि 
गाय अब हरगिज न पालें 
अगर पालते है तो सड़क पर 
हरगिज ना निकाले 
फिर भी निकले 
तो जिम्मेदारी आपकी है 
गाय पंर जो भी करेगे
हम करेंगे 
काटेगे या कही पंर बेच देगे
देश मे भी 
कौन खाये या न खाए 
चुनांव देखकर 
उसकी इजाजत हम ही देंगे

मुनादी हो गयी है 
कि 
प्यार पंर पाबंदियां है 
गर भाई और बहन हो 
या हो मियां और बीबी 
तो कागज ले के निकलो 
की दोनो सचमुच वही हो 

मुनादी हो गयी है 
कि 
लोकतंत्र की 
नई परिभाषा पढ़ लो
जान जाओ 
फिर उसी रस्ते पर बढ़ लो  
सत्ता पर कोई उंगली उठाये 
उससे पहले जरा ये जान जाए 
की 
जान का जोखिम बहुत है 
बन्दूक की नली से 
निकलती है सत्ता
ये तो पढ़ा था 
पर सत्ता बंदूक और 
हिंसा से है चलती 
ये भी पढ़ लो

मुनादी हो गयी है 
कि 
कोई अखबार हो या हो टी वी 
सब सत्ता की भाषा ही बोले 
किसी सिद्धांत के बहकावे में आये 
उससे पहले ज़रा ये जान जाए 
कि सत्ता चीज क्या है 
और 
सत्ता का संगठन चौकस खड़ा है 
कुछ भी हो जाए 
तो हमको क्या पता है
वो खुद ही जाने
या फिर बात माने 

मुनादी हो गयी है 
कि
क्या जरूरी है ये इतिहास पढ़ना 
इतिहास अबतक जो भी पढ़ा था 
सब कूड़े से भरा था 
जो हमको देश का दुश्मन बताता 
पढ़ना है तो राष्ट्र गौरव पढ़ो सब 
नया इतिहास 
जो अब हम समझा रहे है 
है वही इतिहास असली 
और 
इतिहासों के पुरोधा भी वही है 
जो जो हम बताए 
जो इनको अब नही मानेगा उसको 
रास्ते पर लाना भी आता हमे है
फिर काहे का गम  
गांधी से कलबुर्गी तक को 
समझा चुके हम 

मुनादी हो गयी है 
कि
ये आज़ादी बेवजह है 
और 
ऐसे लोकतंत्र का भी क्या करोगे 
ये चुनांव भी तो केवल खर्च ही है 
छोड़ो इसको बस हमे ही सत्ता दे दो 
जब तलक ये मुल्क जिंदा है 
और 
जिंदा है लोग कुछ भी 
फिर देखो हम क्या करेंगे 
पर ये अभी हम क्यो बताए 

मुनादी हो गयी है
किअपने मुह सिले सब 
और 
वो हो बोले जो हम बताए 
आंखे बंद कर ले 
और वो ही देखे 
जो हम दिखाए 
कानों में ठूस लो कुछ 
सुनना भी क्या जरूरी 
दिमागों पर भी कोई जोर क्यो दो 
बस उतना जानो 
जितना हम जनाये 

मुनादी हो गयी है 
कि अब सब मांन जाये 
कि सबके हम खुदा है 
सत्य है हम ,न्याय है हम
शास्वत भी हम ही है 

मुनादी हो गयी है 
कि 
अब कोई चित्र हो या बुत बनाये 
पर क्या बनाना है 
पहले हमको बताए 
जो हम कहे फिर वो ही बनाये

मुनादी हो गयी है 
कि 
बुध्द ने कुछ भी कहा हो 
पर 
संघम शरणं गच्छामि 
के अब नए मतलब समझ लो 
अब हम पर 
उंगली उठाना द्रोह होगा 
फिर नही कहना कि 
तुमने क्या है भोगा
मुनादी हो गयी है ।

गुरुवार, 15 जून 2023

आत्महत्या

आत्महत्या 

अच्छा चढ़ गए कुर्सी या स्टूल पर 
बाँध लिया पंखे मे रस्सी 
फिर थोडी दे रुके थे क्या 
पंखे मे रस्सी बाँधने से पहले ?
कुछ रुक कर सोचा क्या 
और जब बांधा था 
या गले मे डाली थी रस्सी 
तो आँखे नम थी क्या 
या बह रहा था पनाला आंखो से
फिर कैसे कसा होगा गले मे 
उस वक्त क्या था मन मे 
मां पिता भाई बहन कोई दोस्त 
या प्रेमिका या सिर्फ़ गुस्सा 
पर किससे ? खुद से या ?
पर एक पल भी नही आया ख्याल 
बहुत अपनो काया फिर अपना ?
बहुत नशे मे थे क्या 
की कुछ होश ही नही था 
या फिर मौत खुद नशा बन गई थी
उस पलायन के वक्त  
कसा था फंदा तो विचलित हुये क्या 
अच्छा सच सच बताओ 
अन्तिम विचार क्या आया था मन मे 
माँ की चीखे सुनाई पडी क्या 
और टूटा हुआ पिता और भी सब 
सचमुच वाले अपने 
अच्छा जब सरका दिया स्टूल 
और झूल गये पर मरे नही थे 
क्या तब मन मे आया 
काश अब बच जाते 
वो अन्तिम इच्छा क्या थी 
कायर कही के 
तुम पैदा ही क्यो हुये 
जब लड़ नही सकते थे 
जीवन के लिए जीवन से 
अपने पिता अपनी माँ 
और अपनो के लिए खुद से ।

बेटियाँ

बेटियाँ 

घर से जाते जाते भी 
पापा की           
कितनी चिंता करती है
बेटियाँ 
की 
क्या कहा रखा है ,
क्या क्या 
कैसे कैसे 
कर लीजियेगा ,
क्या खा लीजियेगा                
इत्यादि इत्यादि ।
मन और आंखे 
भिगो देती है बेटियाँ 
और 
खुद पर 
पता नही कैसे 
काबू रख पाती है 
बेटियाँ 
या फिर 
आंखे छुपा लेती है 
बेटियाँ ।

इस दौर मे कितने लोग थे हो गये

इस दौर मे कितने लोग 
थे हो गये 
कितने नंबर 
अब कभी नही मिलेंगे 
पर 
मिटाने की हिम्मत नही होती 
कि 
शायद फोन आ ही जाये 
कितनो से बात किया 
जो आखिरी थी 
कितनो को चाह कर भी
देख नही पाये 
कितनो को चाह कर भी
कन्धा नही दे पाये 
जी 
ये कहानी सिर्फ मेरी नही
घर घर की है 
जो फैली है
कन्याकुमारी से कश्मीर तक 
कैसे नाची मौत
और 
कितना लाचार कर दिया
मानवता को 
ना भगवान काम आये
ना अल्ला ना ईसा 
ना मंदिर काम आया 
ना मस्जिद ना कोई धर्म
फिर भी लड़े जा रहे है
सब उसके लिये 
जिसे किसी ने देखा नही
जो काम आया नही
इन्सान बन जाये तो
इंसानियत बचेगी 
और 
बचेगी शोध से
आविष्कारो से
और 
प्रकृति की रक्षा से 
इसलिए मानना है तो
प्रकृती को ईश्वर माने 
और 
इन्सान लड़ने के लिये नही 
प्रेम से रहने के लिये है 
ये बात जाने  ।

शुक्रवार, 9 जून 2023

इंसान से अच्छा तो कांच है

इंसान से अच्छा तो कांच है 
जब टूटता है 
तो आवाज तो आती है 
और 
उफ़ निकली है 
किसी की 
कोई दौड़ता है उधर 
कि क्या टूट गया 
आवाज तो थी 
पर किसके टूटने की 
और 
इंसान टूट जाता है 
बुरी तरह 
चूँकि कोई आवाज 
नहीं आती 
तो कोई नहीं दौड़ता 
उसकी तरफ 
उसका टूटना 
उसके चेहरे पर 
उभर आता है 
पर किसके पास है वक्त 
की चेहरे देखता रहे 
और 
रख दे पीठ पर हाथ सहारे को 
और 
सहला दे इतनी गहरी 
चोट को 
हा इंसान से अच्छा 
और 
खुशकिस्मत तो कांच है ।

शनिवार, 3 जून 2023

ये बारूद वाले किसान

मेरी कविता --

खेतो और बगीचो में 
बारूद बोने वाले 
ये नए किसान 
कहा से आ गए 
इन खेतो और बगीचो में 
यहाँ तो पैदा होती थी फसले 
और 
भरती थी पेट इन्सानों का 
और
होते थे फल मौसम के अनुसार 
और 
पेट भरने के साथ साथ
लड़ते थे इंसान में बीमारियो से 
पर ये पेट क्या पूरा शरीर 
उडा देने वाले 
और साँसे छीन लेने वाले 
मौत बाँटने वाले 
खेतिहर किसने पैदा कर दिया 
इसी समाज में और खेत में
रोकना ही होगा 
इन नए किसानो को 
और बचाना ही होगा
इंसानियत को 
चाहे उसके लिए 
बारूद से इन 
नए बारूद बोने वाले 
किसानो को ही 
क्यों न उड़ा दिया जाये 
इंसानियत बचाने को ।

शनिवार, 27 मई 2023

आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है 

जीवन में आती है तो जीवन बिगाड़ देती है ।

इतना मत इतराओ अपने दौड़ने पर यारो

ये आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

चलते ही जाना चलते ही जाना है ।

एक कविता आप सभी के लिए --

पांव है थके थके पर दूर बहुत जाना है 

पर चलने की उमंग है मन में उत्साह है  

चलना ही जीवन है रुक जाना अंत है 

चल रहा हूँ मै लेकिन रास्ता अनंत है ।

जीवन संघर्ष है, पहाड़ की चढ़ाई है 

अपने पुरसार्थ क़ी ह़ी ये कमाई है 

चलना है,रुकना नहीं चलते ही जाना है ।

रास्ते  में कांटे हो, जंगल हो, पहाड़ हो 

रास्ते में बाधा कोई सिंह की दहाड़ हो 

चलते ही जाना है चलते ही जाना है  ।

आते है तो रोते हुए और सब हंसते है 

रास्ते में कभी मौन,हंसना भी रोना भी 

जाते हुए मौन खुद, बाकी सब रोते है 

कौन परवाह करे हंसने की रोने की 

मंजिल को पाना है चलते ही जाना है ।

मंजिल नहीं मंजिलें है जैसे हो सीढियाँ 

हौसले बनाये रख कदम कदम चलना है 

चलते ही जाना है चलते ही जाना है ।

रास्ता दिखाया था बड़ों ने आगे कभी 

वो तो चले गए अपनी अनंत यात्रा पर 

अब आगे चलना है रास्ता दिखाना है 

पीछे है हमारे जो उन्हें रास्ता बताना है 

मंजिलें दिखाना उन्हें काँटों से बचाना है 

यही है कर्त्तव्य बस यही वो आयाम है 

अपनों को धीरे धीरे वाम पर पहुँचाना है 

चलते हमें जाना है चलते हमें जाना है ।

गिरे, उठे ,चल दिए, पार की खाइयाँ 

लडखडाये फिसले भी पार की पहाड़ियां 

काँटों के चुभने की कभी परवाह नहीं 

बहुत तेज गिरे भी पर निकली आह नहीं  

पैर हो जमीन पर अहंकार दूर रहे 

किसको परवाह तब कौन कौन क्या कहे 

बस यही सत्य है ,यही विकल्प है और संकल्प है

सारे सोपानों को ,मंजिलों को पाना है 

एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है 

चलते ही जाना है चलते ही जाना चलते ही जाना है ।

गुरुवार, 18 मई 2023

कोई नही है कोई नही है कोई नही है

अपनी चाहत अपनी तमन्ना बस उनकी है 
इसमें अपना कुछ भी नही है
ये उनको बतलाए कौन
कोई नही है कोई नही है कोई नही है 
अपने आंसू ,अपनी तडपन बस अपना है 
इसमें उनका कुछ भी नही है 
मेरा दर्द दिखाए कौन 
कोई नही है कोई नही है कोई नही है 
किसको जाकर गीत सुनाऊं 
किससे अपना मन बहलाऊ 
किसको दामन चाक दिखाऊं 
कोई नही है कोई नही कोई नही है 
उनको ये सब बतलाए कौन
उनको पता बताए कौन 
या उनके घर पहुंचाए कौन 
कोई नही है कोई नही है कोई नही है 

( बाद में पूरा करने की कोशिश करता हूं)

बुधवार, 17 मई 2023

बांध का टूटना

आप ने कभी
कोई बाँध टूटता हुआ देखा है 
शायद हाँ भी और ना भी 
वैसे ही 
कभी कभी फूट पड़ता है 
इंसान पूरे वेग से 
और बह जाता है 
वर्षो से रुका हुआ पानी 
और फिर 
छा जाता है गहन सन्नाटा ।

फट न जाये अस्तित्व ही ।

चाहे तो दमघोटू कविता पढ़िए ----

क्या कभी आपने महसूसा है 
की 
बाहर घनघोर सन्नाटा हो 
और 
अंदर दमघोटू और इतना शोर 
की 
लगता है नसे ही नही 
शरीर की कोशिकाएँ भी 
फट पड़ेंगी 
नही हो सकती इससे बड़ी सज़ा 
फांसी में 
एक झटके से मुक्ति मिल जाती हैं 
और 
अजीवन कारावास में भी 
लोगो का साथ 
पर ऐसी सज़ा कल्पनातीत है 
पता नही 
किसी को इस सज़ा का एहसास है 
या नही 
इससे ज्यादा लिखा नही जा सकता 
इस विषय पर 
जेल से भी पेरोल मिल जाती है 
जिंदगी में भी 
कोई पेरोल की व्यवस्था हो सकती है 
कौन मुक्ति देगा इससे 
मुक्ति मिलेगी भी या नही ।
या 
सन्नाटा और 
अथाह लहू में बहता शोर 
साथ साथ चलते रहेंगे 
जब तक 
फट न जाये अस्तित्व ही ।

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा  

हा 
मुझे बचपन से गुस्सा आता था 
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से 
मुझे गुस्सा आता था 
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक 
मैं ट्रेन के दरवाजे पर 
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था 
की
भीड़ ज्यादा है तो  
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते 
मुझे गुस्सा आता था जब कोई 
दूसरों के मैले को उठा कर 
सर पर लेकर जाता था 
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर 
किसी को खाना दिया जाता था 
गुस्सा आता था 
जब सायकिल के हैंडिल पर 
दो बाल्टियां 
और 
पीछे कैरियर पर मटका रख 
दो मील दूर पानी लेने जाता था 
शहर में 
गुस्सा आता था 
जब गांव जाने के लिए 
मीलो सर पर बक्सा रख कर 
चलना पड़ता था अंधेरे ने 
गुस्सा आता था 
जब गांव में बिजली भी नही थी 
गुस्सा आता था 
जब पुलिस अंकल किसी को 
बिना कारण बांध कर ले जाते थे 
माँ बहन की गालियां देते हुए 
और 
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था 
पर किसी भी चीज को 
बदल सकने की ताकत नही थी 
इस बच्चे में 
उसके बाद भी 
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज 
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ 
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं 
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था 
पर खुद शिकार हो गया 
हर बात पर जिस पर 
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए 
मुझे तो गुस्सा आता रहा 
और 
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया 
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर 
और 
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया 
पर 
ताली पिटती भीड़ में 
खो गया मेरा गुस्सा 
और में भी खो गया साथ साथ 
पानी पीकर या पानी के बिना 
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा 
संसद हो या मुम्बई 
मेरा गुस्सा सड़क पर आया 
लॉटरी हो या शहादत 
सड़क पर फूटा गुस्सा 
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी 
नही रोक सकी मेरे गुस्से को 
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता 
भी बने मेरे गुस्से के कारण 
मुझे आज भी गुस्सा आता है 
बार बार बदलते कपड़ो पर 
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर 
पिटती विदेश नीति 
और अर्थव्यवस्था पर 
रोज शहीद होते सैनिको पर 
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर 
रोज के बलात्कार पर 
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर 
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर 
इंच इंच में होते अपराध पर 
थाने से तहसील होते हुये 
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर 
भाषणों के खेप पर 
आसमान छूती महंगाई पर 
न जाने कितनी चीजे है 
गुस्सा होने को 
पर अब 
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और 
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता 
और 
आवाज के दबने पर उफान मारता है 
पर 
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद 
और साधारण आवाज 
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर 
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर 
और दीवारों के बीच 
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए 
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी 
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए 
जो मेरे पास नही है 
और 
चाहिए धन काफी धन 
जो मंच सज़ा सके 
,रथ बना सके 
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है 
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने 
कोई कविता या कुछ विचार 
ताकि गुस्सा 
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

रविवार, 14 मई 2023

घुमन्तू

आपने क्या ये नाम सुने है और इन लोगो को देखा है ? 
घुमन्तूआपने क्या ये नाम सुने है और इन लोगो को देखा है ? 
घुमन्तू, लोहा पीटना, खानाबदोश इत्यादि इत्यादि 
इन सभी के पास या तो घर नही होता 
या 
घर के चूल्हे जलाने का साधन नही होता 
पर 
कुछ ऐसे लोग भी होते है 
जिनके पास घर भी होता है 
और घर चलाने का साधन भी होता है 
पर
वो शामिल हो जाते है इन वर्गों में 
और बेचैनी से कभी यहा ,कभी वहाँ मंडराते रहते है 
ऐसे लोगो को क्या नाम दे ? 
शब्दो के चितेरे कोई नाम दे । लोहा पीटना, खानाबदोश इत्यादि इत्यादि 
इन सभी के पास या तो घर नही होता 
या 
घर के चूल्हे जलाने का साधन नही होता 
पर 
कुछ ऐसे लोग भी होते है 
जिनके पास घर भी होता है 
और घर चलाने का साधन भी होता है 
पर
वो शामिल हो जाते है इन वर्गों में 
और बेचैनी से कभी यहा ,कभी वहाँ मंडराते रहते है 
ऐसे लोगो को क्या नाम दे ? 
शब्दो के चितेरे कोई नाम दे ।

शुक्रवार, 12 मई 2023

सज़ा हुआ घर

सज़ा हुआ घर 
कितना अच्छा लगता है 
पर 
जब आओ कराते है 
मरम्मत और रंग रोगन 
और 
बिखर जाता है सब कुछ 
कितना बदसूरत लगने लगता है 
अपना ही घर 
ऐसे ही इन्सानो के चेहरे 
और चारित्र होते है 
जब तक ढके है 
तो क्या लगते है वाह 
पर 
ज्यो ही 
प्याज के छिलके की तरह 
उतरने लगती है परते 
और 
निकल आता है 
अंदर का सच 
कितना भयावह लगता है 
सब कुछ ।
किसी ने लिखा तो है 
कि 
हर आदमी मे होते है दो चार आदमी ।

बुधवार, 10 मई 2023

मौत और अकेलापन

मेरी कविता ,
इसे केवल कविता समझ कर ही पढे कृपया -

मौत और अकेलापन 
________________
मौत कितनी 
खूबसूरत चीज होती है 
हो जाता है 
सब कुछ शांत शांत 
गहरी नींद 
तनावमुक्त ,शांत शांत 
न किसी का लेना 
न किसी का देना 
कोई भाव ही नही 
कोई इच्छा ही नही 
न डर ,न भूख ,न छल 
न काम न क्रोध 
बस शांति ही शांति 
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा 
और सब देख रहे है 
न रोटी की चिंता 
न बेटे और बेटी की 
न घर की चिंता 
न बिजलो और पानी की 
न बैंक की चिंता 
न टैक्स जमा करने की 
न काम की चिंता 
और न किसी छुट्टी की 
न किसी खुशी की चिंता 
न किसी की नाराजगी की 
निर्विकार ,स्थूल 
हल्का हल्का सब कुछ 
देखो 
कितना सपाट हो गया है चेहरा 
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को 
गजब का तेज लग रहा है 
बहुत कुछ है खूबसूरत 
पर मौत से तो कम 
और मुझे तो 
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन 
सन्नाटा ही सन्नाटा 
कोई आवाज ही नही 
खुद की सांसो के सिवाय 
कोई भी नही खुद के सिवाय 
पंखे के आवाज तो 
कभी कभी फोन की 
और 
हा दब गया रिमोट 
तो टी वी की भी आवाज 
तोड़ देती है सन्नाटा 
और 
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर 
गजब का मुकाबला है 
मौत और अकेलेपन का 
हा
एक फर्क तो है दोनो में 
मौत खूबसूरत होती है 
पर अकेलापन बदसूरत 
मौत शांत होती है 
पर अकेलापन 
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में 
लौट कर किसी ने नही बताया 
उसका अनुभव 
पर 
अकेलेपन को तो 
मैं जानता भी हैं 
और पहचानता भी हूँ 
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है 
और 
अकेलेपन का अंत मौत । 
इसलिए 
मौत से डरो मत उसे प्यार करो 
अकेलेपन से हो सके तो भागो 
और 
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।

नदी में तैरती लाशें

मेरी कविता 

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

सोमवार, 8 मई 2023

ईश्वर है भी या नही ?

ईश्वर है भी या नही ?

जिनके घर से 
कम हो जा रहे है लोग 
वो पूछ रहे है कि 
हमने क्या बुरा किया था 
या 
जाने वाले ने क्या किया था 
बता तो दो ईश्वर 
पर ईश्वर है मौन 
हजारो सालो से 
सब तो किया
ईश्वर को खुश करने को 
फिर भी इतने जुल्म 
तब सवाल पूछते है सब 
कौन सा ईश्वर  
जो कभी नही आया
किसी के भी पुकारे 
शायद आया हो किसी युग मे 
और 
पता नही अब है भी या नही 
होता तो क्या ऐसा होता 
होता तो क्या ये सब होता ।

शुक्रवार, 5 मई 2023

फ़्रीडम इज़ नाट फ़्री

#फ़्रीडम_इस_नाट_फ़्री —-

सत्ता ने कहा मीडिया से 
थोडा झुक जाओ 
पर कुछ घुटने के बल चलने लगे 
और 
आधिकतर तो लेट कर रेगने लगे ।
और 
इस तरह चौथा खम्भा लेटकर खुद 
सत्ता के रास्ते की पगडंडी बन गया ।
सत्ता ने कहा व्यव्स्थापिका से 
हद मे रहो 
और 
वो संगम की जमुना हो गयी 
और 
कार्यपालिका रूपी गंगा मे विलीन हो गयी
तीसरा खम्भा भी सरस्वती की तरह 
भीतर भीतर घुल-मिल रहा है 
अब सब खम्भो की जिम्मेदारी 
खुद जनता के कन्धो पर है 
क्योकी आज़ादी मुफ्त मे नही मिलती 
फ्रीडम इस नॉट फ़्री ।

गुरुवार, 4 मई 2023

बात चीत जारी है



#बातचीत जारी है ,
#निंदा जारी है ,
विशेस #दर्जा जरी है ,
#कवाब और #बिरयानी जरी है ,
#अदानी की #बिजली जारी है 
#सर #काटना जारी है ,
बातचीत के लिए बातचीत जारी है , 
अगली मुलाकात के लिए बातचीत जारी है ,
अगली मुलाकात के मुद्दे के लिए
 बातचीत जारी है 
सीमा पर गोलीबारी भी जारी है ,
सैनिको को मरना जारी है ,
मोदी से राजनाथ तक के बयान जारी है ,
जी हाँ सब जारी है |
कुछ होगा 
इन्तजार है २०१९ के चुनाव का | 
तब तक आप भी इन्तजार करिए 
और 
तब तक मरने दिए गरीबो के बच्चो को 
और 
भरने दीजिये अदानी का खजाना 
आने दीजिये शाल ,बिरयानी और कवाब | 
और 
उलझे रहिये #भारत_माता ,
#बन्दे_मातरम और ऐसे ही फालतू मामलों में 
अगले चुनाव में फिर खा लीजियेगा 
#धर्म की #अफीम 
और
हिन्दुस्तानी बन कर नहीं 
धर्म बन कर वोट डाल दीजियेगा | 
सब जारी है 
ये भी जारी रहने दीजिये | 

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

दर्द है कि जाता ही नही है

दर्द है 
कि जाता ही नही है
न मन का न तन का 
न अपनी जलन का 
न अपनी लगन का 
न अपने कहन का 
न उनके सुनन का 
न उनके कहन का 
न अपने सुनन का 
न दिल की व्यथा का 
न अपनी कथा का 
न यादो का अपने 
न वादो का अपने 
इरादो का अपने 
दवा भी नही है 
दुवा भी नही है 
ये किससे बताये 
किसे हम सुनाये 
आँसू छुपाये 
या हिचकी दबाए 
कटी जीभ अपनी 
निकलता जो खू है 
ये कैसे छुपाये 
न आहो मे कोई 
न चाहो मे कोई 
निगाहो मे कोई 
न राहो मे कोई 
ये गम हम दबाए 
कहा तक अब जाये 
ये दर्द जो है खू मे 
कतरे कतरे लहू मे 
है चमड़ी के अंदर 
औ चमड़ी के बाहर 
ये जाता नही है ।