मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

जिन्दगी का ठहराव

कभी कभी जिंदगी में 
गहरा ठहराव क्यों आ जाता है 
कि 
सब कुछ ठहर जाता है
ठहर जाती है सांसे 
और 
शरीर भी ठहराव का शिकार हो जाता है
मन ठहर जाता है 
तो 
मस्तिष्क भी ठहरा हुआ होता है
पूरा का पूरा अस्तित्व ठहर जाता है 
और 
लगता है कि 
तकदीर भी ठहर गयी है 
और तदबीर भी । 
लगता है 
चौराहे पर खड़े है 
साँसे रोके हुए 
और 
चारो तरफ से 
शोर मचाती गाड़ियां चली जा रही है 
और 
समझ ही नहीं आ रहा 
कि किधर जाये । 
ज्यो ही किसी तरफ पैर बढ़ाते है 
कोई तेज रफ़्तार गाडी और उसका शोर 
वापस पैर खीच लेने को मजबूर कर देता है 
और ठिठक कर वही साँस बांधे 
खड़ा रहने को मजबूर कर देता है ।
आखिर क्यों ऐसा ठहराव आ जाता है 
जिंदगी में कभी कभी ।

रविवार, 24 दिसंबर 2023

आत्मा तो मत बेचो

#आत्मा_तो_मत_बेचो 

जमीन बेचो , पेड़ पौधे और प्रकृति बेचो ,
 मिट्टी बेचो , फल फूल बेचो , योग बेचो , 
मंदिर मस्जिद और ईश्वर बेचो 
पर आत्मा 
वो भी बेच रहे हो रोज 
और उसकी आवाज सुनाई नहीं पड़ती 
आत्मा नहीं बिकी तो सब बच जायेगा 
इंसान भी और इंसानियत भी ।
जरा सोचो और जरा आत्मा की सुनो ।

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

बस घिसट रहा हूँअपनी लाश लिए

मैं ढूंढ रहा हूँ खुद को

कुछ दिनों से 

पर भटक जाता हूँ

रास्ता तलाश करते करते

केवल अँधेरा हाथ आया है 

अब तक

अँधेरे में रास्ता नहीं दीखता

तो कैसे ढूंढ मैं खुद को

रास्ता तलाश करते करते

कितनी बार गिरा मैं

और कितनी बार टकराया हूँ

पता नहीं किस किस चीज से

सर फूट गया है टकरा कर

बह रहा है खून लगातार

केवल सर क्यों ,यहाँ तो

अंग अंग घायल हो गया है

और 

दिल तो छलनी हो गया है

मन और अस्तित्व 

विलीन हो गए है

कही अनंत में

और मैं ,

मैं हूँ ही कहा

मुझे तो ख़त्म कर दिया है

संघर्ष और क़िस्मत की जंग ने 

तो क्या ढूँढना खुद को

बस घिसट रहा हूँ

अपनी लाश लिए 

अब 

अपनी लाश के बोझ ने भी 

थका दिया है बुरी तरह

नहीं चल पाउँगा और 

अपने पैरो पर 

पर कोई कंधे भी तो नहीं

जिनका सहरा मिल जाये 

या 

जिनपर लद कर जाऊं मैं ।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

शरीर भी कितना बेईमान है

ये शरीर भी कितना बेईमान है 
पर खुद को समझता महान है 
पर कही भी सरेंडर कर जाता है
कही अकड़ता कही शिथिल पड़ जाता है 
मच्छर भी काट ले तो बाप रे बाप 
कांटा भी चुभ जाये तो हाय ही हाय 
जरा सा टूट जाये तो औकात बताता है 
इश्क मे कदमो मे लेट जाता है 
नफरत मे अपनी औकात बताता है 
कितनी बड़ी बड़ी बाते बनाता है 
दूसरो से डरता है अपनो को सताता है 
बड़ी से बड़ी डीँग हाकता है 
मौका पडने पर लुढक जाता है 
जी हा पर शरीर तो शरीर है 
कोई मन ,दिल दिमाग और आत्मा तो नही 
जो इसे जैसे चलाते है वैसे चल जाता है 
शरीर बस पुतला है जिसमे दिल है 
शरीर एक अस्तित्व है जिसमे दिमाग है 
शरीर को बस शरीर ही रहने दो 
इसे कम्प्यूटर और गड़ित मत बनाओ 
इसका अपने दिमाग से प्रयोग करो 
और कुछ बुरा हो जाये यो भूल जाओ 
चलो शरीर का भरपूर उपयोग करो 
इसका जितना हो सके प्रयोग करो 
तभी शरीर शरीर रहेगा दौडेगा खेलगा 
जी हा इसकी भाषा को समझो तो 
फिर ये खूब खूब और बहुत खूब बोलेगा ।
अपने शरीर को खूब प्यार करो 
दूसरे के शरीर से भी मत इंकार करो ।
क्योकी शरीर नितांत क्षणभंगुर है 
जल जायेगा 
फिर क्या पता कब 
आप की किस्मत मे वापस आयेगा ।

किस बात के नाते

आप दलगत राजनीति छोड़ दे 
दल वाले आप को छोड़ देते है 
आप राजनीति छोड़ दे
राजनीति वाले आप को छोड़ देते है 
आप नौकरी से बाहर तो
वहाँ के रिश्ते खत्म 
आप काम के न हो 
और 
बोझ बन जाये तो 
सारे रिश्ते खत्म 
जी हा 
रिश्ते भी व्यापार है 
पूरा कारोबार है 
मुनाफे के साथ रहते है 
और घाटा छोड़ 
मुनाफे की तरफ बहते है 
ये मच्छर की तरह है 
जो लैम्प पोस्ट जल जाये
सारे मच्छर उधर भाग जाते है 
आप का बुझ गया तो
किस बात के नाते है 
इसलिए चाहे जो करो
उपयोगी रहो 
कही से भी तेल लाओ या बिजली 
पर जलते रहो 
फिर पूरी आभा 
पूरे गौरव के साथ चलते रहो ।

सोमवार, 4 दिसंबर 2023

अपने हिन्दूस्तानके लिये उठो ।

पहले अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो 

ऐ पढने लिखने वालो उठो 
ऐ कविता करने वालो उठो 
ऐ नाटक करने वालो उठो 
सब मंच सजाने वालो उठो 
सब कलम चलाने वालो उठो 
सब दिमाग लगाने वालो उठो 
सब आवाज उठाने वालो उठो 
कि 
कोई तुमारे अनंत नील गगन 
और तारो को छीन न ले 
उठो की चन्द्रमा तुम्हारा ही रहे 
प्रेम के लिये प्रेरित करता रहे 
उठो कि सूरज पर 
कोई अधिकार न जमा ले
और वो सबको रोशनी देता रहे 
उठो की हवाए 
किसी की कैद मे न हो 
स्वतंत्र चलती रहे 
उठो की हरियाली 
किसी की जागीर न हो
सबकी हो 
उठो की फूलो को 
खिलने से रोका न जा सके 
और सब फूल सब रंग
गुलजार करते रहे बगीचे को 
उठो की नदिया 
कोई सोख न ले 
और वो बहती रहे निरंतर
स्वछ और निर्मल 
उठो की आज़ादी महफ़ूज रहे 
उठो की जम्हूरियत 
किसी की जूती न बने 
उठो की लव खामोश न हो 
उठो कि तुम्हारी धड़कन
और तुम्हारी सांसे 
तुम्हारी ही हो 
उठो कि दुनिया 
अब शमसान न बने 
उठो की चंगेज स्टालिन
हिटलर मुसोलिनी 
अब कोई इन्सान न बने 
उठो अपनी आन बान
शान के लिये उठो 
उठो मानवता और 
दुनिया के लिये उठो 
पहले अपने हिन्दूस्तान
के लिये उठो ।

रविवार, 12 नवंबर 2023

कहो राम तब क्यो आये थे


कहो राम तब क्यो आये थे
अब चुप होकर क्यो बैठे हो
बहुत थके हो तुम लंका से
या फिर क्यो रूठे रूठे हो
रूठे हो खुद से या कैकेयी से
या मंथरा से या अपनी माँ से
जो तुम्हरी खातिर लड़ी नही
और राजपाठ को अड़ी नही
यदि खुद से रूठे तो अच्छा है
ये  रूठना  फिर  सच्चा  है
फिर मर्यादित कैसे होते
ये सवाल भी बहुत बड़ा है 
तब तो केवल एक था रावण
अब रावण की फौज खड़ी हैं
तब तो थी  छोटी  सी लंका
अब की लंका बहुत बड़ी है
तब क्या सब बहुत बुरा था
अब क्या रामराज्य आ गया 
सोचो तब क्यो तुम आये थे
और अब क्यो उदासीन हो
आते तो तुम अब भी लेकिन
मंदिर मस्जिद पर आते हो
या  त्यौहार में आ जाते हो
या फिर प्रचार में आ जाते हो

क्या कमाल था वो पत्थर थी 
तुमने उसमे जान डाल दी
बहुत डरा था नाव लिए वो
वो नाव जो वही खड़ी थी 

दीपक बन जलते रहना है ।

कहा अकेला हूँ मैं देखो
सूरज चाँद सितारे  मेरे
चिड़ियों का कलरव है मेरा
धूप है मेरी धूल है मेरी
बादल मेरे बारिश मेरी
घर की गर वीरानी मेरी
तो सडंको के शोर भी मेरे
बाज़ारों की हलचल मेरी
और नाचता मोर भी मेरा
छत मेरी दीवारें मेरी
घर में जो है सारे मेरे
बातें मेरी और राते मेरी
वादे मेरे और यादें मेरी
और किसी को क्या चाहिए
इतना तो सब कुछ घेरे है
जीवन क्या है बस डेरा है
आज यहाँ है और कही कल
कुछ साँसों का बस फेरा है
सभी अकेले ही आते है
सभी अकेले ही जाते है
कौन अकेला नहीं यह पर
भीड़ में है पर बहुत अकेले
मैं अकेला घिरा हूँ कितना
इतना सब कुछ पास है मेरे
लोगों के जीवन में देखो
विकट अंधेरे बहुत अंधेरे
उन सबसे तो मैं अच्छा हूँ
जीवन को अब क्या चाहिए
थोड़ी ख़ुशियाँ थोड़ी साँसे
मैं तो अब भी एक बच्चा हूँ
जल्द बड़ा भी हो जाऊँगा
फिर से खड़ा भी हो जाऊँगा
कैसा अकेला कौन अकेला
दूर खड़ा अब मौन अकेला
मेरे गीत और मेरे ठहाके
दूर रुकेंगे कही पे जाके
तब तक तो चलते रहना है
दीपक बन जलते रहना है ।

अज्ञात से युद्ध

अज्ञात से युद्ध  ?

बम,मिसाइल ,गोलियां ,गोले 
और 
संगीन किसी को नहीं पहचानती है 
क्योंकि उनके दिल नही होता 
उनके दिमाग नही होता 
वो खुद से कुछ नही करती 
कोई और चलाता है इन्हे 
ये गुलाम है किसी दिमाग के 
ये गुलाम है किसी उंगली के 
पर इंसान चाहे किसी देश का हो 
चाहे कोई भाषा बोलता हो 
और 
चाहे जिस बिल्ले वाली वर्दी पहने हो 
उसके तो आंखे होती है 
दिल और दिमाग भी होता है 
फिर कैसे कहर बन टूट पड़ता है
दूसरे इंसान पर 
जिसे खुद जानता भी नहीं 
जिससे उसकी दुश्मनी भी नही ?
फिर कैसे चलनी कर देता है उसे 
कैसे घोप देता है संगीन 
या उड़ा देता है बम से
बिना विचलित हुए 
क्या नही दिखता सामने उसे 
अपना भाई या बेटा 
नही कर पाता है कल्पना 
एक उजड़े घर की 
एक विधवा पत्नी , टूटे मां बाप
और अनाथ बच्चों की
चाहे सामने वालो के हो 
या ख़ुद के 
कैसे इतना बेदर्द और क्रूर हो जाता है 
कोई भी हाड़ मांस का जीवित इंसान ? 
युद्ध में कोई नहीं जीतता 
सब केवल हारते है 
और बर्बाद हो जाते है मुल्क 
उससे ज्यादा इंसानियत
युद्ध जमीन पर नही 
औरत की  देह 
और 
बच्चो के जीवन पर लड़ा जाता है 
और अंत में खत्म हो जाता है युद्ध 
एक मेज पर चाय के साथ वार्ता से 
तो पहले ही क्यों न 
रख दी जाए ये मेज और चाय 
इंसान की मौत और युद्ध के बीच में ।
आइए मेज पर बात करे हर दिन हर वक्त ।

शनिवार, 11 नवंबर 2023

मेरी दीवाली

मन रही है दीवाली 
हर साल की तरह 
कम होते गए घर से लोग 
अब रह गए हम दो
लोगो के घरो में 
बने है पकवान 
मेरा बेटा भी होटल से 
लाया है पकवान 
लोगो के घरो में 
सजी है रंगोली 
मेरे बेटे ने भी 
कुछ रख दिया है जमीन पर 
लोगो के बच्चे और बड़े भी 
छोड़ रहे है पटाखे 
मैं बिस्तर पर पड़ा 
सुन रहा हूँ आवाजे 
और 
मेरा बेटा बाहर खड़ा 
देख रहा है सबको फोड़ते 
मेरे घर भी आई है मिठाई 
पर 
पता नहीं क्यों 
मिलने आने वालो की तादात 
घट जाती हैं बुरी तरह 
जब किसी पद पर नहीं होता हूँ मैं 
हमने खरीदा है कुम्हार के बनाये 
दिए और लक्ष्मी गणेश 
थोड़ी सी खील और बतासे भी 
ताकि इनको बनाने वालो की 
कुछ मदद हो जाये
और हार न जाये ये 
देश के दुश्मन चीन से 
और मन गयी 
मेरी और मेरे बेटे की भी दीवाली ।

बुधवार, 8 नवंबर 2023

दिए जलाओ खूब जलाओ



दिए जलाओ खूब जलाओ 
इतने जलाओ कि डूब जाओ 
और भूल जाओ भूख अपनी 
दर्द अपना औ चीख अपनी 
जहां भी मिले जगह कोई भी 
मंदिर कोई या नदी किनारा 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
और हर बारी गिनते जाओ 
पिछली बारी जितने जले थे 
उससे ज़्यादा अब जलाओ 
नए नए कीर्तिमान बनाओ 
कैसी ग़रीबी कौन है भूखा 
कैसी बेबसी और बेकारी 
ये सब बाते बेमतलब की 
चकाचौंध में इन्हें भुलाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
सीमा पर जो शहीद हुए है 
वो सब है गरीब के बच्चे 
सुरसतिया की लाज लूटी 
या गौहरबानो उठा ली गयी 
पेड़ो पर लटके किसान हो 
या फ़ुटपाथो की आबादी 
इन सबसे तो आँख फेर लो 
धन्नासेठो को चमकाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
उसके घर में तेल नही है 
कल दिए से तेल वो लेगा 
और वो है पत्तों पर खाता 
कल दिए वो ले जाएगा 
ये भी तो एहसान बहुत है 
इन एहसानों को छपवाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
घर में अंधेरा है लाखो के 
उनको उजाला ख़ुश कर देगा 
पेट में जिनके आग जल रही 
उनके पेटो को भर देगा 
जो क़िस्मत में वही हो रहा 
उन सबको ये पाठ पढ़ाओ 
राम जी अग़ला जन्म बनाए 
ऐसा भाव उनमें  जगाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ ।

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

कुछ भी करो पर उपयोगी बने रहो

एक उम्र के बाद आप उपयोगी नही होते 
किसी के लिए 
बल्कि लोगो की जरूरत होती है आप को 
तब !
क्या आप ने कभी फुटबाल खेला है 
हर खिलाडी फुटबाल को सरका देता है 
दूसरे की तरफ एक रणनीति से 
पर जिन्दगी के मैदान पर 
लोग फुटबाल फेंकते रहते है 
दूसरे की तरफ बला समझ कर 
खेल का मैदान हो या जिन्दगी का 
फुटबाल पैरो से ठोकर खाने के ही काम आती है
और घिस जाने पुरानी हो जाने पर फेंक दी जाती है 
कूड़ेदान मे
इसलिए कुछ भी करो पर उपयोगी बने रहो ।

रविवार, 29 अक्टूबर 2023

ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं

जिन्दगी सिर्फ तुम्हारी नही 

लोग आत्महत्या कैसे कर लेते है 
कितना तकलीफदेह होता है 
जान कर जान देना
जहर पिया तो उसका डर 
गोली चलाने मे कांपते हाथ 
और 
उसके दर्द का एहसास 
नस काटी तो दर्द 
और 
बहते खूँन की दहशत 
और 
फासी लगाया तो कितनी हिम्मत 
गर्दन लटक जाने 
सांस घुट जाने की तकलीफ ।
कैसे हिम्मत आती है 
और 
कर लेने के बाद 
आखिरी क्षणो मे 
सब किया वापस हो जाये
का ख्याल आता है क्या 
क्या तब जिन्दगी से
प्यार महसूस होता है ?
क्या तब इच्छा होती है 
कि 
लड़ले अंतिम लडाई पर ये नही ।
क्या ये क्या वो 
पर ये सब बतायेगा कौन ?
न ये न वो ।
और 
पीछे छूटो का दर्द
असहाय स्थिति
अनिश्चित कल 
और 
मौन मौन बस मौन ।
मत करो ऐसा 
जिसका कोई जवाब नही 
जिसका कल कोई हिसाब नही ।
लडो और खूब लडो 
क्योकी जिन्दगी सिर्फ तुम्हारी नही 
अपनो की भी अमानत है ।

शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

कौन लाएगा उजाला भारत की जिन्दगी मे ।

दीपावली पर 
बड़े शहरो मे 
दुकानो पर 
महंगी गाडिया 
कम पड़ जाती है 
और 
दिये उदास 
पडे रहते है 
जमीन पर 
गरीब 
एक दिया भी 
नही खरीद पाता है 
सेंसेक्स और शेयर 
उछल रहा है 
और 
सोना चाँदी भी 
पर 
एक और चीज 
उछल रही है 
किसानो और 
बेकारो की 
आत्महत्या की संख्या 
सचमुच आज भी 
एक ही देश मे दो है 
एक 
10 फीसदी इंडिया 
वैभव से संपन्न 
जिन्हे देख कर 
तय होती है योजनाये 
और आँकड़े 
दूसरा 
90 फीसदी भारत 
बदहाल और उपेक्षित
मिली थी रात को 
12 बजे आज़ादी 
पर 
90 फीसदी भारत 
की जिन्दगी मे 
आज भी अन्धेरा है ।
कौन लाएगा उजाला 
भारत की जिन्दगी मे ।

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

आखिर ये जंग क्यो ?

आखिर ये जंग क्यो ?

कम या ज्यादा 
बर्बाद दोनो हो रहे है 
रुस भी और युक्रेन भी 
इंसान ही मर रहे है 
रुस मे और युक्रेन मे भी 
एक दूसरे को मारने वाले
एक दूसरे को जानते तक नही है 
पर मारे जा रहे है
एक दूसरे को 
टूट रहे है घर,पुल,सड़के
कारखाने ,स्कूल और अस्पताल 
बन रहा है मलवे का ढेर 
सिंचित हो रही है 
लहू से जमीन दोनो की
जंग ने हमेशा लहू पिया 
और 
तबाह किया सब कुछ 
जंग नही थी तब क्या नही था
जंग से क्या मिला है  
आखिर ये जंग क्यो ?

उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रातें 
कितनी स्याह होतीहै 
क्यो होती है 
इतनी स्याह रातें 
ज्यो ही सूरज 
पच्छिमी की खोह में 
डुबकी लगाता है 
पूरब से फैलने लगती है 
स्याह रात 
टिमटिमाते हुई 
रोशनियां भी 
जुगनू से ज्यादा 
कुछ नही होती 
कितनी भयानकता 
समेटे होती है स्याह रात 
जिंदगी गर्त हो जाती है 
धीरे धीरे इसके आगोश में 
और 
कितना अकेलापन 
तारी हो जाता है 
जिसमे जिंदगी 
सवाल बन जाती है 
इन सवालो का 
कोई जवाब नही होता 
खुद से ही बाते करना 
खुद को तसल्ली देना 
खुद के अकेलेपन से लड़ना 
और लड़ते लड़ते 
नीद के लिए लड़ना 
ताकि आंख बंद कर 
अनदेखा कर सके 
इस स्याह अंधेरे को 
और अकेलेपन को 
पर 
कितना स्याह है सब कुछ 
चलो आंखे बंद कर लेते है 
और 
सोच लेते है 
की 
अकेले नही है हम 
तमाम सूरज उग गए है 
हमारी जिंदगी में ।
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रविवार, 15 अक्टूबर 2023

कुछ सवाल

मेरी कविता 

कुछ सवाल है 
जो अनुत्तरित है 
कुछ जवाब है 
जो खुद 
सवाल बन गए है 
सिलसिला टूटता ही नही 
न सवालो का 
न जवाबो का 
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है 
पर 
कही तो कोई दीवार होगी 
या 
होगा इस सफर का डेड एंड 
जो रोक देगा क्रिया को 
और 
प्रतिक्रिया को भी 
और 
फिर सब होगा शांत शांत ।

नदी में तैरती लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
क्योंकि लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती लाशो की है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

ईश्वर क्या है

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

मिसाइलो के दिमाग नही होता

बम और मिसाइलो के दिमाग नही होता 
बम और मिसाइलो के दिल भी नही होता 
नही जानते बम की वो क्या करते है 
लाशे देख कर मिसाइलों के आसू नही निकलते 
इन्हे नही पता कि घर या बस्ती कैसे बसती है 
कोई हथियार इंसान को नहीं पहचानता है 
इनके धमाके ये खुद नही सुन पाते है 
फट जाने पर उनके खून नही निकलता है 
पर इन्हे चलाने वाले हाथ तो सब जानते है । 

चंदा तुमने कितना भरमाया सालो साल

चंदा तुमने कितना भरमाया सालो साल 
इंसा तुमको समझ न पाया सालो साल 
स्त्री का व्रत हो या रोजा हो मुस्लिम का 
सबने ही तुमसे शक्ति पाया सालो साल 

मां ने बच्चो को भरमाया सालो साल 
भूखे को रोटी बतलाया सालो साल 
चरखा बुढिया कात रही है समझे थे 
चादनी रात में खीर बनाया सालो साल 

( पूरा करना है )

शनिवार, 14 अक्टूबर 2023

सूरज क्या तुम सत्ता हो

सूरज तुम दिल्ली की सत्ता 
आये थे अहंकार में चूर 
गर्म लावा अहंकार का 
सब रहते है शांत
सहते है ताप तुमारा
नही मिलाते आंखे तुमसे
इंतजार करते है
जब ठंडे हो जागोगे तुम 
अब तुम्हारी शाम हो गई 
अब स्वीकार करो चुनौती 
आंख मिलाओ अब तुम सबसे
क्यों छुपने को भाग रहे हो 
डूब रहे हो तुम पश्चिम में 
फिर वो अहंकार था कैसा 
जो उठता है वही डूबता
क्या ये तुमको पता नही था 
इसलिए मदमस्त बहुत थे 
देखो अब तुम अस्त हो रहे 
डूब रहे हो किसी खोह में 
फिर जब आना सोच कर आना 
तुम भी अंतिम सत्य नही हो ।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

ये दर्द है जो गया नहीं

वो दर्द दे कर चला गया ।
ये दर्द है जो गया नहीं 

मैं तो तड़प के रह गया 
उसने लौट कर देखा नहीं 

मैं चीखता ही रह गया 
उसने कुछ भी सुना नहीं 

उसकी याद में बेहाल मैं 
उसने मुझे देखा नहीं 

मेरी निगाह है उसी राह पर 
पर वो इधर मुड़ा नहीं । 

खुश रहना कह के चला गया 
मेरे दर्द की ये दवा नही 

दुनिया से चला जाऊंगा मैं 
पर उसको होगा पता नहीं ।

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

उठा लूंगा मैं ये कलम या बंदूक ।

मैं लिखना चाहता हूं 
फिलिस्तीन और इजराइल पर 
मैं लिखना चाहता हूं 
यूक्रेन और रूस पर 
मैं लिखना चाहता हूं 
मणिपुर और मेवात पर 
मैं लिखना चाहता हूं 
दुनिया की हर हिंसा और मौत पर 
अपने आंसुओ कि स्याही बना कर 
लिखना चाहता हूं मैं 
पर ये क्या हिंसा सोचते ही 
आंसू लाल हो गए सुर्ख लाल 
मेरे हाथ कांपने लगे ओठ लरजने लगे 
गिर गई कलम मेरे हाथ से 
और गिर कर बंदूक बन गई 
नही उठा रहा हूं ये बंदूक मैं 
कि
मेरे भीतर का भी जानवर न जाग जाए 
नही लिख रहा में अब कुछ भी 
और आंसू भी तो गायब है 
कौन मेरा कोई सगा मरा है 
मैं क्यों परवाह करू इन सबकी 
जब मौत मेरे दरवाजे पर दस्तक देगी 
तब उठा लूंगा मैं ये कलम या बंदूक ।

बुधवार, 27 सितंबर 2023

सुना है की मरने के बाद आत्मा भटकती है

सुना है की मरने के बाद 
आत्मा भटकती है 
कर्म के अनुसार 
पता नही किस किस योनि में 
कीड़े मकोड़े से लेकर सांप तक 
पर मरने से पहले भी 
कुछ इंसान भटकते है 
आर एस एस, भाजपा हिंदू परिषद में 
दोनो में कोई अंतर नही है 
दोनो बस भटकते है 
और
भटकते ही रहते है 
परेशान हाल बेवजह
बर्बाद करने को खुद को 
और 
मानवता तथा समाज को ।।

शनिवार, 16 सितंबर 2023

मेरी राहो में कांटे जिसने भी बिछाये

मेरी राहो में कांटे 
जिसने भी बिछाये 
जब वो मेरे पांव में चुभे 
और 
जोर से चीखा मैं दर्द से 
जरूर उनके कानो के 
परदे भी हिले होंगे
और दुख रहे होंगे अभी तक 
दोस्त 
मेरा घाव शायद जल्दी भर जायेगा 
क्योकी बेजान कांटे से हुआ है 
पर तुम्हारा नहीं भर पायेगा जल्दी 
क्योकि 
इंसानी चीख से घायल हुए हो तुम ।
इंसान की जब भी निकलती है चीख 
या कराह 
वो छलनी कर देती है अंदर तक 
और दीखती भी नहीं 
पर 
अचेतन में हथौड़े की तरह 
चोट करती रहती है जिंदगी भर ।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

पसर जाता है सन्नाटा

मेरी कविता -

जब और जितनी बार भी 
अपने घर लौटता हूँ 
और 
दरवाजा खोलता हूँ 
बिजली सी कौंध जाती है 
और 
दीवारो पर बन जाती है 
अंनगिनत तस्वीरें 
और 
मन का बादल बरस उठता है ।
लहरो पर तैर जाती है 
यादो की कितनी कागजी नावें 
और कागज की नाव 
तो कागज की ही होती है 
खो जाती है अथाह पानी में 
और 
पसर जाता है सन्नाटा
दीवारो से छत तक 
और 
बैठक से बिस्तर तक ।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

जीवन पानी और बालू में कही खो गया ।

मैं कूद गया जीवन की नदी में 
और 
नदी का पानी सड़क पर जा पहुंचा 
नदी खाली हो गई 
सड़क नदी बन गई 
जीवन पानी और बालू में कही खो गया । 

रविवार, 27 अगस्त 2023

जिंदाबाद बोल |

कोई सवाल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल 
कोई बवाल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल 
पेट  रख दे किसी सिद्धांत की किताब में तू 
भूख ,ख्याल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल |

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

हां जीवन इसको कहते है |

मेरी कविता -

जिंदगी 

कब होगी पहचान हमारी 

इतने सालो से है दूरी 

क्या मजबूरी 

जिन्दा तो है 

पर क्या सचमुच 

क्या जीवन इसको कहते है 

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू  

नीद नहीं और पेट में हलचल 

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ 

बस अन्धकार है 

क्या जीवन इसको कहते है 

जीवन कब हमको मिलना है 

या फिर ऐसे ही विदा करोगे 

कुछ तो सोचो 

हम दोनों क्या जुदा जुदा है 

कुछ तो बोलो 

और भविष्य के ही पट खोलो 

या फिर कह दो 

हां जीवन इसको ही कहते है | 

जींना है तो हंस कर जी लो 

या फिर दर्द गरल को पी लो 

तेरे हिस्से में बस ये है 

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ 

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ 

चल अब सो जा 

अच्छे सपनो में आज तो खो जा 

कल फिर मुझसे ही लड़ना है 

हां जीवन इसको कहते है |

बुधवार, 9 अगस्त 2023

अजी सुनते हो 
देश है अपना महान ,कही नहीं इतना ज्ञान 
इसमें अपनी जान जी हां अपना हिन्दुस्तान
करवाता हूँ मैं पहचान ,अजी सुनते हो ।

सबने मिलकर नेता बनाया वो हो गए महान 
कुर्सी तक सबने पहुचाया चढ़ गए सीना तान 
सबको बौना कर के अपनी कुर्सी किया मचान 
अजी सुनते हो ।

मंगलवार, 8 अगस्त 2023

क्या बदल गया कुर्सियों में

मेरी ये कविता पढिये -----

पहले 
काठ से कुर्सियां बनती थी 
आज भी 
काठ से भी बनती है कुर्सियां 
पहले भी आदमी होते थे 
और 
आज भी आदमी होते है 
पहले भी आदमी ही 
कुर्सी पर बैठते थे 
और 
कभी कभी कुत्ते भी
आज भी कुर्सी पर 
आदमी ही बैठते है 
और 
कुत्ते भी कभी कभी 
पर 
पहले 
कुर्सियों पर बैठकर भी 
आदमी आदमी ही रहता था 
और कुत्ता कुत्ता ही 
पर अब कुर्सियों पर बैठकर 
आदमी खुद काठ बन गया है 
पर कुत्ते तो कुत्ते ही रह गए ।
क्या बदल गया कुर्सियों में 
या आदमी में 
खोज होनी ही चाहिए 
और ये भी 
की 
पहले काठ खत्म हों जाएगा 
या आदमी या फिर कुर्सियां ?

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

जिसके भी सामने झुका ये सर

जिसके भी सामने 
झुका ये सर 
वो बस वो ही 
जानता है 
अपना घाव और पीड़ा 
संसद के सामने 
लेटा था कोई 
तब से 
संसद ,उसकी परम्पराएं 
सिसक रही है
सुना है कि 
टूटने वाली है 
वह भव्य संसद 
जिसने देखा है
भारत की आज़ादी का
उगता सूरज
और सारा इतिहास 
अब 
फिर लेट गया कोई 
भारत की आस्था 
और 
विश्वास के सामने ?

रविवार, 30 जुलाई 2023

आतंकित है मानवता

क्या सत्ता और न्याय मिलकर 
ऐसी नई सज़ाये शुरु कर सकते है ? 
जीभ काट देने की सज़ा ? 
आंख फोड देने की सज़ा ? 
कलम तोड़ देने की सज़ा ? 
कीबोर्ड हटा देने की सज़ा?  
अक्षर खत्म कर देने की सज़ा ?
अशिक्षित रहने की सज़ा ?
दिमाग निकाल लेने की सज़ा ? 
वो सत्ता किसकी होगी 
वो न्याय किसका होगा 
आतंकित है मानवता 
उसकी कल्पना से भी 
उसकी सम्भावना से भी ।

रहम कर रहम कर रहम कर ।

दिल ,दिमाग़ ,कलम कीबोर्ड
साथ नही दे रहा है कुछ भी 
बहुत कुछ बोलना चाहता हूँ 
पर आवाज फँस जा रही है 
जब भी कलम उठाता हूँ 
अपने बोझ से गिर पडती है
दिल में जो झांकता  हूँ 
तो बस अंधेरा दिखता है 
दिमाग़ पर ज़ोर देता हूँ 
सर ज़ोर से फटने लगता है 
कीबोर्ड पर उँगलिया रखता हूँ 
तो उँगलियाँ झुलस जाती है 
ये क्या दौर आ गया है मौला 
रहम कर रहम कर रहम कर ।

गुरुवार, 27 जुलाई 2023

किस-किस को अब शीश झुकाना पड़ता है,

किस-किस को अब शीश झुकाना पड़ता है, 
दिल पर कितना बोझ उठाना पड़ता है 
काम नहीं चलता अब दीप जलाने से, 
हर पत्त्थर को भोग लगाना पड़ता है 
रूह बहुत दुख पाती इस जीने से, 
यारो जीते जी मर जाना पड़ता है. 
मौज उडाते हैं राजा के अधिकारी, 
पर जनता को कर्ज़ चुकाना पड़ता है 
हमने भी देखे हैं रंग सियासत के, 
भाई सबका साथ निभाना पड़ता है ।

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

चलो अब मैं चुप हो जाता हूँ और

चलो अब मैं चुप हो जाता हूँ 
और
भींच लेता हूँ ओठो को 
चाहे खून क्यो न निकल पडे 
कुछ भी हो जाये मेरे सामने 
आंख मूद लूँगा मैं कस कर 
चाहे फिर दुखती रहे देर तक 
या 
दिखना कम क्यो न हो जाये 
कुछ भी हो हत्या अपहरण 
बलत्कार भ्रश्टाचार  
हो जाये चीर हरण व्यव्स्था का 
या आ जाये तानाशाही 
मिटा दिया जाये संविधान 
पर 
मैं कुछ नही लिखूंगा 
कुछ नही बोलूंगा 
बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग 
और 
शामिल हो जाऊंगा उन्ही मे 
निकाल कर फेंक दूंगा अपनी रीढ 
दफना दूंगा दिल दिमाग 
और चिंतन ।

हम इन्सांन नही कुम्भकरण है ।

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकरण है ।

मैं भी जमाने जैसा हो गया हूँ ?

मिटा दिए है वो तमाम नम्बर 
जो नही उठे मेरी ज़रूरत में 
या 
यूँ ही जब हाल जानना चाहा 
भुला दिए है तमाम वो नाम 
जिन्हें मैं याद नही आया कब से 
वो चेहरे भी धुंधले कर दिए मैंने
जिन्होंने फेर ली निगाहें मुझसे 
हा 
मैं भी जमाने जैसा हो गया हूँ ?

ईश्वर कैसा होता है ।

कितने महान है वो लोग
जो पत्थरो से सर मारते है 
और 
मानते है कि  
पत्थर चमत्कार करता है 
हा 
सच है की पहली आग 
लकड़ियो की रगड़ से 
या 
पत्थरो के टकराने से ही पैदा हुई 
पर 
उसका कारण तो वैज्ञानिक है 
उसमे चमत्कार कुछ भी नही 
और 
किसी अन्य लोक की
ताकत भी कुछ भी नही
मेरी दुवा है आप सबको कि 
सर टकराते रहो 
पर जरा सम्हाल कर
सर से खूँन निकलता है और
फिर उसे रोकने को
दवाई ,मरहम पट्टी 
और 
डाक्टर की जरूरत पडती है 
अगर अधिक निकल गया 
तो 
शायद कही और जाकर
हो सकता है 
दर्शन हो ही जाता हो परमात्मा का
पर तय नही 
क्योकि 
किसी ने लौट कर बताया नही 
कि ईश्वर कैसा होता है ।

रविवार, 23 जुलाई 2023

एलान कर दो कि डर गए हो



एलान कर दो कि डर गए हो 

ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने ग़ुलामी मान ली है 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सब डर गए हो  
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने सोचना बंद कर दिया है 
ख़ुद ही एलान का दो 
कि अब कोई सवाल नही पूछेगा 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि अब कोई चुनाव नही चाहिए 
चुन लिया है इसी आका को 
जब तक वो चाहे तब तक के लिए 
तुम्हारे पास और कोई चारा नही है 
तमाम क़ानूनी ग़ैर क़ानूनी हाथ 
लपकने को तैयार है
और कसने को तुम्हारी गर्दनो को 
मार दिए जागोगे तुम 
या सड़ा दिए जागोगे 
किसी काल कोठरी में 
इसलिए एलान कर दो 
अपनी गर्दनो को टूटने से पहले 
किसी काल कोठरी में जाने से पहले 
कि सब लोग डर गए हो 
और तैयार हो 
साहब हुज़ूर के रास्ते का 
पावड़ा बनने को सदा के लिए ।
(सुधार के सुझावों का स्वागत है )

गुरुवार, 20 जुलाई 2023

ये बारिश कैसी बारिश ।

मेरी कविता  ——

बारिश

बारिश  नहीं आयी
उफ़्फ़ कितनी गरमी है 
सूरज जला देगा क्या 
ये बारिश क्या करेगी 
आफ़त बन कर आयी है 
सब कुछ बहा देगी क्या 
देखो गिर गए 
कितनो के कच्चे घर 
और 
झोपड़ियाँ भी जवाब दे गयी 
अबकी बारिश समय पर आयी 
और उतनी ही आयी 
की अबकी खेत सोना उगलेंगे 
अभी बारिश तो आफ़त है 
भीग गया खेत और खलिहानों में सब 
अब साल कैसे बीतेगा 
कैसे होगी उसकी पढ़ाई और दवाई 
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
बारिश आयी स्कूल की छुट्टी 
छप्प छप्प करते वो पानी में 
वो काग़ज़ की नाव बहाते 
वो बचपन कितना प्यारा लगता है 
उससे पूछो जो अभी है ब्याही 
और पति सीमा पर बैठा 
उन दोनो के मन की सोचो 
और 
वो दोनो भीग रहे है छत पर 
दोनो देख रहे दोनो को 
भीगा आँचल भीगा यौवन 
दोनो को है कितना जलाए 
वो मछरदानी पर प्लास्टिक बिछा रही है 
बालटी भगौने सब बिस्तर पर सज़ा रही है 
ख़ुद बैठी है पर बच्चों को 
इस कोने और उस कोने कर 
वो बारिश से बचा रही है 
पूरी रात नहीं वो सोयी 
सब झेला 
पर कभी नहीं क़िस्मत पर रोयी 
बारिश का मतलब उससे पूछो 
जो पूरा घर अब सुखा रही है 
बारिश तो अब ख़त्म हो गयी 
चरो तरफ हरियाली छायी

फूलों से अब लदी डालियाँ 
सबको ही अच्छी लगती है 
भूल गए सब क्या झेला था 
वो अच्छा या बहुत बुरा था 
फिर जीवन पटरी पर आया  
उफ़्फ़ 
ये बारिश कैसी बारिश ।

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

वो रास्ता वो सफर बहुत ही मुश्किल था पर कैसे भी पहुंचना है ये हमारा दिल था ।

वो रास्ता वो सफर बहुत ही मुश्किल था 
पर कैसे भी पहुंचना है ये हमारा दिल था ।

वो क्या कहलाता है ।

जो दिन भर हंसी 
चेहरे पर चिपकाता है 
अकेले मे रात को रोता 
फिर 
सुबह से मुस्कराता है 
वो भी एक इन्सा है 
जो खुद को 
और 
अपनो को बहलाता है ।
क्या कोई जानता है 
कि 
वो क्या कहलाता है ।

सोमवार, 17 जुलाई 2023

दीवारे उग जाती है रिश्तो के बीच ।

वही लोग 
जो छोटे शहरो मे  
कितने घनिष्ट 
और 
कितने अपने लगते है 
क्योकी खूब मिलते है 
सुख और दुख मे 
पर 
बड़े शहर मे आते ही 
बहुत दूर हो जाते है 
और बिला जाते है 
सारे रिश्ते और भावनायें 
नही मिलते सालो साल 
या 
संपन्न ज्यादा हो जाये 
तो 
छोटे शहर मे भी 
दीवारे उग जाती है 
रिश्तो के बीच ।

ऊंची दीवारे अपनो के बीच

बहुत ही अपने 
जब संपन्न हो जाते है 
या चढ़ जाते है 
ऊंची पायदाने 
उग आती है 
ऊंची दीवारे 
अपनो के बीच 
रिश्तो मे,भावो मे ।

बुलबुले हो गये रिश्ते

छोटे शहरो के 
शहद जैसे रिश्ते 
बड़े शहरो की 
जमीन पाते ही 
कड़वे हो गये
जो फेविकाल से
जुडे लगते थे 
बुलबुले हो गये ।

सोमवार, 10 जुलाई 2023

भीड़ और मैं

मैं भीड़ में गुम हो जाना चाहता हूँ 
पर 
भीड़ और मेरे बीच इतनी दूरी है 
कि 
न मेरी आवाज उसे सुनाई पड़ती है 
और न मैं उसे दिखाई पड़ता हूँ 
मुझे भी नही दीखती है वो भीड़ 
बस सुनाई पड़ती है कानो में आवाज़ 
कही दूर से अपुष्ट ,अस्पष्ट 
और 
में ढूढने लगता हूँ उसे पागल जैसे 
पर 
भीड़ ने लगातार दूरी को कायम रखा है 
और मुझे धलेक रही है लगातार 
एकाकीपन की तरफ ।

रविवार, 2 जुलाई 2023

पकौड़े खाओ चाय पियो ग़म भुलाओ

हार गये 
कोई बात नहीं 
थोड़ी नीद सो लो 
फिर 
पकौड़े बनावावो
और 
अच्छी सी चाय 
उसमे हार डाल दो 
और फिर पी जाओ 
परशुराम,विष्णू का
मंदिर बनाओ 
काशी जाओ जल चढाओ
गांधी लोहिया जेपी से
मुह छुपाओ
अब 
जय श्री राम का नारा 
उनसे ज्यादा जोर से लगाओ ।