जीवन के इस महासमर में
कितनी तो आपाधापी है
कभी है गिरते कभी है उठते
कभी है गिरते कभी है उठते
फिर धीरे से चल पड़ते है
क्या क्या इस जीवन में देखा
खुद के ही जीवन को खोया
खाई में गिरा संघर्षों की
खाई में गिरा संघर्षों की
कष्टों के पत्थर पर सोया
साँसें गिनते रातें कट गई
सपने अपने टूटे बिखरे
आशा के दिये बुझते देखे
आशा के दिये बुझते देखे
और अँधेरे और कितने गहरे
मिट्टी से उठकर के फिर से
मिट्टी में ही मिल जाना है
हर मोड़ पर खुद से लड़ते,
हर मोड़ पर खुद से लड़ते,
खुद को ही खोते जाना है
आंखों में आसमान का सपना
पैरों तले जमीन है खिसकी
मन के मंदिर में दीप जलाया
मन के मंदिर में दीप जलाया
हवा ने उसे हर बार बुझाया
पुल टूटे कितने रिश्तों के
दीवार ढह गयी विश्वासों की
कितनी बार रह गए अकेले
कितनी बार रह गए अकेले
बस आवाज अपनी साँसों की
कष्टों और दुख के ही तकिए थे
आँसूओं से तन नहा गया तन
नई सुबह ने तब था पुकारा
उठो और चलो कर पक्का मन
गिरना तो है नियति का हिस्सा
अपना धर्म है गिर कर उठना
महासमर अब भी जारी है
पर यहाँ अधर्म है थकना
कभी थी मुस्कान छिपाई
कभी दर्द को गले लगाना
जीवन ने बस सिखाया
जीवन ने बस सिखाया
जो खोया था वह फिर पाना
खुद को मिटा नया रूप गढ़
राख से ज्यो उठते अंगारे
संघर्ष की आग में तपकर
संघर्ष की आग में तपकर
बने खूब और खूब है निखरे
अंधी गलियों में कितना भटके
दिशाहीन से तब लगते थे
तब अंतर्मन ने हमे पुकारा
तब अंतर्मन ने हमे पुकारा
राह तुम्हारे भीतर ही है
खोया हुआ है जो कुछ अपना
फिर वही से मिल जाएगा
कष्टों के दिन बहुत हो गए
कष्टों के दिन बहुत हो गए
आगे जीवन खिल जाएगा
अब भी तो आपाधापी है
महासमर भी थमा नहीं है
गिरते हैं और फिर उठते हम
गिरते हैं और फिर उठते हम
पर रुकने का नाम नहीं है
जीवन की दुर्गम यात्रा में
खोकर भी तो बहुत है पाया
पत्थर पर कितना भी सोए
फूलों की भी सेज मिली हैं
हर साँस में यही छिपा है
कदम कदम में नई कहानी
महासमर ही तो जीवन है
महासमर ही तो जीवन है
और यही पहचान है इसकी
खाई में गिरकर जो उठता
आसमान वही है छूता
महासमर के इस जीवन मे
महासमर के इस जीवन मे
अंतिम युद्ध उसी ने जीता ।