शनिवार, 26 सितंबर 2026

जीवन तो एक महासमर है

जीवन के इस महासमर में 
कितनी तो आपाधापी है
कभी है गिरते कभी है उठते 
फिर धीरे से चल पड़ते है

क्या क्या इस जीवन में देखा 
खुद के ही जीवन को खोया
खाई में गिरा संघर्षों की 
कष्टों के पत्थर पर सोया 

साँसें गिनते रातें कट गई 
सपने अपने टूटे बिखरे 
आशा के दिये बुझते देखे
और अँधेरे और कितने गहरे 

मिट्टी से उठकर के फिर से 
मिट्टी में ही मिल जाना है 
हर मोड़ पर खुद से लड़ते, 
खुद को ही खोते जाना है  

आंखों में आसमान का सपना
पैरों तले जमीन है खिसकी 
मन के मंदिर में दीप जलाया
हवा ने उसे हर बार बुझाया 

पुल टूटे कितने रिश्तों के 
दीवार ढह गयी विश्वासों की 
कितनी बार रह गए अकेले 
बस आवाज अपनी साँसों की 

कष्टों और दुख के ही तकिए थे
आँसूओं से तन नहा गया तन 
नई सुबह ने तब था पुकारा
उठो और चलो कर पक्का मन 

गिरना तो है नियति का हिस्सा 
अपना धर्म है गिर कर उठना
महासमर अब भी जारी है 
पर यहाँ अधर्म है थकना 

कभी थी मुस्कान छिपाई 
कभी दर्द को गले लगाना
जीवन ने बस सिखाया 
जो खोया था वह फिर पाना

खुद को मिटा नया रूप गढ़
राख से ज्यो उठते अंगारे
संघर्ष की आग में तपकर 
बने खूब और खूब है निखरे 

अंधी गलियों में कितना भटके  
दिशाहीन से तब  लगते थे 
तब अंतर्मन ने हमे पुकारा 
राह तुम्हारे भीतर ही है 

खोया हुआ है जो कुछ अपना
फिर वही से मिल जाएगा 
कष्टों के दिन बहुत हो गए 
आगे जीवन खिल जाएगा 

अब भी तो आपाधापी है 
महासमर भी थमा नहीं है 
गिरते हैं और फिर उठते हम
पर रुकने का नाम नहीं है 

जीवन की दुर्गम यात्रा में 
खोकर भी तो बहुत है पाया 
पत्थर पर कितना भी सोए 
फूलों की भी सेज मिली हैं 

हर साँस में यही छिपा है 
कदम कदम में नई कहानी
महासमर ही तो जीवन है
और यही पहचान है इसकी 

खाई में गिरकर जो उठता
आसमान वही है छूता 
महासमर के इस जीवन मे
अंतिम युद्ध उसी ने जीता ।