रविवार, 10 जनवरी 2016

दूरबीन लगा कर मुझमे कमियां ढ़ूढ़ते है लोग
कमिया नहीं होती तो क्या मैं देवता नहीं होता ।

सोमवार, 4 जनवरी 2016

गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

कल बना कर रहूँगा अपने जैसा |

हो जाती है कुछ गलतियाँ
भूल जाओ उन्हें आगे बढ़ो
कुरेदोगे तो गलती ही होगी
ख़ुश रहना है तो आगे बढ़ो

कभी बहुत बीमार हो गए थे
कभी लगी थी बहुत सी चोटें
क्लास में फेल हो गए कभी
कभी छूट गयी थी ट्रेन कही

तो क्या सब याद रखते हो सब
घुटते रहते हो उन सब के लिए
क्या वापस ला सकते हो वो सब
पलट सकते हो घड़ी की सूइयां 

नहीं न, तो आगे बढ़ो जीत लो
हर वो किला अपने इरादों का
पहन लो अपने धुले हुए कपडे
और कस कर जूते निकल पडो

बना लो जिंदगी को यूँ खुशनुमा
भूल कर की कहा और कब गिरे
और सोच कर की कल तो मेरा है
कल बना कर रहूँगा अपने जैसा | 

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

आप कितने भी मजबूत हो
आप के इरादे कितने भी अटल
पाँव कितने भी अभ्यस्त
और हाथ कितने भी हुनरमंद
मन कितना भी वश में
और दिमाग कितना भी तीक्ष्ण
पर फर फिर भी
जीतने वाले घुड़सवार की तरह
हर युद्ध फतह करने वाले योधा जैसे
हर कुश्ती जीतने वाले पहलवान जैसे
सारी पहाड़ियाँ चढ़ चुके पर्वतरोही जैसे
किसी कमजोर छण में
आप भी धराशायी हो ही जाते है |
पर गिर कर फिर सम्हल जाना
अगर जानते आप
तो फिर
भविष्य आप का भविष्य होता है
और
गिरने की कमजोरी से कमजोर हुए
या नहीं निकल पाए
इस एहसास से
तो घुटन भविष्य का गला घोट देती है |
इसलिए भूलो हर फिसलन को
और हर मार्ग के वरोध को
बना लो फिसलन को भी एक सुगम मार्ग
और अवरोधों को दूर झाँकने की सीढ़ी
सीख लो गलतियों से सबक
और चल पड़ो
अपनी गंतव्य को पूरे मनोवेग के साथ
देखो वो डूब कर उगता हुआ सूरज
तुम्हे आवाज लगा रहा है
और कह रहा है
की
तुम भी डूब कर फिर चमक सकते हो |

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना वक्त से
और अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और बुरी का आहत कर देता
और चील देता आत्मा को
सचमुच कसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंध खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 6 दिसंबर 2015

मेरे घर मे झांक झांक मुझको शर्मिंदा मत करना

मेरे घर में झाँक झाँक मुझको शर्मिंदा मत करना
मैंने खुद को मार दिया मुझको जिन्दा मत करना
देखो फटी है जेब औ डिब्बे खाली है
फ्रिज जैसा कुछ सारे खाने खाली है
भूख लगी जब अपने गम खा लेता हूँ
प्यास लगे तो आँखो में इतना पानी है ।
आँखो में यूँ झांक झांक मुझको शर्मिंदा मत करना
मैंने खुद को मार दिया है मुझको जिन्दा मत करना
हम तो संग चले थे पंख लग गए तुमको ही
मेरे छालो को कब मुड़ कर तुमने देखा ही
तुम दौड़े और तुमने तो आसमान छू लिया
मैं ऐसे गिरा मुझको कोई जमीन मिली ना
मेरे फटे चीथडो में झाँक अब शर्मिंदा मत करना

मैंने खुद को मार दिया                

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

मैं तो सूरज का बेटा हूँ तो ऐसे कैसे हारू मैं
तुझ जुगनू के हाथो खुद को ऐसे कैसे मारू मैं   |
मेरी राहे है पथरीली पड जायेंगे तुम्हारे पांव में छाले 
तुम्हारे पांव मखमल के लिए है तुम उस तरफ जाओ |





तुमने ही किसे बख्शा जब कोई सूरज तुम्हे नजर आया
की मैं सूरज छोड़ दूँ और तुम्हारे साथ सड़ता ऐसे ही रहूँ
तुमने तो सरो पर पाँव रख कर सारी ही मंजिले तय की
चाहते हो मैं अपने पाँव पर चल कर भी सूरज नहीं पाऊं |
वो देखो न दूर किस कदर वो सूरज चमकता है
मैं तुमको छोड़कर सूरज के साथ जाने वाला हूँ
मत कहना की मैंने भी तो धोखा दे दिया तुमकों
मैं भी अँधेरा छोड़ रौशनी से मन बहलाने वाला हूँ |

साथ चलने की कसम खाये हुये है

जो मेरे साथ चलने की कसम खाए हुए हैं
वो खुद ही बर्बादी के करीब आये हुए है |
मैं तुम्हारी महफ़िल से कुछ यूँ निकल जाऊंगा कल
जैसे सूरज चमकता है और फिर कही डूब जाता है |

सोमवार, 14 सितंबर 2015

जब और जितनी बार भी अपने घर लौटता हूँ और दरवाजा खोलता हूँ बिजली सी कौंध जाती है और दीवारो पर बन जाती है अंनगिनत तस्वीरें और मन का बादल बरस उठता है । लहरो पर तैर जाती है यादो की कितनी कागजी नावें और कागज की नाव तो कागज की ही होती है खो जाती है अथाह पानी में और सन्नाटा पसर जाता है दीवारो से छत तक और बैठक से बिस्तर तक जब और जितनी बार भी अपने घर लौटता हूँ और दरवाजा खोलता हूँ बिजली सी कौंध जाती है और दीवारो पर बन जाती है अंनगिनत तस्वीरें और मन का बादल बरस उठता है । लहरो पर तैर जाती है यादो की कितनी कागजी नावें और कागज की नाव तो कागज की ही होती है खो जाती है अथाह पानी में और सन्नाटा पसर जाता है दीवारो से छत तक और बैठक से बिस्तर तक ।

जब और जितनी बार भी
अपने घर लौटता हूँ
और
दरवाजा खोलता हूँ
बिजली सी कौंध जाती है
और
दीवारो पर बन जाती है
अंनगिनत तस्वीरें
और
मन का बादल बरस उठता है
लहरो पर तैर जाती है
यादो की कितनी कागजी नावें
और
कागज की नाव
तो कागज की ही होती है
खो जाती है अथाह पानी में
और
सन्नाटा पसर जाता है
दीवारो से छत तक
और
बैठक से बिस्तर तक

रविवार, 6 सितंबर 2015

किसी ने पूछा था भूल तो न जावोगे
हमारा सवाल था लौट के आ पावोगे ।
चलता हूँ गर चाहो तो मुझे याद रखो
याद की बात बस राख ही रह जाती है ।
जितना आसान है यहाँ ईश्वर कहलाना
उतना मुश्किल है यहाँ इंसान बन पाना ।
ये क्या मजबूरी है खुद में तन्हा रहना
बहुत लोग है हमें तन्हा करने के लिए ।
ज़माने को हमने खुद को सौंपा था
ज़माने ने हमसे हमको छीन लिया ।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

उस बच्चे को पता नहीं है जाति और मजहब क्या है
नफरत की खेती में इसको हम बैल बना कर जोतेंगे ।

सोमवार, 31 अगस्त 2015

कितने जतन करते हैं लोग बुलाने के लिए
कौन आता है फिर लौट कर जाने के लिए ।

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

बस इतना बयांन देकर उसने ख़ुदकुशी कर ली
कहते बड़ी जाति पर भूखा बीमार बेरोजगार हूँ |
बस इतना बयांन देकर उसने ख़ुदकुशी कर ली
हाँ मैं बड़ी जाति हूँ पर भूखा बीमार बेरोजगार हूँ |

बुधवार, 19 अगस्त 2015

कुर्सी और पेड़

क्यों इतना अंतर होता है
कुर्सी और पेड़ में ?
जबकि कुर्सियां भी
पेड़ो से ही बनती है
पेड़ देते है छाया
और कुर्सी देती है ताप
पेड़ देते है हरियाली
और कुर्सी नखलिस्तान
पेड़ देता है साँस लेने को वायु
और कुर्सी दमखोट देती है
पेड़ देता है फल
और कुर्सी सबका सब खा जाती है
पेड़ देता है सुखद एहसास
और कुर्सी केवल दुःख ही दुःख
क्यों इतना अंतर होता है
पेड़ में और कुर्सी में
जबकि कुर्सियां भी
पेड़ से ही बनती है
शायद कभी कोई शोध हो
और कारण पता लगे
और ये अंतर मिट जाये
कुर्सी और पेड़ का ।

रविवार, 9 अगस्त 2015

एक शख्स हरदम मेरे साथ रहता है

एक शख्स है जो हरदम मेरे ही साथ रहता है
गलत होता मुझसे कुछ तो वो जरूर कहता है
उसे दरगुज़र कर मैं ही अपनी मस्ती में रहता हूँ
अंदर वो मरता रहता है और सब कुछ सहता है।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

जिनके सामने सर झुकता है अदब से

जिनके सामने सर झुकता है अदब से 
गर लोग इस कदर मगरूर हो जायेंगे 
यकीन जानिए कितनी भी हो मुहब्बत 
हम फैसले करने को मजबूर हो जायेंगे ।

रविवार, 12 जुलाई 2015

लो अब मैं चला तुम खुश तो हो आज सूरज ढला तुम खुश तो हो देखो बंद हुयी मेरी जुबान आज बोलने से थे परेशांन खुश तो हो|


सच दो लफ्ज और झूठ भारी है झूठ हुआ आसमान खुश तो हो झूठ और लुट तुम्हारे मेहमान है और जनता बेजुबान खुश तो हो|


ये आदमी नागिन बन गया यारो नाग है परेशांन तुम खुश क्यों हो मैं चला तुम्हारी दुनिया छोड़ कर न जहर न एहसान तुम खुश तो हो


मंगलवार, 7 जुलाई 2015

आँखों में मूरत वसायी थी तेरी अच्छी से

आँखों में मूरत वसायी थी तेरी अच्छी से
आखो से गिरकर तूमने ही उसे तोड़ दिया
अपने घर से तेरे घर को मैंने ही जोड़ा था
दीवार खड़ी करके तूने ही हमें छोड़ दिया ।

ये दिल प्यार से भरा है जगह खाली नही रही

ये दिल प्यार से भरा है जगह खाली नहीं रही
अपनी नफरत को तुम खुद सम्हाल कर देखो |
सुना है कि बहुत शौक है  सबको आजमाने का
खुद को भी तो कभी आजमाईश डाल कर देखो ।

जो झुका अदब से सामने उसका वो कद नहीं है
वो उसका अदब है लेकिन तुम्हारा अर्दब नहीं है
घात करना घर बुला कर कभी अच्छा नहीं होता
जरा सोचो खुद को ऐसे हालात में डाल कर देखो  ।

घबरा जावोगे जब ये तुम्हारे साथ भी हो जायेगा
जब कोई बंद कर देगा औ फिर चाभी भूल जायेगा
तो जरा सोच कर देखो तड़प अपनी और अपनों की
ये नफरत है जो अपनों से खुद पर उछाल कर देखो ।

आसमां में उड़ने वालो से हाथ मिलाये कैसे

आसमांन  में उड़ने वालो से हाथ मिलाये कैसे
पिंजरो में जो है बंद उनके पास भी जाये कैसे
बड़ा मन कुछ सुख दुःख कह लेने सुन लेने का
शोहरत,ताकत के शोर में कुछ भी सुनाये कैसे ।

टूटोगे तुम औ मुस्करायेंगे हम ।

निकल पड़ें जब भी आज़ाद झोंके  की तरह
हाँ शोर मचाएंगे और मशहूर हो जायेंगे हम
ये दस्तक है हमारी सुन लो गर बहरे न हो
वर्ना बेचैन करने वाला शोर बन जायेंगे हम ।

हमें मुर्दा समझते हो निकलेंगे मुट्ठिया बांधे हुए
तुम देखते रहना बदलाव का झंडा फहराएंगे हम
हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा
हाँ देखोगे उदासी से जब शोला बन जायेंगे हम ।

अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो खेत की
अभी आगाज़ है फुटपाथो पर अब भी नजर कर लो
जब बिना आवाज़ के टूटोगे तुम औ मुस्करायेंगे हम ।

जिनके सामने सर झुकता है अदब से

जिनके सामने सर झुकता है अदब से
गर लोग इस कदर मगरूर हो जायेंगे
यकीन जानिए कितनी भी हो मुहब्बत
हम फैसले करने को मजबूर हो जायेंगे ।

सोमवार, 6 जुलाई 2015

सरकार सरकार

सरकार सरकार
जी सरकार
मेरी सरकार
जी सरकार
तेरी सरकार
जी सरकार
क्या सरकार
हाँ सरकार
कुछ कर दो सरकार
कर दिया जा
नहीं हुआ सरकार
कोई बार नहीं जा
नारा लगा और बटन दबा
फिर सरकार बना
जी सरकार
क्या सरकार
कुछ नहीं सरकार
बाबू ने पैसे लिए
काम हो गया सरकार
आप को वोट दिया
पर आप की नही चलती सरकार
चुप हो जा स्वार्थी
जी सरकार
कुछ पूछु सरकार
हाँ पूछ ढोल गंवार
आप बोले की
आप की सरकार
ये भी बोले की
हमारी भी सरकार
पर र र र
क्या अररर र मुह खोल
कुछ तो बोल
नहीं सरकार
मर जाऊंगा सरकार
बोल जल्दी बोल
वर्ना मरेगा
सरकार
आप तो कुछ नहीं
आप की बात भी नहीं
आप की कलम भी नहीं
आप बेकार
किस बात की सरकार
सब बेकार
न कोई सरकार
नौकर है सरदार
हाँ क्या सच है
फिर से बना सरकार
फिर देख सरकार
ना सरकार ना सरकार ।

ये दिल प्यार से भरा है

ये दिल प्यार से भरा है जगह खाली नहीं रही
अपनी नफरत को तुम खुद सम्हाल कर रखो |

रविवार, 21 जून 2015

छा जाता है गहन सन्नाटा ।

आप ने कभी
कोई बाँध टूटता हुआ देखा है
शायद हाँ भी और ना भी
वैसे ही
कभी कभी फूट पड़ता है
इंसान पूरे वेग से
और बह जाता है
वर्षो से रुका हुआ पानी
और फिर
छा जाता है गहन सन्नाटा ।

मोदी जी ने डुगडुगी बजवाया

मोदी जी ने डुगडुगी बजवाया
पूरे देश में मुनादी करवाया
की अब तो अच्छे दिन आ गए है
चारो और ख़ुशी के बादल छा गए हैं
सब पंद्रह पंद्रह लाख पा गए है
खाने से लेकर सब्जी तक और
डालर के दाम बहुत नीचे आ गए है
चीन हमारी जमीन छोड़ भाग गया है
पाक ने उस कश्मीर से बिस्तर बांध लिया है
क्या क्या बताऊ और क्या क्या दिखाऊ
बाहर निकलिए देखिये और
अपने हिस्से का अच्छा दिन ले जाइये
हमारे ऊपर अब सवाल मत उठाइए
ये सुन कर सब गरीब और बेकार जागे
अपना अपना थैला उठा कर बाहर भागे
पूछ आये हर संघी और भाजपाई दुकान पर
हर संघी और भाजपाई के मकान पर
कि भाई जी अच्छा दिन कहा है
सचमुच किसी को कही दिखा है             
हर कोई कुटिलता से मुस्करा रहा था
बेचारा गरीब उदास हो वापस जा रहा था
और अच्छा दिन
अदानी अम्बानी के महलो में ठहाके लगा रहा था

हमको बस हिंदुस्तान समझ लो ।

मस्जिद और मंदिर हो गया
मंडल और कमंडल हो गया
जातिवाद और गोत्र हो गए
प्रान्तवाद और क्षेत्र हो गए
सबकी ही सरकार बन चुकी
सबकी नीतियां देख चुके सब
संघ को देखा जनसंघ देखा
कांग्रेस और भाजपा को भी
सपा को देखा बसपा को भी
साम्यवाद को देख चुके सब
और क्षेत्रवाद के डंडे को भी
पर किसान को मरता देखा
औ नौजवान को मरता देखा
गरीब की खाली थाली देखी
घर में जलती घर वाली देखी
कही पर बेटी फिकती देखी
या फिर इज्जत लुटती देखी
यहाँ बेकारी को बढ़ता देखा
और बीमारी में  सड़ता देखा
फुटपाथो पर भी सोता देखा
और चौराहों पर रोता देखा
धनवालो को ही बढ़ता देखा
अधिकारी औ नेता व्यापारी
ये भी देजा और वो भी देजा
जी भी काम हो जो भी ठेका
सबका ही सूरज चढ़ता देखा
बेटी बिना पैसे कुंवारी देखी
बिन पानी सूखी क्यारी देखी
भूख गरीबी और शिक्षा बेकारी
का अब कोई नारा नहीं लगाता
नैजवान हो या कोई किसान हो
इन्हें अब कोई भी नहीं जगाता
जिस दिन खुद ये उठ जायेंगे
अपने हक़ के लिए जुट जायेंगे
समझा है कि तब क्या होगा
इतिहासों में ये दर्ज बहुत है
इन सबको अब दर्द बहुत है
अब तुम अपनी चाले छोड़ो
पूँजी से तुम अब मुह मोड़ो
मंदिर छोडो मस्जिद छोड़ो
मंडल और कमंडल छोड़ो
जाती धर्म के झगडे छोड़ो
अब इसानों से नाता जोड़ो
अब नारे हो या हो भाषण
सबके घर पहुचाओ राशन
अब बीमारी से जंग छेड़ दो
अब बेकारी से जंग छेड़ दो
नहीं अमीर को हमने रोका
पर अब गरीब न कोई होगा
अब कोई नहीं निरक्षर होगा
ना ही कोई टूटा छप्पर होगा
अब उंच न होगा नीच न होगा
अब ना ये चौड़ी खायी होगी
अब न टूटा हुआ इंसान होगा
अब न ही जीवन में काई होगी
मुट्ठी बांधो औ संकल्प मांज लो
परिवर्तन की हर राह साज लो
ये मुल्क और इसका सब कुछ
जीतना तेरा है उतनी ही उनका
अब गर गरीब ने जान लिया ये
अब सब पाना है ठान लिया ये
तब क्या होगा वो वैभव वालो
तुमने क्या ये सब भी सोचा है
बहुत हो गया अब तुम बदलो
अब सब झूठे नारे झूठे वादे
और झूठे कागज की दीवारे
तुम भी टूटोगे ये सब टूटेंगी
अब हो किसान के सूखे खेत
या नौजवान की कोरी डिग्री
अभी वक्त है अब भी सुन लो
इसमें तो कुछ आवाज और है
इन कदमो का अंदाज और है
झंडा कोई हो, कैसा भी भाषण
उसको तो बस रोटी से मतलब
तुम बदलो कितने कुरते सदरी
उसको बस नौकरी से मतलब
छत ऊपर औ ढका हुआ तन
स्वास्थ्य सुरक्षा और शांत मन
बस इतना ही तो सब माँगा है
ये लाल किला हो तुम्हे मुबारक
बडी कोठियां और जहाज भी
धन दौलत और या ये राज भी
सोने की रोटियां तुम्हे मुबारक
हमको बस इन्सान समझ लो
किसकी जाति क्या कौन धर्म है
हमको बस हिंदुस्तान समझ लो ।

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है
दरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |
हम तो लुटते रहे हर वक्त हर चौराहे पर
वो हर चौराहे पर ही दूकान लिए बैठे है |
हम बने सीढियां तो मीनार तक वो पहुचे
हम सीढ़ी रह गए वो भगवान् बने बैठे है |
बड़े बड़े थे वादे सबकी कहानी बदलेगी
हम पत्थर भी नहीं वो भगवान बने बैठे है |
लावारिश होते कई लोगो को हमने देखा है
स्वयंभू भगवान आज बे पहचान बने बैठे है |

इतना भी मत इतराओ की आज सूरज हो
सब दफ्न होते है वो शमसान हमने देखा है |
हमारा क्या जमी पर गिर के वही रह जायेंगे
आसमां से गिरे को लहूलुहान हमने देखा है |
कर सको तो नीव की ईंटो की भी क़द्र करो
वर्ना जमीदोज होते कई मकान हमने देखा है |


कैसे दिन आये इतना झुक जाना पड़ता है

कैसे दिन आये इतना झुक जाना पड़ता है
कैसो कैसो के आगे शीश नवाना पड़ता है
दादा बोले थे कि किसी के आगे ना झुकना 
सबके ही आगे हमको भोग लगाना पड़ता है
नहीं झुके बढ़ जाएगी बुरी तरह पीड़ा अपनी
और झुके तो आत्माँ को मर जाना पड़ता है
नहीं झुके बढ़ जाएगी बुरी तरह पीड़ा अपनी
और झुके तो आत्माँ को मर जाना पड़ता है
वो राजा राज उनका हम परजा पीड़ा अपनी
दर्शन दे दे इसका एहसान चुकाना पड़ता है
मुगलों का राज गया अंग्रेजो का डूबा सुरज
जहागीर का घंटा तो सबको बजाना पड़ता है|


क्या तब भी आप चुप रहोगे पापा ?

क्या तब भी आप चुप रहोगे पापा ?
जब ----------------------?
आप जो नेता हो ,आप जो पुलिस हो
आप जो समाज के बड़े हो, प्रशासक
पूछ रही है हम सभी की बेटियां
आज ही जब एक बार फिर
हैवानियत का शिकार हुयी
गाँव की दो गरीब बच्चियां
पर नहीं है कही शोर
न कही दिखती है मोमबत्तियां
न विजय चौक की वो भीड़
न वो नारे न वे चेहरे सारे
न टीवी की बहस न हंगामा
न वो महिला विमर्श के लिए
लड़ने का अभिनय करने वाले
सच शहर और गाँव में फर्क है
सच अमीर और गरीब में फर्क है
हाँ बहुत फर्क है
गरीब की और गाँव की इज्जत मे
अमीर की और शहर की इज्जत में
क्या कभी गाँव की बेटी के लिए
विजय चौक गरम नहीं होगा ?

भीड़ इतनी है आसपास पर

भीड़ इतनी है आसपास पर
मन में ये तूफ़ान सा क्यों है
मुस्कराते हुए चेहरे है सब है
हर कोई अनजान सा क्यों है ।
कोई अपना सा लगा ही क्यों
फिर ये बियाबान सा क्यों है
आशंकाए इतनी क्यों तारी है
मन में ये शमसान सा क्यों है ।
छोड़ कर लौट चला है आशिक
टूटा हुवा और बेजान सा क्यों है ।
कोई तो अपना सहारा भी होगा
दिल हुवा ये असमान सा क्यों है ।

कही बादल फटता है

कही बादल फटता है और
कही जमीन फट जाती है
जमीन तब भी फटी थी
जब सीता ने
जमीन से न्याय माँगा था
सच्चाई का
पहाड़ फटते नहीं बस
सरक जाते है जमीन की तरफ
दिल भी फटता है ऐसे ही
और इन्सान
न तो जमीन की परवाह करता है
न बादल की ,न पहाड़ की और
न दिल की ही
जब फट जाता है इनमे से कुछ भी
तो जार जार रोने लगता है इन्सान
और तब भी खुद को नहीं कोसता
कोसने लगता है ईश्वर को
व्यवस्था को और दूसरे को
वाह रे इंसान
तूने खुद को खुदा मान ही लिया है
तो क्या रोना
क्यों रो है तो अपनी ही करनी पर ।
रो !जब तू फटने को मजबूर करता है
आसमान को ,जमीन को और दिल को ।


उस दिन अपने गाँव गया था

दुखी हुआ मन, जब  
उस दिन अपने गाँव गया था
क्या सोचा था कि क्या होगा
कुछ भी वैसा ना निकला था
सब  कुछ बहुत बुरा बुरा था
जो छोटे थे बुड्ढ़े लगते
बड़े तो अब नहीं ही दीखते
वे दोनों तालाब खो गए
सम्मो मायी या काली मायी
सब उदास और बहुत अकेली
मंदिर का दरवाजा
औंधे मुह पड़ा हुआ था 
कुए सारे कही बिलाए
आम या जामुन या पाकड़ सब
दूर दूर तक नजर न आये
                +
न वो अपनापन ,न वो शिकायत
बस दिखावे मरने में और जीने में भी
केवल झूठी शान की बातें
नहीं थी मेरी चाची पर शोक नहीं
वहां  जश्न मना था
कैसे मैंने खाया उस दिन
सबको क्या देखूं
खुद मेरा घर बेगाना था
मेरा कमरा नहीं
मेरे लिए मेहमानखाना था
जिसको ठुकरा कर
मैंने अपनी भावनाओ को रोका था
सब बदल गया है
सभी स्वार्थी ,सभी के मन में
बस घात  है
बस मैं कुछ देदूं तो अच्छा हूँ
गर मैं कुछ अपना कह दू
तो फिर मैं मंजूर नहीं हूँ
भाग चला मैं दो दिन में ही
मेरे गाँव से
पर घूमा था पूरा दिन और यादें ताजा की
फिर जाते जाते मुड़ कर देखा
विदा कह दिया रोते मन से
मेरे गाँव को
पर बाबा की यादो को कैसे छोड़ू मैं
कैसे भूलू मैं सारी अच्छी यादो को
जो मुझमे पैबस्त कही है गहरे तक
         +
गाँव तो बस कहने को हैं
शहरों से होड़ बड़ी है कि
बड़ी बुराई कैसे सीखे और
शहर को कैसे पीछे छोड़ें
शायद ये अंतिम यात्रा हो मेरे गाँव की
बहुत दुखी मैं
क्यों मैं ऐसे गाँव गया था
,सब कुछ तो बदल गया था
अब मेरे आंसू सूख गए है और
मैं दर्द को भूल गया हूँ
हैं कोई देवी  देवता इतने करोड़ में
जो लौटा दे मेरा गाँव वो
पर वे भी हार गए हैं
पोखर के ऊपर की वीरानी और
 उनकी हालत बया कर गयी
छोडो अब सब भूलो भैया
बस यादो में झूलो भैया
गाँव की कहानी ,गाँव की कविता
गाँव का गाना लिखो भैया
ताकि बच्चे पढ़े और जाने कि
गाँव बहुत अच्छा होता है।





जमीन है नहीं पर कोठियों के सपने है

जमीन है नहीं पर कोठियों के सपने है
कोई भी अपना नहीं पर सब  अपने है ।
हमने सोचा न था कि हम बहक जायेंगे 
पर बहक गए है तो कारण भी अपने है ।
आसमान से आग बरसी जल गए हम 
पाँव में छाले है तो हम कैसे चल पायेंगे ।
लोग कहते है कि तुम इतने पीछे खड़े हो 
बेंच दें जमीर बहुत आगे हम चले जायेंगे।
हमें भी तमन्ना हो गयी बड़ा बन जाने की 
बेईमान नहीं हम बड़ा आदमी कहलायेंगे । 
लूट लो बस जर जमीन जोरू जो भी मिले 
फिर शान से चलो सभी नीचे नजर आयेंगे। 
कोठी कुत्ता कार और चमचे भी होंगे खूब 
फिर हम देश में काबिल महान कहलायेंगे ।
वाह रे ये देश ये समाज, तुझे सलाम मेरा 
अच्छों को थू थू और बुरों के गीत गायेंगे । 
क्या फर्क जमीन बिना कोठियों के सपने है
सब होगा आसान जब हम नंगे हो जायेंगे।
बस इसी की दौड़ है चली आज मुल्क में मेरे 
क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।
चलो कोई तो जुबान खोलो नंगों को नंगा कहो 
कई वर्षों के गुलाम हम फिर वही बन जायेंगे ।
आओ नकाबों को उतारे इन्हें सचमुच नंगा करें 
जब नंगे होंगे ये असल में मुह क्या दिखलायेंगे ।



प्राणों से प्यारा हमें अपना वतन

प्राणों से प्यारा हमें अपना वतन ,अच्छा लगता है हमें देश का बंधन

भारत के आगे सब जहान क्या था क्या बताये यारो ये स्थान क्या था
देवता भी ललचाये पैदा होने को ,क्या बताये भाई हिंदुस्तान क्या था

आइये पुराना इतिहास देख ले धुंधला पड़ा जो वो प्रकाश देख ले
वर्तमान पर जो कालिमा छाई आने वाले कल का आभास देख ले 

यही कभी गीता का प्रभाव दिखा था यही पर किसी ने रामायण लिखा था
बुद्ध महावीर की वो  वाणी गूंजी थी सभ्यता सभी ने तों यही से सीखा था
यही तानसेन की वो तान गूंजी थी राणा और शिवाजी की भी शान ऊँची थी
एक गया तों   दूसरा पैदा हो  गया यही  देवताओ  की वो  लम्बी सूची थी

गूंजता था वेद और पुराण का वचन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

जौहर वाली होली यही होती थी कभी चित्तौड़ी टोली यही होती थी कभी
कह दिया तों कह दिया फिर कैसा हटना ऐसी बोली यही होती थी कभी
और यही कर्ण ने भी जन्म लिया था गुरु को अंगूठा भी तों यही दिया था
हरीशचंद्र  भी तों यही  पैदा हुए थे पन्ना धाई  को  भी  कोई भूलोगे  कैसे
मंगल पाण्डेय वाली वो कहानी याद है रानी झाँसी वाली तों जुबानी याद है
किसे याद रहेगा ना विद्रोही सुभाष भगत और आजाद की क़ुरबानी याद है

यही पर जनम हो और यही पर मरण प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

तुलसी की चौपाई  यही मिलती सूर की ये कविताई यही मिलती
यही है कबीर का निर्गुण स्वरुप दिनकर की गरमाई यही मिलती
बच्चन पन्त और निराला भी यहाँ प्रेमचंद ढूढने तुम जाते हो कहा
याद है तुम्हे अगर रसखान की कृष्ण की मीरा भी तों हुई थी यहाँ 
एकला चलो  वाले वो   टैगोर थे   इक़बाल भी तों बड़े  घनघोर  थे

जाने कितने हुए है साहित्य रतन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

इस मिट्टी में हीरे मोती की भरमार है खेतो में पैदा होता सोना अपार है
माँ  की गोद  में  है जैसे  दूध  बह रहा गंगा  यमुना   की ऐसी दो धार है 
राखी का त्यौहार बड़ा प्यार का होता दशहरा तों सारे ही संसार का होता
दिवाली में खुशिया मनाई जाती है होली का त्यौहार तों मनुहार का होता

लोग मिलते है और बंधता है बंधन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

कितनी ही जातियां  और धर्म है कितनी बोलियाँ और कर्म है
पर सबकी जाति हिदुस्तानी है सबके दिलो का बस यही मर्म है 
हिन्दू हो चाहे वो  ईसाई हो, पारसी हो चाहे मुस्लमान भाई हो
सबका तन औए मन एक है जी हाँ  सारा ही हिंदुस्तान भाई है

रहे खुशहाल करो करो ऐसा जतन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

पर मेरे देश को क्या होता जा रहा अपने गुणों को कहा खोता जा रहा
देखो  अन्धकार ही  दिखाई  पड़ता  कही   नही रास्ता सुझाई  पड़ता 
देखो चारो ओर  बस भ्रस्टाचार है यहाँ तों सम्बन्ध भी हुए व्यापार है
राजनीति   का क्या हाल मै  कहूं  कैसे  कैसे  हुए  है कमाल क्या कहू 
इतने सालो लुटेरो ने हमको लूटा है जो भी कहा सब ही  दिखा झूठा है

ये कैसा हो गया देश का चलन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

क्या कोई बताएगा मुझे एक बात बड़ी कोशिश की पर हुई नही ज्ञात
कहाँ  गई  आज मेरी  सोन   चिरैया कैसे  उजड़ी है  ये  तिरंगी मड़ैया 
चन्द्रगुप्त वाला वो  शासन है कहा अकबर वाला वो  प्रशासन है कहा 
कर्ण  वाली कहा वो   दानप्रियता  भारत   की जानी  बलिदानप्रियता

आज क्यों लुटता है लाशो का कफन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

दो  लोग लेके  चलें रक्षामंत्री  को पूरी  गिनती  ना  आये वित्तमंत्री  को
सीमा पर जवान अपना खून बहाए भारतरत्न  मिलता है प्रधानमंत्री को
यहाँ लोकतंत्र  की अजब थाती है   मेरे भूखे भारत को ये  कैसे भाती है 
कैसे पेट भरेगा इस भूखे भारत का जब एक एक सीट  करोड़ खाती है

कैसा उजड़ा है इस देश का चमन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

[और अगर हम लोग नहीं सुधरे तो --------------------------------]\
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आइये कल  की  भी बात बात दूं आने वाली  कल की तस्वीर दिखा दूं
सड़को पर कल खून बहना यहाँ मेरी भी तों इच्छा है की मै भी बहा दू
सडको पर कल  यहाँ   आग लगेगी कल यहाँ    जनता जरूर  जगेगी 
कल ये व्यवस्था जलेगी आग में  भुखमरी  गरीबी  कल  जरूर भगेगी 

कल इस व्यवस्था को मिलेगा कफ़न फिर भी अच्छा लगे अपना वतन

आइये राजघाट चले ,

नेताजी भाषण कर रहे थे
आज दो अक्टूबर है                                                                     
आइये राजघाट चले ,
बापू की कसम खाये
उनके सिधांतो को याद करे,
और निभाये
हमसे रहा नही गया,
और सहा नही गया
हमने कहा,
नेताजी गजब करते है आप
बापू की कसम खा लेंगे
चमचे आसपास दिखलाई नही पड़ेंगे
बापू की कसम खाओगे
मॉस नही खाओगे
दुबले हो जाओगे
बापू की कसम खाओगे
छूटेगी कोठी और कार
नंगे पैर जमीन पर घूमोगे यार
दुबले और काले हो जाओगे
यहाँ तक तों सह लोगे लेकिन
बापू की कसम खा लोगे
दूसरो की औरतो को नही छू पाओगे
फिर जन सम्पर्क कैसे बढाओगे
तब नेताजी घबराये ,रुका ,सोचा ,
मुस्कराए और बोले
यार क्यों रॉकेट की तरह छूटते हो,
भेजा गरमा दिया
क्यों अपने मन की अपने आप लूटते हो,
डरा दिया
हमने कब कसम खाई है की
राजघाट के बाहर भी निभाएंगे
बाहर निकल कर मुक्त होंगे भूल जायेंगे
और अगर अधिक आलोचना होगी क्या
अगले साल दो अक्टूबर नही आयेगी
फिर यहाँ आएंगे ,फिर कसम खायेंगे ,
फिर उसी तरह निभाएंगे .

बहुत दिनों पर गाँव गया था

बहुत दिनों पर गाँव गया था
पर ये मेरा गाँव नहीं था .
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कहा गया वो?
सब कुछ बदला नया नया था
सुनते थे सड़के बननी है ,
पूरे गाँव को वो जोड़ेगी .
वो चकरोड बहुत चौड़ा था ,
पगडण्डी सा अब दिखता है .
वो मेरा चकरोड कहा है ?
वो पोखर ,तालाब ,गड़हिया
जो गाँव के तीन तरफ थे
उनसे पूरा गाँव हरा था ,
पशु नहाते ,सभी तैरते ,
मछली पर सबका ही हक़ था .
अब तों वहा मकान बने है
या फिर है रास्ते लोगो के .
सबके घर को तों रास्ते थे ,
सबके पास मकान थे अपने .
फिर ये सब क्या नया नया है .
वो रास्ते और तालाब कहा  है ?
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
उत्तर वाला नाला सदा भरा रहता था,
दक्षिण में नहर सरकारी .
चारो ओर दिखती थी धान की क्यारी .
कहा गए वो ?.
वो पाकड़ का पेड़ जहा खेला करते थे
और खुला खलिहान या दालान किसी का,
सब सबका था .
एक बार पड़ा था सूखा ,
कई घरो में अन्न नही था
पर जिनके घर हुआ था
आलू वो भून पंहुचा देता था
जिसका भी गन्ना पेरा जाता
भरी बाल्टी गन्ने का रस
उस घर वो भिजवा देता था .
कोई नहीं मरा था भूखा
नहीं रुका था काम किसी का .
बसवारी के बांस सभी के ,
छानी मड़ैया ,सरपत सबका . .
सब थे छवाते साथ उठाते
और मड़ैया उठ जाती थी.
वो मिले जुले स्वर और हाथ कहा है,
मिलके उठाना की आवाजे कहा गयी वो .
बरामदे का कुआँ कितना ठंडा कितना मीठा,
पता था सबको .
और द्वार पर बड़ा सफ़ेद फूलो वाला
मौलश्री का पेड़ खड़ा था .
जो राही इस राह से आता
रुक कर निश्चित पानी पीता,
पेड़ कि छाया में सुस्ताता
और फिर जाता.था
देख कर कितना सुख मिलता था .
कहा गया वो ?
पहले जब थे शहर से आते
पूरा गाँव अपना लगता था
बहुत लोग मिलने आते थे ,
हाल पूछते ,साथ बैठते ,
घर आने को कह जाते थे .
जिसका भी जो रिश्ता था कह जाता था
भाभी ,चाची,आजी बुला रही है ,
बहुत दिनों से नही है देखा,.
आजी कहती दुबले क्यों हो ,
दूध नही मिलता है ,पीलो!
गाँव के चारो ओर बगीचे लदे आम से ,
मेरे घर आम नहीं था
तब काका ने भिजवाया था .
कहा गए वे  लोग जो ऐसा करते थे,
वे सारे बाग़ कहा है ?
वे दोनों स्कूल पूरब में लडके,
पश्चिम में लड़की पड़ने जाती थी
दूर से आती थी आवाजे पढ़ने वाले बच्चो कि .
अब नहीं आ रही 
सबके घर एक चारपाई ,बिस्तर अलग रखा था ,
गाँव कि बारातो और मेहमानों को .
जिसके घर भी दूध दही या सब्जी होती ,
आ जाती थी सब मेहमान सभी के थे तब
+ + + + + + ++++++++++++++++. .
और अब खुली गई दूकाने सब चीजो की,
कोई किसी को कुछ ना देता ,
सब बाजार से आ जाता है .
वो अपनापन और वे रिश्ते,
मेहमानों के लिए रखे सामान
कहा गए वो ?
सबने रास्ता बंद कर दिया,
खोदे गड्ढे कि भाई को राह मिले ना  . .
सबकी  नाली  बंद कर दिया
या मुह उल्टा मोड़ दिया है
सबके दरवाजे पर कीचड़ ,
राह में कीचड़ ,मन में कीचड़
सबका घर जाना मुश्किल है .
पर संतोष सभी को ये है ,
अपना पडोसी परेशान है ,
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
वो था गाँव जहा बाराते
शादी वाले घर तक जाती थी ..
जिस गाँव में सबकी बिटिया सबकी थी ,
कहा गया वो ?
कल सुना की फला की बबुनी भाग गयी,
गाँव के लिए बात नयी थी   .
वो शहर में ,
पढ़ी थी कम और बढ़ी थी ज्यादा ,
खूब सिनेमा देख रही थी .
हिरोइन बनने चली गयी
या फिर रिश्तो में ही छली गई वो .
कुछ आदर्श गाँव के ,
बिना बड़ो के पांव नहीं बाहर जाते थे ,
कहा गए वो ?
पहले भी बजार लगता था
और लगती  थी कुछ दूकाने ,
बढ़ते बढ़ते गाँव मुहाने आ पहुची  है .
पूरा गाँव बाजार बन गया ,
कही खो गया,ढूढ़ रहा हूँ
कहा गया वो ?
सबकी शान इसी में
मुक़दमे किसके कितने  कैसे  जीते ,
सब कुछ हो बर्बाद हमारा पर
पडोसी कि बर्बादी मजा आ गया . .
पहले तों गाँव के बूढ़े ही सब कुछ थे,
उनका ही फरमान बड़ा था
पहले शाम बैठके पर बैठक होती थी.
कुछ बुजुर्ग मानस गाते थे .
बड़े चाव से रामचरित वे समझाते थे .
वे बैठके चाय कि दूकान खा गई .
अब गाँव मुहाने देशी की दुकान खुल गई
और पूरा गाँव तरन्नुम में है .
अब बहस है लाल पारी की,
किसमे मजा है ज्यादा देशी में या अंग्रेजी में .
वो किस्से ,वो मानस ,वो चौपाई
और बुजुर्गो कि वे बहसे
कहा गए वे ?
घर ,खेत और द्वार वही पर नहीं है
गाँव वाले वो चाचा ,वो प्यारे बाबा .
जब भी मै बीमार होता था ,
कोई सवारी नहीं गाँव में
और शहर भी दस कोस था .
बाबा कंधे पर बैठाते,शहर को जाते ,
इलाज कराते ,शाम ढले गाँव आ जाते थे
अब गाड़ी है ,सब कुछ है पर नहीं है तों
मेरे बाबा ,उनको तों भगवान ले गए .
उनका प्यार ,उनकी डांट,
उनका कन्धा याद आ रहा ढूढ़ रहा हूँ
कहा गए वो .
वही गाँव है पर भूतो का डेरा लगता  है ,
नहीं कही वो बाबा चाचा और वो आजी .
गाँव तों है पर इंसानों का नहीं बसेरा .
चौबे जी का घर कितनी रौनक रहती थी,
घास उग गई .दीवार गिर गई
छत पर है जाले ही जाले
और भी घर है ,मेरा भी है
जिनमे लटके है बस ताले.
शहर में दो कमरे सपना है
यहाँ बीस कमरों का घर अपना है
लेकिन कुछ है जो बिला गया है
ढूढ़ रहा हूँ जिसकी खतिर
बार बार हम गाँव आते थे,
कहा गया वो ?
+++++++++++++++++++++++
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ मेरे गाँव को ,
खलिहानों को ,मछली वाले तालाबो को .
बूढ़े बरगद और मौलश्री कि छाव को ,
बर्फ से ठंढे मीठे पानी वाले उस कुए को
भुट्टे तोड़ते थे खेतो में फूट ,ककड़ी खा जाते थे .
वो जामुन वाला पेड़ ,बगीचा आम कि डाली ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ '
जांघिया नाच दिखाने वाली उस टोली को ,
रामायण हो या शादी हो ,
गैस जलाते ,तम्बू लगाते ,
बाजा बजाते इस्माइल को ढूढ़ रहा हूँ .
लाज हया और हसी ठिठोली में मर्यादा ,
शादी में गाली भी तों गायी  जाती थी '
थोडा कहा समझाना ज्यादा वाली भाषा ,
पंचायत पर दंड बैठको वाला अखाडा ,
लाखी पाती वाले खेले ,
कभी कही ,कभी कही के मेले ,
सुथनी और जलेबी गुड की ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कोई मुझे मेरा गाँव बता दो ,
कहा रुक गए पाव बता दो .
बहुत दिनों पर गाँव गया था
ढूढ़ ना पाया मेरे गाँव को ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
कहा गया वो |




















                                                                                                       



































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