इंसान से अच्छा तो कांच है
जब टूटता है
तो आवाज तो आती है
और
उफ़ निकली है
किसी की
कोई दौड़ता है उधर
कि क्या टूट गया
आवाज तो थी
पर किसके टूटने की
और
इंसान टूट जाता है
बुरी तरह
चूँकि कोई आवाज
नहीं आती
तो कोई नहीं दौड़ता
उसकी तरफ
उसका टूटना
उसके चेहरे पर
उभर आता है
पर किसके पास है वक्त
की चेहरे देखता रहे
और
रख दे पीठ पर हाथ सहारे को
और
सहला दे इतनी गहरी
चोट को
हा इंसान से अच्छा
और
खुशकिस्मत तो कांच है ।
जब टूटता है
तो आवाज तो आती है
और
उफ़ निकली है
किसी की
कोई दौड़ता है उधर
कि क्या टूट गया
आवाज तो थी
पर किसके टूटने की
और
इंसान टूट जाता है
बुरी तरह
चूँकि कोई आवाज
नहीं आती
तो कोई नहीं दौड़ता
उसकी तरफ
उसका टूटना
उसके चेहरे पर
उभर आता है
पर किसके पास है वक्त
की चेहरे देखता रहे
और
रख दे पीठ पर हाथ सहारे को
और
सहला दे इतनी गहरी
चोट को
हा इंसान से अच्छा
और
खुशकिस्मत तो कांच है ।