पहचान उन सभी का मंच है जो जिंदगी को जीते नहीं जीने का निर्वाह करते है .वे उन लोगो में नहीं है जिन्हें जीवन मिला है या जीने का मकसद उनके साथ रहता है .बस जीने और घिसटने के बीच दिल वालो की कलम से और दिल से जो निकल जाता है वही कविता है .पहली कविता भी तों आंसू से निकली थी .आंसू अपने दर्द के हो या समाज के ,वे निकलेंगे तों कविता भी निकलेगी और वही दिलवालो की ;पहचान ;है
मंगलवार, 18 अगस्त 2020
ट्रंक काल
त्यौहार और व्यवहार
मंगलवार, 11 अगस्त 2020
हा जीवन इसको कहते है
बुधवार, 5 अगस्त 2020
जहा भी झुका सर
शुक्रवार, 31 जुलाई 2020
शनिवार, 25 जुलाई 2020
कुम्भकरण
शुक्रवार, 24 जुलाई 2020
बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग
बुधवार, 22 जुलाई 2020
बारिश
शनिवार, 18 जुलाई 2020
वो क्या कहलाता है ।
शुक्रवार, 10 जुलाई 2020
एकाकीपन की तरफ ।
रविवार, 5 जुलाई 2020
ऐसे चित्रो से डर लगता है
मंगलवार, 23 जून 2020
जो लिखा ही नही
सोमवार, 22 जून 2020
व्यव्स्था की तरह
गुरुवार, 18 जून 2020
बच्चा बनिये
व्यव्स्था की तरह
चारदीवारी
सोमवार, 15 जून 2020
बेटियाँ
आत्महत्या
सोमवार, 11 मई 2020
हालचाल ठीक ठाक है
बुधवार, 6 मई 2020
आस्तीन में सांप पालना
बुधवार, 29 अप्रैल 2020
ऊपर वाला
जो रोज लिखते है
जिंदगी का बोझ
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020
मंगलवार, 7 अप्रैल 2020
बादल छँट गए
रविवार, 5 अप्रैल 2020
डमरू मदारी और बन्दर
मंगलवार, 31 मार्च 2020
जब कोई मजदूर लिखता है
सोमवार, 23 मार्च 2020
जो तेरी छत पर बैठ गया वो मुझको मंजूर नहीं
गुरुवार, 19 मार्च 2020
टूटा पत्ता
इसीलिए आज बाजार मे हूँ
सड़ी लाश
शुक्रवार, 13 मार्च 2020
होली
रविवार, 8 मार्च 2020
होली है
शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020
झाँक मत लेना
गुरुवार, 30 जनवरी 2020
सोमवार, 27 जनवरी 2020
वो हमको मंजूर नही
मंगलवार, 21 जनवरी 2020
संघर्षो का अन्त ।
शनिवार, 18 जनवरी 2020
कुहरा
शनिवार, 11 जनवरी 2020
जिन्दगी क्या है
बुधवार, 18 दिसंबर 2019
मुनादी हो गयी है
मंगलवार, 10 दिसंबर 2019
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
रविवार, 8 दिसंबर 2019
आग
बुधवार, 4 दिसंबर 2019
रिमझिम फुहारों के साथ
शनिवार, 30 नवंबर 2019
घर के बीच की दीवारों के दिल होता तो कैसा होता
सोमवार, 11 नवंबर 2019
दीवाली
बुधवार, 30 अक्टूबर 2019
जिन्दगी फुटबाल है
मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019
एक ही देश मे दो है
बुधवार, 16 अक्टूबर 2019
कुछ सवाल है जो अनुत्तरित है
कुछ सवाल है
जो अनुत्तरित है
कुछ जवाब है
जो खुद
सवाल बन गए है
सिलसिला टूटता ही नही
न सवालो का न जवाबो का
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है
पर कही तो कोई दीवार होगी
या
होगा इस सफर का डेड एंड
जो रोक देगा क्रिया को
और प्रतिक्रिया को भी
और
फिर सब होगा शांत शांत ।
गुरुवार, 26 सितंबर 2019
क्या सचमुच वो बादलो पर रहता है ?
क्या सचमुच वो
बादलो पर रहता है ?
क्या सचमुच वो हमे
देखता रहता है ?
क्या
ये उसके ही आँसू है
जो
बारिश की शक्ल मे जमीन पर आते है ?
और
हमे भिगोकर
छू लेना चाहते है ?
क्या सचमुच ?
तो छू क्यो नही लेते आकर
हमारे पास सचमुच ?
जब तुम थे
जब तुम थे
जब तुम थे न
सब सुबह उठ जाते थे
और
मैं भी अलसाया सा
पर
अब तो
दोपहर हो जाती है
कइ बार
जब तुम थे ना
घर
कितना साफ रहता था
रहता तो
अब भी साफ ही है
पर
जब तुम थे न
तो
डायनिंग टेबल
खाली रह्ती थी
जब तक खाना न लगे
पर
अब वो भरी है
हर उस चीज से
जिसकी
मुझे जरूरत होती है
और
तुम्हारे बिना
भूलने का डर रहता है
जब तुम थे न
किचेन
कितना भरा होता था
तमाम सामान से
पर
अब बस चाय की पत्ती
और
चीनी
या
कुछ
बहुत दिनो के रखी चीजे
जब तुम थे न
सुबह के नाश्ते से
रात तक
रोज
कुछ नया मिलता था
भूखा
अब भी नही रहता हूँ मैं
बस अक्सर
खाना भूल जाता हूँ
दोपहर को
और
कभी रात मे भी
जब तुम थे न
बिस्तर की चादर
बदल जाती थी
कितना एस यू एस टी हूँ ना
कि
नही बदल पाता हूँ
काफी दिन तक
बाकी सब कुछ वही है
जहा तुम छोडकर गये थे
मैं भी और मेरी आदते भी
और सब यादे भी
तुम्हारा तकिया भी
बिस्तर पर वही रखा है
बस सुबह उठना
और
अपना ध्यान रखना ही
भूल गया हूँ मैं ।
जब तुम थे न
अच्छे भले ठहाके गूजते थे
पता नही क्यो
सन्नाटा ही सन्नाटा है
जब तुम थे न
कितने सक्रिय और
जीवन्त थे तुम
पर
ईश्वर ने दीवार पर
टांग दिया
और
तस्वीर को आधा फ़ाड़ कर ।