मंगलवार, 18 अगस्त 2020

ट्रंक काल

ट्रंक काल 
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पहले भी होता था फोन 

पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी

सुनते सब थे पास बैठे हुए

बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे

और कार्डलेस भी

पर उससे पहले

लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे

लोगो के यहाँ क्याशहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां होते थे फोन

और

वो बहुत रईस होने की निशानी था

गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी

नहीं था कोई फोन

और बुक करनी होती थी ट्रंककाल

बहुत से लोग बुक करते

और बुक करने को लाइन में लगे होते

पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात

नहीं मिलता था फोन तब

जिसका मिल जाता था

वो विजयी भाव ओढ़ लेता था

और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे

ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का

और दूसरा खाने या सोने चला जाता था

जी हां ट्रंककाल लगना भी तब

इश्वर की कृपा और किस्मत की बात थी

जब मिल जाता था फ़ोन

तो चीखना पड़ता था

की आवाज वहा तक पंहुच जाये

कई बार तो हेलो हेलो आप सुन रहे है न

कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी

कई कई बार में बात हो जाती थी

और नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल

तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल

जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन

और ४ जी तथा ३ जी

उस थ्रिल को बस महसूस कर सकते हो

अतीत में जाकर जरा महसूसो और सोचो 

की अपनो की जिंदगी कितनी मुश्किल थी

ट्रिन ट्रिन

मिल गया मेरा ट्रंक काल

तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

त्यौहार और व्यवहार

त्यौहार और व्यवहार 
————————

जी हां 

त्यौहार अब भी होते है पहले भी होते थे 
अब गरीब है तो 
बस लोगो को को मनाते देख लेता है 
या थोडा बहुत मना भी लेता है 
मध्यम वर्ग है तो दिखावे के लिए 
बजट बिगाड कर भी मनाता है 
उच्च वर्ग है तो कहने ही क्या 
किसी पद पर है तो वो नही मनाता 
लोग मनाते है उसका त्यौहार 
और लोगो के दिए सामानो  से 
भर जाता है घर का कमरा
जिनसे काम है उनके अलावा 
कोई किसी से नहीं मिलता 
अब किसी भी त्यौहार में 
मेसेज है न मन गया त्यौहार 
और 
मान लिया गया उसे ही मिलना 
लोगो का और शुभकामनाओ का 
त्यौहार पहले भी होते थे जो पैसे से नहीं 
भावनाओ से मनाये जाते थे 
गरीब अमीर सब खुद इन्तजाम करते थे 
त्यौहार मनाने का 
इतना फर्क था कि
अमीर के काम नौकर कर देते थे 
पर बाकी सब एक समान थे 
होली हो तो रंग सबके पास था 
और पिचकारी भी चाहे पीतल की ,लोहे की 
नहीं तो बांस को काट कर बनायीं 
गरीब की खुद की 
फूहड़ता नहीं 
बल्कि सबको सबसे मिलने वाले 
आनंद का त्यौहार था होली 
गाँव में तो झुण्ड बना कर निकलते थे सब 
उम्र के हिसाब से 
अपनी अपनी भाभियों से होली खेलने 
गुझिया बनाने में पूरा परिवार जुटता था 
बच्चे भरते और मोड़ते या काटते थे 
माँ बेलती थी तो पिता सेंकते थे गुझिया 
बेईमानी की भी गुंजाइश थी 
किसी किसी गुझिया में 
ज्यादा मावा भर कर खुद खा लेने की 
और सेव झाड़ना सेंकना 
कई दिनों तक चलता था त्यौहार 
दीपावली में पतली डंडियो 
जो आम तौर  पर नरगट 
या अरहर की होती थी 
तीन तीन को इस तरह बांधना 
की उस पर दिया रख सके 
और दरवाजे के सामने उन्हें सजाना 
शहर में पहले तो छोटे छोटे दिए 
और बाद में मोम्बत्तिया आया गयी 
तब भी कई दिन पहले से 
मिठाई जैसी चीजे बनती 
अपने ज्ञान और हैसियत के हिसाब से 
कई दिनों तक तैयारी होती थी 
पर जो तब था और आज नहीं है 
वो था समूह में मनाना या समाज में 
तब फोन और मोबाइल नहीं थे 
तो लोग मोबाइल रहते थे 
खूब मिलते थे एक दूसरे से 
त्यौहार में एक परिवार आकर मिला गया 
तो इसका मतलब ये नहीं की मिलन पूरा हो गया 
अगले दिन ये पूरा परिवार उनके घर जाता था 
और चलता था कई दिनों तक ये क्रम 
और फिर पूरा होता था त्यौहार 
जी हां त्यौहार एक परिवार नहीं 
पूरा समाज मनाता था एक दूसरे के साथ  
जो कही खो गया लील लिया नये ज़माने ने 
औरआर्थिक दिखावा 
हीन भावना पैदा कर देता है आज बहुतो में 
देखा होगा आपने भी 
जब आप बहां रहे होते है सफ़ेद या काला धन 
तो बहुत सी उदास आँखे 
उसे बस टुकुर टुकुर देख रही होती है 
जो पहले के सादे त्योहारों में नहीं होता था 
और तब केवल त्यौहार नहीं 
सच्चा व्यवहार भी होता था

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

हा जीवन इसको कहते है

चाहे तो मेरी ये कविता पढिए -

जिंदगी 

कब होगी पहचान हमारी 

इतने सालो से है दूरी 

क्या मजबूरी 

जिन्दा तो है 

पर क्या सचमुच 

क्या जीवन इसको कहते है 

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू  

नीद नहीं और पेट में हलचल 

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ 

बस अन्धकार है 

क्या जीवन इसको कहते है 

जीवन कब हमको मिलना है 

या फिर ऐसे ही विदा करोगे 

कुछ तो सोचो 

हम दोनों क्या जुदा जुदा है 

कुछ तो बोलो 

और भविष्य के ही पट खोलो 

या फिर कह दो 

हां जीवन इसको ही कहते है | 

जींना है तो हंस कर जी लो 

या फिर दर्द गरल को पी लो 

तेरे हिस्से में बस ये है 

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ 

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ 

चल अब सो जा 

अच्छे सपनो में आज तो खो जा 

कल फिर मुझसे ही लड़ना है 

हां जीवन इसको कहते है |

बुधवार, 5 अगस्त 2020

जहा भी झुका सर

जिसके भी सामने 
झुका ये सर 
वो बस वो ही 
जानता है 
अपना घाव और पीड़ा 
संसद की सीढियो के सामने 
लेटा था कोई 
तब से 
संसद और उसकी परम्पराएं 
सिसक रही है
सुना है कि 
टूटने वाली है 
वह भव्य संसद 
जिसने देखा है 
भारत की आज़ादी का उगता सूरज 
और सारा इतिहास 
अब 
फिर लेट गया कोई 
भारत की आस्था 
और 
विश्वास के सामने ?

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

शनिवार, 25 जुलाई 2020

कुम्भकरण

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकरण है ।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग

चलो अब मैं चुप हो जाता हूँ 
और
भींच लेता हूँ ओठो को 
चाहे खून क्यो न निकल पडे 
कुछ भी हो जाये मेरे सामने 
आंख मूद लूँगा मैं कस कर 
चाहे फिर दुखती रहे देर तक 
या दिखना कम क्यो न हो जाये 
कुछ भी हो हत्या अपहरण 
बलत्कार भ्रष्टचार 
हो जाये चीर हरण व्यव्स्था का 
या आ जाये तानाशाही 
मिटा दिया जाये संविधान 
पर 
मैं कुछ नही लिखूंगा 
कुछ नही बोलूंगा 
बन जाऊंगा मैं शुतुरमुर्ग 
और 
शामिल हो जाऊंगा उन्ही मे 
निकाल कर फेंक दूंगा अपनी रीढ 
दफना दूंगा दिल दिमाग 
और चिंतन ।

बुधवार, 22 जुलाई 2020

बारिश

मेरी कविता  ——

बारिश

बारिश  नहीं आयी
उफ़्फ़ कितनी गरमी है 
सूरज जला देगा क्या 
ये बारिश क्या करेगी 
आफ़त बन कर आयी है 
सब कुछ बहा देगी क्या 
देखो गिर गए 
कितनो के कच्चे घर 
और 
झोपड़ियाँ भी जवाब दे गयी 
अबकी बारिश समय पर आयी 
और उतनी ही आयी 
की अबकी खेत सोना उगलेंगे 
अभी बारिश तो आफ़त है 
भीग गया खेत और खलिहानों में सब 
अब साल कैसे बीतेगा 
कैसे होगी उसकी पढ़ाई और दवाई 
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
बारिश आयी स्कूल की छुट्टी 
छप्प छप्प करते वो पानी में 
वो काग़ज़ की नाव बहाते 
वो बचपन कितना प्यारा लगता है 
उससे पूछो जो अभी है ब्याही 
और पति सीमा पर बैठा 
उन दोनो के मन की सोचो 
और 
वो दोनो भीग रहे है छत पर 
दोनो देख रहे दोनो को 
भीगा आँचल भीगा यौवन 
दोनो को है कितना जलाए 
वो मछरदानी पर प्लास्टिक बिछा रही है 
बालटी भगौने सब बिस्तर पर सज़ा रही है 
ख़ुद बैठी है पर बच्चों को 
इस कोने और उस कोने कर 
वो बारिश से बचा रही है 
पूरी रात नहीं वो सोयी 
सब झेला 
पर कभी नहीं क़िस्मत पर रोयी 
बारिश का मतलब उससे पूछो 
जो पूरा घर अब सुखा रही है 
बारिश तो अब ख़त्म हो गयी 
चरो तरफ हरियाली छायी

फूलों से अब लदी डालियाँ 
सबको ही अच्छी लगती है 
भूल गए सब क्या झेला था 
वो अच्छा या बहुत बुरा था 
फिर जीवन पटरी पर आया  
उफ़्फ़ 
ये बारिश कैसी बारिश ।

शनिवार, 18 जुलाई 2020

वो क्या कहलाता है ।

जो दिन भर हंसी 
चेहरे पर चिपकाता है 
अकेले मे रात को रोता 
फिर 
सुबह से मुस्कराता है 
वो भी एक इन्सा है 
जो खुद को 
और 
अपनो को बहलाता है ।
क्या कोई जानता है 
कि 
वो क्या कहलाता है ।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

एकाकीपन की तरफ ।

मैं भीड़ में गुम हो जाना चाहता हूँ 
पर 
भीड़ और मेरे बीच इतनी दूरी है 
कि 
न मेरी आवाज उसे सुनाई पड़ती है 
और न मैं उसे दिखाई पड़ता हूँ 
मुझे भी नही दीखती है वो भीड़ 
बस सुनाई पड़ती है कानो में आवाज़ 
कही दूर से अपुष्ट ,अस्पष्ट 
और 
में ढूढने लगता हूँ उसे पागल जैसे 
पर 
भीड़ ने लगातार दूरी को कायम रखा है 
और मुझे धलेक रही है लगातार 
एकाकीपन की तरफ ।

रविवार, 5 जुलाई 2020

ऐसे चित्रो से डर लगता है

ऐसे चित्रो से डर लगता है
  
ऐसे ही बहुत से चित्र 
तो देखे थे हमने 
तालिबान के यहाँ के 
इसी रंग के कपड़ो मे 
जिनकी गर्दने रेत रहे थे 
ऐसे ही मासूम बच्चे 
और 
वो सब मुल्क 
जहा ऐसे चित्र दिखे
चीथड़ों से दिख रहे है 
वीरान खंडहर वाले भुतहा 
भागते हुये लोग
चीखते हुये लोग 
कटते और धमाको मे
उडते हुये लोग 
चारो तरफ 
शोर ही शोर 
धुवा ही धुवा 
लाशे ही लाशे 
और खंडहर मे 
तब्दील हो गए 
वो खूबसूरत शहर 
लाशो मे तब्दील वो
खूबसूरत शक्ले 
चीखो और धमाको मे तब्दील 
वो अच्छी आवाजे 
सचमुच 
बहुत डर लगता है 
ऐसे चित्रो से 
वो चाहे जिसके हो 
और चाहे जहा
चाहे जिसने खीचे हो
मत बनाओ ऐसे चित्र 
इन बच्चो के हाथो मे
थमाओ किताबे 
खेलने की चीजे 
और 
बजाने को वाद्ययंत्र 
लोहे से बनी ये किताबे 
इन्हे मत पढावो
लोहे के ये वाद्ययंत्र 
इनसे मत बजवावो
इन्हे इन्सांन ही रहने दो 
इन्हे मौत बेचने वाला 
शैतान मत बनाओ 
बहुत डर लगाता है 
इन चित्रो से अब ।
नोट -( यह तस्वीर कही की हो और किसी की हो बस उसका उपयोग अपनी बात समझाने के लिए किया गया है )

मंगलवार, 23 जून 2020

जो लिखा ही नही

तुम पढ़ लो  
वो कविता 
जो 
मैंने लिखा ही नही 
तुम देख लो 
वो चित्र 
जो 
मैंने बनाया ही नही 
तुम बस जाओ 
उन साँसों में 
जो 
मैंने ली ही नही 
तुम आ जाओ 
मेरे घर में 
जो 
कही है ही नही 
पर 
तुम आ सकते हो 
सपने में मेरे 
जिसकी 
सुबह याद नही रहती 
छोटी सब 
आ जाओ 
और बैठ जाओ 
मेरे सामने ताकि 
निहार सकूँ मैं तुम्हें 
जब तक 
मैं मैं हुँ और तुम तुम हो । 

सोमवार, 22 जून 2020

व्यव्स्था की तरह

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ 
कमरे की 
और 
मन की भी 
चिंतन की 
और 
आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि 
छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और 
हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और 
बारिश में 
लगने दो आग 
किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत 
या असबाब 
मुझे क्या 
मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और 
बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि 
कोई चीख सुनाई न पड़े 
और 
न दिखाई दे 
बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब 
मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद 
सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

गुरुवार, 18 जून 2020

बच्चा बनिये

घर मे परिवार होता है 
तभी वो घर होता है 
वर्ना तो बेजान दीवारे है
जिनमे आप कैदी है 
पर 
घर मे कोई छोटा सा बच्चा हो 
और 
बन जाइये बच्चा उसके साथ 
वाह 
क्या जिंदगी हो जाती है 
फिर मिल जाती जिंदगी 
और 
बचपन पोंछ देता है सारे गम 
सारी तकलीफे , बीमारी और वेचारगी 
बन गया हूँ मैं बच्चा आजकल 
सचमुच खूब जी रहा हूँ मैं 
भरपूर जी रहा हूँ मैं 
चुरा लेना चाहता हूँ खुशिया 
और इसकी यादे 
अगली बार फिर मिलने तक के लिए ।
आह जिंदगी वाह जिंदगी ।
बच्चा बन कर देखिये 
बच्चो से प्यार करिये 
खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

व्यव्स्था की तरह

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ 
कमरे की 
और 
मन की भी 
चिंतन की 
और 
आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि 
छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और 
हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और 
बारिश में 
लगने दो आग 
किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत 
या असबाब 
मुझे क्या 
मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और 
बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि 
कोई चीख सुनाई न पड़े 
और 
न दिखाई दे 
बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब 
मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद 
सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

चारदीवारी

घर की चारदीवारी मे 
कैद रहने पर 
लगता है कितना अकेलापन 
सडक पर निकल पडे  
तो  
दीखने और मिलने लगे 
हजारो लोग अपने ही ।
इसलिये तोड दी दीवार की सीमाये 
निकल पडे  
फिर 
सब जग अपना लगा
शामिल हो गये 
लोगो के दुख मे 
और सुख मे भी 
और 
भूल गये 
की 
दुख भी कुछ होता है

सोमवार, 15 जून 2020

बेटियाँ

घर से जाते जाते भी 
पापा की           
कितनी चिंता करती है
बेटियाँ 
की 
क्या कहा रखा है ,
क्या क्या 
कैसे कैसे 
कर लीजियेगा ,
क्या खा लीजियेगा                
इत्यादि इत्यादि ।
मन और आंखे 
भिगो देती है बेटियाँ 
और 
खुद पर 
पता नही कैसे 
काबू रख पाती है 
बेटियाँ 
या फिर 
आंखे छुपा लेती है 
बेटियाँ ।

आत्महत्या

आत्महत्या 

अच्छा चढ़ गए 
कुर्सी या स्टूल पर 
बाँध लिया 
पंखे मे रस्सी 
फिर 
थोडी दे रुके थे क्या 
पंखे मे 
रस्सी बाँधने से पहले ?
कुछ रुक कर सोचा क्या 
और 
जब बांधा था 
या 
गले मे डाली थी रस्सी 
तो 
आंखे नम थी क्या 
या 
बह रहा था पनाला 
आंखो से या खून 
फिर 
कैसे कसा होगा गले मे 
उस वक्त क्या था मन मे 
मां पिता भाई बहन 
कोई दोस्त या प्रेमिका 
या सर्फ गुस्सा 
पर किससे ? 
खुद से या ?
पर एक पल भी 
नही आया ख्याल 
बहुत अपनो का
या फिर अपना ?
बहुत नशे मे थे क्या 
की 
कुछ होश ही नही था 
या फिर 
मौत 
खुद नशा बन गई थी
उस पलायन के वक्त  
कसा था फंदा 
तो विचलित हुये क्या 
अच्छा 
सच सच बताओ 
अन्तिम विचार क्या
आया था मन मे 
माँ की चीखे 
सुनाई पडी क्या 
और 
टूटा हुआ पिता 
और भी सब 
सचमुच वाले अपने 
अच्छा 
जब सरका दिया स्टूल 
और झूल गये 
पर मरे नही थे 
क्या 
तब मन मे आया 
काश अब बच जाते 
वो 
अन्तिम इच्छा क्या थी 
कायर कही के 
तुम पैदा ही क्यो हुये 
जब लड़ नही सकते थे 
जीवन के लिए 
जीवन से 
अपने पिता अपनी माँ 
और 
अपनो के लिए खुद से ।

सोमवार, 11 मई 2020

हालचाल ठीक ठाक है

सब कुछ ठीक ठाक है 
हालचाल ठीक ठाक है 
थोड़े बलात्कार है 
थोड़ी सी लूट है 
कुछ भी जला दो 
सबको ही छूट है 
थोड़ा सा दंगा  है 
कानून नंगा है 
बाकी सब ठीक ठाक है 
हाल चाल ठीक ठाक है 
( बाकी कल )

बुधवार, 6 मई 2020

आस्तीन में सांप पालना

हा 
आस्तीन में सांप पालना 
हमारी आदत है 
और 
उनसे कटवाना भी
तुम भी फुफकार लो 
और 
काट लिया पहले भी 
फिर भी बार बार काट लो ।

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

ऊपर वाला

ये #ऊपर_वाला 
हमेशा से मुसीबतरहाहै
इन्सानो के लिए 
खासकर आम इन्सानो के लिए 
इतिहास उठा कर दे लो 
ये आम इन्सानो को 
सिर्फ कष्ट देता है 
और
खुद के लिए लेताहै
अच्छी अच्छी चीजे 
अभी भी जो आज है 
ये भी तो 
ऊपर वालो की देन है 
और 
नीचे वाले बदहाल है ।

जो रोज लिखते है

ये जो लोग 
रोज पढते है 
नई किताबे 
रोज लिखते है 
कोई कविता 
गजल या कहानी 
और 
नये नये किस्से भी 
कितने 
सुखी लोग है वो
कितने निश्चिंत 
कितने बेपरवाह 
और 
रच देते है 
रोज कुछ नया
पर 
जो खुद को ही 
जिन्दा रखने 
के जतन मे 
बिता देते है दिन 
वो जिन्दा है 
ये भी तो रचना है । 

जिंदगी का बोझ

बंद दरवाजो के पीछे 
छिपे होते है कितने राज 
कितनी सिसकिया 
और 
कितनी चीखे 
कुछ तो 
निकल ही नही पाती है 
बस घुट कर रह जाती है 
कहने को तो 
सब अपने ही होते है 
पर 
कुछ ऊर्जा देते है 
और 
देते है जीने की तमन्ना 
और 
कुछ गला घोट कर 
मार देते है 
या 
बना देते है मरने जैसा 
बाहर निकल कर 
कितना नकली हंसी                           हँसते है लोग 
और 
कितनी खोखली होती है                  उनकी मुस्कराहट 
दर असल इस हंसी मे
एक चीख होती है 
बहुत डरावनी सी             
और 
मुस्कराहट बिल्कुल वही              
जो 
फाँसी पर चढ़ने वाले के
चेहरे पर होती है 
रिश्ते भी कितने 
बोझिल हो जाते है 
जब कोई खुद को
बोझ बना लेता है 
अपने ही ऐतिहासिक
कामो से 
और 
फिर अपने ही वर्तमान से      
क्यो नही जीवन उतना ही हो 
की 
आप ऐश करे अपनी मर्जी का 
और 
फिर छोड दे शरीर 
उसके बाद जीवन का
मतलब भी क्या है 
जब तक आप जरूरी हो
दूनिया और समाज के लिए जिए 
या अपने लिए 
वर्ना क्यो शर्मिंदा हो रोज 
बेहतर है कि आप फिर चले ।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

बादल छँट गए

सब बादल छँट गये 
सूरज निकल आया 
उनकी कैद से 
अब सब कुछ 
साफ साफ दिख रहा है 
गद्ढे भी ,पत्थर भी 
रस्ते भी और मंजिल भी ।

रविवार, 5 अप्रैल 2020

डमरू मदारी और बन्दर

डमरु मदारी और बंदर 
—————————
इधर कुछ साल पहले तक
पता नहीं क्या हो गया 
कि
मदारी दिखने बंद हो गए थे 
क्या उनको नचाने को 
बंदर नहीं मिल रहे थे ?
या दर्शकों ने 
देखना बंद कर दिया था ?
अब समस्या दूर हो गयी है 
बंदर काफ़ी मिल गये है 
और 
दर्शक तो हमेशा से है ही 
जो तटस्थ है । 
बजा डमरु बजाओ ताली 
बंदरिया 
जी मालिक 
नाच दिखाएगी 
हा दिखाऊँगी 
क्या कह रही है 
पहले पैसे फेंको
अरे अब क्यों रुठी है 
पैसे कम आए 
मेहरबान और फेंको 
फिर तमाशा देखो 
डमरु बजने लगता है 
और 
अभ्यस्त बंदर बंदरिया 
खेला दोहराने लगते है 
वही पुराना वही बासी सा 
फिर भी 
डमरु की आवाज पर 
नाचना ही नियति है 
बंदरो  की आज तक ।

मंगलवार, 31 मार्च 2020

जब कोई मजदूर लिखता है

जब कोई मजदूर लिखता है 
तो मुझको मजबूर दिखता है 
गठरी या बच्चा है नहीं मालूम 
सत्ता से तो बहुत दूर दीखता है 
फोटो में जो केला लेके खड़ा है  
वो तो बहुत मशहूर दिखता है 
वो बच्चा रो रहा है भूख से देखो 
उसका बाप भी मजबूर दीखता है 

सोमवार, 23 मार्च 2020

जो तेरी छत पर बैठ गया वो मुझको मंजूर नहीं

जो तेरी छत पर बैठ गया वो मुझको मंजूर नहीं 
चाहे वो एक परिंदा है 
पर मेरी छत से दूर रहे 
तू मुसलमान मैं हिन्दू हूँ मेरा धर्म भ्रष्ट हो जायेगा 
वो तेरी छत पर बैठा है तो तेरे धर्म को लायेगा 
रे खबरदार तू रोक उसे उड़ने से पहले टोक उसे 
या गंगाजल मुझे लाने दे पहले उसको नहलाने दे 
बोला पक्षी कातर होकर तू किस किस को नहलाएगा 
गंगा में वजू किया उसने और मैंने भी डुबकी मारी है 
क्या गंगा को नहलाएगा या दूजी गंगा लायेगा 
पानी ,धूप ,हवा और फसले,
पक्षी ,चौपायो  की नस्ले 
इनमे हिन्दू पहचान जरा तय कर दे मुसलमान जरा 
तू लहू का मजहब तय कर दे 
किरणों में अपने रंग भर दे 
सारे ग्रंथो को पढ़ के बता तेरे इश्वर की जाति है क्या 
तू अज्ञानी टोकेगा क्या उड़ने से तू रोकेगा क्या 
प्रकृति जब खेल दिखाएगी 
तू खुद कही उड़ जायेगा 
किस जगह गिरेगा तू जाकर 
क्या तू बतला ये पायेगा 
खुद का तुझको कुछ पता नहीं 
तू दुनिया को क्या साधेगा 
अपनी सांसो का पता नहीं 
तू प्रकृति को क्या बांधेगा 
सबको स्वतंत्र ही जीने दे ये नदिया सूरज सब सबके है 
ये पृथ्वी जंगल और पहाड़ 
सब तूने नहीं बनाये है 
ये इतने थलचर और जलचर 
सब तूने नहीं बसाये है 
इनमे से तू भी एक अदद ये सब है तब ही तू भी है 
ये आसमान भी सबका है ये विधि विधान भी सबका है 
सब तेरे है तू सबका है गर इतना तू पहचान  गया 
तू भी कुछ पल का किस्सा है 
बस इतना ही तू जान गया 
तो अमन चैन छा जायेगा दुनिया खुशहाल बनाएगा 
तो अब बस तू इंसा बन जा नफरत की मत बीन बजा 
आ दुनिया को खुशहाल करे 
बस प्रेम से मालामाल करे ।
तेरी छत या उसकी छत सब झटके में गिर जाती है 
जब पृथ्वी करवट लेती है उसकी छाती फट जाती है 
तू देख चूका तब क्या होता 
सब वही दफ़न हो जाते है 
सब जाति धर्म या धन दौलत 
सब के सब मिट जाते है ।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

टूटा पत्ता

पेड़ से टूटता है पत्ता 
उड़ता है इधर से उधर 
गिरता है जमीन पर 
हरा होता है 
तो 
कोई जानवर खा जाता है 
सूख जाता है 
तो 
रौद दिया जाता है पैरो से 
और 
मिट्टी मे मिल जाता है 
पेड़ से टूटती है डाल 
सूख जाती है कुछ दिन मे 
पतली होती है 
या कमजोर होती है 
तो जला दी जाती है 
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है 
बना दी जाती है 
कुछ न कुछ 
किसी के बैठने को 
या 
सजावट की चीज बन जाती है 
घर से भागने वालो 
और 
इस पत्ते या डाल मे 
क्या फर्क होता है ?
कुछ भी नही न ।

इसीलिए आज बाजार मे हूँ

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।

सुनो सुनो सुनो ,
कोई मुझे भी खरीद लो 
जी बिकाऊ हूँ मैं 
जैसा भी हूँ
पर आज बाजार में हूँ 
बाजार का युग है 
इतना खोटा भी नहीं कि 
मेरी कुछ भी कीमत न ही 
बोली तो लगाओ 
कही से तो शुरू करो 
चलो तुम रोटी से शुरू करो 
चुपड़ी नहीं रूखी ही सही 
और तुम कपडे से 
उतरन भी चलेगी 
तुम नीद की जगह दोगे 
पर नीद कौन देगा 
पर बोलो ,जो चाहो बोलो 
इतना सस्ता इमांन कहा मिलेगा 
इतना सस्ता ज्ञान कहा मिलेगा 
और 
आज इंसान कहा मिलेगा 
तो बताओ कौन खरीदेगा मुझे 
जी हा
कसम खुदा की मैं बाजार में हूँ 
खरीद रहे हो बेपनाह हुस्न 
लोगो के इमांन 
लोगो के रहनुमा 
तो मुझमे क्या बुराई है 
इस ईमान से डर लगता है 
या फिर इंसान से डर लगता है 
अरे नहीं 
बिकाऊ है आज ये भी 
कोई तो बोलो 
मेरे इंसान और ईमान को 
कोई तो सिक्को में तोलो 
कोई नहीं बोलोगे 
तो रो पडूंगा मैं बेबसी पर 
फिर 
आंसू तो बिलकूल नहीं खरीदोगे 
अब हुस्न कहा से लाऊँ 
मैं भी दल्ला हो सकता हूँ 
ये कैसे समझाऊँ 
या फिर ये बनी हुयी इमेज 
मिटा के कैसे आऊँ 
तो उसके लिए 
किस लॉन्ड्री में जाऊं ।
कोई तो खरीद लो न मुझे ।
जी हां मैं आज बिकाऊ हूँ 
और 
इसीलिए आज बाजार में हूँ ।
और 
बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

सड़ी लाश

वो जब वो नही रहे-                                                     

उन्होने पढाया था 
हज़ारो को 
इसलिये बस गये थे 
उसी शहर मे 
और
उनकी कविताओ पर 
कितनी तालिया बजती थी 
और
उनके भाषण 
लगता था क्रांती कर देंगे 
और
वो कितना अच्छा अभिनय 
करता था / करती थी 
फिर ये सब गुम हो गये 
किसी ने नही देखा 
उसके दरवाजे की तरफ कभी 
जब वो नही रहे ओह्दो पर 
एक दिन 
जब बदबू परेशान करने लगी 
तब पडोसी परेशान हुये 
और 
शिकायत किया पुलिस को 
तब दरवाजा तोड 
निकाला गया कई दिन की 
सडी लाश को 
उस दिन लोगो ने भी कहा 
और अखबार ने भी लिखा 
कि 
ये वो थे / थी 
ऐसे थे और वैसे थे 
और 
लग गयी गिद्ध निगाहे 
उनके घर पर ।
कितनी कहानियां 
पसरी पडी है चारो ओर 
अपने अपने एवरेस्ट पर होने की 
और 
अज्ञातवास मे मिटने की ।

शुक्रवार, 13 मार्च 2020

होली

मेरी एक पुरानी कविता -

होली नहीं खेलता मै

होली नहीं खेलता मै
बचपन बीतने के बाद से
बचपन कब बीता और मै बड़ा हो गया
पता ही नहीं चला
क्योकि अपने जिनके कारण
हम बचपन पकडे रखना चाहते है
वे हाथ छोड़ झटक देते है बचपन को
साया देने वाले अधिकार को
खैर होली नहीं खेली बहुत साल से
तभी कोई आया हवा का झोंका बनकर
खाली जीवन में और अपने साथ लायी
एक मुट्ठी बदली और
बंजर जमीन पर नम हवा तथा
मुट्ठी भर बदली से निकली फुहार ने
उगा दिए कुछ पौधे
होली मै तब भी नहीं खेलता था
परन्तु रंगों से सराबोर हो जाता था
अच्छा लगता था
किसी का ठठा कर हँसना
खुद रंगा होकर सबको रंग देना
ठहाकों से तथा अपने रंगों से
मेरी बंजर जमीन पर उगे पौधे
जब एक दिन पहले तैयारी करते थे
कपड़ों की रंगों की तथा पिचकारी की
अगले सुबह ही उठकर शरीर पर मलते थे
तेल या क्रीम ,रंगों से बचने को
फिर रंग फेंकते थे ,बचते थे और
खुद रंग भी जाते थे सराबोर
फिर शीशे में खुद को पहचानना और
दूसरों को देख कर ठठा कर हँसना
फिर प्यार से गोद में बैठ कर अपने रंगों
से सराबोर कर  देना मुझे भी
कितना सुखद था ,कितनी ऊर्जा थी
कितना जीवन था ,जीवन का अर्थ था
फिर अचानक बुलावा आ गया किसी का
जहा से आई थी बदली
मै ही भूल गया था बादल आते है
बरसते है ,धरती को नमी देते है
कुछ बारिश रुक जाती है
जीवन बन कर जीवन के कुए में ,
तालाब में या  झील में
और कुछ को सूरज सोख लेता है वापस
और पहुंचा देता है वही हर बूँद को
जहा से उसे दुबारा तय करना होता है सफ़र
इस क्रिया को भूल जाना और
न पकडे जाने वाली चीज को
पकड़ कर रखने की कोशिश ही शायद
संबंध है ,संवेग है और अनबूझ पहेली भी
मै फिर अकेला निहार रहा हूँ
लोगो को होली खेलता होली की बात करता
मैंने भी सन्देश भेज दिया और हो गयी होली
धीरे धीरे मेरे पौधे भी अपनी नयी जमीन
तलाश लेंगे जहा वे विस्तार पा सके
और फिर मेरा भी सफ़र शुरू हो जायेगा
अपनी बदली को ढूढने और
उसमे समाहित हो जाने का  ।

रविवार, 8 मार्च 2020

होली है

आज होली है ,रंग लगाना है, लगालो, अच्छे अच्छे रंग डालो,

ये लाल रंग है ,लहू का भी लाल होता है, फैसला तुम्हारा,

किसी को बचाने के लिए रक्तदान करो या बेगुनाहों का रक्त बहालो,

या रुक जाये हर तरह का रक्तपात ऐसी कोई  व्यवस्था बनालो|

और  आप हरा रंग लाये हो ,लगता है कीचड में नहाये हो,

आओ पूरी धरती को फिर हरा भरा बनाये,हों भरपूर फसलें,

फलों के बगीचे ,फूलो की क्यारी नहीं तों गमले ही लगाये,

और नीला , नीला आसमान नीला समुद्र साफ हो नदियाँ,

साँस लेने लायक हवा ,पीने लायक हो पानी नहीं तों ,

खुद ही मिट जाओगे  तों होली कैसे मानोगे |

पीला है तुम्हारा रंग होली का अपनाओ नया ढंग,

गरीबी और बेबसी के कारण जो बेटी आत्महत्या करने या,

बिकने को तत्पर है ,उसे बचाने का तुम्हे  एक अवसर है,

उसके हाथ पीले कर,कफ़न से बचा लो पीली चुनरी ओढा दो ,                                                                 

जीवन में खुशहाली  और उसके घर में पीली होली सजादो |

तुम काला रंग ही लाये हो या तुम्हारा मन भी है काला ,

अपना  इरादा बतादो ,अपना असली चेहरा तो दिखादो ,

हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं समाज के दुश्मनों पर डालो,

उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,

ये राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ सुभाष का हिंदुस्तान |

काला रंग और काला इरादा लेकर आओगे तों पछताओगे,

रंग के साथ हम खून की होली भी खेलना जानते है,

भूले तों नही ७१ और कारगिल ,अब आओगे तों मिट जाओगे, .

बाहर आसान पर अन्दर छिपे काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,

वे हमारे बीच छिपे ना पहचाने जाने वाले गुलाल और अबीर है,

आओ मिल कर सफाई का पानी डाले ,उन्हें ढूढ़ कर निकाले,

सियार का रंग उतर जायेगा ,समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा |

फिर सभी रंगों को मिला कर इन्द्रधनुषी रंग बनाये,

उसी की होली खेलें, पूरे भारत को वही रंग लगायें,

अपना देश महान होगा जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,

विश्व को रास्ता दिखायेगा फिर विश्व गुरु कहलायेगा,

आओ इन इरादों की चन्दन और रोली लगाओ,

हाथ का खंजर फेंक दो और गले से  लग जाओ | .

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

झाँक मत लेना

देशभक्ति की बात कितनी अच्छी लगती है 
पर फाइलो मे उनकी तुम ताक मत लेना 
वेश्याओ के घर बस बदनाम बहुत है 
पर शरीफो की खिड़कियो मे झाँक मत लेना ।

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

आस्तीनो मे साँप

सोचता हूँ 
बिना आस्तीन के 
कपडे पहनू 
जब से जाना है 
की 
आस्तीनो मे 
साँप रहते है ।

सोमवार, 27 जनवरी 2020

वो हमको मंजूर नही

गांधी पर गोली चलवाया वो हमको मंजूर नही 
देशभक्तो की मुखबिरी की और उनको जेल भिजवाय वो हमको मंजूर नही 
अंगेजो से माफी मांगी 
अंग्रेजो से पेंशन खाया वो हमको मंजूर नही 
आज़ादी मंजूर न जिनको वो हमको मंजूर नही 
देश का संविधान था फाड़ा 
और देश का झन्डा जलाया वो हमको मंजूर नही 
सालो झन्डा ना फहराया वो हमको मंजूर नही 
गाय के नाम पे था मरवाया वो हमको मंजूर नही 
राम के नाम पे दंगा कराया वो हमको मंजूर नही 
आग लगायी घर जलवाया वो हमको मंजूर नही 
तलवारो पर बच्चे उछाले कांच पर बहनो को नचवाया वो हमको मंजूर नही 
श्रीराम का नारा लगाकर बहनो के कपडे नुचवाया वो हमको मंजूर 
इज्जत लूटी और जलाया वो हमको मंजूर नही 
संविधान को नही मानता वो हमको मंजूर नही 
लोकतंत्र को नही जानता वो हमको मंजूर नही 
बेटे बेटी को पिटवाये वो हमको मंजूर नही 
रोटी छीने सब बिकवाये वो हमको मंजूर नही 
नफरत का करोबार फैलाये वो हमको मंजूर नही 
सीमा पर बेटे मरवाए वो हमको मंजूर 
दुश्मन के घर जाये बिना बुलाये वो हमको मंजूर नही 
बिरयानी खाए साड़ी पहुचाये वो हमको मंजूर 
फिर अपने बच्चे मरवाए वो हमको मंजूर नही 
अपनो पे इतने केस लगाये वो हमको मंजूर नही 
आओ मिलकर इन्हे भगाये ये हमको मंजूर 
आओ मिल आवाज लगाये ये हमको मंजूर नही 
फासीवाद से पिण्ड छुड़ाए ये हमको मंजूर नही ।

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

संघर्षो का अन्त ।

सुना है कि 
कृष्ण ने 
द्रौपदी की साड़ी 
इतनी लम्बी कर दी 
कि 
उसका छोर ही नही था 
सुना है कि 
हनुमान की पूँछ का भी                       
कोई छोर नही था         
पर 
कही तो अन्त हुआ ही होगा 
उनका उस दिन नही 
तो अगले दिन 
लेकिन 
कुछ लोगो के संघर्षो का                              
कोई अन्त ही नही होता 
वो लड़ते रहते है 
बचपन से बुढापे तक 
और 
नितांत अकेले 
एक दिन थक कर सो जाते है 
चिरनिद्रा मे 
तभी होता है उनके                             
संघर्षो का अन्त ।

शनिवार, 18 जनवरी 2020

कुहरा

कितना भयानक
कुहरा हो जाता है 
अकसर आजकल 
कुछ भी नही दीखता
थोडा सा भी आगे 
पर 
ये कुहरा तो
इस मौसम मे होता है 
थोडे दिन 
मेरे जीवन मे तो 
पता नही कब से 
कुहरा है 
कुछ भी स्पष्ट नही 
अगले पल का भी 
इस कुहरे से 
जीवन का कुहरा 
ज्यादा भयानक होता है 

शनिवार, 11 जनवरी 2020

जिन्दगी क्या है

जिन्दगी क्या है 
उनसे तो 
पूछ भी नही सकते 
जो भस्म हो गये 
जब चलती बस 
बन गयी आग का गोला 
पैर थे 
पर भाग नही पाये 
हाथ थे 
पर 
आग बुझा नही पाये
हा 
उनसे पूछ सकते है 
जो 
कूदने मे कामयाब हो गये 
या 
उनसे जो तमाशबीन थे 
और 
मदद नही कर पाये 
तो वीडियो बनाने लगे 
कि 
बता सके 
कि 
जिन्दगी क्या है । 

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

मुनादी हो गयी है



मुनादी हो गयी है 
कि 
घर से बिल्कुल न निकले 
फिर भी निकले 
तो जिम्मेदारी आप की है 
क्योकी 
लाठी ,बदूके लिए सत्ता खडी है 
जेल के फाटक अब  खुलेंगे 
देश की जनता की खातिर 
किया होगा गांधी ने                   सत्याग्रह या प्रदर्शन 
पर गांधी नही 
गोडसे ही खड़ा है 
चुकी अब ये सत्ता मे है 
इसलिए ये जनता से बडा है 
लोकतंत्र और आज़ादी 
या संविधान ये क्या जाने 
उसे ये क्यो माने 
जब दी जा रही थी               
कुर्बानियां इनकी खातिर 
तो 
ये गांधी के खिलाफ खड़े थे 
अब भी जेहन वही है 
अब भी इनका मन वही है 
भूल मत जाना जलियावाला
और भी सब 
सत्ता के पास अब भी                         ताकत वही है 
वर्दी और बन्दूके वही है 
मुनादी हो गयी है                  
मुह अब हर्गिज न खोले
और          
कलम भी तोड दे सब 
वरना !
मुनादी हो गयी है ।

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना वक्त से
और अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और बुरी का आहत कर देना 
और चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 8 दिसंबर 2019

आग

#आग#

आग!
जब 
मनुष्य को मिली 
तों
बदल गया 
उसका जीवन.                                                                                
बदली 
मानव सभ्यता ,
होती गई तरक्की 
उतरोत्तर
आग जली 
मिला लोहा ,
अविष्कार दर 
अविष्कार
जीवन का 
सब कुछ पानी 
और
आग के 
इर्द गिर्द ही तों है
वही आग आज 
दावानल बनी 
और
मचा दिया कोहराम
कुछ देर पहले 
जो बहा रहे थे 
पसीना
कि 
घर के चूल्हों में 
आग जल सके  
उसकी तैयारी थी 
बेटी के विवाह की,
बच्चा दवाई का 
इंतजार कर रहा था
इंतजार था 
किताबो का 
और
बूढी अम्मा को  
दर्शन को जाने का
इन्ही सपनो
संघर्षो के लिए
वे 
बहा रहे थे पसीना
कि !
नागिन तरह लपकी आग ,
जहर कि तरह 
उगल दिया 
ढेर सा धुआं
पसीना बहा 
और सूख गया 
लहू ने 
संघर्ष किया 
और जल गया
हाथ पैर 
आग के लिए 
संघर्ष करना जानते थे
लेकिन 
आग से 
बिलकुल नहीं
लेकिन 
अब स्कूल नहीं 
जा पायेगा बचपन
अब कब मिलेगी रोटी 
ऐसे क्यों जली आग 
कि
कई घरो में 
नहीं जलेगी 
कई दिन तक
समय से 
पहले सज गई चिता ,
ये थी
किस बात कि सजा ,
पसीना बहाने की?
अपना बहा रहे थे ,
दूसरे का
अपनी तिजोरी में तों 
नहीं भर रहे थे 
यदि 
लगनी ही थी आग 
तों लगती 
काले धन वाले कि                
तिजोरी में
जिसमे बंद है 
किसी के ख्वाब               
किसी कि रोटी 
किसी की बेटी  
या लग जाती                                  इन्सान के 
अनत संघर्ष में ,
नफ़रत ,अज्ञान ,
भूख ,अशिक्षा,
आतंक,भ्रस्टाचार ,
व्यभिचार ,बेकारी                  लाचारी ,बीमारी 
और बदकारी में
पर किसे जला दिया ?
जो खुद संघर्षरत थे 
और
बहुतो के संघर्ष को                          व्यापकता दे दी .
आग भी आज कि                          व्यवस्था हो गई है
जो गरीब को                        
मारती ,दुत्कारती                                         
और देती अपमान
बेईमानो को धन
गौरव, कुर्सी,सत्ता
मान और सम्मान
इस आग से तों 
बिना आग भले ,
विकास चले 
ना चले 
पर 
ऐसे कोई ना जले।

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

रिमझिम फुहारों के साथ

काश 
रिमझिम फुहारों के साथ 
हम भी बह जाते
या 
लगती एक मेज बाहर 
और
सज जाती उस पर 
पकौड़ियाँ तरह तरह की 
सूजी का हलवा 
और 
अदरक वाली चाय 
फुहारों की बूंदे 
आती चेहरे पर 
या नंगे पैरों पर 
और 
सिहरन दौड़ जाती 
सिमट जाता अस्तित्व 
पिघल जाने को 
काश !

शनिवार, 30 नवंबर 2019

घर के बीच की दीवारों के दिल होता तो कैसा होता



घर के बीच की दीवारों के दिल होता तो कैसा होता
भाई के दुःख पर तब दीवार भी रोती औ दिल रोता ।

पत्थर की दीवारे है पर इन्सान भी पत्थर बनते क्यों 
इक माँ की ही कोख से पैदा नफरत के छाते तनते क्यों 
घर और जमीन तो बंट जाएगी  पर माँ को कैसे बाँटोगे 
नफरत इतनी सब बटना है पर माँ को कहा से  काटोगे

सोमवार, 11 नवंबर 2019

दीवाली

दीपो का त्यौहार आ गया, दीप जलेंगे

दीपो का त्यौहार आ गया ,
दीप  जलेंगे
कही मोम के,कुछ मिट्टी के ,
दीप जलेंगे ,सदा जले है ,
फिर जलने है,
दीपो का त्यौहार जो आया,
बालक बच्चे इंतजार में,
उनकी खातिर खुशिया लाया,
मिठाई ,खील बतासे खायेंगे वे,
दीप जलेंगे ,
बम फुलझड़िया खूब दगेंगी,
पर मिट्टी का दीपक कुछ उदास है,
हंस रही है चीन से आई ही सब चीजे,
जिसके लिए अफीम धर्म था,
उसी चीन से बन कर आये ,
सभी देवता है बाजार में,
भारत के दिए और और देवता,
बस बैठे है इंतजार में,
कोई तों ले लो,आखिर वे अपने है,
कुछ अपनों का पेट भरेगा 
देखो वो गरीब का बच्चा,
टुकुर टुकुर ताक रहा है सब चीजो को,
उसका पिता हिसाब लगाकर ,
खील,बतासे,एक फुलझड़ी ले लेता है
ये कह कर की हम चालाक है  
औरो को खर्चा करने दो
हम मुफ्त में मजे करेंगे,
सुबह सुबह जल्दी जग उसका बेटा बीनेगा,
बची मोमबत्तियां और पटाखे,
अगले दिन वो उनको फोड़ेगा,
जहा काम करती उसकी माँ,
वहा से आई आज मिठाई,
मन रही इस घर में आज दीवाली,
दीवाली आई और ख़त्म हो गयी,
अब लगता है की कल क्या बदला था ,
हम दुनिया कि बुराइयों से,
लड़ने की कसम खाये तों कैसा हो,
तब दीवाली मनाये तों कैसा हो,
दीवाली मनाये,सीमा से कोई लाश नही आई,
इस साल किसी ने अपनी बहू नही जलाई,
जब कोई रात न होगी काली, तब होगी असली दीवाली |

बुधवार, 30 अक्टूबर 2019

जिन्दगी फुटबाल है

एक उम्र के बाद 
आप 
उपयोगी नही होते 
किसी के लिए 
बल्कि 
लोगो की जरूरत 
होती है आप को 
तब !
क्या आप ने कभी 
फुटबाल खेला है 
हर खिलाडी 
फुटबाल को 
सरका देता है 
दूसरे की तरफ 
एक रणनीति से 
गोल करने की रणनीति 
पर 
जिन्दगी के मैदान पर 
लोग फुटबाल 
फेंकते रहते है 
दूसरे की तरफ 
बला समझ कर 
खेल का मैदान हो 
या 
जिन्दगी का 
फुटबाल पैरो से 
ठोकर खाने के 
ही काम आती है
और 
घिस जाने 
पुरानी हो जाने 
पर फेंक दी जाती है 
कूड़ेदान मे 
और 
हवा ही निकल जाये 
अनुपयोगी हो जाये 
तो कभी भी 
कूड़ेदान की चीज 
बन ही जाती है ।
इसलिए कुछ भी करो 
पर उपयोगी बने रहो ।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

एक ही देश मे दो है

दीपावली पर 
बड़े शहरो मे 
दुकानो पर 
महंगी गाडिया 
कम पड़ जाती है 
और 
दिये उदास 
पडे रहते है 
जमीन पर 
गरीब 
एक दिया भी 
नही खरीद पाता है 
सेंसेक्स और शेयर 
उछल रहा है 
और 
सोना चाँदी भी 
पर 
एक और चीज 
उछल रही है 
किसानो और 
बेकारो की 
आत्महत्या की संख्या 
सचमुच आज भी 
एक ही देश मे दो है 
एक 
10 फीसदी इंडिया 
वैभव से संपन्न 
जिन्हे देख कर 
तय होती है योजनाये 
और आँकड़े 
दूसरा 
90 फीसदी भारत 
बदहाल और उपेक्षित
मिली थी रात को 
12 बजे आज़ादी 
पर 
90 फीसदी भारत 
की जिन्दगी मे 
आज भी अन्धेरा है ।
कौन लाएगा उजाला 
भारत की जिन्दगी मे । 

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

कुछ सवाल है जो अनुत्तरित है

कुछ सवाल है
जो अनुत्तरित है
कुछ जवाब है
जो खुद
सवाल बन गए है
सिलसिला टूटता ही नही
न सवालो का न जवाबो का
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है
पर कही तो कोई दीवार होगी
या
होगा इस सफर का डेड एंड
जो रोक देगा क्रिया को
और प्रतिक्रिया को भी
और
फिर सब होगा शांत शांत ।

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

क्या सचमुच वो बादलो पर रहता है ?

क्या सचमुच वो
बादलो पर रहता है ?
क्या सचमुच वो हमे                              
देखता रहता है ?
क्या
ये उसके ही आँसू है
जो
बारिश की शक्ल मे                      जमीन पर आते है ?
और
हमे भिगोकर
छू लेना चाहते है ?
क्या सचमुच ?
तो छू क्यो नही लेते आकर
हमारे पास सचमुच ?

जब तुम थे

जब तुम थे

जब तुम थे न
सब सुबह उठ जाते थे
और
मैं भी अलसाया सा
पर
अब तो
दोपहर हो जाती है
कइ बार
जब तुम थे ना
घर
कितना साफ रहता था
रहता तो
अब भी साफ ही है
पर
जब तुम थे न
तो
डायनिंग टेबल
खाली रह्ती थी
जब तक खाना न लगे
पर
अब वो भरी है
हर उस चीज से
जिसकी
मुझे जरूरत होती है
और
तुम्हारे बिना
भूलने का डर रहता है
जब तुम थे न
किचेन
कितना भरा होता था
तमाम सामान से
पर
अब बस चाय की पत्ती
और
चीनी
या
कुछ
बहुत दिनो के रखी चीजे
जब तुम थे न
सुबह के नाश्ते से
रात तक
रोज
कुछ नया मिलता था
भूखा
अब भी नही रहता हूँ मैं
बस अक्सर
खाना भूल जाता हूँ
दोपहर को
और
कभी रात मे भी
जब तुम थे न
बिस्तर की चादर
बदल जाती थी
कितना एस यू एस टी हूँ ना
कि
नही बदल पाता हूँ
काफी दिन तक
बाकी सब कुछ वही है
जहा तुम छोडकर गये थे
मैं भी और मेरी आदते भी
और सब यादे भी
तुम्हारा तकिया भी
बिस्तर पर वही रखा है
बस सुबह उठना
और
अपना ध्यान रखना ही
भूल गया हूँ मैं ।
जब तुम थे न
अच्छे भले ठहाके गूजते थे
पता नही क्यो
सन्नाटा ही सन्नाटा है
जब तुम थे न
कितने सक्रिय और
जीवन्त थे तुम
पर
ईश्वर ने दीवार पर
टांग दिया
और
तस्वीर को आधा फ़ाड़ कर ।