गुरुवार, 17 मई 2012

वो समझा था कि वो सिकंदर है

वो समझा था कि वो सिकंदर है
पर समझा की सब मुकद्दर है ।
बड़ी देर लग गयी जान पाने में 
ये जानने में सामने समंदर है ।
क्या जानेंगे हम बाहर क्या  है 
जब जानते नहीं क्या अन्दर है । 
वो है मेरी है भी और नहीं भी है 
ये वो जाने सब उसके अन्दर है । 
बातें होती है तो बहुत बातें होती 
बातों का मतलब जाने  इश्वर है ।
मै कहना चाहता हूँ चाहत अपनी 
सोचता हूँ आँखे बोलें जो अन्दर है ।
वो क्या नासमझ है नहीं समझते है
मै क्या कहूँ की दिल में समन्दर है ।
लगता है जिंदगी यूँ ही बीत जाएगी 
वो भी अकेले है अकेला मेरा घर है । 



शनिवार, 12 मई 2012

क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।

जमीन है नहीं पर कोठियों के सपने है
कोई भी अपना नहीं पर सब  अपने है ।
हमने सोचा न था कि हम बहक जायेंगे 
पर बहक गए है तो कारण भी अपने है ।
आसमान से आग बरसी जल गए हम 
पाँव में छाले है तो हम कैसे चल पायेंगे ।
लोग कहते है कि तुम इतने पीछे खड़े हो 
बेंच दें जमीर बहुत आगे हम चले जायेंगे।
हमें भी तमन्ना हो गयी बड़ा बन जाने की 
बेईमान नहीं हम बड़ा आदमी कहलायेंगे । 
लूट लो बस जर जमीन जोरू जो भी मिले 
फिर शान से चलो सभी नीचे नजर आयेंगे। 
कोठी कुत्ता कार और चमचे भी होंगे खूब 
फिर हम देश में काबिल महान कहलायेंगे ।
वाह रे ये देश ये समाज, तुझे सलाम मेरा 
अच्छों को थू थू और बुरों के गीत गायेंगे । 
क्या फर्क जमीन बिना कोठियों के सपने है
सब होगा आसान जब हम नंगे हो जायेंगे।
बस इसी की दौड़ है चली आज मुल्क में मेरे 
क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।
चलो कोई तो जुबान खोलो नंगों को नंगा कहो 
कई वर्षों के गुलाम हम फिर वही बन जायेंगे ।
आओ नकाबों को उतारे इन्हें सचमुच नंगा करें 
जब नंगे होंगे ये असल में मुह क्या दिखलायेंगे ।



बुधवार, 9 मई 2012

कितने महंगे है ये हस्ताक्षर और इन्हें करने वाले लोग

मै चला था कि बस एक हस्ताक्षर होगा 
और दूर हो जाएगी मेरी सारी समस्याएं 
चहकने लगेगा मेरा परिवार और बच्चे 
लग जाएगी मेहदी एक बेटी के हाथों में 
पर नहीं जानता था कि कितने महंगे है 
ये हस्ताक्षर और इन्हें करने वाले लोग 
इन्सान नहीं है,बल्कि पैसे की मशीन है 
ये लोग बहुत बड़े हो गए है बहुत ऊंचे भी  
ये सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल करते है 
लोगो को ,उनकी भावनाओं,आस्थाओं को 
पर खुद हो गए है पत्थर केवल पत्थर
पत्थरों को क्यों सत्ता क्यों वैभव क्यों पैसा 
पत्थर क्या करेंगे इन चीजों का, क्या करेंगे 
ये चीजें तो इंसानों के लिए है इंसानों के लिए 
सत्ता होती है लोगो की लोगो द्वारा लोगो के लिए 
पर ये लोग तो खुद ही  बन गए है तीनों लोग  
फिर कहा बचते है मै ,आप या कोई और 
मै बड़े विश्वास से गया था अपना समझ कर 
पर लौट आया बेगाना बन कर लडखडाता हुआ 
ये भी जीवन का एक कड़वा सत्य है ,हा सत्य 
पर हार जाने के बजाय उन्हे हराना है मकसद .
जो इन्सान नहीं पत्थर बन गए है कठोर पत्थर 
सकल्पों को मांज लेना है तय कर लेना है कि 
लड़ाई अभी बाकी,है फैसलाकुन लड़ाई बाकी है 
उठूँ  बहुत चल लिया अब उन्हें चलता करना है 
यही है संकल्प ,यही है इरादा,बाकी अपने संकट 
वो छोड़ देता हूँ वक्त के हाथों में ,संघर्ष के हाथों में ।

शनिवार, 5 मई 2012

एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है

पांव है थके थके पर दूर बहुत जाना है 
पर चलने की उमंग है मन में उत्साह है 
चलना ही जीवन है रुक जाना अंत है                                       
चल रहा हूँ मै लेकिन रास्ता अनंत है ।
जीवन संघर्ष है, पहाड़ की चढ़ाई है 
अपने पुरसार्थ क़ी अपनी कमाई है
चलना है,रुकना नहीं चलते ही जाना है ।
रास्ते  में कांटे हो, जंगल हो, पहाड़ हो 
रास्ते में बाधा कोई सिंह की दहाड़ हो 
चलते ही जाना है चलते ही जाना है  ।
आते है तो रोते हुए और सब हंसते है 
रास्ते में कभी मौन,हंसना भी रोना भी 
जाते हुए मौन खुद, बाकी सब रोते है 
कौन परवाह करे हंसने की रोने की 
मंजिल को पाना है चलते ही जाना है ।
मंजिल नहीं मंजिलें है जैसे हो सीढियाँ 
हौसले बनाये रख कदम कदम चलना है 
चलते ही जाना है चलते ही जाना है ।
रास्ता दिखाया था बड़ों ने आगे कभी 
वो तो चले गए अपनी अनंत यात्रा पर 
अब आगे चलना है रास्ता दिखाना है 
पीछे है हमारे जो उन्हें रास्ता बताना है 
मंजिलें दिखाना उन्हें काँटों से बचाना है 
यही है कर्त्तव्य बस यही वो आयाम है 
अपनों को धीरे धीरे वाम पर पहुँचाना है 
चलते हमें जाना है चलते हमें जाना है ।
गिरे, उठे ,चल दिए, पार की खाइयाँ 
लडखडाये फिसले भी पार की पहाड़ियां 
काँटों के चुभने की कभी परवाह नहीं 
बहुत तेज गिरे पर निकली आह नहीं  
पैर हो जमीन पर अहंकार दूर रहे 
किसे परवाह  कौन कौन क्या कहे 
बस यही सत्य है , यही संकल्प है
सारे सोपानों को ,मंजिलों को पाना है 
एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है 
चलते ही जाना है चलते ही जाना  है ।



रविवार, 23 अक्टूबर 2011

देखो दीपक बोल रहा है

देखो दीपक बोल रहा है
हमारी आँखें खोल रहा है ,
सूरज का अहंकार है तोडा ,
अँधेरे का पीछा न छोड़ा ,
चाहे जितना जला रत भर ,
उसने अपना वचन न तोडा ,
सीख सकेंगे हम भी क्या दीपक की भाषा ,
हम भी फैला सकेंगे लोगो के जीवन में आशा ,
आओ इस दिवाली में ऐसी कसम खाए हम ,
जहा कही भी हो अँधेरा रोशनी पहुंचाए हम ,
वो रोशनी ज्ञान की हो ,नेत्रदान की हो ,
गरीबी,भूख ,अशिक्षा ,अपराध ,भ्रस्ताचार 
मिटाने के अभियान की हो |
तब दिए जलाएं, आप और आप के 
परिवार को दिवाली की शुभकामनायें |



















गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

सोमवार, 13 जून 2011

मै समझा कि जब चाहूँगा दूरिया नाप दूंगा मै ,

मै समझा कि जब चाहूँगा दूरिया नाप दूंगा मै ,
दूरियों ने कहा हम तुमसे बस चार हाथ  दूर है 
चलो,बढ़ो तुम मुझे छू लो और चाहो तो पा लो
अरे तुम रुक क्यों गए बस चार हाथ ही दूर मै 
थक गए तो रुक जाओ और मेरा इंतजार करो 
मेरा रास्ता जब मुडकर बस तेरी तरफ आएगा  
दूरी नहीं रह जाएगी रास्ता तेरी तरफ आएगा   
क्या सचमुच मंजिल पाना मेरे हाथ में नहीं है 
मै  दर्द से  कराह रहा था कि मंजिल मेरी नहीं  
मंजिलो ने कहा मंजिल नहीं मंजिले भी है तेरी 
अब मै रुकूंगा नहीं चलूँगा मंजिले सब मेरी है







 


सोमवार, 30 मई 2011

खुशियाँ चूम और आसमान तेरा है

मै सोचता था आसमान मेरा है ,
पर यहाँ तो हर तरफ अँधेरा है |
ढूढो यही कही कोई सूरज होगा,
जो कहेगा देख ये तेरा सवेरा है |
इतने तारे जो आसमान में फैले,
पुकारते है सारा आसमान तेरा है |
जो थक गया  जरा सी चढ़ाई पर , 
अभी बहुत दूर आसमान तेरा है |
अँधेरे, उजाले दोनों ही जिंदगी है,
अँधेरा है तभी तो सुबह सवेरा है |
अधेरे को तू आने दे और जाने दे,
इरादे रख तो  रोज नया सवेरा है |
चढ़ जा इरादों की किसी पहाड़ी पर,
खुशियाँ चूम और आसमान तेरा है |
























शनिवार, 21 मई 2011

मै एक किनारा हूँ और मेरी खुशियाँ दूसरा ,

आप कभी नदी के किनारे किनारे चले है ,
प्रारंभ में भी दो किनारे और अंत तक भी,
जब तक नदी समां  नहीं जाती समुद्र में  ,
तब तक किनारे मिलने को बेताब ,बेसब्र  ,
पता नहीं समुद्र में विलीन हो जाने पर भी, 
किनारे मिल पाते है या दो तरफ ही जाते है  ,
मै एक किनारा हूँ और मेरी खुशियाँ दूसरा ,
किनारों जैसे कभी नहीं मिल पाएंगे ये भी  |






मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

मुझे लगा श्राप तो अहिल्या से भी कठोर है

कितना अकेला हो गया मै !
कितना पंगु हो गया मै !
कितना असहाय हो गया मै !
एक चौराहे पर सांसें रोके  खड़ा हूँ मै !
कोई दिशा नहीं ,कोई लक्ष्य नहीं ,कोई इरादा नहीं ,
यदि लक्ष्य है तो बाधा बन कर खड़े है,
अपने ही सदा की तरह |
यदि इरादे है भी तो,
उसपर अन्धकार बनकर छाये है अपने ही |
और घोर अंधकार में कही कोई चल पाया है?
जो मै चल सकूँ ?
बस रास्ते पर पड़े पत्थर सा,
उससे अलग भी तो नहीं हूँ मै!
जब भी कोई कोशिश करता हूँ
की  रुके रास्ते चल पड़े ,
अपनी ही अनुभूतियाँ खड़ी हो जाती है,
बाधा बन कर |
बाहरी अवरोधों को तो ठोकर से हटाया जा सकता है ,
संघर्ष किया जा सकता है उनसे,
पर अपने बहुत प्यारे लोगो से !
शायद नियति ही यही है,
चौराहे का पत्थर बन पड़ा रहना |
जो सिर्फ तब हिल सके जब कोई ठोकर हटा दे ,
या कोई गाड़ी कुचल कर उछाल दे कही |
पर रास्ता तो फिर भी नहीं खुलेगा ना,
जब तक रास्ते खुद से तय ना हो,
लक्ष्य खुद से तय ना हो ,
और उसमे अपनों की खिलखिलाहट ना हो |
अहिल्या की भांति श्रापित पत्थर ही हूँ मै,
चौराहे  के बीच पड़ा हुआ |
अहिल्या के लिए तो राम का आना तय था ,
पर मै तो अकेला हूँ और पहचान खो चुका हूँ |
और जब कोई पहचानता ही नहीं!
तो राम भी क्या करेंगे ?
मुझे लगा श्राप तो अहिल्या से भी कठोर है |












शनिवार, 16 अप्रैल 2011

और खोज ख़त्म हो जाएगी खुद ही



निस्तब्ध सोच रहा हूँ
क्या ये मै ही हूँ
मै हूँ तो इस कदर मौन क्यों हूँ 
क्या सचमुच मै ही हूँ
या ढूढ़ रहा हूँ खुद को और खुद में ही !
पर ये खोज बहुत मुश्किल है,
खुद के अन्दर खोज पाना खुद को ही ,
पर खुद को ---प्रयास जारी है ,
लगता है अब जाने की बारी है | 
फिर होगा मौन ,मौन और बस मौन 
और खोज ख़त्म हो जाएगी खुद ही |

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

कितना गरीब हूँ मै कि आंसू तो है

क्या होता है और क्यों होता है जब 
आंसू आते है, मन करता है की जोरे से रोयें 
बिलकुल बचपन की तरह बुक्का फाड़ कर 
और रो नहीं पाते है |
बस घुटते रहते है, अंदर ही अंदर 
बड़ा क्या हुए, खुल कर रोने का अधिकार भी नहीं 
हँसने की जबरन कोशिश भी रुला देती है 
रोना तो कही मन की, दिल की गहराइयो से आता है 
कोई तो बता दो कैसे रोये, कहा रोये ?
कोई कोना नहीं है छुपाने को 
कोई कन्धा नहीं है सिर रखने को
कोई हाथ नहीं सिर सहलाने को 
कोई गोद नहीं ,सुबकने को 
कोई सीना नहीं हिचकी लेने को
कितना गरीब हूँ मै कि आंसू तो है 
पर रोने की  जगह मेरे पास नहीं 
जुबान भी नहीं बची या दब जाती है 
उसे दबा कर रोने लगता हूँ जोर जोर से
जिसे केवल मै सुन सकू 
अँधेरे में अपने बिस्तर पर या 
उस फोटो के सामने बैठ कर 
जो रोने नहीं देती थी 
जो आधार था हँसने का 
पर मै खुल कर जोर से कैसे रोऊ 
कब तक दबाऊँ मै भावनाओं को फूटने से 
नहीं रोऊंगा जोर से, तो मै फट पडूंगा जोर से |



 


रविवार, 20 मार्च 2011

आज होली है ,रंग लगाना है लगालो अच्छे अच्छे रंग डालो

आज होली है ,रंग लगाना, लगालो, अच्छे अच्छे रंग डालो,
ये लाल रंग है ,लहू का भी लाल होता है, फैसला तुम्हारा,
किसी  के लिए रक्तदान करो या बेगुनाहों का रक्त बहालो,
या रुके हर तरह का रक्तपात ऐसी कोई  व्यवस्था बनालो|
और आप हरा रंग लाये हो ,लगता है कीचड में नहाये हो,
आओ पूरी धरती को फिर हरा भरा बनाये,हों भरपूर फसलें,
फलों के बगीचे ,फूलो की क्यारी नहीं तों गमले ही लगाये,
और नीला , नीला आसमान नीला समुद्र साफ हो नदियाँ,
साँस लेने लायक हवा ,पीने लायक हो पानी नहीं तों ,
खुद ही मिट जाओगे  तों होली कैसे मानोगे |
पीला है तुम्हारा रंग होली का अपनाओ नया ढंग,
गरीबी और बेबसी के कारण जो बेटी आत्महत्या करने या,
बिकने को तत्पर है ,उसे बचाने का तुम्हे  एक अवसर है,
उसके हाथ पीले कर,कफ़न से बचा लो पीली चुनरी ओढा दो ,                                                                 
जीवन में खुशहाली  और उसके घर में पीली होली सजादो |
तुम काला रंग ही लाये हो या तुम्हारा मन भी है काला ,
अपना  इरादा बतादो ,अपना असली चेहरा तो दिखादो ,
हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं समाज के दुश्मनों पर डालो,
उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,
ये राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ सुभाष का हिंदुस्तान |
काला रंग और काला इरादा लेकर आओगे तों पछताओगे,
रंग के साथ हम खून की होली भी खेलना जानते है,
भूले तों नही ७१ और कारगिल ,अब आओगे तों मिट जाओगे, .
बाहर आसान पर अन्दर छिपे काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,
वे हमारे बीच छिपे ना पहचाने जाने वाले गुलाल और अबीर है,
आओ मिल कर सफाई का पानी डाले ,उन्हें ढूढ़ कर निकाले,
सियार का रंग उतर जायेगा ,समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा |
फिर सभी रंगों को मिला कर इन्द्रधनुषी रंग बनाये,
उसी की होली खेलें, पूरे भारत को वही रंग लगायें,
अपना देश महान होगा जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,
विश्व को रास्ता दिखायेगा फिर विश्व गुरु कहलायेगा,
आओ इन इरादों की चन्दन और रोली लगाओ,
हाथ का खंजर फेंक दो और गले से  लग जाओ | .

बुधवार, 16 मार्च 2011

नफरतो को होली में इस बार जलाये

यहाँ वहा आज देखो होली हो रही
वहा पे हंसी  यहाँ ठिठोली हो रही

तय था होली एक दिन मनाई जाएगी
होली में  बुराई  सब  जलाई  जाएँगी 
खुशियों से खेलेंगे हम रंग औ गुलाल
गले मिल कर दोस्ती  बढाई  जाएगी

एक दिन नही अब तों  रोज होली है
जी हा आज कि ये नई सोच होली है 
होली गुजरात कि कश्मीर कि होली
सड़क हो या रेल बस होली  होली है

होली में जलाये भी तों कौन लकड़ियाँ
मिल रही है मुफ्त में तमाम लड़कियां
रेल, बस, घर  जलाने का अधिकार है 
रोके कौन सबने बंद की है खिड़कियाँ  

होली का हुड़दंग हो या लोगो की चीख
यहाँ वहा जो भी मिले पहले उसे  खींच
आग में जलादे  चाहे खंजर पर उछाल
पानी से नही अब जमी लहू से ही सींच

देखो कही बम तों कही गोली चल रही 
चारो ओर खून की बस होली चल रही
हम नहला रहे है अपनी माँ को लहू से
नफ़रत की ही बस यहाँ बोली चल रही 

ऐसी होली भारत में और कब तक चलेगी
नफरत की कहानी भला कब तक  पलेगी 
जले राम का हवेली या रहीम  का मकान
इंसानियत की होली ऐसी कब तक जलेगी

आओ ऐसी होली पर विराम लगाये
भाई चारे की कहानी फिर से सुनाये
आओ इंसानी जज्बे  को हम जगाये 
नफरतो को होली में इस बार जलाये

शनिवार, 12 मार्च 2011

पृथ्वी जोर से हिली ,गुस्सा हो गया समुद्र

पृथ्वी जोर से हिली 
समुद्र की नीद टूट गयी 
गुस्सा हो गया समुद्र  
गुस्से में जोर से साँस लेने लगा समुद्र  
उसकी सांसे भारी पड़ गयी पृथ्वी को  
और पृथ्वीवासियों को भी  
चारो तरफ जलजला ,मौत और तबाही 
कुछ करो की फिर पृथ्वी ना हिले 
जरूरत पर हिले तो इतने जोर से ना हिले  
समुन्द्र की नीद ना टूटे ,क्रोधित ना हो समुन्द्र 
अभी तो थोडा सा क्रोधित हुआ है तब ये हाल है 
पूरा समुन्द्र क्रोधित हो गया तो पृथ्वी का क्या होगा 
क्या होगा पृथ्वी पर रहने वालो का 
आओ बचालें पृथ्वी को ,समुन्द्र को और मानवता को |







सोमवार, 10 जनवरी 2011

क्या यही होता है जीवन ?

क्या यही होता है जीवन ?
एक दिन आप जीवन पाते है,
आते तों अकेले है ,पर वहा होते है बहुत से,
हंसने को हंसाने को, खिलाने को, जिलाने को
फिर जिनके कंधो पर होते है आप खुश,
जिनके हाथ पकड़ कर आप पाते है ताकत,
उन्ही कि ताकत ख़त्म हो जाती है और,
आप के कंधे पर सवार वे चले जाते है अनंत यात्रा पर,
लगता है सर पर साया नही रहा ,कोई ताकत नही रही |
पर समय पकड़ा देता है कोई अनजान उंगली जीवन भर को,
जो जीवन का आधार बन जाती है या हो जाती है जीवन ,
पर कुछ लोगो से वक्त छीन लेता है उसे भी बीच रास्ते में ही,
और खड़ा कर देता है आप को ठूंठ कि तरह अकेला |
फिर नजर आते कुछ अपने ही शरीर के टुकड़े कुछ अनुभूतियाँ,
व्यस्त हो जाते है समेट कर खुद को अपनी अनुभूतियो के लिए ,
आप के सहारे चलने वाले आप का सहारा नजर आने लगते है,
समय और परम्पराएँ छीनती जाती है एक एक को बारी बारी,
आप का प्यारा टुकड़ा जो आप का आधार बन गाया है,
अपने जीवन को नया आयाम देने चल पड़ता है नए सफ़र पर,
फिर आप अकेले, जैसे  रेगिस्तान में खड़ा कोई अकेला ठूठ ,
अब ना ही कोई लक्ष्य, ना ही जिम्मेदारी और ना कोई आशा,
हां लक्ष्य केवल जीवन के बचे दिनों को पूरा करना और आशा कि-
बिना किसी को कष्ट दिए या लिए पूरा हो ये जीवन,जिम्मेदारी,
बस खाना पीना समय बिताना और गाना कि.,
दुनिया में हम आये है तों जीना ही पड़ेगा,
जीवन है अगर जहर तों पीना ही पड़ेगा |

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

कोई खामोश है, तों कोई परेशान है ,

1-
कोई खामोश है, तों कोई परेशान है ,
ख़ामोशी को सहना, नही आसान है
कुछ कहें तो चाहे नफ़रत से ही सही
वो भी तो किसी पर एक अहसान है |                                                                                              

2-जिसे भी छूता हूँ, वो टूट जाता है,
   कुछ भी कहता हूँ तों रूठ जाता है
   क्या करू मेरी किस्मत ही ऐसी है,
   जिसे भी चाहता हूँ वो छूट जाता है |

3-तमाम उम्र हम चलते रहे और लोग जलते रहे ,
    अब हम जलते जा रहे है लोग चलते जा रहे है |

4-आइये जिन्दगी  के नए  मायने तलाश करे ,
    दिल को जोड़ा तों फिर दिल पर विश्वास करे ,
    ऐसा क्या जुड़ना कि दिल ना करे  धक् धक्,
   आइये तन मन के अहसास का अहसास करे ,

5-आप भी गर अच्छे है तभी मिल पाते है जनाजा उठाने वाले,
   वो भी खुशकिस्मत होते है जिन्हें मिल जाते है जलाने वाले|
   जो गैर है अपने  नही उनको क्या देखना और क्या सोचना,
   आज कल ऐसे ही होते है मतलबपरस्त तमाम ज़माने वाले|

6-कोई  मेरे सोये दिल को जगाये तों कोई  बात बने ,
   कोई  मेरे घर में भी दीप जलाये तों कोई बात बने |
   बहुत दिन हो गया मैंने तों कोई खुशियाँ नही देखी ,
   दामन में कोई खुशियाँ ले  आये तों कोई बात बने |

7-अँधेरे मेरे घर के देखो दूर से ही दिखलाई पड़ते है,
   मेरे घर का अँधेरा  कोई भगाए तों कोई बात बने |
   सभी के घर बहुत रोशन, सभी के घर में  दिवाली  ,
   कोई मेरी भी दिवाली  मनवाए तों कोई  बात बने |

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

खजुराहो की मूर्तिया बोलती है

ये खुदी मूर्तियाँ पत्थर की इनकी अपनी अलग कहानी
रह जाती है याद सभी को ये सब सदा सदा को जुबानी 
ये बाज रहे है कुछ बाजे और नाच रहा है कोई
कुछ रंग राग सा जमा हुआ   इस महफ़िल में
प्रेम नगर की महफ़िल में पलके है जागी सोई 
कुछ उबलता अरमान यहाँ दीखता हर दिल में
आतुर दीखते है सब छोड़ने को दिल पर कोई निशानी
ये खुदी ----------------------------------------------
ये प्रथम दृश्य इंकार भरा पर ये है मनुहार भरा
ये शर्म को प्रकट किये और इसमे है  प्यार भरा
और ये देखो कैसी इनसे  अठखेलियाँ फूट रही
इसमें गति कुछ रुकी जैसे है थोडा इकरार भरा 
ये बंकिम चितवन कतिपातन कहता है स्वयं कहानी
ये खुदी ---------------------------------------------
अब ये देखो कुछ और निकटता बढ़ती है
हाथो से थामा गोल और नर्म कलाई को
उठते गिरते क्षण सीने के क्या कहते है
प्यासे नयनो से देख रहा  अंगड़ाई  को 
थरथराते अधरों पर अधरों को रखने को मस्त जवानी
ये खुदी ------------------------------------------------
ये निगाहे प्यासी आकुल हो  होकर उठती है
धड़कन बढ़ गयी जब बाहें कटी को कसती है 
स्वास तेज कैसा चेहरा अधरों पर रखे अधर
गति में है दोनों  ये है स्वर्गीय सुख का असर
और अब बाहें हो गयी शिथिल क्या कर डाली मनमानी 
जीवित लगती फूट रही इन मूर्तियों से मदमस्त जवानी
ये खुदी मूर्तियाँ पत्थर और इनकी अपनी अलग कहानी
खजुराहो से जाते  है  सब  मन  में भर कर नयी   रवानी

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

दीपो का त्यौहार आ गया, दीप जलेंगे

दीपो का त्यौहार आ गया ,
दीप  जलेंगे
कही मोम के,कुछ मिट्टी के ,
दीप जलेंगे ,सदा जले है ,
फिर जलने है,
दीपो का त्यौहार जो आया,
बालक बच्चे इंतजार में,
उनकी खातिर खुशिया लाया,
मिठाई ,खील बतासे खायेंगे वे,
दीप जलेंगे ,
बम फुलझड़िया खूब दगेंगी,
पर मिट्टी का दीपक कुछ उदास है,
हंस रही है चीन से आई ही सब चीजे,
जिसके लिए अफीम धर्म था,
उसी चीन से बन कर आये ,
सभी देवता है बाजार में,
भारत के दिए और और देवता,
बस बैठे है इंतजार में,
कोई तों ले लो,आखिर वे अपने है,
कुछ अपनों का पेट भरेगा
देखो वो गरीब का बच्चा,
टुकुर टुकुर ताक रहा है सब चीजो को,
उसका पिता हिसाब लगाकर ,
खील,बतासे,एक फुलझड़ी ले लेता है
ये कह कर की हम चालाक है 
औरो को खर्चा करने दो
हम मुफ्त में मजे करेंगे,
सुबह सुबह जल्दी जग उसका बेटा बीनेगा,
बची मोमबत्तियां और पटाखे,
अगले दिन वो उनको फोड़ेगा,
जहा काम करती उसकी माँ,
वहा से आई आज मिठाई,
मन रही इस घर में आज दीवाली,
दीवाली आई और ख़त्म हो गयी,
अब लगता है की कल क्या बदला था ,
हम दुनिया कि बुराइयों से,
लड़ने की कसम खाये तों कैसा हो,
तब दीवाली मनाये तों कैसा हो,
दीवाली मनाये,सीमा से कोई लाश नही आई,
इस साल किसी ने अपनी बहू नही जलाई,
जब कोई रात न होगी काली, तब होगी असली दीवाली |

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

कभी हरी दूब पर पड़ी ओस की बूँद देखा है

कभी हरी दूब पर, पड़ी ओस की बूंदों देखा है ,
नही देखा ,तों छोटे छोटे बच्चो को देखो,
देखा है कमल या गुलाब के फूल की मुस्कराहट,
नही देखा तों छोटे छोटे बच्चो को देखो,
वर्षा की पहली बूँद को सीप में मोती बनते देखा है,
नही देखा तों अपनी नन्ही सी बेटी को देखो,
जानते हो क्या होता है सच्चा और निश्छल प्यार,
बच्चो की तरफ प्यार से देखो जान जाओगे,
कभी देखा है जीवन से खुद बिना थके लड़ने की कला,
उठने की कोशिश करते ,गिरते और उठते बच्चो को देखो,
कभी सोचा घर बनाने की कल्पना कहा से आई होगी,
माँ की सदी से घर बनाते और सजाते अपनी बेटी को देखो,
कभी प्यार के मोल और गहराई को जाना है,
अपनी शादी के बाद बिदा होती बेटी की आँखों में देखो,
सबसे बहुमूल्य चीज कैसे सम्हाली जाती है कभी जाना,
आंधी में किसी माँ को बच्चो को सीने में चिपकाते हुए देखो,
एक का दर्द दूसरे को कैसे और ज्यादा दर्द देता है कभी देखा है,
जब तुम बीमार हो और कराहते हो  तों बच्चो की आँख में देखो,
कभी किसी इन्सान को आधा कटा हुआ और बटा हुआ देखा है,
किसी ऐसे को देखो जिसका सचमुच का अपना आधा चला गया हो,
किसी ने कभी स्वर्ग से लौट कर बताया की कैसा होता है ,मत पूछो,
प्यार करने वाली पत्नी और बेटे बेटी वाला घर देखो, दिख जायेगा,
भगवान की बनाई सबसे अच्छी दवाई क्या है  जानते हो,
बच्चो को उठाओ सीने से चिपकाओ और पत्नी को देख कर मुस्कराओ,
जीवन का अर्थ अगर नही जानते हो और इसे व्यर्थ मानते हो,
तों बस इन सबको प्यार करो सचमुच में प्यार करो ,जीवन पा जाओगे,
कही कुछ मत खोजो सारी दुनिया की दौलत तुम्हारे पास है,
जान गए तों जोर से हंसो और उसे बाहर फेंक दो जो मन उदास है,
थक गए हो तों बेटी को देखो ,रुक गए हो तों बेटे को देखो,
दोनों तुम्हारी दो आँखे है ,बेटी धड़कन है तों बेटा हाथ है,
तुम तभी पूरे हो जब दोनों तुम्हारे घर में है, दोनों साथ है,
इसलिए एक कसम खाओ की बेटियों को नही मिटाने देंगे,
दोनों को दो हाथ की तरह समझेंगे दोनों में फर्क नही आने देंगे |

बेटियां ताज़ा हवा का झोंका है इन्हें आने दो

बेटियां ताज़ा हवा का झोंका है,
मारों मत इन्हें आने दो,
ये खुशबू है ,इन्हें अपने साथ
एक और घर महकाने दो |
बेटिया वो है जो मुस्कराती है
तों हजारो फूल खिलते है
बेटिया जब पैदा होती है
तों जिंदगी को मायने मिलते है |
बेटिया हर दर्द कि दवा है
खत्म ना हो जाये बचाए रखना,
बेटिया  दुःख में एक दुआ है
इनको मन में सजाये रखना |
दिन भर की तकलीफों के बाद
घर आने पर मरहम है बेटिया,
टूट रहे हो एक बार
इनकी तरफ देखो
तुम्हारा दम है बेटिया |
कितने भी थके हो
गोद में बैठा लो
देखो  अब थकान कहा है,
कितनी चोट बाहर लगी हो
बेटी बस छू दे
अब निशान कहा है |
बेटिया घर की मिठास है रौनक है ,
एक मीठा सा अहसास है,
दुनिया का दुःख दर्द भूल जाओगे,
गर बेटी आसपास है |
बेटिया कलाई में सजी राखी है
और माँ की ममता है बेटियां,
प्रेम का उपहार है तों
अर्द्धांगिनी बनने की
क्षमता है बेटिया |
बेटिया धान है एक क्यारी में उगती
दूसरी में रोपी जाती है,
ये फले एक संसार बनाये
इसलिए दूजे घर में सौपी जाती है |
तुम कैसे मार सकते हो इन्हें
 ये तुम्हारी क्यारी में अमानत है,
दूसरा खेत इंतजार कर रहा है
तुम्हारा प्यार बस जमानत है |
उसे गौर से देखो
अल्ट्रा साउंड मशीन में भी
वो मुस्करा रही है,
नही लगता तुम्हे की
हाथ उठाये प्यार से तुम्हे बुला रही है |
क्या तुम उसे अब भी मार सकते हो,
नही ना अब उसे दुलारों,
तुम्हारी गोद में आने का
इंतजार कर रही है
उसे पुकारो |
तुम ने उसे  पुँकारा देखो
वह माँ के पेट में भी मुस्करा रही है,
उसे सहलाओ देखो वो अपनी
ख़ुशी का अहसास करा रही है |
ये सब देख कर भी
तुम्हारा शैतान जिन्दा है
और उसे मारोगे,
जब दिल खुश होगा घर आओगे
बेटी कह कर किसे पुकारोगे |
बेटिया दिल की धड़कन है
आँख का आंसू और प्यार की पुकार है ,
दूसरे घर में भी दिल
तुम्हारे लिए धड़कता है
तुम्हारा ही संसार है |
इसलिए बेटियों को घर आने दो,
और इन्हें जी भर कर प्यार करो,
मिटाने की सोचो भी मत खुद मिट जाओगे
बेटियों को दुलार करो |

शनिवार, 25 सितंबर 2010

संगम पर मिली गंगा,जमुना से बोली

संगम पर मिली गंगा,जमुना,बोली सुन मेरी बहना
इतने दिन तों अलग रह चुके ,अब  संग हमें बहना 
बादल पापा गरजे खूब गरज  ,गरज कर बरसे खूब
माँ पहाड़ की गोद भर गयी देख कर सभी हरसे खूब
मैदानों से ब्याह  किया कितनी मुसीबत देखी बहना
गन्दा खाना गन्दा पीना गन्दा कपड़ा  गन्दा गहना
माँ  के घर से नीचे उतरे,बांध दिया बच्चो ने हमको
यहाँ बांधा वहा भी बांधा काट दिया बच्चो ने हमको
खाने को गन्दा ही सब कुछ पीने को गन्दा ही पानी
मै बोली मुझको बहने दो पर किसी ने बात ना मानी
सभी गन्दगी फेंका मुझ पर लाशो से भी मुझे सजाया
भद्दी मेरी शक्ल हो गयी पर किसी को तरस ना आया 
बचते बचाते मै तों आई हूँ पर तुम हो मुरझाई कैसे
जरा बताओ इसी उम्र में  तुम पर आफत आई कैसे
जमुना बोली क्या कहना बहना हम दोनों कि एक कहानी
क्या बोलू मन बहुत दुखी है, ख़त्म हो गयी अपनी जवानी  
अपने जब ऐसे अपने है तब क्या जीना है और क्यों बहना
जब अपनी कुछ क़द्र नही किसी के लिए कुछ क्यों सहना
भागो बहना जोर से भागो, वरना क्या क्या सहना होगा
बांध दिया गर फिर दोनों को तों  गंदे घर में रहना होगा
अच्छा बहना अब चलते है अब तों कुछ ये अंतिम पल है
आओ गले मिल बातें कर ले अपना नही अब कोई कल है   
देखो बाहें फैलाये मुस्कराते  समुन्दर मामा हमें बुलाते 
उनके घर हम सब का ठिकाना थपकी देकर हमें सुलाते
क्या क्या सहा कैसा वो घर था सब  सोच कर मै रोती हूँ
उधर जाओ तुम भी सो जाओ और उधर मै भी सोती हूँ

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

दूर तक दिखता समुंदर और आगे कुछ भी नही

दूर तक दिखता  समुंदर और आगे कुछ भी नही
दिख रहा है वो सही है या सत्य फिर कुछ और है
वो दूर बहुत दूर आसमा और समुन्दर मिल रहे है 
क्या सचमुच मिल रहे है, क्या वही अंतिम छोर है
ये कौन है बे खयाल जा रहा है उस अंतिम छोर को
क्या इरादा है इनका कौन है ये कहा इसका ठौर है
अरे रोको कोई तों रोको  इन्हें वरना ये डूब जायेंगे
क्या ये जानते है कि सौन्दर्य नही मौत चहु ओर है
ये नीला पानी बुलाता है प्रेम से और निगल जाता है
देखो ऊपर से शांत दीखता है पर भीतर बड़ा शोर है 
कौन है ये मौन है जो चले जा रहे है राम लक्षमण से
क्या फिर सरयू दोहराएंगे या फिर मन में कुछ और है

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

दिल के टुकड़े उठा कर क्यों सहला रहा है

उसको देखो वो आखिर कहा जा रहा है
इंसानों को देखकर क्यों  कतरा  रहा है

बहुत दिन हो चुका उसे  इंसानों में रहते
अब इंसानों को देख कर ही घबरा रहा है

वो था झूठा और दिल टूटा क्या हो गया
दिल के टुकड़े उठा कर क्यों सहला रहा है

माना जिसको भी अपना सबने भोंका छुरा है 
हद है काँटों से भी बच कर अब वो जा रहा है

कैसे बचेंगे इंसानी रिश्ते इंसानों कि दुनिया
जब हर कोई अपने ही रिश्तो को खा रहा है 

कैसे बताये कैसे समझाए कि सब ऐसे नही है
बहुत चोट खाई दर्द का गाना ही वो गा रहा है

बुधवार, 1 सितंबर 2010

मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई

मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई
देखा मुझे करीब से तों देख कर शरमा गई

मैंने पूछा तुमको मुझसे मिलकर कैसा लगा
बोली मै भयभीत हूँ मन में  केवल भय जगा 
इतनी दीवानगी क्यों किसलिए किसके लिए
इस दुनिया में है कौन किसका कितना सगा

क्या  कोई उसको और वो किसी को भा गई 
मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा  गई

दीवानगी बोली रास्तो का क्या  बन जायेंगे
उठोगे और चल दोगे खुद  नजर आ जायेंगे
जीवन का तों उसूल है कल है भूलने के लिए 
कोई तुम्हे भूला तय करो उसको भूल जायेंगे

दरवाजे खोल कर  देखो चांदनी है  आ गई
मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई

मैंने कहा दीवानगी तुम मेरे पास आई क्यों 
आ गई तों देख कर इस कदर शरमाई क्यों
दीवानेपन की देवी खुद को तुम समझती थी
मै जरा सा  दीवाना हूँ देख कर घबराई क्यों

मुझे होश नही तुम्हे क्या चीज नजर आ गई 
मेरी दीवानगी को देख  दीवानगी घबरा गई

शनिवार, 28 अगस्त 2010

हलाल से मरा या झटके से मौत उसकी

एक मौत हो गयी है हर तरफ बहस है
हलाल से मरा या झटके से मौत उसकी
एक पक्ष कह रहा है हलाल में है जन्नत
स्वर्ग झटके में है एक पक्ष का है ये मत
गुस्से में  आकर दोनों बाहें चढ़ा रहे है
वो  कुरान पढ़ रहा है वो वेद गा रहे है
सच में कोई मरा है या चल रही है सासे
यदि चल रही है सांसे कोई उसे बचाए
पर बहस फिर वही कि कौन उसे बचाए
हिन्दू है या मुसलमा पहले वो ये  बताये
इन्सान होना इंसा को काफी नहीं है  यारो
गैर मजहबी बचाया तो माफ़ी नहो है यारो
उसकी जिंदगी से है किसका कोई  वास्ता
विवादों से खुलता है राजनीति का रास्ता
दोनों ने कहा अफवाह फ़ैलाने में भला है
अजमाया हुआ नुस्खा हर बार जो चला है
छोड़ो इसे अपनी अपनी बस्ती में लौट जाओ
मै गोली इधर  चलाऊ तुम भी उधर  चलाओ
पर पहले देख लेना घर वाले घर पे ही हो
या इंतजार करना थोड़ी देर क्यों नहीं हो
जब दोनों बता देंगे सब ठीक है जी मौला
तुम भी करना दंगा ,हम भी करेंगे दंगा
कुछ मर गए तो फिर सियासत में रंग होगा    
हम दोनों के लड़ने का पुराना ही ढंग होगा   
तुम बनो विधायक और संसदी हो मेरी
प्रान्त में सत्ता तेरी औ दिल्ली में हो मेरी
फिर बात होगी कि   कौन  मर गया था
वो अफवाह थी या सच में कोई मरा था
सचमुच कोई मरा हो तो दोनों रो लेंगे
जनता का ही  है पैसा मुवावजे  में देंगे
पाँच साल के लिए अब हो गयी कमाई
चाहे  कहे  कोई नेता चाहे  कहे कसाई
खेल राजनीति का पता चल गया है साथी
हम लड़ते रहे  जमाना छल गया है साथी
वो    हिन्दू मरेगा या  मुस्लमान  मरेगा 
लेकिन कोई ना कोई  तों  इन्सान मरेगा
हम लड़ते रह गए  तों यारो  याद  रखना
एक दिन होगा पूरा ही हिंदुस्तान मरेगा

रविवार, 22 अगस्त 2010

एक जंग जारी है अन्दर भी बाहर भी

जब हम सुख भोग रहे होते है
पूरी तन्मयता से,अधिकार और गौरव के नशे के साथ
उस वक्त हम यह रंचमात्र भी नही महसूससते है
की उसी वक्त तैयार हो रहा होता है
किसी दुःख का अनचाहा अनजाना शिलालेख
उस शिलालेख को देखते है हम अचानक
तब ऐसा लगता है सुन्दर स्वप्न देखते देखते
खतरनाक सांप ने जीभ से हमें छू लिया
दुःख और विषाद जब हमें तोड़ रहा होता है
और ऐसा लगता है
की हम सम्पूर्ण जंग हार गए है
अपने ही अस्तित्व को स्वीकारने को तैयार नही होते है 
उस वक्त भी ,हमें सबक देकर तैयार हो रहा होता है
एक स्वर्णिम भविष्य का सूरज
वह हमें ललकार रहा होता है उठ खड़े होने को
और कह रह होता है की यह पास में ही मै हू
आओ मुझे छू लो ,चाहो तों पा लो
अपनी सामर्थ्य भर,अपनी उत्कंठा भर,अपने पुरसार्थ भर
मै स्वय तों हू इस कथानक का पात्र
एक जंग के साथ ,जो भीतर भी है और बाहर भी
की कुछ छण के सुखद सूर्य को कैसे और कितना सहेजू
और किस तरह बिना सहमे और ठिठके
पार कर जाऊ अन्धेरेपन को
यह जंग लगातार जारी है ,अन्दर भी और बाहर भी
और मै सामने दीवार पार लिखा गीता सन्देश वाला चित्र
देखकर कलम रख देता हूँ
और मजबूत कदमो से चल पड़ता हूँ  .

तुम कहा थे जब उन्हें फंसी के फंदे पर लटकाया गया ( जून १९७1 )

तुम कहा थे                                                              
उस दिन
जब उन तीनो को
बेडियो में ले जाया गया
उन तीनो को
फांसी के फंदे पर चढ़ाया गया
फांसी पर चढ़ने वाले
तुम क्यों नही थे
उस दिन
जब साइमन हाय हाय का
नारा लग रहा था
लाजपत गरजे ,डंडे पड़े ,
वो शहीद हो गए
वह डंडा तुमने नही खाया उस,
मौत को तुमने नही अपनाया 
उस दिन
जब जलियांवाला बाग़ में
गोलियां चल रही थी
मौत जिंदगी को छल रही थी
उस दिन कोई नही बचा
तुम हमेशा कैसे बच गए
जबकि तुम तों हमेशा लक्ष्य पर होते थे,
क्योकि मंच पर होते थे
उस दिन
जब वह सिंगापुर से चल कर
भारत की भूमि पर आया था
उसने भारत भूमि पर झंडा लहराया था
तुमने साथ नही दिया था
केवल मुकदमा लड़ कर
कर्तव्य पूरा कर दिया था
उस दिन
जब तुम जैसे ही गद्दार की गद्दारी पर ,
गद्दार पुलिस वालो ने
उसे अल्फ्रेंड पार्क में घेर कर गोली मारी थी
उसकी जगह तुम क्यों नही मरे थे
क्योकि तुम्हारी गोरो से यारी थी
तुम उनकी सत्ता को और आगे बढ़ा रहे थे
ना अस्त होने वाले सूरज को
और ऊपर चढ़ा रहे थे
क्यों अहिंसा की बात कर
लोगो को चलती गोलियों में छोड़
तुम पुलिस वैन में घुस जाते थे
होई थी हिंसा, आती थी मौत,
तुम नजर नही आते थे 
क्यों मिला औरो को नरक और
तुमको ए क्लास जेल की कोठरियां
औरो को गुमनामी ,तुमको सत्ता
औरो को भूख तुमको कुर्सी सुविधाएँ
तरह तरह का भत्ता
क्योकि तुम गद्दार थे गोरो के यार थे
तुम कौन होते हो हमें देशद्रोही बताने वाले
हमारे ही संविधान द्वारा
हम पर लाठी और गोली चलाने वाले
तुम्हारा चेहरा साफ नजर आने लगा है
तुम्हारी लफ्फाजी और कोरे भाषणों का
रहस्य समझ में आने लगा है
भूख ,बेकारी और गरीबी की दुहाई देकर
कुर्सी का खेल खेलने का नाटक और नही चलेगा
अब
भूखा मजदूर ,नंगा किसान जाग रहा है
इनका सम्मिलित तूफानी स्वर जागेगा
इनके स्वर में लफ्फाजी नही होगी ,
नारेबाजी नही होगी
अगर होगा तों शहीदी रक्त होगा ,
मचलती आग होगी
जिसमे जल कर
तुम्हारे सारे कुत्सित हथकंडे भष्म हो जायेंगे
ये करोडो इन्सान जिनसे मिल कर बना है
देश हिदुस्तान
अपनी सच्ची आजादी का जश्न मनायेंगे .

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

कुछ इधर की कुछ उधर की

१- ना दो बन्दूक मेरे हाथो में
   हो जायेगा खून कुछ तथाकथित समाजवादियो का
    जो सत्ता,औरत ,धन और जमीन देख 
    कुत्ते की तरह जीभ लपलपाते है                                        
    सभी को कमजोर और गरीब बनाते है
    सूंघ सूंघ कर खा जाते  है हमारा माल
    फिर थपकी देकर कहते है खुद को सम्हाल

२-मै एक सार्वजानिक चौराहे पर खड़ा था
   सामने एक गरीब मुर्दा पड़ा था
   तमाम समाजवादी जहाज से उतर
   बड़ी बड़ी गाडियों में आ रहे थें
   साथ साथ चमचे नारा लगा रहे थे
   इसे ना भूख है ना प्यास है
   क्योकि ये सच्चे समाजवादी की लाश है

३-रामकली ने देखा और भोगा की
   गरीब औरत की कोई इज्जत नही है
   उसकी इज्जत की कोई कीमत नही है
   ऊँचे घरो में रहने वालो की इज्जत है कीमत है
   तों उसने अपनी इज्जत बेंचना शुरू कर दिया
   हर बड़े से उसकी इज्जत खींचना शुरू कर दिया
   और अपना घर इज्जत यानी पैसे से भर दिया
   अब उसके पास भी कोठी है कार है
   उसका भी बहुत फैला हुआ कारोबार है
   अब बड़ो के लिए उसका घर स्वर्ग का द्वार है
   अब वह भी समाज में बहुत इज्जतदार है 

४-एक माह से राशन की लाईन लगा लगा
   एक आदमी शहीद हो गया
   बेचारे ने बस आँख मुदा और चिर स्वप्नों में खो गया
   दो चार दी बाद जब सड़ी हुई लाश से बदबू आई
   तब लोगो ने उसे देखा और फिर भीड़  घबराई
   नाक दबाये कुछ लोग उसके पास आये और पूछा
   भाई तुम्हे क्या हो गया है राशन कुछ दिनों में मिल जायेगा
   आखिर कहा खो गया है
   मजबूती से लाइन में लग जा वरना पीछे वाला
   बड़े लोगो के बच्चो की तरह धक्का देकर आगे बढ़ जायेगा
   और फिर तू अगले साल तक राशन नही पायेगा
   तू यहाँ पड़े पड़े समाजवाद की लाश  बन जायेगा
   तभी आकाश से आवाज की  आई सुन मेरे भाई
   जनता को दो से ही आशाये और निराशाए होती है
   एक नेता से एक भगवान से
   नेता तों कुछ देने से  रहा   
   उसका तों सब उसके ख़ानदान  के लिए ही  कम है
   जब नेता ने राशन नही दिया, मै छला गया
   इसलिए राशन मांगने भगवान के पास चला गया

बुधवार, 18 अगस्त 2010

इतिहास ने खून चूसने वालो का नही खून बहाने वालो का साथ दिया है

विषधरो ने फन फैला रखे है
और उनके फन फैलते फैलते धीरे धीरे इतने बड़े हो गए है
की उन्हें छोड़कर पूरा समाज उन फनो की छत्रछाया में आ गया है
फन के बाहर कुछ बचता भी तों नही है
फन ही धरती बन गए है फन ही समुद्र और आकाश भी
घुटन होने पर भी समाज के कुछ जीव जिनमे कुछ गर्म लाल खून है
केवल छटपटा पाते है, भागते है संघर्ष करते है
पर एक फन से निकल कर दूसरे फन तक ही पहुच पाते है 
धीरे धीरे फनो ने विष उगलने और खून चूसने की मात्रा बढ़ा दी है
लोगो पर उनका कसाव और दबाव भी बढ़ता जा रहा है
इस दबाव और कसाव के कारण कुछ लाल खून वाले जीव एकत्र होने लगे है
और अपने लाल खून तथा अपनी गरमी को मिला कर एक लाल समुद्र
अथवा एक ज्वालामुखी बना देने का प्रयास करने लगे है
जिस दिन यह ज्वालामुखी तैयार हो जायेगा
उस दिन निश्चित ही सारे फन कांपने लगेगे  
जिस दिन यह फूटेगा फन भी जलने लगेगे
फनो की जगह राख दिखलाई पड़ेगी जो खाद का काम देगी
और सारा गर्म खून उसे सींचेगा
तब जो जुताई होगी और फिर जो फसल तैयार होगी
उसे हमेशा की तरह केवल फन नही सारे जीव खायेंगे
तब समाज के जीवो में अपना खून होगा गर्म खून
अपनी छत्रछाया होगी अपनी दिशाए तथा अपने फैलाव होंगे
ज्वालामुखी तैयार करने की प्रक्रिया में मैंने भी अपने को भट्ठी में झोक दिया है
सिंचाई के लिए अपने खून का कतरा कतरा निचोडना शुरू कर दिया है 
सबके साथ मेरा भी खून रंग जरूर लायेगा
क्योकि इतिहास ने खून चूसने वालो का नही खून बहाने वालो का साथ दिया है .

खुशिया तों लोगो ने लूट ली दर्द का आचमन मैंने ही लिया

जितना भी लोगो ने उगला है जहर सारा मैंने तों पी लिया
कोढ़ बन गयी मेरी जिंदगी हस हस कर मैंने तों जी लिया 
कैक्टशिया खुशियों में दिन मेरे बीते है
लगता सब हरा भरा  अन्दर से रीते है
सेमल के फूल की खुशबू है तन मन में
कितने खुशनसीब जो मेरी तरह जीते है 
हंसने के उपक्रम से अभिनय तक कुछ पल मैंने तों जी लिया
मीरा ने तों एक दिन विष पी लिया था
पर मै  हर पल ही विष में जी रहा हूँ
लोगो ने तों  मौत के जहर पिए होंगे
पर मै तों जिंदगी का जहर पी रहा हूँ
दर्द ने सीमाए सब तोड़ दी पर ओठो को मैंने तों सी लिया 
तन तों भला चंगा है मन में कैंसरिया गम
हंसने के अभिनय  से नही  छुपा पाते हम
आँख से आंसू नही है खूने जिगर बह रहा 
मौत धोखा दे गई जिंदगी बन गई सितम
खुशिया तों लोगो ने लूट ली दर्द का आचमन मैंने ही लिया

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

जयप्रकाश जयप्रकाश रट रट के लोग   यहाँ देश के प्रधान और मंत्री बन आये  थे,
साथ साथ चीखते थे क्रांति क्रांति उनके वे चौहत्तर में क्रांति का शंख जो बजाये थे|
समझी थी जानता कुछ भला करे देश का ये इसीलिए वोट उनको ही डाल आये थे,
पर पता चला की एक सत्ता को हटा के यारो सत्तालोलुपो  की पूरी फ़ौज ले आये थे|

लोकतंत्र लोकतंत्र की तों बात सब करे पर लोकतंत्र का मतलब ना कोई जानता
लोकतंत्र नही ये तों भीडतंत्र है यारो डंडे गोली बिना  यहाँ कोई बात नही मानता
समझे है अर्थ  सब जो चाहे सो  करे चाहे  कोई मारे और  चाहे  कोई  मर जाये
लोकतंत्र वहा नही चल सकता है  देश जो अधिकार   और कर्त्तव्य ना पहचानता

हर वर्ष मनाते हो आजादी दिवस पर अब तक देश में आजादी नही आई है
चारो ओर भूख भ्रस्टाचार बेकारी  यहाँ आजादी पे कैसी बदली  सी छाई है
भरे है गोदाम के गोदाम इस देश के पर फिर भी  कैसे बढ़  रही  महंगाई है
नही तेरी मेरी नौकरशाह व्यापारी नेता इनकी खातिर आजादी चली आई है

जब तक इन्कलाब का स्वर फूटेगा नही  तब तक देश में आजादी नही आएगी
जब तक भ्रष्टाचारियो से पिंड छूटेगा नही तब तक देश में आजादी नही आयेगी
जब तक फसेंगे नही नेता नौकरशाह यहाँ और  व्यापारियों को जेल हो जाएगी
सुनो ये कह रहा हूँ इस देश में यारो  जनता के जागे बिन आजादी नही आएगी

जाति और संप्रदाय का ही बोलबाला यहाँ तब लोकतंत्र भला कैसे रह पायेगा
नेता चुनाव लड़े नीतियों और आदर्शो पर भ्रष्टाचारी पूंजीपति कैसे सह पायेगा
इतना जहर भरा है लोकतंत्र की जड़ो में कोई भी हो कुछ भी नही कर पायेगा
लोकतंत्र  तभी जिन्दा होगा इस देश में  फूट कर जब सब मवाद बह जायेगा 

                       संसद  में  हल्ला  मचाते  है  हम
                       जूते  और  चप्पल  चलते  है हम
                       लाशो पर चल कर आई  आजादी 
                       शहीदों को  कैसे    लजाते  है हम

लिखा वेद शास्त्रों  में आएगी प्रलय कल हमने इसी  के लिए रास्ता बनाया है
नही कही भूख है नही है बेकारी कही सारा पैसा परमाणु भट्ठी में लगाया है
परमाणु बम से ही भूख  मिटाना अब दाया और बांया हाथ इसी में जुटाया है 
दोनों हाथ कल झगडा करे ना कही इसीलिए दोनों को ये झुनझुना थमाया है

झगडा किया जो कल दांये बांये हाथ ने झगड़े में  सारा ही शरीर जल जाना है
मिट गया शरीर तों कल फिर बचेगा क्या किसलिए  इतना सब कुछ जुटाना है 
किसलिए बनाये जा रहे  परमाणु बम जब की पता है किसी काम नही आना है
इन्ही पैसो से मिल सकता उन्हें जीवन जो भूखे नंगे है और ना कोई ठिकाना है

जीवन में आई है एक नई बहार रे ------ [ 3-1 -1983 ]

कल तक जीवन में पतझड़ था कल से जीवन में आई है एक नई बहार रे
कल तक जीवन में बदली थी ,कल से जीवन में आई है एक नई फुहार रे
कल तक थी अंधियारी रातें ,कल थी बस  तीखी  बातें
कल जीवन में था सूनापन कल तक थी कडवी सौगातें
कल तक  जीवन में मिलता था हर तरफ अंगार रे
कल .....................................................................................
कल जीवन में आभा चमकी कल ही तों इक बगिया महकी
कल जीवन में फूल खिला है जीवन में कल खुशियाँ  चहकी
कल से बस अपना बना है  एक नया ही संसार रे 
कल .....................................................................................
अब दुनिया में अपना भी एक आंगन है,  इस आंगन  में आया अपना  सावन है
अब ये जीवन की खुशियाँ सब अपनी है अब अपना जीवन खुशियों का जीवन है 
सूखे जीवन में मिला है अब जा के  एक प्यार रे
कल ........................................................................................
कल जीवन में नई रोशनी  लायेंगे कल जीवन  की बगिया  को  महकाएँगे
कल का अपना जीवन दुनिया देखेगी कल जीवन को खुशियों से चह्कायेंगे
अब जीवन में भरनी खुशियाँ तों अपरम्पार रे
कल तक जीवन में पतझड़ थ कल से जीवन में आई है एक नई बाहर रे .    
                                                             

सोमवार, 16 अगस्त 2010

पेरुम्बुतूर की शहादत

पेरुम्बुतूर की शहादत
आज भी समूचे देश को याद है ,लगता है कल की ही तों बात है
यू तों सत्ता के बहुत से नायक जिन्होंने देश की खातिर नाखून भी नही कटवाया
उन पर तथा गाँधी परिवार पर लगातार कीचड डालने की कोशिश की
कौन भूल पायेगा ,वह पल जब देश के गद्दारों के एक धमाके से
टुकड़े टुकड़े हो गए रास्त्रनायक राजीव गांघी के
जिसे कहा गया था दुनिया का सबसे खूबसूरत राजनेता 
उसी को बदसूरती से दुनिया से विदा कर दिया गद्दारों ने
आंसुओ में नहा उठा समूचा देश ,रो पड़ी माताएं ,
विह्वाल चीख में डूब गयी पूरी पीढ़ी, जो भविष्य की आस्था भरी निगाहों से  
राजीव के एक एक सपने का जन्म होते देख रही थी ......
अवाक् पूरा देश था ,परिवार स्तब्ध और मूक
दौड़ पड़े सभी पेरुम्बुतुर की तरफ
उस दिन पेरुम्बुतूर में ............
कातर  प्रियंका ने झुलस गयी एक उंगली को देखा
बोली देखो ना माँ उसी को पकड़ कर मै चलना सीखी
उसी को पकड़ कर मेरे पांव जमीन पर टिक सके
विह्वल राहुल ने दिखाया एक हाथ
बोला माँ यही है वो हाथ जो मुझे गोद में उठाते थे ,झुलाते थे
पापा ने इसी से आसमान की तरफ उछाल कर कहा था
बेटे उतने बड़े हो जाओ पर देश को उसे भी ज्यादा ऊंचाई पर ले जाओ
सोनिया ने देखा एक तरफ पड़ा हुआ सीने का हिस्सा
देखती रही अलपक इस उम्मीद में की शायद अभी दिल धड़क उठेगा
जो धड़कता था मेरे लिए ,बच्चो के लिए और उससे ज्यादा देश के लिए
मन में एक पल के भीतर गुजर गए याद के कई दशक ....
"इस शरीर में देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी "
तभी दिखा चेहरा और खुली हुई आँख जो शायद पूछ रही थी
मैंने तुम्हे पास आने दिया नलिनी अपना समझ कर और तुमने ...
मैंने तों किसी का कुछ नही बिगाड़ा था बस की थी कोशिश
देश को दुनिया के साथ या और आगे दौड़ाने की ,उसमे सब आगे होते
उस आँख में इकीसवी सदी के भारत का सपना थरथरा रहा था
व्याकुलता में समेट रहे थे राहुल ,प्रियंका और सोनिया शरीर का एक एक टुकड़ा
ताकि हिन्दुस्तानी परम्परा से एक शहीद का ,पति और पिता का अंतिम संस्कार हो सके .
और वह भविष्य के सपने देखने वाला  खूबसूरत राज नेता विलीन हो गया |

शनिवार, 14 अगस्त 2010

दरवाजे कि कुण्डी खटकी मत खोलो दरवाजा जी

दरवाजे की कुण्डी बोली ना खोलो दरवाजा जी
डाकू सारे निकल पड़े है बजा रहे है बाजा जी   |


थाने बाहर ह्त्या हो गई थानेदार मुह फेरा जी
सट्टा,मटका दारू भट्टी वही है उसका डेरा जी
भले आदमी दूर दूर और गुंडे घर के अन्दर जी
हर घटना में हिस्सा तय है ये तों बड़ा कमेरा जी


मेले में ही लाज लुट गयी लाज नहीं थी आइ जी
वो चीखी थी बचा लो भैया पर नहीं कोई भाई जी
अपने घर कि लुटती कायर तब भी ऐसा करते जी
गुंडा छूट गया इज्जत से नहीं थी कोई गवाही जी


बस्ती से बच्चा उठा ले गए जी था वहा अँधेरा जी
समझो ये बस्ती में हो गया अब गुंडों का घेरा जी
नानी मर गयी जाने दो प़र मौत तों घर देखा जी
उसका बच्चा वो उसका था पर अब नंबर तेरा जी


अध्यापक है विषय अलावा बाकी सब है जाने जी
बहुत बड़ा धन पशु बनना है मन में ये है ठाने जी
कई गाड़िया कई हो बंगले तब अपना जी माने जी
मुर्गा विस्की, नई नई शिष्या तब गायेंगे गाने जी


आसमान में ईश्वर अल्ला नीचे तों पत्रकार है जी
राम कृष्ण को राह दिखा दे ये इतने फनकार है जी
गाँधी नेहरु या सुभास सबको इनकी दरकार है जी
जब चाहे जिसकी बनवा दे सब इनकी सरकार है जी


ये अफसर आज के राजा इनका है क्या कहना जी
एक परीक्षा  फिर देश को साठ साल तक सहना जी
कुछ ना करना काम टालना आँख में पैसा रहना जी
गंगा जमुना कही से आये , इनके घर से बहना जी


ऊपर वाले से ये मिलवाते इनका बड़ा है खेला जी
क्या क्या बेचे क्या ना बेचे इनका बड़ा झमेला जी
सादगी पर प्रवचन होगा पर करोड़  का मेला जी
सुन्दरियो कि बड़ी फ़ौज है इनका हरम अलबेला जी


अरबपति व्यापारी है दानी रोज नहाते गंगा जी
नकली बेंच मिलावट कर  दबा दिया है चंगा जी
इनके घर में मने दिवाली औरो के घर मातम जी
धंधे में उन सबका चंदा जो लूट करे या दंगा जी


नेताजी थे सुभाष बाबू पर ये भी नेता कहलाते जी
उन सबने सब कुछ छोड़ा ये सब है घर ले जाते जी
ससद से भत्ता और सुविधाए बाहर मन बहलाते जी
देश बच गया खाने को है बाकी सब कुछ खाते जी


भारत है कितना महान कि फिर भी बढ़ता जाता जी
भारत के गौरव का सूरज , ऊपर चढ़ता जाता जी
हम थोड़े ईमानदार होते तों भारत का क्या होता जी
सबसे आगे होता भारत और हसती भारत माता जी

मैं खडा रहने की कोशिश करता हूँ

मै खड़ा रहने की कोशिश करता हूँ
कोशिश करता हूँ की मै भी चलता रहू और जिंदगी भी
साथ चलने वालो को कोई दुःख ना हो कोई कमी ना लगे
लेकिन लगता है की मै उतना समर्थ नहीं हूँ जितना वो

पहले बड़े बुरे बुरे समय देखे बल्कि बदतर समय देखे
लेकिन हारा  नहीं मै कभी भी, हिचका भी नहीं मै
पर अब हारने तों नहीं हिचकने लगा हूँ
मेरा तों मूल वाक्य रहा है
की मै हरूँगा नहीं ,रुकूंगा नहीं
क्या मेरा अकेलापन मुझे हरा देगा मुझे झुका देगा
प्रयास तों अंतिम समय तक करूंगा की चलता रहू, चलाता रहू
सब उसी शान से, उसी दृढ़ता से, उसी सम्मानजनक व्यवस्था से
लेकिन मै ईश्वर नहीं साधारण मनुष्य हूँ
जब तक सामर्थ्य है तभी तक चलूँगा
जब तक हिम्मत है तभी तक रुकूंगा
फिर मेरा भी तों सफ़र और गंतव्य निर्धारित है
मेरा शरीर हो ,मन हो ,दिमाग हो या हिम्मत
सबकी सीमाए तों निर्धारित है
फिर सकल्प तों यही है की उनकीं कमी मेरे अलावा किसी को ना खले
चाहे जितना भी संघर्ष किया है अब किसी का जीवन संघर्ष में ना पले
जब साँस है, आस है, मै हूँ, हारूंगा नहीं,
रुकूंगा नहीं,तकलीफों और संघर्षो के सामने झुकूंगा नहीं |

बहुत दुखी है मेरा जीवन

बहुत दुखी हूँ, मेरा जीवन, जीवन क्या, दुःख की परिभाषा,
ना कोई रस्ता, नही उजाला,ना कोई साथी, ना कोई आशा
पर जीना है, बहुत काम है, बहुत सफ़र है, मना है थकना
दुःख की  छोडो, साहस जोड़ो, पढो  केवल संघर्ष की भाषा

पकिस्तान के नाम पत्र

पकिस्तान के नाम पत्र 

छोटी छोटी बाते छोडो 
ओछी हरकत 
बिना बात की नफरत छोडो 
आओ बैठो बात करे
सैतालिस से बहुत लड़ लिया 
हमसे नफरत बहुत कर लिया ,
आओ नई शुरुआत करे
 
इन सालो में क्या पाया है 
अमरीका की भीख पर जीना 
पाक बना क्या इसीलिए था  
आजादी से अब तक केवल 
मौत और बन्दूक का शासन 
देश बटा क्या इसीलिए था
बटवारे से घटे ही हो तुम 
और हमने खुद आकाश छू लिया 
सारी दुनिया मान रही है
बंदूके दे भेज रहे अपने बच्चे 
की वे मेरे बच्चो को मारे 
बटवारा क्या इसीलिए था
 
याद करो हम लड़े रहे थे अंग्रेजो से 
हिन्दू ,मुस्लिम सिख, ईसाई 
तब  क्या सपने थे
उन अंग्रेजो के पैसो से 
हर बार लड़े तुम मुह की खाई 
पर मरने वाले दोनों ही अपने थे
तुमने तों घायल कर डाला 
अपने तन को मेरे मन को 
क्या मिला तुम्हे बस कुछ डालर
गर ना लड़ते ना बटते 
दोनों बाजू ना कटते 
कितनी ताकत होती 
अपनी क्या कहने थे


टैंक नहीं उस पैसे से 
नहरे बांध और टंकी बनाये 
जो प्यासे हो खेत औ घर 
पानी पहुचाये
जो भी पैसा खर्च हो रहा  
सेनाओ पर 
इससे बनें स्कूल फैक्ट्री 
जीवन को आसान बनाये
भूख गरीबी और बेकारी 
उधर है तो इधर भी 
दुनिया की सारी बीमारी 
उधर है तों इधर भी
लड़ना छोडो 
आओ मिल कर इन्हें भगाए 
जर्मनी ने तोड़ दिया 
अब हम भी दीवार गिराए

हमने हाथ बढाया है 
दिल से आवाज लगाया है 
तय कर के आओ 
आओ मिल कर  बात करे 
अब न समय बर्बाद करे ।
हम थे  तुमको  दिल दे बैठे तुम थोडा भी निभा ना पाए
और ये भी कैसा इंतजार था मौत आ गई तुम ना आये

बस ये  मुझको मंजूर नहीं था कोई तुम्हे बेवफा बताये
बाहर तक आते देख किसी को हाथ हिलाते पर ना आये

धन दौलत के इस बाजार में दिल का सौदा मै कर बैठा
मै फ़कीर और इतनी जुर्रत, तुम इसको ही पचा ना पाए

बड़ी सी कोठी, कार बड़ी सी, दौलत होगी  प्यार ना होगा
अपने पास भी दौलत दिल की बहुत बड़ी थी दिखा ना पाए

कितना पागल, ढूढ़ रहा हूँ प्यार और वफ़ा  इस दुनिया में
होती तिजारत यहाँ प्यार की दिल को हम समझा ना पाये

ना कानून  ना कोई सजा है तों फिर क्या तुम दिल तोड़ोगे
दिल की अदालत वफ़ा की सजा ये किताब हम पढ़ा ना पाये

रोने धोने की आवाजे, कैसा बिस्तर, कैसे कांधे, अब जाना है 
बहुत भीड़ है सभी खड़े है मै जाऊ तों कैसे जाऊ तुम ना आये  








 





                                                                             

नेता जी भाषण कर रहे थे आओ मन्दिर मन्दिर खेले

नेताजी भाषण कर रहे थे ,
आओ मंदिर मंदिर खेले ,
लोग द्वापर,त्रेता भूल गए है ,
उन्हें मंदिर की तरफ धकेले|
यह देश है महान ,
यही पैदा हुए करोडो देवता और कई भगवान,
इसलिए तुच्छ इंसानों हमारी बात मानों |
मैंने कहा नेताजी
यही किसी ने नहाती हुई औरतो के कपडे चुराया था ,
किसी को केवल धनुष छू लेने से गुस्सा आया था |
भगवान होते हुए युद्ध नहीं रोक पाए ,
महाभारत करवाया था |
यही स्त्री और राज्य जुए में हारे थे
पर वे महान थे ,
एक औरत को पांचो ने बना लिया पत्नी
फिर भी चरित्रवान थे |
औरत भगाई वे अच्छे थे ,
हाथी और आदमी में फर्क नहीं किया
कितने सच्चे थे |
यह देश इतना महान था,
आशीर्वाद से बच्चे पैदा करने का
केवल संतो ,इन्द्र और सूर्य को ज्ञान था |
यहाँ आदर्श है और
उसके लिए बहुत संघर्ष है,
जयद्रथ अभिमन्यू भीष्म के वध
यही सन्देश देते है ,
एकलव्य का अंगूठा और बाली की हत्या
यही सन्देश देते है |
यही सीता को आग में चलाया गया
और बच गई तों जंगल पहुचाया गया |
इन्द्र ने अहिल्या से किया व्यभिचार
और ऋषि ने उसे पत्थर बनाया |
राम ने फिर औरत बनाया की
फिर कोई इन्द्र ले इज्जत उतार,
ताकि कोई भगवान कर सके उद्धार|
यहाँ जब किसी ने तप और साधना किया तों ,
उसे राक्षसों ने कम देवताओ ने ज्यादा उजाड़ा ,
कभी रम्भा ,कभी मेनका से
उसका इमान बिगाड़ा |
कोई देव ना बन पाए ये लड़ाई पुरानी है ,
जी हा आज कोई अच्छा ना रहे
यह उसी सीख की निशानी है |
मैंने कहा नेताजी क्या क्या बताऊ ,
करोडो देवो में से
किसके किसके किस्से सुनाऊ,
नेताजी तमतमाए ,
मुर्ख अज्ञानी धर्म के खिलाफ बात करता है,
नहीं डरता है ज्यादा पढ़ गया है
प्रगतिशीलता का बुखार चढ़ गया है|
नहीं जानता बड़े सिर्फ बड़े ही महान होते है.,
भगवान केवल राजाओ के यहाँ ही पैदा होते है ,
वही बड़े ज्ञान होते है|
हमें उनके कर्म और विचारो पर
चिंतन का अधिकार नहीं है,
अगर कर रहे है तों धर्म से प्यार नहीं है |
ऐसा करने वाला नरक में जायेगा,
बड़ी सजा पायेगा |
हमने कहा नेताजी क्या होता है
नरक और उसकी सजा ?
पैदा होने से पहले बच्चे को पेट से निकाल
चाकुओ से गोद कर जलाना ,
किसी ट्रेन कार या घर में चीखते हुए जलना,
राख की ढेर में अपनों की लाश चुनना |
जली बस्ती में अपना घर तलाश करना,
बिना कारण अंजानो के हाथ मरना ,
भूखा रहने पर आत्महत्या या शरीर बेचना ,
पेट भरने के लिए चिता से लाश
और कफ़न खींचना |
लोग भूख ,बेरोजगारी ,
लाचारी क्या क्या सह रहे है,
आप नरक से डर की बात कह रहे है |
आपके देव कहा चले जाते है
जब उनका ही कोई तडपाया जाता है  ,                                                
किसी को विष, किसी को गोली,
किसी को सूली पर चढ़ाया जाता है |
करोडो के पेट हो ख़ाली पर
करोडो लीटर दूध नाली में बहता है ,
करोडो लोगो का खाना हवन में जलता है ,
मंदिर के तहखाने में होता है
व्यभिचार और हत्या,
थैली देख मंदिर में पूजा कराइ जाती है,
जहा अबोध बच्चा
दूध या दवा के बिना मर जाता है ,
पापी सबका हिस्सा अकेले चर जाता है
इसलिए नेताजी जानता को मत बहकाओ ,
मंदिर मस्जिद लाशो पर नहीं
इन्सान के दिल में बनाओ |
उसमे इमान और कर्म का भाव जगाओ ,
नफ़रत की नहीं प्रेम की गंगा बहाओ |
राम ,नानक ,अल्ला ,ईशा
किसी के नाम का राज बनाओ ,
उसमे
भूख बेकारी महामारी पाप अत्याचार ना हो,
कफ़न  मौत और वोट का व्यापार ना हो,
वरना जनता जाग रही है ,
इसीलिए तुम्हारे नकली धर्म से भाग रही है |
अगर आया उसकी शांति में अवरोध
तों
तुम सब अंतिम बार दण्डित किये जाओगे ,
ताकि मानवता को खंडित होने से बचाया जाये ,
अलग अलग ईश्वर का भेद मिटाया जाये,
लोगो को मारने लूटने और जलाने वालो का नहीं,
बनाने और बढ़ाने वालो का समाज बनाया जाये|
जब हर इन्सान के दिल में आ जायेगा
नानक अल्ला ईशा और राम ,
तों एक नहीं करोडो धर्मस्थल
अपने आप बन जायेंगे|
ना जमीन का झगडा ना ईंट ना गारा
ना दीवार ना दंगा ना हत्या,
चारो तरफ मंदिर मस्जिद
चर्च गुरद्वारा नजर आयेंगे |
नेताजी आइये ऐसी दुनिया बनाये ,
नरक को मिटाए,
मंदिर मंदिर मस्जिद मस्जिद नहीं
बल्कि इन्सान इन्सान खेले,
नेताजी स्वयं सहित सबको
इंसानियत की तरफ धकेले |.

कैसा लगता है अकेलापन

कैसा लगता है अकेलापन 
छोटे होते है तों डर जाते है माँ बाप का साया जरा सा हिलते ही
फिर अच्छा लगने लगता है अकेले में बैठना ,अकेले सोचना
बुनना ख्वाब तरह तरह के अपेक्षित औए अनपेक्षित भी
फिर कोई चुपके से प्रवेश कर जाता है अपनी नाव में बेअंदाज
चलने लगते है चप्पू अलग अलग दिशाओ से अलग अलग उर्जा से
अलग अलग विश्वाश और अविश्वाश से
फिर मरा मरा, राम राम होने लगता है 
औए चप्पू की दिशा ,वेग तथा लय,लयबद्ध हो जाती है
चलने लगते है नाव में साथ साथ
समय ! नाव में कुछ मासूम ,रक्तिम अनुभूति वाले सवार बैठा देता है
पता नहीं कहा तक साथ चलने के लिए नियति के अनुसार
आदत पड़ जाती है इन नाविकों की, जीवन को ,चिंतन को,भावना को
किसी पड़ाव पर किसी कारण से उतर पड़ता है कोई एक भी
तब सन्नाटा पसर आता है जीवन में,उतर आती है शाम भरी दोपहरी में 
कही ख़ाली हो जाता है मन का हर कोना,डंक मारने लगता है अकेलापन
याद आने लगती है वो चाय की प्याली ,केक की सुगंध ,चाय की छलकन
और हर वक्त  सहारा बनाए को उत्सुक एक स्वर
सभी स्वर और आवाजे बदल गयी है
कल सुबह सब कुछ लौट आएगा और चहचहा उठेंगी सभी दिशाए
फिर जीवन की नाव चलने लगेगी
उसी दिशा में पूरे विश्वाश ,वेग और समर्पण के साथ 
पूरे आवेग के साथ चप्पू दोनों तरफ चलेंगे ,
नाव सही दिशा में चलेगी
साथ बैठी सवारियां फिर हौसलाआफजाई करेंगी
अपनी मासूम अभिव्यक्तियों के साथ
एक विश्वाश होगा की जब चाहो चप्पू को कई हाथ चलना शुरू कर देंगे
उनका सम्वेत स्वर ,समग्र शक्ति और समर्थ भावना भिगो देगी सभी को
अकेलापन दूर से देखेगा उदास होकर
जब ईश्वर ही अकेला कर दे तों
अब ना चप्पू चलेंगे ना नाव चलेगी ,ना कोई स्वर गूंजेंगे
पूर्ण विराम .

वो अपने आप पर हंसता है मुस्कराता है

वो अपने आप पर हँसता है  मुस्कराता है
तभी एक पत्थर उसकी तरफ को आता है|
.
जमी पर उतरा है तब से ही बड़ा घायल है
लोगो के दिए गमो को पका कर खाता है |.

उसको भी आसमा को छूने की चाहत थी
जमी पर घायल है पंखो को फडफड़ाता है |

अपने पांव पर चलने की बड़ी कोशिश की
मिली अपनों से चोट तों वो लडखडाता है |

क्या बात, उसे मंजिल कभी नहीं मिलती 
खुदा भी उस पर क्यों  नहीं तरस खाता है |

खुदा ने उसको नहीं अपना करम माना है
तभी तों उसके करम मिट्टी में मिलता है |

वो डाकिया जो सबको ही चिठ्ठियाँ देता
उसके घर के सामने से निकाल जाता है |

मंजिल जब कभी होती है पास आने को
उसे फिर कोई गलत पते पर ले जाता है |

वो भी सूरज को माथे पर टांक सकता था 
आज उसका दिया भी तों टिमटिमाता है |

वो चाहता  तों समंदर  में डूब सकता था  
पर फिसलनो पर  वो ना फिसल पाता है |
 
जिसके लिए भी अपने को दांव पर रखा
वो ही हर बार गलत रास्ता दिखलाता है |

वो अपनी जिंदगी का हश्र देख कर हँसता 
जमाना भी  दांतों तले उंगलियाँ दबाता है |

ये जिंदगी है यारो  जीना है इसे मस्ती से
फांकेमस्ती में भी मस्ती से गुनगुनाता है|

में एक और अभिमन्यु

मै
एक और अभिमन्यू!
जीवन के चक्रव्यूह में 
फस गया हूँ
मेरे चारो तरफ
चक्रव्यूह का 
निर्माण करने वाले भी 
मेरे ही है
हाँ, अभिमन्यू की भाति 
मेरे अति निकट के लोगो ने
मेरा शिकार करने के 
सारे जतन कर लिए है
मै लगातार संकोच में हूँ की
इनमे से 
किस पर हथियार उठाऊ
मेरा द्वन्द और भावनाएं 
मुझे रोक रहे है
हथियार उठाने से
परन्तु शिकार कितना ही 
कमजोर क्यों ना हो
और 
घेरने वाले कितने ही बलशाली
मौत सामने देख 
स्वस्फूर्त युद्ध शुरू हो ही जाता है
मै भी चक्रव्यूह से निकलने की 
कोशिश कर रहा हूँ
लड़कर चक्र पर चक्र 
पार करता जा रहा हूँ
पितामह को प्रणाम कर
उनका रथ पीछे धकेल दिया है
लेकिन 
नियति से लड़ने की कला
कोई अभिमन्यू नहीं जानता
लड़ाई जारी है 
और 
चक्रव्यूह पूरे कसाव पर है
और 
मै एक और अभिमन्यू 
चक्रव्यूह में संघर्षरत
संघर्ष और चक्रव्यूह का अंत
ना पांडव को,
ना कौरव को पता है
और 
अभिमन्यू को भी 
पता नहीं होता है .

जीवान रेगिस्तान का ठूंठ

जीवन !कभी कभी रेगिस्तान के सूखे ठूठ के समान हो जाता है
लगता है की कैसे कभी उगा होगा यह पेड़ इस रेगिस्तान में
पानी नहीं ,खाद नही और यह सब देने वाला भी कोई नहीं
उगा तों कैसे उगा ,बढ़ा तों कैसे बढ़ा ,कैसे बना ठूठ यह सवाल निरर्थक है
ठूठ बनकर  लगातार खड़े रहना खड़े रहना खुद में एक बड़ा सवाल है
चारो तरफ आखिरी छोर तक बालू ही बालू,,,,मृगमरीचिका से उम्मीद करता ठूठ 
फिर मरीचिका का भ्रम टूटते ही अंतिम छटपटाहट का शिकार होता ठूठ
फिर एक नई दिशा में पानी का आभास देता बालू का समुद्र
और फिर नए सपनो में आशान्वित हो खो गया ठूठ
खूबसूरत आभा की तिलस्मी का शिकार मुस्कराता हुआ
अंतिम लौ के समान उठान लेता हुआ वह ठूठ
जिंदगी फिर कराहती है बालू की गरमी और इस समुद्र के अकेलेपन से
अपनी ही अपने पर अविश्वाश की कुटिल मुस्कराहट से 
और निहारने लगती है दूर कही दूर
शायद अभी तक तने की कोशिकाओ में कुछ जल बचा है और                                                                          बचा है कुछ संघर्ष करने का माद्दा और सोचने की ताकत
लेकिन यदि कही से बरसात नहीं हुई तों ठूठ तों केवल ठूठ है
और साथ ही चारो तरफ फैले बालू का दूर तक फैला यह समुद्र
लेकिन जल नहीं मिल पाने की तकलीफ तों केवल ठूठ ही समझ सकता है
वह जिंदगी जो ठूठ बन गई है रेगिस्तान की
लोग उसे देखना भी पसंद नहीं करते,कोई उम्मीद नहीं होती है उससे ना
फल की या छाया की
और तपते रेगिस्तान में जहा सब कुछ जल रहा है
लकड़ी को इंधन बनाने की किसे जरूरत है
ठूठ ने सोच लिया कि जिंदगी की अंतिम हार है
तों वह इंधन बनने को भी तैयार है .

क्यो कुछ लोगो के जिम्मे होता है विष पीना

क्यों ! 
कुछ लोगो के जिम्मे होताहै
केवल विष पीना,
गोली खाना ,
सूली चढ़ना
या 
केवल आलोचित होना 
बार बार
उनमे से कुछ तों 
महान हो जाते है
इतिहास के पन्नो में
परन्तु ऐसा भी तों होता है 
की कुछ लोग
रोज खाते है 
गोली लोगो के इरादों की
पीते है विष 
लोगो की भावना की
चढते है सूली 
लोगो की निगाहों की
खाते है केवल 
आलोचना का खाना
पीते है गाली का पानी
सम्हल भी नहीं पाते है 
की
दोहराई जाती है 
यही कहानी
और 
बार बार 
दोहराई जाती रहती है
उसके जीवन भर
और 
महान क्या 
सामान्य भी नहीं हो पाते है
कोई विज्ञानं या मनोविज्ञान
इनकी कहानी 
सुलझा नहीं पाता है
और 
वे अपनी जिंदगी
सुलझाते सुलझाते 
इतने उलझ जाते है
की 
मकड़ी के जाले में 
फसे नजर आते है
और 
वह क्या उसका भविष्य भी
भविष्य के गर्भ में होता है
ऐसा गर्भ !
जिसे 
अल्ट्रासाऊंड भी नहीं बता पाता है .

मैं पत्थर हूँ बिना काम का

मैं पत्थर हूँ बिना काम  का मुझे कहां ले जाओगे,
कथा हमारी मत पूछो, सुन कर पागल हो जाओगे|
क्या बतलाऊं धोखे, कांटे, विष के जंगल भरे हुए,
मत सहलाना दर्द हमारा, तुम घायल हो जाओगे|
वो बच्चे हैं ना
हर हर महादेव और
अल्ला वो अकबर का शोर                                                                      
मौत का तांडव ,चीत्कार
हाहाकार चारो ओर,चारो ओर
और उसी में,.इधर उधर भटकते,
माँ को खोजते दो बच्चे
धर्म नहीं पता,जाति नहीं पता ,
जीवन और मृत्यु भी नहीं पता
जो हसकर बोल दे ,गोद में उठा ले
सीने से लगा ले वे सभी अच्छे
वो बच्चे है ना 
माँ माँ दूधू, माँ माँ रोटी उठो ना माँ 
कटा हाथ और सर पा
उसी से खेलने लगते है
वो बच्चे  है ना
दूसरा, दूध मांगते मांगते
रंग से नहा जाता है, लाल रंगसे
और किसी सीने पर सर रख
उलटने पुलटने लगता है
वो बच्चे है ना
उसने सुना था रंग का मतलब होली है
इसलिए वो भी बोला होली है
दोनों अब माँ और पापा को
पहचानने की कोशिश कर रहे  है
घूम रहे  है आवाज लगाते माँ माँ ,            
सभी औरते उसे माँ लगती हैं
आदमी उन्हें पापा लगते है ,
कैसे पहचाने सर जो नहीं है
सभी से दूध और रोटी मांगकर
थक जाते है दोनों बच्चे
वो बच्चे है ना
नहीं समझते जीवन और मृत्यु का फर्क 
मिल कर फिर खेलने लगते है
बिना जाने की दोनों बनाई गई
दुश्मन कौम के बच्चे
वो बच्चे है ना 
फिर भूख सताती है और
दोनों फिर ढूढने लगते है कुछ
खाना और दूध तों नहीं मिलता ,
मिल जाती है कटार एक को ,दूसरे को त्रिशूल
कटार वाला नहीं जानता कि वही कटार
उसके माँ बाप की कातिल है
त्रिशूल वाला भी नहीं जानता की उसे पकड़ते ही
उसका मजहब चोट खा रहा है
वो बच्चे है ना
समाज के ठेकेदारों ने थमा दिए है
उनके हाथो में मानवता के खिलाफ हथियार
पता नहीं बाद में उनकी जाति क्या होगी
उनका मजहब क्या होगा     
वे गांघी बन मानवता को बचायेंगे 
और दफना देंगे कही गहरे हथियार
या खुद हथियार बन जायेंगे 
मानवता को खोखला करने को
वो बच्चे  है ना
ये तों समाज तय करेगा और
किसको कौन पालता है वो तय करेगा
आओ हाथ में हाथ मिलाये और
इन हाथो में हथियार नहीं किताबे थमाए  
उन्हें हाथ ,पैर और सर कटी लाशो की नहीं
इंसानों की दुनिया दिखाए
वो हमारे ही बच्चे है ना

अचानक काले बादलों ने

अचानक काले बदलो ने अँधेरे का अहसास करा दिया
पढ़ा था[ भूरा बादल पानी लाये ,काला बादल जी डराए ]
गलत हो गयी कहावत  ,काले बादल बरसे खूब बरसे
तन  तों नहीं भीगा लेकिन मन भीग गया अन्दर तक
जब मन भीगता है तों कुछ यादे आ खड़ी होती है सामने
उमस महसूस होने लगती है तन में भी और मन में भी
तन की उमस के इलाज तों मौजूद है कई इस दुनिया में 
लेकिन मन की उमस पर  शायद कोई शोध नहीं हुआ
ये बादल नहीं आते है तब भी डराते है हर किसी  को
आते है तों पहले मन हर्साता है ,कभी कभी तरसाता है
और जब यही बादल फट पड़ते  है जरूरत से  ज्यादा
तों वही जो हाथ जोड़ कर मांग रहे थे ईश्वर से बादल
केवल वे ही नहीं बाकी लोग भी भूल जाते है  जीवन 
ये पानी जो जरूरत है जीवन को ,खेत को ,पशुओ को
वही पानी दुश्मन बन जाता है खेत ,पशु और जीवन का
चारो ओर तबाही का मंजर ,भयावह बहाव और त्रासदी
कितना मुश्किल है कुछ लोगो का जीवन, और आधार
पानी नहीं बरसा तों भूखा रहना खूब बरसा तों भूखा रहना
एक तरफ कुआ एक तरफ खाई ,कैसी इन्होने दुनिया पाई
पानी बरसा लेखक ने कुछ लिखा और मैंने लिखी  कविता 
प्रशासन ने बनाई रिपोर्ट कितना पैसा बटना है यानी चटना है
नेताओ का दौरा, मंत्री मुख्यमंती का हवाई दौरा या हवाखोरी
कुछ पैकेट फेंकते हुए फोटो खिचवाना ,अखबारों में छपवाना
शासन ने दौरा,विपक्ष ने बयान, प्रशासन ने चट्ट,हो गया सब
अब किसान को सोचना है की जीना है या करना आत्महत्या 
मजदूर को सोचना है गाव में रहे या शहर जाये कुछ  कमाए
पढ़ा लिखा जवान मेहनत नहीं अपराध से रोटी की जुगाड़ में है 
जिसकी बेटी की होनी थी शादी ,बीमार माँ और पत्नी का इलाज
जिए या परिवार को जहर खिलाये फिर खुद मर जाये क्या करे
अखबारों और टी वी चैनलों के लिए तों मिल गया काफी मसाला
सोचना नहीं कहा से समाचार लाये क्या क्या  चौबीस घंटे दिखाए
कही ना कही लोग डूब रहे होंगे और ये उनसे पूछ रहे होंगे कैसे है क्या हाल है
इस बाढ़ में शासन की विफलता,प्रशासन का भ्रस्टाचार या विपक्ष की चाल है
डूबने वाले से सवाल मत पूछो ,उसे बचाओ ,हो सके तों उसे  रोटी दिलवाओ
हर साल ऐसा ही होता है, कुछ बाढ़ देख पिकनिक मनाते है ,कुछ कविता लिखते है
कुछ का धंधा और चंदा, किसी की राजनीति, कुछ बह जाते है कुछ भूख से मरते है
फ़िलहाल मेरा शहर बाढ़ से महफूज है दूसरे डूबे तों डूबे ,वे मेरे कुछ भी नहीं लगते
मै आवाज लगा देता हूँ अगर दिन है तों चाय ,पकोड़ी ,रात है तों मौसम का बहाना
थोडा सा नमकीन , बर्फ,ठंडा पानी, सोडा.विस्की की बोतल और गिलास ले आना 
और फिर दो पैग के बाद यादो में डूब जाना ,लिखना ,मिटाना ,आंसू छुपाना
जी हाँ काले बादल क्या आये ,क्या क्या ले आये ,क्या क्या बताये ,क्या क्या छुपाये
अभी तों ए सी कमरे में बैठ खिड़की से बाहर देख कर मन भीग रहा है तन भीग रहा है| .

वही घर वही हम

वही घर है वही हम है वही सब है  मगर हम बेगाने हो गए है
अपना संसार  ,और अपना प्यार था सब  अफसाने हो गए है
.
कैसे कुछ भी मांगू आजकल हिम्मत नहीं पड़ती
कुछ कहना चाहता हूँ तों जबान लडखडाती  है
चाय अमृत लग रही है और खाना लाजवाब है 
जो भी मिल जाये वही जीवन की अजब थाती है

निशाने लोग होते थे हमारे और अब हम ही निशाने हो गए है

हम बड़े हैं हम करेंगे सब, कर्त्तव्य निभाना हमें है
हम तुम्हारे है, तों तुमको आगे बढाना भी हमें है
तुम रुक गए तों अपनी आहुति चढ़ाना भी हमें है
नहीं अच्छा ,जिम्मेदारी हमारी,मर जाना हमें है

नहीं रोते थे ना रो रहे थे  अब तों  रोने के भी बहाने हो गए है

अपना ही टुकड़ा जो बहुत प्यारा है बहुत अपना है   
मेहनत और सलीके से  सब कुछ सम्हाल  रखा है
पता नहीं क्यों फिर भी बहुत संकोच में रहता हूँ मै
जितना संभव नहीं होता उतना मेरा ख्याल रखा है

मेरा जीवन है दिल है दिमाग सब है पर सब वीराने हो गए है

पहले सब कुछ  तय था ऐसा  मुझे लगता था
मै जगू ना जगू पर  ओ बहुत सुबह जगता था
ओ जगाता मुझको था की चाय आ गई साहब
थकन हो ,निराशा हो  और दर्द सब भगता था

अब थकन भी निराशा भी दर्द भी क्या क्या ना जाने हो गए है

अकेला मै बाकी सब अलग कोने में  दिखाई देते
बहुत मुश्किल से ही शायद कुछ शब्द सुनाई देते
मेरा कर्त्तव्य है जुड़े रहना और सब  पूछते रहना
करना है मुझे सब ठीक बहुत से लोग बधाई देते

ख़ुशी कही की, बधाई कही की,और मै,सब अनजाने हो गए है  '

अगर जीवन है तों जीने का बहाना ढूढ़ना होगा
जो कुछ खो गया है  ओ अफसाना ढूढ़ना होगा
गर मुर्दा दिल रहे तों मिट जायेंगे वक्त  से पहले
कोई घाट या फिर कोई  आशियाना ढूढ़ना होगा

दूर इतने आ गए, दर्द इतने भा गए, की दूर आशियाने हो गए है

चलो तलाश करे  की जिंदगी हमें कहा मिलेगी 
जिंदगी ढकी है घने बदलो में, धूप कहा खिलेगी
फटी है जिंदगी की पूरी की पूरी चादर ओढू कैसे
क्या करू कैसे  करू अब ये चादर  कहा सीलेगी

सभी अपने है अच्छे,उन सबके अपने अपने ठिकाने हो गए है
वही घर है, वही हम है, वही सब है ,मगर हम बेगाने हो गए है

उस दिन सुबह गिर गया एक टुकड़ा

उस दिन सुबह सुबह गिर गया
अचानक अपना एक टुकड़ा
ठंडे हाथ ,ठंडे पांव ,निढाल सब कुछ
चार साथ थे, चारो साथ साथ ठंडे पड़ते जा रहे थे
तभी चारो की गर्मी ने टुकड़े में हरकत पैदा किया
खिल गए चारो चेहरे अज्ञात भय के साथ साथ
जब किसी ने कहा की नश्तर चीरेगा टुकड़े को
ज्वालामुखी फट पड़ा था मन के भीतर
कितना मुश्किल से कस कर रोका था उसे
परन्तु उसकी तपन की कालिमा चहरे पर आ ही गई
चेहरा पढ़ लेने का डर भी कौंधा था
चारो अस्थिर है मन से, शरीर से ,आत्मा से
चारो प्रार्थनारत है अपने टुकड़े के लिए
और प्रार्थना स्वीकार हो गई
टुकड़ा फिर चहकेगा चिड़िया बन कर
नाचेगा अपनी रौ में ,हसेगा जाड़े की धूप बन कर
और पूरा प्यार तथा जीवन डाल देगा चाय की प्याली में
फिर चहकेगी चारो दिशाए ,चारो भुजाये ,जमीन और आसमान .