शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

चमचे महान थे ,अब परेशांन है

चमचागिरी चुगलखोरी
ऊपर ऐसी सीना जोरी
राजनीती वाह वाह
चमचे महान है
करतबी इन्सान है
इन्सान है या नहीं
ये बड़ा सवाल है
ये बड़ा बवाल है
जहा कही कुछ मिले
सब चर जाते है
किसी का कुछ भी हो
अपने घर लाते है 
भूख नहीं मिटती है
निष्ठां नहीं टिकती है
मौसी हो मामा हो
सब ही शिकार है
बस पैसा प्यार है
राजनीती ही नहीं
रिश्ते भी व्यापार है 
चमचागिरी जिंदाबाद
चुगलखोरी जिंदाबाद
वफ़ादारी मुर्दाबाद
ईमानदारी मुर्दाबाद
राजनीती का हाल ये
खुद में सवाल ये
पर जवाब कौन दे
इसका हिसाब कौन दे
जो कान का कच्चा है
या मन का मजबूत है
जो सच्चा नेता है
देश का प्रणेता है
राजनीती सत्य हो
सत्य राजनीती हो
बस यही नीति हो ।
चमचे महान थे
अब वो परेशांन है
बस यही विधान है ।



मंगलवार, 20 नवंबर 2012

बड़े ही बेख्याल है, मेरे शहर के लोग

बड़े ही बेख्याल है, मेरे शहर के लोग
खुद में ही सवाल है मेरे शहर के लोग ।

भैये गुरु की आवाजें यहाँ गूंजती रहती
दोस्ती में मालामाल है मेरे शहर के लोग ।

कोई किसी का नहीं और सब सबके है
ये कैसा इंद्रजाल है मेरे शहर के लोग ।

दुनिया को प्रेम सिखाता है ताज का शहर 
नफ़रत से मालामाल है मेरे शहर के लोग ।

ये ताजमहल खा गया लाखो की रोटियां
पर ताज पर निहाल है मेरे शहर के लोग ।

पानी नहीं बिजली नहीं सड़कें नहीं यहाँ
पर खुश है खुशहाल है मेरे शहर के लोग ।

लूटे ,पिटे या गिर ही गए कोई गम नहीं 
चलते  ही मस्त हाल है मेरे शहर के लोग ।

पडोसी के घर डाका या बेटी ही उठ गयी
सुबह पूछते सवाल है मेरे शहर के लोग ।

चाट के दोनो और पीक से भर दिया शहर
हाँ साफ़ सुथरे लाल है मेरे शहर के लोग ।

जुम्मन या रामलाल की बेटी पर चटकारे
हर वक्त रंग गुलाल है मेरे शहर के लोग ।

वोट दिया जाति धर्म या खास वजह से
क्यों  पूछते सवाल है मेरे शहर के लोग ।

चलो तय करे सचमुच बदलेंगे शहर को
पर इसमें सुस्त हाल है मेरे शहर के लोग ।

क्या क्या कहूँ क्या न कहूँ अपने शहर को
मेरे है और मेरी ढाल है मेरे शहर के लोग ।

जिसे भी अपना मान दिल में जगह दे दिया
बने वही जी का जंजाल है मेरे शहर के लोग ।

कवाब ,भंग या शराब संग मस्ती में रहना है
खजाने का करते ख्याल है मेरे शहर के लोग ।

मेरा शहर तो हर  वक्त बस झूमता रहता 
जी हाँ खुद में सुर ताल है मेरे शहर के लोग ।

नाले है घर में बह रहे या घर ही बना नाला
जी हाँ तलैया और ताल है मेरे शहर के लोग ।






गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

क्या रावण जल गया ?



क्या रावण जल गया ?
ख़त्म हो आज रावण ?
जिसे हम कहते हैं रावण
वो बुराइयाँ मिट गयी ?
क्या जीत गया राम
तो कौन सा
जो वन वन भटका
सीता के लिए
और डाल दिया
उन्ही को आग में
भगा दिया किसी के
कहने पर जंगल में
उन बच्चो समेत
जो अभी पेट में थे
क्या रावण ने किया था
इससे बड़ा अपराध
वे अपराध क्या क्या थे ?
कोई ये भी तो बताये
कोई तो समझाए अच्छाई
बुराई की परिभाषा
कौन सी बुराई बड़ी और
कौन सी अच्छाई
हम जलाते रहेंगे रावण
और जिताते रहेंगे राम को
या कभी तय करेंगे ये भी
की क्या होगा दुनिया और
इंसानियत के हित में ?

शनिवार, 22 सितंबर 2012

इतने सालों के बाद दिल्ली को क्या हुआ

इतने सालों के बाद
दिल्ली को क्या हुआ
साठ साल होने पर
परिपक्व होते सब
पर यहाँ तो बचपन
एडियाँ रगड़ता है
आपस में झगड़ता है
रास्ता पता नहीं
वास्ता पता नहीं
अपना पराया हो
कोई खता नहीं
बस खाने का झगडा
फ़ैलाने का झगडा
क्या कमी रह गयी
पालन में पोषण में
संघर्ष में विश्वास में
जो किया जनता ने
इतने सारे सालों में
जो दिया जनता ने
इतने सारे सालों में
दिल्ली सम्हल जाओ
दिल्ली बदल जाओ
वरना इतिहास है
दिल्ली बदलती है
जनता बदलती है
जनता बदल देगी
अपना हक ले लेगी ।



दिल्ली क्या बोलती

दिल्ली क्या बोलती
रहस्य नहीं खोलती
भीतर भीतर खौलती
सबका सब तौलती
क्या होगा अगले पल
दिल्ली नहीं जानती
घनघोर अँधेरा है
ढूँढती सवेरा है
रास्ता दिखाए कौन
वाम तक पहुंचाए कौन
सबके मन में वार है
जेब में कटार है
बस मौका कब मिले
उसका इंतजार है
क्या दिल्ली कल बोलेगी
कुछ मन का खोलेगी
सब कुछ मौन है
रहनुमा कौन है
कोई है या कोई नहीं
ये नयी बात नहीं
दिल्ली बस नाम की 
बेदिल की दिल्ली है
बस मतलब दिल में है
चलाने को हथियार यहाँ
आँखों पर पट्टी बांध
हर कोई है तैयार यहाँ
जिसे चाहे जितना लगे 
पर केवल मेरा भाग्य जगे
दिल्ली का इरादा ये
दिल्ली का वादा ये
दिल्ली खामोश है
अंदर कितना शोर है
सोने का समय है पर
जागरण चारो ओर है
समुन्द्र का मंथन है
विष भी और अमृत भी
जनता को मिले केवल विष
अमृत पी जाते है
भेष बदल राक्षस कुछ
कहानी ये कभी और की
पर दिल्ली में है आज भी
युद्ध अभी जारी है
रक्षस और देवताओं में
दिल्ली और गांवों में ।




सोमवार, 17 सितंबर 2012

कितना बहादुर समझते है

कितना बहादुर समझते है
हम खुद को और सोचते है
कि आसमान पर उड़ेंगे
नाप देंगे समुद्र को
हवाएं हमारी इजाजत से चलेंगी
पहाड़ छोड़ देगा रास्ता
हम जैसे और जहा चाहेंगे
उड़ेंगे खूब उड़ेंगे
हममे आ जाता है भाव
अहम् ब्रह्मास्मि का
पर
एक छोटा सा झटका
एक छोटी सी बीमारी
डरा देती है हमें
जब अबूझ बन जाती है
और हम अचानक
जमीन पर आ जाते है
इन्सान बन जाते है
एक दम उस समय के लिए ।

शनिवार, 25 अगस्त 2012

ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

बारिश आयी
नदिया
खतरे के निशान से
ऊपर हुयी और बह गयी
बाढ आई
बहा दिए लोगो के
घर ,सुख चैन
और ख़त्म हो गयी
बाकी दिनों पूरा देश
पानी को तरसता है
जंतर मंतर और
रामलीला मैदान में
ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

होली नहीं खेलता मै

होली नहीं खेलता मै
बचपन बीतने के बाद से
बचपन कब बीता 
और मै बड़ा हो गया
पता ही नहीं चला
क्योकि 
अपने जिनके कारण हम 
बचपन पकडे रखना चाहते है
वे हाथ छोड़ झटक देते है 
बचपन को
साया देने वाले अधिकार को
खैर 
होली नहीं खेली बहुत साल से
तभी कोई आया 
हवा का झोंका बनकर
खाली जीवन में 
और अपने साथ लायी
एक मुट्ठी बदली और
बंजर जमीन पर नम हवा 
तथा
मुट्ठी भर बदली से निकली 
फुहार ने
उगा दिए कुछ पौधे
होली मै तब भी नहीं खेलता था
परन्तु 
रंगों से सराबोर हो जाता था
अच्छा लगता था
किसी का ठठा कर हँसना
खुद रंगा होकर सबको रंग देना
ठहाकों से तथा अपने रंगों से
मेरी बंजर जमीन पर उगे पौधे
जब एक दिन पहले 
तैयारी करते थे
कपड़ों की रंगों की 
तथा पिचकारी की
अगले सुबह ही उठकर 
शरीर पर मलते थे
तेल या क्रीम ,रंगों से बचने को
फिर रंग फेंकते थे ,बचते थे 
और
खुद रंग भी जाते थे सराबोर
फिर शीशे में खुद को पहचानना 
और
दूसरों को देख कर 
ठठा कर हँसना
फिर प्यार से गोद में बैठ कर 
अपने रंगों से 
सराबोर कर देना मुझे भी
कितना सुखद था ,
कितनी ऊर्जा थी
कितना जीवन था ,
जीवन का अर्थ था
फिर 
अचानक 
बुलावा आ गया किसी का
जहा से आई थी बदली
मै ही भूल गया था 
बादल आते है बरसते है ,
धरती को नमी देते है
कुछ बारिश रुक जाती है
जीवन बन कर 
जीवन के कुए में ,
तालाब में या झील में
और 
कुछ को 
सूरज सोख लेता है वापस
और 
पहुंचा देता है वही हर बूँद को
जहा से उसे दुबारा 
तय करना होता है सफ़र
इस क्रिया को भूल जाना 
और
न पकडे जाने वाली चीज को
पकड़ कर रखने की कोशिश ही 
शायद संबंध है,संवेग है 
और 
अनबूझ पहेली भी
मै फिर अकेला निहार रहा हूँ
लोगो को होली खेलता 
होली की बात करता
मैंने भी सन्देश भेज दिया 
और हो गयी होली
धीरे धीरे मेरे पौधे भी 
अपनी नयी जमीन पा गये
जहा वे विस्तार पा सके
और 
फिर मेरा भी 
सफ़र शुरू हो जायेगा
अपनी बदली को ढूढने और
उसमे समाहित हो जाने को  ।





ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है

ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है 
जीवन में आती है तो जीवन बिगाड़ देती है ।
इतना मत इतराओ अपने दौड़ने पर यारो
ये आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

संसद में ये बहस है कि बड़ा चोर कौन

संसद में ये बहस है
कि बड़ा चोर कौन
संसद भी है मौन
सांसद भी मौन
ये बड़ी बहस है
निर्णय करेगा कौन
वोटर हैरान है
मानस परेशान है
मौन संविधान है
ये कौन सा विधान है
सब लोकतंत्र लोकतंत्र
खेल रहे है
हम तठस्थ बन कर
इन्हें झेल रहे है
फिर सवाल अपनी जगह
ही खड़ा हुआ
हमारी तटस्थता से बड़ा हुआ
कौन बड़ा चोर है
कुछ लोग या हम सब
क्योकि हम तठस्थ है
नून तेल में व्यस्त है
देश चाहे रहे या भाड़ में जाये
जहा कही माल हो
मेरे घर में आये
तब क्या सवाल है
काहे का मलाल है
कौन बड़ा चोर है
तोर है या मोर है
पर अब तय ये रहा
हम सब चोर है
या तो जागो खड़े हो
संसद से भी बड़े हो
या फिर सत्ता सौप दो
राजा रजवाड़े को
और खुद को सौंप दो
भेड़ वाले बाडे को
लोकतंत्र का खेल
हो गया है झेलमझेल
या संविधान बांच ले 
पुरसार्थ मांज ले
अपना ज्ञान जाँच ले
और तिरंगा थाम ले
बापू ,सुभाष नाम ले
देश के सवाल पर
जाति ,धर्म छोड़ दो
बस अपने स्वार्थों
का रुख जरा मोड़ दो
संसद जगा दो तुम 
भ्रस्टों को भगा दो तुम 
देश को मजबूत कर
मत डर ,मत डर ,मत डर  ।


क्या फर्क है माँ और माँ में

आपने देखा है
उस चिड़िया को
परेशान चीखते हुए
और मंडराते हुए
घोसले के आस पास
किसी से अपने बच्चो की
सुरक्षा की चिंता में
जिसका मुकाबला नहीं
सकती है वो
कभी देखा है किसी माँ को
टपकती छत से हर तरह
जतन कर भीगने से बचाती
अपने छोटे बच्चों को
मैंने दोनों को गौर से देखा है
क्या फर्क है माँ और माँ में
चाहे ओ इन्सान हो या चिड़िया
माँ खुद पर ले लेती है
हर मुसीबत
और बचा लेती है बच्चो को
अपनी सामर्थ्य भर
पर क्या बच्चो को याद रह जाता है
ये सब
नहीं न
क्योकि वे तब अबोध बच्चे थे ।

बेटियां खीच लेती है

बेटियां खीच लेती है
सारा प्यार पापा का
और बेटा दीदियों से
प्यार खीच लेता है
और माँ से भी
कभी माँ ही पिता और
पिता ही माँ दोनों हो जाते है
अनचाहे कारणों से
तब प्यार बंट जाता है
बराबर बराबर
पर फिर भी बेटियां
पा जाती है ज्यादा प्यार
और बेटा बन जाता है संबल ।

तन है ,मन है और मस्तिस्क

तन है ,मन है और मस्तिस्क
शरीर है ,दिल है और दिमाग
दोनों एक ही है
तन की तड़प अपनी है
मन की तड़प अपनी है
और मस्तिस्क की अपनी
शरीर, दिल और दिमाग की
भी यही ,दोनों एक है ना ,
शरीर कुछ चाहता है
मन रोक नहीं पाता 
और मस्तिस्क भी
मन कुछ चाहता है
और शरीर साथ नहीं देता
मस्तिस्क विद्रोह कर देता है
कभी कभी
मस्तिस्क रास्ते तय करता है
मन विचलित हो जाता है
और शरीर अलग चला जाता है
लड़ते रहते है तीनो ज्यादातर
कभी कभी ही तीनो एक ही
दिशा में चलते है
और जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

दिल है और दर्द है

दिल है और दर्द है
दिल हँसता है
दर्द रोता है
जब दिल रोता है
तो दर्द हँसता है
और दोनों के बीच
कोई दर्द के कीचड में
धंसता है
वो मै हूँ या आप है
या और कोई
पर कहानी तो सच्ची है
दिल की और दर्द की ।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

इतनी जिंदगी बीत गयी

इतनी जिंदगी बीत गयी
संघर्ष के साथ ,
पर पहली बार लग रहा है
की थकने लगा हूँ और अब बस
और क्या संघर्ष करना
और किसके लिए करना
पर मै फिर खड़ा होऊंगा
और चल पडूंगा
क्यों की मेरा स्वाभाव
थकना और पलायन नहीं है ।

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कितने बदकिस्मत होते है

कितने बदकिस्मत होते है
वे लोग
जिन्हें दूसरे नही अपने ही
मारते है बार बार
वो मार खाकर गिरता है
फिर हिम्मत जुटा कर उठता है
सोचता है अब चलूँगा मै भी
कि फिर कोई बहुत अपना
तोड़ देता है उसके पैर
फोड़ देता है उसकी आँखें
और कुचल देता है
उसके चलने के इरादे
क्या करे ये बदकिस्मत
छोड़ दे हर अपने को
क्योकि
बाहर वाले तो कभी
कुछ बिगाड़ नहीं पाए
वो कैद हो गया है
अपने  जो दुश्मन है
उनकी कैद में ।




शनिवार, 7 जुलाई 2012

हजार बार खुद को अजमाया हमने

हजार बार खुद को अजमाया हमने
हमेशा खुद को मजबूत पाया हमने ,
लोग कहते है  अब की  डूब जाओगे
पर बीच समुंदर  तैरता पाया हमने ।

शुक्रवार, 29 जून 2012

सिलसिला शुरू तो हो, परिणाम देखेंगे

सिलसिला शुरू तो हो, परिणाम देखेंगे
दो कदम साथ चलो, खासो आम देखेंगे ,
पहले क्या तय करना क्या है नसीब में 
मेरा हाथ पकड़ो तो फिर अंजाम  देखेंगे ।

गुरुवार, 28 जून 2012

असमान वाले नीचे झांक कर देख

असमान वाले नीचे झांक कर देख
तेरे बनाये पुतले ये क्या कर रहे है
तूने दिया था बोने को फल, फसलें
पर ये इन्सान तो बारूद बो रहें  है ।

गुरुवार, 17 मई 2012

वो समझा था कि वो सिकंदर है

वो समझा था कि वो सिकंदर है
पर समझा की सब मुकद्दर है ।
बड़ी देर लग गयी जान पाने में 
ये जानने में सामने समंदर है ।
क्या जानेंगे हम बाहर क्या  है 
जब जानते नहीं क्या अन्दर है । 
वो है मेरी है भी और नहीं भी है 
ये वो जाने सब उसके अन्दर है । 
बातें होती है तो बहुत बातें होती 
बातों का मतलब जाने  इश्वर है ।
मै कहना चाहता हूँ चाहत अपनी 
सोचता हूँ आँखे बोलें जो अन्दर है ।
वो क्या नासमझ है नहीं समझते है
मै क्या कहूँ की दिल में समन्दर है ।
लगता है जिंदगी यूँ ही बीत जाएगी 
वो भी अकेले है अकेला मेरा घर है । 



शनिवार, 12 मई 2012

क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।

जमीन है नहीं पर कोठियों के सपने है
कोई भी अपना नहीं पर सब  अपने है ।
हमने सोचा न था कि हम बहक जायेंगे 
पर बहक गए है तो कारण भी अपने है ।
आसमान से आग बरसी जल गए हम 
पाँव में छाले है तो हम कैसे चल पायेंगे ।
लोग कहते है कि तुम इतने पीछे खड़े हो 
बेंच दें जमीर बहुत आगे हम चले जायेंगे।
हमें भी तमन्ना हो गयी बड़ा बन जाने की 
बेईमान नहीं हम बड़ा आदमी कहलायेंगे । 
लूट लो बस जर जमीन जोरू जो भी मिले 
फिर शान से चलो सभी नीचे नजर आयेंगे। 
कोठी कुत्ता कार और चमचे भी होंगे खूब 
फिर हम देश में काबिल महान कहलायेंगे ।
वाह रे ये देश ये समाज, तुझे सलाम मेरा 
अच्छों को थू थू और बुरों के गीत गायेंगे । 
क्या फर्क जमीन बिना कोठियों के सपने है
सब होगा आसान जब हम नंगे हो जायेंगे।
बस इसी की दौड़ है चली आज मुल्क में मेरे 
क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।
चलो कोई तो जुबान खोलो नंगों को नंगा कहो 
कई वर्षों के गुलाम हम फिर वही बन जायेंगे ।
आओ नकाबों को उतारे इन्हें सचमुच नंगा करें 
जब नंगे होंगे ये असल में मुह क्या दिखलायेंगे ।



बुधवार, 9 मई 2012

कितने महंगे है ये हस्ताक्षर और इन्हें करने वाले लोग

मै चला था कि बस एक हस्ताक्षर होगा 
और दूर हो जाएगी मेरी सारी समस्याएं 
चहकने लगेगा मेरा परिवार और बच्चे 
लग जाएगी मेहदी एक बेटी के हाथों में 
पर नहीं जानता था कि कितने महंगे है 
ये हस्ताक्षर और इन्हें करने वाले लोग 
इन्सान नहीं है,बल्कि पैसे की मशीन है 
ये लोग बहुत बड़े हो गए है बहुत ऊंचे भी  
ये सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल करते है 
लोगो को ,उनकी भावनाओं,आस्थाओं को 
पर खुद हो गए है पत्थर केवल पत्थर
पत्थरों को क्यों सत्ता क्यों वैभव क्यों पैसा 
पत्थर क्या करेंगे इन चीजों का, क्या करेंगे 
ये चीजें तो इंसानों के लिए है इंसानों के लिए 
सत्ता होती है लोगो की लोगो द्वारा लोगो के लिए 
पर ये लोग तो खुद ही  बन गए है तीनों लोग  
फिर कहा बचते है मै ,आप या कोई और 
मै बड़े विश्वास से गया था अपना समझ कर 
पर लौट आया बेगाना बन कर लडखडाता हुआ 
ये भी जीवन का एक कड़वा सत्य है ,हा सत्य 
पर हार जाने के बजाय उन्हे हराना है मकसद .
जो इन्सान नहीं पत्थर बन गए है कठोर पत्थर 
सकल्पों को मांज लेना है तय कर लेना है कि 
लड़ाई अभी बाकी,है फैसलाकुन लड़ाई बाकी है 
उठूँ  बहुत चल लिया अब उन्हें चलता करना है 
यही है संकल्प ,यही है इरादा,बाकी अपने संकट 
वो छोड़ देता हूँ वक्त के हाथों में ,संघर्ष के हाथों में ।

शनिवार, 5 मई 2012

एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है

पांव है थके थके पर दूर बहुत जाना है 
पर चलने की उमंग है मन में उत्साह है 
चलना ही जीवन है रुक जाना अंत है                                       
चल रहा हूँ मै लेकिन रास्ता अनंत है ।
जीवन संघर्ष है, पहाड़ की चढ़ाई है 
अपने पुरसार्थ क़ी अपनी कमाई है
चलना है,रुकना नहीं चलते ही जाना है ।
रास्ते  में कांटे हो, जंगल हो, पहाड़ हो 
रास्ते में बाधा कोई सिंह की दहाड़ हो 
चलते ही जाना है चलते ही जाना है  ।
आते है तो रोते हुए और सब हंसते है 
रास्ते में कभी मौन,हंसना भी रोना भी 
जाते हुए मौन खुद, बाकी सब रोते है 
कौन परवाह करे हंसने की रोने की 
मंजिल को पाना है चलते ही जाना है ।
मंजिल नहीं मंजिलें है जैसे हो सीढियाँ 
हौसले बनाये रख कदम कदम चलना है 
चलते ही जाना है चलते ही जाना है ।
रास्ता दिखाया था बड़ों ने आगे कभी 
वो तो चले गए अपनी अनंत यात्रा पर 
अब आगे चलना है रास्ता दिखाना है 
पीछे है हमारे जो उन्हें रास्ता बताना है 
मंजिलें दिखाना उन्हें काँटों से बचाना है 
यही है कर्त्तव्य बस यही वो आयाम है 
अपनों को धीरे धीरे वाम पर पहुँचाना है 
चलते हमें जाना है चलते हमें जाना है ।
गिरे, उठे ,चल दिए, पार की खाइयाँ 
लडखडाये फिसले भी पार की पहाड़ियां 
काँटों के चुभने की कभी परवाह नहीं 
बहुत तेज गिरे पर निकली आह नहीं  
पैर हो जमीन पर अहंकार दूर रहे 
किसे परवाह  कौन कौन क्या कहे 
बस यही सत्य है , यही संकल्प है
सारे सोपानों को ,मंजिलों को पाना है 
एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है 
चलते ही जाना है चलते ही जाना  है ।



रविवार, 23 अक्टूबर 2011

देखो दीपक बोल रहा है

देखो दीपक बोल रहा है
हमारी आँखें खोल रहा है ,
सूरज का अहंकार है तोडा ,
अँधेरे का पीछा न छोड़ा ,
चाहे जितना जला रत भर ,
उसने अपना वचन न तोडा ,
सीख सकेंगे हम भी क्या दीपक की भाषा ,
हम भी फैला सकेंगे लोगो के जीवन में आशा ,
आओ इस दिवाली में ऐसी कसम खाए हम ,
जहा कही भी हो अँधेरा रोशनी पहुंचाए हम ,
वो रोशनी ज्ञान की हो ,नेत्रदान की हो ,
गरीबी,भूख ,अशिक्षा ,अपराध ,भ्रस्ताचार 
मिटाने के अभियान की हो |
तब दिए जलाएं, आप और आप के 
परिवार को दिवाली की शुभकामनायें |



















गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

सोमवार, 13 जून 2011

मै समझा कि जब चाहूँगा दूरिया नाप दूंगा मै ,

मै समझा कि जब चाहूँगा दूरिया नाप दूंगा मै ,
दूरियों ने कहा हम तुमसे बस चार हाथ  दूर है 
चलो,बढ़ो तुम मुझे छू लो और चाहो तो पा लो
अरे तुम रुक क्यों गए बस चार हाथ ही दूर मै 
थक गए तो रुक जाओ और मेरा इंतजार करो 
मेरा रास्ता जब मुडकर बस तेरी तरफ आएगा  
दूरी नहीं रह जाएगी रास्ता तेरी तरफ आएगा   
क्या सचमुच मंजिल पाना मेरे हाथ में नहीं है 
मै  दर्द से  कराह रहा था कि मंजिल मेरी नहीं  
मंजिलो ने कहा मंजिल नहीं मंजिले भी है तेरी 
अब मै रुकूंगा नहीं चलूँगा मंजिले सब मेरी है







 


सोमवार, 30 मई 2011

खुशियाँ चूम और आसमान तेरा है

मै सोचता था आसमान मेरा है ,
पर यहाँ तो हर तरफ अँधेरा है |
ढूढो यही कही कोई सूरज होगा,
जो कहेगा देख ये तेरा सवेरा है |
इतने तारे जो आसमान में फैले,
पुकारते है सारा आसमान तेरा है |
जो थक गया  जरा सी चढ़ाई पर , 
अभी बहुत दूर आसमान तेरा है |
अँधेरे, उजाले दोनों ही जिंदगी है,
अँधेरा है तभी तो सुबह सवेरा है |
अधेरे को तू आने दे और जाने दे,
इरादे रख तो  रोज नया सवेरा है |
चढ़ जा इरादों की किसी पहाड़ी पर,
खुशियाँ चूम और आसमान तेरा है |
























शनिवार, 21 मई 2011

मै एक किनारा हूँ और मेरी खुशियाँ दूसरा ,

आप कभी नदी के किनारे किनारे चले है ,
प्रारंभ में भी दो किनारे और अंत तक भी,
जब तक नदी समां  नहीं जाती समुद्र में  ,
तब तक किनारे मिलने को बेताब ,बेसब्र  ,
पता नहीं समुद्र में विलीन हो जाने पर भी, 
किनारे मिल पाते है या दो तरफ ही जाते है  ,
मै एक किनारा हूँ और मेरी खुशियाँ दूसरा ,
किनारों जैसे कभी नहीं मिल पाएंगे ये भी  |






मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

मुझे लगा श्राप तो अहिल्या से भी कठोर है

कितना अकेला हो गया मै !
कितना पंगु हो गया मै !
कितना असहाय हो गया मै !
एक चौराहे पर सांसें रोके  खड़ा हूँ मै !
कोई दिशा नहीं ,कोई लक्ष्य नहीं ,कोई इरादा नहीं ,
यदि लक्ष्य है तो बाधा बन कर खड़े है,
अपने ही सदा की तरह |
यदि इरादे है भी तो,
उसपर अन्धकार बनकर छाये है अपने ही |
और घोर अंधकार में कही कोई चल पाया है?
जो मै चल सकूँ ?
बस रास्ते पर पड़े पत्थर सा,
उससे अलग भी तो नहीं हूँ मै!
जब भी कोई कोशिश करता हूँ
की  रुके रास्ते चल पड़े ,
अपनी ही अनुभूतियाँ खड़ी हो जाती है,
बाधा बन कर |
बाहरी अवरोधों को तो ठोकर से हटाया जा सकता है ,
संघर्ष किया जा सकता है उनसे,
पर अपने बहुत प्यारे लोगो से !
शायद नियति ही यही है,
चौराहे का पत्थर बन पड़ा रहना |
जो सिर्फ तब हिल सके जब कोई ठोकर हटा दे ,
या कोई गाड़ी कुचल कर उछाल दे कही |
पर रास्ता तो फिर भी नहीं खुलेगा ना,
जब तक रास्ते खुद से तय ना हो,
लक्ष्य खुद से तय ना हो ,
और उसमे अपनों की खिलखिलाहट ना हो |
अहिल्या की भांति श्रापित पत्थर ही हूँ मै,
चौराहे  के बीच पड़ा हुआ |
अहिल्या के लिए तो राम का आना तय था ,
पर मै तो अकेला हूँ और पहचान खो चुका हूँ |
और जब कोई पहचानता ही नहीं!
तो राम भी क्या करेंगे ?
मुझे लगा श्राप तो अहिल्या से भी कठोर है |












शनिवार, 16 अप्रैल 2011

और खोज ख़त्म हो जाएगी खुद ही



निस्तब्ध सोच रहा हूँ
क्या ये मै ही हूँ
मै हूँ तो इस कदर मौन क्यों हूँ 
क्या सचमुच मै ही हूँ
या ढूढ़ रहा हूँ खुद को और खुद में ही !
पर ये खोज बहुत मुश्किल है,
खुद के अन्दर खोज पाना खुद को ही ,
पर खुद को ---प्रयास जारी है ,
लगता है अब जाने की बारी है | 
फिर होगा मौन ,मौन और बस मौन 
और खोज ख़त्म हो जाएगी खुद ही |

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

कितना गरीब हूँ मै कि आंसू तो है

क्या होता है और क्यों होता है जब 
आंसू आते है, मन करता है की जोरे से रोयें 
बिलकुल बचपन की तरह बुक्का फाड़ कर 
और रो नहीं पाते है |
बस घुटते रहते है, अंदर ही अंदर 
बड़ा क्या हुए, खुल कर रोने का अधिकार भी नहीं 
हँसने की जबरन कोशिश भी रुला देती है 
रोना तो कही मन की, दिल की गहराइयो से आता है 
कोई तो बता दो कैसे रोये, कहा रोये ?
कोई कोना नहीं है छुपाने को 
कोई कन्धा नहीं है सिर रखने को
कोई हाथ नहीं सिर सहलाने को 
कोई गोद नहीं ,सुबकने को 
कोई सीना नहीं हिचकी लेने को
कितना गरीब हूँ मै कि आंसू तो है 
पर रोने की  जगह मेरे पास नहीं 
जुबान भी नहीं बची या दब जाती है 
उसे दबा कर रोने लगता हूँ जोर जोर से
जिसे केवल मै सुन सकू 
अँधेरे में अपने बिस्तर पर या 
उस फोटो के सामने बैठ कर 
जो रोने नहीं देती थी 
जो आधार था हँसने का 
पर मै खुल कर जोर से कैसे रोऊ 
कब तक दबाऊँ मै भावनाओं को फूटने से 
नहीं रोऊंगा जोर से, तो मै फट पडूंगा जोर से |



 


रविवार, 20 मार्च 2011

आज होली है ,रंग लगाना है लगालो अच्छे अच्छे रंग डालो

आज होली है ,रंग लगाना, लगालो, अच्छे अच्छे रंग डालो,
ये लाल रंग है ,लहू का भी लाल होता है, फैसला तुम्हारा,
किसी  के लिए रक्तदान करो या बेगुनाहों का रक्त बहालो,
या रुके हर तरह का रक्तपात ऐसी कोई  व्यवस्था बनालो|
और आप हरा रंग लाये हो ,लगता है कीचड में नहाये हो,
आओ पूरी धरती को फिर हरा भरा बनाये,हों भरपूर फसलें,
फलों के बगीचे ,फूलो की क्यारी नहीं तों गमले ही लगाये,
और नीला , नीला आसमान नीला समुद्र साफ हो नदियाँ,
साँस लेने लायक हवा ,पीने लायक हो पानी नहीं तों ,
खुद ही मिट जाओगे  तों होली कैसे मानोगे |
पीला है तुम्हारा रंग होली का अपनाओ नया ढंग,
गरीबी और बेबसी के कारण जो बेटी आत्महत्या करने या,
बिकने को तत्पर है ,उसे बचाने का तुम्हे  एक अवसर है,
उसके हाथ पीले कर,कफ़न से बचा लो पीली चुनरी ओढा दो ,                                                                 
जीवन में खुशहाली  और उसके घर में पीली होली सजादो |
तुम काला रंग ही लाये हो या तुम्हारा मन भी है काला ,
अपना  इरादा बतादो ,अपना असली चेहरा तो दिखादो ,
हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं समाज के दुश्मनों पर डालो,
उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,
ये राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ सुभाष का हिंदुस्तान |
काला रंग और काला इरादा लेकर आओगे तों पछताओगे,
रंग के साथ हम खून की होली भी खेलना जानते है,
भूले तों नही ७१ और कारगिल ,अब आओगे तों मिट जाओगे, .
बाहर आसान पर अन्दर छिपे काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,
वे हमारे बीच छिपे ना पहचाने जाने वाले गुलाल और अबीर है,
आओ मिल कर सफाई का पानी डाले ,उन्हें ढूढ़ कर निकाले,
सियार का रंग उतर जायेगा ,समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा |
फिर सभी रंगों को मिला कर इन्द्रधनुषी रंग बनाये,
उसी की होली खेलें, पूरे भारत को वही रंग लगायें,
अपना देश महान होगा जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,
विश्व को रास्ता दिखायेगा फिर विश्व गुरु कहलायेगा,
आओ इन इरादों की चन्दन और रोली लगाओ,
हाथ का खंजर फेंक दो और गले से  लग जाओ | .

बुधवार, 16 मार्च 2011

नफरतो को होली में इस बार जलाये

यहाँ वहा आज देखो होली हो रही
वहा पे हंसी  यहाँ ठिठोली हो रही

तय था होली एक दिन मनाई जाएगी
होली में  बुराई  सब  जलाई  जाएँगी 
खुशियों से खेलेंगे हम रंग औ गुलाल
गले मिल कर दोस्ती  बढाई  जाएगी

एक दिन नही अब तों  रोज होली है
जी हा आज कि ये नई सोच होली है 
होली गुजरात कि कश्मीर कि होली
सड़क हो या रेल बस होली  होली है

होली में जलाये भी तों कौन लकड़ियाँ
मिल रही है मुफ्त में तमाम लड़कियां
रेल, बस, घर  जलाने का अधिकार है 
रोके कौन सबने बंद की है खिड़कियाँ  

होली का हुड़दंग हो या लोगो की चीख
यहाँ वहा जो भी मिले पहले उसे  खींच
आग में जलादे  चाहे खंजर पर उछाल
पानी से नही अब जमी लहू से ही सींच

देखो कही बम तों कही गोली चल रही 
चारो ओर खून की बस होली चल रही
हम नहला रहे है अपनी माँ को लहू से
नफ़रत की ही बस यहाँ बोली चल रही 

ऐसी होली भारत में और कब तक चलेगी
नफरत की कहानी भला कब तक  पलेगी 
जले राम का हवेली या रहीम  का मकान
इंसानियत की होली ऐसी कब तक जलेगी

आओ ऐसी होली पर विराम लगाये
भाई चारे की कहानी फिर से सुनाये
आओ इंसानी जज्बे  को हम जगाये 
नफरतो को होली में इस बार जलाये

शनिवार, 12 मार्च 2011

पृथ्वी जोर से हिली ,गुस्सा हो गया समुद्र

पृथ्वी जोर से हिली 
समुद्र की नीद टूट गयी 
गुस्सा हो गया समुद्र  
गुस्से में जोर से साँस लेने लगा समुद्र  
उसकी सांसे भारी पड़ गयी पृथ्वी को  
और पृथ्वीवासियों को भी  
चारो तरफ जलजला ,मौत और तबाही 
कुछ करो की फिर पृथ्वी ना हिले 
जरूरत पर हिले तो इतने जोर से ना हिले  
समुन्द्र की नीद ना टूटे ,क्रोधित ना हो समुन्द्र 
अभी तो थोडा सा क्रोधित हुआ है तब ये हाल है 
पूरा समुन्द्र क्रोधित हो गया तो पृथ्वी का क्या होगा 
क्या होगा पृथ्वी पर रहने वालो का 
आओ बचालें पृथ्वी को ,समुन्द्र को और मानवता को |







सोमवार, 10 जनवरी 2011

क्या यही होता है जीवन ?

क्या यही होता है जीवन ?
एक दिन आप जीवन पाते है,
आते तों अकेले है ,पर वहा होते है बहुत से,
हंसने को हंसाने को, खिलाने को, जिलाने को
फिर जिनके कंधो पर होते है आप खुश,
जिनके हाथ पकड़ कर आप पाते है ताकत,
उन्ही कि ताकत ख़त्म हो जाती है और,
आप के कंधे पर सवार वे चले जाते है अनंत यात्रा पर,
लगता है सर पर साया नही रहा ,कोई ताकत नही रही |
पर समय पकड़ा देता है कोई अनजान उंगली जीवन भर को,
जो जीवन का आधार बन जाती है या हो जाती है जीवन ,
पर कुछ लोगो से वक्त छीन लेता है उसे भी बीच रास्ते में ही,
और खड़ा कर देता है आप को ठूंठ कि तरह अकेला |
फिर नजर आते कुछ अपने ही शरीर के टुकड़े कुछ अनुभूतियाँ,
व्यस्त हो जाते है समेट कर खुद को अपनी अनुभूतियो के लिए ,
आप के सहारे चलने वाले आप का सहारा नजर आने लगते है,
समय और परम्पराएँ छीनती जाती है एक एक को बारी बारी,
आप का प्यारा टुकड़ा जो आप का आधार बन गाया है,
अपने जीवन को नया आयाम देने चल पड़ता है नए सफ़र पर,
फिर आप अकेले, जैसे  रेगिस्तान में खड़ा कोई अकेला ठूठ ,
अब ना ही कोई लक्ष्य, ना ही जिम्मेदारी और ना कोई आशा,
हां लक्ष्य केवल जीवन के बचे दिनों को पूरा करना और आशा कि-
बिना किसी को कष्ट दिए या लिए पूरा हो ये जीवन,जिम्मेदारी,
बस खाना पीना समय बिताना और गाना कि.,
दुनिया में हम आये है तों जीना ही पड़ेगा,
जीवन है अगर जहर तों पीना ही पड़ेगा |

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

कोई खामोश है, तों कोई परेशान है ,

1-
कोई खामोश है, तों कोई परेशान है ,
ख़ामोशी को सहना, नही आसान है
कुछ कहें तो चाहे नफ़रत से ही सही
वो भी तो किसी पर एक अहसान है |                                                                                              

2-जिसे भी छूता हूँ, वो टूट जाता है,
   कुछ भी कहता हूँ तों रूठ जाता है
   क्या करू मेरी किस्मत ही ऐसी है,
   जिसे भी चाहता हूँ वो छूट जाता है |

3-तमाम उम्र हम चलते रहे और लोग जलते रहे ,
    अब हम जलते जा रहे है लोग चलते जा रहे है |

4-आइये जिन्दगी  के नए  मायने तलाश करे ,
    दिल को जोड़ा तों फिर दिल पर विश्वास करे ,
    ऐसा क्या जुड़ना कि दिल ना करे  धक् धक्,
   आइये तन मन के अहसास का अहसास करे ,

5-आप भी गर अच्छे है तभी मिल पाते है जनाजा उठाने वाले,
   वो भी खुशकिस्मत होते है जिन्हें मिल जाते है जलाने वाले|
   जो गैर है अपने  नही उनको क्या देखना और क्या सोचना,
   आज कल ऐसे ही होते है मतलबपरस्त तमाम ज़माने वाले|

6-कोई  मेरे सोये दिल को जगाये तों कोई  बात बने ,
   कोई  मेरे घर में भी दीप जलाये तों कोई बात बने |
   बहुत दिन हो गया मैंने तों कोई खुशियाँ नही देखी ,
   दामन में कोई खुशियाँ ले  आये तों कोई बात बने |

7-अँधेरे मेरे घर के देखो दूर से ही दिखलाई पड़ते है,
   मेरे घर का अँधेरा  कोई भगाए तों कोई बात बने |
   सभी के घर बहुत रोशन, सभी के घर में  दिवाली  ,
   कोई मेरी भी दिवाली  मनवाए तों कोई  बात बने |

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

खजुराहो की मूर्तिया बोलती है

ये खुदी मूर्तियाँ पत्थर की इनकी अपनी अलग कहानी
रह जाती है याद सभी को ये सब सदा सदा को जुबानी 
ये बाज रहे है कुछ बाजे और नाच रहा है कोई
कुछ रंग राग सा जमा हुआ   इस महफ़िल में
प्रेम नगर की महफ़िल में पलके है जागी सोई 
कुछ उबलता अरमान यहाँ दीखता हर दिल में
आतुर दीखते है सब छोड़ने को दिल पर कोई निशानी
ये खुदी ----------------------------------------------
ये प्रथम दृश्य इंकार भरा पर ये है मनुहार भरा
ये शर्म को प्रकट किये और इसमे है  प्यार भरा
और ये देखो कैसी इनसे  अठखेलियाँ फूट रही
इसमें गति कुछ रुकी जैसे है थोडा इकरार भरा 
ये बंकिम चितवन कतिपातन कहता है स्वयं कहानी
ये खुदी ---------------------------------------------
अब ये देखो कुछ और निकटता बढ़ती है
हाथो से थामा गोल और नर्म कलाई को
उठते गिरते क्षण सीने के क्या कहते है
प्यासे नयनो से देख रहा  अंगड़ाई  को 
थरथराते अधरों पर अधरों को रखने को मस्त जवानी
ये खुदी ------------------------------------------------
ये निगाहे प्यासी आकुल हो  होकर उठती है
धड़कन बढ़ गयी जब बाहें कटी को कसती है 
स्वास तेज कैसा चेहरा अधरों पर रखे अधर
गति में है दोनों  ये है स्वर्गीय सुख का असर
और अब बाहें हो गयी शिथिल क्या कर डाली मनमानी 
जीवित लगती फूट रही इन मूर्तियों से मदमस्त जवानी
ये खुदी मूर्तियाँ पत्थर और इनकी अपनी अलग कहानी
खजुराहो से जाते  है  सब  मन  में भर कर नयी   रवानी

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

दीपो का त्यौहार आ गया, दीप जलेंगे

दीपो का त्यौहार आ गया ,
दीप  जलेंगे
कही मोम के,कुछ मिट्टी के ,
दीप जलेंगे ,सदा जले है ,
फिर जलने है,
दीपो का त्यौहार जो आया,
बालक बच्चे इंतजार में,
उनकी खातिर खुशिया लाया,
मिठाई ,खील बतासे खायेंगे वे,
दीप जलेंगे ,
बम फुलझड़िया खूब दगेंगी,
पर मिट्टी का दीपक कुछ उदास है,
हंस रही है चीन से आई ही सब चीजे,
जिसके लिए अफीम धर्म था,
उसी चीन से बन कर आये ,
सभी देवता है बाजार में,
भारत के दिए और और देवता,
बस बैठे है इंतजार में,
कोई तों ले लो,आखिर वे अपने है,
कुछ अपनों का पेट भरेगा
देखो वो गरीब का बच्चा,
टुकुर टुकुर ताक रहा है सब चीजो को,
उसका पिता हिसाब लगाकर ,
खील,बतासे,एक फुलझड़ी ले लेता है
ये कह कर की हम चालाक है 
औरो को खर्चा करने दो
हम मुफ्त में मजे करेंगे,
सुबह सुबह जल्दी जग उसका बेटा बीनेगा,
बची मोमबत्तियां और पटाखे,
अगले दिन वो उनको फोड़ेगा,
जहा काम करती उसकी माँ,
वहा से आई आज मिठाई,
मन रही इस घर में आज दीवाली,
दीवाली आई और ख़त्म हो गयी,
अब लगता है की कल क्या बदला था ,
हम दुनिया कि बुराइयों से,
लड़ने की कसम खाये तों कैसा हो,
तब दीवाली मनाये तों कैसा हो,
दीवाली मनाये,सीमा से कोई लाश नही आई,
इस साल किसी ने अपनी बहू नही जलाई,
जब कोई रात न होगी काली, तब होगी असली दीवाली |

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

कभी हरी दूब पर पड़ी ओस की बूँद देखा है

कभी हरी दूब पर, पड़ी ओस की बूंदों देखा है ,
नही देखा ,तों छोटे छोटे बच्चो को देखो,
देखा है कमल या गुलाब के फूल की मुस्कराहट,
नही देखा तों छोटे छोटे बच्चो को देखो,
वर्षा की पहली बूँद को सीप में मोती बनते देखा है,
नही देखा तों अपनी नन्ही सी बेटी को देखो,
जानते हो क्या होता है सच्चा और निश्छल प्यार,
बच्चो की तरफ प्यार से देखो जान जाओगे,
कभी देखा है जीवन से खुद बिना थके लड़ने की कला,
उठने की कोशिश करते ,गिरते और उठते बच्चो को देखो,
कभी सोचा घर बनाने की कल्पना कहा से आई होगी,
माँ की सदी से घर बनाते और सजाते अपनी बेटी को देखो,
कभी प्यार के मोल और गहराई को जाना है,
अपनी शादी के बाद बिदा होती बेटी की आँखों में देखो,
सबसे बहुमूल्य चीज कैसे सम्हाली जाती है कभी जाना,
आंधी में किसी माँ को बच्चो को सीने में चिपकाते हुए देखो,
एक का दर्द दूसरे को कैसे और ज्यादा दर्द देता है कभी देखा है,
जब तुम बीमार हो और कराहते हो  तों बच्चो की आँख में देखो,
कभी किसी इन्सान को आधा कटा हुआ और बटा हुआ देखा है,
किसी ऐसे को देखो जिसका सचमुच का अपना आधा चला गया हो,
किसी ने कभी स्वर्ग से लौट कर बताया की कैसा होता है ,मत पूछो,
प्यार करने वाली पत्नी और बेटे बेटी वाला घर देखो, दिख जायेगा,
भगवान की बनाई सबसे अच्छी दवाई क्या है  जानते हो,
बच्चो को उठाओ सीने से चिपकाओ और पत्नी को देख कर मुस्कराओ,
जीवन का अर्थ अगर नही जानते हो और इसे व्यर्थ मानते हो,
तों बस इन सबको प्यार करो सचमुच में प्यार करो ,जीवन पा जाओगे,
कही कुछ मत खोजो सारी दुनिया की दौलत तुम्हारे पास है,
जान गए तों जोर से हंसो और उसे बाहर फेंक दो जो मन उदास है,
थक गए हो तों बेटी को देखो ,रुक गए हो तों बेटे को देखो,
दोनों तुम्हारी दो आँखे है ,बेटी धड़कन है तों बेटा हाथ है,
तुम तभी पूरे हो जब दोनों तुम्हारे घर में है, दोनों साथ है,
इसलिए एक कसम खाओ की बेटियों को नही मिटाने देंगे,
दोनों को दो हाथ की तरह समझेंगे दोनों में फर्क नही आने देंगे |

बेटियां ताज़ा हवा का झोंका है इन्हें आने दो

बेटियां ताज़ा हवा का झोंका है,
मारों मत इन्हें आने दो,
ये खुशबू है ,इन्हें अपने साथ
एक और घर महकाने दो |
बेटिया वो है जो मुस्कराती है
तों हजारो फूल खिलते है
बेटिया जब पैदा होती है
तों जिंदगी को मायने मिलते है |
बेटिया हर दर्द कि दवा है
खत्म ना हो जाये बचाए रखना,
बेटिया  दुःख में एक दुआ है
इनको मन में सजाये रखना |
दिन भर की तकलीफों के बाद
घर आने पर मरहम है बेटिया,
टूट रहे हो एक बार
इनकी तरफ देखो
तुम्हारा दम है बेटिया |
कितने भी थके हो
गोद में बैठा लो
देखो  अब थकान कहा है,
कितनी चोट बाहर लगी हो
बेटी बस छू दे
अब निशान कहा है |
बेटिया घर की मिठास है रौनक है ,
एक मीठा सा अहसास है,
दुनिया का दुःख दर्द भूल जाओगे,
गर बेटी आसपास है |
बेटिया कलाई में सजी राखी है
और माँ की ममता है बेटियां,
प्रेम का उपहार है तों
अर्द्धांगिनी बनने की
क्षमता है बेटिया |
बेटिया धान है एक क्यारी में उगती
दूसरी में रोपी जाती है,
ये फले एक संसार बनाये
इसलिए दूजे घर में सौपी जाती है |
तुम कैसे मार सकते हो इन्हें
 ये तुम्हारी क्यारी में अमानत है,
दूसरा खेत इंतजार कर रहा है
तुम्हारा प्यार बस जमानत है |
उसे गौर से देखो
अल्ट्रा साउंड मशीन में भी
वो मुस्करा रही है,
नही लगता तुम्हे की
हाथ उठाये प्यार से तुम्हे बुला रही है |
क्या तुम उसे अब भी मार सकते हो,
नही ना अब उसे दुलारों,
तुम्हारी गोद में आने का
इंतजार कर रही है
उसे पुकारो |
तुम ने उसे  पुँकारा देखो
वह माँ के पेट में भी मुस्करा रही है,
उसे सहलाओ देखो वो अपनी
ख़ुशी का अहसास करा रही है |
ये सब देख कर भी
तुम्हारा शैतान जिन्दा है
और उसे मारोगे,
जब दिल खुश होगा घर आओगे
बेटी कह कर किसे पुकारोगे |
बेटिया दिल की धड़कन है
आँख का आंसू और प्यार की पुकार है ,
दूसरे घर में भी दिल
तुम्हारे लिए धड़कता है
तुम्हारा ही संसार है |
इसलिए बेटियों को घर आने दो,
और इन्हें जी भर कर प्यार करो,
मिटाने की सोचो भी मत खुद मिट जाओगे
बेटियों को दुलार करो |

शनिवार, 25 सितंबर 2010

संगम पर मिली गंगा,जमुना से बोली

संगम पर मिली गंगा,जमुना,बोली सुन मेरी बहना
इतने दिन तों अलग रह चुके ,अब  संग हमें बहना 
बादल पापा गरजे खूब गरज  ,गरज कर बरसे खूब
माँ पहाड़ की गोद भर गयी देख कर सभी हरसे खूब
मैदानों से ब्याह  किया कितनी मुसीबत देखी बहना
गन्दा खाना गन्दा पीना गन्दा कपड़ा  गन्दा गहना
माँ  के घर से नीचे उतरे,बांध दिया बच्चो ने हमको
यहाँ बांधा वहा भी बांधा काट दिया बच्चो ने हमको
खाने को गन्दा ही सब कुछ पीने को गन्दा ही पानी
मै बोली मुझको बहने दो पर किसी ने बात ना मानी
सभी गन्दगी फेंका मुझ पर लाशो से भी मुझे सजाया
भद्दी मेरी शक्ल हो गयी पर किसी को तरस ना आया 
बचते बचाते मै तों आई हूँ पर तुम हो मुरझाई कैसे
जरा बताओ इसी उम्र में  तुम पर आफत आई कैसे
जमुना बोली क्या कहना बहना हम दोनों कि एक कहानी
क्या बोलू मन बहुत दुखी है, ख़त्म हो गयी अपनी जवानी  
अपने जब ऐसे अपने है तब क्या जीना है और क्यों बहना
जब अपनी कुछ क़द्र नही किसी के लिए कुछ क्यों सहना
भागो बहना जोर से भागो, वरना क्या क्या सहना होगा
बांध दिया गर फिर दोनों को तों  गंदे घर में रहना होगा
अच्छा बहना अब चलते है अब तों कुछ ये अंतिम पल है
आओ गले मिल बातें कर ले अपना नही अब कोई कल है   
देखो बाहें फैलाये मुस्कराते  समुन्दर मामा हमें बुलाते 
उनके घर हम सब का ठिकाना थपकी देकर हमें सुलाते
क्या क्या सहा कैसा वो घर था सब  सोच कर मै रोती हूँ
उधर जाओ तुम भी सो जाओ और उधर मै भी सोती हूँ

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

दूर तक दिखता समुंदर और आगे कुछ भी नही

दूर तक दिखता  समुंदर और आगे कुछ भी नही
दिख रहा है वो सही है या सत्य फिर कुछ और है
वो दूर बहुत दूर आसमा और समुन्दर मिल रहे है 
क्या सचमुच मिल रहे है, क्या वही अंतिम छोर है
ये कौन है बे खयाल जा रहा है उस अंतिम छोर को
क्या इरादा है इनका कौन है ये कहा इसका ठौर है
अरे रोको कोई तों रोको  इन्हें वरना ये डूब जायेंगे
क्या ये जानते है कि सौन्दर्य नही मौत चहु ओर है
ये नीला पानी बुलाता है प्रेम से और निगल जाता है
देखो ऊपर से शांत दीखता है पर भीतर बड़ा शोर है 
कौन है ये मौन है जो चले जा रहे है राम लक्षमण से
क्या फिर सरयू दोहराएंगे या फिर मन में कुछ और है

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

दिल के टुकड़े उठा कर क्यों सहला रहा है

उसको देखो वो आखिर कहा जा रहा है
इंसानों को देखकर क्यों  कतरा  रहा है

बहुत दिन हो चुका उसे  इंसानों में रहते
अब इंसानों को देख कर ही घबरा रहा है

वो था झूठा और दिल टूटा क्या हो गया
दिल के टुकड़े उठा कर क्यों सहला रहा है

माना जिसको भी अपना सबने भोंका छुरा है 
हद है काँटों से भी बच कर अब वो जा रहा है

कैसे बचेंगे इंसानी रिश्ते इंसानों कि दुनिया
जब हर कोई अपने ही रिश्तो को खा रहा है 

कैसे बताये कैसे समझाए कि सब ऐसे नही है
बहुत चोट खाई दर्द का गाना ही वो गा रहा है

बुधवार, 1 सितंबर 2010

मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई

मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई
देखा मुझे करीब से तों देख कर शरमा गई

मैंने पूछा तुमको मुझसे मिलकर कैसा लगा
बोली मै भयभीत हूँ मन में  केवल भय जगा 
इतनी दीवानगी क्यों किसलिए किसके लिए
इस दुनिया में है कौन किसका कितना सगा

क्या  कोई उसको और वो किसी को भा गई 
मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा  गई

दीवानगी बोली रास्तो का क्या  बन जायेंगे
उठोगे और चल दोगे खुद  नजर आ जायेंगे
जीवन का तों उसूल है कल है भूलने के लिए 
कोई तुम्हे भूला तय करो उसको भूल जायेंगे

दरवाजे खोल कर  देखो चांदनी है  आ गई
मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई

मैंने कहा दीवानगी तुम मेरे पास आई क्यों 
आ गई तों देख कर इस कदर शरमाई क्यों
दीवानेपन की देवी खुद को तुम समझती थी
मै जरा सा  दीवाना हूँ देख कर घबराई क्यों

मुझे होश नही तुम्हे क्या चीज नजर आ गई 
मेरी दीवानगी को देख  दीवानगी घबरा गई

शनिवार, 28 अगस्त 2010

हलाल से मरा या झटके से मौत उसकी

एक मौत हो गयी है हर तरफ बहस है
हलाल से मरा या झटके से मौत उसकी
एक पक्ष कह रहा है हलाल में है जन्नत
स्वर्ग झटके में है एक पक्ष का है ये मत
गुस्से में  आकर दोनों बाहें चढ़ा रहे है
वो  कुरान पढ़ रहा है वो वेद गा रहे है
सच में कोई मरा है या चल रही है सासे
यदि चल रही है सांसे कोई उसे बचाए
पर बहस फिर वही कि कौन उसे बचाए
हिन्दू है या मुसलमा पहले वो ये  बताये
इन्सान होना इंसा को काफी नहीं है  यारो
गैर मजहबी बचाया तो माफ़ी नहो है यारो
उसकी जिंदगी से है किसका कोई  वास्ता
विवादों से खुलता है राजनीति का रास्ता
दोनों ने कहा अफवाह फ़ैलाने में भला है
अजमाया हुआ नुस्खा हर बार जो चला है
छोड़ो इसे अपनी अपनी बस्ती में लौट जाओ
मै गोली इधर  चलाऊ तुम भी उधर  चलाओ
पर पहले देख लेना घर वाले घर पे ही हो
या इंतजार करना थोड़ी देर क्यों नहीं हो
जब दोनों बता देंगे सब ठीक है जी मौला
तुम भी करना दंगा ,हम भी करेंगे दंगा
कुछ मर गए तो फिर सियासत में रंग होगा    
हम दोनों के लड़ने का पुराना ही ढंग होगा   
तुम बनो विधायक और संसदी हो मेरी
प्रान्त में सत्ता तेरी औ दिल्ली में हो मेरी
फिर बात होगी कि   कौन  मर गया था
वो अफवाह थी या सच में कोई मरा था
सचमुच कोई मरा हो तो दोनों रो लेंगे
जनता का ही  है पैसा मुवावजे  में देंगे
पाँच साल के लिए अब हो गयी कमाई
चाहे  कहे  कोई नेता चाहे  कहे कसाई
खेल राजनीति का पता चल गया है साथी
हम लड़ते रहे  जमाना छल गया है साथी
वो    हिन्दू मरेगा या  मुस्लमान  मरेगा 
लेकिन कोई ना कोई  तों  इन्सान मरेगा
हम लड़ते रह गए  तों यारो  याद  रखना
एक दिन होगा पूरा ही हिंदुस्तान मरेगा

रविवार, 22 अगस्त 2010

एक जंग जारी है अन्दर भी बाहर भी

जब हम सुख भोग रहे होते है
पूरी तन्मयता से,अधिकार और गौरव के नशे के साथ
उस वक्त हम यह रंचमात्र भी नही महसूससते है
की उसी वक्त तैयार हो रहा होता है
किसी दुःख का अनचाहा अनजाना शिलालेख
उस शिलालेख को देखते है हम अचानक
तब ऐसा लगता है सुन्दर स्वप्न देखते देखते
खतरनाक सांप ने जीभ से हमें छू लिया
दुःख और विषाद जब हमें तोड़ रहा होता है
और ऐसा लगता है
की हम सम्पूर्ण जंग हार गए है
अपने ही अस्तित्व को स्वीकारने को तैयार नही होते है 
उस वक्त भी ,हमें सबक देकर तैयार हो रहा होता है
एक स्वर्णिम भविष्य का सूरज
वह हमें ललकार रहा होता है उठ खड़े होने को
और कह रह होता है की यह पास में ही मै हू
आओ मुझे छू लो ,चाहो तों पा लो
अपनी सामर्थ्य भर,अपनी उत्कंठा भर,अपने पुरसार्थ भर
मै स्वय तों हू इस कथानक का पात्र
एक जंग के साथ ,जो भीतर भी है और बाहर भी
की कुछ छण के सुखद सूर्य को कैसे और कितना सहेजू
और किस तरह बिना सहमे और ठिठके
पार कर जाऊ अन्धेरेपन को
यह जंग लगातार जारी है ,अन्दर भी और बाहर भी
और मै सामने दीवार पार लिखा गीता सन्देश वाला चित्र
देखकर कलम रख देता हूँ
और मजबूत कदमो से चल पड़ता हूँ  .

तुम कहा थे जब उन्हें फंसी के फंदे पर लटकाया गया ( जून १९७1 )

तुम कहा थे                                                              
उस दिन
जब उन तीनो को
बेडियो में ले जाया गया
उन तीनो को
फांसी के फंदे पर चढ़ाया गया
फांसी पर चढ़ने वाले
तुम क्यों नही थे
उस दिन
जब साइमन हाय हाय का
नारा लग रहा था
लाजपत गरजे ,डंडे पड़े ,
वो शहीद हो गए
वह डंडा तुमने नही खाया उस,
मौत को तुमने नही अपनाया 
उस दिन
जब जलियांवाला बाग़ में
गोलियां चल रही थी
मौत जिंदगी को छल रही थी
उस दिन कोई नही बचा
तुम हमेशा कैसे बच गए
जबकि तुम तों हमेशा लक्ष्य पर होते थे,
क्योकि मंच पर होते थे
उस दिन
जब वह सिंगापुर से चल कर
भारत की भूमि पर आया था
उसने भारत भूमि पर झंडा लहराया था
तुमने साथ नही दिया था
केवल मुकदमा लड़ कर
कर्तव्य पूरा कर दिया था
उस दिन
जब तुम जैसे ही गद्दार की गद्दारी पर ,
गद्दार पुलिस वालो ने
उसे अल्फ्रेंड पार्क में घेर कर गोली मारी थी
उसकी जगह तुम क्यों नही मरे थे
क्योकि तुम्हारी गोरो से यारी थी
तुम उनकी सत्ता को और आगे बढ़ा रहे थे
ना अस्त होने वाले सूरज को
और ऊपर चढ़ा रहे थे
क्यों अहिंसा की बात कर
लोगो को चलती गोलियों में छोड़
तुम पुलिस वैन में घुस जाते थे
होई थी हिंसा, आती थी मौत,
तुम नजर नही आते थे 
क्यों मिला औरो को नरक और
तुमको ए क्लास जेल की कोठरियां
औरो को गुमनामी ,तुमको सत्ता
औरो को भूख तुमको कुर्सी सुविधाएँ
तरह तरह का भत्ता
क्योकि तुम गद्दार थे गोरो के यार थे
तुम कौन होते हो हमें देशद्रोही बताने वाले
हमारे ही संविधान द्वारा
हम पर लाठी और गोली चलाने वाले
तुम्हारा चेहरा साफ नजर आने लगा है
तुम्हारी लफ्फाजी और कोरे भाषणों का
रहस्य समझ में आने लगा है
भूख ,बेकारी और गरीबी की दुहाई देकर
कुर्सी का खेल खेलने का नाटक और नही चलेगा
अब
भूखा मजदूर ,नंगा किसान जाग रहा है
इनका सम्मिलित तूफानी स्वर जागेगा
इनके स्वर में लफ्फाजी नही होगी ,
नारेबाजी नही होगी
अगर होगा तों शहीदी रक्त होगा ,
मचलती आग होगी
जिसमे जल कर
तुम्हारे सारे कुत्सित हथकंडे भष्म हो जायेंगे
ये करोडो इन्सान जिनसे मिल कर बना है
देश हिदुस्तान
अपनी सच्ची आजादी का जश्न मनायेंगे .

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

कुछ इधर की कुछ उधर की

१- ना दो बन्दूक मेरे हाथो में
   हो जायेगा खून कुछ तथाकथित समाजवादियो का
    जो सत्ता,औरत ,धन और जमीन देख 
    कुत्ते की तरह जीभ लपलपाते है                                        
    सभी को कमजोर और गरीब बनाते है
    सूंघ सूंघ कर खा जाते  है हमारा माल
    फिर थपकी देकर कहते है खुद को सम्हाल

२-मै एक सार्वजानिक चौराहे पर खड़ा था
   सामने एक गरीब मुर्दा पड़ा था
   तमाम समाजवादी जहाज से उतर
   बड़ी बड़ी गाडियों में आ रहे थें
   साथ साथ चमचे नारा लगा रहे थे
   इसे ना भूख है ना प्यास है
   क्योकि ये सच्चे समाजवादी की लाश है

३-रामकली ने देखा और भोगा की
   गरीब औरत की कोई इज्जत नही है
   उसकी इज्जत की कोई कीमत नही है
   ऊँचे घरो में रहने वालो की इज्जत है कीमत है
   तों उसने अपनी इज्जत बेंचना शुरू कर दिया
   हर बड़े से उसकी इज्जत खींचना शुरू कर दिया
   और अपना घर इज्जत यानी पैसे से भर दिया
   अब उसके पास भी कोठी है कार है
   उसका भी बहुत फैला हुआ कारोबार है
   अब बड़ो के लिए उसका घर स्वर्ग का द्वार है
   अब वह भी समाज में बहुत इज्जतदार है 

४-एक माह से राशन की लाईन लगा लगा
   एक आदमी शहीद हो गया
   बेचारे ने बस आँख मुदा और चिर स्वप्नों में खो गया
   दो चार दी बाद जब सड़ी हुई लाश से बदबू आई
   तब लोगो ने उसे देखा और फिर भीड़  घबराई
   नाक दबाये कुछ लोग उसके पास आये और पूछा
   भाई तुम्हे क्या हो गया है राशन कुछ दिनों में मिल जायेगा
   आखिर कहा खो गया है
   मजबूती से लाइन में लग जा वरना पीछे वाला
   बड़े लोगो के बच्चो की तरह धक्का देकर आगे बढ़ जायेगा
   और फिर तू अगले साल तक राशन नही पायेगा
   तू यहाँ पड़े पड़े समाजवाद की लाश  बन जायेगा
   तभी आकाश से आवाज की  आई सुन मेरे भाई
   जनता को दो से ही आशाये और निराशाए होती है
   एक नेता से एक भगवान से
   नेता तों कुछ देने से  रहा   
   उसका तों सब उसके ख़ानदान  के लिए ही  कम है
   जब नेता ने राशन नही दिया, मै छला गया
   इसलिए राशन मांगने भगवान के पास चला गया