मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

जिंदगी में क्या किया, पैदा हुए खाया पीया मर गए

जिंदगी में क्या किया, पैदा हुए खाया पीया मर गए
या पैदा हुए,ये किया,वो किया और कुछ तो कर  गए 
जिए तो अपने लिए और मरे तो बस अपनों के लिए 
या कुछ देश,समाज औ इंसानियत के लिए कर गए ।

चमचे चुगलखोर दोनों महान है

चमचे चुगलखोर दोनों  महान है
वाह वाह देखो क्या इनकी शान है

भूखे नंगे थे ये अब करोडो वाले है
सभी को चूस गए मकड़ी के जाले है
बड़े बड़े ज्ञानी इनसे धोखा खा गए
ऐसी खास ताबीज गले में डाले है

जी हाँ सचमुच ये बहुत ही महान है



सोमवार, 1 अप्रैल 2013

बस तुम्हारे लिए, लेकिन

मैं चाँद पर चढूँगा तुम्हारे लिए 
चढूँगा भी, पर
अभी मेरे पैरों में दर्द है
मैं तारे तोड़ लाऊंगा
तुम्हारे लिए ,पर
हाथ थोड़े छोटे पड़ गए है
देखो मेरा दिल धडकता है
बस तुम्हारे लिए, लेकिन
मेरा दिल बहुत बड़ा भी तो है
इसलिए, इसमें समां गए है
बहुत से भांति भांति के लोग
चलना चाहता हूँ, सिद्धांतो पर
याददाश्त, कमजोर हो गयी है
याद ही नहीं रहे ,कोई सिद्धांत
मैंने तुमसे जो वादे किये थे न
वे भी मैं इसीलिए बार बार
भूल जाता हूँ
तुम बुरा मत मानो
मैं तो बहुत अच्छा हूँ
पर इन परेशनियो के कारण
ऐसा  हो गया हूँ
अब जैसा भी हूँ तुम्हारा या
बहुतो का ही हूँ ना
सब मिलकर मेरा कल्याण
करते रहो, क्योकि
तुम सब मेरे लिए हो, न
तुम सब नहीं बल्कि मैं
तुम सब की जिमेदारी हूँ ।
आओ अपना सब कुछ
न्योछावर कर दो मुझे
अपना अभीष्ट मान कर ।


शुक्रवार, 29 मार्च 2013

मजाक मजाक में कह देता हूँ

मजाक मजाक में कह देता हूँ
बहुत कुछ सच ,पर 
वो समझते है कि मजाक है
ये कितना बडा मजाक है
मेरी जिंदगी के साथ
मेरी भावना के साथ
पर खुश रहो मेरे दोस्त
तुम मजाक मान कर भी
बहुत कुछ ऐसा कह जाते हो
जो छू जाता है मेरे मन को
सहला जाता है मेरे वजूद को
और सिहरन पैदा का जाता है
मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व में
चलो यही सही
तुम इतना ही करते रहो
ये भी तो एक एहसान है
एक टूटे हुए इंसान के ऊपर
खुदा तुम्हे सलामत रखे
ताकि
तुम मजाक कर सको और उसे
मजाक ही समझते रहो
ज़िन्दगी भर
क्या पता
जिंदगी की डोर कब टूट जाये
कम से कम तब तक । 

सोमवार, 25 मार्च 2013

तुम्हे सब पता है मैं जानता हूँ

तुम्हे सब पता है
मैं जानता हूँ
मुझे सब पता है
तुम जानते हो
हम दोनों सब जानते है
पर दोनों ही चुप हैं
अपने लबों को कसकर
भींच रखा है
हाथो को पकड़ रखा है अपने ही
जज्बातों को बांध रखा है
पर तूफ़ान आता है जब
तटबंध टूट जाते है तब
तो बस चारो तरफ
सैलाब ही सैलाब होता है
और बह जाता है सब कुछ
ये जानते हुए भी
हमने बांध बना रखे है
अन्दर भी बाहर भी
टूट जाये सब कुछ
और आये तबाही
उससे पहले ही क्यों न
खोल दे सारे बंधन
उन्मुक्त होकर उड़ जाये
अनन्त आकाश में
स्वछन्द होकर
न तुम, तुम रहो,
न हम, हम रहे
बस कोई और बन जाये दोनों
जमीन पर आकाश पर
उस नीले पानी के अनन्त छोर तक
जहा जहा भी कुछ भी है वहा तक ।


रविवार, 3 फ़रवरी 2013

दीवारे भी साथ छोड़ देती है उनका ।

कुछ लोग, अकेलापन ढूढने को
भटकते है, कहा कहा और
आनंदित होते है, उसे पाकर
अपने अपने हालात में
पर कुछ, अकेलेपन से डर जाते है
आतंकित होने की हद तक
और शायद यही आतंक
उन्हें और उनके वजूद को, समझ को
झकझोर देता है, इतनी बुरी तरह
की वे, हर पेड़ पौधे,हर दीवार को
पकड़ने की कोशिश करने लगते है
वहशियाना अंदाज में
हाथ कुछ नहीं आता उनके
सिवाय अकेलेपन के, और
दीवारे भी साथ छोड़ने लगती है, उनका ।                                                                                                          

                                                                                                                                                                                                                                                                          

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

मेरा अपना दोस्त ही क्यों न लौटा देते

कितने बदकिस्मत होते है वे
जिनका कोई साथी नहीं होता
उन गिने चुने लोगो में एक मै भी
कभी कोई साथी नहीं मिला मुझे
जब छोटा था तो
गरीब था, इसलिए अमीर नहीं बने
जो गरीब थे, वे अमीर समझ कर
साथी नहीं बनते थे
कितनी दोहरी जिंदगी थी मेरी
मैंने गरीब को दिखाया अपना
बिना जूतों वाला पैर स्कूल में
पर उसने विश्वास नहीं किया
अमीर को दिखाया, पिता का नाम
पर जेब देख कर, वो नहीं माना
इस तरह, मेरा कोई दोस्त नहीं बना
समाज व्यवस्था में, एक दोस्त बना
व्यवस्था की मजबूरी के कारण
वो मेरी पत्नी थी
पर जिसकी किस्मत में, दोस्त न हो
उसे पत्नी दोस्त भी क्यों और
ईश्वर ने छीन लिया, ये दोस्त भी
बिना दोस्त के जिंदगी क्या
पर सवाल तो अपनी जगह है की
मेरा कोई दोस्त नहीं है 
नकली दोस्तों
मै जनता हूँ की, मै बहुत अकेला हूँ
अपनों की भीड़ में भी
मेरा अपना दोस्त ही, क्यों न लौटा देते
जैसा भी था ,पर मुझे तो प्यारा था ।

कल रात वो मुझसे मिली सपने में

कल रात वो मुझसे मिली सपने में
दुनिया से जाने के इतने सालो बाद
कुछ नहीं बोली बस देखती रही
टुकुर टुकर मेरी तरफ
आँखे गीली थी
फिर झरना बन गयी 
फिर भी कुछ नहीं बोली
बस निहारती रही मुझे निरीहता से
मुझे बेबस और टूटता देख कर भी
कुछ नहीं कर पाने ,सहारा नहीं दे पाने
प्यार से सहला नहीं पाने की बेबसी से
फिर कातर निगाहों से मुझे देखा और
मुस्कराने की मुश्किल सी कोशिश की
और फिर हाथ हिलाती चली गयी
मै समझ नहीं पाया देख नहीं पाया की
मजबूत होकर रुकने का इशारा था
या फिर बुला गयी, मुझे भी अपने पास ।

मै सबसे अलग हूँ ।

पता नहीं क्यों आजकल
कुछ बिखरता रहता है हर वक्त 
कुछ टूटता रहता है अंदर अंदर
पता नहीं कहा से पैदा हो गया है
आंसुओ का सैलाब अंदर अंदर
निकलता है तो वेग के साथ
और रोकता हूँ तो उफनता हुआ
बांध बन जाता है
बांध जब सचमुच टूटेगा अंदर का
तो क्या वैसी ही तबाही फैलाएगा
जैसी फैलाता है जमीन पर बांध
बांध को कस कर रोकना ही होगा
चाहे रोकने में खुद को मिटना पड़े
पर बहुत कुछ हर क्षण
ख़त्म हो रहा है, छीज रहा है
अंदर अंदर
क्या सभी के साथ ऐसा ही होता है
क्या सभी अपनों बहुत अपनों
के ही मारे और सताए हुए होते है
नहीं न ! तभी तो लोग कहते है की
मै सबसे अलग हूँ ।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

वो रौंदी गयी बार बार

वो रोयीं थी जब उसको
रौंदा गया था बार बार
उसे लगा की कोई तो होगा
इनमे से, जो बाप या भाई होगा
और, बचा लेगा उसे इस रिश्ते से
पर भाई ही, कसाई हो चुका था 
जो नहीं हुए, वो तमाशबीन थे
वो रौंदी गयी बार बार
जो रौंद रहे थे
थोड़ी देर बाद वही, किसी को
बहन कह कर पुकारेगे
किसी को, माँ कह कर लिपटेगे
किसी को, बेटी कह कर गोद में उठाएगे
और तब, भूल जायेगे की थोड़ी देर पहले
उसने एक माँ ,बेटी और बहन को रौंदा था
आज ही वह किसी मंदिर जायेगा
की उसे इस गुनाह की सजा से बचा लो
माँ ,देवी माँ 
और भूल जायेगा की, थोड़ी देर पहले उसने
इन्ही देवी माँ की अस्मिता को गाली दिया है
क्यों भूल जाते है लोग, आखिर क्यों
क्यों हर पल कोई बेटी बहन या माँ
रौंदी जाती है, अपनों द्वारा ही
क्या कोई कृष्ण नहीं देख रहा इसे
जिसने केवल साड़ी खींचने पर
भारत को, महाभारत दे दिया
क्या कोई राम नहीं है शेष जिसने
सोने की लंका को खाक कर दिया
नहीं ,तो फिर ये मेरा महान भारत नहीं
कही खो गया मेरा वो महान भारत
जवाब कौन देगा ,हिसाब कौन देगा 



गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

मैंने कसम खाई सच पर चलते जाने की

मैंने कसम खाई सच पर चलते जाने की 
लोगो की भी जिद है बस मुझे मिटाने की
चाहे कितनी ताकत हो या आंधियां चले
मेरी जिद फिर भी एक दिया जलाने की ।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

चमचे महान थे ,अब परेशांन है

चमचागिरी चुगलखोरी
ऊपर ऐसी सीना जोरी
राजनीती वाह वाह
चमचे महान है
करतबी इन्सान है
इन्सान है या नहीं
ये बड़ा सवाल है
ये बड़ा बवाल है
जहा कही कुछ मिले
सब चर जाते है
किसी का कुछ भी हो
अपने घर लाते है 
भूख नहीं मिटती है
निष्ठां नहीं टिकती है
मौसी हो मामा हो
सब ही शिकार है
बस पैसा प्यार है
राजनीती ही नहीं
रिश्ते भी व्यापार है 
चमचागिरी जिंदाबाद
चुगलखोरी जिंदाबाद
वफ़ादारी मुर्दाबाद
ईमानदारी मुर्दाबाद
राजनीती का हाल ये
खुद में सवाल ये
पर जवाब कौन दे
इसका हिसाब कौन दे
जो कान का कच्चा है
या मन का मजबूत है
जो सच्चा नेता है
देश का प्रणेता है
राजनीती सत्य हो
सत्य राजनीती हो
बस यही नीति हो ।
चमचे महान थे
अब वो परेशांन है
बस यही विधान है ।



मंगलवार, 20 नवंबर 2012

बड़े ही बेख्याल है, मेरे शहर के लोग

बड़े ही बेख्याल है, मेरे शहर के लोग
खुद में ही सवाल है मेरे शहर के लोग ।

भैये गुरु की आवाजें यहाँ गूंजती रहती
दोस्ती में मालामाल है मेरे शहर के लोग ।

कोई किसी का नहीं और सब सबके है
ये कैसा इंद्रजाल है मेरे शहर के लोग ।

दुनिया को प्रेम सिखाता है ताज का शहर 
नफ़रत से मालामाल है मेरे शहर के लोग ।

ये ताजमहल खा गया लाखो की रोटियां
पर ताज पर निहाल है मेरे शहर के लोग ।

पानी नहीं बिजली नहीं सड़कें नहीं यहाँ
पर खुश है खुशहाल है मेरे शहर के लोग ।

लूटे ,पिटे या गिर ही गए कोई गम नहीं 
चलते  ही मस्त हाल है मेरे शहर के लोग ।

पडोसी के घर डाका या बेटी ही उठ गयी
सुबह पूछते सवाल है मेरे शहर के लोग ।

चाट के दोनो और पीक से भर दिया शहर
हाँ साफ़ सुथरे लाल है मेरे शहर के लोग ।

जुम्मन या रामलाल की बेटी पर चटकारे
हर वक्त रंग गुलाल है मेरे शहर के लोग ।

वोट दिया जाति धर्म या खास वजह से
क्यों  पूछते सवाल है मेरे शहर के लोग ।

चलो तय करे सचमुच बदलेंगे शहर को
पर इसमें सुस्त हाल है मेरे शहर के लोग ।

क्या क्या कहूँ क्या न कहूँ अपने शहर को
मेरे है और मेरी ढाल है मेरे शहर के लोग ।

जिसे भी अपना मान दिल में जगह दे दिया
बने वही जी का जंजाल है मेरे शहर के लोग ।

कवाब ,भंग या शराब संग मस्ती में रहना है
खजाने का करते ख्याल है मेरे शहर के लोग ।

मेरा शहर तो हर  वक्त बस झूमता रहता 
जी हाँ खुद में सुर ताल है मेरे शहर के लोग ।

नाले है घर में बह रहे या घर ही बना नाला
जी हाँ तलैया और ताल है मेरे शहर के लोग ।






गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

क्या रावण जल गया ?



क्या रावण जल गया ?
ख़त्म हो आज रावण ?
जिसे हम कहते हैं रावण
वो बुराइयाँ मिट गयी ?
क्या जीत गया राम
तो कौन सा
जो वन वन भटका
सीता के लिए
और डाल दिया
उन्ही को आग में
भगा दिया किसी के
कहने पर जंगल में
उन बच्चो समेत
जो अभी पेट में थे
क्या रावण ने किया था
इससे बड़ा अपराध
वे अपराध क्या क्या थे ?
कोई ये भी तो बताये
कोई तो समझाए अच्छाई
बुराई की परिभाषा
कौन सी बुराई बड़ी और
कौन सी अच्छाई
हम जलाते रहेंगे रावण
और जिताते रहेंगे राम को
या कभी तय करेंगे ये भी
की क्या होगा दुनिया और
इंसानियत के हित में ?

शनिवार, 22 सितंबर 2012

इतने सालों के बाद दिल्ली को क्या हुआ

इतने सालों के बाद
दिल्ली को क्या हुआ
साठ साल होने पर
परिपक्व होते सब
पर यहाँ तो बचपन
एडियाँ रगड़ता है
आपस में झगड़ता है
रास्ता पता नहीं
वास्ता पता नहीं
अपना पराया हो
कोई खता नहीं
बस खाने का झगडा
फ़ैलाने का झगडा
क्या कमी रह गयी
पालन में पोषण में
संघर्ष में विश्वास में
जो किया जनता ने
इतने सारे सालों में
जो दिया जनता ने
इतने सारे सालों में
दिल्ली सम्हल जाओ
दिल्ली बदल जाओ
वरना इतिहास है
दिल्ली बदलती है
जनता बदलती है
जनता बदल देगी
अपना हक ले लेगी ।



दिल्ली क्या बोलती

दिल्ली क्या बोलती
रहस्य नहीं खोलती
भीतर भीतर खौलती
सबका सब तौलती
क्या होगा अगले पल
दिल्ली नहीं जानती
घनघोर अँधेरा है
ढूँढती सवेरा है
रास्ता दिखाए कौन
वाम तक पहुंचाए कौन
सबके मन में वार है
जेब में कटार है
बस मौका कब मिले
उसका इंतजार है
क्या दिल्ली कल बोलेगी
कुछ मन का खोलेगी
सब कुछ मौन है
रहनुमा कौन है
कोई है या कोई नहीं
ये नयी बात नहीं
दिल्ली बस नाम की 
बेदिल की दिल्ली है
बस मतलब दिल में है
चलाने को हथियार यहाँ
आँखों पर पट्टी बांध
हर कोई है तैयार यहाँ
जिसे चाहे जितना लगे 
पर केवल मेरा भाग्य जगे
दिल्ली का इरादा ये
दिल्ली का वादा ये
दिल्ली खामोश है
अंदर कितना शोर है
सोने का समय है पर
जागरण चारो ओर है
समुन्द्र का मंथन है
विष भी और अमृत भी
जनता को मिले केवल विष
अमृत पी जाते है
भेष बदल राक्षस कुछ
कहानी ये कभी और की
पर दिल्ली में है आज भी
युद्ध अभी जारी है
रक्षस और देवताओं में
दिल्ली और गांवों में ।




सोमवार, 17 सितंबर 2012

कितना बहादुर समझते है

कितना बहादुर समझते है
हम खुद को और सोचते है
कि आसमान पर उड़ेंगे
नाप देंगे समुद्र को
हवाएं हमारी इजाजत से चलेंगी
पहाड़ छोड़ देगा रास्ता
हम जैसे और जहा चाहेंगे
उड़ेंगे खूब उड़ेंगे
हममे आ जाता है भाव
अहम् ब्रह्मास्मि का
पर
एक छोटा सा झटका
एक छोटी सी बीमारी
डरा देती है हमें
जब अबूझ बन जाती है
और हम अचानक
जमीन पर आ जाते है
इन्सान बन जाते है
एक दम उस समय के लिए ।

शनिवार, 25 अगस्त 2012

ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

बारिश आयी
नदिया
खतरे के निशान से
ऊपर हुयी और बह गयी
बाढ आई
बहा दिए लोगो के
घर ,सुख चैन
और ख़त्म हो गयी
बाकी दिनों पूरा देश
पानी को तरसता है
जंतर मंतर और
रामलीला मैदान में
ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

होली नहीं खेलता मै

होली नहीं खेलता मै
बचपन बीतने के बाद से
बचपन कब बीता 
और मै बड़ा हो गया
पता ही नहीं चला
क्योकि 
अपने जिनके कारण हम 
बचपन पकडे रखना चाहते है
वे हाथ छोड़ झटक देते है 
बचपन को
साया देने वाले अधिकार को
खैर 
होली नहीं खेली बहुत साल से
तभी कोई आया 
हवा का झोंका बनकर
खाली जीवन में 
और अपने साथ लायी
एक मुट्ठी बदली और
बंजर जमीन पर नम हवा 
तथा
मुट्ठी भर बदली से निकली 
फुहार ने
उगा दिए कुछ पौधे
होली मै तब भी नहीं खेलता था
परन्तु 
रंगों से सराबोर हो जाता था
अच्छा लगता था
किसी का ठठा कर हँसना
खुद रंगा होकर सबको रंग देना
ठहाकों से तथा अपने रंगों से
मेरी बंजर जमीन पर उगे पौधे
जब एक दिन पहले 
तैयारी करते थे
कपड़ों की रंगों की 
तथा पिचकारी की
अगले सुबह ही उठकर 
शरीर पर मलते थे
तेल या क्रीम ,रंगों से बचने को
फिर रंग फेंकते थे ,बचते थे 
और
खुद रंग भी जाते थे सराबोर
फिर शीशे में खुद को पहचानना 
और
दूसरों को देख कर 
ठठा कर हँसना
फिर प्यार से गोद में बैठ कर 
अपने रंगों से 
सराबोर कर देना मुझे भी
कितना सुखद था ,
कितनी ऊर्जा थी
कितना जीवन था ,
जीवन का अर्थ था
फिर 
अचानक 
बुलावा आ गया किसी का
जहा से आई थी बदली
मै ही भूल गया था 
बादल आते है बरसते है ,
धरती को नमी देते है
कुछ बारिश रुक जाती है
जीवन बन कर 
जीवन के कुए में ,
तालाब में या झील में
और 
कुछ को 
सूरज सोख लेता है वापस
और 
पहुंचा देता है वही हर बूँद को
जहा से उसे दुबारा 
तय करना होता है सफ़र
इस क्रिया को भूल जाना 
और
न पकडे जाने वाली चीज को
पकड़ कर रखने की कोशिश ही 
शायद संबंध है,संवेग है 
और 
अनबूझ पहेली भी
मै फिर अकेला निहार रहा हूँ
लोगो को होली खेलता 
होली की बात करता
मैंने भी सन्देश भेज दिया 
और हो गयी होली
धीरे धीरे मेरे पौधे भी 
अपनी नयी जमीन पा गये
जहा वे विस्तार पा सके
और 
फिर मेरा भी 
सफ़र शुरू हो जायेगा
अपनी बदली को ढूढने और
उसमे समाहित हो जाने को  ।





ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है

ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है 
जीवन में आती है तो जीवन बिगाड़ देती है ।
इतना मत इतराओ अपने दौड़ने पर यारो
ये आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

संसद में ये बहस है कि बड़ा चोर कौन

संसद में ये बहस है
कि बड़ा चोर कौन
संसद भी है मौन
सांसद भी मौन
ये बड़ी बहस है
निर्णय करेगा कौन
वोटर हैरान है
मानस परेशान है
मौन संविधान है
ये कौन सा विधान है
सब लोकतंत्र लोकतंत्र
खेल रहे है
हम तठस्थ बन कर
इन्हें झेल रहे है
फिर सवाल अपनी जगह
ही खड़ा हुआ
हमारी तटस्थता से बड़ा हुआ
कौन बड़ा चोर है
कुछ लोग या हम सब
क्योकि हम तठस्थ है
नून तेल में व्यस्त है
देश चाहे रहे या भाड़ में जाये
जहा कही माल हो
मेरे घर में आये
तब क्या सवाल है
काहे का मलाल है
कौन बड़ा चोर है
तोर है या मोर है
पर अब तय ये रहा
हम सब चोर है
या तो जागो खड़े हो
संसद से भी बड़े हो
या फिर सत्ता सौप दो
राजा रजवाड़े को
और खुद को सौंप दो
भेड़ वाले बाडे को
लोकतंत्र का खेल
हो गया है झेलमझेल
या संविधान बांच ले 
पुरसार्थ मांज ले
अपना ज्ञान जाँच ले
और तिरंगा थाम ले
बापू ,सुभाष नाम ले
देश के सवाल पर
जाति ,धर्म छोड़ दो
बस अपने स्वार्थों
का रुख जरा मोड़ दो
संसद जगा दो तुम 
भ्रस्टों को भगा दो तुम 
देश को मजबूत कर
मत डर ,मत डर ,मत डर  ।


क्या फर्क है माँ और माँ में

आपने देखा है
उस चिड़िया को
परेशान चीखते हुए
और मंडराते हुए
घोसले के आस पास
किसी से अपने बच्चो की
सुरक्षा की चिंता में
जिसका मुकाबला नहीं
सकती है वो
कभी देखा है किसी माँ को
टपकती छत से हर तरह
जतन कर भीगने से बचाती
अपने छोटे बच्चों को
मैंने दोनों को गौर से देखा है
क्या फर्क है माँ और माँ में
चाहे ओ इन्सान हो या चिड़िया
माँ खुद पर ले लेती है
हर मुसीबत
और बचा लेती है बच्चो को
अपनी सामर्थ्य भर
पर क्या बच्चो को याद रह जाता है
ये सब
नहीं न
क्योकि वे तब अबोध बच्चे थे ।

बेटियां खीच लेती है

बेटियां खीच लेती है
सारा प्यार पापा का
और बेटा दीदियों से
प्यार खीच लेता है
और माँ से भी
कभी माँ ही पिता और
पिता ही माँ दोनों हो जाते है
अनचाहे कारणों से
तब प्यार बंट जाता है
बराबर बराबर
पर फिर भी बेटियां
पा जाती है ज्यादा प्यार
और बेटा बन जाता है संबल ।

तन है ,मन है और मस्तिस्क

तन है ,मन है और मस्तिस्क
शरीर है ,दिल है और दिमाग
दोनों एक ही है
तन की तड़प अपनी है
मन की तड़प अपनी है
और मस्तिस्क की अपनी
शरीर, दिल और दिमाग की
भी यही ,दोनों एक है ना ,
शरीर कुछ चाहता है
मन रोक नहीं पाता 
और मस्तिस्क भी
मन कुछ चाहता है
और शरीर साथ नहीं देता
मस्तिस्क विद्रोह कर देता है
कभी कभी
मस्तिस्क रास्ते तय करता है
मन विचलित हो जाता है
और शरीर अलग चला जाता है
लड़ते रहते है तीनो ज्यादातर
कभी कभी ही तीनो एक ही
दिशा में चलते है
और जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

दिल है और दर्द है

दिल है और दर्द है
दिल हँसता है
दर्द रोता है
जब दिल रोता है
तो दर्द हँसता है
और दोनों के बीच
कोई दर्द के कीचड में
धंसता है
वो मै हूँ या आप है
या और कोई
पर कहानी तो सच्ची है
दिल की और दर्द की ।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

इतनी जिंदगी बीत गयी

इतनी जिंदगी बीत गयी
संघर्ष के साथ ,
पर पहली बार लग रहा है
की थकने लगा हूँ और अब बस
और क्या संघर्ष करना
और किसके लिए करना
पर मै फिर खड़ा होऊंगा
और चल पडूंगा
क्यों की मेरा स्वाभाव
थकना और पलायन नहीं है ।

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कितने बदकिस्मत होते है

कितने बदकिस्मत होते है
वे लोग
जिन्हें दूसरे नही अपने ही
मारते है बार बार
वो मार खाकर गिरता है
फिर हिम्मत जुटा कर उठता है
सोचता है अब चलूँगा मै भी
कि फिर कोई बहुत अपना
तोड़ देता है उसके पैर
फोड़ देता है उसकी आँखें
और कुचल देता है
उसके चलने के इरादे
क्या करे ये बदकिस्मत
छोड़ दे हर अपने को
क्योकि
बाहर वाले तो कभी
कुछ बिगाड़ नहीं पाए
वो कैद हो गया है
अपने  जो दुश्मन है
उनकी कैद में ।




शनिवार, 7 जुलाई 2012

हजार बार खुद को अजमाया हमने

हजार बार खुद को अजमाया हमने
हमेशा खुद को मजबूत पाया हमने ,
लोग कहते है  अब की  डूब जाओगे
पर बीच समुंदर  तैरता पाया हमने ।

शुक्रवार, 29 जून 2012

सिलसिला शुरू तो हो, परिणाम देखेंगे

सिलसिला शुरू तो हो, परिणाम देखेंगे
दो कदम साथ चलो, खासो आम देखेंगे ,
पहले क्या तय करना क्या है नसीब में 
मेरा हाथ पकड़ो तो फिर अंजाम  देखेंगे ।

गुरुवार, 28 जून 2012

असमान वाले नीचे झांक कर देख

असमान वाले नीचे झांक कर देख
तेरे बनाये पुतले ये क्या कर रहे है
तूने दिया था बोने को फल, फसलें
पर ये इन्सान तो बारूद बो रहें  है ।

गुरुवार, 17 मई 2012

वो समझा था कि वो सिकंदर है

वो समझा था कि वो सिकंदर है
पर समझा की सब मुकद्दर है ।
बड़ी देर लग गयी जान पाने में 
ये जानने में सामने समंदर है ।
क्या जानेंगे हम बाहर क्या  है 
जब जानते नहीं क्या अन्दर है । 
वो है मेरी है भी और नहीं भी है 
ये वो जाने सब उसके अन्दर है । 
बातें होती है तो बहुत बातें होती 
बातों का मतलब जाने  इश्वर है ।
मै कहना चाहता हूँ चाहत अपनी 
सोचता हूँ आँखे बोलें जो अन्दर है ।
वो क्या नासमझ है नहीं समझते है
मै क्या कहूँ की दिल में समन्दर है ।
लगता है जिंदगी यूँ ही बीत जाएगी 
वो भी अकेले है अकेला मेरा घर है । 



शनिवार, 12 मई 2012

क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।

जमीन है नहीं पर कोठियों के सपने है
कोई भी अपना नहीं पर सब  अपने है ।
हमने सोचा न था कि हम बहक जायेंगे 
पर बहक गए है तो कारण भी अपने है ।
आसमान से आग बरसी जल गए हम 
पाँव में छाले है तो हम कैसे चल पायेंगे ।
लोग कहते है कि तुम इतने पीछे खड़े हो 
बेंच दें जमीर बहुत आगे हम चले जायेंगे।
हमें भी तमन्ना हो गयी बड़ा बन जाने की 
बेईमान नहीं हम बड़ा आदमी कहलायेंगे । 
लूट लो बस जर जमीन जोरू जो भी मिले 
फिर शान से चलो सभी नीचे नजर आयेंगे। 
कोठी कुत्ता कार और चमचे भी होंगे खूब 
फिर हम देश में काबिल महान कहलायेंगे ।
वाह रे ये देश ये समाज, तुझे सलाम मेरा 
अच्छों को थू थू और बुरों के गीत गायेंगे । 
क्या फर्क जमीन बिना कोठियों के सपने है
सब होगा आसान जब हम नंगे हो जायेंगे।
बस इसी की दौड़ है चली आज मुल्क में मेरे 
क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।
चलो कोई तो जुबान खोलो नंगों को नंगा कहो 
कई वर्षों के गुलाम हम फिर वही बन जायेंगे ।
आओ नकाबों को उतारे इन्हें सचमुच नंगा करें 
जब नंगे होंगे ये असल में मुह क्या दिखलायेंगे ।



बुधवार, 9 मई 2012

कितने महंगे है ये हस्ताक्षर और इन्हें करने वाले लोग

मै चला था कि बस एक हस्ताक्षर होगा 
और दूर हो जाएगी मेरी सारी समस्याएं 
चहकने लगेगा मेरा परिवार और बच्चे 
लग जाएगी मेहदी एक बेटी के हाथों में 
पर नहीं जानता था कि कितने महंगे है 
ये हस्ताक्षर और इन्हें करने वाले लोग 
इन्सान नहीं है,बल्कि पैसे की मशीन है 
ये लोग बहुत बड़े हो गए है बहुत ऊंचे भी  
ये सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल करते है 
लोगो को ,उनकी भावनाओं,आस्थाओं को 
पर खुद हो गए है पत्थर केवल पत्थर
पत्थरों को क्यों सत्ता क्यों वैभव क्यों पैसा 
पत्थर क्या करेंगे इन चीजों का, क्या करेंगे 
ये चीजें तो इंसानों के लिए है इंसानों के लिए 
सत्ता होती है लोगो की लोगो द्वारा लोगो के लिए 
पर ये लोग तो खुद ही  बन गए है तीनों लोग  
फिर कहा बचते है मै ,आप या कोई और 
मै बड़े विश्वास से गया था अपना समझ कर 
पर लौट आया बेगाना बन कर लडखडाता हुआ 
ये भी जीवन का एक कड़वा सत्य है ,हा सत्य 
पर हार जाने के बजाय उन्हे हराना है मकसद .
जो इन्सान नहीं पत्थर बन गए है कठोर पत्थर 
सकल्पों को मांज लेना है तय कर लेना है कि 
लड़ाई अभी बाकी,है फैसलाकुन लड़ाई बाकी है 
उठूँ  बहुत चल लिया अब उन्हें चलता करना है 
यही है संकल्प ,यही है इरादा,बाकी अपने संकट 
वो छोड़ देता हूँ वक्त के हाथों में ,संघर्ष के हाथों में ।

शनिवार, 5 मई 2012

एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है

पांव है थके थके पर दूर बहुत जाना है 
पर चलने की उमंग है मन में उत्साह है 
चलना ही जीवन है रुक जाना अंत है                                       
चल रहा हूँ मै लेकिन रास्ता अनंत है ।
जीवन संघर्ष है, पहाड़ की चढ़ाई है 
अपने पुरसार्थ क़ी अपनी कमाई है
चलना है,रुकना नहीं चलते ही जाना है ।
रास्ते  में कांटे हो, जंगल हो, पहाड़ हो 
रास्ते में बाधा कोई सिंह की दहाड़ हो 
चलते ही जाना है चलते ही जाना है  ।
आते है तो रोते हुए और सब हंसते है 
रास्ते में कभी मौन,हंसना भी रोना भी 
जाते हुए मौन खुद, बाकी सब रोते है 
कौन परवाह करे हंसने की रोने की 
मंजिल को पाना है चलते ही जाना है ।
मंजिल नहीं मंजिलें है जैसे हो सीढियाँ 
हौसले बनाये रख कदम कदम चलना है 
चलते ही जाना है चलते ही जाना है ।
रास्ता दिखाया था बड़ों ने आगे कभी 
वो तो चले गए अपनी अनंत यात्रा पर 
अब आगे चलना है रास्ता दिखाना है 
पीछे है हमारे जो उन्हें रास्ता बताना है 
मंजिलें दिखाना उन्हें काँटों से बचाना है 
यही है कर्त्तव्य बस यही वो आयाम है 
अपनों को धीरे धीरे वाम पर पहुँचाना है 
चलते हमें जाना है चलते हमें जाना है ।
गिरे, उठे ,चल दिए, पार की खाइयाँ 
लडखडाये फिसले भी पार की पहाड़ियां 
काँटों के चुभने की कभी परवाह नहीं 
बहुत तेज गिरे पर निकली आह नहीं  
पैर हो जमीन पर अहंकार दूर रहे 
किसे परवाह  कौन कौन क्या कहे 
बस यही सत्य है , यही संकल्प है
सारे सोपानों को ,मंजिलों को पाना है 
एवरेस्ट पर्वत पर झंडा फहराना है 
चलते ही जाना है चलते ही जाना  है ।



रविवार, 23 अक्टूबर 2011

देखो दीपक बोल रहा है

देखो दीपक बोल रहा है
हमारी आँखें खोल रहा है ,
सूरज का अहंकार है तोडा ,
अँधेरे का पीछा न छोड़ा ,
चाहे जितना जला रत भर ,
उसने अपना वचन न तोडा ,
सीख सकेंगे हम भी क्या दीपक की भाषा ,
हम भी फैला सकेंगे लोगो के जीवन में आशा ,
आओ इस दिवाली में ऐसी कसम खाए हम ,
जहा कही भी हो अँधेरा रोशनी पहुंचाए हम ,
वो रोशनी ज्ञान की हो ,नेत्रदान की हो ,
गरीबी,भूख ,अशिक्षा ,अपराध ,भ्रस्ताचार 
मिटाने के अभियान की हो |
तब दिए जलाएं, आप और आप के 
परिवार को दिवाली की शुभकामनायें |



















गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

सोमवार, 13 जून 2011

मै समझा कि जब चाहूँगा दूरिया नाप दूंगा मै ,

मै समझा कि जब चाहूँगा दूरिया नाप दूंगा मै ,
दूरियों ने कहा हम तुमसे बस चार हाथ  दूर है 
चलो,बढ़ो तुम मुझे छू लो और चाहो तो पा लो
अरे तुम रुक क्यों गए बस चार हाथ ही दूर मै 
थक गए तो रुक जाओ और मेरा इंतजार करो 
मेरा रास्ता जब मुडकर बस तेरी तरफ आएगा  
दूरी नहीं रह जाएगी रास्ता तेरी तरफ आएगा   
क्या सचमुच मंजिल पाना मेरे हाथ में नहीं है 
मै  दर्द से  कराह रहा था कि मंजिल मेरी नहीं  
मंजिलो ने कहा मंजिल नहीं मंजिले भी है तेरी 
अब मै रुकूंगा नहीं चलूँगा मंजिले सब मेरी है







 


सोमवार, 30 मई 2011

खुशियाँ चूम और आसमान तेरा है

मै सोचता था आसमान मेरा है ,
पर यहाँ तो हर तरफ अँधेरा है |
ढूढो यही कही कोई सूरज होगा,
जो कहेगा देख ये तेरा सवेरा है |
इतने तारे जो आसमान में फैले,
पुकारते है सारा आसमान तेरा है |
जो थक गया  जरा सी चढ़ाई पर , 
अभी बहुत दूर आसमान तेरा है |
अँधेरे, उजाले दोनों ही जिंदगी है,
अँधेरा है तभी तो सुबह सवेरा है |
अधेरे को तू आने दे और जाने दे,
इरादे रख तो  रोज नया सवेरा है |
चढ़ जा इरादों की किसी पहाड़ी पर,
खुशियाँ चूम और आसमान तेरा है |
























शनिवार, 21 मई 2011

मै एक किनारा हूँ और मेरी खुशियाँ दूसरा ,

आप कभी नदी के किनारे किनारे चले है ,
प्रारंभ में भी दो किनारे और अंत तक भी,
जब तक नदी समां  नहीं जाती समुद्र में  ,
तब तक किनारे मिलने को बेताब ,बेसब्र  ,
पता नहीं समुद्र में विलीन हो जाने पर भी, 
किनारे मिल पाते है या दो तरफ ही जाते है  ,
मै एक किनारा हूँ और मेरी खुशियाँ दूसरा ,
किनारों जैसे कभी नहीं मिल पाएंगे ये भी  |






मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

मुझे लगा श्राप तो अहिल्या से भी कठोर है

कितना अकेला हो गया मै !
कितना पंगु हो गया मै !
कितना असहाय हो गया मै !
एक चौराहे पर सांसें रोके  खड़ा हूँ मै !
कोई दिशा नहीं ,कोई लक्ष्य नहीं ,कोई इरादा नहीं ,
यदि लक्ष्य है तो बाधा बन कर खड़े है,
अपने ही सदा की तरह |
यदि इरादे है भी तो,
उसपर अन्धकार बनकर छाये है अपने ही |
और घोर अंधकार में कही कोई चल पाया है?
जो मै चल सकूँ ?
बस रास्ते पर पड़े पत्थर सा,
उससे अलग भी तो नहीं हूँ मै!
जब भी कोई कोशिश करता हूँ
की  रुके रास्ते चल पड़े ,
अपनी ही अनुभूतियाँ खड़ी हो जाती है,
बाधा बन कर |
बाहरी अवरोधों को तो ठोकर से हटाया जा सकता है ,
संघर्ष किया जा सकता है उनसे,
पर अपने बहुत प्यारे लोगो से !
शायद नियति ही यही है,
चौराहे का पत्थर बन पड़ा रहना |
जो सिर्फ तब हिल सके जब कोई ठोकर हटा दे ,
या कोई गाड़ी कुचल कर उछाल दे कही |
पर रास्ता तो फिर भी नहीं खुलेगा ना,
जब तक रास्ते खुद से तय ना हो,
लक्ष्य खुद से तय ना हो ,
और उसमे अपनों की खिलखिलाहट ना हो |
अहिल्या की भांति श्रापित पत्थर ही हूँ मै,
चौराहे  के बीच पड़ा हुआ |
अहिल्या के लिए तो राम का आना तय था ,
पर मै तो अकेला हूँ और पहचान खो चुका हूँ |
और जब कोई पहचानता ही नहीं!
तो राम भी क्या करेंगे ?
मुझे लगा श्राप तो अहिल्या से भी कठोर है |












शनिवार, 16 अप्रैल 2011

और खोज ख़त्म हो जाएगी खुद ही



निस्तब्ध सोच रहा हूँ
क्या ये मै ही हूँ
मै हूँ तो इस कदर मौन क्यों हूँ 
क्या सचमुच मै ही हूँ
या ढूढ़ रहा हूँ खुद को और खुद में ही !
पर ये खोज बहुत मुश्किल है,
खुद के अन्दर खोज पाना खुद को ही ,
पर खुद को ---प्रयास जारी है ,
लगता है अब जाने की बारी है | 
फिर होगा मौन ,मौन और बस मौन 
और खोज ख़त्म हो जाएगी खुद ही |

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

कितना गरीब हूँ मै कि आंसू तो है

क्या होता है और क्यों होता है जब 
आंसू आते है, मन करता है की जोरे से रोयें 
बिलकुल बचपन की तरह बुक्का फाड़ कर 
और रो नहीं पाते है |
बस घुटते रहते है, अंदर ही अंदर 
बड़ा क्या हुए, खुल कर रोने का अधिकार भी नहीं 
हँसने की जबरन कोशिश भी रुला देती है 
रोना तो कही मन की, दिल की गहराइयो से आता है 
कोई तो बता दो कैसे रोये, कहा रोये ?
कोई कोना नहीं है छुपाने को 
कोई कन्धा नहीं है सिर रखने को
कोई हाथ नहीं सिर सहलाने को 
कोई गोद नहीं ,सुबकने को 
कोई सीना नहीं हिचकी लेने को
कितना गरीब हूँ मै कि आंसू तो है 
पर रोने की  जगह मेरे पास नहीं 
जुबान भी नहीं बची या दब जाती है 
उसे दबा कर रोने लगता हूँ जोर जोर से
जिसे केवल मै सुन सकू 
अँधेरे में अपने बिस्तर पर या 
उस फोटो के सामने बैठ कर 
जो रोने नहीं देती थी 
जो आधार था हँसने का 
पर मै खुल कर जोर से कैसे रोऊ 
कब तक दबाऊँ मै भावनाओं को फूटने से 
नहीं रोऊंगा जोर से, तो मै फट पडूंगा जोर से |



 


रविवार, 20 मार्च 2011

आज होली है ,रंग लगाना है लगालो अच्छे अच्छे रंग डालो

आज होली है ,रंग लगाना, लगालो, अच्छे अच्छे रंग डालो,
ये लाल रंग है ,लहू का भी लाल होता है, फैसला तुम्हारा,
किसी  के लिए रक्तदान करो या बेगुनाहों का रक्त बहालो,
या रुके हर तरह का रक्तपात ऐसी कोई  व्यवस्था बनालो|
और आप हरा रंग लाये हो ,लगता है कीचड में नहाये हो,
आओ पूरी धरती को फिर हरा भरा बनाये,हों भरपूर फसलें,
फलों के बगीचे ,फूलो की क्यारी नहीं तों गमले ही लगाये,
और नीला , नीला आसमान नीला समुद्र साफ हो नदियाँ,
साँस लेने लायक हवा ,पीने लायक हो पानी नहीं तों ,
खुद ही मिट जाओगे  तों होली कैसे मानोगे |
पीला है तुम्हारा रंग होली का अपनाओ नया ढंग,
गरीबी और बेबसी के कारण जो बेटी आत्महत्या करने या,
बिकने को तत्पर है ,उसे बचाने का तुम्हे  एक अवसर है,
उसके हाथ पीले कर,कफ़न से बचा लो पीली चुनरी ओढा दो ,                                                                 
जीवन में खुशहाली  और उसके घर में पीली होली सजादो |
तुम काला रंग ही लाये हो या तुम्हारा मन भी है काला ,
अपना  इरादा बतादो ,अपना असली चेहरा तो दिखादो ,
हो सके तों ये रंग समाज पर नहीं समाज के दुश्मनों पर डालो,
उन्हें ढूढ़ निकालो और बतादो काले इरादों के लिए नहीं है स्थान,
ये राम कृष्ण बुद्ध महावीर गाँधी के साथ सुभाष का हिंदुस्तान |
काला रंग और काला इरादा लेकर आओगे तों पछताओगे,
रंग के साथ हम खून की होली भी खेलना जानते है,
भूले तों नही ७१ और कारगिल ,अब आओगे तों मिट जाओगे, .
बाहर आसान पर अन्दर छिपे काले मन वालो से लड़ाई गंभीर है,
वे हमारे बीच छिपे ना पहचाने जाने वाले गुलाल और अबीर है,
आओ मिल कर सफाई का पानी डाले ,उन्हें ढूढ़ कर निकाले,
सियार का रंग उतर जायेगा ,समाज उन्हें रास्ते पर लायेगा |
फिर सभी रंगों को मिला कर इन्द्रधनुषी रंग बनाये,
उसी की होली खेलें, पूरे भारत को वही रंग लगायें,
अपना देश महान होगा जी हाँ ऐसा हिंदुस्तान होगा,
विश्व को रास्ता दिखायेगा फिर विश्व गुरु कहलायेगा,
आओ इन इरादों की चन्दन और रोली लगाओ,
हाथ का खंजर फेंक दो और गले से  लग जाओ | .

बुधवार, 16 मार्च 2011

नफरतो को होली में इस बार जलाये

यहाँ वहा आज देखो होली हो रही
वहा पे हंसी  यहाँ ठिठोली हो रही

तय था होली एक दिन मनाई जाएगी
होली में  बुराई  सब  जलाई  जाएँगी 
खुशियों से खेलेंगे हम रंग औ गुलाल
गले मिल कर दोस्ती  बढाई  जाएगी

एक दिन नही अब तों  रोज होली है
जी हा आज कि ये नई सोच होली है 
होली गुजरात कि कश्मीर कि होली
सड़क हो या रेल बस होली  होली है

होली में जलाये भी तों कौन लकड़ियाँ
मिल रही है मुफ्त में तमाम लड़कियां
रेल, बस, घर  जलाने का अधिकार है 
रोके कौन सबने बंद की है खिड़कियाँ  

होली का हुड़दंग हो या लोगो की चीख
यहाँ वहा जो भी मिले पहले उसे  खींच
आग में जलादे  चाहे खंजर पर उछाल
पानी से नही अब जमी लहू से ही सींच

देखो कही बम तों कही गोली चल रही 
चारो ओर खून की बस होली चल रही
हम नहला रहे है अपनी माँ को लहू से
नफ़रत की ही बस यहाँ बोली चल रही 

ऐसी होली भारत में और कब तक चलेगी
नफरत की कहानी भला कब तक  पलेगी 
जले राम का हवेली या रहीम  का मकान
इंसानियत की होली ऐसी कब तक जलेगी

आओ ऐसी होली पर विराम लगाये
भाई चारे की कहानी फिर से सुनाये
आओ इंसानी जज्बे  को हम जगाये 
नफरतो को होली में इस बार जलाये

शनिवार, 12 मार्च 2011

पृथ्वी जोर से हिली ,गुस्सा हो गया समुद्र

पृथ्वी जोर से हिली 
समुद्र की नीद टूट गयी 
गुस्सा हो गया समुद्र  
गुस्से में जोर से साँस लेने लगा समुद्र  
उसकी सांसे भारी पड़ गयी पृथ्वी को  
और पृथ्वीवासियों को भी  
चारो तरफ जलजला ,मौत और तबाही 
कुछ करो की फिर पृथ्वी ना हिले 
जरूरत पर हिले तो इतने जोर से ना हिले  
समुन्द्र की नीद ना टूटे ,क्रोधित ना हो समुन्द्र 
अभी तो थोडा सा क्रोधित हुआ है तब ये हाल है 
पूरा समुन्द्र क्रोधित हो गया तो पृथ्वी का क्या होगा 
क्या होगा पृथ्वी पर रहने वालो का 
आओ बचालें पृथ्वी को ,समुन्द्र को और मानवता को |







सोमवार, 10 जनवरी 2011

क्या यही होता है जीवन ?

क्या यही होता है जीवन ?
एक दिन आप जीवन पाते है,
आते तों अकेले है ,पर वहा होते है बहुत से,
हंसने को हंसाने को, खिलाने को, जिलाने को
फिर जिनके कंधो पर होते है आप खुश,
जिनके हाथ पकड़ कर आप पाते है ताकत,
उन्ही कि ताकत ख़त्म हो जाती है और,
आप के कंधे पर सवार वे चले जाते है अनंत यात्रा पर,
लगता है सर पर साया नही रहा ,कोई ताकत नही रही |
पर समय पकड़ा देता है कोई अनजान उंगली जीवन भर को,
जो जीवन का आधार बन जाती है या हो जाती है जीवन ,
पर कुछ लोगो से वक्त छीन लेता है उसे भी बीच रास्ते में ही,
और खड़ा कर देता है आप को ठूंठ कि तरह अकेला |
फिर नजर आते कुछ अपने ही शरीर के टुकड़े कुछ अनुभूतियाँ,
व्यस्त हो जाते है समेट कर खुद को अपनी अनुभूतियो के लिए ,
आप के सहारे चलने वाले आप का सहारा नजर आने लगते है,
समय और परम्पराएँ छीनती जाती है एक एक को बारी बारी,
आप का प्यारा टुकड़ा जो आप का आधार बन गाया है,
अपने जीवन को नया आयाम देने चल पड़ता है नए सफ़र पर,
फिर आप अकेले, जैसे  रेगिस्तान में खड़ा कोई अकेला ठूठ ,
अब ना ही कोई लक्ष्य, ना ही जिम्मेदारी और ना कोई आशा,
हां लक्ष्य केवल जीवन के बचे दिनों को पूरा करना और आशा कि-
बिना किसी को कष्ट दिए या लिए पूरा हो ये जीवन,जिम्मेदारी,
बस खाना पीना समय बिताना और गाना कि.,
दुनिया में हम आये है तों जीना ही पड़ेगा,
जीवन है अगर जहर तों पीना ही पड़ेगा |

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

कोई खामोश है, तों कोई परेशान है ,

1-
कोई खामोश है, तों कोई परेशान है ,
ख़ामोशी को सहना, नही आसान है
कुछ कहें तो चाहे नफ़रत से ही सही
वो भी तो किसी पर एक अहसान है |                                                                                              

2-जिसे भी छूता हूँ, वो टूट जाता है,
   कुछ भी कहता हूँ तों रूठ जाता है
   क्या करू मेरी किस्मत ही ऐसी है,
   जिसे भी चाहता हूँ वो छूट जाता है |

3-तमाम उम्र हम चलते रहे और लोग जलते रहे ,
    अब हम जलते जा रहे है लोग चलते जा रहे है |

4-आइये जिन्दगी  के नए  मायने तलाश करे ,
    दिल को जोड़ा तों फिर दिल पर विश्वास करे ,
    ऐसा क्या जुड़ना कि दिल ना करे  धक् धक्,
   आइये तन मन के अहसास का अहसास करे ,

5-आप भी गर अच्छे है तभी मिल पाते है जनाजा उठाने वाले,
   वो भी खुशकिस्मत होते है जिन्हें मिल जाते है जलाने वाले|
   जो गैर है अपने  नही उनको क्या देखना और क्या सोचना,
   आज कल ऐसे ही होते है मतलबपरस्त तमाम ज़माने वाले|

6-कोई  मेरे सोये दिल को जगाये तों कोई  बात बने ,
   कोई  मेरे घर में भी दीप जलाये तों कोई बात बने |
   बहुत दिन हो गया मैंने तों कोई खुशियाँ नही देखी ,
   दामन में कोई खुशियाँ ले  आये तों कोई बात बने |

7-अँधेरे मेरे घर के देखो दूर से ही दिखलाई पड़ते है,
   मेरे घर का अँधेरा  कोई भगाए तों कोई बात बने |
   सभी के घर बहुत रोशन, सभी के घर में  दिवाली  ,
   कोई मेरी भी दिवाली  मनवाए तों कोई  बात बने |