शनिवार, 7 सितंबर 2024

आओ न कृष्ण ।

आओ न कृष्ण ।

कृष्ण आज तुम्हारे घर पर हूँ
मथुरा वृंदावन में 
और तुम्हें ढूढ रहा हूँ ,
तुम कहा हो कृष्ण 
ना मथुरा मे मिले 
ना गोवर्धन के आसपास 
ना यमुना के किनारे 
और ना गोकुल ,
ना नन्दगाँव ,बरसाने मे 
तब कहा हो कृष्ण 
निधिवन और मधुवन भी सूना है 
भागकर गये थे द्वारका 
क्या वही कही बिला गये कृष्ण 
पर लोग तो तुम्हे यहा ढूढ रहे है 
कब आवोगे कृष्ण 
या अब तुम हो ही नही 
तुमने रचा था महाभारत 
या तुम सचमुच नही चाहते थे वो युद्द 
तो फिर हुआ कैसे वो युद्ध 
क्या सिर्फ तुम्हारे  उपदेश के लिये 
कि सामने जो भी है 
मत देखो कौन है बस उसे मारो 
और 
लाशो से पटी धरती को देख 
शायद युधिष्ठिर कांप उठे थे 
तुम भी कांपे थे क्या कृष्ण 
तुम तो इश्वर थे 
अवतार थे विष्णू के 
फिर क्यो नही रोक पाये 
अपनो का ही वीभत्स वध 
क्यो नही रोक पाये धूत क्रीड़ा 
क्यो नही रोक पाये एक नेत्रहीन का अपमान 
क्यो नही रोक पाये भरी सभा मे स्त्री का अपमान 
क्यो नही रोक पाये वो वध 
चाहे अभिमन्यु का हो या जयद्रथ का 
वो छल से किया गया वध 
तो क्या तुम भी सर्फ दर्शक थे 
या मिथ्या है कि तुम इश्वर हो 
वरना !
तो क्या तुम इन अनैतिकताओ के 
सारथी बनकर खो बैठे थे अपना देवत्व 
और शक्तिया 
और हो गये थे अशक्त 
तभी तो भागना पड़ा तुम्हे 
अपनी प्यारी नगरी छोडकर 
क्या तभी तुम शिकार हो गये एक बहेलिए के 
अगर हा तो एक बार प्रकट होकर ये बता दो 
ताकी करोड़ों लोगो का भ्रम टूट सके 
अगर ना तो भी प्रकट होकर बता दो 
कि तब क्यो हुआ वो सब 
और एलान कर दो 
कि अब 
वैसा कुछ भी नही होगा कृष्ण
तुम्हारी नगरी मे मुझे इन्तजार है 
तुम्हारे आने और एलान करने का ।
आओ न कृष्ण ।

शनिवार, 17 अगस्त 2024

जब जब भी महाभारत होगा

बहुत साल पहले की बात है 
भारत में महाभारत हुआ था 
भाईयो ने भाईयो को दुत्कारा था 
तो भाईयो ने भाईयो को मारा था 

जमीन लाशों से पटी थी 
बचे थे बच्चे और विधवाएं 
युद्ध भूमि में रोए थे युधिस्ठिर 
किस पर राज करूं? इनपर !.

कल्पी थी तब द्रौपदी 
ये मैने क्या कर दिया 
कैसे आंख मिलाऊं मैं 
अपनो की विधवाओं से 

जब जब भी महाभारत होगा 
यही होता रहेगा तब तब 
जमीं की भूख नहीं मिटेगी 
लाशों से, न प्यास खून से 

इसलिए रोक सको तो रोको 
किसी भी अट्टहास को 
जमीन की भूख को 
और कैसी भी धूत क्रीड़ा को 

तोड़ दो हर उस सपने को 
जो तानाशाह बनाता हो 
रोक लो हर उस कदम को 
जो युद्ध भूमि को जाता हो ।
+++++++++++++++++++
आज वालो से :

ये तो बताये कि महाभारत की याद में
कौन सा विभीषिका दिवस मनाए 
महाभारत की याद में कौन सा झंडा फहराये 
महाभारत की याद में कौन सी रूदाली गाए  ?

रविवार, 11 अगस्त 2024

फिर भी कर लेते सब कुछ!

क्या तुम 
कहीं-भी, किसी के भी सामने 
पैंट की जिप खोल देते हो?
सड़क! बाज़ार! पार्क! 
या अपने घर में भी!

कैसे ऐसा कर पाते हो,
जब बलात्कार करते हो?
कुछ लोग ऐसा कर सकते हैं
तुम्हारे किसी अपने के साथ भी 

क्या यह उस वक़्त मन में आता है?
फिर भी कर लेते सब कुछ!

बुधवार, 17 जुलाई 2024

चलो चले वहाँ दूर कही दूर ,जहाँ कुछ आस है कुछ प्यार है और उम्मीदें कुछ ।

चलो चले वहाँ 
दूर कही दूर ,
जहाँ कुछ आस है 
कुछ प्यार है 
और उम्मीदें कुछ ।

छोटे शहरो के रिश्ते

छोटे शहरो के 
शहद जैसे रिश्ते 
बड़े शहरो की 
जमीन पाते ही 
कड़वे हो गये
जो फेविकाल से
जुडे लगते थे 
बुलबुले हो गये ।

बहुत ही अपने जब संपन्न हो जाते है

बहुत ही अपने 
जब संपन्न हो जाते है 
या चढ़ जाते है 
ऊंची पायदाने 
उग आती है 
ऊंची दीवारे 
अपनो के बीच 
रिश्तो मे,भावो मे ।

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

वो सदमे में ही रहा होगा शायद

वो सदमे में ही  रहा होगा शायद

उसने कुछ नहीं कहा होगा शायद

कितना शोर और कितना धुआं था

उसने कुछ देखा सुना होगा शायद

लगी थी हाट सब कुछ बिक रहा था

कुछ छुपा और कुछ दिख रहा था 

वे सब आये थे जो सब खरीद लेते है

उनसे कुछ भी ना बचा होगा शायद

जो लोग जीत कर घरो को लौटे है

वहा तों  जश्न हो रहा होगा शायद  .

उधर वो जो ख़ाली उदास बैठा है 

वो मेले में लुट गया होगा शायद

है मेला या दंगा हमारा भ्रम तों नहीं

घर नहीं कही ठहर गया होगा शायद

इससे अच्छा तों अपना  पनघट था

ओ फिसलने से डर गया होगा शायद

समंदर तों हमेशा ही इतना गहरा था

किनारे पर धोखा हुआ होगा शायद|

सीख लिया समंदर की सवारी करना

कहा पहुंचोगे ना सोचा होगा शायद .

अन्दर इतना तूफ़ान सा क्यो है

अन्दर इतना तूफ़ान सा क्यो है 
मन इतना परेशांन सा क्यो  है 
न कोई बात है,न कोई भाव ही 
दर्द इतना मेहरबान सा क्यो है | 

दर्द मन में,दिमाग में,लहू में भी 
दर्द तन में,दिल औ वजूद में भी 
दर्द साँस ,धड़कन औ रूह में भी 
ये दर्द हुआ आसमान सा क्यूं है |

शनिवार, 6 जुलाई 2024

ये दिल्ली ने कहा है

ये दिल्ली ने कहा है 
की 
कलम को तोड़ दे सब 
अगर कुछ सोचते है 
जो हमसे कुछ अलग है 
उस चिंतन को मोड़ दे सब
ये दिल्ली ने कहा है 
अब कोई कविता न लिखे 
लिख रहे है 
तो ऐसा वैसा न लिखे 
जो दिल्ली को नहीं
अच्छा लगेगा 
ये दिल्ली ने कहा है 
न कोई फिल्मे बनाये 
न ही कोई गीत गाये 
न नाटक ही दिखाए 
जो दिल्ली को न भाये 
ये दिल्ली ने कहा है 
सूरज पूरब से निकलता 
ये औरो ने कहा था 
सूरज अब पच्छिम से उगेगा  
भारत में रहेंगे तो 
पूरब को सब लोग अब 
पच्छिम कहेंगे   
ये दिल्ली ने कहा है 
बदलो से नहीं होती है बारिश
मेढक की शादी न हो
तो बारिश हो नहीं सकती 
सब मान लो सब शादी कराओ 
ये दिल्ली ने कहा है 
हमसे पहले कुछ नहीं था 
जो किया हमने किया है 
ये जमीन आसमान नदिया 
हवाए सब हमने दिया है 
ये दिल्ली ने कहा है  ।

गुरुवार, 20 जून 2024

सरहदे

सरहदे तय कर दी घरों की
सरहदे तय कर दी देशों की 
पर सरहद नही तय कर पाए 
औरत और आदमी के रिश्तों की 
जब चाहा ,जहा चाहा 
तोड़ देते है सरहद और सीमाएं ।

बुधवार, 19 जून 2024

सबको पढ़ाओ दो दूनी इक्कीस

खुद पढ़ोगे तो बहुत पीछे रह जागोगे 
ज्यादा से ज्यादा कोई नौकरी पावोगे 
मुश्किल से घर चलाओगे 
बड़ा बनना है 
तो 
सबको पढ़ाओ दो दूनी इक्कीस 
सब मुझे दे दो तो होगा बाइस 
पढ़ाना सीख गए तो ऊंचाई पर जागोगे 
सेठ और मंत्री क्या प्रधानमंत्री बन जागोगे । 

सोमवार, 27 मई 2024

मेरी देह मेरी है

साहित्य की नई बहस 
मेरी देह मेरी है 
मैं जो चाहे वो करु
किसी को क्या
कहानी कविता पूर्ण हुई 
और 
हो गया 
स्वतंत्रता का उद्घोष ।

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

दर्द है कि जाता ही नही

दर्द है कि जाता ही नही 
न मन का न तन का 
न अपनी जलन का 
न अपनी लगन का 
न अपने कहन का 
न उनके सुनन का 
न उनके कहन का 
न अपने सुनन का 
न दिल की व्यथा का 
न अपनी कथा का 
न यादो का अपने 
न वादो का अपने 
इरादो का अपने 
दवा भी नही है 
दुवा भी नही है 
ये किससे बताये 
किसे हम सुनाये 
आँसू छुपाये 
या हिचकी दबाए 
कटी जीभ अपनी 
निकलता जो खू है 
ये कैसे छुपाये 
न आहो मे कोई 
न चाहो मे कोई 
निगाहो मे कोई 
न राहो मे कोई 
ये गम हम दबाए 
कहा तक अब जाये 
ये दर्द जो खू मे 
कतरे कतरे लहू मे 
है चमड़ी के अंदर 
औ चमड़ी के बाहर 
ये जाता नही है ।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

गहन सन्नाटा ।



क्या वक्त है 
चारो तरफ 
या तो सन्नाटा है 
या 
सन्नाटा टूटता है 
तो 
आर्द्र स्वर मे जिंदगी
बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है गहन सन्नाटा ।

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

कभी समन्दर के किनारे खड़े होकर दूर देखा है आप ने

समय हो तो मेरी ये कविता भी पढिये --

कभी 
समन्दर के किनारे 
खड़े होकर 
दूर देखा है आप ने 
लगता है कि 
कुछ ही दूर पर 
आसमान मिल रहा है 
समन्दर से 
पर जब आगे बढ़ते है 
नाव से या जहाज से 
तो वो मिलन 
और दूर चला जाता है 
वैसी ही होती है 
कुछ जिंदगियां 
और कुछ के भविष्य 
इच्छाये ,खुशियाँ और आशाएं ।
मैं भी 
ताक रहा हूँ टुकुर टुकुर 
दूर से दूर तक 
बहुत दिनों से 
और भाग रहा हूँ लगातार 
की आसमान को छू लूँ  ।
पर
या तो आसमान छल करता है 
या 
मेरा पुरुषार्थ ही जवाब दे जाता है 
और
हाथ भी तो छोटे पड़ जाते है मेरे ।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

चलो धूल डालते है कुछ विचारो पर

चलो धूल डालते है 
कुछ विचारो पर 
भावनाओ पर 
रिश्तों पर 
और ढक देते है 
बहुत सी यादे ।
भूल जाते है वो कदम 
जो हम साथ चले थे 
लिखते है नयी इबारत 
और नया मुस्तक़बिल ।

सुनो सुनो सुनो फरमान है राजा का

सुनो सुनो सुनो 
फरमान है राजा का 
या धर्म की जुबान है 
चार बच्चे पैदा हो 
ऐसा फरमान है 
दो एक के लिये 
दो दूसरे के लिये 
अपने लिये घन्टा 
सुनो सुनो सुनो 
मुनादी करा दो 
कि जरूरत है 
बच्चा पैदा करने वाली
मशीन की  
सुनो सुनो सुनो ।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

बहुत हुआ पृथ्वी पर जय श्री राम जय श्री राम 
जहां भी राम सोयें थे वो जग कर बैठ गए 
झांक कर देखा ये कौन भक्त नए 
( आज पूरा करता हूँ )

रविवार, 7 अप्रैल 2024

अभिशप्त

अभिशप्त आत्माएं 
अभिशप्त वजूद 
अभिशप्त वादे 
अभिशप्त इरादे 
अभिशप्त इच्छाये 
अभिशप्त भविष्य
अभिशप्त रिश्ते
अभिशप्त भावनाए 
सपोले ही चहुँ ओर
आस्तीन कैसे बचाए
अभिशप्त सब कुछ 
ये सब 
जाकर किसे दिखाये ।

जीवन एक सवाल है और जवाब भी ।

ये सीधी सपाट सड़क बचपन है 
पहाड़ की चढ़ाई जवानी है 
और 
रेगिस्तान में चलना बुढ़ापा है 
इसी में कही नदी में तैरना 
समुद्र की लहरों से खेलना 
तारो को गिनना,चांद से बात करना 
फूलो को सूंघना पत्तो को सहलाना 
और बिला वजह दौड़ना 
तथा 
अनजाने गड्ढे में गिर जाना भी होता है ।
जीवन एक सवाल है और जवाब भी ।

शनिवार, 6 अप्रैल 2024

ऐसा क्यो होता है अक्सर

मेरी कविता:

ऐसा क्यो होता है अक्सर
कि 
जिस जमीन पर आप 
बुनियाद बनाना चाहते है 
वही दलदल निकल आती है 
और 
धंस जाता है खुद का वजूद 
जिस पेड़ को मजबूत समझ 
छप्पर का आधार बनाना चाहते है 
वही इतना कमजोर निकल जाता है 
कि 
तनिक सा बोझ पडते ही 
लचक जाता है 
और 
सब कुछ जमीदोज हो जाता है 
पहाडी पर चढ़ते वक्त 
पहला ही पत्थर 
कमजोर निकल जाता है 
और 
पहले ही कदम पर घायल कर 
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर 
हिम्मत तब भी नही हारते लोग 
और 
जारी रखते है खोज 
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की 
पूरी तरह लम्बे समय तक 
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की 
और 
पहाडी पर घायल होकर भी 
अन्तिम चोटी तक पहुचने के 
सही मार्ग की ।

सोमवार, 1 अप्रैल 2024

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।
तुम्हारे अहंकार में से कुछ नहीं चाहिए हमें ।
बल्कि हम दे देते है थोड़ी सी विनम्रता तुम्हे ।
और चाहो तो एक आइना भी ।

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।
तुम्हारे अहंकार में से कुछ नहीं चाहिए हमें ।
बल्कि हम दे देते है थोड़ी सी विनम्रता तुम्हे ।
और चाहो तो एक आइना भी ।

रविवार, 31 मार्च 2024

रेगिस्तान का हिरन

वो रेगिस्तान का हिरन देखा है क्या 
लगातार भागता और फिर दम तोड़ता
उसे हर थोड़ी दूर पानी दिख रहा था 
और पानी और थोड़ी दूर हो जा रहा था 
कई प्रेमी भी  ऐसा ही हिरन होते है 
और उनका प्यार रेगिस्तान का पानी । 

नाखून

नाखून

औरत को देखते ही
आँखों में नाखून उगना कब से शुरू हुआ?
जब हम असभ्य थे
या जब सभ्य हो गए!

औरत को देखते ही
उसे घायल कर देने की प्रवृत्ति कब से आयी?
जब हमारे पास शब्द नहीं थे
या 
जब हमने भाषा गढ़ ली!

औरत को देखते ही
उसमें प्रवेश करने की उत्कंठा
कब से हिलोरें मारने लगी?
जब हम कुछ नहीं जानते थे
या 
जबसे हमने ईश्वर गढ़ लिया !

औरत को देखते ही
उसपर क़ाबिज़ होने की इच्छा
कब से उत्पन्न हुई?
किसी बर्बरता को देखकर 
या जबसे हमने बर्बरता का सामान्यीकरण कर लिया


यह सब त्रासदियाँ हैं
मनुष्यता के पक्ष में लड़ने के लिए
इन त्रासदियों को ख़त्म करने के लिए
नए औज़ार बनाने होंगे

- डॉ. सी. पी. राय

रविवार, 24 मार्च 2024

आहट सुनाई पड़ रही है आपातकाल की

आहट सुनाई पड़ रही है ?
आपातकाल की 
या समय पूर्व चुनाव की 
और 
किसी भी तरह ,किसी भी हालत में 
जीत ,जीत और केवल जीत 
ताकि फिर सब स्थाई हो सके
मनमाना पन हो या तानाशाही 
कोई सामने नहीं हो 
ना विपक्ष ,न संविधान और लोकतंत्र 
महात्मा से लेकर शहीदे आजम तक 
नेता जी से लेकर बिस्मिल तक 
सब की आत्माएं 
बस टुकुर टुकुर ताक रही है 
पर आंखो में आसू के कारण 
कुछ साफ साफ दिख नही रहा है 
तो एक दूसरे से पूछ रहे है 
कि कुछ देखा क्या कुछ सुना क्या 
अपने भारत का हाल 
पर जवाब में सिर्फ सन्नाटा और हिचकी ।

शुक्रवार, 22 मार्च 2024

मेरे ओठ इस कदर क्यों सिये गए है ।

जब कोई मेरे घाव को कुरेदता है न
मुझे बहुत दर्द होता है 
कोई मेरे घाव को सहलाता भी है 
तो लगता है कि कुरेद रहा है
हर बार मेरा घाव और गहरा हो जाता है 
इसलिए मुझे मेरे हाल पर ही छोड़ दो 
न कुरेदो , न सहलाओ 
बस कोई इतना बताओ 
इतने घाव मुझे क्यों दिए गए है 
मुझे चीखने से भी क्यों रोका गया 
मेरे ओठ इस कदर क्यों सिये गए है ।

सोमवार, 11 मार्च 2024

वो सब आगे निकल गए

वो सब आगे निकल गए 

जो जो काफ़ी दिन साथ चले 
गलबहिया करते हुए
एक दिन अचानक थोड़ा ठिठके
उनके पीछे होते ही 
मैं लहूलुहान हो गया 
छटपटाया और गिर गया 
और मुझे तड़पता छोड़ 
वो तेजी से आगे निकल गए 
ये कहानी आख़िरी कभी नहीं हुयी 
और गिनती अब तक नहीं रुकी ।

शनिवार, 9 मार्च 2024

क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ?

क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ? 

तब भी शोर था पर नारो का 
सार्थक नारो का 
कही इंकलाब जिंदाबाद
कही महात्मा गांधी जिंदाबाद 
स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा 
करो या मरो 
अंग्रेजो भारत छोड़ो 
दुश्मन स्पष्ट था और उद्देश्य भी 
फिर अचानक एक शोर हुआ 
ठाय ठाय ठाय
और
फिर देश में गूज उठा नारा 
महात्मा गांधी अमर रहे 
थर्रा गया भारत और मानवता 
पर सम्हाल कर चलता रहा भारत 
और 
पहुंच गया ऊंचाइयों पर 
आज फिर शोर है 
आजादी की लड़ाई का विरोध करने वालों का शोर 
कर्कश शोर क्रोधित घृणा लिए 
जय श्रीराम जय श्रीराम 
गोडसे जिंदाबाद फासीवाद जिंदाबाद 
नफरत भय आशंका से घिरा देश 
नारो नारो में कितना फर्क होता है ।
अंग्रेजो के आतताई शासन से तो बच निकला 
पर क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ?

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

धुप अन्धेरा है

धुप अन्धेरा है 
चारो ओर 
जमीन से आसमान तक 
क्या आसमान के परे भी
कुछ होगा 
जहा कुछ रोशनी होगी 
हमारे हिस्से की भी ।

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

युद्ध

मेरी कविता 
"युद्ध "

राम कृष्ण बुद्ध 
मुहम्मद और ईसा 
नही खत्म कर पाये 
मानव के विनाश का युद्ध
ईसा को छोड सब 
खुद भी तो युद्धरत रहे 
और बो गये 
भले बुरे के नाम पर 
युद्ध की खेती 
जो हजारो साल से
फैलती ही जा रही है 
कौन मिटायेगा 
हर भाषा से 
ये शब्द "युद्ध "?

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

जीवन केवल मृग मरीचिका है

जीवन केवल मृग मरीचिका है 
विचार कुलांचे भरते रहते है 
रेगिस्तान के पानी के 
एहसास के साथ 
भागता रहता है इंसान 
और 
पानी के लिए तड़प 
दौड़ाती रहती है 
यहां से वहां तक
वहां से वहाँ तक ।
कोई साथी हो 
जो चिकोटी काट कर 
यथार्थ के धरातल पर उतार दे 
और 
वो भी नही है 
तो भटकन अनन्त है ।

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

हिंदू कौन

हिंदू कौन ? 
और 
हिंदुस्तानी कौन ? 
जो इंसान हो 
और 
कर्म करे ईमानदारी से 
या कुछ न करे 
या 
लूट घूस झूठ सब करे 
इसपर सब मौन ।

सोमवार, 22 जनवरी 2024

जानता हूं तुम मुझे नही वोट को ढूंढ रहे हो

चारो तरफ है कानफोडू शोर
कि राम आयेंगे राम आयेंगे 
राम है हतप्रभ की कहा गया मैं
मैं तो हूं कण कण में 
शबरी के बेर में केवट की नाव में 
पत्थर बनी अहिल्या में 
ये कलयुग वाले मुझे कहा ढूंढ रहे है 
सब जगह ढूंढ रहे है शोर मचा कर 
बस नही ढूंढ रहे है अपने मन में 
क्योंकि मन आइना होता है
जो शर्मिंदा कर सकता है
भाई से मुकदमा लड़ रहे भक्तो को
अपनी सीता को घसीटते हुए भक्तो को 
अहिल्याओ से बलात्कार करते भक्तो को 
शबरी और केवट की उपेक्षा करते भक्तो को 
मिलावट करते ,जहर बेचते 
मुंनाफाखोरी करते भक्तो को 
बच्चियों को देख कर 
आंख में नाखून उगा लेने वाले भक्तो को
अरे मूर्खो मैं तुम्हे कभी नही मिलूंगा 
मैं तो महल में नही जंगल में हूं
शबरी और केवट की झोपड़ी में हूं ।
महल मुझे रास नहीं आता है मेरा दम घुटता है 
और तुम मेरा दम घोट देना चाहते हो 
और चाहते हो कि में तुम्हे मिल जाऊं 
मैं जानता हूं तुम मुझे नही वोट को ढूंढ रहे हो ।।

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

जीवन का कोहरा

कितना भयानक
कुहरा हो जाता है 
अकसर आजकल 
कुछ भी नही दीखता
थोडा सा भी आगे 
पर 
ये कुहरा तो
इस मौसम मे होता है 
थोडे दिन 
कुछ लोगो के जीवन मे तो 
पता नही कब से 
कुहरा है 
कुछ भी स्पष्ट नही 
अगले पल का भी 
इस कुहरे से 
जीवन का कुहरा 
ज्यादा भयानक होता है

मंगलवार, 16 जनवरी 2024

अब इतनी ठंड क्यो लगती है

अब इतनी ठंड क्यो लगती है 
तब तो बिलकुल नही लगती थी 
जब होती थी एक हाफ़ शर्ट 
जब स्वेटर भी नही पहनते थे 
ना पैर में जूते और मोजे 
बस चप्पल पहन निकल लिए 
तब भी ठंड कहा लगी थी 
जब जनवरी की इसी ठंड में 
पहुँच गए थे शिमला 
फिर कुफ़री में बर्फ़ के पहाड़ पर 
कितना खेले थे बर्फ़ से 
कितने लेटे थे बर्फ़ में 
और कितने बर्फ़ के गोले बना कर 
मारे थे एक दूसरे को 
पर ठंड तो नही लगी थी 
बर्फ़ के गोले फेकने से गर्मी आयी थी 
जो पिघल गयी थी 
तब अब क्यो लग रही है ठंड ?

बुधवार, 10 जनवरी 2024

अभियुक्त

देश के मालिक नागरिक
कभी भी बन सकते है अभियुक्त 
आजादी मिल गई तो क्या
हक भी मांगोगे ?
मांगोगे रोटी और रोजगार 
कपड़ा और मकान 
और इतने बड़े अपराध में भी 
अभियुक्त नही बनोगे ?
निकलोगे सड़क पर हाथ लहराते हुए
और नारे लगाते हुए
और डालोगे खलल 
साहब बहादुर की नीद में 
फिर भी अभियुक्त नही बनोगे ? 
गीता में पढ़ाया है 
सिर्फ कर्म करो सत्ताधीशों के लिए 
और कोई इच्छा मत करो 
और 
ये नही मानने वाले को द्रोही माना जायेगा 
देशद्रोही ,धर्मद्रोही और राजद्रोही ।
अभियुक्त अभियुक्त और अभियुक्त ।

नारी तुम देवी हो

नारी तुम तो देवी पर मंदिर में 
नारी तुम तो श्रद्धा हो पर पन्नो में 
नारी तुम तो शक्ति हो नवरात्रि में 
नारी तुम तो सीता हो रामायण में 
नारी तुम तो सावित्री हो 
पति के लिए लड़ जाने वाली 
ये अलग बात है कोई पति नही लड़ा 
पत्नी की खातिर 
तुमको खुश रहने को क्या  कम है 
तुम मंदिर में पूजी जाती 
नवरात्रि में घर घर आती 
पर नारी तुम क्या हो तुम भी जानती 
बर्तन कपड़े चूल्हा पोछा और बिस्तर है 
इतना ही संसार तुम्हारा वरना डंडा 
जिस दिन द्रोपदी बन केश बांध लोगी तुम 
उस दिन हा उस दिन तुम शक्ति हो जावोगी ।

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

इतने बाण लग चुके

कुछ लोगों के शरीर ही नही 
बल्कि आत्मा तक पर 
इतने बाण लग चुके होते है 
जमाने के 
कि 
कोई और बाण 
लगने की जगह ही 
नही बची होती है ।
अगर कोई चलेगा 
तो 
बाण पर ही लगेगा 
और 
उसे और गहरे तक 
पैबस्त ही कर देगा न 
घाव 
और कितना गहरा हो जाता है 
ऐसे में 
और दर्द भी कितना बढ़ जाता है 
उस बाण से ।

अगर राम जानते होते

राम को याद आ गई अपनी अयोध्या 
और उतर आए हाल चाल लेने 
देखा उन्होंने हलचल , नारो का शोर 
तो पूछ लिया किसी से 
क्या ये अयोध्या ही है 
जवाब मिला हा तो भागने लगे वापस 
पकड़ लिया नारा लगाती भीड़ ने 
पूछने लगे की कौन हो 
और ये बनवासी का वेश क्यों 
क्या किसी और धर्म के हो 
और कोई कांड करने आए हो वेश बदल कर 
राम बोले मैं राम हूं 
जिसका बहुत जोर से मारा लगा रहे हो
पर इतने गुस्से में क्यों हो तुम लोग 
ऐसा तो मेरा महल भी नही था 
जैसा तुम लोग बना रहे हो 
मुझे महल में रहना कहा पसंद
मैं तो बनवास में खुश था 
क्योंकि महल ने दिया बनवास 
और फिर छीन लिया सीता 
पर तुम लोग मेरी प्रतीमा 
इस महल में क्यों लगा रहे हो 
क्यों बहाया खून तुम लोगो ने और किया झगड़ा 
जबकि अयोध्या का तो मतलब ही था 
जहा युद्ध नही हो 
और क्या आडंबर कर रहे हो 
अरे अगर मैं महल में रहा होता 
तो बस होता एक राजा 
लेकिन बनवासी बनके बन गया में राम 
जिसकी कथा सुनते और सुनाते हो
भीड़ उग्र हुई की जरूर ये है कोई पाखंडी 
कोई हिंदू और राम विरोधी 
पर कोई हाथ उठाता
तभी प्रकट हो गए विराट रूप में हनुमान 
और भीड़ भागने लगी 
की ये कैसा विशाल बानर है 
कोई बोला बंदूक लाओ गोली चलाओ
राम बोले की जब तुम मुझे जानते नही हो 
तो व्यर्थ का ये सब आडंबर क्यों 
जब तुम मुझे मानते नही हो 
तो इसने साल झगड़ा क्यों
अगर जानते होते और मानते होते 
तो मेरा मंदिर और मूर्ति नही बनाते
बल्कि मुझे और हनुमान को अपनाते 
तब दंगा नही करते 
बल्कि राम बनने 
और सबको राम बनाने की कोशिश करते 
तब ये तनाव और शोर नही होता 
शोर और क्रोध मुझे पसंद नही है 
जाओ घरों में जाओ और सोचो 
मुझे मंदिर में नही अपने दिल में बैठाओ 
में वही मिलूंगा
अभी तो मैं चलूंगा 
क्योंकि घुटन हो रही है मुझे 
इस नकली राजनीतिक अयोध्या में 
चलो हनुमान 
और चले गए 
अनंत आकाश में राम और हनुमान भी 
चर्चा अब भी यही थी की कोई मायावी था 
बच के निकल गया 
हमारा कारज निस्फल करने आया था 
और साथ में मायावी बंदर भी लाया था 
वही खड़ा 
एक सचमुच का राम और हनुमान भक्त बोला 
अरे मूर्खो जो सच में सामने था 
और खुद को पाने का मार्ग बता रहा था 
तुम उसे दुत्कार रहे हो  
और जो है ही नही उसे सजा संवार रहे हो ।

मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

जिन्दगी का ठहराव

कभी कभी जिंदगी में 
गहरा ठहराव क्यों आ जाता है 
कि 
सब कुछ ठहर जाता है
ठहर जाती है सांसे 
और 
शरीर भी ठहराव का शिकार हो जाता है
मन ठहर जाता है 
तो 
मस्तिष्क भी ठहरा हुआ होता है
पूरा का पूरा अस्तित्व ठहर जाता है 
और 
लगता है कि 
तकदीर भी ठहर गयी है 
और तदबीर भी । 
लगता है 
चौराहे पर खड़े है 
साँसे रोके हुए 
और 
चारो तरफ से 
शोर मचाती गाड़ियां चली जा रही है 
और 
समझ ही नहीं आ रहा 
कि किधर जाये । 
ज्यो ही किसी तरफ पैर बढ़ाते है 
कोई तेज रफ़्तार गाडी और उसका शोर 
वापस पैर खीच लेने को मजबूर कर देता है 
और ठिठक कर वही साँस बांधे 
खड़ा रहने को मजबूर कर देता है ।
आखिर क्यों ऐसा ठहराव आ जाता है 
जिंदगी में कभी कभी ।

रविवार, 24 दिसंबर 2023

आत्मा तो मत बेचो

#आत्मा_तो_मत_बेचो 

जमीन बेचो , पेड़ पौधे और प्रकृति बेचो ,
 मिट्टी बेचो , फल फूल बेचो , योग बेचो , 
मंदिर मस्जिद और ईश्वर बेचो 
पर आत्मा 
वो भी बेच रहे हो रोज 
और उसकी आवाज सुनाई नहीं पड़ती 
आत्मा नहीं बिकी तो सब बच जायेगा 
इंसान भी और इंसानियत भी ।
जरा सोचो और जरा आत्मा की सुनो ।

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

बस घिसट रहा हूँअपनी लाश लिए

मैं ढूंढ रहा हूँ खुद को

कुछ दिनों से 

पर भटक जाता हूँ

रास्ता तलाश करते करते

केवल अँधेरा हाथ आया है 

अब तक

अँधेरे में रास्ता नहीं दीखता

तो कैसे ढूंढ मैं खुद को

रास्ता तलाश करते करते

कितनी बार गिरा मैं

और कितनी बार टकराया हूँ

पता नहीं किस किस चीज से

सर फूट गया है टकरा कर

बह रहा है खून लगातार

केवल सर क्यों ,यहाँ तो

अंग अंग घायल हो गया है

और 

दिल तो छलनी हो गया है

मन और अस्तित्व 

विलीन हो गए है

कही अनंत में

और मैं ,

मैं हूँ ही कहा

मुझे तो ख़त्म कर दिया है

संघर्ष और क़िस्मत की जंग ने 

तो क्या ढूँढना खुद को

बस घिसट रहा हूँ

अपनी लाश लिए 

अब 

अपनी लाश के बोझ ने भी 

थका दिया है बुरी तरह

नहीं चल पाउँगा और 

अपने पैरो पर 

पर कोई कंधे भी तो नहीं

जिनका सहरा मिल जाये 

या 

जिनपर लद कर जाऊं मैं ।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

शरीर भी कितना बेईमान है

ये शरीर भी कितना बेईमान है 
पर खुद को समझता महान है 
पर कही भी सरेंडर कर जाता है
कही अकड़ता कही शिथिल पड़ जाता है 
मच्छर भी काट ले तो बाप रे बाप 
कांटा भी चुभ जाये तो हाय ही हाय 
जरा सा टूट जाये तो औकात बताता है 
इश्क मे कदमो मे लेट जाता है 
नफरत मे अपनी औकात बताता है 
कितनी बड़ी बड़ी बाते बनाता है 
दूसरो से डरता है अपनो को सताता है 
बड़ी से बड़ी डीँग हाकता है 
मौका पडने पर लुढक जाता है 
जी हा पर शरीर तो शरीर है 
कोई मन ,दिल दिमाग और आत्मा तो नही 
जो इसे जैसे चलाते है वैसे चल जाता है 
शरीर बस पुतला है जिसमे दिल है 
शरीर एक अस्तित्व है जिसमे दिमाग है 
शरीर को बस शरीर ही रहने दो 
इसे कम्प्यूटर और गड़ित मत बनाओ 
इसका अपने दिमाग से प्रयोग करो 
और कुछ बुरा हो जाये यो भूल जाओ 
चलो शरीर का भरपूर उपयोग करो 
इसका जितना हो सके प्रयोग करो 
तभी शरीर शरीर रहेगा दौडेगा खेलगा 
जी हा इसकी भाषा को समझो तो 
फिर ये खूब खूब और बहुत खूब बोलेगा ।
अपने शरीर को खूब प्यार करो 
दूसरे के शरीर से भी मत इंकार करो ।
क्योकी शरीर नितांत क्षणभंगुर है 
जल जायेगा 
फिर क्या पता कब 
आप की किस्मत मे वापस आयेगा ।

किस बात के नाते

आप दलगत राजनीति छोड़ दे 
दल वाले आप को छोड़ देते है 
आप राजनीति छोड़ दे
राजनीति वाले आप को छोड़ देते है 
आप नौकरी से बाहर तो
वहाँ के रिश्ते खत्म 
आप काम के न हो 
और 
बोझ बन जाये तो 
सारे रिश्ते खत्म 
जी हा 
रिश्ते भी व्यापार है 
पूरा कारोबार है 
मुनाफे के साथ रहते है 
और घाटा छोड़ 
मुनाफे की तरफ बहते है 
ये मच्छर की तरह है 
जो लैम्प पोस्ट जल जाये
सारे मच्छर उधर भाग जाते है 
आप का बुझ गया तो
किस बात के नाते है 
इसलिए चाहे जो करो
उपयोगी रहो 
कही से भी तेल लाओ या बिजली 
पर जलते रहो 
फिर पूरी आभा 
पूरे गौरव के साथ चलते रहो ।

सोमवार, 4 दिसंबर 2023

अपने हिन्दूस्तानके लिये उठो ।

पहले अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो 

ऐ पढने लिखने वालो उठो 
ऐ कविता करने वालो उठो 
ऐ नाटक करने वालो उठो 
सब मंच सजाने वालो उठो 
सब कलम चलाने वालो उठो 
सब दिमाग लगाने वालो उठो 
सब आवाज उठाने वालो उठो 
कि 
कोई तुमारे अनंत नील गगन 
और तारो को छीन न ले 
उठो की चन्द्रमा तुम्हारा ही रहे 
प्रेम के लिये प्रेरित करता रहे 
उठो कि सूरज पर 
कोई अधिकार न जमा ले
और वो सबको रोशनी देता रहे 
उठो की हवाए 
किसी की कैद मे न हो 
स्वतंत्र चलती रहे 
उठो की हरियाली 
किसी की जागीर न हो
सबकी हो 
उठो की फूलो को 
खिलने से रोका न जा सके 
और सब फूल सब रंग
गुलजार करते रहे बगीचे को 
उठो की नदिया 
कोई सोख न ले 
और वो बहती रहे निरंतर
स्वछ और निर्मल 
उठो की आज़ादी महफ़ूज रहे 
उठो की जम्हूरियत 
किसी की जूती न बने 
उठो की लव खामोश न हो 
उठो कि तुम्हारी धड़कन
और तुम्हारी सांसे 
तुम्हारी ही हो 
उठो कि दुनिया 
अब शमसान न बने 
उठो की चंगेज स्टालिन
हिटलर मुसोलिनी 
अब कोई इन्सान न बने 
उठो अपनी आन बान
शान के लिये उठो 
उठो मानवता और 
दुनिया के लिये उठो 
पहले अपने हिन्दूस्तान
के लिये उठो ।

रविवार, 12 नवंबर 2023

कहो राम तब क्यो आये थे


कहो राम तब क्यो आये थे
अब चुप होकर क्यो बैठे हो
बहुत थके हो तुम लंका से
या फिर क्यो रूठे रूठे हो
रूठे हो खुद से या कैकेयी से
या मंथरा से या अपनी माँ से
जो तुम्हरी खातिर लड़ी नही
और राजपाठ को अड़ी नही
यदि खुद से रूठे तो अच्छा है
ये  रूठना  फिर  सच्चा  है
फिर मर्यादित कैसे होते
ये सवाल भी बहुत बड़ा है 
तब तो केवल एक था रावण
अब रावण की फौज खड़ी हैं
तब तो थी  छोटी  सी लंका
अब की लंका बहुत बड़ी है
तब क्या सब बहुत बुरा था
अब क्या रामराज्य आ गया 
सोचो तब क्यो तुम आये थे
और अब क्यो उदासीन हो
आते तो तुम अब भी लेकिन
मंदिर मस्जिद पर आते हो
या  त्यौहार में आ जाते हो
या फिर प्रचार में आ जाते हो

क्या कमाल था वो पत्थर थी 
तुमने उसमे जान डाल दी
बहुत डरा था नाव लिए वो
वो नाव जो वही खड़ी थी 

दीपक बन जलते रहना है ।

कहा अकेला हूँ मैं देखो
सूरज चाँद सितारे  मेरे
चिड़ियों का कलरव है मेरा
धूप है मेरी धूल है मेरी
बादल मेरे बारिश मेरी
घर की गर वीरानी मेरी
तो सडंको के शोर भी मेरे
बाज़ारों की हलचल मेरी
और नाचता मोर भी मेरा
छत मेरी दीवारें मेरी
घर में जो है सारे मेरे
बातें मेरी और राते मेरी
वादे मेरे और यादें मेरी
और किसी को क्या चाहिए
इतना तो सब कुछ घेरे है
जीवन क्या है बस डेरा है
आज यहाँ है और कही कल
कुछ साँसों का बस फेरा है
सभी अकेले ही आते है
सभी अकेले ही जाते है
कौन अकेला नहीं यह पर
भीड़ में है पर बहुत अकेले
मैं अकेला घिरा हूँ कितना
इतना सब कुछ पास है मेरे
लोगों के जीवन में देखो
विकट अंधेरे बहुत अंधेरे
उन सबसे तो मैं अच्छा हूँ
जीवन को अब क्या चाहिए
थोड़ी ख़ुशियाँ थोड़ी साँसे
मैं तो अब भी एक बच्चा हूँ
जल्द बड़ा भी हो जाऊँगा
फिर से खड़ा भी हो जाऊँगा
कैसा अकेला कौन अकेला
दूर खड़ा अब मौन अकेला
मेरे गीत और मेरे ठहाके
दूर रुकेंगे कही पे जाके
तब तक तो चलते रहना है
दीपक बन जलते रहना है ।

अज्ञात से युद्ध

अज्ञात से युद्ध  ?

बम,मिसाइल ,गोलियां ,गोले 
और 
संगीन किसी को नहीं पहचानती है 
क्योंकि उनके दिल नही होता 
उनके दिमाग नही होता 
वो खुद से कुछ नही करती 
कोई और चलाता है इन्हे 
ये गुलाम है किसी दिमाग के 
ये गुलाम है किसी उंगली के 
पर इंसान चाहे किसी देश का हो 
चाहे कोई भाषा बोलता हो 
और 
चाहे जिस बिल्ले वाली वर्दी पहने हो 
उसके तो आंखे होती है 
दिल और दिमाग भी होता है 
फिर कैसे कहर बन टूट पड़ता है
दूसरे इंसान पर 
जिसे खुद जानता भी नहीं 
जिससे उसकी दुश्मनी भी नही ?
फिर कैसे चलनी कर देता है उसे 
कैसे घोप देता है संगीन 
या उड़ा देता है बम से
बिना विचलित हुए 
क्या नही दिखता सामने उसे 
अपना भाई या बेटा 
नही कर पाता है कल्पना 
एक उजड़े घर की 
एक विधवा पत्नी , टूटे मां बाप
और अनाथ बच्चों की
चाहे सामने वालो के हो 
या ख़ुद के 
कैसे इतना बेदर्द और क्रूर हो जाता है 
कोई भी हाड़ मांस का जीवित इंसान ? 
युद्ध में कोई नहीं जीतता 
सब केवल हारते है 
और बर्बाद हो जाते है मुल्क 
उससे ज्यादा इंसानियत
युद्ध जमीन पर नही 
औरत की  देह 
और 
बच्चो के जीवन पर लड़ा जाता है 
और अंत में खत्म हो जाता है युद्ध 
एक मेज पर चाय के साथ वार्ता से 
तो पहले ही क्यों न 
रख दी जाए ये मेज और चाय 
इंसान की मौत और युद्ध के बीच में ।
आइए मेज पर बात करे हर दिन हर वक्त ।