बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

मैं रबड़ का पेड़ हूँ कितना गिरा दो और दबा दो

मैं रबड़ का पेड़ हूँ कितना गिरा दो और दबा दो 

नहीं होगी मौत मेरी फिर से मैं खड़ा हो जाऊंगा

मजबूत हो गर आप चाहे जो खरीद लो कलम हो जुबान हो या फिर जमीर हो ।

मजबूत हो गर आप चाहे जो खरीद लो 
कलम हो जुबान हो या फिर जमीर हो ।

क्या बताये लोग अब उपलब्धियों के नाम पर मौज शौक नफरत और दौलत का भण्डार है ।

क्या बताये लोग अब  उपलब्धियों के नाम पर 
मौज शौक नफरत और दौलत का भण्डार है ।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

मन में ये तूफ़ान सा क्यों है

भीड़ इतनी है आसपास पर 
मन में ये तूफ़ान सा क्यों है 
मुस्कराते हुए चेहरे है सब है
हर कोई अनजान सा क्यों है ।
कोई अपना सा लगा ही क्यों
फिर ये बियाबान सा क्यों है 
आशंकाए इतनी क्यों तारी है
मन में ये शमसान सा क्यों है ।
छोड़ कर लौट चला है आशिक
टूटा हुवा और बेजान सा क्यों है ।
कोई तो अपना सहारा भी होगा
दिल हुवा ये असमान सा क्यों है ।

बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

न पहले रुका था न अब मैं रुकुंगा ।ना मैं थकूंगा न मैं हरगिज झुकूँगा

ना मैं थकूंगा न मैं हरगिज झुकूँगा 
खुशफहमी न पालो नहीं मैं रुकुंगा 
न जाने कितने झंझावातो को देखा 
कितनी कठिन दिन रातो को देखा 
न पहले रुका न अब मैं रुकुंगा
न पहले थका न अब मैं थकूंगा ।
चोटी  पर चढ़ कौन बसता वहां है 
समन्दर में जा कौन रुकता वहां है 
मैं भी सैलानी हूँ मैं क्यों बसूँगा 
मेरा भी सफ़र है मैं क्यों रुकूंगा 
ये जीवन है जब तक चलते ही जाना 
आसमा पर उड़ना जमी पर भी आना 
अंतिम सफ़र आसमा पर बसूँगा 
जमी घूम ली तो यहाँ क्यों रुकूंगा 
इश्वर होने की ग़लतफ़हमी है तुमको 
मैं इंसा हूँ  खुद पर भरोसा है मुझको 
हैं मेरे पांव अपने मैं उनसे चलूँगा 
न पहले रुक था न अब मैं रुकुंगा
कोई खुद को भगवान माने तो माने 
अपनी सारी शक्ति मुझ पर ही ताने 
ऐसी शक्ति से मैं न हरगिज डरूंगा 
न पहले रुका था न अब मैं रुकुंगा ।

शनिवार, 21 जनवरी 2023

पेड़ और पिता

पेड़ और पिता 

पेड़ पर चहचाहती है चिड़िया 
उछलती है फुदकती है 
और बंदर भी इस डाल से उस डाल पर 
धमाचौकड़ी करते रहते है 
और 
पिता के शरीर पर भी कूदते है बच्चे 
पेड़ पर थक कर सो जाती है चिड़िया 
और बंदर भी 
पिता के पेट पर भी लेटते ही सो जाते है बच्चे 
कभी पिता कुर्सी बन जाता है तो कभी घोड़ा 
कभी पिता बिस्तर बन जाता है
और पेड़ भी तो
बच्चो के लिए छाया होता है पिता 
और चिड़िया के लिए पेड़ 
कभी देखा है बंदर के बच्चे का दुस्साहस
और कूद पड़ने का प्रयास डालियों पर 
उसे विश्वास है मां सम्हाल लेगी 
पर इस कूद फांद में 
पेड़ की कितनी पत्तियां और टहनियां टूट जाती है 
बच्चे भी तो बिस्तर या कही भी ऊंचाई से 
बस हाथ फैला कर कूद पड़ते है पिता के ऊपर 
कि पिता गिरने नही देगा 
बच्चो का विश्वास टूटने नही देता पिता
तभी तो 
जब पिता उछाल देता है आसमान की तरफ
तो बच्चा डरता नहीं रोता नही हंसता है 
जानता है कि पिता गिरने नही देगा 
कहा से आता है बच्चो में ये आत्मविश्वास 
और स्पर्श का भी कुछ होता है 
कि पेट पर सुला कर थपकी देते ही सो जाते है बच्चे 
पिता का हाथ हो या पांव झूला बन जाते है अक्सर 
पेड़ की डाल की तरह ही 
पिता फलदार पेड़ होता है
जब चाहा हाथ बढ़ाया और पा लिया खा लिया 
पर जब फल हाथ नही आता है 
तो पेड़ पत्थर की मार भी सहता है 
बच्चे मारते नही पत्थर ,बस फल तोड़ते है 
जब फल नही मिलता 
तो पेड़ की तरफ कौन देखता है 
उसे छोड़ दिया जाता है उपेक्षित 
या काट कर कोने में डाल दिया जाता है 
की कभी शायद किसी काम आ जाए । 

संघर्षो का अन्त ।

सुना है कि 
कृष्ण ने 
द्रौपदी की साड़ी 
इतनी लम्बी कर दी 
कि 
उसका छोर ही नही था 
सुना है कि 
हनुमान की पूँछ का भी                       
कोई छोर नही था         
पर 
कही तो अन्त हुआ ही होगा 
उनका उस दिन नही 
तो अगले दिन 
लेकिन 
कुछ लोगो के संघर्षो का                              
कोई अन्त ही नही होता 
वो लड़ते रहते है 
बचपन से बुढापे तक 
और 
नितांत अकेले 
एक दिन थक कर सो जाते है 
चिरनिद्रा मे 
तभी होता है उनके                             
संघर्षो का अन्त ।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

औरत

औरत 


औरत 

औरत क्या  कोई पहाड़ है 
जिस पर चढ़ जाना चाहते हो 
औरत क्या कोई नदी है  
जिसमें नहा लेना चाहते हो 
औरत क्या कोई दुश्मन का क़िला है 
जिसे जीत लेना चाहते हो 
दुश्मन का क़िला तो तुम्हारे भीतर है 
जीत सको तो उसे जीतो । 

गुरुवार, 19 जनवरी 2023

स्वेटर जो तुमने बुना था

स्वेटर 
तुमने बुना था अपने हाथ से वो सफेद स्वेटर 
उसे आज भी पहनता हूं मैं 
सबसे ज्यादा गर्म है वो स्वेटर 
जिसका फंदा डालते वक्त तुमने कुछ नापा था
और फिर गिनकर डाल दिए थे उतने ही फंदे
वो सलाई थी जो बुन रही थी स्वेटर 
या तुम्हारी जिद मुझे ठंड से बचाने की 
तुमने नाप लिया था शरीर नीचे से ऊपर 
और आगे से पीछे 
नही नापते तब भी स्वेटर सही ही बनता
आज मैं सबसे ज्यादा पहनता हूं वही स्वेटर 
ऊन नही तुम्हारी गर्मी भरी है इस स्वेटर में 
अभी भी पहन रखा है मैने वही सफेद स्वेटर 
लगता है तुमने कस कर जकड़ रखा है मुझे 
अपनी बाहों के घेरे में 
हां बहुत सम्हाल कर रखता हूं मैं ये स्वेटर 
और कोशिश करता हूँ 
कि जिंदगी के अंतिम दिन तक पहनू
मैं तुम्हारा बनाया हुआ सफेद स्वेटर 
तुम जहा भी हो क्या देख पाते हो अपना स्वेटर
या महसूस करते हो मेरे शरीर की गर्माहट 
क्या खुश हो पाते हो
कि मैने स्वेटर को 
ये  समझ कर पहन रखा है हर वक्त 
ये स्वेटर नही हैं तुम हो 
और तुम्हारी महक भी है इसमें 
याद तो गई ही नहीं कभी 
कि इसे तुम्हारी याद कहूं।
इसकी छुवन रोमांचित करती रहती हैं मुझे 
हां मैंने पहन रखा है वही सफेद स्वेटर।

सोमवार, 16 जनवरी 2023

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ 

मैं भारत राजा  राम का हूँ

मैं भारत कृष्ण कन्हाई का 

मैं भारत राधा मीरा का 

मैं भारत सीता माई का 

मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ 


 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

रुक जाना जीवन नही मरना है

शरीर कहता है जरा उम्र तो देख 
रुक जा या धीरे चल गिर जाएगा 
मन कहता है अभी तो जवान हूं मैं 
दोनो की बहस खत्म ही नहीं होती 
शरीर कहता है बहुत परेशान हूं मैं 
शरीर कहता है तू अकेला रहता है 
मन कहता है सारा जहांन अपना है 
शरीर को जब झेलना पड़ता है अकेले 
तो पता लगता है जहां एक सपना है 
मैं परेशान हूं किसकी मानू ना मानू 
सवाल ये है कि दोनो ही अपना है । 
जीते है वो मान कर जिससे सुख मिले 
जिंदगी भी तो चार पल का सपना है 
शरीर भी मन का साथ जरूर देगा 
और मन भी शरीर को चला देगा 
जिंदगी कुछ भी नही एक फरेब है
एक पल रोना है अगले पल हसना है । 
चलो चलते है चलो चलते है चलो चलते है 
क्योंकि रुक जाना जीवन नही मरना है । 
(अभी अभी )

गुरुवार, 12 जनवरी 2023

आदमी या पिट्ठू

निकल पडते है 
सुबह ही पिटठू टागे 
न जाने कितने लोग 
कन्धे झुके पीठ झुकी 
चेहरा सपाट भावहीन 
पिटठू मे ही होता है 
उनका पूरा ऑफिस 
उनका टिफिन 
और पानी 
उनके अरमान
उनका भविष्य 
उनकी जवाबदेही 
घर से बाहर तक की
कही पैदल 
तो 
कही साइकिल पर 
कही बाइक पर 
तो कही बस मे 
कही लोकल मे 
कभी 
इन्हे गौर से निहारो 
क्या ये आप के अपनो जैसे ही है 
कभी 
इन्हे प्यार से पुकारो 
क्या ये सुन पाते है आवाज 
या बस भाग रहे है 
जिन्दगी की जद्दो-जहद मे 
मजदूर भी हंस लेता है पर ये नही 
मजदूर गा लेता है 
पर ये नही 
मजदूर अपने मन से भी जी लेता है 
पर ये नही 
कौन है ये लोग 
जिनकी पीठ पर 
लाद दिया है भारी बोझ 
नई अर्थव्यवस्था ने 
नई पढाई ने 
और 
आज के परिवारो ने 
बस किसी तरह 
इतना तो कमा लो 
कि 
शाम को लौट कर 
दो रोटी खिला दो 
और खुद भी खा लो 
इनकी पहचान क्या है 
ये आदमी है या पिटठू ?

बुधवार, 11 जनवरी 2023

अभियुक्त

देश के मालिक नागरिक 
कभी भी बन सकते है अभियुक्त
आजादी मिल गई तो क्या मतलब 
हक भी मांगोगे ?
मांगोगे रोटी और रोजगार 
कपड़ा और मकान 
और इतने बड़े अपराध में भी 
अभियुक्त नही बनोगे ?
निकलोगे सड़क पर हाथ लहराते हुए
और नारे लगाते हुए
और डालोगे खलल 
साहब बहादुर की नीद में 
फिर भी अभियुक्त नही बनोगे ? 
गीता में पढ़ाया है 
सिर्फ कर्म करो सत्ताधीशों के लिए 
और कोई इच्छा मत करो 
और 
ये नही मानने वाले को द्रोही माना जायेगा 
देशद्रोही ,धर्मद्रोही और राजद्रोही ।
अभियुक्त अभियुक्त और अभियुक्त । 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

सैकडो प्रणाम जयप्रकाश तेरे नाम रे दुनिया जहांन सब आकाश तेरे नाम रे ।

जयप्रकाश नारायण जी के निधन के बाद लिखी मेरी कविता -

सैकडो प्रणाम जयप्रकाश तेरे नाम रे 
दुनिया जहांन सब आकाश तेरे नाम रे ।

तुझको दुख तो होता होगा स्वर्ग की उस उंचाई पर 
हंसी तो तुझको आती होगी इस सारी सच्चाई पर 
तुझको तेरे बेटो ने ही तिल तिल कर के मारा है 
कौन जनम के पाप की बेटे आये इस नीचाई पर 
कैसी ऊबड़ खाबड़ बीती जिन्दगी की शाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ----

सन 42 का योद्धा अब कैसा मजबूर हुआ 
77 के आते आते सारे जहां मशहूर हुआ 
पर अपने बेटो बेटी के हाथो दुर्दिन क्या आये 
एक ने दे दी काल कोठरी 
दूसरो से दूर हुआ 
घोड़े तूने साधे पर लगाई ना लगाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ---

तूने देश की खातिर तोडी थी जेल की दीवारे 
47 के पहले तेरी गूजती थी हुन्कारे 
पर बाद मे तुझको लगा की देश अभी आज़ाद नही 
इसिलिए 75 मे गूजे थे तेरे फिर नारे 
आज़ाद कराया था जो देश था गुलाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ---

पर तुझको भी पता नही था फिर वही सब होना है 
अपने गान्धी की तरह तुझे भी अन्धकार मे खोना है 
देश की जनता को फिर वही व्यव्स्था शासन ढोना है 
रामराज के कर्णधारो को फिर गद्दी पर सोना है 
कहते थे प्रधान की खुदा ना वो इंसान रे 
सैकड़ो प्रणाम ----

अब तेरे बेटे तेरा इक स्मारक बनवाएंगे 
आंसू वही बहायेंगे और कसमे भी वही खायेंगे 
गंगाजल से धोए कोई कोई पत्थर मारेगा 
अपने अपने झंडे मे सब तुझको अब चिपकायेंगे 
गलियो गलियो बिकोगे तुम वोटो के दाम रे 
सैकड़ो प्रणाम ---

देश के नवयुवको मिल बोलो गांधी लोहिया जयप्रकाश 
गूजे सारी धरती और गूंज उठे सारा आकाश 
जो भुनाते गाँधी लोहिया और जयप्रकाश को 
आओ मिलकर अब हमे करना है उनका सत्यानाश 
एक व्यव्स्था नई बनाये सब मिल खासो आम रे 
सैकड़ो प्रणाम जयप्रकाश तेरे नाम रे ।

रविवार, 25 दिसंबर 2022

पिछले कई दिनो से

पिछले कई दिनो से 
गले की आवाज फंस गयी है 
ठीक से निकलती ही नही
पिछले कई दिनो से 
कलम चलती ही नही 
लगता है पन्ना फ़ट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
किबोर्ड पर उंगली टिकती ही नही 
लगता है 
किबोर्ड जोर से दब कर टूट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
नीद ठीक से आई ही नही 
पूरी रात कुछ खौलता रहता है 
पिछ्ली कई दिनो से 
खाने मे स्वाद नही है 
किसी तरह ठूस लेता हूँ
और निगल लेता हूँ 
मैं लड़ रहा हूँ जंग खुद से 
पिछले कूछ दिनो से 
कब खत्म होगी ये जंग ?

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

आवो न कृष्ण ।

कृष्ण आज तुम्हारे घर पर हूँ
और
ढूढ रहा हूँ 
कृष्ण तुम कहा हो 
ना मथुरा मे मिले 
ना गोवर्धन के आसपास 
ना यमुना के किनारे 
और 
ना गोकुल ,ना नन्दगाँव ,
ना बरसाने मे 
तब कहा हो कृष्ण 
निधिवन और मधुवन भी सूना है 
भागकर गये थे द्वारका 
क्या वही कही बिला गये कृष्ण 
पर लोग तो तुम्हे यहा ढूढ रहे है 
कब आवोगे कृष्ण 
या 
अब तुम हो ही नही 
तुमने रचा था महाभारत 
या तुम सचमुच नही चाहते थे वो युद्द 
तो फिर हुआ कैसे वो युद्ध 
क्या सिर्फ तन्हारे उस उपदेश के लिये 
कि 
सामने जो भी है मत देखो कौन है 
बस उसे मारो 
और 
लाशो से पटी धरती को देख 
शायद युधिष्ठिर कांप उठे थे 
तुम भी कांपे थे क्या कृष्ण 
तुम तो इश्वर थे 
अवतार थे विष्णू के 
फिर क्यो नही रोक पाये 
अपनो का ही वीभत्स वध 
क्यो नही रोक पाये धूत क्रीड़ा 
क्यो नही रोक पाये एक नेत्रहीन का अपमान 
क्यो नही रोक पाये भरी सभा मे स्त्री का अपमान 
क्यो नही रोक पाये वो वध 
चाहे अभिमन्यु का हो या जयद्रथ का 
वो छल से किया गया वध 
तो क्या तुम भी सर्फ दर्शक थे 
या मिथ्या है कि तुम इश्वर हो 
वरना !
तो क्या तुम इन अनैतिकताओ के सारथी बनकर 
खो बैठे थे अपना देवत्व 
और शक्तिया 
और हो गये थे अशक्त ।तभी तो भागना पड़ा तुम्हे अपनी प्यारी नगरी छोडकर 
क्या तभी तुम शिकार हो गये एक बहेलिए के 
अगर हा तो एक बार प्रकट होकर ये बता दो 
ताकी करोदो लोगो का भ्रम टूट सके 
अगर ना 
तो भी प्रकट होकर बता दो कि तक क्यो हुआ वो सब 
और 
एलान कर दो 
कि 
अब वैसा कुछ भी नही होगा कृष्ण ।
तुम्हारी नगरी मे मुझे इन्तजार है तुम्हारे आने 
और एलान करने का ।
आवो न कृष्ण ।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

वो दिन हमारे कारण आएगा

एक दिन 
आसमान बहेगा
जमीन पर 
समुद्र उड़ेगा
आसमान पर
पहाड नाचेगा
पत्तो पर 
पेड उगेगे 
आसमान पर
चिडिया खायेगी
हाथियो को 
चीटियो के डर से 
शेर भालू भागेगे 
बस केवल इंसान 
कही नही होगा 
वो दिन हँ वो दिन 
हमारे कारण आएगा । 

सोमवार, 14 नवंबर 2022

वो दिन संघ की जीत का होगा ।

एक दिन 
आसमान बहेगा
जमीन पर 
समुद्र उड़ेगा
आसमान पर
पहाड नाचेगा
पत्तो पर 
पेड उगेगे 
आसमान पर
चिडिया खायेगी
हाथियो को 
चीटियो के डर से 
शेर भालू भागेगे 
बस केवल इंसान 
कही नही होगा 
वो दिन हँ वो दिन 
संघ की जीत का होगा ।

सोमवार, 7 नवंबर 2022

दिए जलाओ खूब जलाओ

दिए जलाओ खूब जलाओ 
इतने जलाओ कि डूब जाओ 
और भूल जाओ भूख अपनी 
दर्द अपना औ चीख अपनी 
जहां भी मिले जगह कोई भी 
मंदिर कोई या नदी किनारा 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
और हर बारी गिनते जाओ 
पिछली बारी जितने जले थे 
उससे ज़्यादा अबकी जलाओ 
फिर नया कीर्तिमान बनाओ 
कैसी ग़रीबी कौन है भूखा 
कैसी बेबसी और बेकारी 
ये सब बाते बेमतलब की 
चकाचौंध में इन्हें भुलाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
सीमा पर जो शहीद हुए है 
वो सब है गरीब के बच्चे 
सुरसतिया की लाज लूटी 
या गौहरबानो उठा ली गयी 
पेड़ो पर लटके किसान हो 
या फ़ुटपाथो की आबादी 
इन सबसे तो आँख फेर लो 
धन्नासेठो को चमकाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
उसके घर में तेल नही है 
कल दिए से तेल वो लेगा 
और वो है पत्तों पर खाता 
कल दिए वो के जाएगा 
ये भी तो एहसान बहुत है 
इन एहसानों को छपवाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ 
घर में अंधेरा है लाखो के 
उनको उजाला ख़ुश कर देगा 
पेट में जिनके आग जल रही 
उनके पेटो को भर देगा 
जो क़िस्मत में वही हो रहा 
उन सबको ये पाठ पढ़ाओ 
राम जी अग़ला जन्म बनाए 
ऐसा भाव उनमें जगाओ 
दिए जलाओ खूब जलाओ । 


मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

दर्द भोगे हो साथ साथ

पिता हो ,माँ हो 
बेटा या बेटी 
पता नही कैसे 
समझ जाते है 
एक दूसरे का दर्द 
और 
अंदर अंदर छटपटाते है
एक दूसरे के लिए 
कोई पैथी नही पहचानती 
न कोई विज्ञान 
इस बेतार संदेश को 
गर 
दर्द में शामिल रहे हो 
कभी या ज्यादातर 
और 
दर्द भोगे हो साथ साथ 
मजबूत चट्टान बनकर 
एक दूसरे के लिए 
और 
जुड़े हो दिल और आत्मा से ।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रातें 
कितनी स्याह होतीहै 
क्यो होती है 
इतनी स्याह रातें 
ज्यो ही सूरज 
पच्छिमी की खोह में 
डुबकी लगाता है 
पूरब से फैलने लगती है 
स्याह रात 
टिमटिमाते हुई 
रोशनियां भी 
जुगनू से ज्यादा 
कुछ नही होती 
कितनी भयानकता 
समेटे होती है स्याह रात 
जिंदगी गर्त हो जाती है 
धीरे धीरे इसके आगोश में 
और 
कितना अकेलापन 
तारी हो जाता है 
जिसमे जिंदगी 
सवाल बन जाती है 
इन सवालो का 
कोई जवाब नही होता 
खुद से ही बाते करना 
खुद को तसल्ली देना 
खुद के अकेलेपन से लड़ना 
और लड़ते लड़ते 
नीद के लिए लड़ना 
ताकि आंख बंद कर 
अनदेखा कर सके 
इस स्याह अंधेरे को 
और अकेलेपन को 
पर 
कितना स्याह है सब कुछ 
चलो आंखे बंद कर लेते है 
और 
सोच लेते है 
की 
अकेले नही है हम 
तमाम सूरज उग गए है 
हमारी जिंदगी में ।
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

फिर सब होगा शांत

कुछ सवाल है 
जो अनुत्तरित है 
कुछ जवाब है 
जो खुद 
सवाल बन गए है 
सिलसिला टूटता ही नही 
न सवालो का न जवाबो का 
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है 
पर कही तो कोई दीवार होगी 
या 
होगा इस सफर का डेड एंड 
जो रोक देगा क्रिया को 
और प्रतिक्रिया को भी 
और 
फिर सब होगा शांत शांत ।

बुधवार, 21 सितंबर 2022

तुम कुर्सी हो मुझे मालूम है तुम्हारे पांव नहीं

इतनी दूर क्यों हो तुम कभी मिल जाया करो 
न हकीकत में तो सपने में ही आ जाया करो 
तुम कुर्सी हो मुझे मालूम है तुम्हारे पांव नहीं 
मेरे तक आने को कोई तो दाव लगाया करो |

रविवार, 18 सितंबर 2022

बाते बस बाते बनाये जा रहे है

बाते बस बाते बनाये जा रहे है
मुल्क को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम कर दिया चंद दिन में 
फिर भी मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से
पर अब किस्से सुनाये जा रहे है

कोविड कभी डेंगू से मर गये है 
और ये भाषण सुनाये जा रहे है
 
लाखो मजदूर निकले थे घरो से 
उन पर डंडा बजाये जा रहे है
 
चेहरे पर शिकन नहीं है जरा भी
मौत के कारण गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना
ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

रौशनी से मन बहलाने वाला हूँ |

वो देखो न दूर किस कदर वो सूरज चमकता है 
मैं तुमको छोड़कर सूरज के साथ जाने वाला हूँ 
मत कहना की मैंने भी तो धोखा दे दिया तुमकों 
मैं भी अँधेरा छोड़ रौशनी से मन बहलाने वाला हूँ |

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे हैदरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है
दरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |

हम तो लुटते रहे हर वक्त हर चौराहे पर
वो हर चौराहे पर ही दूकान लिए बैठे है |

हम बने सीढियां तो मीनार तक वो पहुचे
हम तो सीढ़ी रह गए वो महान बने बैठे है |

बड़े बड़े थे वादे सबकी कहानी बदलेगी
हम पत्थर भी नहीं वो भगवान बने बैठे है |

लावारिश होते कई लोगो को हमने देखा है
स्वयंभू भगवान आज बे पहचान बने बैठे है |

संविधान की कसम खा उसके ऊपर बैठ गए 
राजा नहीं बनोगे तुम हम संविधान लिए बैठे है 




*   *   *    *     *     *      *      *      *   *

इतना भी मत इतराओ की आज सूरज हो
सब दफ्न होते है वो शमसान हमने देखा है |

हमारा क्या जमी पर गिर के वही रह जायेंगे
आसमां से गिरे को लहूलुहान हमने देखा है |

कर सको तो नीव की ईंटो की भी क़द्र करो
वर्ना जमीदोज होते कई मकान हमने देखा है |

बुधवार, 24 अगस्त 2022

दिल नाराज़ है

दिल नाराज़ है 

परसों खाना खाया ही था 
कि
दिल नाराज़ हो गया 
बोला ख़ुद खा लेते हो 
और 
मुझे भूखा छोड देते हो 
मेरा ध्यान ही नही रखते 
चलो मैं रूठ गया 
फिर भी मैंने अनदेखा किया
तो कल फिर नाराज़ हुआ 
और 
आज दिल के डाक्टर के पास आ गया हूँ 
दिल की नाराजगी दूर करने को 
देखे इस डाक्टर से ख़ुश होता है 
या इसे कोई और डाक्टर चाहिए ।

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी 
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है 

वो अकेले बुजुर्ग इंसान 

बहुत दिनो क्या सालो से 

जानता हूँ उन्हें मैं 

और 

बहुत अच्छी है उनसे पहचान 

पहले उनका घर भरा भरा था 

फिर 

धीरे धीरे खाली होता चला गया 

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे 

अचांनक अकेले हो गए वो 
कभी बैठने लगे मेरे साथ 

और बताने लगे 

अपनी पूरी बात 

पहले 

उनके पास बहुत लोग आते थे 

जब वो कुछ थे 

और बहुत लोग 

उनकी उंगली पकड़ कर 

क्या क्या हो गए 

तब तो हालत ये थी 

किसी के घर मौत भी
 
हुयी हो 

तो फोन करता था 

की आप जल्दी आइये 

अर्थी उठने वाली है 

आप का ही इन्तजार है 

शादी हो या कुछ 

कितने लोग बुलाते थे 

वो लोग जो कहते थे कि  

आप का ज्ञान रौशनी देता है 

और आप के बिना तो 

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता 

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए 

अब कोई नहीं आता 
कोई नहीं बुलाता 

सबको बना दिया 

पर ये जहा के तहा रह 

गए 

जब कोई उनका अपना 

धोखा देता या 

कर देता पीठ पर वार 

तो ये रहते थे बहुत दुखी 

और बेक़रार 

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में 

पर 

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो 

मैने देखा है 

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने 

पर जब अपने साथ थे 

क्या मजाल उनके चेहरे पर 

शिकन भी आई हो कभी 

लेकिन 

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे 

जब से अकेले हो गए वो 

उनके बच्चे भी चले गए दूर 

अपनी अपनी जरूरी वजहों से 

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ 

बहुत प्यार करते है 

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी 

पर मजबूरिया अपनी जगह है 

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में 

अक्सर देखता हूँ 

उन्हें सुबह बाहर निकल कर 
लान से 

तुलसी की पत्तियां तोड़ते 

बताते है 

की उनसे अच्छी चाय 

कोई नहीं बना सकता है 

सेंक लेते है ब्रेड और 

काट लेते है कोई फल 

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है 

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है 

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा 

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते 

मैंने कहा 
क्यों खुद करते है ये सब 

और इस उम्र में 

बोले कसरत भी है 
और पैसे की बचत भी 

मैंने पुछा की आप को क्या कमी 

तो बस मुस्करा कर रह गए 

मंगाते है खाना है कभी कभी 

शायद दो दिन में एक बार 

मैंने पूछा की आप को तो 

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी 

बोले खाना ज्यादा होता है

और 

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है 

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है 

और 

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में 

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है 

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे 

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा 

और 

नए नए पकवान खाऊंगा 

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न 

और 

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता 

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा 

कभी कभी बहुत खुश होते है 

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा 

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर 

और सब तैयारी में लगे रहते है 

कई दिन तक 

फिर जब तक बच्चे साथ होते है 

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन 

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक 

कुछ गुनगुनाते रहते है 

और 

बच्चो के यहां से आने के बाद भी 

कई दिन उदास होते है 

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ 

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है 

बज जाती है तभी घंटी 

कौन देखे की कौन है 

और 
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है 

कभी दूध गर्म करते है 

और बाहर कोई आ गया 

और दूध गिर जाता है पूरा 
चाय भी 

कभी सब्जी जल जाती है 

तो कभी रोटी खाक हो जाती है 

पुछा की फिर क्या करते है आप 

बोले अगर दिन में होता है 
तब तो हो जाता है 

पर जब रात में जल जाती है 

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना 

या अगर ब्रेड है तो वो 

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है 

और 

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है 

हल्का हल्का 

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना 

की मैं भूखा भी सोता हूँ 
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है 

परेशांन रहने लगेंगे 

उन लोगो के खुश रहने 

और मस्त रहने के दिन है 

उस दिन बहुत दुखी थे 

मैंने पुछा क्या हुआ 

बोले 

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है 

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ 

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है 

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ 

और 

फिर जोर से ठठाकर हँसे 

और चल दिए 

मैंने कहा कहा चले 

बोले किसी और को ढूढने 

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो 

कभी कभी जब बीमार हो जाते है 

तो दिखलाई नहीं पड़ते 

मिले तो पुछा क्या हो गया था 

बोले कुछ नहीं 

बताओ और क्या हो रहा है 

बहुत कुरेदा 

तो बोले मेरा दुःख तो 

कोई बाँट नहीं सकता 

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख 

तो बाँट सकता हूँ 

आइये कुछ अच्छी बाते करे 

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे 

मैंने पुछा आज क्या हुआ 

बोले एक चिंता है 

मुझे कुछ हो गया तो 

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को 
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे 

और खुला रखना भी मुश्किल है 

और 

उनकी आँखों से टपक गया कुछ 

बाँध जो रुका था काफी दिनों से 

शायद टूटना ही चाहता था 

कि

वो इधर उधर देखने लगे 

और खांसने लगे 

खुद को रोकने को 

और मुझे भरमाने को 

फिर धीरे से उठ कर चले गए 

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग 

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है 

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ 

और 

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा  

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव 

और 

सुनुगा उनका खोखला ठहाका 

और फिर मैं भी सर झुका कर 

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा 

अपने घर की तरफ 

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

शनिवार, 13 अगस्त 2022

अच्छे दिन

मेरी व्यंग कविता का आनंद लीजिये ---

मोदी जी ने डुगडुगी बजवाया 
पूरे देश में मुनादी करवाया 
की अब तो अच्छे दिन आ गए है
चारो और ख़ुशी के बादल छा गए हैं 
सब पंद्रह पंद्रह लाख पा गए है 
खाने से लेकर सब्जी तक और 
डालर के दाम बहुत नीचे आ गए है 
चीन हमारी जमीन छोड़ भाग गया है 
पाक ने उस कश्मीर से बिस्तर बांध लिया है 
क्या क्या बताऊ और क्या क्या दिखाऊ 
बाहर निकलिए देखिये और 
अपने हिस्से का अच्छा दिन ले जाइये 
हमारे ऊपर अब सवाल मत उठाइए 
ये सुन कर सब गरीब और बेकार जागे
अपना अपना थैला उठा कर बाहर भागे 
पूछ आये हर संघी और भाजपाई दुकान पर 
हर संघी और भाजपाई के मकान पर 
कि भाई जी अच्छा दिन कहा है 
सचमुच किसी को कही दिखा है                   
हर कोई कुटिलता से मुस्करा रहा था 
बेचारा गरीब उदास हो वापस जा रहा था
और अच्छा दिन 
अदानी अम्बानी के महलो में ठहाके लगा रहा था

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

हां जीवन इसको कहते है |

जिंदगी 

कब होगी पहचान हमारी 

इतने सालो से है दूरी 

क्या मजबूरी 

जिन्दा तो है 

पर क्या सचमुच 

क्या जीवन इसको कहते है 

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू  

नीद नहीं और पेट में हलचल 

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ 

बस अन्धकार है 

क्या जीवन इसको कहते है 

जीवन कब हमको मिलना है 

या फिर ऐसे ही विदा करोगे 

कुछ तो सोचो 

हम दोनों क्या जुदा जुदा है 

कुछ तो बोलो 

और भविष्य के ही पट खोलो 

या फिर कह दो 

हां जीवन इसको ही कहते है | 

जींना है तो हंस कर जी लो 

या फिर दर्द गरल को पी लो 

तेरे हिस्से में बस ये है 

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ 

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ 

चल अब सो जा 

अच्छे सपनो में आज तो खो जा 

कल फिर मुझसे ही लड़ना है 

हां जीवन इसको कहते है |

रविवार, 31 जुलाई 2022

नई सज़ाएं

क्या कोई सत्ता 
और 
न्याय मिलकर 
ऐसी नई सज़ाये 
शुरु कर सकते है ? 
जीभ काट देने की सज़ा ? 
आंख फोड देने की सज़ा ? 
कलम तोड़ देने की सज़ा ? 
कीबोर्ड हटा देने की सज़ा?  
अक्षर खत्म कर देने की सज़ा ?
अशिक्षित रहने की सज़ा ?
दिमाग निकाल लेने की सज़ा ? 
वो सत्ता किसकी होगी 
वो न्याय किसका होगा 
आतंकित है मानवता 
उसकी कल्पना से भी 
उसकी सम्भावना से भी ।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

रहम कर मौला

दिल ,दिमाग़ ,कलम कीबोर्ड
साथ नही दे रहा है कुछ भी 
बहुत कुछ बोलना चाहता हूँ 
पर आवाज फँस जा रही है 
जब भी कलम उठाता हूँ 
अपने बोझ से गिर पडती है
दिल में जो झांकता  हूँ 
तो बस अंधेरा दिखता है 
दिमाग़ पर ज़ोर देता हूँ 
सर ज़ोर से फटने लगता है 
कीबोर्ड पर उँगलिया रखता हूँ 
तो उँगलियाँ झुलस जाती है 
ये क्या दौर आ गया है मौला 
रहम कर रहम कर रहम कर ।

रविवार, 24 जुलाई 2022

नदी में तैरती लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

हमको उंगली दिखा रहे है

आदरणीय Udaypratap Singh  जी की चार पंक्तियाँ पढ कर हमने भी लिख दिया चार ही पंक्तियाँ---

गलत जा रहे थे और गलत जा रहे है 
टोका तो हमको   उंगली दिखा रहे है 
गड्ढे मे गिरोगे   चमचे ताली बजाएंगे 
हम तो दुखी होंगे और आसू बहायेंगे ।

शनिवार, 23 जुलाई 2022

एलान कर दो कि डर गए हो



एलान कर दो कि डर गए हो 

ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने ग़ुलामी मान ली है 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सब डर गए हो  
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने सोचना बंद कर दिया है 
ख़ुद ही एलान का दो 
कि अब कोई सवाल नही पूछेगा 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि अब कोई चुनाव नही चाहिए 
चुन लिया है इसी आका को 
जब तक वो चाहे तब तक के लिए 
तुम्हारे पास और कोई चारा नही है 
तमाम क़ानूनी ग़ैर क़ानूनी हाथ 
लपकने को तैयार है
और कसने को तुम्हारी गर्दनो को 
मार दिए जागोगे तुम 
या सड़ा दिए जागोगे 
किसी काल कोठरी में 
इसलिए एलान कर दो 
अपनी गर्दनो को टूटने से पहले 
किसी काल कोठरी में जाने से पहले 
कि सब लोग डर गए हो 
और तैयार हो 
साहब हुज़ूर के रास्ते का 
पावड़ा बनने को सदा के लिए ।

शनिवार, 25 जून 2022

राम तुम मत आना

राम तुम मत आना

उन्होने कहा 
जय श्रीराम बोल
वो बोला 
जय श्रीराम 
उन्होने कहा 
हनुमान की जय बोल 
वो बोला 
हनुमान की जय 
वो जो कहते रहे 
वो बोलता रहा 
वो बोलता रहा
जय श्रीराम 
और 
हनुमान की जय 
और 
राम के भक्त 
उसे 
लगातार पीटते रहे 
जब तक 
वो बोलता रहा 
कितना दर्द हुआ होगा न
जब 
इतने लोगो ने 
इतने घंटो तक 
मारा होगा उसे 
क्या दर्द का 
बिल्कुल भी एहसास 
नही हुआ होगा 
उन लोगो को 
जो खुद को 
हिन्दू कहते है 
क्या सचमुच 
ये लोग हिन्दू है 
हिन्दू तो चींटी को 
बचा कर चलता है 
की 
कही मर न जाये 
ये कौन से हिन्दू है 
अब वो अब 
सांस ही नही ले रहा था 
तो 
उन्होने भी 
बोलना बन्द कर दिया 
जय श्रीराम 
और 
हनुमान की जय 
वो तो 
बोलने लायक ही नही बचा था 
भाग खड़े हुये 
राम का नाम लेकर 
वध करने वाले 
हा वध शब्द का ही 
प्रयोग किया था 
गांधी को मारने वालो ने 
और 
गोली खाकर 
गांधी ने भी तो कहा था 
हे राम हे राम 
नही 
ये अब हे राम नही 
बल्कि 
जय श्रीराम बोलते है 
ताकी कही गांधी के 
अनुयायी न कहलाये 
पर 
वो तो 
भाग ही नही पाया  
बिन बुलायी मौत से 
जो 
उस राम के नाम से आई 
जिसने 
अधर्म को खत्म किया 
धर्म के लिए 
पर धर्म के नाम पर भी 
कभी अधर्म होगा 
कहा सोचा होगा 
राम ने
जीते राज 
उन्होने युद्द मे 
पर 
दे दिये 
वही के लोगो को 
राज पाने के लिए 
उनके नाम का उपयोग होगा 
कहा सोचा होगा 
राम ने 
अब उसकी विधवा 
जो अभी 
जल्दी ही 
ब्याही गयी थी
अहिल्या की तरह 
पत्थर बन गयी है 
की 
कौन होगा 
अब सहारा 
किसके साथ बीतेगा जीवन 
कितना चीखी होगी वो 
उसकी बेजान लाश देखकर 
कई बार तो 
बेहोश हो गयी होगी 
फिर पानी डाल कर 
उठाया गया होगा उसे 
वो फिर पछाड़ मार मार 
गिर जाती होगी 
क्या 
उसे मारने वालो ने 
ऐसे दृश्य नही देखा होगा 
अपने घरो पर 
और 
नही देखा होगा 
विधवा हुयी किसी 
बहन और बेटी को 
अचानक 
और बूढे हो गये मा बाप को 
बेसहारा हो गये 
अबोध बच्चो को 
क्या नही आते वो दृश्य 
कभी 
इन लोगो की आंखो मे 
राम को भी तो 
बाँट दिया इन लोगो ने 
जो 
उसके खाने मे 
आते ही नही 
कि 
उम्मीद करे की 
इस युग मे भी 
आयेंगे राम 
और 
उद्धार कर देंगे 
उसकी बुत बन गयी 
विधवा का ।
वैसे भी राम 
अब आते ही कहा है 
चाहे 
कितना भी अधर्म हो 
पर 
अब तो राम 
खुद ही खतरे मे है 
क्या पता 
कि 
वो पढाये पाठ 
सही और गलत का 
धर्म और अधर्म का 
और 
उनका नाम लेने वाले 
उन्हे ही राम विरोधी 
और
राष्ट्र विरोधी बता दे
और 
जय श्रीराम का नारा
लगाती हुयी भीड़  
राम का ही बध कर दे 
इसलिये राम !
तुम बिल्कुल मत आना 
अपने भक्तो वाले 
इस देश मे 
और इस युग मे ।

शुक्रवार, 24 जून 2022

गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

बाते बस बाते बनाये जा रहे है
मुल्क को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम कर दिया चंद दिन में 
फिर भी मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से
पर अब किस्से सुनाये जा रहे है

कोविड कभी डेंगू से मर गये है 
और ये भाषण सुनाये जा रहे है
 
लाखो मजदूर निकले थे घरो से 
उन पर डंडा बजाये जा रहे है
 
चेहरे पर शिकन नहीं है जरा भी
मौत के कारण गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना
ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

गुरुवार, 23 जून 2022

मैं मैं हुँ और तुम तुम हो ।

तुम पढ़ लो 
वो कविता 
जो 
मैंने लिखा ही नही 
तुम देख लो 
वो चित्र 
जो 
मैंने बनाया ही नही 
तुम बस जाओ 
उन साँसों में 
जो 
मैंने ली ही नही 
तुम आ जाओ 
मेरे घर में 
जो 
कही है ही नही 
पर 
तुम आ सकते हो 
सपने में मेरे 
जिसकी 
सुबह याद नही रहती 
छोड़ो सब 
आ जाओ 
और बैठ जाओ 
मेरे सामने ताकि 
निहार सकूँ मैं तुम्हें 
जब तक 
मैं मैं हुँ और तुम तुम हो ।

मंगलवार, 21 जून 2022

बरसें तो हरसे

आख़िर लखनऊ में भी मौसम की ग़रीबी से मुक्ति मिलती दिख रही है । आख़िर लखनऊ में भी आ गयी है बदली की कुछ टुकड़ियाँ 
आख़िर लखनऊ में हवाओ की तपिश हुयी ठंडी 
आख़िर लखनऊ में सूरज को परे धकेला दिया बदली ने 
पर ये बदली छलावा है या सचमुच भरी पूरी बदली 
ये तपती हुयी धरती को भिगो देगी भरपूर पानी से 
या फिर तवे पर छन्न की आवाज की तरह टपकेगी 
पर उम्मीदों ने एहसास को भिगो ही दिया है 
अब बरसे तो हम हरसे वरना फिर कुछ दिन तरसे । 

बुधवार, 8 जून 2022

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

मंगलवार, 31 मई 2022

एकाकीपन

बहुत उदास है दिन 
राते तो उदास ही है
काफी दिनों से 
पर आगोश में नीद के 
उदासी खो जाती है कही 
पर दिन की उदासियाँ 
और एकाकीपन 
इनसे जूझना नहीं आता 
अपने से भाग जाने की 
कला नहीं सीख पाया मैं 
अभिमन्यु की तरह 
एक कला से महरूम 
रह गया मैं भी 
वो चक्रव्यूह तोड़ने को 
था आतुर 
और मैं तलाश रहा हूँ 
कोई चक्रव्यूह 
जिसमें एकाकीपन और 
उदासी का एहसास न हो ।

मंगलवार, 17 मई 2022

रोज की जिंदगी और ये घर ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा  

हा 
मुझे बचपन से गुस्सा आता था 
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से 
मुझे गुस्सा आता था 
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक 
मैं ट्रेन के दरवाजे पर 
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था 
की
भीड़ ज्यादा है तो  
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते 
मुझे गुस्सा आता था जब कोई 
दूसरों के मैले को उठा कर 
सर पर लेकर जाता था 
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर 
किसी को खाना दिया जाता था 
गुस्सा आता था 
जब सायकिल के हैंडिल पर 
दो बाल्टियां 
और 
पीछे कैरियर पर मटका रख 
दो मील दूर पानी लेने जाता था 
शहर में 
गुस्सा आता था 
जब गांव जाने के लिए 
मीलो सर पर बक्सा रख कर 
चलना पड़ता था अंधेरे ने 
गुस्सा आता था 
जब गांव में बिजली भी नही थी 
गुस्सा आता था 
जब पुलिस अंकल किसी को 
बिना कारण बांध कर ले जाते थे 
माँ बहन की गालियां देते हुए 
और 
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था 
पर किसी भी चीज को 
बदल सकने की ताकत नही थी 
इस बच्चे में 
उसके बाद भी 
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज 
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ 
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं 
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था 
पर खुद शिकार हो गया 
हर बात पर जिस पर 
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए 
मुझे तो गुस्सा आता रहा 
और 
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया 
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर 
और 
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया 
पर 
ताली पिटती भीड़ में 
खो गया मेरा गुस्सा 
और में भी खो गया साथ साथ 
पानी पीकर या पानी के बिना 
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा 
संसद हो या मुम्बई 
मेरा गुस्सा सड़क पर आया 
लॉटरी हो या शहादत 
सड़क पर फूटा गुस्सा 
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी 
नही रोक सकी मेरे गुस्से को 
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता 
भी बने मेरे गुस्से के कारण 
मुझे आज भी गुस्सा आता है 
बार बार बदलते कपड़ो पर 
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर 
पिटती विदेश नीति 
और अर्थव्यवस्था पर 
रोज शहीद होते सैनिको पर 
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर 
रोज के बलात्कार पर 
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर 
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर 
इंच इंच में होते अपराध पर 
थाने से तहसील होते हुये 
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर 
भाषणों के खेप पर 
आसमान छूती महंगाई पर 
न जाने कितनी चीजे है 
गुस्सा होने को 
पर अब 
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और 
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता 
और 
आवाज के दबने पर उफान मारता है 
पर 
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद 
और साधारण आवाज 
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर 
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर 
और दीवारों के बीच 
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए 
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी 
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए 
जो मेरे पास नही है 
और 
चाहिए धन काफी धन 
जो मंच सज़ा सके 
,रथ बना सके 
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है 
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने 
कोई कविता या कुछ विचार 
ताकि गुस्सा 
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

गुरुवार, 12 मई 2022

उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश 

मेरा प्यारा है सबका प्यारा है सबसे न्यारा है

मेरा प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश  

भारत की ये शान है हा भारत की ये जान है 

ये भारत का मान है ये भारत की पहचान है

ये आन बान और शान है मेरा ये उत्तर प्रदेश

मेरा प्यारा है सबका प्यारा है सबसे न्यारा है  

उत्तर प्रदेश ------------ 

हम भारत के वासी है पर पास हमारे काशी है 

हम भारत के वासी है पर कान्हा के ब्रजवासी है

हम भारत के वासी है वो  राम मेरे बनवासी है 

देवो ने भी चुना जिसे हम है वही प्रदेश उत्तर प्रदेश  



बुधवार, 11 मई 2022

मौत और अकेलापन

मौत और अकेलापन 
________________
मौत कितनी 
खूबसूरत चीज होती है 
हो जाता है 
सब कुछ शांत शांत 
गहरी नींद 
तनावमुक्त ,शांत शांत 
न किसी का लेना 
न किसी का देना 
कोई भाव ही नही 
कोई इच्छा ही नही 
न डर ,न भूख ,न छल 
न काम न क्रोध 
बस शांति ही शांति 
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा 
और सब देख रहे है 
न रोटी की चिंता 
न बेटे और बेटी की 
न घर की चिंता 
न बिजलो और पानी की 
न बैंक की चिंता 
न टैक्स जमा करने की 
न काम की चिंता 
और न किसी छुट्टी की 
न किसी खुशी की चिंता 
न किसी की नाराजगी की 
निर्विकार ,स्थूल 
हल्का हल्का सब कुछ 
देखो 
कितना सपाट हो गया है चेहरा 
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को 
गजब का तेज लग रहा है 
बहुत कुछ है खूबसूरत 
पर मौत से तो कम 
और मुझे तो 
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन 
सन्नाटा ही सन्नाटा 
कोई आवाज ही नही 
खुद की सांसो के सिवाय 
कोई भी नही खुद के सिवाय 
पंखे के आवाज तो 
कभी कभी फोन की 
और 
हा दब गया रिमोट 
तो टी वी की भी आवाज 
तोड़ देती है सन्नाटा 
और 
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर 
गजब का मुकाबला है 
मौत और अकेलेपन का 
हा
एक फर्क तो है दोनो में 
मौत खूबसूरत होती है 
पर अकेलापन बदसूरत 
मौत शांत होती है 
पर अकेलापन 
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में 
लौट कर किसी ने नही बताया 
उसका अनुभव 
पर 
अकेलेपन को तो 
मैं जानता भी हैं 
और पहचानता भी हूँ 
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है 
और 
अकेलेपन का अंत मौत । 
इसलिए 
मौत से डरो मत उसे प्यार करो 
अकेलेपन से हो सके तो भागो 
और 
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

रविवार, 24 अप्रैल 2022

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

सोमवार, 18 अप्रैल 2022

लिखते है नयी इबारत

चलो धूल डालते है 
कुछ विचारो पर 
भावनाओ पर 
रिश्तों पर 
और ढक देते है 
बहुत सी यादे ।
भूल जाते है वो कदम 
जो हम साथ चले थे 
लिखते है नयी इबारत 
और नया मुस्तक़बिल ।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

हुक्मनामे

आये दिन ये जो
हुक्मनामे फेंके जा रहे है 
आप के वजूद पर
आप के चिन्तन पर  
ताकि 
सीख जाओ आप 
तानाशाही मे जीना 
अंधे और मूर्खतापूर्ण
आदेशो को मानना 
और 
जब जब आका कहे 
घरो मे कैद रहना 
शायद खिड़किया भी
सील हो जाये एक दिन
और दरवाजे भी 
आका के बटन दबाने से
ही खुले सब 
दिमाग मत चलाओ 
जुबान मत हिलाओ 
पर सर हिलाओ 
जैसे आका कहे 
हाँ तो हा, ना तो ना ।