मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

गौरव के साथ चलते रहो ।

आप दलगत राजनीति छोड़ दे 
दल वाले आप को छोड़ देते है 
आप राजनीति छोड़ दे 
राजनीति वाले 
आप को छोड़ देते है 
आप नौकरी से बाहर 
तो वहाँ के रिश्ते खत्म 
आप काम के न हो 
और बोझ बन जाये 
तो सारे रिश्ते खत्म 
जी हा 
रिश्ते भी व्यापार है 
पूरा कारोबार है 
मुनाफे के साथ रहते है 
और घाटा छोड़ 
मुनाफे की तरफ बहते है 
ये मच्छर की तरह है 
जो लैम्प पोस्ट जल जाये 
सारे मच्छर उधर भाग जाते है 
आप का बुझ गया 
तो किस बात के नाते है 
इसलिए चाहे जो करो 
उपयोगी रहो 
कही से भी तेल लाओ 
या बिजली 
पर जलते रहो 
फिर पूरी आभा 
पूरे गौरव के साथ चलते रहो ।

रविवार, 12 दिसंबर 2021

रिश्तो की डाल

पेड की डाले भी 
अपने पेड को भी 
घायल कर देती है 
कभी कभी 
जब चलता है 
कोई तेज अंधड़ 
तो
सबसे ज्यादा 
सबसे हल्के पत्ते 
साथ छोड़ते है पेड का 
फिर 
हल्की डाले टूट कर
अलग हो जाती है 
पर 
ज्यादा मजबूत डाल 
जो ज्यादा जुडी होती है 
खुद लटक जाती है 
और 
साथ ही छील देती है 
पेड के तने को भी 
जिससे जुडी होती है वो 
कई बार बहुत ज्यादा
मजबूत जुडी डाल तो
गिरती है तो 
पेड को चीर देती है 
बीचो बीच से 
फिर पेड कमजोर हो जाता है 
बच गया तो बच गया 
वरना दूसरा तेज अंधड़ 
पेड को भी जमीदोज कर देता है 
पेड की ये कहानी
जिन्दगी पर भी तो लागू होती है 
और 
इंसानी रिश्तो पर भी ।

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

कल हो या न हो

खुशी आंखो मे भरो 
चाहे कितने आसू 
लटके हो 
खुशी दिल मे भरो 
चाहे कितना घायल हो 
खुशी इच्छाओ मे भरो 
चाहे दम तोड गयी हो 
खुशी बातो मे भरो 
चाहे 
अन्दर से खोखली हो चुकी हो 
और ठठा कर हंसो 
चाहे आवाज फंस रहो हो 
गमो को कुचल दो 
फिलवक्त और सो जाओ 
खुशी के एहसास के साथ
नीद के आने का पल जी लो  
क्योकी 
पता नही कल हो या न हो ।

बदबू न आये और कुत्ता वफादार रहे

नाम वाले अक्सर 
बहुत अकेले होते है 
उनका नाम होता है 
उनके अकेलेपन का कारण
और 
कई बात 
वो स्वयं शिकार होते है 
गलतफहमी के 
कितने पर्दे पर चमकने वाले 
मर गये लावारिश 
और 
वो प्रोफेसर साहब 
जिन्हे फख्र था 
कि 
हजारो उनके पढाये 
रहते है इस शहर मे 
और वो गाँव नही गये 
वही बस गये 
वो जो रहते थे 
अपने कुत्ते के साथ 
और वो हीरोइन भी तो 
ये सब मर गये लावारिश 
एक न एक दिन 
और 
पडोसियो ने भी नही देखा 
कि 
क्यो नही दिखे बाहर
खिडकी पर 
या बालकनी मे 
कई दिन से 
पर ये सच नही 
कि उन्होने नही देखा 
देखा पास जाकर 
सभी ने 
जब सब 
बदबू से परेशान हुये 
जो उठ रही थी 
सड़ी हुयी लाश से 
कितना प्यार करता था
उनका कुत्ता उनको 
और 
कितना बफादार था 
पर उसको भी 
भूख लगती है 
नही मिला भोजन 
तो खा लिया 
अपने प्यारे मालिक
या मालकिन को ही 
सचमुच कितना अकेला
हो गया है 
हर शक्स इस दुनिया मे 
किसी का कोई नही 
और नाम वाले तो 
खैर सचमुच 
बहुत अकेले होते है 
और अभिशप्त होते है 
लावारिश मौत के लिये
तब जो है ही अकेले
और सधनविहीन बेनाम भी 
वो तो और भी न जाने
किस किस चीज के लिये
अभिशप्त होते है
पर मौत से पहले 
बाहर निकल कर
चिल्ला सकने का मौका
तो होना ही चाहिए 
या 
सड़ने से पहले
शरीर और अंग 
दान दे देने का 
ताकि बदबू से पडोसी
परेशान न हो 
और 
अगर कुत्ता है साथ मे 
भूख के कारण 
उसकी वफादारी कलंकित न हो ।

अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो

पहले अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो 

ऐ पढने लिखने वालो उठो 
ऐ कविता करने वालो उठो 
ऐ नाटक करने वालो उठो 
सब मंच सजाने वालो उठो 
सब कलम चलाने वालो उठो 
सब दिमाग लगाने वालो उठो 
सब आवाज उठाने वालो उठो 
कि 
कोई तुमारे अनंत नील गगन 
और तारो को छीन न ले 
उठो की चन्द्रमा तुम्हारा ही रहे 
प्रेम के लिये प्रेरित करता रहे 
उठो कि सूरज पर 
कोई अधिकार न जमा ले
और वो सबको रोशनी देता रहे 
उठो की हवाए 
किसी की कैद मे न हो 
स्वतंत्र चलती रहे 
उठो की हरियाली 
किसी की जागीर न हो
सबकी हो 
उठो की फूलो को 
खिलने से रोका न जा सके 
और सब फूल सब रंग
गुलजार करते रहे बगीचे को 
उठो की नदिया 
कोई सोख न ले 
और वो बहती रहे निरंतर
स्वछ और निर्मल 
उठो की आज़ादी महफ़ूज रहे 
उठो की जम्हूरियत 
किसी की जूती न बने 
उठो की लव खामोश न हो 
उठो तो तुम्हारी धड़कन
और तुम्हारी सांसे 
तुम्हारी ही हो 
उठो कि दुनिया 
अब शमसान न बने 
उठो की चंगेज स्टालिन
हिटलर मुसोलिनी 
अब कोई इन्सान न बने 
उठो अपनी आन बान
शान के लिये उठो 
उठो मानवता और 
दुनिया के लिये उठो 
पहले अपने हिन्दूस्तान
के लिये उठो ।

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

जो आये थे भिखारी बन कर मुझसे मांगने

जो आये थे भिखारी बन कर मुझसे मांगने 

मैं देखता रह गया वो मुझे कंगाल कर गया  

वो घिसी चप्पल में कितना मजलूम लगता था 

बड़ा मजबूर लगता था बडा मासूम लगता था 

जब मारा पीठ में खंजर मुझे बेहाल कर गया 



शनिवार, 27 नवंबर 2021

खाली हाथ बिना जेब जल जाना है

आज शमशान घाट पर 
बैठा देख रहा था 
और सोच रहा था 
जीवन का सच 
वो पैसे के पीछे भागते रहे 
बहुत कमाया 
पर 
जीवन तो नही बचा पाये 
उन्होने लकडी ली ढेर सारी 
और 
घी के कनस्तर के कनस्तर उडेल दिये 
पर चिता बड़ी मुश्किल से 
बड़ी देर मे जली 
और 
वो बस किसी तरह जला पाया 
पर चिता धधक कर जल उठी 
कितने कन्धे थे उसके साथ जो गरीब था 
पर सिर्फ नौकर साथ थे 
जो अमीर था 
शमशान भी समाज का आइना है 
कोई औरत या बेटी अकेली 
या दो ले आते है अपने को 
ठेल पर डाल कर 
और 
गिड़गिड़ाते है मदद को 
तो किसी की भीड
भर देती है शमशान को 
यद्द्पि जलते दोनो है 
लकडी मे 
पर 
किसी के पास चन्दन 
तो किसी के पास कुछ भी नही 
शमशान भी गैर बराबरी का स्थान है 
समाज दिखता है यहा 
और समाज का सच 
जिन्दगी का सच तो होता ही है 
कि 
खाली हाथ बिना जेब 
नंगे जल जाना है यहा सभी को ।

भविष्य पढो

इतिहास पढ कर क्या करोगे 
भविश्य पढो 
उसी मे हित है सबका 
मानवता का 
समाज का 
और 
देश तथा दुनिया का 
इतिहास पढो 
तो 
केवल इसलिये 
कि 
किन कारणो से 
मानवता को कष्ट हुआ 
मानवता का नाश हुआ 
बस वो नही होने देना है ।

सोमवार, 22 नवंबर 2021

संघर्ष ही जीवन है

कुछ लोग 
संघर्ष करते है 
जीवन भर 
जीवन के लिये
और 
एक छत के लिये  
जो संघर्ष 
खा जाता है
आधी जिन्दगी 
कुछ लोग 
संघर्ष करते रहते है 
अपनी ही दीवारो से
अपनी बनाई छत से 
बचे हुये जीवन भर
उनका जीवन जीवन कहा 
बस संघर्ष होता है ।

रविवार, 21 नवंबर 2021

अंग भी बोलते है कभी

हम कितना बोलते है रोज 
और 
हमारा शरीर सुनता है और 
मानता है हर बात 
पर 
कभी कभी शरीर का कोई अंग 
थोडा सा बोल देता है 
तो 
नही सुन पाते है हम 
और 
किस कदर पस्त हो जाते है ।
फिर दवाई चीर फाड और 
पता नही क्या क्या ।

चिडिया उड़,मैना उड़ ।

हम दोनो खेलते थे 
अपने बच्चो के साथ 
चिड़िया उड़ तोता उड़ 
मैना उड़ घोडा उड़ 
उंगली उठा कर उड़ा देते थे 
या उगली रखी रह जाती थी 
हार जाता था कोई 
घोडा हाथी उड़ पर 
पर उस दिन 
हार गये हम सब 
उंगली नही 
साथी ही उड़ गया 
अनंत आकाश मे 
देह को छोड़ कर 
और 
तब से चिडिया ने 
उड़ना बंद कर दिया 
उगली स्थिर हो गयी 
जहा की तहा 
तब से नही खेला 
चिडिया उड़,मैना उड़ ।

शनिवार, 20 नवंबर 2021

भगवान नाराज होंगे

मैने कुछ लोगो को 
बातो मे बता दिया 
कि 
किस तरह 
तमाम लोगो ने 
मेरा इस्तेमाल किया 
और 
फिर धोखा दिया 
पीठ पर वार किया 
तो 
उन बेचारो ने भी 
तय किया 
कि 
वो भी इस विधान 
और 
परम्परा को क्यो टूटने दे 
भगवान नाराज होंगे ।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

टूटा पत्ता

पेड़ से टूटता है पत्ता 
उड़ता है इधर से उधर 
गिरता है जमीन पर 
हरा होता है 
तो 
कोई जानवर खा जाता है 
सूख जाता है 
तो 
रौद दिया जाता है पैरो से 
और 
मिट्टी मे मिल जाता है 
पेड़ से टूटती है डाल 
सूख जाती है कुछ दिन मे 
पतली होती है 
या कमजोर होती है 
तो जला दी जाती है 
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है 
बना दी जाती है 
कुछ न कुछ 
किसी के बैठने को 
या 
सजावट की चीज बन जाती है 
घर से भागने वालो 
और 
इस पत्ते या डाल मे 
क्या फर्क होता है ?
कुछ भी नही न ।

चल पडूंगा पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ--

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और 
अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और 
अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए 
खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना 
वक्त से
और 
अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और 
बुरी का आहत कर देना 
और 
चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और 
कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और 
कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 7 नवंबर 2021

गोवर्धन और कृष्ण

कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन
बचाने को उन लोगो को 
जिनको खड़ा कर दिया था 
सबसे बडी सत्ता के खिलाफ 
बस यही तो कहा था कृष्ण ने 
कि 
उसे क्यो भोग लगाते हो 
जो खाता ही नही है 
जिसे भूख ही नही है 
और 
उदर भी नही है 
केवल वास लेता है वो 
उसे खिलाओ 
जिसे भूख है 
जिसे जरूरत है
लाओ मुझे खिलाओ 
मैं खाऊंगा 
कितना कमजोर था देवत्व 
की 
तुरन्त हिल जाता था उनका आसन 
और 
कितना क्रोध भरा था इनमें 
कैसे और क्यो देवता माने इन्हें
जो सहज इंसान भी नही 
बरसा दिया क्रोध 
उन सभी पंर 
जिन्हें खड़ा किया था कृष्ण ने 
सत्य के साथ 
पर 
कृष्ण भी तो कृष्ण थे 
प्रेम किया तो खूब किया 
राजनीति किया तो खूब किया 
युध्द भी खूब करवाया 
खूब मरवाया
और 
खूब बचाया 
खड़े हो गए यहाँ भी कृष्ण 
अपनो के साथ 
और 
उठा लिया गोवर्धन 
अपनी छोटी सी उंगली पर 
वो छोटी सी उंगली 
और 
उतना बड़ा पहाड़ 
कैसे टिक पाया होगा 
और 
कैसे उठाया होगा 
कितनी दुखी होगी 
उनकी उंगली 
शायद आज भी दर्द 
हो रही वो उंगली 
पर 
असम्भव को संभव करने का नाम 
ही 
कृष्ण है शायद 
लगता है 
की वो पहाड़ नही 
बल्कि पुरुसार्थ रहा होगा 
संकल्प रहा होगा 
इरादा रहा होगा 
और 
अडिगता रही होगी 
और 
आंख में आंख डाल कर 
खड़े हो गए होंगे कृष्ण 
सबसे आगे 
उंगली उठाकर चुनौती देते हुए 
और 
उनके संकल्प के सामने 
नही टिक पाया होगा 
इतना उथला से इंद्र
और 
भाग खड़ा हुआ होगा 
खूब तालियां बजी होंगी 
नाचे होंगे लोग 
कृष्ण को उठा कर कंधे पर 
गोपिया रीझ गयी होंगी कितनी 
और 
देख रही होंगी कनंखियो से 
कृष्ण को 
कृष्ण ने भी जरूर देखा होगा 
अठखेलियाँ 
और 
मंद मंद मुस्कराए होंगे कृष्ण 
पर 
कृष तुम कितने लंबे विश्राम पर हो 
या 
अपने गुण , अपनी जिम्मेदारी 
भूल गयो हो 
देखो 
कितने नकली देव 
क्या क्या जुल्म कर रहे है 
तुम्हारे लोगों पर 
तुम्हारी गोपिकाओं 
तुम्हारे बच्चो से 
क्या क्या सलूक हो रहा है कृष्ण 
तुम इतने बेदर्द तो नही हो सकते 
की 
लोगो का दर्द ही भूल जाओ 
आ जाओ न कृष्ण 
भारत ही नही दुनिया को 
एक और महाभारत की जरूरत है 
और 
जरूरत हैं 
आज के संदर्भ में 
एक नए ज्ञान और उपदेश की 
कब आवोगे कृष्ण 
और 
ये महापर्वत कब उठावोगे 
अपने इरादे और न्याय की 
उंगली पर ।
आओ न कृष्ण , अब उठ जाओ 
आ भी जाओ न कृष्ण ।

रविवार, 31 अक्टूबर 2021

बचा सको तो बचाओ अपनो को

संजय दत्त हो या आर्यन
सब परिवारों मे 
समय न होने
आपसी बातचीत 
और
आपसी विश्वास नही होने
बड़े और समाज तथा
कानून से बड़े होने के
एहसास का नरीजा है
सावधान रहिये 
कल हम और आप 
किसी के भी घर मे हो सकता है 
बिना गुनाह मे शामिल हुये 
पूरे परिवार को 
गुनाहगार बनते देखा है मैने
वो गुन्डे के मा बाप हो 
या बलत्कारी के 
वो डकैत के पिता हो 
या झूठे किसी मामले मे
फंस गये बच्चे के 
इसलिए 
आंखे खोल कर रखो 
जितना ज्यादा बच सको
बचाओ
बचा सको तो बचाओ अपनो
को
सिखा सको सिखाओ
अपनो को बचना गुनाह से 
और गुनाह के झूठे आरोप से भी ।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

जिंदगी अपनो की अमानत है

जिन्दगी सिर्फ तुम्हारी नही 

लोग आत्महत्या कैसे कर लेते है 
कितना तकलीफदेह होता है 
जान कर जान देना
जहर पिया तो उसका डर 
गोली चलाने मे कांपते हाथ 
और 
उसके दर्द का एहसास 
नस काटी तो दर्द 
और 
बहते खूँन की दहशत 
और 
फासी लगाया तो कितनी हिम्मत 
गर्दन लटक जाने 
सांस घुट जाने की तकलीफ ।
कैसे हिम्मत आती है 
और 
कर लेने के बाद 
आखिरी क्षणो मे 
सब किया वापस हो जाये का 
ख्याल आता है क्या 
क्या तब जिन्दगी से 
प्यार महसूस होता है ?
क्या तब इच्छा होती है 
कि 
लड़ले अंतिम लडाई पर ये नही ।
क्या ये क्या वो 
पर ये सब बतायेगा कौन ?
न ये न वो ।
और 
पीछे छूटो का दर्द , 
असहाय स्थिति , 
अनिश्चित कल 
और 
मौन मौन बस मौन ।
मत करो ऐसा 
जिसका कोई जवाब नही 
जिसका कल कोई हिसाब नही ।
लडो और खूब लडो 
क्योकी जिन्दगी सिर्फ तुम्हारी नही 
अपनो की भी अमानत है ।

सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

राजनीति व्यापार हो गयी

राजनीति व्यापार हो गयी 
हर कोई माल कमाता है 
बाप ने कितनी मेहनत की 
और बेटा मौज उड़ाता है  ।

रविवार, 17 अक्टूबर 2021

मुल्क को बस सताए जा रहे है

बाते बस बाते बनाये जा रहे है

सभी को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम जिंदगी को कर दिया है 

बेशरम    मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से

अब  जुमले   बताये  जा रहे है

कोविड से तो लाखो मर गये थे  

ये  तो भाषण सुनाये जा रहे है 

लाखो मजदूर निकले थे घरो से 

उन पर डंडा बजाये जा रहे है 

चेहरे पर शिकन इनके कहा है 

मौत के वजहें  गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना

ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

 

मैंने कहा मिलते नहीं

मैंने कहा मिलते नहीं 

उसने कहा की क्यों मिले 

मैंने कहा बस चाय पर 

उसने कहा काफी पसंद 

मैंने कह वो ही सही 

उसने कहा रहने ही दो 

मैंने कहा ऐसा भी क्या 

उसने कहा ऐसा भी क्या 

कि ये भी सही वो भी सही 

टिकते नहीं तुम चाय पर 

तो भरोसा तुम पर क्यों 

कल भी टिकोगे या भगोगे 

मैंने कहा वादा रहा 

उसने कहा ज्यादा रहा 

जाने ही दो तुम भी चलो 

किसी और को देखो कही

उससे मिलो पर अब टलो 


 



शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

नदी में तैरती लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।


सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

ये रस्सियाँ

ये रस्सियाँ ----

आज तक समझ मे नही आया 
कि 
क्यो औरतों को 
रस्सियो से बांध दिया जाता है 
उनके गर्दन मे रस्सी
उनकी कमर मे रस्सी 
उनके हाथ मे रस्सी 
और
उनके पांव मे रस्सी 
जो 
उनकी खूबसुरती को 
बदसूरत बना देती है 
वैसे तो 
कुछ कमजोर पुरुष भी
रस्सियो मे बंध जाते है
अपनी अज्ञानता से 
या फर्जी आस्था से 
पर 
क्या बनाया या बिगाडा
किसी का इन रस्सियो ने
सिवाय गुलाम बनाने के
पहले जानवर गुलाम बने और 
रस्सियो मे बंध गये 
और 
अब कुछ इन्सान भी
कब मुक्ति मिलेगी 
इन इन्सानो को 
इन रस्सियो से 
ये सवाल आज मेरा है 
पर कल सबका होगा 
जानवर भी 
कहा बधना चाहते है रस्सियो मे 
और कोशिश करते रहते है 
तोड देने की 
पर इन्सान ने तो
इन रस्सियो को 
खुशी से कबूल किया है 
तो 
इन्हे कब और कौन तोड़ेगा ? 
इन्सान स्वाभाविक
नैसर्गिक सुन्दरता के
साथ कब जिएगा ?

बुधवार, 15 सितंबर 2021

यादो की कागजी नावें

जब और जितनी बार भी 
अपने घर लौटता हूँ 
और 
दरवाजा खोलता हूँ 
बिजली सी कौंध जाती है 
और 
दीवारो पर बन जाती है 
अंनगिनत तस्वीरें 
और 
मन का बादल बरस उठता है 
लहरो पर तैर जाती है 
यादो की कितनी कागजी नावें 
और कागज की नाव 
तो कागज की ही होती है 
खो जाती है अथाह पानी में 
और 
पसर जाता है सन्नाटा
दीवारो से छत तक 
और 
बैठक से बिस्तर तक ।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

बहुत दिनो बाद आज

बहुत दिनो के बाद 
आज फिर उदासी ने घेर लिया 
बहुत दिनो के बाद 
आज अकेलेपन का एहसास हुआ  
बहुत दिनो के बाद 
आज मौन बहुत भारी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज किताबे कितना काट रही है 
बहुत दिनो के बाद 
आज किबोर्ड पर उंगली सुन्न हुयी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज आइना जैसे डर रहा है 
बहुत दिनो के बाद 
आज दीवारे कस कर बैठ गयी 
बहुत दिनो के बाद 
आज छत सर पर कितनी भारी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज पौधे जलते से लगते है 
बहुत दिनो के बाद 
आज पांव घास मे झुलसे है 
बहुत दिनो के बाद 
आज खुद की लडाई खुद से है 
बहुत दिनो के बाद 
आज खुद से कितनी नफरत है 
पर जाये भी तो कहा कहा 
हर जगह यही सब होगा ना 
खालीपन बेबसी बेचारगी 
मरुस्थल का हिरन बन 
भागे भी तो कहा कहा 
संबल की प्यास लिये 
सब जगह बस बालू है 
झूठी सी आस लिये 
भागे भी तो कहा कहा 
बहुत दिनो के बाद 
आज बहुत अधीर हो 
थोडा सा रो लेगे 
बहुत दिनो के बाद आज 
थक कर कुछ सो लेंगे 
बस इस उम्मीद से कि
कल शायद अच्छा हो ।

सोमवार, 23 अगस्त 2021

दिल और दर्द

दिल है और दर्द है

दिल हँसता है

दर्द रोता है

जब दिल रोता है

तो दर्द हँसता है

और दोनों के बीच

कोई दर्द के कीचड में

धंसता है

वो मै हूँ या आप है

या और कोई

पर कहानी तो सच्ची है

दिल की और दर्द की ।

जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

तन है ,मन है और मस्तिस्क 

शरीर है ,दिल है और दिमाग 

दोनों एक ही है 

तन की तड़प अपनी है 

मन की तड़प अपनी है 

और मस्तिस्क की अपनी 

शरीर, दिल और दिमाग की 

भी यही ,दोनों एक है ना ,

शरीर कुछ चाहता है 

मन रोक नहीं पाता 

और मस्तिस्क भी 

मन कुछ चाहता है 

और शरीर साथ नहीं देता 

मस्तिस्क विद्रोह कर देता है 

कभी कभी 

मस्तिस्क रास्ते तय करता है 

मन विचलित हो जाता है 

और शरीर अलग चला जाता है 

लड़ते रहते है तीनो ज्यादातर 

कभी कभी ही तीनो एक ही 

दिशा में चलते है 

और जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा

मैं मर भी जाऊं तो क्या होगा 
शायद अगर हुआ तो 
चार कंधे 
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले 
कुछ क्षण की 
कुछ सिसकियाँ 
कुछ कहानिया 
कुछ शिकायतें 
कुछ झूठी अच्छाइयां 
बहुत सी बुराइयाँ 
क्या किया जीवन में 
बेकार था कुछ न किया 
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया 
नालायक था कुछ नहीं किया 
बार बार बोर होकर भी 
दोहराई जाती वही कहानियां 
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ कुछ कम हुआ 
लो तेरही भी आ गयी 
ये भी खर्च कवाएगी 
कोई रिश्तेदार रुक न जाये 
चलो सब चले गए 
अब देखो कहां क्या क्या है 
बाट लो किसका क्या है 
और 
चल पड़ेगी जिंदगी 
अपने अपने रस्ते पर 
एक कोने में टंगी तस्वीर 
साल में एक बार शायद 
बदलेगी माला 
और हाथ जोड़ कर भागते हुए लोग 
आज तो देर हो गयी इस चक्कर में 
पता नहीं क्यों बने है ये रिवाज 
इसलिए 
मेरे लिए मेरी वसीयत है 
की 
कोई नहीं रोयेगा 
बिजली में जला देना मुझे 
किसी नदी में नहीं बहाना मुझे 
मैं नहीं मानता कोई पूजा इसलिए 
न कोई पूजा और न उठावनी तेरही 
अगले ही पल से सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो 
मेरे लिए न कभी कोई पारेशान हुआ 
न किसी को होना है 
वर्ना मैं परेशान हो जाऊंगा 
कुछ नहीं है मेरे पास
की कोई लडे की किसका क्या 
बस मेरी यादे कभी क्रोध लायेंगी
की नालायक बाप ने कुछ नहीं किया 
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी 
कुछ नहीं होगा 
सब जैसे था वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही मेरी वसीयत है 
जो किसी काम नही आएगी 
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ 
कोई फर्क नहीं पड़ता 
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और मैं भी चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा 
शायद लावारिश होकर 
की किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

शनिवार, 7 अगस्त 2021

हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा

निकल पड़ें जब भी आज़ाद झोंके की तरह 
हाँ शोर मचाएंगे और मशहूर हो जायेंगे हम 
ये दस्तक है हमारी सुन लो गर बहरे भी हो 
वर्ना बेचैन करने वाला शोर बन जायेंगे हम ।

हमें मुर्दा समझते हो निकलेंगे मुट्ठिया बांधे हुए 
तुम देखते रह जावोगे और झंडा फहराएंगे हम 
हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा 
हाँ देखोगे उदासी से जब शोला बन जायेंगे हम ।

अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की 
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो खेत की 
अभी आगाज़ है फुटपाथो पर अब  नजर कर लो 
जमीन पर जब गिरोगे तुम खुश हो मुस्करायेंगे हम ।

रविवार, 25 जुलाई 2021

ईश्वर कैसा होता है

कितने महान है वो लोग
जो पत्थरो से सर मारते है 
और 
मानते है कि  
पत्थर चमत्कार करता है 
हा 
सच है की पहली आग 
लकड़ियो की रगड़ से 
या 
पत्थरो के टकराने से ही पैदा हुई 
पर 
उसका कारण तो वैज्ञानिक है 
उसमे चमत्कार कुछ भी नही 
और 
किसी अन्य लोक की
ताकत भी कुछ भी नही
मेरी दुवा है आप सबको कि 
सर टकराते रहो 
पर जरा सम्हाल कर
सर से खूँन निकलता है और
फिर उसे रोकने को
दवाई ,मरहम पट्टी 
और 
डाक्टर की जरूरत पडती है 
अगर अधिक निकल गया 
तो 
शायद कही और जाकर
हो सकता है 
दर्शन हो ही जाता हो परमात्मा का
पर तय नही 
क्योकि 
किसी ने लौट कर बताया नही 
कि ईश्वर कैसा होता है ।

जमाने जैसा हो गया हूँ

मिटा दिए है वो तमाम नम्बर 
जो नही उठे मेरी ज़रूरत में 
या 
यूँ ही जब हाल जानना चाहा 
भुला दिए है तमाम वो नाम 
जिन्हें मैं याद नही आया कब से 
वो चेहरे भी धुंधले कर दिए मैंने
जिन्होंने फेर ली निगाहें मुझसे 
हा 
अब मैं भी जमाने जैसा हो गया हूँ ?

हम कुम्भकर्ण है

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकर्ण है  ।

शनिवार, 24 जुलाई 2021

शनिवार, 17 जुलाई 2021

जहाँ कुछ प्यार है

चलो चले वहाँ 
दूर कही दूर ,
जहाँ कुछ आस है 
कुछ प्यार है 
और उम्मीदें कुछ ।

रिश्ते या बुलबुले

छोटे शहरो के 
शहद जैसे रिश्ते 
बड़े शहरो की 
जमीन पाते ही 
कड़वे हो गये
जो फेविकाल से
जुडे लगते थे 
बुलबुले हो गये ।

दीवारे

बहुत ही अपने 
जब संपन्न हो जाते है 
या चढ़ जाते है 
ऊंची पायदाने 
उग आती है 
ऊंची दीवारे 
अपनो के बीच 
रिश्तो मे,भावो मे ।

छोटे शहर और बड़े शहर

वही लोग 
जो छोटे शहरो मे  
कितने घनिष्ट 
और 
कितने अपने लगते है 
क्योकी खूब मिलते है 
सुख और दुख मे 
पर 
बड़े शहर मे आते ही 
बहुत दूर हो जाते है 
और बिला जाते है 
सारे रिश्ते और भावनायें 
नही मिलते सालो साल 
या 
संपन्न ज्यादा हो जाये 
तो 
छोटे शहर मे भी 
दीवारे उग जाती है 
रिश्तो के बीच ।

बुधवार, 14 जुलाई 2021

आसमान कुछ कह रहा है

आसमान कुछ कह रहा है 
अपनी बोली अपनी भाषा में 
ज़रा सुनिए इसका गीत 
इसका संगीत 
कितना मनभावन है 
कितना शीतल है 
इंतज़ार था इसी का 
कितने दिन से 
पृथ्वी को और हमको भी 
कि 
बादल झूम कर आए 
खूब झूम कर गाए 
हम सब झूम कर नहाए 
और पृथ्वी भी तृप्त हो जाए । 


शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

गुरुवार, 17 जून 2021

सो जाओ व्यवस्था की तरह

सो जाओ इस व्यवस्था की तरह:

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ कमरे की 
और मन की भी चिंतन की 
और आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और बारिश में 
लगने दो आग किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत या असबाब 
मुझे क्या मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि कोई चीख सुनाई न पड़े 
और न दिखाई दे बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

बच्चा बन जाइए

घर मे परिवार होता है 
तभी वो घर होता है 
वर्ना तो बेजान दीवारे है
जिनमे आप कैदी है 
पर 
घर मे कोई छोटा सा बच्चा हो 
और 
बन जाइये बच्चा उसके साथ 
वाह 
क्या जिंदगी हो जाती है 
फिर मिल जाती जिंदगी 
और 
बचपन पोंछ देता है सारे गम 
सारी तकलीफे , बीमारी और वेचारगी 
बन गया हूँ मैं बच्चा आजकल 
सचमुच खूब जी रहा हूँ मैं 
भरपूर जी रहा हूँ मैं 
चुरा लेना चाहता हूँ खुशिया 
और इसकी यादे 
अगली बार फिर मिलने तक के लिए ।
आह जिंदगी वाह जिंदगी ।
बच्चा बन कर देखिये 
बच्चो से प्यार करिये 
खुद को बूढा मानने से इनकार करिये ।

सो जाओ व्यवस्था की तरह

चलो अब बंद करता हूँ 
खिड़कियाँ 
कमरे की 
और 
मन की भी 
चिंतन की 
और 
आँखों की भी 
बुझा देता हूँ रौशनी 
ताकि 
छा जाये अँधेरा 
अंदर भी और बाहर भी 
क्योकि 
अँधेरा हमें सुकून देता है 
और 
हर चीज से 
आँख बंद कर लेने का बहाना 
सो जाता हूँ मैं भी 
सोने दो लोगो को भूखे पेट 
या फुटपाथ के थपेड़ों 
और 
बारिश में 
लगने दो आग 
किसी की आबरू में 
लूटने दो इज्जत 
या असबाब 
मुझे क्या 
मैंने तो गर्त कर लिया है 
खुद को अँधेरे में 
और 
बंद कर ली है खिड़कियाँ 
ताकि 
कोई चीख सुनाई न पड़े 
और 
न दिखाई दे 
बाहर के अँधेरे 
मेरे अंदर के अँधेरे 
अब 
मेरे साथी बन गए है न 
चलो मुझे गहरी नीद 
सो जाने दो 
इस व्यवस्था की तरह ।

मंगलवार, 15 जून 2021

प्रकृती को ईश्वर माने

इस दौर मे कितने लोग 
थे हो गये 
कितने नंबर 
अब कभी नही मिलेंगे 
पर 
मिटाने की हिम्मत नही होती 
कि 
शायद फोन आ ही जाये 
कितनो से बात किया 
जो आखिरी थी 
कितनो को चाह कर भी
देख नही पाये 
कितनो को चाह कर भी
कन्धा नही दे पाये 
जी 
ये कहानी सिर्फ मेरी नही
घर घर की है 
जो फैली है
कन्याकुमारी से कश्मीर तक 
कैसे नाची मौत
और 
कितना लाचार कर दिया
मानवता को 
ना भगवान काम आये
ना अल्ला ना ईसा 
ना मंदिर काम आया 
ना मस्जिद ना कोई धर्म
फिर भी लड़े जा रहे है
सब उसके लिये 
जिसे किसी ने देखा नही
जो काम आया नही
इन्सान बन जाये तो
इंसानियत बचेगी 
और 
बचेगी शोध से
आविष्कारो से
और 
प्रकृति की रक्षा से 
इसलिए मानना है तो
प्रकृती को ईश्वर माने 
और 
इन्सान लड़ने के लिये
प्रेम से रहने के लिये है 
ये बात जाने ।

गुरुवार, 3 जून 2021

बारूद बोने वाले किसान

खेतो और बगीचो में 
बारूद बोने वाले 
ये नए किसान 
कहा से आ गए 
इन खेतो और बगीचो में 
यहाँ तो पैदा होती थी फसले 
और 
भरती थी पेट इन्सानों का 
और
होते थे फल मौसम के अनुसार 
और 
पेट भरने के साथ साथ
लड़ते थे इंसान में बीमारियो से 
पर ये पेट क्या पूरा शरीर 
उडा देने वाले 
और साँसे छीन लेने वाले 
मौत बाँटने वाले 
खेतिहर किसने पैदा कर दिया 
इसी समाज में और खेत में
रोकना ही होगा 
इन नए किसानो को 
और बचाना ही होगा
इंसानियत को 
चाहे उसके लिए 
बारूद से इन 
नए बारूद बोने वाले 
किसानो को ही 
क्यों न उड़ा दिया जाये 
इंसानियत बचाने को ।

सोमवार, 24 मई 2021

मगरूर होना चाहता हूं ।

मैं भी 
मगरूर होना चाहता हूं ।
महसूस करना चाहता हूं
रावण के अहंकार को 
अपने अंदर
इसलिए मुझे भी 
कुछ दिन सत्ता दे दो 
हे ईश्वर ।

मंगलवार, 18 मई 2021

गहन सन्नाटा

आप ने कभी
कोई बाँध टूटता हुआ देखा है 
शायद हाँ भी और ना भी 
वैसे ही 
कभी कभी फुट पड़ता है 
इंसान पूरे वेग से 
और बह जाता है 
वर्षो से रुका हुआ पानी 
और फिर 
छा जाता है गहन सन्नाटा ।

मंगलवार, 11 मई 2021

नदी में लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

शनिवार, 8 मई 2021

ईश्वर है भी या नही ?

ईश्वर है भी या नही ?

जिनके घर से 
कम हो जा रहे है लोग 
वो पूछ रहे है कि 
हमने क्या बुरा किया था 
या जाने वाले ने क्या किया था 
बता तो दो ईश्वर 
पर ईश्वर है मौन 
हजारो सालो से 
सब तो किया इश्वर को खुश करने को 
फिर भी इतने जुल्म 
तब सवाल पूछते है सब 
कौन सा ईश्वर  
जो कभी नही आया किसी के भी पुकारे 
शायद आया हो किसी युग मे 
और 
पता नही अब है भी या नही 
होता तो क्या ऐसा होता 
होता तो क्या ये सब होता ।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

बेहतर है क़ि आप फिर चले

बंद दरवाज़े के पीछे 
छिपे होते है कितने राज 
कितनी सिसकिया 
और 
कितनी चीखे 
कुछ तो 
निकल ही नही पाती है 
बस घुट कर रह जाती है 
कहने को तो 
सब अपने ही होते है 
पर 
कुछ ऊर्जा देते है 
और 
देते है जीने की तमन्ना 
और 
कुछ गला घोट कर 
मार देते है 
या 
बना देते है मरने जैसा 
बाहर निकल कर 
कितना नकली हंसी हँसते है लोग 
और 
कितनी खोखली होती है उनकी मुस्कराहट 
दर असल इस हंसी मे
एक चीख होती है 
बहुत डरावनी सी             
और 
मुस्कराहट बिल्कुल वही              
जो 
फाँसी पर चढ़ने वाले के
चेहरे पर होती है 
रिश्ते भी कितने 
बोझिल हो जाते है 
जब कोई खुद को
बोझ बना लेता है 
अपने ही ऐतिहासिक
कामो से 
और 
फिर अपने ही वर्तमान से      
क्यो नही जीवन उतना ही हो 
की 
आप ऐश करे अपनी मर्जी का 
और 
फिर छोड दे शरीर 
उसके बाद जीवन का
मतलब भी क्या है 
जब तक आप जरूरी हो
दूनिया और समाज के लिए जिए 
या अपने लिए 
वर्ना क्यो शर्मिंदा हो रोज 
बेहतर है कि आप फिर चले ।

रच देते है कविता

ये जो लोग 
रोज पढते है 
नई किताबे 
रोज लिखते है 
कोई कविता 
गजल या कहानी 
और 
नये नये किस्से भी 
कितने 
सुखी लोग है वो
कितने निश्चिंत 
कितने बेपरवाह 
और 
रच देते है 
रोज कुछ नया
पर 
जो खुद को ही 
जिन्दा रखने 
के जतन मे 
बिता देते है दिन 
वो जिन्दा है 
ये भी तो रचना है ।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

प्रकृति ही ईश्वर

ईश्वर और कोई नहीं 
प्रकृति ही ईश्वर है 

हमने पत्थरों, पेड़ों और 
पशुओं की पूजा की 
जिससे हम डरे उसकी पूजा की  
बाद में लोगों को डराने के लिए 
गढ़ने लगे अपने-अपने ईश्वर 
वह बन गया हमारा हथियार 
अधिकार और व्यापार

कूटरचित माताओं और बाबाओं के 
वेश में फैल गया ईश्वर  
पाखंडियों ने स्वार्थ में 
गली-गली बैठा दिये ईश्वर 
धर्म के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
पाप करो और बहती गंगा में हाथ धो लो
बुरा करो और मानस-पाठ करा लो

कहते हैं पाप बढ़ेगा तो जन्म लेगा ईश्वर 
पर आज के पापियों से डरकर 
कहीं छिप गया है ईश्वर 

हमने काट डाले जंगल
कुपित है प्रकृति
मंदिर-मस्जिद छोड़ो
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला से नाता तोड़ो 
बचने के ठिकाने बनाओ

बन सको तो भगीरथ बनो 
नदियों को बचाओ 
पहाड़ों, जंगलों को बचाओ
आओ, आक्सीजन बढ़ाओ
जानें बचाओ