शनिवार, 7 सितंबर 2024

आतंकित है मानवता

क्या सत्ता और न्याय मिलकर 
ऐसी नई सज़ाये शुरु कर सकते है ? 
जीभ काट देने की सज़ा ? 
आंख फोड देने की सज़ा ? 
कलम तोड़ देने की सज़ा ? 
कीबोर्ड हटा देने की सज़ा?  
अक्षर खत्म कर देने की सज़ा ?
अशिक्षित रहने की सज़ा ?
दिमाग निकाल लेने की सज़ा ? 
वो सत्ता किसकी होगी 
वो न्याय किसका होगा 
आतंकित है मानवता 
उसकी कल्पना से भी 
उसकी सम्भावना से भी ।

ईश्वर कैसा होता है ।

कितने महान है वो लोग
जो पत्थरो से सर मारते है 
और 
मानते है कि  
पत्थर चमत्कार करता है 
हा 
सच है की पहली आग 
लकड़ियो की रगड़ से 
या 
पत्थरो के टकराने से ही पैदा हुई 
पर 
उसका कारण तो वैज्ञानिक है 
उसमे चमत्कार कुछ भी नही 
और 
किसी अन्य लोक की
ताकत भी कुछ भी नही
मेरी दुवा है आप सबको कि 
सर टकराते रहो 
पर जरा सम्हाल कर
सर से खूँन निकलता है और
फिर उसे रोकने को
दवाई ,मरहम पट्टी 
और 
डाक्टर की जरूरत पडती है 
अगर अधिक निकल गया 
तो 
शायद कही और जाकर
हो सकता है 
दर्शन हो ही जाता हो परमात्मा का
पर तय नही 
क्योकि 
किसी ने लौट कर बताया नही 
कि ईश्वर कैसा होता है ।

जो दिन भर हंसी चेहरे पर चिपकाता है

जो दिन भर हंसी 
चेहरे पर चिपकाता है 
अकेले मे रात को रोता 
फिर 
सुबह से मुस्कराता है 
वो भी एक इन्सा है 
जो खुद को 
और 
अपनो को बहलाता है ।
क्या कोई जानता है 
कि 
वो क्या कहलाता है ।

सपना देखता था

कितना बुद्धू था वो कि सपना देखता था 
और सपने मे सबको अपना देखता था 
उसे पता नही था कि सपने तो सपने होते है 
वो तो सोने मे कल्पनाओ की उड़ान होते है 
जागने पर वो कब अपने होते है 
ये सपने क्या से क्या बनाते है 
और कहा ले जाते है 
पर जब टूटते है तो किस कदर रुलाते है 
इसलिये छोडो सोते हुये सपने मत देखो 
हा देखो खुली आंखो से देखो खूब देखो 
हकीकत के आसपास देखो 
और हकीकत कभी धोखा नही देती 
न सपनो का न अपनो का 
अपनो की छोडो 
उस सपनो के पीछे लग जाओ 
जो तुम्हे बुलंदी पर ले जाते हो 
और 
तमाम तुमसे नफरत करने वालो को भी 
तुम्हारा अपना बनाते हो 
आओ सपना सपना खेले 
बनाये सपनो के लिए बुनियाद 
और 
अपनी इमारत बुलंद करने को चाहे जो झेले 
पर बुलंदी पर पहुच कर 
मेहनत और लगन के सफलता का झन्डा फहराए 
और 
ऐसे जंम जाये की फिर नीचे उतर कर ही ना  आये ।

बारिश



बारिश

बारिश  नहीं आयी
उफ़्फ़ कितनी गरमी है 
सूरज जला देगा क्या 
ये बारिश क्या करेगी 
आफ़त बन कर आयी है 
सब कुछ बहा देगी क्या 
देखो गिर गए 
कितनो के कच्चे घर 
और 
झोपड़ियाँ भी जवाब दे गयी 
अबकी बारिश समय पर आयी 
और उतनी ही आयी 
की अबकी खेत सोना उगलेंगे 
अभी बारिश तो आफ़त है 
भीग गया खेत और खलिहानों में सब 
अब साल कैसे बीतेगा 
कैसे होगी उसकी पढ़ाई और दवाई 
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
बारिश आयी स्कूल की छुट्टी 
छप्प छप्प करते वो पानी में 
वो काग़ज़ की नाव बहाते 
वो बचपन कितना प्यारा लगता है 
उससे पूछो जो अभी है ब्याही 
और पति सीमा पर बैठा 
उन दोनो के मन की सोचो 
और 
वो दोनो भीग रहे है छत पर 
दोनो देख रहे दोनो को 
भीगा आँचल भीगा यौवन 
दोनो को है कितना जलाए 
वो मछरदानी पर प्लास्टिक बिछा रही है 
बालटी भगौने सब बिस्तर पर सज़ा रही है 
ख़ुद बैठी है पर बच्चों को 
इस कोने और उस कोने कर 
वो बारिश से बचा रही है 
पूरी रात नहीं वो सोयी 
सब झेला 
पर कभी नहीं क़िस्मत पर रोयी 
बारिश का मतलब उससे पूछो 
जो पूरा घर अब सुखा रही है 
बारिश तो अब ख़त्म हो गयी 
चरो तरफ हरियाली छायी

फूलों से अब लदी डालियाँ 
सबको ही अच्छी लगती है 
भूल गए सब क्या झेला था 
वो अच्छा या बहुत बुरा था 
फिर जीवन पटरी पर आया  
उफ़्फ़ 
ये बारिश कैसी बारिश ।

बुलडोजर अंधा होता है

बुलडोजर अंधा होता है 
और बहरा भी 
वो चलता है तो
किसी को नहीं छोड़ता 
चाहे वो गांधी हो 
जयप्रकाश या विनोबा 
इसलिए बुलडोजर को
पहले कदम पर ही रोक दो ।

मैतेई हो कुकी या नागा

मैतेई हो कुकी या नागा
क्या इंसान के अलावा कुछ है 
क्या फर्क है इन सब में ? 
फिर लड़ाई क्यों ?

आंसू ने आंख मिलाकर मुझसे की ये बात तू दिल वाला है तो मैं ही हूँ तेरी सौगात ।

आंसू ने आंख मिलाकर मुझसे की ये बात 
तू दिल वाला है तो मैं ही हूँ  तेरी सौगात ।

रहम कर रहम कर रहम कर ।

दिल ,दिमाग़ ,कलम कीबोर्ड
साथ नही दे रहा है कुछ भी 
बहुत कुछ बोलना चाहता हूँ 
पर आवाज फँस जा रही है 
जब भी कलम उठाता हूँ 
अपने बोझ से गिर पडती है
दिल में जो झांकता  हूँ 
तो बस अंधेरा दिखता है 
दिमाग़ पर ज़ोर देता हूँ 
सर ज़ोर से फटने लगता है 
कीबोर्ड पर उँगलिया रखता हूँ 
तो उँगलियाँ झुलस जाती है 
ये क्या दौर आ गया है मौला 
रहम कर रहम कर रहम कर ।

प्रकृति का प्रकोप सहना है ।।

पहाड़ टूट रहे है 
जमीन धंस रही हैं
पुल टूट रहे है 
सड़के धंस रही है 
समुद्र उफन रहा है 
किसको कोसे 
प्रकृत को या खुद को 
पढ़ा था 
जब पृथ्वी पर बोझ बढ़ेगा 
पृथ्वी खुद ठीक कर लेगी 
प्रकृति की बरबादी का हिसाब 
प्रकृति हो तो लेगी 
या तो प्रकृति के साथ हो जाओ 
या फिर प्रकृति का कहर झेलो 
प्रकृति के साथ खेलो 
या प्रकृति से खेलो 
तय हमे करना है
प्रकृति की साथ रहना है
या प्रकृति का प्रकोप सहना है ।।

जिसके भी सामने झुका ये सर

जिसके भी सामने 
झुका ये सर 
वो बस वो ही 
जानता है 
अपना घाव और पीड़ा 
संसद के सामने 
लेटा था कोई 
तब से 
संसद ,उसकी परम्पराएं 
सिसक रही है
सुना है कि 
टूटने वाली है 
वह भव्य संसद 
जिसने देखा है
भारत की आज़ादी का
उगता सूरज
और सारा इतिहास 
अब 
फिर लेट गया कोई 
भारत की आस्था 
और 
विश्वास के सामने ?

हां जीवन इसको कहते है |



जिंदगी 

कब होगी पहचान हमारी 

इतने सालो से है दूरी 

क्या मजबूरी 

जिन्दा तो है 

पर क्या सचमुच 

क्या जीवन इसको कहते है 

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू  

नीद नहीं और पेट में हलचल 

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ 

बस अन्धकार है 

क्या जीवन इसको कहते है 

जीवन कब हमको मिलना है 

या फिर ऐसे ही विदा करोगे 

कुछ तो सोचो 

हम दोनों क्या जुदा जुदा है 

कुछ तो बोलो 

और भविष्य के ही पट खोलो 

या फिर कह दो 

हां जीवन इसको ही कहते है | 

जींना है तो हंस कर जी लो 

या फिर दर्द गरल को पी लो 

तेरे हिस्से में बस ये है 

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ 

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ 

चल अब सो जा 

अच्छे सपनो में आज तो खो जा 

कल फिर मुझसे ही लड़ना है 

हां जीवन इसको कहते है |

संसद में ये बहस है कि बड़ा चोर कौन



संसद में ये बहस है 
कि बड़ा चोर कौन
संसद भी है मौन
सांसद भी मौन
ये बड़ी बहस है
निर्णय करेगा कौन
वोटर हैरान है
मानस परेशान है
मौन संविधान है
ये कौन सा विधान है
सब लोकतंत्र लोकतंत्र
खेल रहे है
हम तठस्थ बन कर
इन्हें झेल रहे है
फिर सवाल अपनी जगह
ही खड़ा हुआ
हमारी तटस्थता से बड़ा हुआ
कौन बड़ा चोर है
कुछ लोग या हम सब
क्योकि हम तठस्थ है
नून तेल में व्यस्त है
देश चाहे रहे या भाड़ में जाये
जहा कही माल हो
मेरे घर में आये
तब क्या सवाल है
काहे का मलाल है
कौन बड़ा चोर है
तोर है या मोर है
पर अब तय ये रहा
हम सब चोर है
या तो जागो खड़े हो
संसद से भी बड़े हो
या फिर सत्ता सौप दो
राजा रजवाड़े को
और खुद को सौंप दो
भेड़ वाले बाडे को
लोकतंत्र का खेल
हो गया है झेलमझेल
या संविधान बांच ले  
पुरसार्थ मांज ले
अपना ज्ञान जाँच ले
और तिरंगा थाम ले
बापू ,सुभाष नाम ले
देश के सवाल पर
जाति ,धर्म छोड़ दो
बस अपने स्वार्थों
का रुख जरा मोड़ दो
संसद जगा दो तुम  
भ्रस्टों को भगा दो तुम  
देश को मजबूत कर
मत डर ,मत डर ,मत डर  ।

किसी के भी सामने पैंट की जिप खोल देते हो?

क्या तुम 
कहीं-भी, किसी के भी सामने 
पैंट की जिप खोल देते हो?
सड़क! बाज़ार! पार्क! 
या अपने घर में भी!

कैसे ऐसा कर पाते हो,
जब बलात्कार करते हो?
कुछ लोग ऐसा कर सकते हैं
तुम्हारे किसी अपने के साथ भी 

क्या यह उस वक़्त मन में आता है?
फिर भी कर लेते सब कुछ!

रोक लो हर उस कदम को जो युद्ध भूमि को जाता हो ।

बहुत साल पहले की बात है 
भारत में महाभारत हुआ था 
भाईयो ने भाईयो को दुत्कारा था 
तो भाईयो ने भाईयो को मारा था 

जमीन लाशों से पटी थी 
बचे थे बच्चे और विधवाएं 
युद्ध भूमि में रोए थे युधिस्ठिर 
किस पर राज करूं? इनपर !.

कल्पी थी तब द्रौपदी 
ये मैने क्या कर दिया 
कैसे आंख मिलाऊं मैं 
अपनो की विधवाओं से 

जब जब भी महाभारत होगा 
यही होता रहेगा तब तब 
जमीं की भूख नहीं मिटेगी 
लाशों से, न प्यास खून से 

इसलिए रोक सको तो रोको 
किसी भी अट्टहास को 
जमीन की भूख को 
और कैसी भी धूत क्रीड़ा को 

तोड़ दो हर उस सपने को 
जो तानाशाह बनाता हो 
रोक लो हर उस कदम को 
जो युद्ध भूमि को जाता हो ।
+++++++++++++++++++

आज वालो से :

ये तो बता कि महाभारत की याद में
कौन सा विभीषिका दिवस मनाए 
महाभारत की याद में कौन सा झंडा फहराये 
महाभारत की याद में कौन सी रूदाली गाए  ?

मैं लिखना चाहता हूं



मैं लिखना चाहता हूं 
फिलिस्तीन और इजराइल पर 
मैं लिखना चाहता हूं 
यूक्रेन और रूस पर 
मैं लिखना चाहता हूं 
मणिपुर और मेवात पर 
मैं लिखना चाहता हूं 
दुनिया की हर हिंसा और मौत पर 
अपने आंसुओ कि स्याही बना कर 
लिखना चाहता हूं मैं 
पर ये क्या हिंसा सोचते ही 
आंसू लाल हो गए सुर्ख लाल 
मेरे हाथ कांपने लगे ओठ लरजने लगे 
गिर गई कलम मेरे हाथ से 
और गिर कर बंदूक बन गई 
नही उठा रहा हूं ये बंदूक मैं 
कि
मेरे भीतर का भी जानवर न जाग जाए 
नही लिख रहा में अब कुछ भी 
और आंसू भी तो गायब है 
कौन मेरा कोई सगा मरा है 
मैं क्यों परवाह करू इन सबकी 
जब मौत मेरे दरवाजे पर दस्तक देगी 
तब उठा लूंगा मैं ये कलम या बंदूक ।

कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन



कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन
बचाने को उन लोगो को
जिनको खड़ा कर दिया था
सबसे बडी सत्ता के खिलाफ
बस यही तो कहा था कृष्ण ने
कि उसे क्यो भोग लगाते हो
जो खाता ही नही है
जिसे भूख ही नही है
और उदर भी नही है
केवल वास लेता है वो
उसे खिलाओ जिसे भूख है
जिसे जरूरत है
लाओ मुझे खिलाओ, मैं खाऊंगा
कितना कमजोर था देवत्व
की तुरन्त हिल जाता था उनका आसन
और कितना क्रोध भरा था इनमें
कैसे और क्यो देवता माने इन्हें
जो सहज इंसान भी नही
बरसा दिया क्रोध उन सभी पंर
जिन्हें खड़ा किया था कृष्ण ने
सत्य के साथ
पर कृष्ण भी तो कृष्ण थे
प्रेम किया तो खूब किया
राजनीति किया तो खूब किया
युध्द भी खूब करवाया
खूब मरवाया और खूब बचाया
खड़े हो गए यहाँ भी कृष्ण
अपनो के साथ
और उठा लिया गोवर्धन
अपनी छोटी सी उंगली पर
वो छोटी सी उंगली
और उतना बड़ा पहाड़
कैसे टिक पाया होगा
और कैसे उठाया होगा
कितनी दुखी होगी उनकी उंगली
शायद आज भी दर्द कर रही वो उंगली
पर असम्भव को संभव करने का नाम
ही कृष्ण है शायद
लगता है की वो पहाड़ नही
बल्कि पुरुसार्थ रहा होगा
संकल्प रहा होगा इरादा रहा होगा
और अडिगता रही होगी
और आंख में आंख डाल कर
खड़े हो गए होंगे कृष्ण
सबसे आगे उंगली उठाकर चुनौती देते हुए
और उनके संकल्प के सामने
नही टिक पाया होगा इतना उथला से इंद्र
और भाग खड़ा हुआ होगा
खूब तालियां बजी होंगी
नाचे होंगे लोग कृष्ण को उठा कर कंधे पर
गोपिया रीझ गयी होंगी कितनी
और देख रही होंगी कनंखियो से
कृष्ण को
कृष्ण ने भी जरूर देखा होगा
अठखेलियाँ
और मंद मंद मुस्कराए होंगे कृष्ण
पर कृष्ण तुम कितने लंबे विश्राम पर हो
या
अपने गुण,अपनी जिम्मेदारी भूल गयो हो
देखो कितने नकली देव
क्या क्या जुल्म कर रहे है तुम्हारे लोगों पर
तुम्हारी गोपिकाओं तुम्हारे बच्चो से
क्या क्या सलूक हो रहा है कृष्ण
तुम इतने बेदर्द तो नही हो सकते
की लोगो का दर्द ही भूल जाओ
आ जाओ न कृष्ण
भारत ही नही दुनिया को
एक और महाभारत की जरूरत है
और जरूरत हैं आज के संदर्भ में
एक नए ज्ञान और उपदेश की
कब आवोगे कृष्ण
और ये महापर्वत कब उठावोगे
अपने इरादे और न्याय की
उंगली पर ।
आओ न कृष्ण , अब उठ जाओ
आ भी जाओ न कृष्ण ।

सूरज निकल आया

सब बादल छँट गये 
सूरज निकल आया 
उनकी कैद से 
अब सब कुछ 
साफ साफ दिख रहा है 
गद्ढे भी ,पत्थर भी 
रस्ते भी और मंजिल भी ।

इंतजार है इंतजार है इन्तजार है



इंतजार है इंतजार है इन्तजार है 

गर्म हवायें बहुत तपिश थी 
कितनी काली अंधियारी थी 
जुल्म ज़्यादती शोषण कितना 
और ग़ुलामी की ज़ंजीरे 
फिर वो रोटी बटी हर जगह 
गोली और धमाके गूंजे 
बिन तैयारी ही था सब कुछ 
थाली में थे गए परोसे ख़ुद के बेटे 
टुकड़े टुकड़े में ख़त्म हुआ सब 
हाँ गोली तो फेल हो गयी 
पर बोली को जगा गयी थी 
बहुत दिनो की चुप्पी थी फिर 
फिर गूंजा था जोश सभी का 
फिर आया था होश सभी को 
पर बाक़ी वो भूल नही की 
एक लँगोटी वाला आगे 
पीछे पूरा देश चला था 
ये हथियार कुछ नया नया था 
दुनिया हतप्रभ दुश्मन हतप्रभ 
इस हथियार का ना जवाब था 
पर जुल्मों का ना हिसाब था 
करो या मरो का नारा था 
चौरी चौरा ने रोक दिया ये 
फिर न कभी ये दोबारा था 
ना मारेंगे ना मानेगे 
युद्ध का नया ये नारा था 
सत्य अहिंसा का प्रयोग था 
सत्याग्रह और असहयोग था 
जिसका सूरज ना डूबा था 
चली अहिंसा डूब गया वो 
छटा अंधेरा सूरज निकला
आज हवाये कुछ ठंडी थी 
पर बँटवारे की आबाजे 
कान के पर्दे फाड़ रही थी 
धरती अपनी चिंघाड़ रही थी 
फिर फ़क़ीर ही निकला बाहर 
जान हथेली पर फिर लेकर 
कैसे कैसे थी शांति आयी 
पर बहुतो को कहा थी भाई 
वहाँ प्रार्थना हाथ जुड़ा था
आतंकी सामने खड़ा  था
जिसने कल तक साँस न ली थी 
उसने गोली खूब चलायी 
इंगलिश गोली इंगलिश पिस्टल
हाँ कायर को खूब थी भाई 
फिर से सूरज डूब गया था
फिर हवाये गर्म हुयी थी 
आज का मौसम फिर वैसा है 
वही अंधेरा वही कालिमा 
पर फ़क़ीर वो नही यहाँ है 
अब मौसम को कौन बचाए 
कौन उगाए फिर सूरज को 
ठंडी हवाये कौन चलाए 
इंतज़ार है इंतज़ार हाँ इंतज़ार है ।

वो दर्द दे कर चला गया ।



वो दर्द दे कर चला गया ।
ये दर्द है जो गया नहीं 

मैं तो तड़प के रह गया 
उसने लौट कर देखा नहीं 

मैं चीखता ही रह गया 
उसने कुछ भी सुना नहीं 

उसकी याद में बेहाल मैं 
उसने मुझे देखा नहीं 

मेरी निगाह है उसी राह पर 
पर वो इधर मुड़ा नहीं । 

खुश रहना कह के चला गया 
मेरे दर्द की ये दवा नही 

एक दिन सो जाऊंगा मैं 
उसको होगा पता नहीं ।

राम को याद आ गई अपनी अयोध्या

अभी लिखी कविता 

राम को याद आ गई अपनी अयोध्या 
और उतर आए हाल चाल लेने 
देखा उन्होंने हलचल , नारो का शोर 
तो पूछ लिया किसी से 
क्या ये अयोध्या ही है 
जवाब मिला हा तो भागने लगे वापस 
पकड़ लिया नारा लगाती भीड़ ने 
पूछने लगे की कौन हो 
और ये बनवासी का वेश क्यों 
क्या किसी और धर्म के हो 
और कोई कांड करने आए हो वेश बदल कर 
राम बोले मैं राम हूं 
जिसका बहुत जोर से नारा लगा रहे हो
पर इतने गुस्से में क्यों हो तुम लोग 
ऐसा तो मेरा महल भी नही था 
जैसा तुम लोग बना रहे हो 
मुझे महल में रहना कहा पसंद
मैं तो बनवास में खुश था 
क्योंकि महल ने दिया बनवास 
और फिर छीन लिया सीता 
पर तुम लोग मेरी प्रतीमा 
इस महल में क्यों लगा रहे हो 
क्यों बहाया खून तुम लोगो ने और किया झगड़ा 
जबकि अयोध्या का तो मतलब ही था 
जहा युद्ध नही हो 
और क्या आडंबर कर रहे हो 
अरे अगर मैं महल में रहा होता 
तो बस होता एक राजा 
लेकिन बनवासी बनके बन गया में राम 
जिसकी कथा सुनते और सुनाते हो
भीड़ उग्र हुई की जरूर ये है कोई पाखंडी 
कोई हिंदू और राम विरोधी 
पर कोई हाथ उठाता
तभी प्रकट हो गए विराट रूप में हनुमान 
और भीड़ भागने लगी 
की ये कैसा विशाल बानर है 
कोई बोला बंदूक लाओ गोली चलाओ
राम बोले की जब तुम मुझे जानते नही हो 
तो व्यर्थ का ये सब आडंबर क्यों 
जब तुम मुझे मानते नही हो 
तो इसने साल झगड़ा क्यों
अगर जानते होते और मानते होते 
तो मेरा मंदिर और मूर्ति नही बनाते
बल्कि मुझे और हनुमान को अपनाते 
तब दंगा नही करते 
बल्कि राम बनने 
और सबको राम बनाने की कोशिश करते 
तब ये तनाव और शोर नही होता 
शोर और क्रोध मुझे पसंद नही है 
जाओ घरों में जाओ और सोचो 
मुझे मंदिर में नही अपने दिल में बैठाओ 
में वही मिलूंगा
अभी तो मैं चलूंगा 
क्योंकि घुटन हो रही है मुझे 
इस नकली राजनीतिक अयोध्या में 
चलो हनुमान 
और चले गए 
अनंत आकाश में राम और हनुमान भी 
चर्चा अब भी यही थी की कोई मायावी था 
बच के निकल गया 
हमारा कारज निस्फल करने आया था 
और साथ में मायावी बंदर भी लाया था 
वही खड़ा 
एक सचमुच का राम और हनुमान भक्त बोला 
अरे मूर्खो जो सच में सामने था 
और खुद को पाने का मार्ग बता रहा था 
तुम उसे दुत्कार रहे हो  
और जो है ही नही उसे सजा संवार रहे हो ।

आओ न कृष्ण ।

आओ न कृष्ण ।

कृष्ण आज तुम्हारे घर पर हूँ
मथुरा वृंदावन में 
और तुम्हें ढूढ रहा हूँ ,
तुम कहा हो कृष्ण 
ना मथुरा मे मिले 
ना गोवर्धन के आसपास 
ना यमुना के किनारे 
और ना गोकुल ,
ना नन्दगाँव ,बरसाने मे 
तब कहा हो कृष्ण 
निधिवन और मधुवन भी सूना है 
भागकर गये थे द्वारका 
क्या वही कही बिला गये कृष्ण 
पर लोग तो तुम्हे यहा ढूढ रहे है 
कब आवोगे कृष्ण 
या अब तुम हो ही नही 
तुमने रचा था महाभारत 
या तुम सचमुच नही चाहते थे वो युद्द 
तो फिर हुआ कैसे वो युद्ध 
क्या सिर्फ तुम्हारे  उपदेश के लिये 
कि सामने जो भी है 
मत देखो कौन है बस उसे मारो 
और 
लाशो से पटी धरती को देख 
शायद युधिष्ठिर कांप उठे थे 
तुम भी कांपे थे क्या कृष्ण 
तुम तो इश्वर थे 
अवतार थे विष्णू के 
फिर क्यो नही रोक पाये 
अपनो का ही वीभत्स वध 
क्यो नही रोक पाये धूत क्रीड़ा 
क्यो नही रोक पाये एक नेत्रहीन का अपमान 
क्यो नही रोक पाये भरी सभा मे स्त्री का अपमान 
क्यो नही रोक पाये वो वध 
चाहे अभिमन्यु का हो या जयद्रथ का 
वो छल से किया गया वध 
तो क्या तुम भी सर्फ दर्शक थे 
या मिथ्या है कि तुम इश्वर हो 
वरना !
तो क्या तुम इन अनैतिकताओ के 
सारथी बनकर खो बैठे थे अपना देवत्व 
और शक्तिया 
और हो गये थे अशक्त 
तभी तो भागना पड़ा तुम्हे 
अपनी प्यारी नगरी छोडकर 
क्या तभी तुम शिकार हो गये एक बहेलिए के 
अगर हा तो एक बार प्रकट होकर ये बता दो 
ताकी करोड़ों लोगो का भ्रम टूट सके 
अगर ना तो भी प्रकट होकर बता दो 
कि तब क्यो हुआ वो सब 
और एलान कर दो 
कि अब 
वैसा कुछ भी नही होगा कृष्ण
तुम्हारी नगरी मे मुझे इन्तजार है 
तुम्हारे आने और एलान करने का ।
आओ न कृष्ण ।

शनिवार, 17 अगस्त 2024

जब जब भी महाभारत होगा

बहुत साल पहले की बात है 
भारत में महाभारत हुआ था 
भाईयो ने भाईयो को दुत्कारा था 
तो भाईयो ने भाईयो को मारा था 

जमीन लाशों से पटी थी 
बचे थे बच्चे और विधवाएं 
युद्ध भूमि में रोए थे युधिस्ठिर 
किस पर राज करूं? इनपर !.

कल्पी थी तब द्रौपदी 
ये मैने क्या कर दिया 
कैसे आंख मिलाऊं मैं 
अपनो की विधवाओं से 

जब जब भी महाभारत होगा 
यही होता रहेगा तब तब 
जमीं की भूख नहीं मिटेगी 
लाशों से, न प्यास खून से 

इसलिए रोक सको तो रोको 
किसी भी अट्टहास को 
जमीन की भूख को 
और कैसी भी धूत क्रीड़ा को 

तोड़ दो हर उस सपने को 
जो तानाशाह बनाता हो 
रोक लो हर उस कदम को 
जो युद्ध भूमि को जाता हो ।
+++++++++++++++++++
आज वालो से :

ये तो बताये कि महाभारत की याद में
कौन सा विभीषिका दिवस मनाए 
महाभारत की याद में कौन सा झंडा फहराये 
महाभारत की याद में कौन सी रूदाली गाए  ?

रविवार, 11 अगस्त 2024

फिर भी कर लेते सब कुछ!

क्या तुम 
कहीं-भी, किसी के भी सामने 
पैंट की जिप खोल देते हो?
सड़क! बाज़ार! पार्क! 
या अपने घर में भी!

कैसे ऐसा कर पाते हो,
जब बलात्कार करते हो?
कुछ लोग ऐसा कर सकते हैं
तुम्हारे किसी अपने के साथ भी 

क्या यह उस वक़्त मन में आता है?
फिर भी कर लेते सब कुछ!

बुधवार, 17 जुलाई 2024

चलो चले वहाँ दूर कही दूर ,जहाँ कुछ आस है कुछ प्यार है और उम्मीदें कुछ ।

चलो चले वहाँ 
दूर कही दूर ,
जहाँ कुछ आस है 
कुछ प्यार है 
और उम्मीदें कुछ ।

छोटे शहरो के रिश्ते

छोटे शहरो के 
शहद जैसे रिश्ते 
बड़े शहरो की 
जमीन पाते ही 
कड़वे हो गये
जो फेविकाल से
जुडे लगते थे 
बुलबुले हो गये ।

बहुत ही अपने जब संपन्न हो जाते है

बहुत ही अपने 
जब संपन्न हो जाते है 
या चढ़ जाते है 
ऊंची पायदाने 
उग आती है 
ऊंची दीवारे 
अपनो के बीच 
रिश्तो मे,भावो मे ।

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

वो सदमे में ही रहा होगा शायद

वो सदमे में ही  रहा होगा शायद

उसने कुछ नहीं कहा होगा शायद

कितना शोर और कितना धुआं था

उसने कुछ देखा सुना होगा शायद

लगी थी हाट सब कुछ बिक रहा था

कुछ छुपा और कुछ दिख रहा था 

वे सब आये थे जो सब खरीद लेते है

उनसे कुछ भी ना बचा होगा शायद

जो लोग जीत कर घरो को लौटे है

वहा तों  जश्न हो रहा होगा शायद  .

उधर वो जो ख़ाली उदास बैठा है 

वो मेले में लुट गया होगा शायद

है मेला या दंगा हमारा भ्रम तों नहीं

घर नहीं कही ठहर गया होगा शायद

इससे अच्छा तों अपना  पनघट था

ओ फिसलने से डर गया होगा शायद

समंदर तों हमेशा ही इतना गहरा था

किनारे पर धोखा हुआ होगा शायद|

सीख लिया समंदर की सवारी करना

कहा पहुंचोगे ना सोचा होगा शायद .

अन्दर इतना तूफ़ान सा क्यो है

अन्दर इतना तूफ़ान सा क्यो है 
मन इतना परेशांन सा क्यो  है 
न कोई बात है,न कोई भाव ही 
दर्द इतना मेहरबान सा क्यो है | 

दर्द मन में,दिमाग में,लहू में भी 
दर्द तन में,दिल औ वजूद में भी 
दर्द साँस ,धड़कन औ रूह में भी 
ये दर्द हुआ आसमान सा क्यूं है |

शनिवार, 6 जुलाई 2024

ये दिल्ली ने कहा है

ये दिल्ली ने कहा है 
की 
कलम को तोड़ दे सब 
अगर कुछ सोचते है 
जो हमसे कुछ अलग है 
उस चिंतन को मोड़ दे सब
ये दिल्ली ने कहा है 
अब कोई कविता न लिखे 
लिख रहे है 
तो ऐसा वैसा न लिखे 
जो दिल्ली को नहीं
अच्छा लगेगा 
ये दिल्ली ने कहा है 
न कोई फिल्मे बनाये 
न ही कोई गीत गाये 
न नाटक ही दिखाए 
जो दिल्ली को न भाये 
ये दिल्ली ने कहा है 
सूरज पूरब से निकलता 
ये औरो ने कहा था 
सूरज अब पच्छिम से उगेगा  
भारत में रहेंगे तो 
पूरब को सब लोग अब 
पच्छिम कहेंगे   
ये दिल्ली ने कहा है 
बदलो से नहीं होती है बारिश
मेढक की शादी न हो
तो बारिश हो नहीं सकती 
सब मान लो सब शादी कराओ 
ये दिल्ली ने कहा है 
हमसे पहले कुछ नहीं था 
जो किया हमने किया है 
ये जमीन आसमान नदिया 
हवाए सब हमने दिया है 
ये दिल्ली ने कहा है  ।

गुरुवार, 20 जून 2024

सरहदे

सरहदे तय कर दी घरों की
सरहदे तय कर दी देशों की 
पर सरहद नही तय कर पाए 
औरत और आदमी के रिश्तों की 
जब चाहा ,जहा चाहा 
तोड़ देते है सरहद और सीमाएं ।

बुधवार, 19 जून 2024

सबको पढ़ाओ दो दूनी इक्कीस

खुद पढ़ोगे तो बहुत पीछे रह जागोगे 
ज्यादा से ज्यादा कोई नौकरी पावोगे 
मुश्किल से घर चलाओगे 
बड़ा बनना है 
तो 
सबको पढ़ाओ दो दूनी इक्कीस 
सब मुझे दे दो तो होगा बाइस 
पढ़ाना सीख गए तो ऊंचाई पर जागोगे 
सेठ और मंत्री क्या प्रधानमंत्री बन जागोगे । 

सोमवार, 27 मई 2024

मेरी देह मेरी है

साहित्य की नई बहस 
मेरी देह मेरी है 
मैं जो चाहे वो करु
किसी को क्या
कहानी कविता पूर्ण हुई 
और 
हो गया 
स्वतंत्रता का उद्घोष ।

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

दर्द है कि जाता ही नही

दर्द है कि जाता ही नही 
न मन का न तन का 
न अपनी जलन का 
न अपनी लगन का 
न अपने कहन का 
न उनके सुनन का 
न उनके कहन का 
न अपने सुनन का 
न दिल की व्यथा का 
न अपनी कथा का 
न यादो का अपने 
न वादो का अपने 
इरादो का अपने 
दवा भी नही है 
दुवा भी नही है 
ये किससे बताये 
किसे हम सुनाये 
आँसू छुपाये 
या हिचकी दबाए 
कटी जीभ अपनी 
निकलता जो खू है 
ये कैसे छुपाये 
न आहो मे कोई 
न चाहो मे कोई 
निगाहो मे कोई 
न राहो मे कोई 
ये गम हम दबाए 
कहा तक अब जाये 
ये दर्द जो खू मे 
कतरे कतरे लहू मे 
है चमड़ी के अंदर 
औ चमड़ी के बाहर 
ये जाता नही है ।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

गहन सन्नाटा ।



क्या वक्त है 
चारो तरफ 
या तो सन्नाटा है 
या 
सन्नाटा टूटता है 
तो 
आर्द्र स्वर मे जिंदगी
बचाने की आवाजो से 
और 
फिर गुस्से और चीखो से 
और 
फिर छा जाता है गहन सन्नाटा ।

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

कभी समन्दर के किनारे खड़े होकर दूर देखा है आप ने

समय हो तो मेरी ये कविता भी पढिये --

कभी 
समन्दर के किनारे 
खड़े होकर 
दूर देखा है आप ने 
लगता है कि 
कुछ ही दूर पर 
आसमान मिल रहा है 
समन्दर से 
पर जब आगे बढ़ते है 
नाव से या जहाज से 
तो वो मिलन 
और दूर चला जाता है 
वैसी ही होती है 
कुछ जिंदगियां 
और कुछ के भविष्य 
इच्छाये ,खुशियाँ और आशाएं ।
मैं भी 
ताक रहा हूँ टुकुर टुकुर 
दूर से दूर तक 
बहुत दिनों से 
और भाग रहा हूँ लगातार 
की आसमान को छू लूँ  ।
पर
या तो आसमान छल करता है 
या 
मेरा पुरुषार्थ ही जवाब दे जाता है 
और
हाथ भी तो छोटे पड़ जाते है मेरे ।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

चलो धूल डालते है कुछ विचारो पर

चलो धूल डालते है 
कुछ विचारो पर 
भावनाओ पर 
रिश्तों पर 
और ढक देते है 
बहुत सी यादे ।
भूल जाते है वो कदम 
जो हम साथ चले थे 
लिखते है नयी इबारत 
और नया मुस्तक़बिल ।

सुनो सुनो सुनो फरमान है राजा का

सुनो सुनो सुनो 
फरमान है राजा का 
या धर्म की जुबान है 
चार बच्चे पैदा हो 
ऐसा फरमान है 
दो एक के लिये 
दो दूसरे के लिये 
अपने लिये घन्टा 
सुनो सुनो सुनो 
मुनादी करा दो 
कि जरूरत है 
बच्चा पैदा करने वाली
मशीन की  
सुनो सुनो सुनो ।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

बहुत हुआ पृथ्वी पर जय श्री राम जय श्री राम 
जहां भी राम सोयें थे वो जग कर बैठ गए 
झांक कर देखा ये कौन भक्त नए 
( आज पूरा करता हूँ )

रविवार, 7 अप्रैल 2024

अभिशप्त

अभिशप्त आत्माएं 
अभिशप्त वजूद 
अभिशप्त वादे 
अभिशप्त इरादे 
अभिशप्त इच्छाये 
अभिशप्त भविष्य
अभिशप्त रिश्ते
अभिशप्त भावनाए 
सपोले ही चहुँ ओर
आस्तीन कैसे बचाए
अभिशप्त सब कुछ 
ये सब 
जाकर किसे दिखाये ।

जीवन एक सवाल है और जवाब भी ।

ये सीधी सपाट सड़क बचपन है 
पहाड़ की चढ़ाई जवानी है 
और 
रेगिस्तान में चलना बुढ़ापा है 
इसी में कही नदी में तैरना 
समुद्र की लहरों से खेलना 
तारो को गिनना,चांद से बात करना 
फूलो को सूंघना पत्तो को सहलाना 
और बिला वजह दौड़ना 
तथा 
अनजाने गड्ढे में गिर जाना भी होता है ।
जीवन एक सवाल है और जवाब भी ।

शनिवार, 6 अप्रैल 2024

ऐसा क्यो होता है अक्सर

मेरी कविता:

ऐसा क्यो होता है अक्सर
कि 
जिस जमीन पर आप 
बुनियाद बनाना चाहते है 
वही दलदल निकल आती है 
और 
धंस जाता है खुद का वजूद 
जिस पेड़ को मजबूत समझ 
छप्पर का आधार बनाना चाहते है 
वही इतना कमजोर निकल जाता है 
कि 
तनिक सा बोझ पडते ही 
लचक जाता है 
और 
सब कुछ जमीदोज हो जाता है 
पहाडी पर चढ़ते वक्त 
पहला ही पत्थर 
कमजोर निकल जाता है 
और 
पहले ही कदम पर घायल कर 
चढाई छोड़ने को मजबूर कर देता है ।
खैर 
हिम्मत तब भी नही हारते लोग 
और 
जारी रखते है खोज 
एक मजबूत ,पुख्ता जमीन की 
पूरी तरह लम्बे समय तक 
मजबूती से खड़े रहने वाले पेड़ की 
और 
पहाडी पर घायल होकर भी 
अन्तिम चोटी तक पहुचने के 
सही मार्ग की ।

सोमवार, 1 अप्रैल 2024

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।
तुम्हारे अहंकार में से कुछ नहीं चाहिए हमें ।
बल्कि हम दे देते है थोड़ी सी विनम्रता तुम्हे ।
और चाहो तो एक आइना भी ।

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।

हम तुम्हारे अहंकार को ठुकराते है ।
तुम्हारे अहंकार में से कुछ नहीं चाहिए हमें ।
बल्कि हम दे देते है थोड़ी सी विनम्रता तुम्हे ।
और चाहो तो एक आइना भी ।

रविवार, 31 मार्च 2024

रेगिस्तान का हिरन

वो रेगिस्तान का हिरन देखा है क्या 
लगातार भागता और फिर दम तोड़ता
उसे हर थोड़ी दूर पानी दिख रहा था 
और पानी और थोड़ी दूर हो जा रहा था 
कई प्रेमी भी  ऐसा ही हिरन होते है 
और उनका प्यार रेगिस्तान का पानी । 

नाखून

नाखून

औरत को देखते ही
आँखों में नाखून उगना कब से शुरू हुआ?
जब हम असभ्य थे
या जब सभ्य हो गए!

औरत को देखते ही
उसे घायल कर देने की प्रवृत्ति कब से आयी?
जब हमारे पास शब्द नहीं थे
या 
जब हमने भाषा गढ़ ली!

औरत को देखते ही
उसमें प्रवेश करने की उत्कंठा
कब से हिलोरें मारने लगी?
जब हम कुछ नहीं जानते थे
या 
जबसे हमने ईश्वर गढ़ लिया !

औरत को देखते ही
उसपर क़ाबिज़ होने की इच्छा
कब से उत्पन्न हुई?
किसी बर्बरता को देखकर 
या जबसे हमने बर्बरता का सामान्यीकरण कर लिया


यह सब त्रासदियाँ हैं
मनुष्यता के पक्ष में लड़ने के लिए
इन त्रासदियों को ख़त्म करने के लिए
नए औज़ार बनाने होंगे

- डॉ. सी. पी. राय

रविवार, 24 मार्च 2024

आहट सुनाई पड़ रही है आपातकाल की

आहट सुनाई पड़ रही है ?
आपातकाल की 
या समय पूर्व चुनाव की 
और 
किसी भी तरह ,किसी भी हालत में 
जीत ,जीत और केवल जीत 
ताकि फिर सब स्थाई हो सके
मनमाना पन हो या तानाशाही 
कोई सामने नहीं हो 
ना विपक्ष ,न संविधान और लोकतंत्र 
महात्मा से लेकर शहीदे आजम तक 
नेता जी से लेकर बिस्मिल तक 
सब की आत्माएं 
बस टुकुर टुकुर ताक रही है 
पर आंखो में आसू के कारण 
कुछ साफ साफ दिख नही रहा है 
तो एक दूसरे से पूछ रहे है 
कि कुछ देखा क्या कुछ सुना क्या 
अपने भारत का हाल 
पर जवाब में सिर्फ सन्नाटा और हिचकी ।

शुक्रवार, 22 मार्च 2024

मेरे ओठ इस कदर क्यों सिये गए है ।

जब कोई मेरे घाव को कुरेदता है न
मुझे बहुत दर्द होता है 
कोई मेरे घाव को सहलाता भी है 
तो लगता है कि कुरेद रहा है
हर बार मेरा घाव और गहरा हो जाता है 
इसलिए मुझे मेरे हाल पर ही छोड़ दो 
न कुरेदो , न सहलाओ 
बस कोई इतना बताओ 
इतने घाव मुझे क्यों दिए गए है 
मुझे चीखने से भी क्यों रोका गया 
मेरे ओठ इस कदर क्यों सिये गए है ।

सोमवार, 11 मार्च 2024

वो सब आगे निकल गए

वो सब आगे निकल गए 

जो जो काफ़ी दिन साथ चले 
गलबहिया करते हुए
एक दिन अचानक थोड़ा ठिठके
उनके पीछे होते ही 
मैं लहूलुहान हो गया 
छटपटाया और गिर गया 
और मुझे तड़पता छोड़ 
वो तेजी से आगे निकल गए 
ये कहानी आख़िरी कभी नहीं हुयी 
और गिनती अब तक नहीं रुकी ।

शनिवार, 9 मार्च 2024

क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ?

क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ? 

तब भी शोर था पर नारो का 
सार्थक नारो का 
कही इंकलाब जिंदाबाद
कही महात्मा गांधी जिंदाबाद 
स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा 
करो या मरो 
अंग्रेजो भारत छोड़ो 
दुश्मन स्पष्ट था और उद्देश्य भी 
फिर अचानक एक शोर हुआ 
ठाय ठाय ठाय
और
फिर देश में गूज उठा नारा 
महात्मा गांधी अमर रहे 
थर्रा गया भारत और मानवता 
पर सम्हाल कर चलता रहा भारत 
और 
पहुंच गया ऊंचाइयों पर 
आज फिर शोर है 
आजादी की लड़ाई का विरोध करने वालों का शोर 
कर्कश शोर क्रोधित घृणा लिए 
जय श्रीराम जय श्रीराम 
गोडसे जिंदाबाद फासीवाद जिंदाबाद 
नफरत भय आशंका से घिरा देश 
नारो नारो में कितना फर्क होता है ।
अंग्रेजो के आतताई शासन से तो बच निकला 
पर क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ?