शनिवार, 26 सितंबर 2026

जीवन तो एक महासमर है

जीवन के इस महासमर में 
कितनी तो आपाधापी है
कभी है गिरते कभी है उठते 
फिर धीरे से चल पड़ते है

क्या क्या इस जीवन में देखा 
खुद के ही जीवन को खोया
खाई में गिरा संघर्षों की 
कष्टों के पत्थर पर सोया 

साँसें गिनते रातें कट गई 
सपने अपने टूटे बिखरे 
आशा के दिये बुझते देखे
और अँधेरे और कितने गहरे 

मिट्टी से उठकर के फिर से 
मिट्टी में ही मिल जाना है 
हर मोड़ पर खुद से लड़ते, 
खुद को ही खोते जाना है  

आंखों में आसमान का सपना
पैरों तले जमीन है खिसकी 
मन के मंदिर में दीप जलाया
हवा ने उसे हर बार बुझाया 

पुल टूटे कितने रिश्तों के 
दीवार ढह गयी विश्वासों की 
कितनी बार रह गए अकेले 
बस आवाज अपनी साँसों की 

कष्टों और दुख के ही तकिए थे
आँसूओं से तन नहा गया तन 
नई सुबह ने तब था पुकारा
उठो और चलो कर पक्का मन 

गिरना तो है नियति का हिस्सा 
अपना धर्म है गिर कर उठना
महासमर अब भी जारी है 
पर यहाँ अधर्म है थकना 

कभी थी मुस्कान छिपाई 
कभी दर्द को गले लगाना
जीवन ने बस सिखाया 
जो खोया था वह फिर पाना

खुद को मिटा नया रूप गढ़
राख से ज्यो उठते अंगारे
संघर्ष की आग में तपकर 
बने खूब और खूब है निखरे 

अंधी गलियों में कितना भटके  
दिशाहीन से तब  लगते थे 
तब अंतर्मन ने हमे पुकारा 
राह तुम्हारे भीतर ही है 

खोया हुआ है जो कुछ अपना
फिर वही से मिल जाएगा 
कष्टों के दिन बहुत हो गए 
आगे जीवन खिल जाएगा 

अब भी तो आपाधापी है 
महासमर भी थमा नहीं है 
गिरते हैं और फिर उठते हम
पर रुकने का नाम नहीं है 

जीवन की दुर्गम यात्रा में 
खोकर भी तो बहुत है पाया 
पत्थर पर कितना भी सोए 
फूलों की भी सेज मिली हैं 

हर साँस में यही छिपा है 
कदम कदम में नई कहानी
महासमर ही तो जीवन है
और यही पहचान है इसकी 

खाई में गिरकर जो उठता
आसमान वही है छूता 
महासमर के इस जीवन मे
अंतिम युद्ध उसी ने जीता ।

सोमवार, 9 मार्च 2026

हास्य कविता

एक पत्नी ने अपने पति को 
उस दिन प्यार से बुलाया 
और बगल में बैठाया 
बोली 
प्रीयतम में कुछ दिखाउंगी 
और उसके द्वारा 
एक अच्छी बात समझाऊंगी 
ध्यान से देखना 
और फिर बताना 
क्या सीखा ये सुनाना 
पत्नी ने अपना कुत्ता बुलाया 
और पास में बैठाया 
कुत्ते के खाने के बर्तन को दारू से भर दिया 
और कुत्ते के आगे कर दिया 
कुत्ते ने पूछ हिलाया 
फिर उस बर्तन में भरी दारू को सूंघा 
पर मुह नही लगाया 
फिर पत्नी ने दारू नाली में फैलाया 
और उस बर्तन में दूध भर दिया 
फिर कुत्ते के आगे कर दिया 
कुत्ते ने फिर पूछ हिलाया 
और बर्तन के पास आया 
इस बार कुत्ता दूध पी गया 
पत्नी प्यार से बोली 
प्रियतम अब जरा सुनाओ 
और प्यार से बताओ 
की तुमने क्या शिक्षा पाई 
क्या तुम्हारे अकल में आई 
पति ने धीरे से मुह खोला 
और फिर बोला 
हा तुमने जी समझाया 
वो अच्छी तरह समझ मे आया 
पत्नी उत्साहित हुई तो 
अब तो अपना मुह खोलो 
जरा जल्दी से बोलो 
पति बोला 
ये समझ मे आया 
की जो दारू नही पीता है 
वो कुत्ता होता है । 

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

थोड़े से गम है तो क्या मुस्कराना छोड़ दे

थोड़े से गम है तो क्या मुस्कराना छोड़ दे 
रास्ते मे कांटे है तो क्या आना जाना छोड़ दे 

शोर बहुत है कमजर्फ लोगो के धोखो का 
क्या जिंदगी अब यमन राग गाना छोड़ दे ।

चेहरे पर  उसके गुस्ताखियों  की धूल है 
हमसे कहते है कि आईना दिखाना छोड़ दे 

पीठ पर  हमारे पैबस्त है ख़ंजर हजार 
चाहते है हमसे कि हम चिल्लाना छोड़ दे 

घाव से मेरे दर्द और लहू इतना बह रहा 
फिर भी चाहते है कि मलहम लगाना छोड़ दे 


शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

गिरमिटिया जब घर से आया

गिरमिटिया जब घर से आया 
रोटी   रोटी     को   तड़पाया 
पर   उसने फिर ताज बनाया 
हा   उसने फिर राज चलाया 

गुरुवार, 5 जून 2025

किस-किस के आगे शीश झुकाना पड़ता है,

किस-किस के आगे शीश झुकाना पड़ता है, 
दिल पर कितना बोझ उठाना पड़ता है 

काम नहीं चलता अब दीप जलाने से, 
हर जुगनू  को भोग लगाना पड़ता है 

रूह बहुत दुख पाती ऐसे जीने से, 
यारो जीते जी मर जाना पड़ता है. 

नौकरशाही मौज उड़ाती रहती है 
जनता को कर्ज़ चुकाना पड़ता है 

हमने भी देखे हैं रंग सियासत के, 
चोरो तक का साथ निभाना पड़ता है ।

रविवार, 9 मार्च 2025

क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ?

क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ? 

तब भी शोर था पर नारो का 
सार्थक नारो का 
कही इंकलाब जिंदाबाद
कही महात्मा गांधी जिंदाबाद 
स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा 
करो या मरो 
अंग्रेजो भारत छोड़ो 
दुश्मन स्पष्ट था और उद्देश्य भी 
फिर अचानक एक शोर हुआ 
ठाय ठाय ठाय
और
फिर देश में गूज उठा नारा 
महात्मा गांधी अमर रहे 
थर्रा गया भारत और मानवता 
पर सम्हाल पर चलता रहा भारत 
और 
पहुंच गया ऊंचाइयों पर 
आज फिर शोर है 
आजादी की लड़ाई का विरोध करने वाली का शोर 
कर्कश शोर क्रोधित घृणा लिए 
जय श्रीराम जय श्रीराम 
गोडसे जिंदाबाद फासीवाद जिंदाबाद 
नफरत भय आशंका से घिरा देश 
नारो नारो में कितना फर्क होता है ।
अंग्रेजो के आतताई शासन से तो बच निकला 
पर क्या अभी भी बच जाएगा हिंदुस्तान ?

रविवार, 2 मार्च 2025

इसी को शायदयुद्ध कहते है ।

दो देशो के जवान 
जो एक दूसरे को 
जानते तक नही है 
पहचानते नही है
कोई लड़ाई नही है 
उनकी आपस मे 
पर वर्दी पहन ली 
तो खूँन बहा रहे है 
एक दूसरे का 
जानी दुश्मन बन कर 
जी इसी को शायद
युद्ध कहते है ।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

मैं तुम्हे छूना नहीं चाहता

मैं तुम्हे छूना नहीं चाहता हूं 
तुम मैली हो जाओगी 
बैठी रहो दूर 
निहारता रहूं पूरा का पूरा
निगाहे मैली नहीं है मेरी 
पास आकर कुछ कम हो जावोगे 
बस ओंठ दिखेंगे या वक्ष 
मैं नहीं चाहता 
कि 
तुम इतने तक सीमित हो जाओ 
मैं बस सुनते रहना चाहता हूं तुम्हे 
एहसास करना चाहता हूं घंटियों का 
जो बजती है मेरे कानो में 
इसलिए तुम दूर बैठी रहो सामने 
बस हिलते रहे तुम्हारे ओंठ 
मुस्कुराती रहे तुम्हारी आँखें 
बुलाती रहे तुम्हारी आँखें 
और मैं मोहपाश में बंधा 
ठिठका रहूं जहां का तहां ।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

भारत में दो भारत

सड़क बनाने वाले लोग उस पर आने जाने वाले लोग 
बैंड बजाने वाले लोग और उस पर कमर हिलाने वाले लोग 
भारी भारी रोशनी उठाने वाले लोग और उसमें नहाने वाले लोग 
कूड़ा उठाने वाले लोग और कूड़ा फैलाने वाले लोग 
जूठन खाने वाले लोग और जूठन बचाने वाले लोग 
मेहनत से कमाने वाले लोग और पैसा लुटाने वाले लोग 
मुश्किल से शरीर छुपाने वाले लोग और कपड़े में सब दिखाने वाले लोग 
खुद को बेच खाने वाले लोग और वहा आने जाने वाले लोग 
अन्न उगाने वाले लोग और उसे छिपाने वाले लोग 
जी भारत में इनका दो भारत है । 
इनके बीच में एक शांत महाभारत है ।
कब पाञ्चजन्य की आवाज गूंजेगी और
कब कोई कृष्ण उपदेश देंगे कि लड़ाई हक की है , लड़ाई अपनो से पर हक छीनने वालो से है 
उठो बस अपना हक मांग लो और न मिले तो अधिकार है तुम्हारा की छीन लो ।।
एक भारत में दो भारत नहीं चलेगा 
महाभारत होगी और फिर एक भारत होगा ।
पर युद्ध से पहले शांति ,सहयोग और सहृदयता का उपदेश दिया था कृष्ण ने 
तब नहीं सुनी आवाज उनकी तो महाभारत हुआ 
इतिहास से सीख लिया जाए तो महाभारत सामने क्योंकर आए । 

सोमवार, 16 दिसंबर 2024

जब अचानक तुम्हे देखा

जब अचानक तुम्हे देखा 
तो लगा कि 
जैसे बंद था अंधेरी कोठरी में अकेले 
और 
सूरज नहीं देखा था कब से 
अचानक तुम सामने खडे थे 
सूरज की रोशनी लिए 
चांद की ठंडक लिए 
तो दिल धक से रह गया 
और लगा कि विश्वास न करे 
और 
खुद की सांस रोककर 
खुद को एहसास करवाए 
कि हम जिंदा है 
और 
तुम्हे अचानक देखा तो लगा 
मैं बंद दरवाजे के पीछे 
सांस रोक कर खड़ा हूं 
और 
तुम्हारी पदचाप सुन रहा हूं 
जिसका इंतजार था कब से । 

रविवार, 6 अक्टूबर 2024

तुम जेल में ठूस दिये जाओगे

तुम जेल में ठूस दिये जाओगे 

तुम्हे हथेलियां फैलाए रहना था 
पर
तुम उंगलियों को मोड़ने लगे 
और 
अंगूठे को दबा लिया उनके बीच 
क्या तुम नही जानते इसे मुट्ठी कहते है
और 
मुठिया प्रतिरोध का प्रतीक होती है 
तुम लोग मुठिया लहरावोगे 
फिर भी तुम्हे डर नहीं लगता है
तुम जेल में ठूस दिये जावोगे ।

तुम ऊंची आवाज में बोलने लगे 
सत्ता और सियासत को तोलने लगे 
पूछ रहे हो सवाल अपने हालत के 
शब्द चुन रहे हो अपने खयालात के 
फिर तुम्हें डर नहीं लगता है 
उनकी गोली पहले घुटने पर 
और फिर कनपटी पर लगती है ।
तुम जेल में ठूस दिये जावोगे।

तुम मांग रहे हो हक ये जुर्रत 
तुम मांग रहे हो घर ये जुर्रत 
तुम मांग रहे हो रोटी ये जुर्रत 
तुम मांग रहे अवसर ये जुर्रत 
क्या तुम्हे डर नही लगता 
कि नक्सलवादी कहलावोगे
तुम अज्ञात में जला दिए जावोगे 
फिर भी बच गए तो 
तुम जेल में ठूस दिये जावोगे। 

तुम लिख रहे हो कहानी,कविता 
तुम कर रहे हो प्रहसन या नाटक 
तुम बना रहे हो इशारे की पेंटिंग 
तुम गढ़ रहे हो क्रांति की मशाल 
फिर भी तुम डर नही लगता 
तुम जेल में ठूस दिये जावोगे।

रविवार, 22 सितंबर 2024

पेड़ो का जंगल ही हमें बचाएगा

जंगल कितना अच्छा लगता है 

हरा भरा ,तरह तरह के पेड़ पौधों वाला 

कितनी शीतलता देता है जंगल 

कुछ जंगल डरावने भी होते है 

फिर भी मानवता के लिए जरूरी होते है 


आजकल भी उग रहे है काफी जंगल 

सीमेंट के बालू के कंक्रीट के 

ये भी रंग बिरंगे होते है 

पर ये ज्यदातर डरावने होते  है 

वो जंगल देते है आक्सीजन 

और ये उगल रहे है जहरीली गैस 


वो जंगल भी हिलता है आंधी आने पर 

पर डर नही लगता है 

हा अक्सर टूट जाति है कुछ डालिया 

उखड जाते है कुछ कमजोर  पेड़ 

ये जंगल भी हिलता है बड़ी जोर से 

जब जमीन में कोई आंधी चलती है 

और डरा देता है मानवता को 


कभी ज्यादा  तेज काँप गयी धरती तो 

वो पेड़ का जंगल ख़त्म करते जा रहे है हम  

और उगाते जा रहे है कंक्रीट का जंगल 

पेड़ो का जंगल ही हमें बचाएगा 

और कंक्रीट का जंगल हमें मिटाएगा 

ये हमें कब समझ में आएगा | 


गौर से देखिये छोटे बच्चे और माँ बाप को

आप कभी गौर से देखते है 

किसी छोटे बच्चों और उनके माँ पिता  को

एक दुसरे से कितना प्यार होता हैं 

जब तक बच्चे बच्चे रहते  है 

जरा महसूस करिए दूर से उस प्यार करते 


बच्चों का मचलना रूठना मनाना 

दूर भागना ,एक दुसरे को खोजना 

न मिलने पर परेशान होना 

नाम लेकर या मम्मा पापा चिल्लाना 

एक दूसरे को ढूढना  

मिलने पर गुस्सा या प्यार उड़ेल देना 


नहीं देखते आप ये सब दृश्य गौर से

तो अब से जरूर देखा करिये

इन द्र्श्यो में जवाब है जिंदगी के 

जी बहुत सारे जवाब आज के और कल के भीं 

इन दृश्यों में जीवन हैं

ये जीवन के लिए जरूरी है । 


सोमवार, 16 सितंबर 2024

मेरी रहा में कांटे

मेरी राहो में कांटे 
जिसने भी बिछाये 
जब वो मेरे पांव में चुभे 
और 
जोर से चीखा मैं दर्द से 
जरूर उनके कानो के 
परदे भी हिले होंगे
और दुख रहे होंगे अभी तक 
दोस्त 
मेरा घाव शायद जल्दी भर जायेगा 
क्योकी बेजान कांटे से हुआ है 
पर तुम्हारा नहीं भर पायेगा जल्दी 
क्योकि 
इंसानी चीख से घायल हुए हो तुम ।
इंसान की जब भी निकलती है चीख 
या कराह 
वो छलनी कर देती है अंदर तक 
और दीखती भी नहीं 
पर 
अचेतन में हथौड़े की तरह 
चोट करती रहती है जिंदगी भर ।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2024

तुमने ऐसा क्यों करवाया था कृष्ण

कृष्णा 
तुमने ऐसा क्योंकि करवाया था 
क्यों कहा था कोई अपना नहीं 
देखो सब मरे है 

तुम रोक भी तो सकते थे 
महा शक्तिशाली हो या थे तुम 
तब 
तुमने अपनो से अपनो को क्यो मरवाया था 

पहले झुक कर प्रमाण करो 
फिर मार दो 
ये क्यों सिखलाया था कृष्णा 

देखो ने फिर क्या हुआ 
बापू को भी उसने पहले प्रणाम किया 
और उन्हें मार दिया कृष्णा 

और आज तो कुछ पाने को 
अपनो को मार देने की बाढ़ आ गई है
तुमने वो नही करवाया होता 
क्या तब भी ये सब हो रहा होता 
जरा सोचो कृष्ण और सोचो 
कि क्या तुम अब ये रोक सकते हो ?

बुधवार, 11 सितंबर 2024

वो किस कदर कंगाल है

मेरी बात --

अपने बच्चे 

पिता के दर्द और तकलीफ में 
क्या खूब संतुलन 
बैठाती हुई बेटी 
पिता के दुख में 
मरहम लगाती हुई बेटी 
दूर नौकरी की मजबूरी 
फिर भी 
भाग कर आती हुई बेटी 
पिता के दर्द से 
छटपटाती हुई बेटी 

नौकरी , कैरियर 
और 
पिता की तड़प में 
संतुलन बैठाता हुआ बेटा 
पिता की तकलीफ को
कम करने को 
फड़फड़ाता हुआ बेटा 
अपनी नींद और भूख भूल 
पिता ही पिता में 
पूरा मन लगाता हुआ बेटा 

नही हो धन दौलत 
पद और प्रतिष्ठा
पर ऐसा पिता तो 
कितना मालामाल है 
होंगे उनके 
और 
उनके बच्चो के पास
धन, दौलत, पद
प्रतिष्ठा ,सब कुछ 
पर 
ये सब नही है 
तो वो बाप 
किस कदर कंगाल है ।

बहुत दिनों पर गांव गया था

बहुत दिनों पर गाँव गया था पर ये मेरा गाँव नहीं था

बहुत दिनों पर गाँव गया था 
पर ये मेरा गाँव नहीं था .
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कहा गया वो?

सब कुछ बदला नया नया था
सुनते थे सड़के बननी है ,
पूरे गाँव को वो जोड़ेगी .
वो चकरोड बहुत चौड़ा था ,
पगडण्डी सा अब दिखता है .
वो मेरा चकरोड कहा है ?

वो पोखर ,तालाब ,गड़हिया 
जो  गाँव के तीन तरफ थे
उनसे पूरा गाँव हरा था ,
पशु नहाते ,सभी तैरते ,
मछली पर सबका ही हक़ था .
अब तों वहा मकान बने है 
या फिर है रस्ते लोगो के .
सबके घर को तों रस्ते थे ,
सबके पास मकान थे अपने .
फिर ये सब क्या नया नया है .
वो रस्ते और तालाब कहा  है ?
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .

उत्तर वाला नाला सदा भरा रहता था,
दक्षिण में नहर सरकारी .
चारो ओर दिखती थी 
इतनी धान की क्यारी 
.कहा गए वो ?.

वो पाकड़ का पेड़ 
जहा खेला करते थे
और 
खुला खलिहान 
या दालान किसी का, 
सब सबका था .

एक बार पड़ा था सूखा ,
कई घरो में अन्न नही था
पर जिनके घर हुआ था आलू 
वो भून पंहुचा देता था
जिसका भी गन्ना पेरा जाता
भरी बाल्टी गन्ने का रस 
उस घर वो भिजवा देता था .
कोई नहीं मरा था भूखा 
नहीं रुका था काम किसी का 

बसवारी के बांस सभी के ,
छानी मड़ैया ,सरपत सबका . .
सब थे छवाते साथ उठाते 
और मड़ैया उठ जाती थी.
वो मिले जुले स्वर और हाथ कहा है,
मिलके  उठाना की आवाजे कहा गयी वो .

बरामदे का कुआँ 
कितना ठंडा कितना मीठा, 
पता था सबको .
और 
द्वार पर बड़ा सफ़ेद फूलो वाला 
मौलश्री का  पेड़ खड़ा था .
जो राही इस राह से  आता 
रुक कर निश्चित पानी पीता,
पेड़ कि छाया में सुस्ताता 
और फिर जाता.था
देख कर कितना सुख मिलाता था .
कहा गया वो ?

पहले जब थे शहर से आते 
पूरा गाँव अपना लगता था
बहुत लोग मिलने आते थे ,
हाल पूछते ,साथ बैठते ,
घर आने को कह जाते थे .
जिसका भी जो रिश्ता था 
कह जाता था
भाभी ,चाची या बुला रही है ,
बहुत दिनों से नही है देखा,.
आजी कहती दुबले क्यों हो ,
दूध नही मिलता है ,पीलो!
गाँव के चारो तरफ बगीचे 
लदे आम से ,
मेरे घर आम नहीं था 
तब काका ने भिजवाया था .
कहा गए वे  लोग 
जो ऐसा करते थे, 
वे सारे  बाग़ कहा है ?

वे दोनों स्कूल पूरब में लडके, 
पश्चिम में लड़की पड़ने जाती थी
दूर से आती थी आवाजे पढ़ने वाले बच्चो कि .
अब नहीं आ रही 
सबके घर एक चारपाई ,बिस्तर 
अलग रखा था ,
गाँव कि बारातो और मेहमानों को .
जिसके घर भी दूध दही या सब्जी होती ,
आ जाती थी 
सब मेहमान सभी के थे तब . .

और अब खुली गई दूकाने सब चीजो की,
कोई किसी को कुछ ना देता ,
सब बाजार से आ जाता है .
वो अपनापन और वे रिश्ते,
मेहमानों के लिए रखे सामान कहा गए वो ?

सबने रस्ता बंद कर दिया, 
खोदे गड्ढे कि भाई को राह मिले ना  . .
सबकी  नाली  बंद कर दिया 
या मुह उल्टा मोड़ दिया है
सबके दरवाजे पर कीचड़ ,
राह में कीचड़ ,मन में कीचड़ 
सबका घर जाना मुश्किल है .
पर संतोष सभी को ये है ,
अपना पडोसी परेशान है ,
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
वो था गाँव जहा बाराते 
शादी वाले घर तक जाती थी ..
जिस गाँव में सबकी बिटिया सबकी थी ,
कहा गया वो ?

कल सुना 
की फला की बबुनी भाग गयी,
गाँव के लिए बात नयी  .
वो शहर में ,पढ़ी थी कम 
और बढ़ी थी ज्यादा ,
खूब सिनेमा देख रही थी .
हिरोइन बनने चली गयी 
या फिर रिश्तो में ही छली गई वो .
कुछ आदर्श गाँव के ,
बिना बड़ो के पांव नहीं बाहर जाते थे , कहा गए वो ?

पहले भी बजार लगता था
और लगती  थी कुछ दूकाने ,
बढ़ते बढ़ते गाँव मुहाने आ पहुची  है .
पूरा गाँव बाजार बन गया 
कही खो गया,
ढूढ़ रहा हूँ कहा गया वो ?

सबकी शान इसी में मुक़दमे 
किसके कितने  कैसे  जीते ,
सब कुछ हो बर्बाद हमारा 
पर पडोसी कि बर्बादी 
मजा आ गया . .
पहले तों गाँव के बूढ़े ही सब कुछ थे,
उनका ही फरमान बड़ा था
पहले शाम बैठके पर बैठक होती थी.
कुछ बुजुर्ग मानस गाते थे .
बड़े चाव से रामचरित वे समझाते थे .
वे बैठके चाय कि दूकान खा गई .
अब गाँव मुहाने 
देसी की दुकान खुल गई 
और पूरा गाँव तरन्नुम में है .
अब बहस है लाल पारी की, 
किसमे मजा है ज्यादा 
देसी में या अंग्रेजी में .
वो किस्से ,वो मानस ,वो चौपाई 
और बुजुर्गो कि वे बहसे 
कहा गए वे ?

घर ,खेत और द्वार वही 
पर नहीं है 
गाँव वाले वो चाचा ,वो प्यारे बाबा .
जब भी मै बीमार होता था ,
कोई सवारी नहीं गाँव में 
और शहर भी दस कोस था .
मेरे बाबा कंधे पर बैठाते,
शहर को जाते ,
इलाज कराते 
और शाम ढले गाँव आ जाते
अब गाड़ी है ,सब कुछ है 
पर नहीं है तों मेरे बाबा 
उनको तों भगवान ले गए .
उनका प्यार ,उनकी डांट,
उनका कन्धा याद आ रहा
ढूढ़ रहा हूँ 
कहा गए वो .

वही गाँव है 
पर भूतो का डेरा लगता 
नहीं कही वो बाबा चाचा 
और वो आजी .
गाँव तों है 
पर इंसानों का नहीं बसेरा .
चौबे जी का घर 
कितनी रौनक रहती थी,
घास उग गई .
दीवार गिर गई 
छत पर है जाले ही जाले
और भी घर है ,
मेरा भी है 
जिनमे लटके है बस ताले.
शहर में दो कमरे सपना है 
यहाँ बीस कमरों का घर अपना है
लेकिन कुछ है जो बिला गया है
ढूढ़ रहा हूँ जिसकी खतिर 
बार बार हम गाँव आते थे, 
कहा गया वो ?

मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ मेरे गाँव को ,
खलिहानों को ,
मछली वाले तालाबो को .
बूढ़े बरगद और मौलश्री कि छाव को ,
बर्फ से ठंढे मीठे पानी वाले उस कुए को
भुट्टे  तोड़ते थे खेतो में 
फूट और ककड़ी खा जाते थे .
वो जामुन वाला पेड़ ,
बगीचा आम कि डाली ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ '

जांघिया नाच दिखाने वाली 
उस टोली को ,
रामायण हो या शादी हो ,
गैस जलाते ,तम्बू लगाते ,बाजा बजाते इस्माइल को ढूढ़ रहा हूँ .

लाज हया 
और 
हसी ठिठोली में मर्यादा ,
शादी में गाली भी तों गाई जाती थी '
थोडा कहा समझाना ज्यादा वाली भाषा ,
पंचायत पर दंड बैठको वाला अखाडा ,
लाखी पाती वाले खेले ,
कभी कही ,कभी कही के मेले ,
सुथनी और जलेबी गुड की ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कोई मुझे मेरा गाँव बता दो ,
कहा रुक गए पाव बता दो .
बहुत दिनों पर गाँव गया था 
ढूढ़ ना पाया मेरे गाँव को ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .

मंगलवार, 10 सितंबर 2024

वो चीखती रही तुम चीरते रहे

जब तुम लौट कर घर जाते 
और पुकारते ही अपनी बेटी को 
आजा बेटी कैसी हो पापा की बेटी 
पर वो भी किसी पापा की बेटी थी 

कहते हो अपनी बहन से 
बहना जरा पानी पिला दे 
और चाय भी बन दे
जब तुम लौट कर घर जाते 
और पुकारते ही अपनी बेटी को 
आजा बेटी कैसी हो पापा की बेटी 
पर वो भी किसी पापा की बेटी थी 

कहते हो अपनी बहन से 
बहना जरा पानी पिला दे 
और चाय भी बन दे
पर वो भी तो किसी की बहन थी 

कहते हो अपनी मां से 
मां बड़ी भूख लगी है 
वो भी तो किसी की मां बनी होती 

कैसे कर लेते हो कन्या पूजन 
वो भी तो कन्या ही थी 
कैसे कर लेते देवी की पूजा 
वो भी तो देवी ही थी 

हा वो,हा वो ! 
जिसे थोड़ी पहले तुम रौंद कर आए हो 
अपने जैसे ही राक्षस दोस्तो के साथ 
वो भी पुकार रही थी 
कोई मुझे बचा लो 
कोई तो मेरा भाई बन जाओ 

पर क्या हुआ था तुम लोगो 
नही सुनी थी उसकी चीख 
वो चीखती रही और तुम चीरते रहे ।

कहते हो अपनी मां से 
मां बड़ी भूख लगी है 
वो भी तो किसी की मां बनी होती 

कैसे कर लेते हो कन्या पूजन 
वो भी तो कन्या ही थी 
कैसे कर लेते देवी की पूजा 
वो भी तो देवी ही थी 

हा वो,हा वो ! 
जिसे थोड़ी पहले तुम रौंद कर आए हो 
अपने जैसे ही राक्षस दोस्तो के साथ 
वो भी पुकार रही थी 
कोई मुझे बचा लो 
कोई तो मेरा भाई बन जाओ 

पर क्या हुआ था तुम लोगो 
नही सुनी थी उसकी चीख 
वो चीखती रही और तुम चीरते रहे ।

आओ न कृष्णा

सुनो कृष्णा ! 

देख रहे हो तुम्हारे घर में क्या हो रहा है कृष्ण 
रोज़ सीताओं का अपहरण हो रहा है 
और रोज़ हर गली और मोड पर 
द्रौपदी का चीर हरण हो रहा है कृष्णा 

तब तो सिर्फ़ साडी खींचने पर तुम आ गए थे कृष्णा 
और 
बचा लिया था लाज द्रौपदी की 
पर अब कहा हो तुम कृष्णा 

क्या तुम्हें बलात्कार होती गोपियों का
आर्द्र स्वर सुनाई नहीं दे रहा है 
या कान बंद कर लिया है तुमने 

तब यमुना को जहरीला कर रहा था वो सर्प 
तो तुमने उसके फ़न नाथ दिए थे कृष्णा 
आज आकर देखो गंगा जमुना क्या हाल है 
क्या उन्हें तुम यो ही छोड दोगे कृष्णा 

कितनी महाभारत हो रही है भारत में 
पर तुम नहीं हो कृष्णा 
कहा सो रहे हो कृष्ण ? 
या 
ड़र गए हो कलियुगी लोगों से तुम भी कृष्णा? 
फिर तुम कैसे ईश्वर हो या हो अवतार  कृष्णा 

तुमने ही कहा था की जब जब 
पृथ्वी पर जुल्म बढ़ेगा, तुम आवोगे कृष्णा 
क्या तुम कह कर भूल गए कृष्णा 
या भूलने का नाटक कर रहो कृष्णा 

आओ न और फूक दो अपना शंख कृष्णा 
और 
दिखा दो चक्र सुदर्शन की ताक़त  पापियों के ख़िलाफ़ कृष्णा 

अगर अब भी नही आवोगे कृष्णा 
तो लोग तुमने अवतार और ईश्वर मानने से इनकार से कर देंगे कृष्णा 
और मान लगे की तुम सिर्फ़ 
किसी कथा के काल्पनिक पात्र भर हो कृष्णा 

तब क्या करोगे  कृष्णा ? 
आओ ना 
और बता दो की तुम सचमुच में हो कृष्णा ।

हारता मैं भी नही हूं

जिनका कद छोटा है 
वे पैर उचका कर मिलते है 
वे नही सकते है कर्म से मुकाबला 
वे भीतरघात करते है 
वे अपनाते है सारे हथकंडे 
और वे ही जीत जाते है 

पर हारता मैं भी नही हूं 
मेरे पास बची रहती है मेरी सच्चाई 
मेरा आत्मसम्मान और मेरा जमीर 
जो जीता नही जा सकता 

खुश रहो तुम अपना सफर करो 
पाप का और छल का 
मैं भी खुश हूं अपनी अच्छी नीद से ,अपनी बेफिक्री से अपनी हालत से ।