मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

दर्द भोगे हो साथ साथ

पिता हो ,माँ हो 
बेटा या बेटी 
पता नही कैसे 
समझ जाते है 
एक दूसरे का दर्द 
और 
अंदर अंदर छटपटाते है
एक दूसरे के लिए 
कोई पैथी नही पहचानती 
न कोई विज्ञान 
इस बेतार संदेश को 
गर 
दर्द में शामिल रहे हो 
कभी या ज्यादातर 
और 
दर्द भोगे हो साथ साथ 
मजबूत चट्टान बनकर 
एक दूसरे के लिए 
और 
जुड़े हो दिल और आत्मा से ।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रातें 
कितनी स्याह होतीहै 
क्यो होती है 
इतनी स्याह रातें 
ज्यो ही सूरज 
पच्छिमी की खोह में 
डुबकी लगाता है 
पूरब से फैलने लगती है 
स्याह रात 
टिमटिमाते हुई 
रोशनियां भी 
जुगनू से ज्यादा 
कुछ नही होती 
कितनी भयानकता 
समेटे होती है स्याह रात 
जिंदगी गर्त हो जाती है 
धीरे धीरे इसके आगोश में 
और 
कितना अकेलापन 
तारी हो जाता है 
जिसमे जिंदगी 
सवाल बन जाती है 
इन सवालो का 
कोई जवाब नही होता 
खुद से ही बाते करना 
खुद को तसल्ली देना 
खुद के अकेलेपन से लड़ना 
और लड़ते लड़ते 
नीद के लिए लड़ना 
ताकि आंख बंद कर 
अनदेखा कर सके 
इस स्याह अंधेरे को 
और अकेलेपन को 
पर 
कितना स्याह है सब कुछ 
चलो आंखे बंद कर लेते है 
और 
सोच लेते है 
की 
अकेले नही है हम 
तमाम सूरज उग गए है 
हमारी जिंदगी में ।
उफ्फ ये स्याह अंधेरा !

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

फिर सब होगा शांत

कुछ सवाल है 
जो अनुत्तरित है 
कुछ जवाब है 
जो खुद 
सवाल बन गए है 
सिलसिला टूटता ही नही 
न सवालो का न जवाबो का 
क्रिया और प्रतिक्रिया जारी है 
पर कही तो कोई दीवार होगी 
या 
होगा इस सफर का डेड एंड 
जो रोक देगा क्रिया को 
और प्रतिक्रिया को भी 
और 
फिर सब होगा शांत शांत ।

बुधवार, 21 सितंबर 2022

तुम कुर्सी हो मुझे मालूम है तुम्हारे पांव नहीं

इतनी दूर क्यों हो तुम कभी मिल जाया करो 
न हकीकत में तो सपने में ही आ जाया करो 
तुम कुर्सी हो मुझे मालूम है तुम्हारे पांव नहीं 
मेरे तक आने को कोई तो दाव लगाया करो |

रविवार, 18 सितंबर 2022

बाते बस बाते बनाये जा रहे है

बाते बस बाते बनाये जा रहे है
मुल्क को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम कर दिया चंद दिन में 
फिर भी मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से
पर अब किस्से सुनाये जा रहे है

कोविड कभी डेंगू से मर गये है 
और ये भाषण सुनाये जा रहे है
 
लाखो मजदूर निकले थे घरो से 
उन पर डंडा बजाये जा रहे है
 
चेहरे पर शिकन नहीं है जरा भी
मौत के कारण गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना
ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

रौशनी से मन बहलाने वाला हूँ |

वो देखो न दूर किस कदर वो सूरज चमकता है 
मैं तुमको छोड़कर सूरज के साथ जाने वाला हूँ 
मत कहना की मैंने भी तो धोखा दे दिया तुमकों 
मैं भी अँधेरा छोड़ रौशनी से मन बहलाने वाला हूँ |

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे हैदरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है
दरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |

हम तो लुटते रहे हर वक्त हर चौराहे पर
वो हर चौराहे पर ही दूकान लिए बैठे है |

हम बने सीढियां तो मीनार तक वो पहुचे
हम तो सीढ़ी रह गए वो महान बने बैठे है |

बड़े बड़े थे वादे सबकी कहानी बदलेगी
हम पत्थर भी नहीं वो भगवान बने बैठे है |

लावारिश होते कई लोगो को हमने देखा है
स्वयंभू भगवान आज बे पहचान बने बैठे है |

संविधान की कसम खा उसके ऊपर बैठ गए 
राजा नहीं बनोगे तुम हम संविधान लिए बैठे है 




*   *   *    *     *     *      *      *      *   *

इतना भी मत इतराओ की आज सूरज हो
सब दफ्न होते है वो शमसान हमने देखा है |

हमारा क्या जमी पर गिर के वही रह जायेंगे
आसमां से गिरे को लहूलुहान हमने देखा है |

कर सको तो नीव की ईंटो की भी क़द्र करो
वर्ना जमीदोज होते कई मकान हमने देखा है |

बुधवार, 24 अगस्त 2022

दिल नाराज़ है

दिल नाराज़ है 

परसों खाना खाया ही था 
कि
दिल नाराज़ हो गया 
बोला ख़ुद खा लेते हो 
और 
मुझे भूखा छोड देते हो 
मेरा ध्यान ही नही रखते 
चलो मैं रूठ गया 
फिर भी मैंने अनदेखा किया
तो कल फिर नाराज़ हुआ 
और 
आज दिल के डाक्टर के पास आ गया हूँ 
दिल की नाराजगी दूर करने को 
देखे इस डाक्टर से ख़ुश होता है 
या इसे कोई और डाक्टर चाहिए ।

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी 
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है 

वो अकेले बुजुर्ग इंसान 

बहुत दिनो क्या सालो से 

जानता हूँ उन्हें मैं 

और 

बहुत अच्छी है उनसे पहचान 

पहले उनका घर भरा भरा था 

फिर 

धीरे धीरे खाली होता चला गया 

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे 

अचांनक अकेले हो गए वो 
कभी बैठने लगे मेरे साथ 

और बताने लगे 

अपनी पूरी बात 

पहले 

उनके पास बहुत लोग आते थे 

जब वो कुछ थे 

और बहुत लोग 

उनकी उंगली पकड़ कर 

क्या क्या हो गए 

तब तो हालत ये थी 

किसी के घर मौत भी
 
हुयी हो 

तो फोन करता था 

की आप जल्दी आइये 

अर्थी उठने वाली है 

आप का ही इन्तजार है 

शादी हो या कुछ 

कितने लोग बुलाते थे 

वो लोग जो कहते थे कि  

आप का ज्ञान रौशनी देता है 

और आप के बिना तो 

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता 

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए 

अब कोई नहीं आता 
कोई नहीं बुलाता 

सबको बना दिया 

पर ये जहा के तहा रह 

गए 

जब कोई उनका अपना 

धोखा देता या 

कर देता पीठ पर वार 

तो ये रहते थे बहुत दुखी 

और बेक़रार 

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में 

पर 

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो 

मैने देखा है 

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने 

पर जब अपने साथ थे 

क्या मजाल उनके चेहरे पर 

शिकन भी आई हो कभी 

लेकिन 

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे 

जब से अकेले हो गए वो 

उनके बच्चे भी चले गए दूर 

अपनी अपनी जरूरी वजहों से 

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ 

बहुत प्यार करते है 

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी 

पर मजबूरिया अपनी जगह है 

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में 

अक्सर देखता हूँ 

उन्हें सुबह बाहर निकल कर 
लान से 

तुलसी की पत्तियां तोड़ते 

बताते है 

की उनसे अच्छी चाय 

कोई नहीं बना सकता है 

सेंक लेते है ब्रेड और 

काट लेते है कोई फल 

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है 

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है 

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा 

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते 

मैंने कहा 
क्यों खुद करते है ये सब 

और इस उम्र में 

बोले कसरत भी है 
और पैसे की बचत भी 

मैंने पुछा की आप को क्या कमी 

तो बस मुस्करा कर रह गए 

मंगाते है खाना है कभी कभी 

शायद दो दिन में एक बार 

मैंने पूछा की आप को तो 

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी 

बोले खाना ज्यादा होता है

और 

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है 

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है 

और 

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में 

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है 

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे 

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा 

और 

नए नए पकवान खाऊंगा 

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न 

और 

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता 

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा 

कभी कभी बहुत खुश होते है 

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा 

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर 

और सब तैयारी में लगे रहते है 

कई दिन तक 

फिर जब तक बच्चे साथ होते है 

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन 

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक 

कुछ गुनगुनाते रहते है 

और 

बच्चो के यहां से आने के बाद भी 

कई दिन उदास होते है 

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ 

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है 

बज जाती है तभी घंटी 

कौन देखे की कौन है 

और 
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है 

कभी दूध गर्म करते है 

और बाहर कोई आ गया 

और दूध गिर जाता है पूरा 
चाय भी 

कभी सब्जी जल जाती है 

तो कभी रोटी खाक हो जाती है 

पुछा की फिर क्या करते है आप 

बोले अगर दिन में होता है 
तब तो हो जाता है 

पर जब रात में जल जाती है 

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना 

या अगर ब्रेड है तो वो 

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है 

और 

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है 

हल्का हल्का 

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना 

की मैं भूखा भी सोता हूँ 
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है 

परेशांन रहने लगेंगे 

उन लोगो के खुश रहने 

और मस्त रहने के दिन है 

उस दिन बहुत दुखी थे 

मैंने पुछा क्या हुआ 

बोले 

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है 

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ 

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है 

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ 

और 

फिर जोर से ठठाकर हँसे 

और चल दिए 

मैंने कहा कहा चले 

बोले किसी और को ढूढने 

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो 

कभी कभी जब बीमार हो जाते है 

तो दिखलाई नहीं पड़ते 

मिले तो पुछा क्या हो गया था 

बोले कुछ नहीं 

बताओ और क्या हो रहा है 

बहुत कुरेदा 

तो बोले मेरा दुःख तो 

कोई बाँट नहीं सकता 

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख 

तो बाँट सकता हूँ 

आइये कुछ अच्छी बाते करे 

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे 

मैंने पुछा आज क्या हुआ 

बोले एक चिंता है 

मुझे कुछ हो गया तो 

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को 
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे 

और खुला रखना भी मुश्किल है 

और 

उनकी आँखों से टपक गया कुछ 

बाँध जो रुका था काफी दिनों से 

शायद टूटना ही चाहता था 

कि

वो इधर उधर देखने लगे 

और खांसने लगे 

खुद को रोकने को 

और मुझे भरमाने को 

फिर धीरे से उठ कर चले गए 

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग 

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है 

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ 

और 

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा  

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव 

और 

सुनुगा उनका खोखला ठहाका 

और फिर मैं भी सर झुका कर 

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा 

अपने घर की तरफ 

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

शनिवार, 13 अगस्त 2022

अच्छे दिन

मेरी व्यंग कविता का आनंद लीजिये ---

मोदी जी ने डुगडुगी बजवाया 
पूरे देश में मुनादी करवाया 
की अब तो अच्छे दिन आ गए है
चारो और ख़ुशी के बादल छा गए हैं 
सब पंद्रह पंद्रह लाख पा गए है 
खाने से लेकर सब्जी तक और 
डालर के दाम बहुत नीचे आ गए है 
चीन हमारी जमीन छोड़ भाग गया है 
पाक ने उस कश्मीर से बिस्तर बांध लिया है 
क्या क्या बताऊ और क्या क्या दिखाऊ 
बाहर निकलिए देखिये और 
अपने हिस्से का अच्छा दिन ले जाइये 
हमारे ऊपर अब सवाल मत उठाइए 
ये सुन कर सब गरीब और बेकार जागे
अपना अपना थैला उठा कर बाहर भागे 
पूछ आये हर संघी और भाजपाई दुकान पर 
हर संघी और भाजपाई के मकान पर 
कि भाई जी अच्छा दिन कहा है 
सचमुच किसी को कही दिखा है                   
हर कोई कुटिलता से मुस्करा रहा था 
बेचारा गरीब उदास हो वापस जा रहा था
और अच्छा दिन 
अदानी अम्बानी के महलो में ठहाके लगा रहा था

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

हां जीवन इसको कहते है |

जिंदगी 

कब होगी पहचान हमारी 

इतने सालो से है दूरी 

क्या मजबूरी 

जिन्दा तो है 

पर क्या सचमुच 

क्या जीवन इसको कहते है 

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू  

नीद नहीं और पेट में हलचल 

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ 

बस अन्धकार है 

क्या जीवन इसको कहते है 

जीवन कब हमको मिलना है 

या फिर ऐसे ही विदा करोगे 

कुछ तो सोचो 

हम दोनों क्या जुदा जुदा है 

कुछ तो बोलो 

और भविष्य के ही पट खोलो 

या फिर कह दो 

हां जीवन इसको ही कहते है | 

जींना है तो हंस कर जी लो 

या फिर दर्द गरल को पी लो 

तेरे हिस्से में बस ये है 

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ 

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ 

चल अब सो जा 

अच्छे सपनो में आज तो खो जा 

कल फिर मुझसे ही लड़ना है 

हां जीवन इसको कहते है |

रविवार, 31 जुलाई 2022

नई सज़ाएं

क्या कोई सत्ता 
और 
न्याय मिलकर 
ऐसी नई सज़ाये 
शुरु कर सकते है ? 
जीभ काट देने की सज़ा ? 
आंख फोड देने की सज़ा ? 
कलम तोड़ देने की सज़ा ? 
कीबोर्ड हटा देने की सज़ा?  
अक्षर खत्म कर देने की सज़ा ?
अशिक्षित रहने की सज़ा ?
दिमाग निकाल लेने की सज़ा ? 
वो सत्ता किसकी होगी 
वो न्याय किसका होगा 
आतंकित है मानवता 
उसकी कल्पना से भी 
उसकी सम्भावना से भी ।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

रहम कर मौला

दिल ,दिमाग़ ,कलम कीबोर्ड
साथ नही दे रहा है कुछ भी 
बहुत कुछ बोलना चाहता हूँ 
पर आवाज फँस जा रही है 
जब भी कलम उठाता हूँ 
अपने बोझ से गिर पडती है
दिल में जो झांकता  हूँ 
तो बस अंधेरा दिखता है 
दिमाग़ पर ज़ोर देता हूँ 
सर ज़ोर से फटने लगता है 
कीबोर्ड पर उँगलिया रखता हूँ 
तो उँगलियाँ झुलस जाती है 
ये क्या दौर आ गया है मौला 
रहम कर रहम कर रहम कर ।

रविवार, 24 जुलाई 2022

नदी में तैरती लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।

हमको उंगली दिखा रहे है

आदरणीय Udaypratap Singh  जी की चार पंक्तियाँ पढ कर हमने भी लिख दिया चार ही पंक्तियाँ---

गलत जा रहे थे और गलत जा रहे है 
टोका तो हमको   उंगली दिखा रहे है 
गड्ढे मे गिरोगे   चमचे ताली बजाएंगे 
हम तो दुखी होंगे और आसू बहायेंगे ।

शनिवार, 23 जुलाई 2022

एलान कर दो कि डर गए हो



एलान कर दो कि डर गए हो 

ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने ग़ुलामी मान ली है 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सब डर गए हो  
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि सबने सोचना बंद कर दिया है 
ख़ुद ही एलान का दो 
कि अब कोई सवाल नही पूछेगा 
ख़ुद ही एलान कर दो 
कि अब कोई चुनाव नही चाहिए 
चुन लिया है इसी आका को 
जब तक वो चाहे तब तक के लिए 
तुम्हारे पास और कोई चारा नही है 
तमाम क़ानूनी ग़ैर क़ानूनी हाथ 
लपकने को तैयार है
और कसने को तुम्हारी गर्दनो को 
मार दिए जागोगे तुम 
या सड़ा दिए जागोगे 
किसी काल कोठरी में 
इसलिए एलान कर दो 
अपनी गर्दनो को टूटने से पहले 
किसी काल कोठरी में जाने से पहले 
कि सब लोग डर गए हो 
और तैयार हो 
साहब हुज़ूर के रास्ते का 
पावड़ा बनने को सदा के लिए ।

शनिवार, 25 जून 2022

राम तुम मत आना

राम तुम मत आना

उन्होने कहा 
जय श्रीराम बोल
वो बोला 
जय श्रीराम 
उन्होने कहा 
हनुमान की जय बोल 
वो बोला 
हनुमान की जय 
वो जो कहते रहे 
वो बोलता रहा 
वो बोलता रहा
जय श्रीराम 
और 
हनुमान की जय 
और 
राम के भक्त 
उसे 
लगातार पीटते रहे 
जब तक 
वो बोलता रहा 
कितना दर्द हुआ होगा न
जब 
इतने लोगो ने 
इतने घंटो तक 
मारा होगा उसे 
क्या दर्द का 
बिल्कुल भी एहसास 
नही हुआ होगा 
उन लोगो को 
जो खुद को 
हिन्दू कहते है 
क्या सचमुच 
ये लोग हिन्दू है 
हिन्दू तो चींटी को 
बचा कर चलता है 
की 
कही मर न जाये 
ये कौन से हिन्दू है 
अब वो अब 
सांस ही नही ले रहा था 
तो 
उन्होने भी 
बोलना बन्द कर दिया 
जय श्रीराम 
और 
हनुमान की जय 
वो तो 
बोलने लायक ही नही बचा था 
भाग खड़े हुये 
राम का नाम लेकर 
वध करने वाले 
हा वध शब्द का ही 
प्रयोग किया था 
गांधी को मारने वालो ने 
और 
गोली खाकर 
गांधी ने भी तो कहा था 
हे राम हे राम 
नही 
ये अब हे राम नही 
बल्कि 
जय श्रीराम बोलते है 
ताकी कही गांधी के 
अनुयायी न कहलाये 
पर 
वो तो 
भाग ही नही पाया  
बिन बुलायी मौत से 
जो 
उस राम के नाम से आई 
जिसने 
अधर्म को खत्म किया 
धर्म के लिए 
पर धर्म के नाम पर भी 
कभी अधर्म होगा 
कहा सोचा होगा 
राम ने
जीते राज 
उन्होने युद्द मे 
पर 
दे दिये 
वही के लोगो को 
राज पाने के लिए 
उनके नाम का उपयोग होगा 
कहा सोचा होगा 
राम ने 
अब उसकी विधवा 
जो अभी 
जल्दी ही 
ब्याही गयी थी
अहिल्या की तरह 
पत्थर बन गयी है 
की 
कौन होगा 
अब सहारा 
किसके साथ बीतेगा जीवन 
कितना चीखी होगी वो 
उसकी बेजान लाश देखकर 
कई बार तो 
बेहोश हो गयी होगी 
फिर पानी डाल कर 
उठाया गया होगा उसे 
वो फिर पछाड़ मार मार 
गिर जाती होगी 
क्या 
उसे मारने वालो ने 
ऐसे दृश्य नही देखा होगा 
अपने घरो पर 
और 
नही देखा होगा 
विधवा हुयी किसी 
बहन और बेटी को 
अचानक 
और बूढे हो गये मा बाप को 
बेसहारा हो गये 
अबोध बच्चो को 
क्या नही आते वो दृश्य 
कभी 
इन लोगो की आंखो मे 
राम को भी तो 
बाँट दिया इन लोगो ने 
जो 
उसके खाने मे 
आते ही नही 
कि 
उम्मीद करे की 
इस युग मे भी 
आयेंगे राम 
और 
उद्धार कर देंगे 
उसकी बुत बन गयी 
विधवा का ।
वैसे भी राम 
अब आते ही कहा है 
चाहे 
कितना भी अधर्म हो 
पर 
अब तो राम 
खुद ही खतरे मे है 
क्या पता 
कि 
वो पढाये पाठ 
सही और गलत का 
धर्म और अधर्म का 
और 
उनका नाम लेने वाले 
उन्हे ही राम विरोधी 
और
राष्ट्र विरोधी बता दे
और 
जय श्रीराम का नारा
लगाती हुयी भीड़  
राम का ही बध कर दे 
इसलिये राम !
तुम बिल्कुल मत आना 
अपने भक्तो वाले 
इस देश मे 
और इस युग मे ।

शुक्रवार, 24 जून 2022

गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

बाते बस बाते बनाये जा रहे है
मुल्क को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम कर दिया चंद दिन में 
फिर भी मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से
पर अब किस्से सुनाये जा रहे है

कोविड कभी डेंगू से मर गये है 
और ये भाषण सुनाये जा रहे है
 
लाखो मजदूर निकले थे घरो से 
उन पर डंडा बजाये जा रहे है
 
चेहरे पर शिकन नहीं है जरा भी
मौत के कारण गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना
ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

गुरुवार, 23 जून 2022

मैं मैं हुँ और तुम तुम हो ।

तुम पढ़ लो 
वो कविता 
जो 
मैंने लिखा ही नही 
तुम देख लो 
वो चित्र 
जो 
मैंने बनाया ही नही 
तुम बस जाओ 
उन साँसों में 
जो 
मैंने ली ही नही 
तुम आ जाओ 
मेरे घर में 
जो 
कही है ही नही 
पर 
तुम आ सकते हो 
सपने में मेरे 
जिसकी 
सुबह याद नही रहती 
छोड़ो सब 
आ जाओ 
और बैठ जाओ 
मेरे सामने ताकि 
निहार सकूँ मैं तुम्हें 
जब तक 
मैं मैं हुँ और तुम तुम हो ।

मंगलवार, 21 जून 2022

बरसें तो हरसे

आख़िर लखनऊ में भी मौसम की ग़रीबी से मुक्ति मिलती दिख रही है । आख़िर लखनऊ में भी आ गयी है बदली की कुछ टुकड़ियाँ 
आख़िर लखनऊ में हवाओ की तपिश हुयी ठंडी 
आख़िर लखनऊ में सूरज को परे धकेला दिया बदली ने 
पर ये बदली छलावा है या सचमुच भरी पूरी बदली 
ये तपती हुयी धरती को भिगो देगी भरपूर पानी से 
या फिर तवे पर छन्न की आवाज की तरह टपकेगी 
पर उम्मीदों ने एहसास को भिगो ही दिया है 
अब बरसे तो हम हरसे वरना फिर कुछ दिन तरसे । 

बुधवार, 8 जून 2022

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

मंगलवार, 31 मई 2022

एकाकीपन

बहुत उदास है दिन 
राते तो उदास ही है
काफी दिनों से 
पर आगोश में नीद के 
उदासी खो जाती है कही 
पर दिन की उदासियाँ 
और एकाकीपन 
इनसे जूझना नहीं आता 
अपने से भाग जाने की 
कला नहीं सीख पाया मैं 
अभिमन्यु की तरह 
एक कला से महरूम 
रह गया मैं भी 
वो चक्रव्यूह तोड़ने को 
था आतुर 
और मैं तलाश रहा हूँ 
कोई चक्रव्यूह 
जिसमें एकाकीपन और 
उदासी का एहसास न हो ।

मंगलवार, 17 मई 2022

रोज की जिंदगी और ये घर ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा  

हा 
मुझे बचपन से गुस्सा आता था 
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से 
मुझे गुस्सा आता था 
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक 
मैं ट्रेन के दरवाजे पर 
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था 
की
भीड़ ज्यादा है तो  
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते 
मुझे गुस्सा आता था जब कोई 
दूसरों के मैले को उठा कर 
सर पर लेकर जाता था 
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर 
किसी को खाना दिया जाता था 
गुस्सा आता था 
जब सायकिल के हैंडिल पर 
दो बाल्टियां 
और 
पीछे कैरियर पर मटका रख 
दो मील दूर पानी लेने जाता था 
शहर में 
गुस्सा आता था 
जब गांव जाने के लिए 
मीलो सर पर बक्सा रख कर 
चलना पड़ता था अंधेरे ने 
गुस्सा आता था 
जब गांव में बिजली भी नही थी 
गुस्सा आता था 
जब पुलिस अंकल किसी को 
बिना कारण बांध कर ले जाते थे 
माँ बहन की गालियां देते हुए 
और 
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था 
पर किसी भी चीज को 
बदल सकने की ताकत नही थी 
इस बच्चे में 
उसके बाद भी 
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज 
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ 
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं 
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था 
पर खुद शिकार हो गया 
हर बात पर जिस पर 
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए 
मुझे तो गुस्सा आता रहा 
और 
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया 
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर 
और 
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया 
पर 
ताली पिटती भीड़ में 
खो गया मेरा गुस्सा 
और में भी खो गया साथ साथ 
पानी पीकर या पानी के बिना 
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा 
संसद हो या मुम्बई 
मेरा गुस्सा सड़क पर आया 
लॉटरी हो या शहादत 
सड़क पर फूटा गुस्सा 
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी 
नही रोक सकी मेरे गुस्से को 
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता 
भी बने मेरे गुस्से के कारण 
मुझे आज भी गुस्सा आता है 
बार बार बदलते कपड़ो पर 
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर 
पिटती विदेश नीति 
और अर्थव्यवस्था पर 
रोज शहीद होते सैनिको पर 
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर 
रोज के बलात्कार पर 
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर 
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर 
इंच इंच में होते अपराध पर 
थाने से तहसील होते हुये 
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर 
भाषणों के खेप पर 
आसमान छूती महंगाई पर 
न जाने कितनी चीजे है 
गुस्सा होने को 
पर अब 
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और 
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता 
और 
आवाज के दबने पर उफान मारता है 
पर 
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद 
और साधारण आवाज 
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर 
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर 
और दीवारों के बीच 
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए 
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी 
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए 
जो मेरे पास नही है 
और 
चाहिए धन काफी धन 
जो मंच सज़ा सके 
,रथ बना सके 
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है 
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने 
कोई कविता या कुछ विचार 
ताकि गुस्सा 
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

गुरुवार, 12 मई 2022

उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश 

मेरा प्यारा है सबका प्यारा है सबसे न्यारा है

मेरा प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश  

भारत की ये शान है हा भारत की ये जान है 

ये भारत का मान है ये भारत की पहचान है

ये आन बान और शान है मेरा ये उत्तर प्रदेश

मेरा प्यारा है सबका प्यारा है सबसे न्यारा है  

उत्तर प्रदेश ------------ 

हम भारत के वासी है पर पास हमारे काशी है 

हम भारत के वासी है पर कान्हा के ब्रजवासी है

हम भारत के वासी है वो  राम मेरे बनवासी है 

देवो ने भी चुना जिसे हम है वही प्रदेश उत्तर प्रदेश  



बुधवार, 11 मई 2022

मौत और अकेलापन

मौत और अकेलापन 
________________
मौत कितनी 
खूबसूरत चीज होती है 
हो जाता है 
सब कुछ शांत शांत 
गहरी नींद 
तनावमुक्त ,शांत शांत 
न किसी का लेना 
न किसी का देना 
कोई भाव ही नही 
कोई इच्छा ही नही 
न डर ,न भूख ,न छल 
न काम न क्रोध 
बस शांति ही शांति 
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा 
और सब देख रहे है 
न रोटी की चिंता 
न बेटे और बेटी की 
न घर की चिंता 
न बिजलो और पानी की 
न बैंक की चिंता 
न टैक्स जमा करने की 
न काम की चिंता 
और न किसी छुट्टी की 
न किसी खुशी की चिंता 
न किसी की नाराजगी की 
निर्विकार ,स्थूल 
हल्का हल्का सब कुछ 
देखो 
कितना सपाट हो गया है चेहरा 
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को 
गजब का तेज लग रहा है 
बहुत कुछ है खूबसूरत 
पर मौत से तो कम 
और मुझे तो 
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन 
सन्नाटा ही सन्नाटा 
कोई आवाज ही नही 
खुद की सांसो के सिवाय 
कोई भी नही खुद के सिवाय 
पंखे के आवाज तो 
कभी कभी फोन की 
और 
हा दब गया रिमोट 
तो टी वी की भी आवाज 
तोड़ देती है सन्नाटा 
और 
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर 
गजब का मुकाबला है 
मौत और अकेलेपन का 
हा
एक फर्क तो है दोनो में 
मौत खूबसूरत होती है 
पर अकेलापन बदसूरत 
मौत शांत होती है 
पर अकेलापन 
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में 
लौट कर किसी ने नही बताया 
उसका अनुभव 
पर 
अकेलेपन को तो 
मैं जानता भी हैं 
और पहचानता भी हूँ 
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है 
और 
अकेलेपन का अंत मौत । 
इसलिए 
मौत से डरो मत उसे प्यार करो 
अकेलेपन से हो सके तो भागो 
और 
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

रविवार, 24 अप्रैल 2022

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

सोमवार, 18 अप्रैल 2022

लिखते है नयी इबारत

चलो धूल डालते है 
कुछ विचारो पर 
भावनाओ पर 
रिश्तों पर 
और ढक देते है 
बहुत सी यादे ।
भूल जाते है वो कदम 
जो हम साथ चले थे 
लिखते है नयी इबारत 
और नया मुस्तक़बिल ।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

हुक्मनामे

आये दिन ये जो
हुक्मनामे फेंके जा रहे है 
आप के वजूद पर
आप के चिन्तन पर  
ताकि 
सीख जाओ आप 
तानाशाही मे जीना 
अंधे और मूर्खतापूर्ण
आदेशो को मानना 
और 
जब जब आका कहे 
घरो मे कैद रहना 
शायद खिड़किया भी
सील हो जाये एक दिन
और दरवाजे भी 
आका के बटन दबाने से
ही खुले सब 
दिमाग मत चलाओ 
जुबान मत हिलाओ 
पर सर हिलाओ 
जैसे आका कहे 
हाँ तो हा, ना तो ना ।

सोमवार, 21 मार्च 2022

हांके पर चलने वाली भेडे बनाओ

किसी भी तरह से 
सबको डराओ 
क्योकी 
जो नही डरते 
वो सत्ता के लिए 
खतरा बन जाते है 
और 
डरे हुये लोग 
गुलामी मान लेते है 
बस यूँ ही 
इसलिये ऐसे या वैसे 
कैसे भी 
आवाम को डराओ 
उन्हे जीता जागता 
इन्सान मत रहने दो 
उन्हे 
हांके पर चलने वाली 
भेडे बनाओ 
और फिर जैसा चाहो
वैसा राज चलाओ ।

सोमवार, 14 मार्च 2022

एक चांद उगा देंगे हम चाहे जहा कही


शाम ढली थी और थोडी सी रात हुयी 
बहुत दिनो के बाद चांद से बात हुयी ।
कुछ रूठा सा चाँद अकड के बैठ गया 
कितना निहारा करता था चन्दा को  मैं 
गाँव देहरी या शहर का का आंगन था 
पर जाने फिर क्या हुआ दोस्ती टूट गयी 
जीवन के संघर्ष या फिर टूटा मन था 
याद किसे आती है चांद सितारो की 
जब रोटी ही चांद दिखाई पडती हो 
और सितारे नमक मे पड़े  दिखते हो 
जब भूख पेट की ख़ुद से याचना करती हो 
बच्चो की फीस उन्हे अपमानित करती हो 
पत्नी की कोशिश फटी साड़ियाँ ढकने की 
जब पूरा दिन जब मुफ्त इलाज खा जाता हो 
जब धक्कों से ही अपने जीवन का नाता हो 
छत भी छीनने का खतरा सर पर लटका हो 
तो कौन देखता चांद तुम्हे और कब देखे 
तुमने भी क्या किया अपने इस प्रेमी का 
जो बड़े देवता बने हुये तुम फिरते हो 
नही शिकायत का हक तुमको बिल्कुल है 
कहा देखना था तुमको थे तुम याद कहा 
वो तो यूँ ही बस नजर उठ गयी ऊपर को 
कि बादल मे क्या चमक रहा है देखो तो 
आंख मिल गयी तुमसे तो तुम ऐंठ गये 
लेके किस्सा देखा देखी का बैठ गये 
जाओ जाओ हमको भी अब परवाह नही 
एक चांद उगा देंगे हम चाहे जहा कही 
अब तुम नही मेरे बच्चे है चांद मेरे
तुम भी हो पर मेरे बच्चो के बाद मेरे ।

रविवार, 13 मार्च 2022

सभी रंगों को मिला कर होली मनाओ

सभी रंग अपने है 
वो लाल हो ,केसरिया हो 
हरा हो या नीला 
बैगनी हो या पीला 
या जो भी हो 
जिसे जो पसंद 
वो लगालो 
दूसरे को पसंद 
तो उसपर भी डालो 
पर 
उसमें कोई खतरनाक चीज न हो 
और न इरादे हो खतरनाक 
जी हां खूब खेलो रंग और गुलाल 
पर न हो धरती खून से लाल 
ऐसा समाज बना लो 
जी हां 
ये इतने सारे रंगों का नाम ही 
हिंदुस्तान है 
जहा एक ही रंग है वो मिस्र ,अफगानिस्तान 
और पाकिस्तान है ।
क्या वो एक रंग पसंद है 
या ये हिंदुस्तानियत का रंगारंग 
आप गले मिलो 
पर नफरत के खंजर को फेंक कर आओ 
हां आओ सभी रंगों को मिला कर होली मनाओ

गुरुवार, 3 मार्च 2022

इसी को युद्ध कहते है ।

अजीब बात है 
दो देशो के जवान 
जो एक दूसरे को 
जानते तक नही है 
पहचानते नही है
कोई लड़ाई नही है 
उनकी आपस मे 
पर वर्दी पहन ली 
तो खूँन बहा रहे है 
एक दूसरे का 
जानी दुश्मन बन कर 
जी इसी को शायद 
युद्ध कहते है ।

रविवार, 27 फ़रवरी 2022

युद्ध की खेती

राम कृष्ण बुद्ध 
मुहम्मद और ईसा 
नही खत्म कर पाये 
मानव के विनाश का युद्ध
ईसा को छोड सब 
खुद भी तो युद्धरत रहे 
और बो गये 
भले बुरे के नाम पर 
युद्ध की खेती 
जो हजारो साल से
फैलती ही जा रही है 
कौन मिटायेगा 
हर भाषा से 
ये शब्द "युद्ध "?

युद्ध खत्म होगा

युद्ध खत्म होगा
और बैठ जायेगा
एक मेज पर 
हमेशा खत्म हुआ है 
कोई युद्ध नही चला 
अनंत काल तक
पर 
उसकी त्रासदी रहती है
अनंत काल तक 
मा पिता की आंख
सूनी रहती है 
अनंत काल तक 
पत्नी की मांग 
उजडी रहती है 
अनंत काल तक
बच्चो का सर 
बिना साये के रहता है 
अनंत काल तक 
मानवता ही नही 
लहू से सिंचित जमी 
रोती है अनंत काल तक ।

बुधवार, 23 फ़रवरी 2022

जीवन मृगमरीचिका है

जीवन केवल मृग मरीचिका है 
विचार कुलांचे भरते रहते है 
रेगिस्तान के पानी के 
एहसास के साथ 
भागता रहता है इंसान 
और 
पानी के लिए तड़प 
दौड़ाती रहती है 
यहां से वहां तक
वहां से वहाँ तक ।
कोई साथी हो 
जो चिकोटी काट कर 
यथार्थ के धरातल पर उतार दे 
और 
वो भी नही है 
तो भटकन अनन्त है ।

सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

हैपी वलेंटाइन डे

अकेले बैठे है 
पर
अकेले कहा 
दीवारें है 
और 
छत भी 
बिस्तर है 
और 
टीवी भी 
लैपटॉप को 
कैसे भुलाये 
इनमे से अपना 
वेलेंटाइन 
किसे बनाये 
किसको दे 
कोई फूल 
और 
कह दे धीरे से 
हैप्पी वेलेंटाइन डे ।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

खुद की लाश ढोना

कुछ लाशे कितनी भारी होती है 
उठाना मुश्किल हो जाता है 
और 
बार बार कंधे बदलने पडते है 
या 
फिर गाडी पर ले जाना पडता है 
पर 
खुद की लाश को ढोना तो 
कितना मुश्किल होता है ।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

ये दिल हुवा वीरान सा क्यों है ।

भीड़ इतनी है आसपास पर 
मन में ये तूफ़ान सा क्यों है 
मुस्कराते हुए चेहरे है सब है
हर कोई अनजान सा क्यों है ।
कोई अपना सा लगा ही क्यों
फिर ये बियाबान सा क्यों है 
आशंकाए इतनी क्यों तारी है
मन में ये शमसान सा क्यों है ।
छोड़ कर लौट चला है आशिक
टूटा हुवा और बेजान सा क्यों है ।
कोई तो अपना सहारा भी होगा
ये दिल हुवा वीरान सा क्यों है ।

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

ये आदमी है या पिटठू ?

निकल पडते है 
सुबह ही पिटठू टागे 
न जाने कितने लोग 
कन्धे झुके पीठ झुकी 
चेहरा सपाट भावहीन 
पिटठू मे ही होता है 
उनका पूरा ऑफिस 
उनका टिफिन 
और पानी 
उनके अरमान
उनका भविष्य 
उनकी जवाबदेही 
घर से बाहर तक की
कही पैदल 
तो 
कही साइकिल पर 
कही बाइक पर 
तो कही बस मे 
कही लोकल मे 
कभी 
इन्हे गौर से निहारो 
क्या ये आप के अपनो जैसे ही है 
कभी 
इन्हे प्यार से पुकारो 
क्या ये सुन पाते है आवाज 
या बस भाग रहे है 
जिन्दगी की जद्दो-जहद मे 
मजदूर भी हंस लेता है पर ये नही 
मजदूर गा लेता है 
पर ये नही 
मजदूर अपने मन से भी जी लेता है 
पर ये नही 
कौन है ये लोग 
जिनकी पीठ पर 
लाद दिया है भारी बोझ 
नई अर्थव्यवस्था ने 
नई पढाई ने 
और 
आज के परिवारो ने 
बस किसी तरह 
इतना तो कमा लो 
कि 
शाम को लौट कर 
दो रोटी खिला दो 
और खुद भी खा लो 
इनकी पहचान क्या है 
ये आदमी है या पिटठू ? 

मर जाने का पर कुछ नही बताने का ।

ये नया फरमान है 
नये जमाने का 
कितना भी दर्द हो 
किसी को 
कुछ नही सुनाने का 
रख दे कोई गर्दन पर 
और 
कोई सीने पर पाँव 
फिर भी नही चिल्लाने का
ना दिल न भाव तुम पत्थर हो 
बस इतना समझं जाने का 
चाहे घुट कर मर जाने का 
पर हरगिज़ नही बताने का ।

कन्धे पर बोझ

पीठ पर बोझ टाँगे 
वो भटकता है 
सुबह से शाम तक 
इस दरवाजे से 
उस दरवाजे तक 
लोगो की चीजे पहुचाते 
डांट खाते 
देर होने पर 
अपना पैसा कटवाते 
डांट खाता है 
घर वालो की भी 
देर हो जाने पर 
और उस दिन का 
घर का सामान नही लाने पर 
और पैसा कट गया 
किसी की शिकायत पर 
ये भी बताने पर 
सो जाता है 
पेट मे डांट पचा कर 
क्योकी 
कल सुबह फिर निकलना है 
कन्धे पर घर की
जिम्मेदारियो का बोझ लेकर ।

शनिवार, 8 जनवरी 2022

जाति का नशा

जाति का नशा -----

पहले मैं समझता था 
कि 
सबसे बड़ा नशा 
धर्म का होता है 
मैं गलत था 
जाति के नशे का 
कोई मुकाबला नही 
इस नशे में डाकुओ के 
गाने गाए जाते है
उसकी जाति की शादियों में 
उसी जाति के किसी शहीद
या 
महान साहित्यकार
अथवा वैज्ञानिक के प्रति 
ये दीवानगी नही देख पाएंगे आप 
पर ऐसी जातियाँ भी खास ही है ।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

उतना अघाते है ।

कुछ बड़े लोग है
जो प्रेम और इज्जत से 
पहले घर बुलाते है 
फिर 
आहिस्ता से धीमे जहर का 
इंजेक्शन लगाते है 
आप जितना तड़पते हो 
वो उतना अघाते है ।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

देश को कायर बना दो

पूरे देश को कायर बना दो 
और 
सिखा दो कि 
बंद का आदेश होते ही 
बंद हो जाना है 
अपने अपने पिजडे मे 
ताकि निर्द्वन्द चर सके कुछ लोग 
मुल्क को चरागाह समझ कर 
और 
तुम बादशाह बने रह सको 
और हर पल पोशाक बदल कर 
देश के बदलने की 
डीँग हांक सको 
ताकि तुम अकेले 
महंगे जहाज 
और महंगी गाडी मे 
चल बता सको 
कि  
पूरा मुल्क अमीर हो गया है 
ताकि तुम 
सैकडो करोड के घर मे रह 
सबको ऐसे होने की बात कह सको 
ताकि 
हजारो करोड के नये दफ्तर की 
ऊंचाई से देख सको मुल्क 
जिसमे बस तुम और
तुम्हारे दरबारी ही दिखलायी पड़े 
और 
इश्तहार छप सके 
कि 
भारत तो चमक है तुम्हारी आँखो मे 
पर पर पर पर पर 
जाने ही देता हूँ 
क्योकी इतिहास मे 
कई बार हो चुका है ।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

इंतज़ार है इंतज़ार है इंतज़ार है

गर्म हवायें बहुत तपिश थी 
कितनी काली अंधियारी थी 
जुल्म ज़्यादती शोषण कितना 
और ग़ुलामी की ज़ंजीरे 
फिर वो रोटी बटी हर जगह 
गोली और धमाके गूंजे 
बिन तैयारी ही था सब कुछ 
थाली में थे गए परोसे ख़ुद के बेटे 
टुकड़े टुकड़े में ख़त्म हुआ सब 
हाँ गोली तो फेल हो गयी 
पर बोली को जगा गयी थी 
बहुत दिनो की चुप्पी थी फिर 
फिर गूंजा था जोश सभी का 
फिर आया था होश सभी को 
पर बाक़ी वो भूल नही की 
एक लँगोटी वाला आगे 
पीछे पूरा देश चला था 
ये हथियार कुछ नया नया था 
दुनिया हतप्रभ दुश्मन हतप्रभ 
इस हथियार का ना जवाब था 
पर जुल्मों का ना हिसाब था 
करो या मरो का नारा था 
चौरी चौरा ने रोक दिया ये 
फिर न कभी ये दोबारा था 
ना मारेंगे ना मानेगे 
युद्ध का नया ये नारा था 
सत्य अहिंसा का प्रयोग था 
सत्याग्रह और असहयोग था 
जिसका सूरज ना डूबा था 
चली अहिंसा डूब गया वो 
छटा अंधेरा सूरज निकला
आज हवाये कुछ ठंडी थी 
पर बँटवारे की आबाजे 
कान के पर्दे फाड़ रही थी 
धरती अपनी चिंघाड़ रही थी 
फिर फ़क़ीर ही निकला बाहर 
जान हथेली पर फिर लेकर 
कैसे कैसे थी शांति आयी 
पर बहुतो को कहा थी भाई 
वहाँ प्रार्थना हाथ जुड़ा था
आतंकी सामने खड़ा  था
जिसने कल तक साँस न ली थी 
उसने गोली खूब चलायी 
इंगलिश गोली इंगलिश पिस्टल
हाँ कायर को खूब थी भाई 
फिर से सूरज डूब गया था
फिर हवाये गर्म हुयी थी 
आज का मौसम फिर वैसा है 
वही अंधेरा वही कालिमा 
पर फ़क़ीर वो नही यहाँ है 
अब मौसम को कौन बचाए 
कौन उगाए फिर सूरज को 
ठंडी हवाये कौन चलाए 
इंतज़ार है इंतज़ार हाँ इंतज़ार है ।

बहुत दिनो से

बहुत दिनो से 
चिडिया ना चहकी आंगन मे 
बहुत दिनो से 
कोयल ना कूकी पेड़ो से 
बहुत दिनो से 
मोर नही नाचा सावन मे 
बहुत दिनो से 
ना फूल खिला है मेरे मन मे 
क्या है ये सब 
सफर अन्त का 
या मुरझाता मन 
तन तो भला भला दिखता है 
पर शायद मन घायल है 
बहुत दिनो से 
कोई गाना याद न आया 
बहुत दिनो से 
यादे भी तो कुंद पडी है 
बहुत दिनो से 
सारी घडिया बंद पडी 
बहुत दिनो से 
सभी खिड़कियां बंद पडी है 
दरवाजे से हवा रोशनी 
सब बाहर है 
बतियाए तो किससे आखिर 
खिसियाये तो किस पर आखिर 
सलवट जितनी है बिस्तर पर 
उससे ज्यादा मन कर भीतर 
बहुत दिनो से ।

और सोचने मे क्या जाता है

सोचता हूँ 
मैं फिर बच्चा हो जाऊ 
जो कुछ नही जानता 
सोचता हूँ 
उड़ जाऊँ नील गगन मे 
पक्षी बन कर 
सोचता हूँ 
खूब खाऊँ
परेशान हो जाऊँ 
सोचता हूँ 
खूब चलूँ 
और थक जाऊँ 
कि नीद आ जाये 
शान्त शान्त गहरी 
सोचता हूँ 
भाग जाऊँ 
अपने से दूर कही 
जहा कोई जानता न हो 
सोचता हूँ 
रम जाऊँ 
किसी भी इश्क मे 
की रश्क न रहे 
पर 
ये भी क्या जिन्दगी 
न ये किया न वो किया 
एलान कर दूँ 
कि सब किया हा सब किया 
सोचता हूँ 
फिर से 
पकड लाऊं 
खोया हुआ हमसफर 
और फिर बंद हो जाऊँ 
अपने दिल के राजमहल मे ।
और 
सोचने मे क्या जाता है ।