रविवार, 27 फ़रवरी 2022

युद्ध की खेती

राम कृष्ण बुद्ध 
मुहम्मद और ईसा 
नही खत्म कर पाये 
मानव के विनाश का युद्ध
ईसा को छोड सब 
खुद भी तो युद्धरत रहे 
और बो गये 
भले बुरे के नाम पर 
युद्ध की खेती 
जो हजारो साल से
फैलती ही जा रही है 
कौन मिटायेगा 
हर भाषा से 
ये शब्द "युद्ध "?

युद्ध खत्म होगा

युद्ध खत्म होगा
और बैठ जायेगा
एक मेज पर 
हमेशा खत्म हुआ है 
कोई युद्ध नही चला 
अनंत काल तक
पर 
उसकी त्रासदी रहती है
अनंत काल तक 
मा पिता की आंख
सूनी रहती है 
अनंत काल तक 
पत्नी की मांग 
उजडी रहती है 
अनंत काल तक
बच्चो का सर 
बिना साये के रहता है 
अनंत काल तक 
मानवता ही नही 
लहू से सिंचित जमी 
रोती है अनंत काल तक ।

बुधवार, 23 फ़रवरी 2022

जीवन मृगमरीचिका है

जीवन केवल मृग मरीचिका है 
विचार कुलांचे भरते रहते है 
रेगिस्तान के पानी के 
एहसास के साथ 
भागता रहता है इंसान 
और 
पानी के लिए तड़प 
दौड़ाती रहती है 
यहां से वहां तक
वहां से वहाँ तक ।
कोई साथी हो 
जो चिकोटी काट कर 
यथार्थ के धरातल पर उतार दे 
और 
वो भी नही है 
तो भटकन अनन्त है ।

सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

हैपी वलेंटाइन डे

अकेले बैठे है 
पर
अकेले कहा 
दीवारें है 
और 
छत भी 
बिस्तर है 
और 
टीवी भी 
लैपटॉप को 
कैसे भुलाये 
इनमे से अपना 
वेलेंटाइन 
किसे बनाये 
किसको दे 
कोई फूल 
और 
कह दे धीरे से 
हैप्पी वेलेंटाइन डे ।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

खुद की लाश ढोना

कुछ लाशे कितनी भारी होती है 
उठाना मुश्किल हो जाता है 
और 
बार बार कंधे बदलने पडते है 
या 
फिर गाडी पर ले जाना पडता है 
पर 
खुद की लाश को ढोना तो 
कितना मुश्किल होता है ।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

ये दिल हुवा वीरान सा क्यों है ।

भीड़ इतनी है आसपास पर 
मन में ये तूफ़ान सा क्यों है 
मुस्कराते हुए चेहरे है सब है
हर कोई अनजान सा क्यों है ।
कोई अपना सा लगा ही क्यों
फिर ये बियाबान सा क्यों है 
आशंकाए इतनी क्यों तारी है
मन में ये शमसान सा क्यों है ।
छोड़ कर लौट चला है आशिक
टूटा हुवा और बेजान सा क्यों है ।
कोई तो अपना सहारा भी होगा
ये दिल हुवा वीरान सा क्यों है ।

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

ये आदमी है या पिटठू ?

निकल पडते है 
सुबह ही पिटठू टागे 
न जाने कितने लोग 
कन्धे झुके पीठ झुकी 
चेहरा सपाट भावहीन 
पिटठू मे ही होता है 
उनका पूरा ऑफिस 
उनका टिफिन 
और पानी 
उनके अरमान
उनका भविष्य 
उनकी जवाबदेही 
घर से बाहर तक की
कही पैदल 
तो 
कही साइकिल पर 
कही बाइक पर 
तो कही बस मे 
कही लोकल मे 
कभी 
इन्हे गौर से निहारो 
क्या ये आप के अपनो जैसे ही है 
कभी 
इन्हे प्यार से पुकारो 
क्या ये सुन पाते है आवाज 
या बस भाग रहे है 
जिन्दगी की जद्दो-जहद मे 
मजदूर भी हंस लेता है पर ये नही 
मजदूर गा लेता है 
पर ये नही 
मजदूर अपने मन से भी जी लेता है 
पर ये नही 
कौन है ये लोग 
जिनकी पीठ पर 
लाद दिया है भारी बोझ 
नई अर्थव्यवस्था ने 
नई पढाई ने 
और 
आज के परिवारो ने 
बस किसी तरह 
इतना तो कमा लो 
कि 
शाम को लौट कर 
दो रोटी खिला दो 
और खुद भी खा लो 
इनकी पहचान क्या है 
ये आदमी है या पिटठू ? 

मर जाने का पर कुछ नही बताने का ।

ये नया फरमान है 
नये जमाने का 
कितना भी दर्द हो 
किसी को 
कुछ नही सुनाने का 
रख दे कोई गर्दन पर 
और 
कोई सीने पर पाँव 
फिर भी नही चिल्लाने का
ना दिल न भाव तुम पत्थर हो 
बस इतना समझं जाने का 
चाहे घुट कर मर जाने का 
पर हरगिज़ नही बताने का ।

कन्धे पर बोझ

पीठ पर बोझ टाँगे 
वो भटकता है 
सुबह से शाम तक 
इस दरवाजे से 
उस दरवाजे तक 
लोगो की चीजे पहुचाते 
डांट खाते 
देर होने पर 
अपना पैसा कटवाते 
डांट खाता है 
घर वालो की भी 
देर हो जाने पर 
और उस दिन का 
घर का सामान नही लाने पर 
और पैसा कट गया 
किसी की शिकायत पर 
ये भी बताने पर 
सो जाता है 
पेट मे डांट पचा कर 
क्योकी 
कल सुबह फिर निकलना है 
कन्धे पर घर की
जिम्मेदारियो का बोझ लेकर ।

शनिवार, 8 जनवरी 2022

जाति का नशा

जाति का नशा -----

पहले मैं समझता था 
कि 
सबसे बड़ा नशा 
धर्म का होता है 
मैं गलत था 
जाति के नशे का 
कोई मुकाबला नही 
इस नशे में डाकुओ के 
गाने गाए जाते है
उसकी जाति की शादियों में 
उसी जाति के किसी शहीद
या 
महान साहित्यकार
अथवा वैज्ञानिक के प्रति 
ये दीवानगी नही देख पाएंगे आप 
पर ऐसी जातियाँ भी खास ही है ।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

उतना अघाते है ।

कुछ बड़े लोग है
जो प्रेम और इज्जत से 
पहले घर बुलाते है 
फिर 
आहिस्ता से धीमे जहर का 
इंजेक्शन लगाते है 
आप जितना तड़पते हो 
वो उतना अघाते है ।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

देश को कायर बना दो

पूरे देश को कायर बना दो 
और 
सिखा दो कि 
बंद का आदेश होते ही 
बंद हो जाना है 
अपने अपने पिजडे मे 
ताकि निर्द्वन्द चर सके कुछ लोग 
मुल्क को चरागाह समझ कर 
और 
तुम बादशाह बने रह सको 
और हर पल पोशाक बदल कर 
देश के बदलने की 
डीँग हांक सको 
ताकि तुम अकेले 
महंगे जहाज 
और महंगी गाडी मे 
चल बता सको 
कि  
पूरा मुल्क अमीर हो गया है 
ताकि तुम 
सैकडो करोड के घर मे रह 
सबको ऐसे होने की बात कह सको 
ताकि 
हजारो करोड के नये दफ्तर की 
ऊंचाई से देख सको मुल्क 
जिसमे बस तुम और
तुम्हारे दरबारी ही दिखलायी पड़े 
और 
इश्तहार छप सके 
कि 
भारत तो चमक है तुम्हारी आँखो मे 
पर पर पर पर पर 
जाने ही देता हूँ 
क्योकी इतिहास मे 
कई बार हो चुका है ।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

इंतज़ार है इंतज़ार है इंतज़ार है

गर्म हवायें बहुत तपिश थी 
कितनी काली अंधियारी थी 
जुल्म ज़्यादती शोषण कितना 
और ग़ुलामी की ज़ंजीरे 
फिर वो रोटी बटी हर जगह 
गोली और धमाके गूंजे 
बिन तैयारी ही था सब कुछ 
थाली में थे गए परोसे ख़ुद के बेटे 
टुकड़े टुकड़े में ख़त्म हुआ सब 
हाँ गोली तो फेल हो गयी 
पर बोली को जगा गयी थी 
बहुत दिनो की चुप्पी थी फिर 
फिर गूंजा था जोश सभी का 
फिर आया था होश सभी को 
पर बाक़ी वो भूल नही की 
एक लँगोटी वाला आगे 
पीछे पूरा देश चला था 
ये हथियार कुछ नया नया था 
दुनिया हतप्रभ दुश्मन हतप्रभ 
इस हथियार का ना जवाब था 
पर जुल्मों का ना हिसाब था 
करो या मरो का नारा था 
चौरी चौरा ने रोक दिया ये 
फिर न कभी ये दोबारा था 
ना मारेंगे ना मानेगे 
युद्ध का नया ये नारा था 
सत्य अहिंसा का प्रयोग था 
सत्याग्रह और असहयोग था 
जिसका सूरज ना डूबा था 
चली अहिंसा डूब गया वो 
छटा अंधेरा सूरज निकला
आज हवाये कुछ ठंडी थी 
पर बँटवारे की आबाजे 
कान के पर्दे फाड़ रही थी 
धरती अपनी चिंघाड़ रही थी 
फिर फ़क़ीर ही निकला बाहर 
जान हथेली पर फिर लेकर 
कैसे कैसे थी शांति आयी 
पर बहुतो को कहा थी भाई 
वहाँ प्रार्थना हाथ जुड़ा था
आतंकी सामने खड़ा  था
जिसने कल तक साँस न ली थी 
उसने गोली खूब चलायी 
इंगलिश गोली इंगलिश पिस्टल
हाँ कायर को खूब थी भाई 
फिर से सूरज डूब गया था
फिर हवाये गर्म हुयी थी 
आज का मौसम फिर वैसा है 
वही अंधेरा वही कालिमा 
पर फ़क़ीर वो नही यहाँ है 
अब मौसम को कौन बचाए 
कौन उगाए फिर सूरज को 
ठंडी हवाये कौन चलाए 
इंतज़ार है इंतज़ार हाँ इंतज़ार है ।

बहुत दिनो से

बहुत दिनो से 
चिडिया ना चहकी आंगन मे 
बहुत दिनो से 
कोयल ना कूकी पेड़ो से 
बहुत दिनो से 
मोर नही नाचा सावन मे 
बहुत दिनो से 
ना फूल खिला है मेरे मन मे 
क्या है ये सब 
सफर अन्त का 
या मुरझाता मन 
तन तो भला भला दिखता है 
पर शायद मन घायल है 
बहुत दिनो से 
कोई गाना याद न आया 
बहुत दिनो से 
यादे भी तो कुंद पडी है 
बहुत दिनो से 
सारी घडिया बंद पडी 
बहुत दिनो से 
सभी खिड़कियां बंद पडी है 
दरवाजे से हवा रोशनी 
सब बाहर है 
बतियाए तो किससे आखिर 
खिसियाये तो किस पर आखिर 
सलवट जितनी है बिस्तर पर 
उससे ज्यादा मन कर भीतर 
बहुत दिनो से ।

और सोचने मे क्या जाता है

सोचता हूँ 
मैं फिर बच्चा हो जाऊ 
जो कुछ नही जानता 
सोचता हूँ 
उड़ जाऊँ नील गगन मे 
पक्षी बन कर 
सोचता हूँ 
खूब खाऊँ
परेशान हो जाऊँ 
सोचता हूँ 
खूब चलूँ 
और थक जाऊँ 
कि नीद आ जाये 
शान्त शान्त गहरी 
सोचता हूँ 
भाग जाऊँ 
अपने से दूर कही 
जहा कोई जानता न हो 
सोचता हूँ 
रम जाऊँ 
किसी भी इश्क मे 
की रश्क न रहे 
पर 
ये भी क्या जिन्दगी 
न ये किया न वो किया 
एलान कर दूँ 
कि सब किया हा सब किया 
सोचता हूँ 
फिर से 
पकड लाऊं 
खोया हुआ हमसफर 
और फिर बंद हो जाऊँ 
अपने दिल के राजमहल मे ।
और 
सोचने मे क्या जाता है ।

पिछले कई दिनो से

पिछले कई दिनो से 
गले की आवाज फंस गयी है 
ठीक से निकलती ही नही
पिछले कई दिनो से 
कलम चलती ही नही 
लगता है पन्ना फ़ट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
किबोर्ड पर उंगली टिकती ही नही 
लगता है 
किबोर्ड जोर से दब कर टूट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
नीद ठीक से आई ही नही 
पूरी रात कुछ खौलता रहता है 
पिछ्ली कई दिनो से 
खाने मे स्वाद नही है 
किसी तरह ठूस लेता हूँ 
और निगल लेता हूँ 
मैं लड़ रहा हूँ जंग खुद से 
पिछले कई दिनो से 
कब खत्म होगी ये जंग ? 

मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

जवाब तुम दोगे

मेरा सवाल तुमसे है जवाब तुम दोगे 
मेरे मुल्क की गुरबत का हिसाब तुम दोगे
ये मुल्क सोने की चिड़िया हुआ करता था 
क्यो बिक रहा है सब  हिसाब तुम दोगे
तुम बादशाह हो हमारी मर्जी से वोटो से 
हमारा सौदा कैसे हुआ जवाब तुम दोगे
हमने तोड़ा था दुनिया औ पडोसी का गरूर
पडोसी घुस गया इसका जवाब तुम दोगे 
(कल पूरा करूँगा )

शरीर बेईमान है

ये शरीर भी कितना बेईमान है 
पर खुद को समझता महान है 
पर कही भी सरेंडर कर जाता है
कही अकड़ता कही शिथिल पड़ जाता है 
मच्छर भी काट ले तो बाप रे बाप 
कांटा भी चुभ जाये तो हाय ही हाय 
जरा सा टूट जाये तो औकात बताता है 
इश्क मे कदमो मे लेट जाता है 
नफरत मे अपनी औकात बताता है 
कितनी बड़ी बड़ी बाते बनाता है 
दूसरो से डरता है अपनो को सताता है 
बड़ी से बड़ी डीँग हाकता है 
मौका पडने पर लुढक जाता है 
जी हा पर शरीर तो शरीर है 
कोई मन ,दिल दिमाग और आत्मा तो नही 
जो इसे जैसे चलाते है वैसे चल जाता है 
शरीर बस पुतला है जिसमे दिल है 
शरीर एक अस्तित्व है जिसमे दिमाग है 
शरीर को बस शरीर ही रहने दो 
इसे कम्प्यूटर और गड़ित मत बनाओ 
इसका अपने दिमाग से प्रयोग करो 
और कुछ बुरा हो जाये यो भूल जाओ 
चलो शरीर का भरपूर उपयोग करो 
इसका जितना हो सके प्रयोग करो 
तभी शरीर शरीर रहेगा दौडेगा खेलगा 
जी हा इसकी भाषा को समझो तो 
फिर ये खूब खूब और बहुत खूब बोलेगा ।
अपने शरीर को खूब प्यार करो 
दूसरे के शरीर से भी मत इंकार करो ।
क्योकी शरीर नितांत क्षणभंगुर है जल जायेगा 
फिर क्या पता कब आप की किस्मत मे वापस आयेगा ।

गौरव के साथ चलते रहो ।

आप दलगत राजनीति छोड़ दे 
दल वाले आप को छोड़ देते है 
आप राजनीति छोड़ दे 
राजनीति वाले 
आप को छोड़ देते है 
आप नौकरी से बाहर 
तो वहाँ के रिश्ते खत्म 
आप काम के न हो 
और बोझ बन जाये 
तो सारे रिश्ते खत्म 
जी हा 
रिश्ते भी व्यापार है 
पूरा कारोबार है 
मुनाफे के साथ रहते है 
और घाटा छोड़ 
मुनाफे की तरफ बहते है 
ये मच्छर की तरह है 
जो लैम्प पोस्ट जल जाये 
सारे मच्छर उधर भाग जाते है 
आप का बुझ गया 
तो किस बात के नाते है 
इसलिए चाहे जो करो 
पयोगी रहो 
कही से भी तेल लाओ 
या बिजली 
पर जलते रहो 
फिर पूरी आभा 
पूरे गौरव के साथ चलते रहो ।

रविवार, 12 दिसंबर 2021

रिश्तो की डाल

पेड की डाले भी 
अपने पेड को भी 
घायल कर देती है 
कभी कभी 
जब चलता है 
कोई तेज अंधड़ 
तो
सबसे ज्यादा 
सबसे हल्के पत्ते 
साथ छोड़ते है पेड का 
फिर 
हल्की डाले टूट कर
अलग हो जाती है 
पर 
ज्यादा मजबूत डाल 
जो ज्यादा जुडी होती है 
खुद लटक जाती है 
और 
साथ ही छील देती है 
पेड के तने को भी 
जिससे जुडी होती है वो 
कई बार बहुत ज्यादा
मजबूत जुडी डाल तो
गिरती है तो 
पेड को चीर देती है 
बीचो बीच से 
फिर पेड कमजोर हो जाता है 
बच गया तो बच गया 
वरना दूसरा तेज अंधड़ 
पेड को भी जमीदोज कर देता है 
पेड की ये कहानी
जिन्दगी पर भी तो लागू होती है 
और 
इंसानी रिश्तो पर भी ।

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

कल हो या न हो

खुशी आंखो मे भरो 
चाहे कितने आसू 
लटके हो 
खुशी दिल मे भरो 
चाहे कितना घायल हो 
खुशी इच्छाओ मे भरो 
चाहे दम तोड गयी हो 
खुशी बातो मे भरो 
चाहे 
अन्दर से खोखली हो चुकी हो 
और ठठा कर हंसो 
चाहे आवाज फंस रहो हो 
गमो को कुचल दो 
फिलवक्त और सो जाओ 
खुशी के एहसास के साथ
नीद के आने का पल जी लो  
क्योकी 
पता नही कल हो या न हो ।

बदबू न आये और कुत्ता वफादार रहे

नाम वाले अक्सर 
बहुत अकेले होते है 
उनका नाम होता है 
उनके अकेलेपन का कारण
और 
कई बात 
वो स्वयं शिकार होते है 
गलतफहमी के 
कितने पर्दे पर चमकने वाले 
मर गये लावारिश 
और 
वो प्रोफेसर साहब 
जिन्हे फख्र था 
कि 
हजारो उनके पढाये 
रहते है इस शहर मे 
और वो गाँव नही गये 
वही बस गये 
वो जो रहते थे 
अपने कुत्ते के साथ 
और वो हीरोइन भी तो 
ये सब मर गये लावारिश 
एक न एक दिन 
और 
पडोसियो ने भी नही देखा 
कि 
क्यो नही दिखे बाहर
खिडकी पर 
या बालकनी मे 
कई दिन से 
पर ये सच नही 
कि उन्होने नही देखा 
देखा पास जाकर 
सभी ने 
जब सब 
बदबू से परेशान हुये 
जो उठ रही थी 
सड़ी हुयी लाश से 
कितना प्यार करता था
उनका कुत्ता उनको 
और 
कितना बफादार था 
पर उसको भी 
भूख लगती है 
नही मिला भोजन 
तो खा लिया 
अपने प्यारे मालिक
या मालकिन को ही 
सचमुच कितना अकेला
हो गया है 
हर शक्स इस दुनिया मे 
किसी का कोई नही 
और नाम वाले तो 
खैर सचमुच 
बहुत अकेले होते है 
और अभिशप्त होते है 
लावारिश मौत के लिये
तब जो है ही अकेले
और सधनविहीन बेनाम भी 
वो तो और भी न जाने
किस किस चीज के लिये
अभिशप्त होते है
पर मौत से पहले 
बाहर निकल कर
चिल्ला सकने का मौका
तो होना ही चाहिए 
या 
सड़ने से पहले
शरीर और अंग 
दान दे देने का 
ताकि बदबू से पडोसी
परेशान न हो 
और 
अगर कुत्ता है साथ मे 
भूख के कारण 
उसकी वफादारी कलंकित न हो ।

अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो

पहले अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो 

ऐ पढने लिखने वालो उठो 
ऐ कविता करने वालो उठो 
ऐ नाटक करने वालो उठो 
सब मंच सजाने वालो उठो 
सब कलम चलाने वालो उठो 
सब दिमाग लगाने वालो उठो 
सब आवाज उठाने वालो उठो 
कि 
कोई तुमारे अनंत नील गगन 
और तारो को छीन न ले 
उठो की चन्द्रमा तुम्हारा ही रहे 
प्रेम के लिये प्रेरित करता रहे 
उठो कि सूरज पर 
कोई अधिकार न जमा ले
और वो सबको रोशनी देता रहे 
उठो की हवाए 
किसी की कैद मे न हो 
स्वतंत्र चलती रहे 
उठो की हरियाली 
किसी की जागीर न हो
सबकी हो 
उठो की फूलो को 
खिलने से रोका न जा सके 
और सब फूल सब रंग
गुलजार करते रहे बगीचे को 
उठो की नदिया 
कोई सोख न ले 
और वो बहती रहे निरंतर
स्वछ और निर्मल 
उठो की आज़ादी महफ़ूज रहे 
उठो की जम्हूरियत 
किसी की जूती न बने 
उठो की लव खामोश न हो 
उठो तो तुम्हारी धड़कन
और तुम्हारी सांसे 
तुम्हारी ही हो 
उठो कि दुनिया 
अब शमसान न बने 
उठो की चंगेज स्टालिन
हिटलर मुसोलिनी 
अब कोई इन्सान न बने 
उठो अपनी आन बान
शान के लिये उठो 
उठो मानवता और 
दुनिया के लिये उठो 
पहले अपने हिन्दूस्तान
के लिये उठो ।

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

जो आये थे भिखारी बन कर मुझसे मांगने

जो आये थे भिखारी बन कर मुझसे मांगने 

मैं देखता रह गया वो मुझे कंगाल कर गया  

वो घिसी चप्पल में कितना मजलूम लगता था 

बड़ा मजबूर लगता था बडा मासूम लगता था 

जब मारा पीठ में खंजर मुझे बेहाल कर गया 



शनिवार, 27 नवंबर 2021

खाली हाथ बिना जेब जल जाना है

आज शमशान घाट पर 
बैठा देख रहा था 
और सोच रहा था 
जीवन का सच 
वो पैसे के पीछे भागते रहे 
बहुत कमाया 
पर 
जीवन तो नही बचा पाये 
उन्होने लकडी ली ढेर सारी 
और 
घी के कनस्तर के कनस्तर उडेल दिये 
पर चिता बड़ी मुश्किल से 
बड़ी देर मे जली 
और 
वो बस किसी तरह जला पाया 
पर चिता धधक कर जल उठी 
कितने कन्धे थे उसके साथ जो गरीब था 
पर सिर्फ नौकर साथ थे 
जो अमीर था 
शमशान भी समाज का आइना है 
कोई औरत या बेटी अकेली 
या दो ले आते है अपने को 
ठेल पर डाल कर 
और 
गिड़गिड़ाते है मदद को 
तो किसी की भीड
भर देती है शमशान को 
यद्द्पि जलते दोनो है 
लकडी मे 
पर 
किसी के पास चन्दन 
तो किसी के पास कुछ भी नही 
शमशान भी गैर बराबरी का स्थान है 
समाज दिखता है यहा 
और समाज का सच 
जिन्दगी का सच तो होता ही है 
कि 
खाली हाथ बिना जेब 
नंगे जल जाना है यहा सभी को ।

भविष्य पढो

इतिहास पढ कर क्या करोगे 
भविश्य पढो 
उसी मे हित है सबका 
मानवता का 
समाज का 
और 
देश तथा दुनिया का 
इतिहास पढो 
तो 
केवल इसलिये 
कि 
किन कारणो से 
मानवता को कष्ट हुआ 
मानवता का नाश हुआ 
बस वो नही होने देना है ।

सोमवार, 22 नवंबर 2021

संघर्ष ही जीवन है

कुछ लोग 
संघर्ष करते है 
जीवन भर 
जीवन के लिये
और 
एक छत के लिये  
जो संघर्ष 
खा जाता है
आधी जिन्दगी 
कुछ लोग 
संघर्ष करते रहते है 
अपनी ही दीवारो से
अपनी बनाई छत से 
बचे हुये जीवन भर
उनका जीवन जीवन कहा 
बस संघर्ष होता है ।

रविवार, 21 नवंबर 2021

अंग भी बोलते है कभी

हम कितना बोलते है रोज 
और 
हमारा शरीर सुनता है और 
मानता है हर बात 
पर 
कभी कभी शरीर का कोई अंग 
थोडा सा बोल देता है 
तो 
नही सुन पाते है हम 
और 
किस कदर पस्त हो जाते है ।
फिर दवाई चीर फाड और 
पता नही क्या क्या ।

चिडिया उड़,मैना उड़ ।

हम दोनो खेलते थे 
अपने बच्चो के साथ 
चिड़िया उड़ तोता उड़ 
मैना उड़ घोडा उड़ 
उंगली उठा कर उड़ा देते थे 
या उगली रखी रह जाती थी 
हार जाता था कोई 
घोडा हाथी उड़ पर 
पर उस दिन 
हार गये हम सब 
उंगली नही 
साथी ही उड़ गया 
अनंत आकाश मे 
देह को छोड़ कर 
और 
तब से चिडिया ने 
उड़ना बंद कर दिया 
उगली स्थिर हो गयी 
जहा की तहा 
तब से नही खेला 
चिडिया उड़,मैना उड़ ।

शनिवार, 20 नवंबर 2021

भगवान नाराज होंगे

मैने कुछ लोगो को 
बातो मे बता दिया 
कि 
किस तरह 
तमाम लोगो ने 
मेरा इस्तेमाल किया 
और 
फिर धोखा दिया 
पीठ पर वार किया 
तो 
उन बेचारो ने भी 
तय किया 
कि 
वो भी इस विधान 
और 
परम्परा को क्यो टूटने दे 
भगवान नाराज होंगे ।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

टूटा पत्ता

पेड़ से टूटता है पत्ता 
उड़ता है इधर से उधर 
गिरता है जमीन पर 
हरा होता है 
तो 
कोई जानवर खा जाता है 
सूख जाता है 
तो 
रौद दिया जाता है पैरो से 
और 
मिट्टी मे मिल जाता है 
पेड़ से टूटती है डाल 
सूख जाती है कुछ दिन मे 
पतली होती है 
या कमजोर होती है 
तो जला दी जाती है 
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है 
बना दी जाती है 
कुछ न कुछ 
किसी के बैठने को 
या 
सजावट की चीज बन जाती है 
घर से भागने वालो 
और 
इस पत्ते या डाल मे 
क्या फर्क होता है ?
कुछ भी नही न ।

चल पडूंगा पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ--

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और 
अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और 
अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए 
खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना 
वक्त से
और 
अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और 
बुरी का आहत कर देना 
और 
चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और 
कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और 
कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 7 नवंबर 2021

गोवर्धन और कृष्ण

कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन
बचाने को उन लोगो को 
जिनको खड़ा कर दिया था 
सबसे बडी सत्ता के खिलाफ 
बस यही तो कहा था कृष्ण ने 
कि 
उसे क्यो भोग लगाते हो 
जो खाता ही नही है 
जिसे भूख ही नही है 
और 
उदर भी नही है 
केवल वास लेता है वो 
उसे खिलाओ 
जिसे भूख है 
जिसे जरूरत है
लाओ मुझे खिलाओ 
मैं खाऊंगा 
कितना कमजोर था देवत्व 
की 
तुरन्त हिल जाता था उनका आसन 
और 
कितना क्रोध भरा था इनमें 
कैसे और क्यो देवता माने इन्हें
जो सहज इंसान भी नही 
बरसा दिया क्रोध 
उन सभी पंर 
जिन्हें खड़ा किया था कृष्ण ने 
सत्य के साथ 
पर 
कृष्ण भी तो कृष्ण थे 
प्रेम किया तो खूब किया 
राजनीति किया तो खूब किया 
युध्द भी खूब करवाया 
खूब मरवाया
और 
खूब बचाया 
खड़े हो गए यहाँ भी कृष्ण 
अपनो के साथ 
और 
उठा लिया गोवर्धन 
अपनी छोटी सी उंगली पर 
वो छोटी सी उंगली 
और 
उतना बड़ा पहाड़ 
कैसे टिक पाया होगा 
और 
कैसे उठाया होगा 
कितनी दुखी होगी 
उनकी उंगली 
शायद आज भी दर्द 
हो रही वो उंगली 
पर 
असम्भव को संभव करने का नाम 
ही 
कृष्ण है शायद 
लगता है 
की वो पहाड़ नही 
बल्कि पुरुसार्थ रहा होगा 
संकल्प रहा होगा 
इरादा रहा होगा 
और 
अडिगता रही होगी 
और 
आंख में आंख डाल कर 
खड़े हो गए होंगे कृष्ण 
सबसे आगे 
उंगली उठाकर चुनौती देते हुए 
और 
उनके संकल्प के सामने 
नही टिक पाया होगा 
इतना उथला से इंद्र
और 
भाग खड़ा हुआ होगा 
खूब तालियां बजी होंगी 
नाचे होंगे लोग 
कृष्ण को उठा कर कंधे पर 
गोपिया रीझ गयी होंगी कितनी 
और 
देख रही होंगी कनंखियो से 
कृष्ण को 
कृष्ण ने भी जरूर देखा होगा 
अठखेलियाँ 
और 
मंद मंद मुस्कराए होंगे कृष्ण 
पर 
कृष तुम कितने लंबे विश्राम पर हो 
या 
अपने गुण , अपनी जिम्मेदारी 
भूल गयो हो 
देखो 
कितने नकली देव 
क्या क्या जुल्म कर रहे है 
तुम्हारे लोगों पर 
तुम्हारी गोपिकाओं 
तुम्हारे बच्चो से 
क्या क्या सलूक हो रहा है कृष्ण 
तुम इतने बेदर्द तो नही हो सकते 
की 
लोगो का दर्द ही भूल जाओ 
आ जाओ न कृष्ण 
भारत ही नही दुनिया को 
एक और महाभारत की जरूरत है 
और 
जरूरत हैं 
आज के संदर्भ में 
एक नए ज्ञान और उपदेश की 
कब आवोगे कृष्ण 
और 
ये महापर्वत कब उठावोगे 
अपने इरादे और न्याय की 
उंगली पर ।
आओ न कृष्ण , अब उठ जाओ 
आ भी जाओ न कृष्ण ।

रविवार, 31 अक्टूबर 2021

बचा सको तो बचाओ अपनो को

संजय दत्त हो या आर्यन
सब परिवारों मे 
समय न होने
आपसी बातचीत 
और
आपसी विश्वास नही होने
बड़े और समाज तथा
कानून से बड़े होने के
एहसास का नरीजा है
सावधान रहिये 
कल हम और आप 
किसी के भी घर मे हो सकता है 
बिना गुनाह मे शामिल हुये 
पूरे परिवार को 
गुनाहगार बनते देखा है मैने
वो गुन्डे के मा बाप हो 
या बलत्कारी के 
वो डकैत के पिता हो 
या झूठे किसी मामले मे
फंस गये बच्चे के 
इसलिए 
आंखे खोल कर रखो 
जितना ज्यादा बच सको
बचाओ
बचा सको तो बचाओ अपनो
को
सिखा सको सिखाओ
अपनो को बचना गुनाह से 
और गुनाह के झूठे आरोप से भी ।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

जिंदगी अपनो की अमानत है

जिन्दगी सिर्फ तुम्हारी नही 

लोग आत्महत्या कैसे कर लेते है 
कितना तकलीफदेह होता है 
जान कर जान देना
जहर पिया तो उसका डर 
गोली चलाने मे कांपते हाथ 
और 
उसके दर्द का एहसास 
नस काटी तो दर्द 
और 
बहते खूँन की दहशत 
और 
फासी लगाया तो कितनी हिम्मत 
गर्दन लटक जाने 
सांस घुट जाने की तकलीफ ।
कैसे हिम्मत आती है 
और 
कर लेने के बाद 
आखिरी क्षणो मे 
सब किया वापस हो जाये का 
ख्याल आता है क्या 
क्या तब जिन्दगी से 
प्यार महसूस होता है ?
क्या तब इच्छा होती है 
कि 
लड़ले अंतिम लडाई पर ये नही ।
क्या ये क्या वो 
पर ये सब बतायेगा कौन ?
न ये न वो ।
और 
पीछे छूटो का दर्द , 
असहाय स्थिति , 
अनिश्चित कल 
और 
मौन मौन बस मौन ।
मत करो ऐसा 
जिसका कोई जवाब नही 
जिसका कल कोई हिसाब नही ।
लडो और खूब लडो 
क्योकी जिन्दगी सिर्फ तुम्हारी नही 
अपनो की भी अमानत है ।

सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

राजनीति व्यापार हो गयी

राजनीति व्यापार हो गयी 
हर कोई माल कमाता है 
बाप ने कितनी मेहनत की 
और बेटा मौज उड़ाता है  ।

रविवार, 17 अक्टूबर 2021

मुल्क को बस सताए जा रहे है

बाते बस बाते बनाये जा रहे है

सभी को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम जिंदगी को कर दिया है 

बेशरम    मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से

अब  जुमले   बताये  जा रहे है

कोविड से तो लाखो मर गये थे  

ये  तो भाषण सुनाये जा रहे है 

लाखो मजदूर निकले थे घरो से 

उन पर डंडा बजाये जा रहे है 

चेहरे पर शिकन इनके कहा है 

मौत के वजहें  गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना

ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

 

मैंने कहा मिलते नहीं

मैंने कहा मिलते नहीं 

उसने कहा की क्यों मिले 

मैंने कहा बस चाय पर 

उसने कहा काफी पसंद 

मैंने कह वो ही सही 

उसने कहा रहने ही दो 

मैंने कहा ऐसा भी क्या 

उसने कहा ऐसा भी क्या 

कि ये भी सही वो भी सही 

टिकते नहीं तुम चाय पर 

तो भरोसा तुम पर क्यों 

कल भी टिकोगे या भगोगे 

मैंने कहा वादा रहा 

उसने कहा ज्यादा रहा 

जाने ही दो तुम भी चलो 

किसी और को देखो कही

उससे मिलो पर अब टलो 


 



शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

नदी में तैरती लाशें

नदी में तैरती लाशें 

जब लाइन लग गयी लाशों की
जब बोली लगने लगी लाशो की 
जब कंधे की क़ीमत हो गयी लाशो की 
जब लकड़ी ब्लैक होने लगी लाशो की 
जब टोकन मिलने लगे जलने को लाशो की 
तब
हाँ तब लाशें उठी और चल पड़ी 
नदियों की तरफ़ 
कि आग नही तो पानी ही सही 
जलेंगे नही तो कछुओं या किसी और 
जानवरों के भोजन के काम आ जाएँगे
आख़िर इनकी राख भी तो नदी में ही जाती है । 
वैसे भी कितना खर्च हो गया परिवारों का 
और खर्च को घर भी बिकवा दे क्या 
अपनो का 
और 
इन लाशो को तो अपने लेने ही नही आए 
लाश से रोग फैलता है 
पर लाश की सम्पत्ति और बैंक बैलेंस से नही 
इसलिए 
इन लाशों ने ख़ैरात से जलने से इनकार कर दिया 
और ख़ुद जाकर बह गयी नदी में 
किसी सरकार की कोई गलती नही 
गलती घर वाली की है 
की वो पैसे वाले क्यो नही 
और गलती लाशो की भी है 
की उसने अपनो को 
इतना कायर और स्वार्थी क्यो बनाया ।
नदी तो प्रतीक है इस व्यवस्था का 
और लाशें भारत की जनता का ।


सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

ये रस्सियाँ

ये रस्सियाँ ----

आज तक समझ मे नही आया 
कि 
क्यो औरतों को 
रस्सियो से बांध दिया जाता है 
उनके गर्दन मे रस्सी
उनकी कमर मे रस्सी 
उनके हाथ मे रस्सी 
और
उनके पांव मे रस्सी 
जो 
उनकी खूबसुरती को 
बदसूरत बना देती है 
वैसे तो 
कुछ कमजोर पुरुष भी
रस्सियो मे बंध जाते है
अपनी अज्ञानता से 
या फर्जी आस्था से 
पर 
क्या बनाया या बिगाडा
किसी का इन रस्सियो ने
सिवाय गुलाम बनाने के
पहले जानवर गुलाम बने और 
रस्सियो मे बंध गये 
और 
अब कुछ इन्सान भी
कब मुक्ति मिलेगी 
इन इन्सानो को 
इन रस्सियो से 
ये सवाल आज मेरा है 
पर कल सबका होगा 
जानवर भी 
कहा बधना चाहते है रस्सियो मे 
और कोशिश करते रहते है 
तोड देने की 
पर इन्सान ने तो
इन रस्सियो को 
खुशी से कबूल किया है 
तो 
इन्हे कब और कौन तोड़ेगा ? 
इन्सान स्वाभाविक
नैसर्गिक सुन्दरता के
साथ कब जिएगा ?

बुधवार, 15 सितंबर 2021

यादो की कागजी नावें

जब और जितनी बार भी 
अपने घर लौटता हूँ 
और 
दरवाजा खोलता हूँ 
बिजली सी कौंध जाती है 
और 
दीवारो पर बन जाती है 
अंनगिनत तस्वीरें 
और 
मन का बादल बरस उठता है 
लहरो पर तैर जाती है 
यादो की कितनी कागजी नावें 
और कागज की नाव 
तो कागज की ही होती है 
खो जाती है अथाह पानी में 
और 
पसर जाता है सन्नाटा
दीवारो से छत तक 
और 
बैठक से बिस्तर तक ।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

बहुत दिनो बाद आज

बहुत दिनो के बाद 
आज फिर उदासी ने घेर लिया 
बहुत दिनो के बाद 
आज अकेलेपन का एहसास हुआ  
बहुत दिनो के बाद 
आज मौन बहुत भारी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज किताबे कितना काट रही है 
बहुत दिनो के बाद 
आज किबोर्ड पर उंगली सुन्न हुयी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज आइना जैसे डर रहा है 
बहुत दिनो के बाद 
आज दीवारे कस कर बैठ गयी 
बहुत दिनो के बाद 
आज छत सर पर कितनी भारी है 
बहुत दिनो के बाद 
आज पौधे जलते से लगते है 
बहुत दिनो के बाद 
आज पांव घास मे झुलसे है 
बहुत दिनो के बाद 
आज खुद की लडाई खुद से है 
बहुत दिनो के बाद 
आज खुद से कितनी नफरत है 
पर जाये भी तो कहा कहा 
हर जगह यही सब होगा ना 
खालीपन बेबसी बेचारगी 
मरुस्थल का हिरन बन 
भागे भी तो कहा कहा 
संबल की प्यास लिये 
सब जगह बस बालू है 
झूठी सी आस लिये 
भागे भी तो कहा कहा 
बहुत दिनो के बाद 
आज बहुत अधीर हो 
थोडा सा रो लेगे 
बहुत दिनो के बाद आज 
थक कर कुछ सो लेंगे 
बस इस उम्मीद से कि
कल शायद अच्छा हो ।

सोमवार, 23 अगस्त 2021

दिल और दर्द

दिल है और दर्द है

दिल हँसता है

दर्द रोता है

जब दिल रोता है

तो दर्द हँसता है

और दोनों के बीच

कोई दर्द के कीचड में

धंसता है

वो मै हूँ या आप है

या और कोई

पर कहानी तो सच्ची है

दिल की और दर्द की ।

जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

तन है ,मन है और मस्तिस्क 

शरीर है ,दिल है और दिमाग 

दोनों एक ही है 

तन की तड़प अपनी है 

मन की तड़प अपनी है 

और मस्तिस्क की अपनी 

शरीर, दिल और दिमाग की 

भी यही ,दोनों एक है ना ,

शरीर कुछ चाहता है 

मन रोक नहीं पाता 

और मस्तिस्क भी 

मन कुछ चाहता है 

और शरीर साथ नहीं देता 

मस्तिस्क विद्रोह कर देता है 

कभी कभी 

मस्तिस्क रास्ते तय करता है 

मन विचलित हो जाता है 

और शरीर अलग चला जाता है 

लड़ते रहते है तीनो ज्यादातर 

कभी कभी ही तीनो एक ही 

दिशा में चलते है 

और जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा

मैं मर भी जाऊं तो क्या होगा 
शायद अगर हुआ तो 
चार कंधे 
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले 
कुछ क्षण की 
कुछ सिसकियाँ 
कुछ कहानिया 
कुछ शिकायतें 
कुछ झूठी अच्छाइयां 
बहुत सी बुराइयाँ 
क्या किया जीवन में 
बेकार था कुछ न किया 
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया 
नालायक था कुछ नहीं किया 
बार बार बोर होकर भी 
दोहराई जाती वही कहानियां 
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ कुछ कम हुआ 
लो तेरही भी आ गयी 
ये भी खर्च कवाएगी 
कोई रिश्तेदार रुक न जाये 
चलो सब चले गए 
अब देखो कहां क्या क्या है 
बाट लो किसका क्या है 
और 
चल पड़ेगी जिंदगी 
अपने अपने रस्ते पर 
एक कोने में टंगी तस्वीर 
साल में एक बार शायद 
बदलेगी माला 
और हाथ जोड़ कर भागते हुए लोग 
आज तो देर हो गयी इस चक्कर में 
पता नहीं क्यों बने है ये रिवाज 
इसलिए 
मेरे लिए मेरी वसीयत है 
की 
कोई नहीं रोयेगा 
बिजली में जला देना मुझे 
किसी नदी में नहीं बहाना मुझे 
मैं नहीं मानता कोई पूजा इसलिए 
न कोई पूजा और न उठावनी तेरही 
अगले ही पल से सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो 
मेरे लिए न कभी कोई पारेशान हुआ 
न किसी को होना है 
वर्ना मैं परेशान हो जाऊंगा 
कुछ नहीं है मेरे पास
की कोई लडे की किसका क्या 
बस मेरी यादे कभी क्रोध लायेंगी
की नालायक बाप ने कुछ नहीं किया 
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी 
कुछ नहीं होगा 
सब जैसे था वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही मेरी वसीयत है 
जो किसी काम नही आएगी 
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ 
कोई फर्क नहीं पड़ता 
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और मैं भी चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा 
शायद लावारिश होकर 
की किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

शनिवार, 7 अगस्त 2021

हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा

निकल पड़ें जब भी आज़ाद झोंके की तरह 
हाँ शोर मचाएंगे और मशहूर हो जायेंगे हम 
ये दस्तक है हमारी सुन लो गर बहरे भी हो 
वर्ना बेचैन करने वाला शोर बन जायेंगे हम ।

हमें मुर्दा समझते हो निकलेंगे मुट्ठिया बांधे हुए 
तुम देखते रह जावोगे और झंडा फहराएंगे हम 
हमें राख समझा है अन्दर की चिंगारी नहीं देखा 
हाँ देखोगे उदासी से जब शोला बन जायेंगे हम ।

अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो पेट की 
अभी आगाज है अब भी आवाज सुन लो खेत की 
अभी आगाज़ है फुटपाथो पर अब  नजर कर लो 
जमीन पर जब गिरोगे तुम खुश हो मुस्करायेंगे हम ।

रविवार, 25 जुलाई 2021

ईश्वर कैसा होता है

कितने महान है वो लोग
जो पत्थरो से सर मारते है 
और 
मानते है कि  
पत्थर चमत्कार करता है 
हा 
सच है की पहली आग 
लकड़ियो की रगड़ से 
या 
पत्थरो के टकराने से ही पैदा हुई 
पर 
उसका कारण तो वैज्ञानिक है 
उसमे चमत्कार कुछ भी नही 
और 
किसी अन्य लोक की
ताकत भी कुछ भी नही
मेरी दुवा है आप सबको कि 
सर टकराते रहो 
पर जरा सम्हाल कर
सर से खूँन निकलता है और
फिर उसे रोकने को
दवाई ,मरहम पट्टी 
और 
डाक्टर की जरूरत पडती है 
अगर अधिक निकल गया 
तो 
शायद कही और जाकर
हो सकता है 
दर्शन हो ही जाता हो परमात्मा का
पर तय नही 
क्योकि 
किसी ने लौट कर बताया नही 
कि ईश्वर कैसा होता है ।

जमाने जैसा हो गया हूँ

मिटा दिए है वो तमाम नम्बर 
जो नही उठे मेरी ज़रूरत में 
या 
यूँ ही जब हाल जानना चाहा 
भुला दिए है तमाम वो नाम 
जिन्हें मैं याद नही आया कब से 
वो चेहरे भी धुंधले कर दिए मैंने
जिन्होंने फेर ली निगाहें मुझसे 
हा 
अब मैं भी जमाने जैसा हो गया हूँ ?

हम कुम्भकर्ण है

लोकतंत्र खत्म हो जाये
हमको क्या 
संविधान खत्म हो जाये
हमको क्या  
तानाशाही आ जाये
हमको क्या 
जुबान सिल दिया जाये
हमको क्या 
हम भारत है 
पहले भी गुलाम हो गए
क्या फर्क पडा 
आज़ादी के लिए जो लड़े मरे
हमको क्या 
हमे बस थोडा सा खाना
थोडे से कपडे 
और 
एक कमरा मिल जाये 
और 
हम टीवी देखते खाते
सोते उसी मे दफन हो जाये
अभी हम सो रहे है
आवाज देकर 
जगावो मत हमे
हम इन्सांन नही कुम्भकर्ण है  ।

शनिवार, 24 जुलाई 2021