शुक्रवार, 24 जून 2022

गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

बाते बस बाते बनाये जा रहे है
मुल्क को बस सताए जा रहे है

जहन्नुम कर दिया चंद दिन में 
फिर भी मुस्कराये   जा रहे है

वादे क्या किये थे तब सभी से
पर अब किस्से सुनाये जा रहे है

कोविड कभी डेंगू से मर गये है 
और ये भाषण सुनाये जा रहे है
 
लाखो मजदूर निकले थे घरो से 
उन पर डंडा बजाये जा रहे है
 
चेहरे पर शिकन नहीं है जरा भी
मौत के कारण गिनाये जा रहे है

गांधी को रोशनी दुनिया ने माना
ये गोडसे को चमकाए जा रहे है ।

गुरुवार, 23 जून 2022

मैं मैं हुँ और तुम तुम हो ।

तुम पढ़ लो 
वो कविता 
जो 
मैंने लिखा ही नही 
तुम देख लो 
वो चित्र 
जो 
मैंने बनाया ही नही 
तुम बस जाओ 
उन साँसों में 
जो 
मैंने ली ही नही 
तुम आ जाओ 
मेरे घर में 
जो 
कही है ही नही 
पर 
तुम आ सकते हो 
सपने में मेरे 
जिसकी 
सुबह याद नही रहती 
छोड़ो सब 
आ जाओ 
और बैठ जाओ 
मेरे सामने ताकि 
निहार सकूँ मैं तुम्हें 
जब तक 
मैं मैं हुँ और तुम तुम हो ।

मंगलवार, 21 जून 2022

बरसें तो हरसे

आख़िर लखनऊ में भी मौसम की ग़रीबी से मुक्ति मिलती दिख रही है । आख़िर लखनऊ में भी आ गयी है बदली की कुछ टुकड़ियाँ 
आख़िर लखनऊ में हवाओ की तपिश हुयी ठंडी 
आख़िर लखनऊ में सूरज को परे धकेला दिया बदली ने 
पर ये बदली छलावा है या सचमुच भरी पूरी बदली 
ये तपती हुयी धरती को भिगो देगी भरपूर पानी से 
या फिर तवे पर छन्न की आवाज की तरह टपकेगी 
पर उम्मीदों ने एहसास को भिगो ही दिया है 
अब बरसे तो हम हरसे वरना फिर कुछ दिन तरसे । 

बुधवार, 8 जून 2022

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

मंगलवार, 31 मई 2022

एकाकीपन

बहुत उदास है दिन 
राते तो उदास ही है
काफी दिनों से 
पर आगोश में नीद के 
उदासी खो जाती है कही 
पर दिन की उदासियाँ 
और एकाकीपन 
इनसे जूझना नहीं आता 
अपने से भाग जाने की 
कला नहीं सीख पाया मैं 
अभिमन्यु की तरह 
एक कला से महरूम 
रह गया मैं भी 
वो चक्रव्यूह तोड़ने को 
था आतुर 
और मैं तलाश रहा हूँ 
कोई चक्रव्यूह 
जिसमें एकाकीपन और 
उदासी का एहसास न हो ।

मंगलवार, 17 मई 2022

रोज की जिंदगी और ये घर ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट 
और 
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ 
जब शहर मे कही जाना हो 
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी 
फिर एक लान है 
जहा अब कभी नही बैठता 
किसी के जाने के बाद 
फिर एक बरामदा 
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था 
जब बेटियाँ घर पर थी 
और बारिश हुई थी 
और 
मेरा शौक बारिश होने पर 
बरामदे में बैठ कर हलुवा 
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना 
और अदरक की चाय 
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन 
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है 
वही बीतता है ज्यादा समय 
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप 
और 
वो खिड़की 
जिससे बाहर आते जाते लोग 
एहसास कराते है 
की आसपास इंसान और भी है 
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर 
जहा सुबह क्या 
दोपहर तक बीत जाती है 
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन 
और 
फेसबुक ट्विटर और ब्लॉगर में 
पता नही चलता 
कैसे बिना नहाए शाम हो जाती है 
उस कोने में 
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा 
अब कौन याद करे और ! 
रसोई में जाना जरूरी है 
और बाथरूम में भी 
थोड़ा लेट लो वाकर पर 
और खुद को बेवकूफ बना लो 
की हमने भी फिटनेस किया 
पांच बदाम भी खा ही लो 
कपड़े गंदे हो गए मशीन है 
बस डालना और निकलना ही 
नाश्ता और खाना 
और 
कुछ अबूझ लिखने की कोशिश 
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से 
जिंदगी बिगाड़ दिया इन्होंने 
पर बेमन से पढने की कोशिश 
कभी कभी आ जाता है कोई 
भूला भटका , 
उसकी और अपनी चाय 
और 
बिना विषय के समय काटना 
लो हो गयी शाम 
और 
कुछ पेट मे भी चला ही जाए 
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है 
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ 
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है 
जीभ के नीचे दबावो 
और सो जाओ बेफिकर 
अब कल की कल देखेंगे 
छोटा पडने वाला घर 
किंतना बड़ा हो गया है
और 
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है 
पर बीत जाता है हर दिन भी 
और घर के कोने में सिमट कर 
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे 
आज भी बीत गया एक दिन 
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ 
कही से बजी कोई पायल 
नही रात को एक बजे का भ्रम 
सो जाता हूँ 
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला 
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा 
ओढ़कर ।

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा  

हा 
मुझे बचपन से गुस्सा आता था 
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से 
मुझे गुस्सा आता था 
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक 
मैं ट्रेन के दरवाजे पर 
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था 
की
भीड़ ज्यादा है तो  
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते 
मुझे गुस्सा आता था जब कोई 
दूसरों के मैले को उठा कर 
सर पर लेकर जाता था 
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर 
किसी को खाना दिया जाता था 
गुस्सा आता था 
जब सायकिल के हैंडिल पर 
दो बाल्टियां 
और 
पीछे कैरियर पर मटका रख 
दो मील दूर पानी लेने जाता था 
शहर में 
गुस्सा आता था 
जब गांव जाने के लिए 
मीलो सर पर बक्सा रख कर 
चलना पड़ता था अंधेरे ने 
गुस्सा आता था 
जब गांव में बिजली भी नही थी 
गुस्सा आता था 
जब पुलिस अंकल किसी को 
बिना कारण बांध कर ले जाते थे 
माँ बहन की गालियां देते हुए 
और 
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था 
पर किसी भी चीज को 
बदल सकने की ताकत नही थी 
इस बच्चे में 
उसके बाद भी 
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज 
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ 
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं 
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था 
पर खुद शिकार हो गया 
हर बात पर जिस पर 
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए 
मुझे तो गुस्सा आता रहा 
और 
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया 
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर 
और 
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया 
पर 
ताली पिटती भीड़ में 
खो गया मेरा गुस्सा 
और में भी खो गया साथ साथ 
पानी पीकर या पानी के बिना 
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा 
संसद हो या मुम्बई 
मेरा गुस्सा सड़क पर आया 
लॉटरी हो या शहादत 
सड़क पर फूटा गुस्सा 
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी 
नही रोक सकी मेरे गुस्से को 
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता 
भी बने मेरे गुस्से के कारण 
मुझे आज भी गुस्सा आता है 
बार बार बदलते कपड़ो पर 
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर 
पिटती विदेश नीति 
और अर्थव्यवस्था पर 
रोज शहीद होते सैनिको पर 
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर 
रोज के बलात्कार पर 
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर 
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर 
इंच इंच में होते अपराध पर 
थाने से तहसील होते हुये 
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर 
भाषणों के खेप पर 
आसमान छूती महंगाई पर 
न जाने कितनी चीजे है 
गुस्सा होने को 
पर अब 
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और 
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता 
और 
आवाज के दबने पर उफान मारता है 
पर 
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद 
और साधारण आवाज 
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर 
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर 
और दीवारों के बीच 
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए 
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी 
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए 
जो मेरे पास नही है 
और 
चाहिए धन काफी धन 
जो मंच सज़ा सके 
,रथ बना सके 
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है 
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने 
कोई कविता या कुछ विचार 
ताकि गुस्सा 
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

गुरुवार, 12 मई 2022

उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश 

मेरा प्यारा है सबका प्यारा है सबसे न्यारा है

मेरा प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश  

भारत की ये शान है हा भारत की ये जान है 

ये भारत का मान है ये भारत की पहचान है

ये आन बान और शान है मेरा ये उत्तर प्रदेश

मेरा प्यारा है सबका प्यारा है सबसे न्यारा है  

उत्तर प्रदेश ------------ 

हम भारत के वासी है पर पास हमारे काशी है 

हम भारत के वासी है पर कान्हा के ब्रजवासी है

हम भारत के वासी है वो  राम मेरे बनवासी है 

देवो ने भी चुना जिसे हम है वही प्रदेश उत्तर प्रदेश  



बुधवार, 11 मई 2022

मौत और अकेलापन

मौत और अकेलापन 
________________
मौत कितनी 
खूबसूरत चीज होती है 
हो जाता है 
सब कुछ शांत शांत 
गहरी नींद 
तनावमुक्त ,शांत शांत 
न किसी का लेना 
न किसी का देना 
कोई भाव ही नही 
कोई इच्छा ही नही 
न डर ,न भूख ,न छल 
न काम न क्रोध 
बस शांति ही शांति 
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा 
और सब देख रहे है 
न रोटी की चिंता 
न बेटे और बेटी की 
न घर की चिंता 
न बिजलो और पानी की 
न बैंक की चिंता 
न टैक्स जमा करने की 
न काम की चिंता 
और न किसी छुट्टी की 
न किसी खुशी की चिंता 
न किसी की नाराजगी की 
निर्विकार ,स्थूल 
हल्का हल्का सब कुछ 
देखो 
कितना सपाट हो गया है चेहरा 
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को 
गजब का तेज लग रहा है 
बहुत कुछ है खूबसूरत 
पर मौत से तो कम 
और मुझे तो 
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन 
सन्नाटा ही सन्नाटा 
कोई आवाज ही नही 
खुद की सांसो के सिवाय 
कोई भी नही खुद के सिवाय 
पंखे के आवाज तो 
कभी कभी फोन की 
और 
हा दब गया रिमोट 
तो टी वी की भी आवाज 
तोड़ देती है सन्नाटा 
और 
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर 
गजब का मुकाबला है 
मौत और अकेलेपन का 
हा
एक फर्क तो है दोनो में 
मौत खूबसूरत होती है 
पर अकेलापन बदसूरत 
मौत शांत होती है 
पर अकेलापन 
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में 
लौट कर किसी ने नही बताया 
उसका अनुभव 
पर 
अकेलेपन को तो 
मैं जानता भी हैं 
और पहचानता भी हूँ 
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है 
और 
अकेलेपन का अंत मौत । 
इसलिए 
मौत से डरो मत उसे प्यार करो 
अकेलेपन से हो सके तो भागो 
और 
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

रविवार, 24 अप्रैल 2022

ईश्वर क्या है ?

ईश्वर क्या है ? 
जो अज्ञात था है और रहेगा 
या 
प्रकृति ही ईश्वर है 
क्योंकि 
पत्थर पेड़ और 
विभिन्न पशु पक्षी को माना 
हमने ईश्वर ,
जो हमारा नुक़सान कर सका 
या 
जिससे हम डरे उसे माना ईश्वर 
फिर हम समझदार हो गए 
तो गढ़ने लगे ईश्वर के स्वरूप 
ईश्वर ने सब कुछ बनाया 
पर 
हम बनाने लगे अपने अपने ईश्वर 
ईश्वर एक डर है 
ईश्वर हमारा लालच है 
ईश्वर जीने की इच्छा है 
ईश्वर मौत का डर है 
ईश्वर हथियार बन गया हमारा 
ईश्वर व्यापार बन गया हमारा 
किसी ने नही देखा ईश्वर 
किसी से नही मिला ईश्वर 
पर 
डीह बाबा , सम्मो माई 
जियुतिया माई से लेकर 
संतोषी माता तक 
और 
साई बाबा से लेकर 
तमाम पत्थरों तक फैल गए ईश्वर 
फिर ईश्वर बनने का चस्का 
इंसानो में भी लग गया 
पहले सब डरते थे बुरा करने से 
जब ईश्वर अज्ञात था 
या 
उसके प्रतीक दुर्गम जगहों पर थे 
मनुष्य ने अपने स्वार्थ में गली गली 
चौराहे चौराहे पर बैठा दिया ईश्वर 
तो डर ही ख़त्म हो गया 
ईश्वर के ठेकेदारों ने निकाल दिए रास्ते 
हमेशा पाप और बुरा करो 
पर बीच बीच में कही नहा आओ 
पूजा करते रहो कराते रहो 
और जिसको जो ठीक लगे 
उस धर्म स्थान पर जाते रहो 
पाप धुल जाएगा 
और 
इस व्यवस्था से बढ़ने लगा पाप 
जब कोई एक रावण कंस जडीज था 
तो अवतार ले लेता था ईश्वर 
कहानिया तो यही बताती है 
पर जब बुरो की फ़ौज हो गयी 
तो 
अपने आसमान में छिप गया ईश्वर 
बेचारा किस किस से लड़े ईश्वर 
और 
किस शक्ल में आए दुनिया में 
कि लोग स्वीकार ले उसे ईश्वर 
क्योंकि 
इंसान ने गढ़ दिए है हज़ारो 
और 
ईश्वर से परिचय का दावा करने वाले 
ख़ुद भी बन बैठे है ईश्वर 
जिसे देखा ही नही 
उसे क्या मानना ईश्वर 
ओकसीजन आज ईश्वर है 
और 
उसके लिए पेड़ ईश्वर है 
पानी भी ईश्वर है 
जी हाँ प्रकृति ही ईश्वर है 
इसलिए मंदिर मस्जिद नही 
प्रकृति को बचाओ 
ईश्वर अल्ला जहाँ है वही रहने दो 
अपने बचने के ठिकाने बनाओ । 
ईश्वर कल्पना है 
उस पर कहानी और कविता खूब लिखो 
पर प्रकृति के साथ दिखो 
ईश्वर शक्ति है तो उससे डरो 
और कोई पाप मत करो 
ईश्वर के ईश्वर मत बनो 
बन सकते हो तो भागीरथ बानो 
नदियों को बचाओ 
देवस्थलो के बजाय 
जीवन स्थलो पर पैसा लगाओ 
देवस्थलों के बजाय पेड़ उगाओ
ईश्वर ख़ुश होगा और जीने देगा 
वरना एक दिन पानी भी नही पीने देगा ।

सोमवार, 18 अप्रैल 2022

लिखते है नयी इबारत

चलो धूल डालते है 
कुछ विचारो पर 
भावनाओ पर 
रिश्तों पर 
और ढक देते है 
बहुत सी यादे ।
भूल जाते है वो कदम 
जो हम साथ चले थे 
लिखते है नयी इबारत 
और नया मुस्तक़बिल ।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

हुक्मनामे

आये दिन ये जो
हुक्मनामे फेंके जा रहे है 
आप के वजूद पर
आप के चिन्तन पर  
ताकि 
सीख जाओ आप 
तानाशाही मे जीना 
अंधे और मूर्खतापूर्ण
आदेशो को मानना 
और 
जब जब आका कहे 
घरो मे कैद रहना 
शायद खिड़किया भी
सील हो जाये एक दिन
और दरवाजे भी 
आका के बटन दबाने से
ही खुले सब 
दिमाग मत चलाओ 
जुबान मत हिलाओ 
पर सर हिलाओ 
जैसे आका कहे 
हाँ तो हा, ना तो ना ।

सोमवार, 21 मार्च 2022

हांके पर चलने वाली भेडे बनाओ

किसी भी तरह से 
सबको डराओ 
क्योकी 
जो नही डरते 
वो सत्ता के लिए 
खतरा बन जाते है 
और 
डरे हुये लोग 
गुलामी मान लेते है 
बस यूँ ही 
इसलिये ऐसे या वैसे 
कैसे भी 
आवाम को डराओ 
उन्हे जीता जागता 
इन्सान मत रहने दो 
उन्हे 
हांके पर चलने वाली 
भेडे बनाओ 
और फिर जैसा चाहो
वैसा राज चलाओ ।

सोमवार, 14 मार्च 2022

एक चांद उगा देंगे हम चाहे जहा कही


शाम ढली थी और थोडी सी रात हुयी 
बहुत दिनो के बाद चांद से बात हुयी ।
कुछ रूठा सा चाँद अकड के बैठ गया 
कितना निहारा करता था चन्दा को  मैं 
गाँव देहरी या शहर का का आंगन था 
पर जाने फिर क्या हुआ दोस्ती टूट गयी 
जीवन के संघर्ष या फिर टूटा मन था 
याद किसे आती है चांद सितारो की 
जब रोटी ही चांद दिखाई पडती हो 
और सितारे नमक मे पड़े  दिखते हो 
जब भूख पेट की ख़ुद से याचना करती हो 
बच्चो की फीस उन्हे अपमानित करती हो 
पत्नी की कोशिश फटी साड़ियाँ ढकने की 
जब पूरा दिन जब मुफ्त इलाज खा जाता हो 
जब धक्कों से ही अपने जीवन का नाता हो 
छत भी छीनने का खतरा सर पर लटका हो 
तो कौन देखता चांद तुम्हे और कब देखे 
तुमने भी क्या किया अपने इस प्रेमी का 
जो बड़े देवता बने हुये तुम फिरते हो 
नही शिकायत का हक तुमको बिल्कुल है 
कहा देखना था तुमको थे तुम याद कहा 
वो तो यूँ ही बस नजर उठ गयी ऊपर को 
कि बादल मे क्या चमक रहा है देखो तो 
आंख मिल गयी तुमसे तो तुम ऐंठ गये 
लेके किस्सा देखा देखी का बैठ गये 
जाओ जाओ हमको भी अब परवाह नही 
एक चांद उगा देंगे हम चाहे जहा कही 
अब तुम नही मेरे बच्चे है चांद मेरे
तुम भी हो पर मेरे बच्चो के बाद मेरे ।

रविवार, 13 मार्च 2022

सभी रंगों को मिला कर होली मनाओ

सभी रंग अपने है 
वो लाल हो ,केसरिया हो 
हरा हो या नीला 
बैगनी हो या पीला 
या जो भी हो 
जिसे जो पसंद 
वो लगालो 
दूसरे को पसंद 
तो उसपर भी डालो 
पर 
उसमें कोई खतरनाक चीज न हो 
और न इरादे हो खतरनाक 
जी हां खूब खेलो रंग और गुलाल 
पर न हो धरती खून से लाल 
ऐसा समाज बना लो 
जी हां 
ये इतने सारे रंगों का नाम ही 
हिंदुस्तान है 
जहा एक ही रंग है वो मिस्र ,अफगानिस्तान 
और पाकिस्तान है ।
क्या वो एक रंग पसंद है 
या ये हिंदुस्तानियत का रंगारंग 
आप गले मिलो 
पर नफरत के खंजर को फेंक कर आओ 
हां आओ सभी रंगों को मिला कर होली मनाओ

गुरुवार, 3 मार्च 2022

इसी को युद्ध कहते है ।

अजीब बात है 
दो देशो के जवान 
जो एक दूसरे को 
जानते तक नही है 
पहचानते नही है
कोई लड़ाई नही है 
उनकी आपस मे 
पर वर्दी पहन ली 
तो खूँन बहा रहे है 
एक दूसरे का 
जानी दुश्मन बन कर 
जी इसी को शायद 
युद्ध कहते है ।

रविवार, 27 फ़रवरी 2022

युद्ध की खेती

राम कृष्ण बुद्ध 
मुहम्मद और ईसा 
नही खत्म कर पाये 
मानव के विनाश का युद्ध
ईसा को छोड सब 
खुद भी तो युद्धरत रहे 
और बो गये 
भले बुरे के नाम पर 
युद्ध की खेती 
जो हजारो साल से
फैलती ही जा रही है 
कौन मिटायेगा 
हर भाषा से 
ये शब्द "युद्ध "?

युद्ध खत्म होगा

युद्ध खत्म होगा
और बैठ जायेगा
एक मेज पर 
हमेशा खत्म हुआ है 
कोई युद्ध नही चला 
अनंत काल तक
पर 
उसकी त्रासदी रहती है
अनंत काल तक 
मा पिता की आंख
सूनी रहती है 
अनंत काल तक 
पत्नी की मांग 
उजडी रहती है 
अनंत काल तक
बच्चो का सर 
बिना साये के रहता है 
अनंत काल तक 
मानवता ही नही 
लहू से सिंचित जमी 
रोती है अनंत काल तक ।

बुधवार, 23 फ़रवरी 2022

जीवन मृगमरीचिका है

जीवन केवल मृग मरीचिका है 
विचार कुलांचे भरते रहते है 
रेगिस्तान के पानी के 
एहसास के साथ 
भागता रहता है इंसान 
और 
पानी के लिए तड़प 
दौड़ाती रहती है 
यहां से वहां तक
वहां से वहाँ तक ।
कोई साथी हो 
जो चिकोटी काट कर 
यथार्थ के धरातल पर उतार दे 
और 
वो भी नही है 
तो भटकन अनन्त है ।

सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

हैपी वलेंटाइन डे

अकेले बैठे है 
पर
अकेले कहा 
दीवारें है 
और 
छत भी 
बिस्तर है 
और 
टीवी भी 
लैपटॉप को 
कैसे भुलाये 
इनमे से अपना 
वेलेंटाइन 
किसे बनाये 
किसको दे 
कोई फूल 
और 
कह दे धीरे से 
हैप्पी वेलेंटाइन डे ।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

खुद की लाश ढोना

कुछ लाशे कितनी भारी होती है 
उठाना मुश्किल हो जाता है 
और 
बार बार कंधे बदलने पडते है 
या 
फिर गाडी पर ले जाना पडता है 
पर 
खुद की लाश को ढोना तो 
कितना मुश्किल होता है ।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

ये दिल हुवा वीरान सा क्यों है ।

भीड़ इतनी है आसपास पर 
मन में ये तूफ़ान सा क्यों है 
मुस्कराते हुए चेहरे है सब है
हर कोई अनजान सा क्यों है ।
कोई अपना सा लगा ही क्यों
फिर ये बियाबान सा क्यों है 
आशंकाए इतनी क्यों तारी है
मन में ये शमसान सा क्यों है ।
छोड़ कर लौट चला है आशिक
टूटा हुवा और बेजान सा क्यों है ।
कोई तो अपना सहारा भी होगा
ये दिल हुवा वीरान सा क्यों है ।

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

ये आदमी है या पिटठू ?

निकल पडते है 
सुबह ही पिटठू टागे 
न जाने कितने लोग 
कन्धे झुके पीठ झुकी 
चेहरा सपाट भावहीन 
पिटठू मे ही होता है 
उनका पूरा ऑफिस 
उनका टिफिन 
और पानी 
उनके अरमान
उनका भविष्य 
उनकी जवाबदेही 
घर से बाहर तक की
कही पैदल 
तो 
कही साइकिल पर 
कही बाइक पर 
तो कही बस मे 
कही लोकल मे 
कभी 
इन्हे गौर से निहारो 
क्या ये आप के अपनो जैसे ही है 
कभी 
इन्हे प्यार से पुकारो 
क्या ये सुन पाते है आवाज 
या बस भाग रहे है 
जिन्दगी की जद्दो-जहद मे 
मजदूर भी हंस लेता है पर ये नही 
मजदूर गा लेता है 
पर ये नही 
मजदूर अपने मन से भी जी लेता है 
पर ये नही 
कौन है ये लोग 
जिनकी पीठ पर 
लाद दिया है भारी बोझ 
नई अर्थव्यवस्था ने 
नई पढाई ने 
और 
आज के परिवारो ने 
बस किसी तरह 
इतना तो कमा लो 
कि 
शाम को लौट कर 
दो रोटी खिला दो 
और खुद भी खा लो 
इनकी पहचान क्या है 
ये आदमी है या पिटठू ? 

मर जाने का पर कुछ नही बताने का ।

ये नया फरमान है 
नये जमाने का 
कितना भी दर्द हो 
किसी को 
कुछ नही सुनाने का 
रख दे कोई गर्दन पर 
और 
कोई सीने पर पाँव 
फिर भी नही चिल्लाने का
ना दिल न भाव तुम पत्थर हो 
बस इतना समझं जाने का 
चाहे घुट कर मर जाने का 
पर हरगिज़ नही बताने का ।

कन्धे पर बोझ

पीठ पर बोझ टाँगे 
वो भटकता है 
सुबह से शाम तक 
इस दरवाजे से 
उस दरवाजे तक 
लोगो की चीजे पहुचाते 
डांट खाते 
देर होने पर 
अपना पैसा कटवाते 
डांट खाता है 
घर वालो की भी 
देर हो जाने पर 
और उस दिन का 
घर का सामान नही लाने पर 
और पैसा कट गया 
किसी की शिकायत पर 
ये भी बताने पर 
सो जाता है 
पेट मे डांट पचा कर 
क्योकी 
कल सुबह फिर निकलना है 
कन्धे पर घर की
जिम्मेदारियो का बोझ लेकर ।

शनिवार, 8 जनवरी 2022

जाति का नशा

जाति का नशा -----

पहले मैं समझता था 
कि 
सबसे बड़ा नशा 
धर्म का होता है 
मैं गलत था 
जाति के नशे का 
कोई मुकाबला नही 
इस नशे में डाकुओ के 
गाने गाए जाते है
उसकी जाति की शादियों में 
उसी जाति के किसी शहीद
या 
महान साहित्यकार
अथवा वैज्ञानिक के प्रति 
ये दीवानगी नही देख पाएंगे आप 
पर ऐसी जातियाँ भी खास ही है ।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

उतना अघाते है ।

कुछ बड़े लोग है
जो प्रेम और इज्जत से 
पहले घर बुलाते है 
फिर 
आहिस्ता से धीमे जहर का 
इंजेक्शन लगाते है 
आप जितना तड़पते हो 
वो उतना अघाते है ।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

देश को कायर बना दो

पूरे देश को कायर बना दो 
और 
सिखा दो कि 
बंद का आदेश होते ही 
बंद हो जाना है 
अपने अपने पिजडे मे 
ताकि निर्द्वन्द चर सके कुछ लोग 
मुल्क को चरागाह समझ कर 
और 
तुम बादशाह बने रह सको 
और हर पल पोशाक बदल कर 
देश के बदलने की 
डीँग हांक सको 
ताकि तुम अकेले 
महंगे जहाज 
और महंगी गाडी मे 
चल बता सको 
कि  
पूरा मुल्क अमीर हो गया है 
ताकि तुम 
सैकडो करोड के घर मे रह 
सबको ऐसे होने की बात कह सको 
ताकि 
हजारो करोड के नये दफ्तर की 
ऊंचाई से देख सको मुल्क 
जिसमे बस तुम और
तुम्हारे दरबारी ही दिखलायी पड़े 
और 
इश्तहार छप सके 
कि 
भारत तो चमक है तुम्हारी आँखो मे 
पर पर पर पर पर 
जाने ही देता हूँ 
क्योकी इतिहास मे 
कई बार हो चुका है ।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

इंतज़ार है इंतज़ार है इंतज़ार है

गर्म हवायें बहुत तपिश थी 
कितनी काली अंधियारी थी 
जुल्म ज़्यादती शोषण कितना 
और ग़ुलामी की ज़ंजीरे 
फिर वो रोटी बटी हर जगह 
गोली और धमाके गूंजे 
बिन तैयारी ही था सब कुछ 
थाली में थे गए परोसे ख़ुद के बेटे 
टुकड़े टुकड़े में ख़त्म हुआ सब 
हाँ गोली तो फेल हो गयी 
पर बोली को जगा गयी थी 
बहुत दिनो की चुप्पी थी फिर 
फिर गूंजा था जोश सभी का 
फिर आया था होश सभी को 
पर बाक़ी वो भूल नही की 
एक लँगोटी वाला आगे 
पीछे पूरा देश चला था 
ये हथियार कुछ नया नया था 
दुनिया हतप्रभ दुश्मन हतप्रभ 
इस हथियार का ना जवाब था 
पर जुल्मों का ना हिसाब था 
करो या मरो का नारा था 
चौरी चौरा ने रोक दिया ये 
फिर न कभी ये दोबारा था 
ना मारेंगे ना मानेगे 
युद्ध का नया ये नारा था 
सत्य अहिंसा का प्रयोग था 
सत्याग्रह और असहयोग था 
जिसका सूरज ना डूबा था 
चली अहिंसा डूब गया वो 
छटा अंधेरा सूरज निकला
आज हवाये कुछ ठंडी थी 
पर बँटवारे की आबाजे 
कान के पर्दे फाड़ रही थी 
धरती अपनी चिंघाड़ रही थी 
फिर फ़क़ीर ही निकला बाहर 
जान हथेली पर फिर लेकर 
कैसे कैसे थी शांति आयी 
पर बहुतो को कहा थी भाई 
वहाँ प्रार्थना हाथ जुड़ा था
आतंकी सामने खड़ा  था
जिसने कल तक साँस न ली थी 
उसने गोली खूब चलायी 
इंगलिश गोली इंगलिश पिस्टल
हाँ कायर को खूब थी भाई 
फिर से सूरज डूब गया था
फिर हवाये गर्म हुयी थी 
आज का मौसम फिर वैसा है 
वही अंधेरा वही कालिमा 
पर फ़क़ीर वो नही यहाँ है 
अब मौसम को कौन बचाए 
कौन उगाए फिर सूरज को 
ठंडी हवाये कौन चलाए 
इंतज़ार है इंतज़ार हाँ इंतज़ार है ।

बहुत दिनो से

बहुत दिनो से 
चिडिया ना चहकी आंगन मे 
बहुत दिनो से 
कोयल ना कूकी पेड़ो से 
बहुत दिनो से 
मोर नही नाचा सावन मे 
बहुत दिनो से 
ना फूल खिला है मेरे मन मे 
क्या है ये सब 
सफर अन्त का 
या मुरझाता मन 
तन तो भला भला दिखता है 
पर शायद मन घायल है 
बहुत दिनो से 
कोई गाना याद न आया 
बहुत दिनो से 
यादे भी तो कुंद पडी है 
बहुत दिनो से 
सारी घडिया बंद पडी 
बहुत दिनो से 
सभी खिड़कियां बंद पडी है 
दरवाजे से हवा रोशनी 
सब बाहर है 
बतियाए तो किससे आखिर 
खिसियाये तो किस पर आखिर 
सलवट जितनी है बिस्तर पर 
उससे ज्यादा मन कर भीतर 
बहुत दिनो से ।

और सोचने मे क्या जाता है

सोचता हूँ 
मैं फिर बच्चा हो जाऊ 
जो कुछ नही जानता 
सोचता हूँ 
उड़ जाऊँ नील गगन मे 
पक्षी बन कर 
सोचता हूँ 
खूब खाऊँ
परेशान हो जाऊँ 
सोचता हूँ 
खूब चलूँ 
और थक जाऊँ 
कि नीद आ जाये 
शान्त शान्त गहरी 
सोचता हूँ 
भाग जाऊँ 
अपने से दूर कही 
जहा कोई जानता न हो 
सोचता हूँ 
रम जाऊँ 
किसी भी इश्क मे 
की रश्क न रहे 
पर 
ये भी क्या जिन्दगी 
न ये किया न वो किया 
एलान कर दूँ 
कि सब किया हा सब किया 
सोचता हूँ 
फिर से 
पकड लाऊं 
खोया हुआ हमसफर 
और फिर बंद हो जाऊँ 
अपने दिल के राजमहल मे ।
और 
सोचने मे क्या जाता है ।

पिछले कई दिनो से

पिछले कई दिनो से 
गले की आवाज फंस गयी है 
ठीक से निकलती ही नही
पिछले कई दिनो से 
कलम चलती ही नही 
लगता है पन्ना फ़ट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
किबोर्ड पर उंगली टिकती ही नही 
लगता है 
किबोर्ड जोर से दब कर टूट जायेगा 
पिछले कई दिनो से 
नीद ठीक से आई ही नही 
पूरी रात कुछ खौलता रहता है 
पिछ्ली कई दिनो से 
खाने मे स्वाद नही है 
किसी तरह ठूस लेता हूँ 
और निगल लेता हूँ 
मैं लड़ रहा हूँ जंग खुद से 
पिछले कई दिनो से 
कब खत्म होगी ये जंग ? 

मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

जवाब तुम दोगे

मेरा सवाल तुमसे है जवाब तुम दोगे 
मेरे मुल्क की गुरबत का हिसाब तुम दोगे
ये मुल्क सोने की चिड़िया हुआ करता था 
क्यो बिक रहा है सब  हिसाब तुम दोगे
तुम बादशाह हो हमारी मर्जी से वोटो से 
हमारा सौदा कैसे हुआ जवाब तुम दोगे
हमने तोड़ा था दुनिया औ पडोसी का गरूर
पडोसी घुस गया इसका जवाब तुम दोगे 
(कल पूरा करूँगा )

शरीर बेईमान है

ये शरीर भी कितना बेईमान है 
पर खुद को समझता महान है 
पर कही भी सरेंडर कर जाता है
कही अकड़ता कही शिथिल पड़ जाता है 
मच्छर भी काट ले तो बाप रे बाप 
कांटा भी चुभ जाये तो हाय ही हाय 
जरा सा टूट जाये तो औकात बताता है 
इश्क मे कदमो मे लेट जाता है 
नफरत मे अपनी औकात बताता है 
कितनी बड़ी बड़ी बाते बनाता है 
दूसरो से डरता है अपनो को सताता है 
बड़ी से बड़ी डीँग हाकता है 
मौका पडने पर लुढक जाता है 
जी हा पर शरीर तो शरीर है 
कोई मन ,दिल दिमाग और आत्मा तो नही 
जो इसे जैसे चलाते है वैसे चल जाता है 
शरीर बस पुतला है जिसमे दिल है 
शरीर एक अस्तित्व है जिसमे दिमाग है 
शरीर को बस शरीर ही रहने दो 
इसे कम्प्यूटर और गड़ित मत बनाओ 
इसका अपने दिमाग से प्रयोग करो 
और कुछ बुरा हो जाये यो भूल जाओ 
चलो शरीर का भरपूर उपयोग करो 
इसका जितना हो सके प्रयोग करो 
तभी शरीर शरीर रहेगा दौडेगा खेलगा 
जी हा इसकी भाषा को समझो तो 
फिर ये खूब खूब और बहुत खूब बोलेगा ।
अपने शरीर को खूब प्यार करो 
दूसरे के शरीर से भी मत इंकार करो ।
क्योकी शरीर नितांत क्षणभंगुर है जल जायेगा 
फिर क्या पता कब आप की किस्मत मे वापस आयेगा ।

गौरव के साथ चलते रहो ।

आप दलगत राजनीति छोड़ दे 
दल वाले आप को छोड़ देते है 
आप राजनीति छोड़ दे 
राजनीति वाले 
आप को छोड़ देते है 
आप नौकरी से बाहर 
तो वहाँ के रिश्ते खत्म 
आप काम के न हो 
और बोझ बन जाये 
तो सारे रिश्ते खत्म 
जी हा 
रिश्ते भी व्यापार है 
पूरा कारोबार है 
मुनाफे के साथ रहते है 
और घाटा छोड़ 
मुनाफे की तरफ बहते है 
ये मच्छर की तरह है 
जो लैम्प पोस्ट जल जाये 
सारे मच्छर उधर भाग जाते है 
आप का बुझ गया 
तो किस बात के नाते है 
इसलिए चाहे जो करो 
उपयोगी रहो 
कही से भी तेल लाओ 
या बिजली 
पर जलते रहो 
फिर पूरी आभा 
पूरे गौरव के साथ चलते रहो ।

रविवार, 12 दिसंबर 2021

रिश्तो की डाल

पेड की डाले भी 
अपने पेड को भी 
घायल कर देती है 
कभी कभी 
जब चलता है 
कोई तेज अंधड़ 
तो
सबसे ज्यादा 
सबसे हल्के पत्ते 
साथ छोड़ते है पेड का 
फिर 
हल्की डाले टूट कर
अलग हो जाती है 
पर 
ज्यादा मजबूत डाल 
जो ज्यादा जुडी होती है 
खुद लटक जाती है 
और 
साथ ही छील देती है 
पेड के तने को भी 
जिससे जुडी होती है वो 
कई बार बहुत ज्यादा
मजबूत जुडी डाल तो
गिरती है तो 
पेड को चीर देती है 
बीचो बीच से 
फिर पेड कमजोर हो जाता है 
बच गया तो बच गया 
वरना दूसरा तेज अंधड़ 
पेड को भी जमीदोज कर देता है 
पेड की ये कहानी
जिन्दगी पर भी तो लागू होती है 
और 
इंसानी रिश्तो पर भी ।

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

कल हो या न हो

खुशी आंखो मे भरो 
चाहे कितने आसू 
लटके हो 
खुशी दिल मे भरो 
चाहे कितना घायल हो 
खुशी इच्छाओ मे भरो 
चाहे दम तोड गयी हो 
खुशी बातो मे भरो 
चाहे 
अन्दर से खोखली हो चुकी हो 
और ठठा कर हंसो 
चाहे आवाज फंस रहो हो 
गमो को कुचल दो 
फिलवक्त और सो जाओ 
खुशी के एहसास के साथ
नीद के आने का पल जी लो  
क्योकी 
पता नही कल हो या न हो ।

बदबू न आये और कुत्ता वफादार रहे

नाम वाले अक्सर 
बहुत अकेले होते है 
उनका नाम होता है 
उनके अकेलेपन का कारण
और 
कई बात 
वो स्वयं शिकार होते है 
गलतफहमी के 
कितने पर्दे पर चमकने वाले 
मर गये लावारिश 
और 
वो प्रोफेसर साहब 
जिन्हे फख्र था 
कि 
हजारो उनके पढाये 
रहते है इस शहर मे 
और वो गाँव नही गये 
वही बस गये 
वो जो रहते थे 
अपने कुत्ते के साथ 
और वो हीरोइन भी तो 
ये सब मर गये लावारिश 
एक न एक दिन 
और 
पडोसियो ने भी नही देखा 
कि 
क्यो नही दिखे बाहर
खिडकी पर 
या बालकनी मे 
कई दिन से 
पर ये सच नही 
कि उन्होने नही देखा 
देखा पास जाकर 
सभी ने 
जब सब 
बदबू से परेशान हुये 
जो उठ रही थी 
सड़ी हुयी लाश से 
कितना प्यार करता था
उनका कुत्ता उनको 
और 
कितना बफादार था 
पर उसको भी 
भूख लगती है 
नही मिला भोजन 
तो खा लिया 
अपने प्यारे मालिक
या मालकिन को ही 
सचमुच कितना अकेला
हो गया है 
हर शक्स इस दुनिया मे 
किसी का कोई नही 
और नाम वाले तो 
खैर सचमुच 
बहुत अकेले होते है 
और अभिशप्त होते है 
लावारिश मौत के लिये
तब जो है ही अकेले
और सधनविहीन बेनाम भी 
वो तो और भी न जाने
किस किस चीज के लिये
अभिशप्त होते है
पर मौत से पहले 
बाहर निकल कर
चिल्ला सकने का मौका
तो होना ही चाहिए 
या 
सड़ने से पहले
शरीर और अंग 
दान दे देने का 
ताकि बदबू से पडोसी
परेशान न हो 
और 
अगर कुत्ता है साथ मे 
भूख के कारण 
उसकी वफादारी कलंकित न हो ।

अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो

पहले अपने हिन्दूस्तान के लिये उठो 

ऐ पढने लिखने वालो उठो 
ऐ कविता करने वालो उठो 
ऐ नाटक करने वालो उठो 
सब मंच सजाने वालो उठो 
सब कलम चलाने वालो उठो 
सब दिमाग लगाने वालो उठो 
सब आवाज उठाने वालो उठो 
कि 
कोई तुमारे अनंत नील गगन 
और तारो को छीन न ले 
उठो की चन्द्रमा तुम्हारा ही रहे 
प्रेम के लिये प्रेरित करता रहे 
उठो कि सूरज पर 
कोई अधिकार न जमा ले
और वो सबको रोशनी देता रहे 
उठो की हवाए 
किसी की कैद मे न हो 
स्वतंत्र चलती रहे 
उठो की हरियाली 
किसी की जागीर न हो
सबकी हो 
उठो की फूलो को 
खिलने से रोका न जा सके 
और सब फूल सब रंग
गुलजार करते रहे बगीचे को 
उठो की नदिया 
कोई सोख न ले 
और वो बहती रहे निरंतर
स्वछ और निर्मल 
उठो की आज़ादी महफ़ूज रहे 
उठो की जम्हूरियत 
किसी की जूती न बने 
उठो की लव खामोश न हो 
उठो तो तुम्हारी धड़कन
और तुम्हारी सांसे 
तुम्हारी ही हो 
उठो कि दुनिया 
अब शमसान न बने 
उठो की चंगेज स्टालिन
हिटलर मुसोलिनी 
अब कोई इन्सान न बने 
उठो अपनी आन बान
शान के लिये उठो 
उठो मानवता और 
दुनिया के लिये उठो 
पहले अपने हिन्दूस्तान
के लिये उठो ।

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

जो आये थे भिखारी बन कर मुझसे मांगने

जो आये थे भिखारी बन कर मुझसे मांगने 

मैं देखता रह गया वो मुझे कंगाल कर गया  

वो घिसी चप्पल में कितना मजलूम लगता था 

बड़ा मजबूर लगता था बडा मासूम लगता था 

जब मारा पीठ में खंजर मुझे बेहाल कर गया 



शनिवार, 27 नवंबर 2021

खाली हाथ बिना जेब जल जाना है

आज शमशान घाट पर 
बैठा देख रहा था 
और सोच रहा था 
जीवन का सच 
वो पैसे के पीछे भागते रहे 
बहुत कमाया 
पर 
जीवन तो नही बचा पाये 
उन्होने लकडी ली ढेर सारी 
और 
घी के कनस्तर के कनस्तर उडेल दिये 
पर चिता बड़ी मुश्किल से 
बड़ी देर मे जली 
और 
वो बस किसी तरह जला पाया 
पर चिता धधक कर जल उठी 
कितने कन्धे थे उसके साथ जो गरीब था 
पर सिर्फ नौकर साथ थे 
जो अमीर था 
शमशान भी समाज का आइना है 
कोई औरत या बेटी अकेली 
या दो ले आते है अपने को 
ठेल पर डाल कर 
और 
गिड़गिड़ाते है मदद को 
तो किसी की भीड
भर देती है शमशान को 
यद्द्पि जलते दोनो है 
लकडी मे 
पर 
किसी के पास चन्दन 
तो किसी के पास कुछ भी नही 
शमशान भी गैर बराबरी का स्थान है 
समाज दिखता है यहा 
और समाज का सच 
जिन्दगी का सच तो होता ही है 
कि 
खाली हाथ बिना जेब 
नंगे जल जाना है यहा सभी को ।

भविष्य पढो

इतिहास पढ कर क्या करोगे 
भविश्य पढो 
उसी मे हित है सबका 
मानवता का 
समाज का 
और 
देश तथा दुनिया का 
इतिहास पढो 
तो 
केवल इसलिये 
कि 
किन कारणो से 
मानवता को कष्ट हुआ 
मानवता का नाश हुआ 
बस वो नही होने देना है ।

सोमवार, 22 नवंबर 2021

संघर्ष ही जीवन है

कुछ लोग 
संघर्ष करते है 
जीवन भर 
जीवन के लिये
और 
एक छत के लिये  
जो संघर्ष 
खा जाता है
आधी जिन्दगी 
कुछ लोग 
संघर्ष करते रहते है 
अपनी ही दीवारो से
अपनी बनाई छत से 
बचे हुये जीवन भर
उनका जीवन जीवन कहा 
बस संघर्ष होता है ।

रविवार, 21 नवंबर 2021

अंग भी बोलते है कभी

हम कितना बोलते है रोज 
और 
हमारा शरीर सुनता है और 
मानता है हर बात 
पर 
कभी कभी शरीर का कोई अंग 
थोडा सा बोल देता है 
तो 
नही सुन पाते है हम 
और 
किस कदर पस्त हो जाते है ।
फिर दवाई चीर फाड और 
पता नही क्या क्या ।

चिडिया उड़,मैना उड़ ।

हम दोनो खेलते थे 
अपने बच्चो के साथ 
चिड़िया उड़ तोता उड़ 
मैना उड़ घोडा उड़ 
उंगली उठा कर उड़ा देते थे 
या उगली रखी रह जाती थी 
हार जाता था कोई 
घोडा हाथी उड़ पर 
पर उस दिन 
हार गये हम सब 
उंगली नही 
साथी ही उड़ गया 
अनंत आकाश मे 
देह को छोड़ कर 
और 
तब से चिडिया ने 
उड़ना बंद कर दिया 
उगली स्थिर हो गयी 
जहा की तहा 
तब से नही खेला 
चिडिया उड़,मैना उड़ ।

शनिवार, 20 नवंबर 2021

भगवान नाराज होंगे

मैने कुछ लोगो को 
बातो मे बता दिया 
कि 
किस तरह 
तमाम लोगो ने 
मेरा इस्तेमाल किया 
और 
फिर धोखा दिया 
पीठ पर वार किया 
तो 
उन बेचारो ने भी 
तय किया 
कि 
वो भी इस विधान 
और 
परम्परा को क्यो टूटने दे 
भगवान नाराज होंगे ।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

टूटा पत्ता

पेड़ से टूटता है पत्ता 
उड़ता है इधर से उधर 
गिरता है जमीन पर 
हरा होता है 
तो 
कोई जानवर खा जाता है 
सूख जाता है 
तो 
रौद दिया जाता है पैरो से 
और 
मिट्टी मे मिल जाता है 
पेड़ से टूटती है डाल 
सूख जाती है कुछ दिन मे 
पतली होती है 
या कमजोर होती है 
तो जला दी जाती है 
मजबूत भी होती है
तो भी काट दी जाती है 
बना दी जाती है 
कुछ न कुछ 
किसी के बैठने को 
या 
सजावट की चीज बन जाती है 
घर से भागने वालो 
और 
इस पत्ते या डाल मे 
क्या फर्क होता है ?
कुछ भी नही न ।

चल पडूंगा पूरी ऊर्जा के साथ

चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ--

मन बहुत असहज
सर पर द्वन्द का पहाड़
कुछ अकेलापन
और
कुछ अज्ञात भय
कुछ जीवन के हालत
बदलने के काल का विचलन
सचमुच
जब कोई पूरी नौकरी करके
अवकाश प्राप्त करता होगा
और
अचानक खाली हो जाता होगा
सब सुविधाओ और अधिकारों से
अचानक विमुक्त
और 
अकेले में याद आता अतीत
अतीत के वो सारे कृत्य
जो उस वक्त के नशे में किये
और 
अब नए धरातल पर
झकझोरते हुए 
खुद को अंदर तक
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
मेरे साथ भी
कितना मुश्किल हो रहा है
सामंजस्य बैठाना 
वक्त से
और 
अपने अतीत में झाँकना
मीठी यादो का गुदगुदाना
और 
बुरी का आहत कर देना 
और 
चीर देना आत्मा को
सचमुच कैसे रहते होगे
वो सारे लोग
कभी जीवन ऊचे पहाड़ की चढ़ाई सा
चढ़ने से पहले ही हांफने का एहसास
और 
कभी बर्फ की खायी सा
फिसलने से पहले ही
अंधी खोह में समां जाने का डर
पर सम्हाल जाऊंगा मैं
और
चल पडूंगा फिर पूरी ऊर्जा के साथ
अपने कर्तव्य पथ पर
पर आज तो आज है
और 
कल का इन्तजार है
स्वर्णिम किरणों के साथ
जीवन में प्रवेश करने का |

रविवार, 7 नवंबर 2021

गोवर्धन और कृष्ण

कृष्ण ने उठाया था गोवर्धन
बचाने को उन लोगो को 
जिनको खड़ा कर दिया था 
सबसे बडी सत्ता के खिलाफ 
बस यही तो कहा था कृष्ण ने 
कि 
उसे क्यो भोग लगाते हो 
जो खाता ही नही है 
जिसे भूख ही नही है 
और 
उदर भी नही है 
केवल वास लेता है वो 
उसे खिलाओ 
जिसे भूख है 
जिसे जरूरत है
लाओ मुझे खिलाओ 
मैं खाऊंगा 
कितना कमजोर था देवत्व 
की 
तुरन्त हिल जाता था उनका आसन 
और 
कितना क्रोध भरा था इनमें 
कैसे और क्यो देवता माने इन्हें
जो सहज इंसान भी नही 
बरसा दिया क्रोध 
उन सभी पंर 
जिन्हें खड़ा किया था कृष्ण ने 
सत्य के साथ 
पर 
कृष्ण भी तो कृष्ण थे 
प्रेम किया तो खूब किया 
राजनीति किया तो खूब किया 
युध्द भी खूब करवाया 
खूब मरवाया
और 
खूब बचाया 
खड़े हो गए यहाँ भी कृष्ण 
अपनो के साथ 
और 
उठा लिया गोवर्धन 
अपनी छोटी सी उंगली पर 
वो छोटी सी उंगली 
और 
उतना बड़ा पहाड़ 
कैसे टिक पाया होगा 
और 
कैसे उठाया होगा 
कितनी दुखी होगी 
उनकी उंगली 
शायद आज भी दर्द 
हो रही वो उंगली 
पर 
असम्भव को संभव करने का नाम 
ही 
कृष्ण है शायद 
लगता है 
की वो पहाड़ नही 
बल्कि पुरुसार्थ रहा होगा 
संकल्प रहा होगा 
इरादा रहा होगा 
और 
अडिगता रही होगी 
और 
आंख में आंख डाल कर 
खड़े हो गए होंगे कृष्ण 
सबसे आगे 
उंगली उठाकर चुनौती देते हुए 
और 
उनके संकल्प के सामने 
नही टिक पाया होगा 
इतना उथला से इंद्र
और 
भाग खड़ा हुआ होगा 
खूब तालियां बजी होंगी 
नाचे होंगे लोग 
कृष्ण को उठा कर कंधे पर 
गोपिया रीझ गयी होंगी कितनी 
और 
देख रही होंगी कनंखियो से 
कृष्ण को 
कृष्ण ने भी जरूर देखा होगा 
अठखेलियाँ 
और 
मंद मंद मुस्कराए होंगे कृष्ण 
पर 
कृष तुम कितने लंबे विश्राम पर हो 
या 
अपने गुण , अपनी जिम्मेदारी 
भूल गयो हो 
देखो 
कितने नकली देव 
क्या क्या जुल्म कर रहे है 
तुम्हारे लोगों पर 
तुम्हारी गोपिकाओं 
तुम्हारे बच्चो से 
क्या क्या सलूक हो रहा है कृष्ण 
तुम इतने बेदर्द तो नही हो सकते 
की 
लोगो का दर्द ही भूल जाओ 
आ जाओ न कृष्ण 
भारत ही नही दुनिया को 
एक और महाभारत की जरूरत है 
और 
जरूरत हैं 
आज के संदर्भ में 
एक नए ज्ञान और उपदेश की 
कब आवोगे कृष्ण 
और 
ये महापर्वत कब उठावोगे 
अपने इरादे और न्याय की 
उंगली पर ।
आओ न कृष्ण , अब उठ जाओ 
आ भी जाओ न कृष्ण ।