शुक्रवार, 18 मई 2018

दमघोटू कविता

चाहे तो दमघोटू कविता पढ़िए ----

क्या कभी आपने महसूसा है
की
बाहर घनघोर सन्नाटा हो
और
अंदर दमघोटू और इतना शोर
की
लगता है नसे ही नही
शरीर की कोशिकाएँ भी
फट पड़ेंगी
नही हो सकती इससे बड़ी सज़ा
फांसी में
एक झटके से मुक्ति मिल जाती हैं
और
अजीवन कारावास में भी
लोगो का साथ
पर ऐसी सज़ा कल्पनातीत है
पता नही
किसी को इस सज़ा का एहसास है
या नही
इससे ज्यादा लिखा नही जा सकता
इस विषय पर
जेल से भी पेरोल मिल जाती है
जिंदगी में भी
कोई पेरोल की व्यवस्था हो सकती है
कौन मुक्ति देगा इससे
मुक्ति मिलेगी भी या नही ।
या
सन्नाटा और
अथाह लहू में बहता शोर
साथ साथ चलते रहेंगे
जब तक
फट न जाये अस्तित्व ही ।

शुक्रवार, 11 मई 2018

मौत और अकेलापन

मौत और अकेलापन
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मौत कितनी
खूबसूरत चीज होती है
हो जाता है
सब कुछ शांत शांत
गहरी नींद
तनावमुक्त ,शांत शांत
न किसी का लेना
न किसी का देना
कोई भाव ही नही
कोई इच्छा ही नही
न डर ,न भूख ,न छल
न काम न क्रोध
बस शांति ही शांति
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा
और सब देख रहे है
न रोटी की चिंता
न बेटे और बेटी की
न घर की चिंता
न बिजलो और पानी की
न बैंक की चिंता
न टैक्स जमा करने की
न काम की चिंता
और न किसी छुट्टी की
न किसी खुशी की चिंता
न किसी की नाराजगी की
निर्विकार ,स्थूल
हल्का हल्का सब कुछ
देखो
कितना सपाट हो गया है चेहरा
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को
गजब का तेज लग रहा है
बहुत कुछ है खूबसूरत
पर मौत से तो कम
और मुझे तो
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन
सन्नाटा ही सन्नाटा
कोई आवाज ही नही
खुद की सांसो के सिवाय
कोई भी नही खुद के सिवाय
पंखे के आवाज तो
कभी कभी फोन की
और
हा दब गया रिमोट
तो टी वी की भी आवाज
तोड़ देती है सन्नाटा
और
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर
गजब का मुकाबला है
मौत और अकेलेपन का
हा
एक फर्क तो है दोनो में
मौत खूबसूरत होती है
पर अकेलापन बदसूरत
मौत शांत होती है
पर अकेलापन
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में
लौट कर किसी ने नही बताया
उसका अनुभव
पर
अकेलेपन को तो
मैं जानता भी हैं
और पहचानता भी हूँ
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है
और
अकेलेपन का अंत मौत ।
इसलिए
मौत से डरो मत उसे प्यार करो
अकेलेपन से हो सके तो भागो
और
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।

बुधवार, 2 मई 2018

झमाझम बारिश

झमाझम बारिश
और
आदतन बाहर बैठा हूँ
अकेला में
नही बन रही कोई कविता
नही आ रहे है कोई विचार
तारी है
अकेलेपन का आतंक
कलम और कीबोर्ड असहाय
ताक रहे है टुकुर टुकुर
पर उंगलियां जम गई है
उठ रही है मिट्टी की महक
सोंधी सोंधी सी
कुछ कूड़े करकट की बदबू भी
बीच बीच मे
चमक उठती है बिजली
शायद कहती हुई
कि
मुझे देख बस चमकती हूँ
और
खत्म हो जाती हूँ
या गिर जाती हूँ
कही बर्बादी बन कर
क्या ये कोई जीना है
तू तो बैठा निहार रहा है
अपनी आंखों से सब
और
अनुभूतिक तो होता होगा
प्रकृति से ,बारिश से हरियाली से
उठ खड़ा हो 
और
बैठ जा अपनी उस मेज पर
जहा बैठते ही बन जाता है
तू कवि और लेखक
उंगलियां चलती ही
तो कुछ रच ही देती है
चल उठा गिलास
और हंस दे ठठा कर
और
मैं भी बदली से कहती हूँ
और तू भी बोल चियर्स ।