बुधवार, 16 सितंबर 2015

मेरी राहो में कांटे जिसने भी बिछाये जब वो मेरे पांव में चुभे और जोर से चीखा मैं दर्द से जरूर उनके कानो के परदे भी हिले होंगे और दुख रहे होंगे अभी तक दोस्त मेरा घाव शायद जल्दी भर जायेगा क्योकी बेजान कांटे से हुआ है पर तुम्हारा नहीं भर पायेगा जल्दी क्योकि इंसानी चीख से घायल हुए हो तुम । इंसान की जब भी निकलती है चीख या कराह वो छलनी कर देती है अंदर तक और दीखती भी नहीं पर अचेतन में हथौड़े के तरह चोट करती रहती है जिंदगी भर ।


मंगलवार, 15 सितंबर 2015

मैं तो सूरज का बेटा हूँ तो ऐसे कैसे हारू मैं
तुझ जुगनू के हाथो खुद को ऐसे कैसे मारू मैं   |
मेरी राहे है पथरीली पड जायेंगे तुम्हारे पांव में छाले 
तुम्हारे पांव मखमल के लिए है तुम उस तरफ जाओ |





तुमने ही किसे बख्शा जब कोई सूरज तुम्हे नजर आया
की मैं सूरज छोड़ दूँ और तुम्हारे साथ सड़ता ऐसे ही रहूँ
तुमने तो सरो पर पाँव रख कर सारी ही मंजिले तय की
चाहते हो मैं अपने पाँव पर चल कर भी सूरज नहीं पाऊं |
वो देखो न दूर किस कदर वो सूरज चमकता है
मैं तुमको छोड़कर सूरज के साथ जाने वाला हूँ
मत कहना की मैंने भी तो धोखा दे दिया तुमकों
मैं भी अँधेरा छोड़ रौशनी से मन बहलाने वाला हूँ |

हमारे साथ तुम कही बस डूब न जाओ
हमें छोड़ दो तुम तैर कर पार हो जाओ |
जो मेरे साथ चलने की कसम खाए हुए हैं
वो खुद ही बर्बादी के करीब आये हुए है |
मैं तुम्हारी महफ़िल से कुछ यूँ निकल जाऊंगा कल
जैसे सूरज चमकता है और फिर कही डूब जाता है |

सोमवार, 14 सितंबर 2015

जब और जितनी बार भी अपने घर लौटता हूँ और दरवाजा खोलता हूँ बिजली सी कौंध जाती है और दीवारो पर बन जाती है अंनगिनत तस्वीरें और मन का बादल बरस उठता है । लहरो पर तैर जाती है यादो की कितनी कागजी नावें और कागज की नाव तो कागज की ही होती है खो जाती है अथाह पानी में और सन्नाटा पसर जाता है दीवारो से छत तक और बैठक से बिस्तर तक जब और जितनी बार भी अपने घर लौटता हूँ और दरवाजा खोलता हूँ बिजली सी कौंध जाती है और दीवारो पर बन जाती है अंनगिनत तस्वीरें और मन का बादल बरस उठता है । लहरो पर तैर जाती है यादो की कितनी कागजी नावें और कागज की नाव तो कागज की ही होती है खो जाती है अथाह पानी में और सन्नाटा पसर जाता है दीवारो से छत तक और बैठक से बिस्तर तक ।

जब और जितनी बार भी
अपने घर लौटता हूँ
और
दरवाजा खोलता हूँ
बिजली सी कौंध जाती है
और
दीवारो पर बन जाती है
अंनगिनत तस्वीरें
और
मन का बादल बरस उठता है
लहरो पर तैर जाती है
यादो की कितनी कागजी नावें
और
कागज की नाव
तो कागज की ही होती है
खो जाती है अथाह पानी में
और
सन्नाटा पसर जाता है
दीवारो से छत तक
और
बैठक से बिस्तर तक

रविवार, 6 सितंबर 2015

किसी ने पूछा था भूल तो न जावोगे
हमारा सवाल था लौट के आ पावोगे ।
चलता हूँ गर चाहो तो मुझे याद रखो
याद की बात बस राख ही रह जाती है ।
जितना आसान है यहाँ ईश्वर कहलाना
उतना मुश्किल है यहाँ इंसान बन पाना ।
ये क्या मजबूरी है खुद में तन्हा रहना
बहुत लोग है हमें तन्हा करने के लिए ।
ज़माने को हमने खुद को सौंपा था
ज़माने ने हमसे हमको छीन लिया ।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

उस बच्चे को पता नहीं है जाति और मजहब क्या है
नफरत की खेती में इसको हम बैल बना कर जोतेंगे ।