गुरुवार, 21 जून 2018

चलो सपने देखे सुबह होने तक ।

चलो अब कुछ अच्छा होने के
सपने देखे सुबह होने तक ।
सूरज निकलेगा और ग्रस लेगा
इस अँधेरे को शाम होने तक ।
फिर शाम आयेगी और
सूरज गर्त हो जायेगा उसके अन्दर
यही क्रम जीवन को चलाता रहेगा
उठाता रहेगा गिराता रहेगा
हम नियति का सड़क पर पड़ा
पत्थर बन लोगो की ठोकरों से
इधर उधर उछलते और गिरते रहेंगे
कुचलते रहेंगे स्वार्थो के टायर हमें
जब तक कही जमीन में
दफन नहीं हो जायेंगे हम ।
फिर भी तब सपने देखना तो
हमारी नियति भी है और अधिकार भी ।
क्या अब इतने ताकतवर हो गए है
कुछ लोग की
वो हमारे सपने भी
हँमसे छीन लेना चाहते है
पर पत्थर चाहे बेजान क्यों न हो
कभी ठोकर दे सकता है
तो कभी किसी उछाल से
घायल भी कर सकता है
इसलिए मुझ बेजान से भी खेलो मत
मुझे सपने देखने दो ।
चलो सपने देखे सुबह होने तक ।

बुधवार, 20 जून 2018

क्या दुनिया से जाने के बाद सुनाई नहीं पड़ता

सुनो !
सुनो ना
क्यों नहीं सुनते हो
क्या दुनिया से जाने के बाद
सुनाई नहीं पड़ता
और
दिखाई भी नहीं पड़ता
कि
कोई कितना परेशांन है
कभी भी जवाब नहीं देते हो
पुकार पुकार कर थक गया मैं
न दिखते हो ,न बोलते हो
तो
अब मैं भी क्यों बोलू
चलो मैं भी बेवफा हो जाता हूँ
तुम्हारी ही तरह
और भूल जाता हूँ तुम्हे
अब
मैं भी क्यों बोलू
क्यों पुकारूँ
थक गया हूँ पुकार पुकार कर
जब तुम्हे मेरी कोई चिंता नहीं
तो मैं ही क्यों करूँ
पर जरूर
तुम्हारी कोई मजबूरी होगी
वर्ना ऐसी तो नहीं थी तुम
कैसे भूल जाऊं तुम्हे
और
कैसे पुकारना बंद कर दू
पता नहीं कब चमत्कार हो जाये
और
आ खड़े हो तुम सामने 
चलो अभी तुम भी सो जाओ
और मैं भी
जरी रहेगा ये जद्दोजहद
पाने और खोंने के बीच संघर्ष का
जो सच है वो सच ही रहेगा
पर उम्मीद और सपने
जीने की उमंग भरे रहते है

सोमवार, 18 जून 2018

मेरे अंदर के अँधेरे

चलो अब बंद करता हूँ
खिड़कियाँ
कमरे की
और मन की भी
चिंतन की
और आँखों की भी
बुझा देता हूँ रौशनी
ताकि छा जाये अँधेरा
अंदर भी और बाहर भी
क्योकि
अँधेरा हमें सुकून देता है
और
हर चीज से
आँख बंद कर लेने का बहाना
सो जाता हूँ मैं भी
सोने दो लोगो को भूखे पेट
या फुटपाथ के थपेड़ों
और बारिश में
लगने दो आग
किसी की आबरू में
लूटने दो इज्जत या असबाब
मुझे क्या
मैंने तो गर्त कर लिया है
खुद को अँधेरे में
और बंद कर ली है खिड़कियाँ
ताकि
कोई चीख सुनाई न पड़े
और न दिखाई दे
बाहर के अँधेरे
मेरे अंदर के अँधेरे
अब मेरे साथी बन गए है न
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो
इस व्यवस्था की तरह ।