शनिवार, 28 जुलाई 2018

ये दिल्ली ने कहा है

ये दिल्ली ने कहा है
की कलम को तोड़ दे सब 
अगर कुछ सोचते है 
जो हमसे कुछ अलग है 
उस चिंतन को मोड़ दे सब
ये दिल्ली ने कहा है 
अब कोई कविता न लिखे 
लिख रहे है 
तो ऐसा वैसा न लिखे 
जो दिल्ली को नहीं अच्छा लगेगा 

ये दिल्ली ने कहा है 
न कोई फिल्मे बनाये 
न ही कोई गीत गए 
न नाटक ही दिखाए 
जो दिल्ली को न भाये 

ये दिल्ली ने कहा है 
सूरज पूरब से निकलता 
ये औरो ने कहा था 
सूरज अब पच्छिम से उगेगा  
भारत में रहेंगे तो 
पूरब को सब लोग अब 
पच्छिम कहेंगे   

ये दिल्ली ने कहा है 
बदलो से बारिश नहीं होती 
मेढक की शादी न हो
तो बारिश हो नहीं सकती 
हमारी बात ये सब मांन जाओ 
सब मान लो सब शादी कराओ 

ये दिल्ली ने कहा है 
हमसे पहले कुछ नहीं था 
जो किया हमने किया है
ये जमीन आसमान नदिया
हवाए सब हमने दिया है

ये दिल्ली ने कहा है 










शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

मुनादी हो गयी है

मुनादी हो गयी है 

कि
गाय अब हरगिज न पालें
अगर पालते है तो सड़क पर
हरगिज ना निकाले
फिर भी निकले
तो जिम्मेदारी आपकी है
गाय पंर जो भी करेगे
हम करेंगे
काटेगे या कही पंर बेच देगे
देश मे भी कौन खाये या न खाए
चुनांव देखकर
उसकी इजाजत हम ही देंगे

मुनादी हो गयी है
कि
प्यार पंर पाबंदियां है
गर भाई और बहन हो
या हो मियां और बीबी
तो कागज ले के निकलो
की दोनो सचमुच वही हो

मुनादी हो गयी है
कि
लोकतंत्र की नई परिभाषा पढ़ लो
जान जाओ फिर उसी रस्ते पर बढ़ लो 
सत्ता पर कोई उंगली उठाये
उससे पहले जरा ये जान जाए
की जान का जोखिम बहुत है
बन्दूक की नली से निकलती है सत्ता
ये तो पढ़ा था
पर सत्ता बंदूक और हिंसा से है चलती
ये भी पढ़ लो

मुनादी हो गयी है
कि
कोई अखबार हो या हो टी वी
सब सत्ता की भाषा ही बोले
किसी सिद्धांत के बहकावे में आये
उससे पहले ज़रा ये जान जाए
कि सत्ता चीज क्या है
और
सत्ता का संगठन चौकस खड़ा है
कुछ भी हो जाए
तो हमको क्या पता है
वो खुद ही जाने
या फिर बात माने 

मुनादी हो गयी है
कि
क्या जरूरी है ये इतिहास पढ़ना
इतिहास अबतक जो भी पढ़ा था
सब कूड़े से भरा था
जो हमको देश का दुश्मन बताता
पढ़ना है तो राष्ट्र गौरव पढ़ो सब
नया इतिहास
जो अब हम समझा रहे है
है वही इतिहास असली
और
इतिहासों के पुरोधा भी वही है
जो जो हम बताए
जो इनको अब नही मानेगा उसको
रास्ते पर लाना भी आता हमे है
फिर काहे का गम 
गांधी से कलबुर्गी तक को
समझा चुके हम 

मुनादी हो गयी है
कि
ये आज़ादी बेवजह है
और
ऐसे लोकतंत्र का भी क्या करोगे
ये चुनांव भी तो केवल खर्च ही है
छोड़ो इसको बस हमे ही सत्ता दे दो
जब तलक ये मुल्क जिंदा है
और
जिंदा है लोग कुछ भी
फिर देखो हम क्या करेंगे
पर ये अभी हम क्यो बताए 

मुनादी हो गयी है
किअपने मुह सिले सब
और 
वो हो बोले जो हम बताए
आंखे बंद कर ले
और वो ही देखे
जो हम दिखाए
कानों में ठूस लो कुछ
सुनना भी क्या जरूरी
दिमागों पर भी कोई जोर क्यो दो
बस उतना जानो
जितना हम जनाये 

मुनादी हो गयी है
कि अब सब मांन जाये
कि सबके हम खुदा है
सत्य है हम ,न्याय है हम
शास्वत भी हम ही है 

मुनादी हो गयी है
कि
अब कोई चित्र हो या बुत बनाये
पर क्या बनाना है
पहले हमको बताए
जो हम कहे फिर वो ही बनाये

मुनादी हो गयी है
कि
बुध्द ने कुछ भी कहा हो
पर
संघम शरणं गच्छामि
के अब नए मतलब समझ लो
अब हम पर उंगली उठाना द्रोह होगा
फिर नही कहना कि तुमने क्या है भोगा
मुनादी हो गयी है ।

शनिवार, 21 जुलाई 2018

बारिश

बारिश  नहीं आयी
उफ़्फ़ कितनी गरमी है 
सूरज जला देगा क्या 
ये बारिश क्या करेगी 
आफ़त बन कर आयी है 
सब कुछ बहा देगी क्या 
देखो गिर गए 
कितनो के कच्चे घर 
और 
झोपड़ियाँ भी जवाब दे गयी 
अबकी बारिश समय पर आयी 
और उतनी ही आयी 
की अबकी खेत सोना उगलेंगे 
अभी बारिश तो आफ़त है 
भीग गया खेत और खलिहानों में सब 
अब साल कैसे बीतेगा 
कैसे होगी उसकी पढ़ाई और दवाई 
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
बारिश आयी स्कूल की छुट्टी 
छप्प छप्प करते वो पानी में 
वो काग़ज़ की नाव बहाते 
वो बचपन कितना प्यारा लगता है 
उससे पूछो जो अभी है ब्याही 
और पति सीमा पर बैठा 
उन दोनो के मन की सोचो 
और 
वो दोनो भीग रहे छतों पर 
दोनो देख रहे दोनो को 
भीगा आँचल भीगा यौवन 
दोनो को है कितना जलाए 
वो मछरदानी पर प्लास्टिक बिछा रही है 
बालटी भगौने सब बिस्तर पर सज़ा रही है 
ख़ुद बैठी है पर बच्चों को 
इस कोने और उस कोने कर 
वो बारिश से बचा रही है 
पूरी रात नहीं वो सोयी 
सब झेला 
पर कभी नहीं क़िस्मत पर रोयी 
उससे पूछो बारिश का मतलब 
जो पूरा घर अब सूखा रही है 
बारिश अब ख़त्म हो गयी 
चरो तरफ हरियाली छायी

फूलों से अब लदी डालियाँ 
सबको ही अच्छी लगती है 
भूल गए सब क्या झेला था 
वो अच्छा या बहुत बुरा था 
फिर ज़िंदगी पटरी पर आयी 
उफ़्फ़ 
ये बारिश कैसी बारिश ।


बारिश

बारिश के क्या गीत सुनाए
बारिश के मतलब कैसे कैसे
जिसके जो हालात है वैसे
किसकी खातिर गीत बनाये
वो जोड़ा जो नया नया है
वो सैनिक सीमा पर गया है
वो किसान जिसको कुछ बोना
या जिसका बाहर अन्न पड़ा है
ना आई तो सूखा झेलो
आ गयी तो बाढ़ ले आयी
ये अमृत है खेत की खातिर
पर आफत भी खेत मे आयी
किसको देखे किसे भुलाएं
किसकी खातिर गीत बनाये
बह गया या भीग गया सब
पूरे साल भूख से लड़ना
कैसे पढ़ाई कैसे दवाई
बिटिया का भी ब्याह था होना
अच्छी बारिश खेत मे सोना
वाह वाह भाई फिर क्या कहना
जिसकी झोपड़ी या छत चूती है
जरा उससे पूछो इसका मतलब
बाल्टी भगौने भर गए सब
अब बिस्तर को कैसे बचाये
खुद तो बैठ गयी कोने में
पर बच्चों को कहा सुलाये
वो कागज की नाव चलाते
छप्प छप्प करते आते जाते
तैर रहे है वो मस्ती में
ये बचपन है मौज मनाए
छत पर भीग रही वो देखो
उस छत पर कोई आंख लगाए
भीग गया आँचल यौवन का
फिर फिर देखे और शरमाये
भीग रहा है तन और मन सब
कैसा पानी जो अगन लगाए
जिसपर जो बीते वो जाने
दूजा क्या अंदाज लगाए
किसकी खातिर गीत बनाये ।

सोमवार, 9 जुलाई 2018

एकाकीपन

मैं भीड़ में गुम हो जाना चाहता हूँ
पर
भीड़ और मेरे बीच इतनी दूरी है
कि
न मेरी आवाज उसे सुनाई पड़ती है
और न मैं उसे दिखाई पड़ता हूँ
मुझे भी नही दीखती है वो भीड़
बस सुनाई पड़ती है कानो में आवाज़
कही दूर से अपुष्ट ,अस्पष्ट
और
में ढूढने लगता हूँ उसे पागल जैसे
पर
भीड़ ने लगातार दूरी को कायम रखा है
और मुझे धलेक रही है लगातार
एकाकीपन की तरफ ।