शनिवार, 28 अगस्त 2010

हलाल से मरा या झटके से मौत उसकी

एक मौत हो गयी है हर तरफ बहस है
हलाल से मरा या झटके से मौत उसकी
एक पक्ष कह रहा है हलाल में है जन्नत
स्वर्ग झटके में है एक पक्ष का है ये मत
गुस्से में  आकर दोनों बाहें चढ़ा रहे है
वो  कुरान पढ़ रहा है वो वेद गा रहे है
सच में कोई मरा है या चल रही है सासे
यदि चल रही है सांसे कोई उसे बचाए
पर बहस फिर वही कि कौन उसे बचाए
हिन्दू है या मुसलमा पहले वो ये  बताये
इन्सान होना इंसा को काफी नहीं है  यारो
गैर मजहबी बचाया तो माफ़ी नहो है यारो
उसकी जिंदगी से है किसका कोई  वास्ता
विवादों से खुलता है राजनीति का रास्ता
दोनों ने कहा अफवाह फ़ैलाने में भला है
अजमाया हुआ नुस्खा हर बार जो चला है
छोड़ो इसे अपनी अपनी बस्ती में लौट जाओ
मै गोली इधर  चलाऊ तुम भी उधर  चलाओ
पर पहले देख लेना घर वाले घर पे ही हो
या इंतजार करना थोड़ी देर क्यों नहीं हो
जब दोनों बता देंगे सब ठीक है जी मौला
तुम भी करना दंगा ,हम भी करेंगे दंगा
कुछ मर गए तो फिर सियासत में रंग होगा    
हम दोनों के लड़ने का पुराना ही ढंग होगा   
तुम बनो विधायक और संसदी हो मेरी
प्रान्त में सत्ता तेरी औ दिल्ली में हो मेरी
फिर बात होगी कि   कौन  मर गया था
वो अफवाह थी या सच में कोई मरा था
सचमुच कोई मरा हो तो दोनों रो लेंगे
जनता का ही  है पैसा मुवावजे  में देंगे
पाँच साल के लिए अब हो गयी कमाई
चाहे  कहे  कोई नेता चाहे  कहे कसाई
खेल राजनीति का पता चल गया है साथी
हम लड़ते रहे  जमाना छल गया है साथी
वो    हिन्दू मरेगा या  मुस्लमान  मरेगा 
लेकिन कोई ना कोई  तों  इन्सान मरेगा
हम लड़ते रह गए  तों यारो  याद  रखना
एक दिन होगा पूरा ही हिंदुस्तान मरेगा

रविवार, 22 अगस्त 2010

एक जंग जारी है अन्दर भी बाहर भी

जब हम सुख भोग रहे होते है
पूरी तन्मयता से,अधिकार और गौरव के नशे के साथ
उस वक्त हम यह रंचमात्र भी नही महसूससते है
की उसी वक्त तैयार हो रहा होता है
किसी दुःख का अनचाहा अनजाना शिलालेख
उस शिलालेख को देखते है हम अचानक
तब ऐसा लगता है सुन्दर स्वप्न देखते देखते
खतरनाक सांप ने जीभ से हमें छू लिया
दुःख और विषाद जब हमें तोड़ रहा होता है
और ऐसा लगता है
की हम सम्पूर्ण जंग हार गए है
अपने ही अस्तित्व को स्वीकारने को तैयार नही होते है 
उस वक्त भी ,हमें सबक देकर तैयार हो रहा होता है
एक स्वर्णिम भविष्य का सूरज
वह हमें ललकार रहा होता है उठ खड़े होने को
और कह रह होता है की यह पास में ही मै हू
आओ मुझे छू लो ,चाहो तों पा लो
अपनी सामर्थ्य भर,अपनी उत्कंठा भर,अपने पुरसार्थ भर
मै स्वय तों हू इस कथानक का पात्र
एक जंग के साथ ,जो भीतर भी है और बाहर भी
की कुछ छण के सुखद सूर्य को कैसे और कितना सहेजू
और किस तरह बिना सहमे और ठिठके
पार कर जाऊ अन्धेरेपन को
यह जंग लगातार जारी है ,अन्दर भी और बाहर भी
और मै सामने दीवार पार लिखा गीता सन्देश वाला चित्र
देखकर कलम रख देता हूँ
और मजबूत कदमो से चल पड़ता हूँ  .

तुम कहा थे जब उन्हें फंसी के फंदे पर लटकाया गया ( जून १९७1 )

तुम कहा थे                                                              
उस दिन
जब उन तीनो को
बेडियो में ले जाया गया
उन तीनो को
फांसी के फंदे पर चढ़ाया गया
फांसी पर चढ़ने वाले
तुम क्यों नही थे
उस दिन
जब साइमन हाय हाय का
नारा लग रहा था
लाजपत गरजे ,डंडे पड़े ,
वो शहीद हो गए
वह डंडा तुमने नही खाया उस,
मौत को तुमने नही अपनाया 
उस दिन
जब जलियांवाला बाग़ में
गोलियां चल रही थी
मौत जिंदगी को छल रही थी
उस दिन कोई नही बचा
तुम हमेशा कैसे बच गए
जबकि तुम तों हमेशा लक्ष्य पर होते थे,
क्योकि मंच पर होते थे
उस दिन
जब वह सिंगापुर से चल कर
भारत की भूमि पर आया था
उसने भारत भूमि पर झंडा लहराया था
तुमने साथ नही दिया था
केवल मुकदमा लड़ कर
कर्तव्य पूरा कर दिया था
उस दिन
जब तुम जैसे ही गद्दार की गद्दारी पर ,
गद्दार पुलिस वालो ने
उसे अल्फ्रेंड पार्क में घेर कर गोली मारी थी
उसकी जगह तुम क्यों नही मरे थे
क्योकि तुम्हारी गोरो से यारी थी
तुम उनकी सत्ता को और आगे बढ़ा रहे थे
ना अस्त होने वाले सूरज को
और ऊपर चढ़ा रहे थे
क्यों अहिंसा की बात कर
लोगो को चलती गोलियों में छोड़
तुम पुलिस वैन में घुस जाते थे
होई थी हिंसा, आती थी मौत,
तुम नजर नही आते थे 
क्यों मिला औरो को नरक और
तुमको ए क्लास जेल की कोठरियां
औरो को गुमनामी ,तुमको सत्ता
औरो को भूख तुमको कुर्सी सुविधाएँ
तरह तरह का भत्ता
क्योकि तुम गद्दार थे गोरो के यार थे
तुम कौन होते हो हमें देशद्रोही बताने वाले
हमारे ही संविधान द्वारा
हम पर लाठी और गोली चलाने वाले
तुम्हारा चेहरा साफ नजर आने लगा है
तुम्हारी लफ्फाजी और कोरे भाषणों का
रहस्य समझ में आने लगा है
भूख ,बेकारी और गरीबी की दुहाई देकर
कुर्सी का खेल खेलने का नाटक और नही चलेगा
अब
भूखा मजदूर ,नंगा किसान जाग रहा है
इनका सम्मिलित तूफानी स्वर जागेगा
इनके स्वर में लफ्फाजी नही होगी ,
नारेबाजी नही होगी
अगर होगा तों शहीदी रक्त होगा ,
मचलती आग होगी
जिसमे जल कर
तुम्हारे सारे कुत्सित हथकंडे भष्म हो जायेंगे
ये करोडो इन्सान जिनसे मिल कर बना है
देश हिदुस्तान
अपनी सच्ची आजादी का जश्न मनायेंगे .

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

कुछ इधर की कुछ उधर की

१- ना दो बन्दूक मेरे हाथो में
   हो जायेगा खून कुछ तथाकथित समाजवादियो का
    जो सत्ता,औरत ,धन और जमीन देख 
    कुत्ते की तरह जीभ लपलपाते है                                        
    सभी को कमजोर और गरीब बनाते है
    सूंघ सूंघ कर खा जाते  है हमारा माल
    फिर थपकी देकर कहते है खुद को सम्हाल

२-मै एक सार्वजानिक चौराहे पर खड़ा था
   सामने एक गरीब मुर्दा पड़ा था
   तमाम समाजवादी जहाज से उतर
   बड़ी बड़ी गाडियों में आ रहे थें
   साथ साथ चमचे नारा लगा रहे थे
   इसे ना भूख है ना प्यास है
   क्योकि ये सच्चे समाजवादी की लाश है

३-रामकली ने देखा और भोगा की
   गरीब औरत की कोई इज्जत नही है
   उसकी इज्जत की कोई कीमत नही है
   ऊँचे घरो में रहने वालो की इज्जत है कीमत है
   तों उसने अपनी इज्जत बेंचना शुरू कर दिया
   हर बड़े से उसकी इज्जत खींचना शुरू कर दिया
   और अपना घर इज्जत यानी पैसे से भर दिया
   अब उसके पास भी कोठी है कार है
   उसका भी बहुत फैला हुआ कारोबार है
   अब बड़ो के लिए उसका घर स्वर्ग का द्वार है
   अब वह भी समाज में बहुत इज्जतदार है 

४-एक माह से राशन की लाईन लगा लगा
   एक आदमी शहीद हो गया
   बेचारे ने बस आँख मुदा और चिर स्वप्नों में खो गया
   दो चार दी बाद जब सड़ी हुई लाश से बदबू आई
   तब लोगो ने उसे देखा और फिर भीड़  घबराई
   नाक दबाये कुछ लोग उसके पास आये और पूछा
   भाई तुम्हे क्या हो गया है राशन कुछ दिनों में मिल जायेगा
   आखिर कहा खो गया है
   मजबूती से लाइन में लग जा वरना पीछे वाला
   बड़े लोगो के बच्चो की तरह धक्का देकर आगे बढ़ जायेगा
   और फिर तू अगले साल तक राशन नही पायेगा
   तू यहाँ पड़े पड़े समाजवाद की लाश  बन जायेगा
   तभी आकाश से आवाज की  आई सुन मेरे भाई
   जनता को दो से ही आशाये और निराशाए होती है
   एक नेता से एक भगवान से
   नेता तों कुछ देने से  रहा   
   उसका तों सब उसके ख़ानदान  के लिए ही  कम है
   जब नेता ने राशन नही दिया, मै छला गया
   इसलिए राशन मांगने भगवान के पास चला गया

बुधवार, 18 अगस्त 2010

इतिहास ने खून चूसने वालो का नही खून बहाने वालो का साथ दिया है

विषधरो ने फन फैला रखे है
और उनके फन फैलते फैलते धीरे धीरे इतने बड़े हो गए है
की उन्हें छोड़कर पूरा समाज उन फनो की छत्रछाया में आ गया है
फन के बाहर कुछ बचता भी तों नही है
फन ही धरती बन गए है फन ही समुद्र और आकाश भी
घुटन होने पर भी समाज के कुछ जीव जिनमे कुछ गर्म लाल खून है
केवल छटपटा पाते है, भागते है संघर्ष करते है
पर एक फन से निकल कर दूसरे फन तक ही पहुच पाते है 
धीरे धीरे फनो ने विष उगलने और खून चूसने की मात्रा बढ़ा दी है
लोगो पर उनका कसाव और दबाव भी बढ़ता जा रहा है
इस दबाव और कसाव के कारण कुछ लाल खून वाले जीव एकत्र होने लगे है
और अपने लाल खून तथा अपनी गरमी को मिला कर एक लाल समुद्र
अथवा एक ज्वालामुखी बना देने का प्रयास करने लगे है
जिस दिन यह ज्वालामुखी तैयार हो जायेगा
उस दिन निश्चित ही सारे फन कांपने लगेगे  
जिस दिन यह फूटेगा फन भी जलने लगेगे
फनो की जगह राख दिखलाई पड़ेगी जो खाद का काम देगी
और सारा गर्म खून उसे सींचेगा
तब जो जुताई होगी और फिर जो फसल तैयार होगी
उसे हमेशा की तरह केवल फन नही सारे जीव खायेंगे
तब समाज के जीवो में अपना खून होगा गर्म खून
अपनी छत्रछाया होगी अपनी दिशाए तथा अपने फैलाव होंगे
ज्वालामुखी तैयार करने की प्रक्रिया में मैंने भी अपने को भट्ठी में झोक दिया है
सिंचाई के लिए अपने खून का कतरा कतरा निचोडना शुरू कर दिया है 
सबके साथ मेरा भी खून रंग जरूर लायेगा
क्योकि इतिहास ने खून चूसने वालो का नही खून बहाने वालो का साथ दिया है .

खुशिया तों लोगो ने लूट ली दर्द का आचमन मैंने ही लिया

जितना भी लोगो ने उगला है जहर सारा मैंने तों पी लिया
कोढ़ बन गयी मेरी जिंदगी हस हस कर मैंने तों जी लिया 
कैक्टशिया खुशियों में दिन मेरे बीते है
लगता सब हरा भरा  अन्दर से रीते है
सेमल के फूल की खुशबू है तन मन में
कितने खुशनसीब जो मेरी तरह जीते है 
हंसने के उपक्रम से अभिनय तक कुछ पल मैंने तों जी लिया
मीरा ने तों एक दिन विष पी लिया था
पर मै  हर पल ही विष में जी रहा हूँ
लोगो ने तों  मौत के जहर पिए होंगे
पर मै तों जिंदगी का जहर पी रहा हूँ
दर्द ने सीमाए सब तोड़ दी पर ओठो को मैंने तों सी लिया 
तन तों भला चंगा है मन में कैंसरिया गम
हंसने के अभिनय  से नही  छुपा पाते हम
आँख से आंसू नही है खूने जिगर बह रहा 
मौत धोखा दे गई जिंदगी बन गई सितम
खुशिया तों लोगो ने लूट ली दर्द का आचमन मैंने ही लिया

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

जयप्रकाश जयप्रकाश रट रट के लोग   यहाँ देश के प्रधान और मंत्री बन आये  थे,
साथ साथ चीखते थे क्रांति क्रांति उनके वे चौहत्तर में क्रांति का शंख जो बजाये थे|
समझी थी जानता कुछ भला करे देश का ये इसीलिए वोट उनको ही डाल आये थे,
पर पता चला की एक सत्ता को हटा के यारो सत्तालोलुपो  की पूरी फ़ौज ले आये थे|

लोकतंत्र लोकतंत्र की तों बात सब करे पर लोकतंत्र का मतलब ना कोई जानता
लोकतंत्र नही ये तों भीडतंत्र है यारो डंडे गोली बिना  यहाँ कोई बात नही मानता
समझे है अर्थ  सब जो चाहे सो  करे चाहे  कोई मारे और  चाहे  कोई  मर जाये
लोकतंत्र वहा नही चल सकता है  देश जो अधिकार   और कर्त्तव्य ना पहचानता

हर वर्ष मनाते हो आजादी दिवस पर अब तक देश में आजादी नही आई है
चारो ओर भूख भ्रस्टाचार बेकारी  यहाँ आजादी पे कैसी बदली  सी छाई है
भरे है गोदाम के गोदाम इस देश के पर फिर भी  कैसे बढ़  रही  महंगाई है
नही तेरी मेरी नौकरशाह व्यापारी नेता इनकी खातिर आजादी चली आई है

जब तक इन्कलाब का स्वर फूटेगा नही  तब तक देश में आजादी नही आएगी
जब तक भ्रष्टाचारियो से पिंड छूटेगा नही तब तक देश में आजादी नही आयेगी
जब तक फसेंगे नही नेता नौकरशाह यहाँ और  व्यापारियों को जेल हो जाएगी
सुनो ये कह रहा हूँ इस देश में यारो  जनता के जागे बिन आजादी नही आएगी

जाति और संप्रदाय का ही बोलबाला यहाँ तब लोकतंत्र भला कैसे रह पायेगा
नेता चुनाव लड़े नीतियों और आदर्शो पर भ्रष्टाचारी पूंजीपति कैसे सह पायेगा
इतना जहर भरा है लोकतंत्र की जड़ो में कोई भी हो कुछ भी नही कर पायेगा
लोकतंत्र  तभी जिन्दा होगा इस देश में  फूट कर जब सब मवाद बह जायेगा 

                       संसद  में  हल्ला  मचाते  है  हम
                       जूते  और  चप्पल  चलते  है हम
                       लाशो पर चल कर आई  आजादी 
                       शहीदों को  कैसे    लजाते  है हम

लिखा वेद शास्त्रों  में आएगी प्रलय कल हमने इसी  के लिए रास्ता बनाया है
नही कही भूख है नही है बेकारी कही सारा पैसा परमाणु भट्ठी में लगाया है
परमाणु बम से ही भूख  मिटाना अब दाया और बांया हाथ इसी में जुटाया है 
दोनों हाथ कल झगडा करे ना कही इसीलिए दोनों को ये झुनझुना थमाया है

झगडा किया जो कल दांये बांये हाथ ने झगड़े में  सारा ही शरीर जल जाना है
मिट गया शरीर तों कल फिर बचेगा क्या किसलिए  इतना सब कुछ जुटाना है 
किसलिए बनाये जा रहे  परमाणु बम जब की पता है किसी काम नही आना है
इन्ही पैसो से मिल सकता उन्हें जीवन जो भूखे नंगे है और ना कोई ठिकाना है

जीवन में आई है एक नई बहार रे ------ [ 3-1 -1983 ]

कल तक जीवन में पतझड़ था कल से जीवन में आई है एक नई बहार रे
कल तक जीवन में बदली थी ,कल से जीवन में आई है एक नई फुहार रे
कल तक थी अंधियारी रातें ,कल थी बस  तीखी  बातें
कल जीवन में था सूनापन कल तक थी कडवी सौगातें
कल तक  जीवन में मिलता था हर तरफ अंगार रे
कल .....................................................................................
कल जीवन में आभा चमकी कल ही तों इक बगिया महकी
कल जीवन में फूल खिला है जीवन में कल खुशियाँ  चहकी
कल से बस अपना बना है  एक नया ही संसार रे 
कल .....................................................................................
अब दुनिया में अपना भी एक आंगन है,  इस आंगन  में आया अपना  सावन है
अब ये जीवन की खुशियाँ सब अपनी है अब अपना जीवन खुशियों का जीवन है 
सूखे जीवन में मिला है अब जा के  एक प्यार रे
कल ........................................................................................
कल जीवन में नई रोशनी  लायेंगे कल जीवन  की बगिया  को  महकाएँगे
कल का अपना जीवन दुनिया देखेगी कल जीवन को खुशियों से चह्कायेंगे
अब जीवन में भरनी खुशियाँ तों अपरम्पार रे
कल तक जीवन में पतझड़ थ कल से जीवन में आई है एक नई बाहर रे .    
                                                             

सोमवार, 16 अगस्त 2010

पेरुम्बुतूर की शहादत

पेरुम्बुतूर की शहादत
आज भी समूचे देश को याद है ,लगता है कल की ही तों बात है
यू तों सत्ता के बहुत से नायक जिन्होंने देश की खातिर नाखून भी नही कटवाया
उन पर तथा गाँधी परिवार पर लगातार कीचड डालने की कोशिश की
कौन भूल पायेगा ,वह पल जब देश के गद्दारों के एक धमाके से
टुकड़े टुकड़े हो गए रास्त्रनायक राजीव गांघी के
जिसे कहा गया था दुनिया का सबसे खूबसूरत राजनेता 
उसी को बदसूरती से दुनिया से विदा कर दिया गद्दारों ने
आंसुओ में नहा उठा समूचा देश ,रो पड़ी माताएं ,
विह्वाल चीख में डूब गयी पूरी पीढ़ी, जो भविष्य की आस्था भरी निगाहों से  
राजीव के एक एक सपने का जन्म होते देख रही थी ......
अवाक् पूरा देश था ,परिवार स्तब्ध और मूक
दौड़ पड़े सभी पेरुम्बुतुर की तरफ
उस दिन पेरुम्बुतूर में ............
कातर  प्रियंका ने झुलस गयी एक उंगली को देखा
बोली देखो ना माँ उसी को पकड़ कर मै चलना सीखी
उसी को पकड़ कर मेरे पांव जमीन पर टिक सके
विह्वल राहुल ने दिखाया एक हाथ
बोला माँ यही है वो हाथ जो मुझे गोद में उठाते थे ,झुलाते थे
पापा ने इसी से आसमान की तरफ उछाल कर कहा था
बेटे उतने बड़े हो जाओ पर देश को उसे भी ज्यादा ऊंचाई पर ले जाओ
सोनिया ने देखा एक तरफ पड़ा हुआ सीने का हिस्सा
देखती रही अलपक इस उम्मीद में की शायद अभी दिल धड़क उठेगा
जो धड़कता था मेरे लिए ,बच्चो के लिए और उससे ज्यादा देश के लिए
मन में एक पल के भीतर गुजर गए याद के कई दशक ....
"इस शरीर में देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी "
तभी दिखा चेहरा और खुली हुई आँख जो शायद पूछ रही थी
मैंने तुम्हे पास आने दिया नलिनी अपना समझ कर और तुमने ...
मैंने तों किसी का कुछ नही बिगाड़ा था बस की थी कोशिश
देश को दुनिया के साथ या और आगे दौड़ाने की ,उसमे सब आगे होते
उस आँख में इकीसवी सदी के भारत का सपना थरथरा रहा था
व्याकुलता में समेट रहे थे राहुल ,प्रियंका और सोनिया शरीर का एक एक टुकड़ा
ताकि हिन्दुस्तानी परम्परा से एक शहीद का ,पति और पिता का अंतिम संस्कार हो सके .
और वह भविष्य के सपने देखने वाला  खूबसूरत राज नेता विलीन हो गया |

शनिवार, 14 अगस्त 2010

दरवाजे कि कुण्डी खटकी मत खोलो दरवाजा जी

दरवाजे की कुण्डी बोली ना खोलो दरवाजा जी
डाकू सारे निकल पड़े है बजा रहे है बाजा जी   |


थाने बाहर ह्त्या हो गई थानेदार मुह फेरा जी
सट्टा,मटका दारू भट्टी वही है उसका डेरा जी
भले आदमी दूर दूर और गुंडे घर के अन्दर जी
हर घटना में हिस्सा तय है ये तों बड़ा कमेरा जी


मेले में ही लाज लुट गयी लाज नहीं थी आइ जी
वो चीखी थी बचा लो भैया पर नहीं कोई भाई जी
अपने घर कि लुटती कायर तब भी ऐसा करते जी
गुंडा छूट गया इज्जत से नहीं थी कोई गवाही जी


बस्ती से बच्चा उठा ले गए जी था वहा अँधेरा जी
समझो ये बस्ती में हो गया अब गुंडों का घेरा जी
नानी मर गयी जाने दो प़र मौत तों घर देखा जी
उसका बच्चा वो उसका था पर अब नंबर तेरा जी


अध्यापक है विषय अलावा बाकी सब है जाने जी
बहुत बड़ा धन पशु बनना है मन में ये है ठाने जी
कई गाड़िया कई हो बंगले तब अपना जी माने जी
मुर्गा विस्की, नई नई शिष्या तब गायेंगे गाने जी


आसमान में ईश्वर अल्ला नीचे तों पत्रकार है जी
राम कृष्ण को राह दिखा दे ये इतने फनकार है जी
गाँधी नेहरु या सुभास सबको इनकी दरकार है जी
जब चाहे जिसकी बनवा दे सब इनकी सरकार है जी


ये अफसर आज के राजा इनका है क्या कहना जी
एक परीक्षा  फिर देश को साठ साल तक सहना जी
कुछ ना करना काम टालना आँख में पैसा रहना जी
गंगा जमुना कही से आये , इनके घर से बहना जी


ऊपर वाले से ये मिलवाते इनका बड़ा है खेला जी
क्या क्या बेचे क्या ना बेचे इनका बड़ा झमेला जी
सादगी पर प्रवचन होगा पचास लाख का मेला जी
सुन्दरियो कि बड़ी फ़ौज है इनका हरम अलबेला जी


अरबपति व्यापारी है दानी रोज नहाते गंगा जी
नकली बेंच मिलावट कर  दबा दिया है चंगा जी
इनके घर में मने दिवाली औरो के घर मातम जी
धंधे में उन सबका चंदा जो लूट करे या दंगा जी


नेताजी थे सुभाष बाबू पर ये भी नेता कहलाते जी
उन सबने सब कुछ छोड़ा ये सब है घर ले जाते जी
ससद से भत्ता और सुविधाए बाहर मन बहलाते जी
देश बच गया खाने को है बाकी सब कुछ खाते जी


भारत है कितना महान कि फिर भी बढ़ता जाता जी
भारत के गौरव का सूरज , ऊपर चढ़ता जाता जी
हम थोड़े ईमानदार होते तों भारत का क्या होता जी
सबसे आगे होता भारत और हसती भारत माता जी
मै खड़ा रहने की कोशिश करता हूँ
कोशिश करता हूँ की मै भी चलता रहू और जिंदगी भी
साथ चलने वालो को कोई दुःख ना हो कोई कमी ना लगे
लेकिन लगता है की मै उतना समर्थ नहीं हूँ जितना वो

पहले बड़े बुरे बुरे समय देखे बल्कि बदतर समय देखे
लेकिन हारा  नहीं मै कभी भी, हिचका भी नहीं मै
पर अब हारने तों नहीं हिचकने लगा हूँ
मेरा तों मूल वाक्य रहा है
की मै हरूँगा नहीं ,रुकूंगा नहीं
क्या मेरा अकेलापन मुझे हरा देगा मुझे झुका देगा
प्रयास तों अंतिम समय तक करूंगा की चलता रहू, चलाता रहू
सब उसी शान से, उसी दृढ़ता से, उसी सम्मानजनक व्यवस्था से
लेकिन मै ईश्वर नहीं साधारण मनुष्य हूँ
जब तक सामर्थ्य है तभी तक चलूँगा
जब तक हिम्मत है तभी तक रुकूंगा
फिर मेरा भी तों सफ़र और गंतव्य निर्धारित है
मेरा शरीर हो ,मन हो ,दिमाग हो या हिम्मत
सबकी सीमाए तों निर्धारित है
फिर सकल्प तों यही है की उनकीं कमी मेरे अलावा किसी को ना खले
चाहे जितना भी संघर्ष किया है अब किसी का जीवन संघर्ष में ना पले
जब साँस है, आस है, मै हूँ, हारूंगा नहीं,
रुकूंगा नहीं,तकलीफों और संघर्षो के सामने झुकूंगा नहीं |
बहुत दुखी हूँ, मेरा जीवन, जीवन क्या, दुःख की परिभाषा,
ना कोई रस्ता, नही उजाला,ना कोई साथी, ना कोई आशा
पर जीना है, बहुत काम है, बहुत सफ़र है, मना है थकना
दुःख की  छोडो, साहस जोड़ो, पढो  केवल संघर्ष की भाषा
                                         पाकिस्तान के नाम
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छोटी छोटी बाते छोडो ओछी हरकत बिना बात की नफरत छोडो आओ बैठो बात करे
सैतालिस से बहुत लड़ लिया हमसे नफरत बहुत कर लिया ,आओ नई शुरुआत करे
 
इन सालो में क्या पाया है अमरीका की भीख पर जीना पाक बना क्या इसीलिए था  
आजादी से अब तक केवल मौत और बन्दूक का शासन देश बटा क्या इसीलिए था
बटवारे से घटे ही हो तुम और हमने खुद आकाश छू लिया सारी दुनिया मान रही है
बंदूके दे भेज रहे हो अपने बच्चे की वे मेरे बच्चो को मारे बटवारा क्या इसीलिए था
 
याद करो हम लड़े रहे  थे अंग्रेजो से हिन्दू ,मुस्लिम सिख, ईसाई तब  क्या सपने थे
उन अंग्रेजो के पैसो से हर बार लड़े तुम मुह की खाई पर मरने वाले दोनों ही अपने थे
तुमने तों घायल कर डाला अपने तन को मेरे मन को क्या मिला तुम्हे बस कुछ डालर
गर  ना लड़ते ना बटते दोनों बाजू ना कटते कितनी ताकत होती अपनी क्या कहने थे


टैंक नहीं उस पैसे से नहरे बांध और टंकी बनाये जो प्यासे हो खेत औ घर पानी पहुचाये
जो भी पैसा खर्च हो रहा  सेनाओ पर इससे बनें स्कूल फैक्ट्री जीवन को आसान बनाये
भूख गरीबी और बेकारी उधर है तो इधर भी दुनिया की सारी बीमारी उधर है तों इधर भी
लड़ना छोडो आओ मिल कर इन्हें भगाए जर्मनी ने तोड़ दिया अब हम भी दीवार गिराए


हमने हाथ बढाया है दिल से आवाज लगाया है तय कर के आओ अब ना समय बर्बाद करे 
..........................................................................................आओ मिल कर  बात करे |
हम थे  तुमको  दिल दे बैठे तुम थोडा भी निभा ना पाए
और ये भी कैसा इंतजार था मौत आ गई तुम ना आये

बस ये  मुझको मंजूर नहीं था कोई तुम्हे बेवफा बताये
बाहर तक आते देख किसी को हाथ हिलाते पर ना आये

धन दौलत के इस बाजार में दिल का सौदा मै कर बैठा
मै फ़कीर और इतनी जुर्रत, तुम इसको ही पचा ना पाए

बड़ी सी कोठी, कार बड़ी सी, दौलत होगी  प्यार ना होगा
अपने पास भी दौलत दिल की बहुत बड़ी थी दिखा ना पाए

कितना पागल, ढूढ़ रहा हूँ प्यार और वफ़ा  इस दुनिया में
होती तिजारत यहाँ प्यार की दिल को हम समझा ना पाये

ना कानून  ना कोई सजा है तों फिर क्या तुम दिल तोड़ोगे
दिल की अदालत वफ़ा की सजा ये किताब हम पढ़ा ना पाये

रोने धोने की आवाजे, कैसा बिस्तर, कैसे कांधे, अब जाना है 
बहुत भीड़ है सभी खड़े है मै जाऊ तों कैसे जाऊ तुम ना आये  








 





                                                                             
नेताजी भाषण कर रहे थे ,
आओ मंदिर मंदिर खेले ,
लोग द्वापर,त्रेता भूल गए है ,
उन्हें मंदिर की तरफ धकेले|
यह देश है महान ,
यही पैदा हुए करोडो देवता और कई भगवान,
इसलिए तुच्छ इंसानों हमारी बात मानों |
मैंने कहा नेताजी
यही किसी ने नहाती हुई औरतो के कपडे चुराया था ,
किसी को केवल धनुष छू लेने से गुस्सा आया था |
भगवान होते हुए युद्ध नहीं रोक पाए ,
महाभारत करवाया था |
यही स्त्री और राज्य जुए में हारे थे
पर वे महान थे ,
एक औरत को पांचो ने बना लिया पत्नी
फिर भी चरित्रवान थे |
औरत भगाई वे अच्छे थे ,
हाथी और आदमी में फर्क नहीं किया
कितने सच्चे थे |
यह देश इतना महान था,
आशीर्वाद से बच्चे पैदा करने का
केवल संतो ,इन्द्र और सूर्य को ज्ञान था |
यहाँ आदर्श है और
उसके लिए बहुत संघर्ष है,
जयद्रथ अभिमन्यू भीष्म के वध
यही सन्देश देते है ,
एकलव्य का अंगूठा और बाली की हत्या
यही सन्देश देते है |
यही सीता को आग में चलाया गया
और बच गई तों जंगल पहुचाया गया |
इन्द्र ने अहिल्या से किया व्यभिचार
और ऋषि ने उसे पत्थर बनाया |
राम ने फिर औरत बनाया की
फिर कोई इन्द्र ले इज्जत उतार,
ताकि कोई भगवान कर सके उद्धार|
यहाँ जब किसी ने तप और साधना किया तों ,
उसे राक्षसों ने कम देवताओ ने ज्यादा उजाड़ा ,
कभी रम्भा ,कभी मेनका से
उसका इमान बिगाड़ा |
कोई देव ना बन पाए ये लड़ाई पुरानी है ,
जी हा आज कोई अच्छा ना रहे
यह उसी सीख की निशानी है |
मैंने कहा नेताजी क्या क्या बताऊ ,
करोडो देवो में से
किसके किसके किस्से सुनाऊ,
नेताजी तमतमाए ,
मुर्ख अज्ञानी धर्म के खिलाफ बात करता है,
नहीं डरता है ज्यादा पढ़ गया है
प्रगतिशीलता का बुखार चढ़ गया है|
नहीं जानता बड़े सिर्फ बड़े ही महान होते है.,
भगवान केवल राजाओ के यहाँ ही पैदा होते है ,
वही बड़े ज्ञान होते है|
हमें उनके कर्म और विचारो पर
चिंतन का अधिकार नहीं है,
अगर कर रहे है तों धर्म से प्यार नहीं है |
ऐसा करने वाला नरक में जायेगा,
बड़ी सजा पायेगा |
हमने कहा नेताजी क्या होता है
नरक और उसकी सजा ?
पैदा होने से पहले बच्चे को पेट से निकाल
चाकुओ से गोद कर जलाना ,
किसी ट्रेन कार या घर में चीखते हुए जलना,
राख की ढेर में अपनों की लाश चुनना |
जली बस्ती में अपना घर तलाश करना,
बिना कारण अंजानो के हाथ मरना ,
भूखा रहने पर आत्महत्या या शरीर बेचना ,
पेट भरने के लिए चिता से लाश
और कफ़न खींचना |
लोग भूख ,बेरोजगारी ,
लाचारी क्या क्या सह रहे है,
आप नरक से डर की बात कह रहे है |
आपके देव कहा चले जाते है
जब उनका ही कोई तडपाया जाता है  ,                                                
किसी को विष, किसी को गोली,
किसी को सूली पर चढ़ाया जाता है |
करोडो के पेट हो ख़ाली पर
करोडो लीटर दूध नाली में बहता है ,
करोडो लोगो का खाना हवन में जलता है ,
मंदिर के तहखाने में होता है
व्यभिचार और हत्या,
थैली देख मंदिर में पूजा कराइ जाती है,
जहा अबोध बच्चा
दूध या दवा के बिना मर जाता है ,
पापी सबका हिस्सा अकेले चर जाता है
इसलिए नेताजी जानता को मत बहकाओ ,
मंदिर मस्जिद लाशो पर नहीं
इन्सान के दिल में बनाओ |
उसमे इमान और कर्म का भाव जगाओ ,
नफ़रत की नहीं प्रेम की गंगा बहाओ |
राम ,नानक ,अल्ला ,ईशा
किसी के नाम का राज बनाओ ,
उसमे
भूख बेकारी महामारी पाप अत्याचार ना हो,
कफ़न  मौत और वोट का व्यापार ना हो,
वरना जनता जाग रही है ,
इसीलिए तुम्हारे नकली धर्म से भाग रही है |
अगर आया उसकी शांति में अवरोध
तों
तुम सब अंतिम बार दण्डित किये जाओगे ,
ताकि मानवता को खंडित होने से बचाया जाये ,
अलग अलग ईश्वर का भेद मिटाया जाये,
लोगो को मारने लूटने और जलाने वालो का नहीं,
बनाने और बढ़ाने वालो का समाज बनाया जाये|
जब हर इन्सान के दिल में आ जायेगा
नानक अल्ला ईशा और राम ,
तों एक नहीं करोडो धर्मस्थल
अपने आप बन जायेंगे|
ना जमीन का झगडा ना ईंट ना गारा
ना दीवार ना दंगा ना हत्या,
चारो तरफ मंदिर मस्जिद
चर्च गुरद्वारा नजर आयेंगे |
नेताजी आइये ऐसी दुनिया बनाये ,
नरक को मिटाए,
मंदिर मंदिर मस्जिद मस्जिद नहीं
बल्कि इन्सान इन्सान खेले,
नेताजी स्वयं सहित सबको
इंसानियत की तरफ धकेले |.
कैसा लगता है अकेलापन 
छोटे होते है तों डर जाते है माँ बाप का साया जरा सा हिलते ही
फिर अच्छा लगने लगता है अकेले में बैठना ,अकेले सोचना
बुनना ख्वाब तरह तरह के अपेक्षित औए अनपेक्षित भी
फिर कोई चुपके से प्रवेश कर जाता है अपनी नाव में बेअंदाज
चलने लगते है चप्पू अलग अलग दिशाओ से अलग अलग उर्जा से
अलग अलग विश्वाश और अविश्वाश से
फिर मरा मरा, राम राम होने लगता है 
औए चप्पू की दिशा ,वेग तथा लय,लयबद्ध हो जाती है
चलने लगते है नाव में साथ साथ
समय ! नाव में कुछ मासूम ,रक्तिम अनुभूति वाले सवार बैठा देता है
पता नहीं कहा तक साथ चलने के लिए नियति के अनुसार
आदत पड़ जाती है इन नाविकों की, जीवन को ,चिंतन को,भावना को
किसी पड़ाव पर किसी कारण से उतर पड़ता है कोई एक भी
तब सन्नाटा पसर आता है जीवन में,उतर आती है शाम भरी दोपहरी में 
कही ख़ाली हो जाता है मन का हर कोना,डंक मारने लगता है अकेलापन
याद आने लगती है वो चाय की प्याली ,केक की सुगंध ,चाय की छलकन
और हर वक्त  सहारा बनाए को उत्सुक एक स्वर
सभी स्वर और आवाजे बदल गयी है
कल सुबह सब कुछ लौट आएगा और चहचहा उठेंगी सभी दिशाए
फिर जीवन की नाव चलने लगेगी
उसी दिशा में पूरे विश्वाश ,वेग और समर्पण के साथ 
पूरे आवेग के साथ चप्पू दोनों तरफ चलेंगे ,
नाव सही दिशा में चलेगी
साथ बैठी सवारियां फिर हौसलाआफजाई करेंगी
अपनी मासूम अभिव्यक्तियों के साथ
एक विश्वाश होगा की जब चाहो चप्पू को कई हाथ चलना शुरू कर देंगे
उनका सम्वेत स्वर ,समग्र शक्ति और समर्थ भावना भिगो देगी सभी को
अकेलापन दूर से देखेगा उदास होकर
जब ईश्वर ही अकेला कर दे तों
अब ना चप्पू चलेंगे ना नाव चलेगी ,ना कोई स्वर गूंजेंगे
पूर्ण विराम .
वो अपने आप पर हँसता है  मुस्कराता है
तभी एक पत्थर उसकी तरफ को आता है|
.
जमी पर उतरा है तब से ही बड़ा घायल है
लोगो के दिए गमो को पका कर खाता है |.

उसको भी आसमा को छूने की चाहत थी
जमी पर घायल है पंखो को फडफड़ाता है |

अपने पांव पर चलने की बड़ी कोशिश की
मिली अपनों से चोट तों वो लडखडाता है |

क्या बात, उसे मंजिल कभी नहीं मिलती 
खुदा भी उस पर क्यों  नहीं तरस खाता है |

खुदा ने उसको नहीं अपना करम माना है
तभी तों उसके करम मिट्टी में मिलता है |

वो डाकिया जो सबको ही चिठ्ठियाँ देता
उसके घर के सामने से निकाल जाता है |

मंजिल जब कभी होती है पास आने को
उसे फिर कोई गलत पते पर ले जाता है |

वो भी सूरज को माथे पर टांक सकता था 
आज उसका दिया भी तों टिमटिमाता है |

वो चाहता  तों समंदर  में डूब सकता था  
पर फिसलनो पर  वो ना फिसल पाता है |
 
जिसके लिए भी अपने को दांव पर रखा
वो ही हर बार गलत रास्ता दिखलाता है |

वो अपनी जिंदगी का हश्र देख कर हँसता 
जमाना भी  दांतों तले उंगलियाँ दबाता है |

ये जिंदगी है यारो  जीना है इसे मस्ती से
फांकेमस्ती में भी मस्ती से गुनगुनाता है|
मै
एक और अभिमन्यू!
जीवन के चक्रव्यूह में फस गया हूँ
मेरे चारो तरफ
 चक्रव्यूह का निर्माण करने वाले भी मेरे ही है
हाँ, अभिमन्यू की भाति 
मेरे अति निकट के लोगो ने
मेरा शिकार करने के सारे जतन कर लिए है
मै लगातार संकोच में हूँ की
 इनमे से किस पर हथियार उठाऊ
मेरा द्वन्द और भावनाएं मुझे रोक रहे है
हथियार उठाने से
परन्तु शिकार कितना ही कमजोर क्यों ना हो
और घेरने वाले कितने ही बलशाली
मौत सामने देख स्वस्फूर्त युद्ध शुरू हो ही जाता है
मै भी चक्रव्यूह से निकलने की कोशिश कर रहा हूँ
लड़कर चक्र पर चक्र पार करता जा रहा हूँ
पितामह को प्रणाम कर
 उनका रथ पीछे धकेल दिया है
लेकिन नियति से लड़ने की कला
कोई अभिमन्यू नहीं जानता
लड़ाई जारी है और चक्रव्यूह पूरे कसाव पर है
और मै एक और अभिमन्यू चक्रव्यूह में संघर्षरत
संघर्ष और चक्रव्यूह का अंत
ना पांडव को,ना कौरव को पता है
और अभिमन्यू को भी पता नहीं होता है .
जीवन !कभी कभी रेगिस्तान के सूखे ठूठ के समान हो जाता है
लगता है की कैसे कभी उगा होगा यह पेड़ इस रेगिस्तान में
पानी नहीं ,खाद नही और यह सब देने वाला भी कोई नहीं
उगा तों कैसे उगा ,बढ़ा तों कैसे बढ़ा ,कैसे बना ठूठ यह सवाल निरर्थक है
ठूठ बनकर  लगातार खड़े रहना खड़े रहना खुद में एक बड़ा सवाल है
चारो तरफ आखिरी छोर तक बालू ही बालू,,,,मृगमरीचिका से उम्मीद करता ठूठ 
फिर मरीचिका का भ्रम टूटते ही अंतिम छटपटाहट का शिकार होता ठूठ
फिर एक नई दिशा में पानी का आभास देता बालू का समुद्र
और फिर नए सपनो में आशान्वित हो खो गया ठूठ
खूबसूरत आभा की तिलस्मी का शिकार मुस्कराता हुआ
अंतिम लौ के समान उठान लेता हुआ वह ठूठ
जिंदगी फिर कराहती है बालू की गरमी और इस समुद्र के अकेलेपन से
अपनी ही अपने पर अविश्वाश की कुटिल मुस्कराहट से 
और निहारने लगती है दूर कही दूर
शायद अभी तक तने की कोशिकाओ में कुछ जल बचा है और                                                                          बचा है कुछ संघर्ष करने का माद्दा और सोचने की ताकत
लेकिन यदि कही से बरसात नहीं हुई तों ठूठ तों केवल ठूठ है
और साथ ही चारो तरफ फैले बालू का दूर तक फैला यह समुद्र
लेकिन जल नहीं मिल पाने की तकलीफ तों केवल ठूठ ही समझ सकता है
वह जिंदगी जो ठूठ बन गई है रेगिस्तान की
लोग उसे देखना भी पसंद नहीं करते,कोई उम्मीद नहीं होती है उससे ना
फल की या छाया की
और तपते रेगिस्तान में जहा सब कुछ जल रहा है
लकड़ी को इंधन बनाने की किसे जरूरत है
ठूठ ने सोच लिया कि जिंदगी की अंतिम हार है
तों वह इंधन बनने को भी तैयार है .
क्यों ! कुछ लोगो के जिम्मे होताहै
केवल विष पीना,गोली खाना ,सूली चढ़ना
या केवल आलोचित होना बार बार
उनमे से कुछ तों महान हो जाते है
 इतिहास के पन्नो में
परन्तु ऐसा भी तों होता है की कुछ लोग
रोज खाते है गोली लोगो के इरादों की
पीते है विष लोगो की भावना की
चढते है सूली लोगो की निगाहों की
खाते है केवल आलोचना का खाना
पीते है गाली का पानी
सम्हल भी नहीं पाते है की
 दोहराई जाती है यही कहानी
और बार बार दोहराई जाती रहती है
उसके जीवन भर
और महान क्या सामान्य भी नहीं हो पाते है
कोई विज्ञानं या मनोविज्ञान
 इनकी कहानी सुलझा नहीं पाता है
और वे अपनी जिंदगी
सुलझाते सुलझाते इतने उलझ जाते है
की मकड़ी के जाले में फसे नजर आते है
और वह क्या उसका भविष्य भी
 भविष्य के गर्भ में होता है
ऐसा गर्भ !
जिसे अल्ट्रासाऊंड भी नहीं बता पाता है .

मैं पत्थर हूँ बिना काम का

मैं पत्थर हूँ बिना काम  का मुझे कहां ले जाओगे,
कथा हमारी मत पूछो, सुन कर पागल हो जाओगे|
क्या बतलाऊं धोखे, कांटे, विष के जंगल भरे हुए,
मत सहलाना दर्द हमारा, तुम घायल हो जाओगे|
वो बच्चे हैं ना
हर हर महादेव और
अल्ला वो अकबर का शोर                                                                       
मौत का तांडव ,चीत्कार
हाहाकार चारो ओर,चारो ओर
और उसी में,.इधर उधर भटकते,
माँ को खोजते दो बच्चे
धर्म नहीं पता,जाति नहीं पता ,
जीवन और मृत्यु भी नहीं पता
जो हसकर बोल दे ,गोद में उठा ले
सीने से लगा ले वे सभी अच्छे
वो बच्चे है ना 
माँ माँ दूधू, माँ माँ रोटी उठो ना माँ 
कटा हाथ और सर पा
उसी से खेलने लगते है
वो बच्चे  है ना
दूसरा, दूध मांगते मांगते
रंग से नहा जाता है, लाल रंगसे
और किसी सीने पर सर रख
उलटने पुलटने लगता है
वो बच्चे है ना
उसने सुना था रंग का मतलब होली है
इसलिए वो भी बोला होली है
दोनों अब माँ और पापा को
पहचानने की कोशिश कर रहे  है
घूम रहे  है आवाज लगाते माँ माँ ,            
सभी औरते उसे माँ लगती हैं
आदमी उन्हें पापा लगते है ,
कैसे पहचाने सर जो नहीं है
सभी से दूध और रोटी मांगकर
थक जाते है दोनों बच्चे
वो बच्चे है ना
नहीं समझते जीवन और मृत्यु का फर्क 
मिल कर फिर खेलने लगते है
बिना जाने की दोनों बनाई गई
दुश्मन कौम के बच्चे
वो बच्चे है ना 
फिर भूख सताती है और
दोनों फिर ढूढने लगते है कुछ
खाना और दूध तों नहीं मिलता ,
मिल जाती है कटार एक को ,दूसरे को त्रिशूल
कटार वाला नहीं जानता कि वही कटार
उसके माँ बाप की कातिल है
त्रिशूल वाला भी नहीं जानता की उसे पकड़ते ही
उसका मजहब चोट खा रहा है
वो बच्चे है ना
समाज के ठेकेदारों ने थमा दिए है
उनके हाथो में मानवता के खिलाफ हथियार
पता नहीं बाद में उनकी जाति क्या होगी
उनका मजहब क्या होगा     
वे गांघी बन मानवता को बचायेंगे 
और दफना देंगे कही गहरे हथियार
या खुद हथियार बन जायेंगे 
मानवता को खोखला करने को
वो बच्चे  है ना
ये तों समाज तय करेगा और
किसको कौन पालता है वो तय करेगा
आओ हाथ में हाथ मिलाये और
इन हाथो में हथियार नहीं किताबे थमाए  
उन्हें हाथ ,पैर और सर कटी लाशो की नहीं
इंसानों की दुनिया दिखाए
वो हमारे ही बच्चे है ना
अचानक काले बदलो ने अँधेरे का अहसास करा दिया
पढ़ा था[ भूरा बादल पानी लाये ,काला बादल जी डराए ]
गलत हो गयी कहावत  ,काले बादल बरसे खूब बरसे
तन  तों नहीं भीगा लेकिन मन भीग गया अन्दर तक
जब मन भीगता है तों कुछ यादे आ खड़ी होती है सामने
उमस महसूस होने लगती है तन में भी और मन में भी
तन की उमस के इलाज तों मौजूद है कई इस दुनिया में 
लेकिन मन की उमस पर  शायद कोई शोध नहीं हुआ
ये बादल नहीं आते है तब भी डराते है हर किसी  को
आते है तों पहले मन हर्साता है ,कभी कभी तरसाता है
और जब यही बादल फट पड़ते  है जरूरत से  ज्यादा
तों वही जो हाथ जोड़ कर मांग रहे थे ईश्वर से बादल
केवल वे ही नहीं बाकी लोग भी भूल जाते है  जीवन 
ये पानी जो जरूरत है जीवन को ,खेत को ,पशुओ को
वही पानी दुश्मन बन जाता है खेत ,पशु और जीवन का
चारो ओर तबाही का मंजर ,भयावह बहाव और त्रासदी
कितना मुश्किल है कुछ लोगो का जीवन, और आधार
पानी नहीं बरसा तों भूखा रहना खूब बरसा तों भूखा रहना
एक तरफ कुआ एक तरफ खाई ,कैसी इन्होने दुनिया पाई
पानी बरसा लेखक ने कुछ लिखा और मैंने लिखी  कविता 
प्रशासन ने बनाई रिपोर्ट कितना पैसा बटना है यानी चटना है
नेताओ का दौरा, मंत्री मुख्यमंती का हवाई दौरा या हवाखोरी
कुछ पैकेट फेंकते हुए फोटो खिचवाना ,अखबारों में छपवाना
शासन ने दौरा,विपक्ष ने बयान, प्रशासन ने चट्ट,हो गया सब
अब किसान को सोचना है की जीना है या करना आत्महत्या 
मजदूर को सोचना है गाव में रहे या शहर जाये कुछ  कमाए
पढ़ा लिखा जवान मेहनत नहीं अपराध से रोटी की जुगाड़ में है 
जिसकी बेटी की होनी थी शादी ,बीमार माँ और पत्नी का इलाज
जिए या परिवार को जहर खिलाये फिर खुद मर जाये क्या करे
अखबारों और टी वी चैनलों के लिए तों मिल गया काफी मसाला
सोचना नहीं कहा से समाचार लाये क्या क्या  चौबीस घंटे दिखाए
कही ना कही लोग डूब रहे होंगे और ये उनसे पूछ रहे होंगे कैसे है क्या हाल है
इस बाढ़ में शासन की विफलता,प्रशासन का भ्रस्टाचार या विपक्ष की चाल है
डूबने वाले से सवाल मत पूछो ,उसे बचाओ ,हो सके तों उसे  रोटी दिलवाओ
हर साल ऐसा ही होता है, कुछ बाढ़ देख पिकनिक मनाते है ,कुछ कविता लिखते है
कुछ का धंधा और चंदा, किसी की राजनीति, कुछ बह जाते है कुछ भूख से मरते है
फ़िलहाल मेरा शहर बाढ़ से महफूज है दूसरे डूबे तों डूबे ,वे मेरे कुछ भी नहीं लगते
मै आवाज लगा देता हूँ अगर दिन है तों चाय ,पकोड़ी ,रात है तों मौसम का बहाना
थोडा सा नमकीन , बर्फ,ठंडा पानी, सोडा.विस्की की बोतल और गिलास ले आना 
और फिर दो पैग के बाद यादो में डूब जाना ,लिखना ,मिटाना ,आंसू छुपाना
जी हाँ काले बादल क्या आये ,क्या क्या ले आये ,क्या क्या बताये ,क्या क्या छुपाये
अभी तों ए सी कमरे में बैठ खिड़की से बाहर देख कर मन भीग रहा है तन भीग रहा है| .
वही घर है वही हम है वही सब है  मगर हम बेगाने हो गए है
अपना संसार  ,और अपना प्यार था सब  अफसाने हो गए है
.
कैसे कुछ भी मांगू आजकल हिम्मत नहीं पड़ती
कुछ कहना चाहता हूँ तों जबान लडखडाती  है
चाय अमृत लग रही है और खाना लाजवाब है 
जो भी मिल जाये वही जीवन की अजब थाती है

निशाने लोग होते थे हमारे और अब हम ही निशाने हो गए है

हम बड़े हैं हम करेंगे सब, कर्त्तव्य निभाना हमें है
हम तुम्हारे है, तों तुमको आगे बढाना भी हमें है
तुम रुक गए तों अपनी आहुति चढ़ाना भी हमें है
नहीं अच्छा ,जिम्मेदारी हमारी,मर जाना हमें है

नहीं रोते थे ना रो रहे थे  अब तों  रोने के भी बहाने हो गए है

अपना ही टुकड़ा जो बहुत प्यारा है बहुत अपना है   
मेहनत और सलीके से  सब कुछ सम्हाल  रखा है
पता नहीं क्यों फिर भी बहुत संकोच में रहता हूँ मै
जितना संभव नहीं होता उतना मेरा ख्याल रखा है

मेरा जीवन है दिल है दिमाग सब है पर सब वीराने हो गए है

पहले सब कुछ  तय था ऐसा  मुझे लगता था
मै जगू ना जगू पर  ओ बहुत सुबह जगता था
ओ जगाता मुझको था की चाय आ गई साहब
थकन हो ,निराशा हो  और दर्द सब भगता था

अब थकन भी निराशा भी दर्द भी क्या क्या ना जाने हो गए है

अकेला मै बाकी सब अलग कोने में  दिखाई देते
बहुत मुश्किल से ही शायद कुछ शब्द सुनाई देते
मेरा कर्त्तव्य है जुड़े रहना और सब  पूछते रहना
करना है मुझे सब ठीक बहुत से लोग बधाई देते

ख़ुशी कही की, बधाई कही की,और मै,सब अनजाने हो गए है  '

अगर जीवन है तों जीने का बहाना ढूढ़ना होगा
जो कुछ खो गया है  ओ अफसाना ढूढ़ना होगा
गर मुर्दा दिल रहे तों मिट जायेंगे वक्त  से पहले
कोई घाट या फिर कोई  आशियाना ढूढ़ना होगा

दूर इतने आ गए, दर्द इतने भा गए, की दूर आशियाने हो गए है

चलो तलाश करे  की जिंदगी हमें कहा मिलेगी 
जिंदगी ढकी है घने बदलो में, धूप कहा खिलेगी
फटी है जिंदगी की पूरी की पूरी चादर ओढू कैसे
क्या करू कैसे  करू अब ये चादर  कहा सीलेगी

सभी अपने है अच्छे,उन सबके अपने अपने ठिकाने हो गए है
वही घर है, वही हम है, वही सब है ,मगर हम बेगाने हो गए है

आग!

आग!
जब मनुष्य को मिली तों
बदल गया उसका जीवन.                                                                               
बदली मानव सभ्यता ,
होती गई तरक्की उतरोत्तर
आग जली मिला लोहा ,
अविष्कार दर अविष्कार
जीवन का सब कुछ पानी और
आग के इर्द गिर्द ही तों है
वही आग कल दावानल बनी और
मचा दिया कोहराम
कुछ देर पहले जो बहा रहे थे पसीना
कि घर के चूल्हों में आग जल सके 
उसकी तैयारी थी बेटी के विवाह की,
बच्चा दवाई का इंतजार कर रहा था
इंतजार था किताबो का और
बूढी अम्मा को मथुरा दर्शन को जाने का
इन्ही सपनो, संघर्षो के लिए
वे बहा रहे थे पसीना
कि !
नागिन तरह लपकी आग ,
जहर कि तरह उगल दिया ढेर सा धुआं
पसीना बहा और सूख गया ,
लहू ने संघर्ष किया और जल गया
हाथ पैर आग के लिए संघर्ष करना जानते थे
लेकिन आग से बिलकुल नहीं
अपनी दवा भूल किसी के लिए दवा ,
लेकिन अब स्कूल नहीं जा पायेगा बचपन
अब कब मिलेगी रोटी ,
ऐसे क्यों जली आग कि
कई घरो में नहीं जलेगी कई दिन तक
समय से पहले सज गई चिता ,
ये थी किस बात कि सजा ,
पसीना बहाने की?
अपना बहा रहे थे ,
दूसरे का
अपनी तिजोरी में तों नहीं भर रहे थे
यदि लगनी ही थी आग तों
लगती काले धन वाले कि तिजोरी में
जिसमे बंद है किसी के ख्वाब ,
किसी कि रोटी किसी की बेटी 
या लग जाती                                                                                                                                           इन्सान के अनत संघर्ष में ,
नफ़रत ,अज्ञान ,भूख ,अशिक्षा,आतंक
भ्रस्टाचार ,व्यभिचार ,बेकारी लाचारी ,
बीमारी और बदकारी में
पर किसे जला दिया ?
जो खुद संघर्षरत थे और
बहुतो के संघर्ष को व्यापकता दे दी .
आग भी आज कि व्यवस्था हो गई है
जो गरीब को मारती ,दुत्कारती
और देती अपमान
बेईमानो को धन, गौरव, कुर्सी,
सत्ता, मान और सम्मान
इस आग से तों बिना आग भले ,
विकास चले ना चले पर ऐसे कोई ना जले.|
उस दिन सुबह सुबह गिर गया
अचानक अपना एक टुकड़ा
ठंडे हाथ ,ठंडे पांव ,निढाल सब कुछ
चार साथ थे, चारो साथ साथ ठंडे पड़ते जा रहे थे
तभी चारो की गर्मी ने टुकड़े में हरकत पैदा किया
खिल गए चारो चेहरे अज्ञात भय के साथ साथ
जब किसी ने कहा की नश्तर चीरेगा टुकड़े को
ज्वालामुखी फट पड़ा था मन के भीतर
कितना मुश्किल से कस कर रोका था उसे
परन्तु उसकी तपन की कालिमा चहरे पर आ ही गई
चेहरा पढ़ लेने का डर भी कौंधा था
चारो अस्थिर है मन से, शरीर से ,आत्मा से
चारो प्रार्थनारत है अपने टुकड़े के लिए
और प्रार्थना स्वीकार हो गई
टुकड़ा फिर चहकेगा चिड़िया बन कर
नाचेगा अपनी रौ में ,हसेगा जाड़े की धूप बन कर
और पूरा प्यार तथा जीवन डाल देगा चाय की प्याली में
फिर चहकेगी चारो दिशाए ,चारो भुजाये ,जमीन और आसमान .
वो सदमे में ही  रहा होगा शायद
उसने कुछ नहीं कहा होगा शायद
कितना शोर और कितना धुआं था
उसने कुछ देखा सुना होगा शायद

लगी थी हाट सब कुछ बिक रहा था
कुछ छुपा और कुछ दिख रहा था 
वे सब आये थे जो सब खरीद लेते है
उनसे कुछ भी ना बचा होगा शायद

जो लोग जीत कर घरो को लौटे है
वहा तों  जश्न हो रहा होगा शायद  .
उधर वो जो ख़ाली उदास बैठा है 
वो मेले में लुट गया होगा शायद

है मेला या दंगा हमारा भ्रम तों नहीं
घर नहीं कही ठहर गया होगा शायद
इससे अच्छा तों अपना  पनघट था
ओ फिसलने से डर गया होगा शायद

समंदर तों हमेशा ही इतना गहरा था
किनारे पर धोखा हुआ होगा शायद|
सीख लिया समंदर की सवारी करना
कहा पहुंचोगे ना सोचा होगा शायद .

कभी कभी दर्द खून के कतरे कतरे में समां जाता है

कभी कभी दर्द खून के कतरे कतरे में समां जाता है
होता भी है और दिखता भी नहीं
कभी लगता है की फट पड़ेगा दर्द से समूचा अस्तित्व
पर अस्तित्व खुद सवाल बन जाता है
शिराओ में बहता रक्त तथा अंतर्मन में भावनाओ का वेग
लगता है दोनों साथ छोड़ गए है
पर जीवन तों चलने, जूझने और खरा उतरने का नाम है
एक बार फिर कस कर भींच लेता हूँ स्वयं को
समेट कर उर्जा खड़ा हो जाता हूँ ,अपनों के भविष्य के लिए
नहीं तारी होने देता नकारात्मकता को 
और इस विचार के साथ कुर्सी पर बैठ जाता हूँ
की दुनिया किसी के साथ ना ख़त्म हुई है ना होगी
कोई नहीं जाता किसी के साथ अंतिम और अज्ञात पथ पर
यादो और वादों को ताकत भी तों बनाया जा सकता है
सपनों तथा इच्छित खुशियों को पूरा करने के लिए
यदि पूरा कर लिया तों महसूसा जा सकता है कोई आसपास
कष्टों वाले शरीर के बिना सूछ्म रूप में हर वक्त हर स्थान पर
पता ही नहीं चलने देता की रो रहा है या हंस रहा है
कितना सुखद है यह अज्ञात अस्तित्व,
ये अनूठा सम्बन्ध अमूर्त और व्यापक |
उस दिन देखा था
अचानक आई सुनामी की त्रासदी
छुटियाँ मनाते ,नाचते गाते
लोग जाने कहा खो गए
कुछ तों भाग भी रहे थे बचने को,
पर मौत से कोई नहीं भाग सका है
और बाढ़ की त्रासदी का वह दृश्य.\
कई दिनों तक बेचैन किये रहा मन को
एक परिवार एक दूसरे को पकडे था,
और सबने मिल कर पकड़ा यह पेड़ को
रिश्तो ने रिश्तो को पकड़ा था और,
पकड़ा था ना बिछुड़ने की भावना को
लेकिन मौत के वेग ने बहाया एक को
देखते देखते विलुप्त हो गया वह कही
फिर दूसरा,तीसरा तथा चौथा,
अंतिम को बहाया धारा ने या
उसने खुद छोड़ दिया पेड़ को .
यह जीवन की सच्चाई का परिदृश्य था,
जो त्रासदी के रूप में सन्देश दे रहा था नश्वरता का
लेकिन फिर भी जीवन तों जुड़े रहने का नाम है
और बिछुड़ने पर तकलीफ देता है .
कल ही तों चुपके से सर का साया उठ गया,
बिना कोई कष्ट दिए
या कष्ट देने की इच्छा ही नहीं थी ,
मथता रहा मन बहुत दिनों तक
अभी ये सदमा पोछ भी नहीं पाए थे कि
जो अनजाना जीवन में आया
 और जीवन बन गया
जीवन से लड़ने लगा ,
शरीर से जीवन का निकल जाना
बड़ा कष्टकारी होता है
नियति या जीवन त्रासदियो का ही नाम है
और जीवन कि इस त्रासदी ने लिख दिया इबारत
और शुरू हो गई जंग कस कर पकडे रहने
 और हाथ से छूट जाने के बीच
ज्यो ही कोई रपट बताती कुछ ठीक है
मन ठठा कर हंस पड़ता
जब सन्देश शंकालु होता मन क्या
खून का कतरा कतरा विखंडित हो जाता
पूरी कोशिश कि पकडे रहने कि जीवन को ,
अपनों कि खुशियों ,किलकारी ,भविष्य को
सबकी धुरी और अपने संबल को ,
लेकिन वे पेड़ पकडे हुए और छुटते हुए लोग ..
हर पल अभिनय करना कितना भारी होता है ,
क्योकि ये मंच नहीं है
जीवन है, अपने है,और अपनों से अभिनय
तथा पल पल छिनता जीवन छीजता विश्वास
यह जीवन कि सुनामी ,
विश्वाश कि बाढ़ ,रिश्तो का भूस्खलन
तथा आस्था और अस्मिता पर गिरता दिखाई देता
 पहाड़ और बर्फ कि फिसलन है
और कलम कि स्याही अंत में
 शब्दों का साथ छोड़ रही है धीरे धीरे ,
और अचानक स्याही सूख गई और
शब्द भी ख़त्म हो गए, बस स्तब्धता................
वही बेटा है, वही बेटी है,वही हम है ,वही घर है,
पर जीवन से हंसी और खुशियाँ सब ही गायब है|
वही कमरा है,वही है रंग,वही बिस्तर,वही चादर, 
मादक गंध,सलवट, अंगड़ाइया सब ही गायब है .|

फिर एक वर्ष बीत गया

फिर एक वर्ष बीत गया और आ गया गिनती का नया वर्ष.
चरित्र पतोन्मुख ,भविष्य पतोन्मुख .
बनावटी महफिले और धमाल सड़क से सितारों तक .
नाच ,कानफोडू शोर ,दारू की नदिया ,नशे का सुट्टा ,
और इसकी आड़ में छमाप्राप्त  सब कुछ जो लिख ना सके कलम .
कौन किसकी पत्नी ,कौन किसकी क्या और कौन किसका सनम
सब झूठे नशे और दिखावे में सराबोर ,कोई छी..भारतीय गवार ना कह दे .
शोर के साथ नए साल का स्वागत ,नाच चौराहे ,चौराहे पर
छोटे से बड़े लान तथा होटल में ,पार्टियाँ हजारो से लाखो तक की
बस बारह बजे ,बत्ती बुझे और शोर करके चिपक जाने के इंतजार के लिए
तथा बस इतना कहने के लिए की ये वर्ष शुभ हो
शुभ हो और लूट सके देश और समाज को करोडो में अरबो में
इस शुभ के लिए लोग नाच रहे है .
ये नाच रहे है क्योकि उनके पड़ोस में कल सीमा से एक लाश आई है.
कुछ नाच रहे हैं उनके लिए जो गला देने वाली बर्फ और जला देने वाले बालू की सीमा पर खड़े है .
कुछ शोर कर रहे है हमेशा साथ देने वाले दिल के मरीज पडोसी के लिए
वे नाच रहे है वर्षो के जिगरी दोस्त की आत्मा की शांति के लिए जो कल ही गुजरा है
कुछ नाच रहे है जो सबका पेट भरते भरते आत्महत्या कर रहे है
और उनके लिए भी जो सबका तन ढकते खुद नंगे ही रह गए .
ये सूरमा नाच रहे है की पड़ोस में डाका पड़ा तों ये चुप रह कर बच गए
इनके सामने जिस लड़की को हवस का शिकार बनाया गया ओ इनकी कुछ नही थी  .
इसलिए नाच रहे है .
वे नाच रहे है पानी पी कर मरने वालो के लिए ,वे दवा बिना मरने वालो के लिए
वे ,आतंकवाद ,गोधरा ,अक्छरधाम ,मुंबई ,कश्मीर ,अहमदाबाद
तमाम मौतों की ख़ुशी में नाच रहे ,क्योकि मरने वाले इनके कुछ नहीं थे .
इस बात का गर्व है और गर्व है  ससद पर हमले पर ,कारगिल पर
क्योकि वहा इनका कोई नहीं मरा .
ये बहा रहे है दारू ,नोच रहे है मॉस उनके लिए                                                                                                  
जो बाहर चिपके पेट और नंगे शरीर टुकुर टुकुर ताक रहे है की
गलती से कोई जूठा टुकड़ा उनके पास आ गिरे
चाहे फिर जंग हो उनके और सड़क के कुत्तो के बीच .
जी हां सौ करोड़ से अधिक वाले देश में ये कुछ लाख नाच रहे है और नचा रहे है इतनो को ,
छी ;ये नाच और गाना ,बहन, बेटी  तथा पत्नी को लोगो के बीच नचाना
और चिल्लाना की नया साल आ गया है,इतराना ,ओ बड़े ओ है ये बताना . 





















.
पता ना चला उम्र बढ़ी या उम्र घट गयी
पता चल पाया नहीं और इतनी कट गई 
बगीचा ,फुलवारी या बियाबान जंगल था
उजाले की तलाश में डलिया सब कट गई .

अँधेरे में जब होते है उजाला ढूढते है हम
उजाला मिल गया तों अँधेरा याद आता है
दोनों को ढूढने के कारण है अलग अलग
दोनों का जिंदगी से अलग अलग नाता है .

लोगो के सफ़र से जल रहे हो

लोगो के सफ़र से जल रहे हो
हमारे साथ क्यों ना चल रहे हो

पुरानी है कहावत अब भी नयी है
कहावत है लेकिन बिलकुल सही है
चलना बस चलना ही  जिंदगी है
रुके बस रुक गए तों मौत ही है

उठो चलो तुम जीवन भर चले हो 
अकेले हो नहीं संग चल रहे हो

चाँद कितना दूर था अब पैरो के नीचे
बुद्ध ,मंगल आज अपनी ओर खींचे 
इंसा कल शायद नया सूरज उगा दे
और सागर से ग्रहों पर फसले सींचे ,

ठान लिया,चल दिए तों सफल रहे हो


तूने पहाड़  काट कर नदिया निकाला
तूने बांधा हाथी और शेर चीता पाला
हवा में उड़ना समुद्र पर चलना सीखा
तुम  ढले पर ईश रचना को भी ढाला

बर्फ पर दौड़े  नहीं और फिसल रहे हो

आग जैसी भी हो बुझाना जानते  तुम
गर धीमी पड़ गयी जलाना जानते तुम
आग दावानल बन कभी सब लील जाती
उस आग पर चल बढ़ जाना जानते तुम

आग पर हम चल रहे है  तुम चल रहे हो

कैसा  छलना किसको छलना जानते तुम
नश्वर जिंदगी किसको अपना मानते तुम
जो दिख रहे ये सब मरे है गीता में लिखा है
फिर क्यों दिलो  में नफरतो को पालते तुम

ख़ुशी विश्वास बांटो तों तुम  भी फल रहे हो .

है उचाइयां छूना तों  बस हाथो को बढ़ा दो
बातें नहीं आत्मविश्वास पर हिम्मत चढ़ा दो
हिम्मतें मर्दा मरदे खुदा  सुना होगा तुमने
हिम्मत बांध लो  और  पावो  को  बढ़ा दो


फिर देखो मंजिल डर मंजिल चल रहे है .

आज बहुत याद आ रहा है कोई

आज बहुत याद आ रहा है कोई
कितना अकेला कर दिया मुझे
जिसने वादा किया था
जन्मो तक साथ चलने का
एक जनम भी साथ ना चल सके
सबसे बड़ी शक्ति कि मार से
बहुत संघर्ष किया साथ चलने के लिए
जीवन से और जीवन के लिए तों
संघर्ष करना आता था ,खूब आता था
लेकिन जीवन देने वाले से संघर्ष
 शायद किसी के बस में नहीं
ओ ना होती और ऐसी ना होती तों
जाने कब का मिट गया होता मै
सर का साया हट जाये तों अपना हाथ
 सर पर रख काम चल जाता है
परन्तु जब आँख कि रोशनी ,दिमाग से सोच ,
खून से गर्मी ,आत्मा से आत्म ,
मन कि खनखनाहट ,जीवन का संबल ,
जीने का आधार ,अपना पूरा संसार छीन जाये
तब कैसा लगता है किसी को ?
आज दिवाली है ,हमने कहा अपनों से मनाओ ,
यादो को दूर भगाओ ,हसो,मुस्कराओ
पर याद तजा हो गयी और गम हरे हो गए
,लगा कोई पास है लगातार
सहला रहा है ,समझा रहा है.रोशनी जला रहे है
 पर उसमे ओ चमक कहा जो तब थी
त्यौहार में ओ गर्मी कहा जो तब थी ,
सब मुस्करा रहे है फीकी मुस्कान .
सहारा बनने को लगातार उत्सुक
हमारा बेटा सहारा बन गया है , .
छुटकी हमसे से भी बड़ी ,परिवार कि धुरी बन गयी है
और बड़ी ओ तों सबका संबल है ,बहुत बड़ी हो गयी है
सब एक्टिंग कर रहे है एक दूसरे से पर सब उदास है
आप कहा है हर समय लगता है कही आस पास है
यूँ तों चारो तरफ बहुत लोग है ,बहुत जिम्मेदारिया है .
लेकिन बहुत उदासी है,अकेलापन है
,जीने में दुशवारियाँ ही दुशवारियाँ है

हे रास्ट्र पिता बापू

हे रास्ट्र पिता बापू
चरण स्पर्श ,तुम्हारे आदर्श .
तुमने रामराज्य का स्वप्न देखा था
देखो
हम कितना जल्दी जल्दी ला रहे है .
तुमने जितने भी सिधांत दिए थे ,
देखो
हम कितना मन से निभा रहे है .
पुलिस वाला कहता है,
हम भी बापू के सिधांतो पर चलते है
इसीलिए हाथ में लाठी लिए फिरते है .
सरकारे ! अहिंसा का पालन कर रही है ,
नित्य रजिस्टर गुनाहों से भर रही है .
रोज लाठी और गोली चलवाती है ,
इस तरह आप के रामराज्य को
हिंसा होने से बचाती है .
नौकरशाही ने
आपके तीन बंदरो को अपनाया है ,
उन्ही को
अपने जीवन का मापदंड बतलाया है .
इनका कहना है कि किसी को
इनका बुरा
ना देखना,न कहना,न सुनना चाहिए ,
जो ये बहा रहे है
उसी धारा में बहना चाहिए .
वो धारा सबको स्वर्ग ले जाएगी
और
आपके सपने को सच बनाएगी .
कचहरी और दफ्तरों में भी
आप का ही बोलबाला है ,
वहा के लोग कहते है की
जो आप की बात ना माने
तो उसका मुह काला है ,
इसीलिए हर काम की फीस
अलग अलग पद और काम के अनुसार
कम से कम पाँच बताई जाती है ,
कोई कम ना दे अतः पीठ पीछे लगी
आपकी पंजे वाली तस्वीर दिखाई जाती है .
बापू आपकी लंगोटी भी खूब चल रही है ,
उसे देख कर आज की महिलाये
खूब मचल रही है .
लंगोटी थी प्रतीक
कम आवश्यकताओ की
उसे उन्होंने अपनाया है.
इसीलिए कुछ कपड़ा गायब हो गया है
और कुछ नीचे उतर आया है .
सत्य ! ये तों नेताओ को प्यारा है ,
ये ही उनके जीवन का सहारा है
नेता सत्य पर चल रहे है
इसीलिए रोज विचार बदल रहे है .
उनका कहना है की जहा सत्य मिलेगा
वही जायेंगे
और
कुर्सी सत्य का एकमात्र साधन है ,
हर हालात में उसे अपनाएंगे .
बापू आपके रामराज्य में
कुछ बाकी रह गया हो तों बताना ,
तमाम जाँच आयोग बैठ रहे है ,
एक और बैठाएंगे ,
उसकी संभावनाओ के बारे में
पता लगायेंगे .
मगर आप कही दुबारा
हिन्दोस्तान में पैदा होना चाहो
तों सम्हल  कर आना
वर्ना पड़ेगा पछताना ,
क्योकि रामराज्य आ गया है ,
वो गुलाम रास्ट्र नहीं
जहा गाँधी को पहचाना जायेगा ,
यहाँ तों वो पुजेगा जो
आज के नेताओ जैसा बन कर आएगा ,
रोज सुबह के नाश्ते से लेकर
रात के भोजन तक गांधीवाद खायेगा .
अच्छा बापू पत्र ख़त्म कर रहा हूँ ,
नीद आ रही है ,
मेरी क्या गलती है ,
पूरे हिन्दुस्तान को चिर निद्रा सता रही है ,
बापू जिस दिन ये हिंदुस्तान
अपनी चिर निद्रा से जाग जायेगा ,
उस दिन आपके देश में सच्ची आजादी ,
सच्चा लोकतंत्र और सच्चा गांधीवाद आएगा|

अकेला था तू अकेला है ये क्या जीवन का खेला रे

अकेला था तू अकेला है ये क्या जीवन का खेला रे
सुख देखे दुःख देखे और मिलना बिछड़ना झेला रे

रोता रोता तू आया था सब लोगो के मन भाया था
तेरी किलकारी जब गूंजी सारा कुनबा चिलाया था
तेरा बचपन क्या आया सबके मन को हरसाया था
बड़ी मिन्नतें की सबने तब घर में  बचपन आया था

कैसे अच्छे दिन थे वे भी कैसा बचपन भी  खेला रे

अब देख तू बड़ा हो गया अपने पाव पे खड़ा हो गया
बहुत बुराई दिखती तुझमे काहे को तू बड़ा हो गया
ये बोल कहाँ से लाया किसने है तुझको सिखलाया
इससे तों निर्पूत भले थे  छाती पर आ खड़ा हो गया


तुझ जैसे बेटे से अच्छा तों  रहता  बहुत  अकेला रे

देकर खून  किया है पैदा अभी कब तक और पिएगा
जीवन में तों बहुत घाव है तू अपयश से उन्हें सिएगा
श्राप तुझे है कीड़े  मकोड़े से बदतर भी जीवन होगा
या ओ कर जो मै कहता हूँ तब अपना जीवन जिएगा

निकल और ले जा बच्चे वच्चे लगा ले अपना ठेला रे

जीवन भी क्या चीज है भैया कैसे  कैसे रंग  दिखाए
नहीं है पैसा बस शोहरत है आटा दाल कहा से आये
दवा, दूध और फीस नहीं है बच्चो को कैसे बहलाए
रोने गाने से क्या होगा आओ कुछ पुरसार्थ जगाये

बस संबल थी जीवनसाथी और साथ में  अपने बच्चे
कुछ भी हो सब खुश रहते थे ये थे अपने साथी सच्चे
आखिर अपने दिन भी आये फिर बोले ये सारे  बच्चे
संग रहेंगे मिलजुलकर ही आये है अब ये दिन अच्छे


लेकिन जीवन गूढ़ बहुत है  गूढ़ है इसका झमेला   रे

आना था ना कोई आया कई आफते घर में आ गयी
संघर्षो को बस हम भाए  और मुसीबते हमें भा गयी
सारे  मिल कर खड़े हो गए घर कि शक्ति बचाए कैसे
संघर्षो का अंत नहीं था जीवन में फिर शाम आ गयी

बच्चो का संसार लुट गया और  मै हो गया अकेला रे

अब बच्चो को एक एक कर  उनकी  राह दिखाना
जीवन में कोई  दुःख  ना आये  ऐसा मार्ग बनाना है
दुःख ही  देखे  है इन सब ने उपरवाले अब  ना  देना
दुःख हो मेरे और सुख इनके  इन्हें नहीं मुरझाना है

जीवन इसी का नाम है साथी सब है पर तू अकेला रे

याद आ गयी अब जीवन कि कहते थे कि संग रहेंगे
जो भी होगा खट्टा मीठा हाथ मिला कर संग सहेंगे
छोड़ा हमको बीच राह में थी उनको कितनी तकलीफे
क्या ना सहा और साथ दिया हम शिकायत नहीं करेंगे
                                                                                                                                                                    
सुख दुःख में  इस जीवन की गाड़ी को बहुत  धकेला रे
कितना छुपाऊ  कुछ  ना  बताऊ  फिर मै   हूँ अकेला रे
ये ही सच  ये ही  जीवन  है ये ही  जीवन   का मेला  रे
आते  सब यहाँ  अकेले  है  रहता  सब  यहाँ  अकेला रे

किसका दुःख कौन पहचाने जो भोगे बस ओ ही जाने
जान लो जल्दी ये सारे सच फिर  ना  कोई  झमेला रे
माँ का बेटा सीमा पर है  कई रातो से वो सोई नहीं,
बेटे ने  भी नहीं   झुकाया अपनी माँ का शीश  वहां ,
चले गोलिया टैंक चले और हैण्ड ग्रेनेड मोर्टार चले  ,
बेटो में   झगडा  इसका था  सबसे आगे कौन  रहे , 
नहीं लजाया माँ के खूँ को धरती माँ पर चढ़ा दिया,
उसकी शहादत लजा ना जाये इसलिए माँ रोई नहीं.|.

कमल हँसता था आज रो रहा है

कमल हँसता था, आज रो रहा है
हँसता था तों खूब हँसता ही रहता था .
एक दिन इंसानों कि तरफ देखा और
मुस्कराया, कमल
लगा ! वो अपने को गर्व से देख रहा है
चुभ रहे थे उसे भौरे के डंक पर
वो मुस्करा रहा था
वो बोला तुम लोग भी पैदा होते हो
फिर मर जाते हो ओर मै भी.                                                                                                         
पर तुम पैदा होते हो तों
सबको अच्छे नहीं लगते 
अगर लड़की पैदा हुए तों
बहुतो को अच्छे नहीं लगते
पता चल गया तों पेट में, नहीं तों
पैदा होते ही मार दिए जाते हो
हम पैदा होते है तों धीरे धीरे मुस्कराते है
फिर हसते है खुलकर .
हमें देख कर लोग खुश होते है .
हम डंक सह कर मकरंद देतें है कि
लोगो को जीवन मिल सके
लेकिन तुम हसते हो नकली और
डंक मार देते हो किसी को
पैदा हुए खाया पीया और मर गए बस .
तुमने लोगो को दिया क्या ,
समाज और मानवता के लिए किया क्या .
पैदा हुए अपने लिए ,जिए अपने लिए
और मर गए .छी; तुम्हारा जीना .
            +++++++

आज रो रहा है कमल कि मै मकरंद और
सौंदर्य का अहसास दोनों देता हूँ  .
पर किसे पकड़ा दिया मुझे ?
जो समाज में वैचारिक बदबू फैलाते है
और फैलाते है दंगे .
जो कुर्सी कि खातिर कि सब कुछ करते है .
देखा उनका वो रूप जब वो
भगवान का नाम लेकर आये
और पूरे देश में दंगे ही दंगे करवाए .
जब आग में जली  बस्तिया और
शहर ,गाव और हर नगर .
चारो तरफ आग ,चीखे ,मौत ,
लूट पाट और धुँआ ही धुँआ .
जब औरत के पेट से
चार महीने का बच्चा निकला ,
उसे तलवार पर उछाला तों
मै बहुत रोया .
जब लडकियों के कपडे उतारे ,
शीशो पर नचाया था
भगवान का नारा लगाया तों
मै भी चिल्लाया था
क्या क्या बताऊ ,क्या क्या सुनाऊ
सब सब जानते है .
मुझे उगाना ही था तों
इनके गंदे विचारो और
अंधे संस्कारो के कीचड में क्यों उगाया .
मेरी खुशबू डूब जाती
इनके बदबूदार नारों में .
मेरी मुसकराहट गुम हो जाती है
इनके कर्मो को देख कर .
मै भाग नहीं पता हूँ ,इन्होने
मुझे अपने झंडे में चिपका दिया है .
मै रो रो कर सबसे विनती कर रहा हूँ
कोई तों मुझे  बचाओ .
मुझे मेरे नाम गुण के अनुरूप
धरातल दिलवाओ .
मै कमल हूँ हिटलर और मुसोलिनी नहीं हूँ.
मुझे अपने साथ लोगो का खुश होना और
मुस्कराना अच्छा लगता है .
मुझे सत्ता कि बेदर्द लड़ाई में इस्तेमाल मत करो
मुझे मुस्कराने दो
मुझे गाने दो वो तुम्हारी ही फिल्म का गाना .
;इन्सान का इन्सान से हो भाई चारा ,
यही पैगाम हमारा .

जख्म पुराने नहीं कुरेदो फिर गहरे हो जायेंगे

जख्म  पुराने नहीं कुरेदो  फिर गहरे हो जायेंगे
अपने दिल के शोर से यारो हम बहरे हो जायेंगे ।
                                                                                            
गैस रिसी ,रोटी गयी ,लोग मरे और लोग भगे 
नही बोलते अब क्यों बोले जख्म हरे हो जायेंगे ।
                                                                                            
ये चर्चा है बहुत जरूरी कौन भगा और कैसे जी
मरने वालो की मत सोचो वे नहीं अब आयेंगे ।
                                                                                                
कौन बचा  अब रोने को इससे क्या लेना देना
राजनीति से चूक गए तों हम सब  पछतायेंगे|

मर गए उनका वोट नहीं ,बचे वे मरने जैसे है
जो सुनते है उन्हें सुनाओ वोट वही डलवायेंगे
                                                                                                
कुछ दिन पहले वाला वादा याद नहीं रह पता है
लोग मरे तब तों रोये थे कब तक रोते जायेंगे |

तेरह दिन के बाद तों अपने याद नहीं रह पाते है
अनजानों की बस्ती में कब तक शोक मनाएंगे|


राम नाम पर पिट गए यारो अब ये मुद्दा आया है
भाषण   धरना  और प्रदर्शन सत्ता में ले आयेंगे  |

बची लड़ाई है ये किसने किसे भगाया था यारो 
पहचानो और उन्हें भगाओ हम सत्ता पा जायेंगे |

लहू मेरे जिगर का बह रहा है

लहू  तों मेरे जिगर  का बह रहा है 
दर्द कौन कौन कितना सह  रहा है,
हकीकत सब ही जानते है लेकिन
कोई  भी कुछ भी नहीं कह रहा है|

मै आसमानों  में सूराख कर रहा हूँ
अपने लहू से हर गढ़े को भर रहा हूँ 
कहते है धीरे ही सही  मै मर रहा हूँ 
समंदर की तरफ  दरिया बह रहा है|

उधर ऊंचाइयां इधर गहराइयों को देख
हार मत जीवन कि सच्चाइयों को देख,
गिरा तो गिरने कि अच्छाइयो को देख
लड़ाई में खड़ा  है तू यही तो कह रहा है|

देख चींटी गिर रही और फिर चढ़ रही है
वो मधुमक्खी भी  क्या क्या सह रही है,
घोंसले तो जतन से उस गौरैया ने बनाये   
वो दूर बैठी है  उसमे और कोई रह रहा है|

सिकंदर है तू  तों  तुझे लड़ना ही होगा
मंजिल सामने है  तुझे बढ़ना ही होगा ,
शिखर तक तुझको तों चढ़ना ही होगा
मुसीबतों का किला था अब ढह  रहा है |

सूरज है नही पर रोशनी तों दिख रही है
नजर तों उस पर नही कोई टिक रही है ,
विश्वास हो तो खुद नया  सूरज उगा  दो   
सूरज  तों अपनी मुट्ठियों में रह रहा है|

निराश है तों क्या विश्वास खो दिया तूने 
गीता पढ़ा औ कुछ सबक नहीं लिया तूने  ,
कुछ काम तेरे तो कुछ अपने  पास रखे है 
उस पर भी छोड़ ऊपर वाला ये कह रहा है|




आज का समाजवाद

 मच गया शोर की समाजवाद आया है
लोग दौड़े अपने अपने थैले लेकर
कुछ फटे कुछ मैले कुचैले लेकर
पूछ आये हर दूकान पर
वहा रहने वालो के हर मकान पर
क्यों  भैया समाजवाद कहा है ?
थोड़ी देर पहले तक क्या भाव बिका है ?
सभी थे निरुत्तर नहीं मिला कोई उत्तर
वो गरीब लडखडाता हुआ वापस जा रहा था
समाजवाद
दिल्ली मुंबई के महलों में बैठा ठहाके लगा रहा था |.