रविवार, 21 जून 2015

छा जाता है गहन सन्नाटा ।

आप ने कभी
कोई बाँध टूटता हुआ देखा है
शायद हाँ भी और ना भी
वैसे ही
कभी कभी फूट पड़ता है
इंसान पूरे वेग से
और बह जाता है
वर्षो से रुका हुआ पानी
और फिर
छा जाता है गहन सन्नाटा ।

मोदी जी ने डुगडुगी बजवाया

मोदी जी ने डुगडुगी बजवाया
पूरे देश में मुनादी करवाया
की अब तो अच्छे दिन आ गए है
चारो और ख़ुशी के बादल छा गए हैं
सब पंद्रह पंद्रह लाख पा गए है
खाने से लेकर सब्जी तक और
डालर के दाम बहुत नीचे आ गए है
चीन हमारी जमीन छोड़ भाग गया है
पाक ने उस कश्मीर से बिस्तर बांध लिया है
क्या क्या बताऊ और क्या क्या दिखाऊ
बाहर निकलिए देखिये और
अपने हिस्से का अच्छा दिन ले जाइये
हमारे ऊपर अब सवाल मत उठाइए
ये सुन कर सब गरीब और बेकार जागे
अपना अपना थैला उठा कर बाहर भागे
पूछ आये हर संघी और भाजपाई दुकान पर
हर संघी और भाजपाई के मकान पर
कि भाई जी अच्छा दिन कहा है
सचमुच किसी को कही दिखा है             
हर कोई कुटिलता से मुस्करा रहा था
बेचारा गरीब उदास हो वापस जा रहा था
और अच्छा दिन
अदानी अम्बानी के महलो में ठहाके लगा रहा था

हमको बस हिंदुस्तान समझ लो ।

मस्जिद और मंदिर हो गया
मंडल और कमंडल हो गया
जातिवाद और गोत्र हो गए
प्रान्तवाद और क्षेत्र हो गए
सबकी ही सरकार बन चुकी
सबकी नीतियां देख चुके सब
संघ को देखा जनसंघ देखा
कांग्रेस और भाजपा को भी
सपा को देखा बसपा को भी
साम्यवाद को देख चुके सब
और क्षेत्रवाद के डंडे को भी
पर किसान को मरता देखा
औ नौजवान को मरता देखा
गरीब की खाली थाली देखी
घर में जलती घर वाली देखी
कही पर बेटी फिकती देखी
या फिर इज्जत लुटती देखी
यहाँ बेकारी को बढ़ता देखा
और बीमारी में  सड़ता देखा
फुटपाथो पर भी सोता देखा
और चौराहों पर रोता देखा
धनवालो को ही बढ़ता देखा
अधिकारी औ नेता व्यापारी
ये भी देजा और वो भी देजा
जी भी काम हो जो भी ठेका
सबका ही सूरज चढ़ता देखा
बेटी बिना पैसे कुंवारी देखी
बिन पानी सूखी क्यारी देखी
भूख गरीबी और शिक्षा बेकारी
का अब कोई नारा नहीं लगाता
नैजवान हो या कोई किसान हो
इन्हें अब कोई भी नहीं जगाता
जिस दिन खुद ये उठ जायेंगे
अपने हक़ के लिए जुट जायेंगे
समझा है कि तब क्या होगा
इतिहासों में ये दर्ज बहुत है
इन सबको अब दर्द बहुत है
अब तुम अपनी चाले छोड़ो
पूँजी से तुम अब मुह मोड़ो
मंदिर छोडो मस्जिद छोड़ो
मंडल और कमंडल छोड़ो
जाती धर्म के झगडे छोड़ो
अब इसानों से नाता जोड़ो
अब नारे हो या हो भाषण
सबके घर पहुचाओ राशन
अब बीमारी से जंग छेड़ दो
अब बेकारी से जंग छेड़ दो
नहीं अमीर को हमने रोका
पर अब गरीब न कोई होगा
अब कोई नहीं निरक्षर होगा
ना ही कोई टूटा छप्पर होगा
अब उंच न होगा नीच न होगा
अब ना ये चौड़ी खायी होगी
अब न टूटा हुआ इंसान होगा
अब न ही जीवन में काई होगी
मुट्ठी बांधो औ संकल्प मांज लो
परिवर्तन की हर राह साज लो
ये मुल्क और इसका सब कुछ
जीतना तेरा है उतनी ही उनका
अब गर गरीब ने जान लिया ये
अब सब पाना है ठान लिया ये
तब क्या होगा वो वैभव वालो
तुमने क्या ये सब भी सोचा है
बहुत हो गया अब तुम बदलो
अब सब झूठे नारे झूठे वादे
और झूठे कागज की दीवारे
तुम भी टूटोगे ये सब टूटेंगी
अब हो किसान के सूखे खेत
या नौजवान की कोरी डिग्री
अभी वक्त है अब भी सुन लो
इसमें तो कुछ आवाज और है
इन कदमो का अंदाज और है
झंडा कोई हो, कैसा भी भाषण
उसको तो बस रोटी से मतलब
तुम बदलो कितने कुरते सदरी
उसको बस नौकरी से मतलब
छत ऊपर औ ढका हुआ तन
स्वास्थ्य सुरक्षा और शांत मन
बस इतना ही तो सब माँगा है
ये लाल किला हो तुम्हे मुबारक
बडी कोठियां और जहाज भी
धन दौलत और या ये राज भी
सोने की रोटियां तुम्हे मुबारक
हमको बस इन्सान समझ लो
किसकी जाति क्या कौन धर्म है
हमको बस हिंदुस्तान समझ लो ।

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है

वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है
दरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |
हम तो लुटते रहे हर वक्त हर चौराहे पर
वो हर चौराहे पर ही दूकान लिए बैठे है |
हम बने सीढियां तो मीनार तक वो पहुचे
हम सीढ़ी रह गए वो भगवान् बने बैठे है |
बड़े बड़े थे वादे सबकी कहानी बदलेगी
हम पत्थर भी नहीं वो भगवान बने बैठे है |
लावारिश होते कई लोगो को हमने देखा है
स्वयंभू भगवान आज बे पहचान बने बैठे है |

इतना भी मत इतराओ की आज सूरज हो
सब दफ्न होते है वो शमसान हमने देखा है |
हमारा क्या जमी पर गिर के वही रह जायेंगे
आसमां से गिरे को लहूलुहान हमने देखा है |
कर सको तो नीव की ईंटो की भी क़द्र करो
वर्ना जमीदोज होते कई मकान हमने देखा है |


कैसे दिन आये इतना झुक जाना पड़ता है

कैसे दिन आये इतना झुक जाना पड़ता है
कैसो कैसो के आगे शीश नवाना पड़ता है
दादा बोले थे कि किसी के आगे ना झुकना 
सबके ही आगे हमको भोग लगाना पड़ता है
नहीं झुके बढ़ जाएगी बुरी तरह पीड़ा अपनी
और झुके तो आत्माँ को मर जाना पड़ता है
नहीं झुके बढ़ जाएगी बुरी तरह पीड़ा अपनी
और झुके तो आत्माँ को मर जाना पड़ता है
वो राजा राज उनका हम परजा पीड़ा अपनी
दर्शन दे दे इसका एहसान चुकाना पड़ता है
मुगलों का राज गया अंग्रेजो का डूबा सुरज
जहागीर का घंटा तो सबको बजाना पड़ता है|


क्या तब भी आप चुप रहोगे पापा ?

क्या तब भी आप चुप रहोगे पापा ?
जब ----------------------?
आप जो नेता हो ,आप जो पुलिस हो
आप जो समाज के बड़े हो, प्रशासक
पूछ रही है हम सभी की बेटियां
आज ही जब एक बार फिर
हैवानियत का शिकार हुयी
गाँव की दो गरीब बच्चियां
पर नहीं है कही शोर
न कही दिखती है मोमबत्तियां
न विजय चौक की वो भीड़
न वो नारे न वे चेहरे सारे
न टीवी की बहस न हंगामा
न वो महिला विमर्श के लिए
लड़ने का अभिनय करने वाले
सच शहर और गाँव में फर्क है
सच अमीर और गरीब में फर्क है
हाँ बहुत फर्क है
गरीब की और गाँव की इज्जत मे
अमीर की और शहर की इज्जत में
क्या कभी गाँव की बेटी के लिए
विजय चौक गरम नहीं होगा ?

भीड़ इतनी है आसपास पर

भीड़ इतनी है आसपास पर
मन में ये तूफ़ान सा क्यों है
मुस्कराते हुए चेहरे है सब है
हर कोई अनजान सा क्यों है ।
कोई अपना सा लगा ही क्यों
फिर ये बियाबान सा क्यों है
आशंकाए इतनी क्यों तारी है
मन में ये शमसान सा क्यों है ।
छोड़ कर लौट चला है आशिक
टूटा हुवा और बेजान सा क्यों है ।
कोई तो अपना सहारा भी होगा
दिल हुवा ये असमान सा क्यों है ।

कही बादल फटता है

कही बादल फटता है और
कही जमीन फट जाती है
जमीन तब भी फटी थी
जब सीता ने
जमीन से न्याय माँगा था
सच्चाई का
पहाड़ फटते नहीं बस
सरक जाते है जमीन की तरफ
दिल भी फटता है ऐसे ही
और इन्सान
न तो जमीन की परवाह करता है
न बादल की ,न पहाड़ की और
न दिल की ही
जब फट जाता है इनमे से कुछ भी
तो जार जार रोने लगता है इन्सान
और तब भी खुद को नहीं कोसता
कोसने लगता है ईश्वर को
व्यवस्था को और दूसरे को
वाह रे इंसान
तूने खुद को खुदा मान ही लिया है
तो क्या रोना
क्यों रो है तो अपनी ही करनी पर ।
रो !जब तू फटने को मजबूर करता है
आसमान को ,जमीन को और दिल को ।


उस दिन अपने गाँव गया था

दुखी हुआ मन, जब  
उस दिन अपने गाँव गया था
क्या सोचा था कि क्या होगा
कुछ भी वैसा ना निकला था
सब  कुछ बहुत बुरा बुरा था
जो छोटे थे बुड्ढ़े लगते
बड़े तो अब नहीं ही दीखते
वे दोनों तालाब खो गए
सम्मो मायी या काली मायी
सब उदास और बहुत अकेली
मंदिर का दरवाजा
औंधे मुह पड़ा हुआ था 
कुए सारे कही बिलाए
आम या जामुन या पाकड़ सब
दूर दूर तक नजर न आये
                +
न वो अपनापन ,न वो शिकायत
बस दिखावे मरने में और जीने में भी
केवल झूठी शान की बातें
नहीं थी मेरी चाची पर शोक नहीं
वहां  जश्न मना था
कैसे मैंने खाया उस दिन
सबको क्या देखूं
खुद मेरा घर बेगाना था
मेरा कमरा नहीं
मेरे लिए मेहमानखाना था
जिसको ठुकरा कर
मैंने अपनी भावनाओ को रोका था
सब बदल गया है
सभी स्वार्थी ,सभी के मन में
बस घात  है
बस मैं कुछ देदूं तो अच्छा हूँ
गर मैं कुछ अपना कह दू
तो फिर मैं मंजूर नहीं हूँ
भाग चला मैं दो दिन में ही
मेरे गाँव से
पर घूमा था पूरा दिन और यादें ताजा की
फिर जाते जाते मुड़ कर देखा
विदा कह दिया रोते मन से
मेरे गाँव को
पर बाबा की यादो को कैसे छोड़ू मैं
कैसे भूलू मैं सारी अच्छी यादो को
जो मुझमे पैबस्त कही है गहरे तक
         +
गाँव तो बस कहने को हैं
शहरों से होड़ बड़ी है कि
बड़ी बुराई कैसे सीखे और
शहर को कैसे पीछे छोड़ें
शायद ये अंतिम यात्रा हो मेरे गाँव की
बहुत दुखी मैं
क्यों मैं ऐसे गाँव गया था
,सब कुछ तो बदल गया था
अब मेरे आंसू सूख गए है और
मैं दर्द को भूल गया हूँ
हैं कोई देवी  देवता इतने करोड़ में
जो लौटा दे मेरा गाँव वो
पर वे भी हार गए हैं
पोखर के ऊपर की वीरानी और
 उनकी हालत बया कर गयी
छोडो अब सब भूलो भैया
बस यादो में झूलो भैया
गाँव की कहानी ,गाँव की कविता
गाँव का गाना लिखो भैया
ताकि बच्चे पढ़े और जाने कि
गाँव बहुत अच्छा होता है।





जमीन है नहीं पर कोठियों के सपने है

जमीन है नहीं पर कोठियों के सपने है
कोई भी अपना नहीं पर सब  अपने है ।
हमने सोचा न था कि हम बहक जायेंगे 
पर बहक गए है तो कारण भी अपने है ।
आसमान से आग बरसी जल गए हम 
पाँव में छाले है तो हम कैसे चल पायेंगे ।
लोग कहते है कि तुम इतने पीछे खड़े हो 
बेंच दें जमीर बहुत आगे हम चले जायेंगे।
हमें भी तमन्ना हो गयी बड़ा बन जाने की 
बेईमान नहीं हम बड़ा आदमी कहलायेंगे । 
लूट लो बस जर जमीन जोरू जो भी मिले 
फिर शान से चलो सभी नीचे नजर आयेंगे। 
कोठी कुत्ता कार और चमचे भी होंगे खूब 
फिर हम देश में काबिल महान कहलायेंगे ।
वाह रे ये देश ये समाज, तुझे सलाम मेरा 
अच्छों को थू थू और बुरों के गीत गायेंगे । 
क्या फर्क जमीन बिना कोठियों के सपने है
सब होगा आसान जब हम नंगे हो जायेंगे।
बस इसी की दौड़ है चली आज मुल्क में मेरे 
क्या होगा मुल्क का जब सभी बिक जायेंगे ।
चलो कोई तो जुबान खोलो नंगों को नंगा कहो 
कई वर्षों के गुलाम हम फिर वही बन जायेंगे ।
आओ नकाबों को उतारे इन्हें सचमुच नंगा करें 
जब नंगे होंगे ये असल में मुह क्या दिखलायेंगे ।



प्राणों से प्यारा हमें अपना वतन

प्राणों से प्यारा हमें अपना वतन ,अच्छा लगता है हमें देश का बंधन

भारत के आगे सब जहान क्या था क्या बताये यारो ये स्थान क्या था
देवता भी ललचाये पैदा होने को ,क्या बताये भाई हिंदुस्तान क्या था

आइये पुराना इतिहास देख ले धुंधला पड़ा जो वो प्रकाश देख ले
वर्तमान पर जो कालिमा छाई आने वाले कल का आभास देख ले 

यही कभी गीता का प्रभाव दिखा था यही पर किसी ने रामायण लिखा था
बुद्ध महावीर की वो  वाणी गूंजी थी सभ्यता सभी ने तों यही से सीखा था
यही तानसेन की वो तान गूंजी थी राणा और शिवाजी की भी शान ऊँची थी
एक गया तों   दूसरा पैदा हो  गया यही  देवताओ  की वो  लम्बी सूची थी

गूंजता था वेद और पुराण का वचन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

जौहर वाली होली यही होती थी कभी चित्तौड़ी टोली यही होती थी कभी
कह दिया तों कह दिया फिर कैसा हटना ऐसी बोली यही होती थी कभी
और यही कर्ण ने भी जन्म लिया था गुरु को अंगूठा भी तों यही दिया था
हरीशचंद्र  भी तों यही  पैदा हुए थे पन्ना धाई  को  भी  कोई भूलोगे  कैसे
मंगल पाण्डेय वाली वो कहानी याद है रानी झाँसी वाली तों जुबानी याद है
किसे याद रहेगा ना विद्रोही सुभाष भगत और आजाद की क़ुरबानी याद है

यही पर जनम हो और यही पर मरण प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

तुलसी की चौपाई  यही मिलती सूर की ये कविताई यही मिलती
यही है कबीर का निर्गुण स्वरुप दिनकर की गरमाई यही मिलती
बच्चन पन्त और निराला भी यहाँ प्रेमचंद ढूढने तुम जाते हो कहा
याद है तुम्हे अगर रसखान की कृष्ण की मीरा भी तों हुई थी यहाँ 
एकला चलो  वाले वो   टैगोर थे   इक़बाल भी तों बड़े  घनघोर  थे

जाने कितने हुए है साहित्य रतन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

इस मिट्टी में हीरे मोती की भरमार है खेतो में पैदा होता सोना अपार है
माँ  की गोद  में  है जैसे  दूध  बह रहा गंगा  यमुना   की ऐसी दो धार है 
राखी का त्यौहार बड़ा प्यार का होता दशहरा तों सारे ही संसार का होता
दिवाली में खुशिया मनाई जाती है होली का त्यौहार तों मनुहार का होता

लोग मिलते है और बंधता है बंधन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

कितनी ही जातियां  और धर्म है कितनी बोलियाँ और कर्म है
पर सबकी जाति हिदुस्तानी है सबके दिलो का बस यही मर्म है 
हिन्दू हो चाहे वो  ईसाई हो, पारसी हो चाहे मुस्लमान भाई हो
सबका तन औए मन एक है जी हाँ  सारा ही हिंदुस्तान भाई है

रहे खुशहाल करो करो ऐसा जतन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

पर मेरे देश को क्या होता जा रहा अपने गुणों को कहा खोता जा रहा
देखो  अन्धकार ही  दिखाई  पड़ता  कही   नही रास्ता सुझाई  पड़ता 
देखो चारो ओर  बस भ्रस्टाचार है यहाँ तों सम्बन्ध भी हुए व्यापार है
राजनीति   का क्या हाल मै  कहूं  कैसे  कैसे  हुए  है कमाल क्या कहू 
इतने सालो लुटेरो ने हमको लूटा है जो भी कहा सब ही  दिखा झूठा है

ये कैसा हो गया देश का चलन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

क्या कोई बताएगा मुझे एक बात बड़ी कोशिश की पर हुई नही ज्ञात
कहाँ  गई  आज मेरी  सोन   चिरैया कैसे  उजड़ी है  ये  तिरंगी मड़ैया 
चन्द्रगुप्त वाला वो  शासन है कहा अकबर वाला वो  प्रशासन है कहा 
कर्ण  वाली कहा वो   दानप्रियता  भारत   की जानी  बलिदानप्रियता

आज क्यों लुटता है लाशो का कफन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

दो  लोग लेके  चलें रक्षामंत्री  को पूरी  गिनती  ना  आये वित्तमंत्री  को
सीमा पर जवान अपना खून बहाए भारतरत्न  मिलता है प्रधानमंत्री को
यहाँ लोकतंत्र  की अजब थाती है   मेरे भूखे भारत को ये  कैसे भाती है 
कैसे पेट भरेगा इस भूखे भारत का जब एक एक सीट  करोड़ खाती है

कैसा उजड़ा है इस देश का चमन प्राणों से भी प्यारा हमें अपना वतन

[और अगर हम लोग नहीं सुधरे तो --------------------------------]\
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आइये कल  की  भी बात बात दूं आने वाली  कल की तस्वीर दिखा दूं
सड़को पर कल खून बहना यहाँ मेरी भी तों इच्छा है की मै भी बहा दू
सडको पर कल  यहाँ   आग लगेगी कल यहाँ    जनता जरूर  जगेगी 
कल ये व्यवस्था जलेगी आग में  भुखमरी  गरीबी  कल  जरूर भगेगी 

कल इस व्यवस्था को मिलेगा कफ़न फिर भी अच्छा लगे अपना वतन

आइये राजघाट चले ,

नेताजी भाषण कर रहे थे
आज दो अक्टूबर है                                                                     
आइये राजघाट चले ,
बापू की कसम खाये
उनके सिधांतो को याद करे,
और निभाये
हमसे रहा नही गया,
और सहा नही गया
हमने कहा,
नेताजी गजब करते है आप
बापू की कसम खा लेंगे
चमचे आसपास दिखलाई नही पड़ेंगे
बापू की कसम खाओगे
मॉस नही खाओगे
दुबले हो जाओगे
बापू की कसम खाओगे
छूटेगी कोठी और कार
नंगे पैर जमीन पर घूमोगे यार
दुबले और काले हो जाओगे
यहाँ तक तों सह लोगे लेकिन
बापू की कसम खा लोगे
दूसरो की औरतो को नही छू पाओगे
फिर जन सम्पर्क कैसे बढाओगे
तब नेताजी घबराये ,रुका ,सोचा ,
मुस्कराए और बोले
यार क्यों रॉकेट की तरह छूटते हो,
भेजा गरमा दिया
क्यों अपने मन की अपने आप लूटते हो,
डरा दिया
हमने कब कसम खाई है की
राजघाट के बाहर भी निभाएंगे
बाहर निकल कर मुक्त होंगे भूल जायेंगे
और अगर अधिक आलोचना होगी क्या
अगले साल दो अक्टूबर नही आयेगी
फिर यहाँ आएंगे ,फिर कसम खायेंगे ,
फिर उसी तरह निभाएंगे .

बहुत दिनों पर गाँव गया था

बहुत दिनों पर गाँव गया था
पर ये मेरा गाँव नहीं था .
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कहा गया वो?
सब कुछ बदला नया नया था
सुनते थे सड़के बननी है ,
पूरे गाँव को वो जोड़ेगी .
वो चकरोड बहुत चौड़ा था ,
पगडण्डी सा अब दिखता है .
वो मेरा चकरोड कहा है ?
वो पोखर ,तालाब ,गड़हिया
जो गाँव के तीन तरफ थे
उनसे पूरा गाँव हरा था ,
पशु नहाते ,सभी तैरते ,
मछली पर सबका ही हक़ था .
अब तों वहा मकान बने है
या फिर है रास्ते लोगो के .
सबके घर को तों रास्ते थे ,
सबके पास मकान थे अपने .
फिर ये सब क्या नया नया है .
वो रास्ते और तालाब कहा  है ?
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
उत्तर वाला नाला सदा भरा रहता था,
दक्षिण में नहर सरकारी .
चारो ओर दिखती थी धान की क्यारी .
कहा गए वो ?.
वो पाकड़ का पेड़ जहा खेला करते थे
और खुला खलिहान या दालान किसी का,
सब सबका था .
एक बार पड़ा था सूखा ,
कई घरो में अन्न नही था
पर जिनके घर हुआ था
आलू वो भून पंहुचा देता था
जिसका भी गन्ना पेरा जाता
भरी बाल्टी गन्ने का रस
उस घर वो भिजवा देता था .
कोई नहीं मरा था भूखा
नहीं रुका था काम किसी का .
बसवारी के बांस सभी के ,
छानी मड़ैया ,सरपत सबका . .
सब थे छवाते साथ उठाते
और मड़ैया उठ जाती थी.
वो मिले जुले स्वर और हाथ कहा है,
मिलके उठाना की आवाजे कहा गयी वो .
बरामदे का कुआँ कितना ठंडा कितना मीठा,
पता था सबको .
और द्वार पर बड़ा सफ़ेद फूलो वाला
मौलश्री का पेड़ खड़ा था .
जो राही इस राह से आता
रुक कर निश्चित पानी पीता,
पेड़ कि छाया में सुस्ताता
और फिर जाता.था
देख कर कितना सुख मिलता था .
कहा गया वो ?
पहले जब थे शहर से आते
पूरा गाँव अपना लगता था
बहुत लोग मिलने आते थे ,
हाल पूछते ,साथ बैठते ,
घर आने को कह जाते थे .
जिसका भी जो रिश्ता था कह जाता था
भाभी ,चाची,आजी बुला रही है ,
बहुत दिनों से नही है देखा,.
आजी कहती दुबले क्यों हो ,
दूध नही मिलता है ,पीलो!
गाँव के चारो ओर बगीचे लदे आम से ,
मेरे घर आम नहीं था
तब काका ने भिजवाया था .
कहा गए वे  लोग जो ऐसा करते थे,
वे सारे बाग़ कहा है ?
वे दोनों स्कूल पूरब में लडके,
पश्चिम में लड़की पड़ने जाती थी
दूर से आती थी आवाजे पढ़ने वाले बच्चो कि .
अब नहीं आ रही 
सबके घर एक चारपाई ,बिस्तर अलग रखा था ,
गाँव कि बारातो और मेहमानों को .
जिसके घर भी दूध दही या सब्जी होती ,
आ जाती थी सब मेहमान सभी के थे तब
+ + + + + + ++++++++++++++++. .
और अब खुली गई दूकाने सब चीजो की,
कोई किसी को कुछ ना देता ,
सब बाजार से आ जाता है .
वो अपनापन और वे रिश्ते,
मेहमानों के लिए रखे सामान
कहा गए वो ?
सबने रास्ता बंद कर दिया,
खोदे गड्ढे कि भाई को राह मिले ना  . .
सबकी  नाली  बंद कर दिया
या मुह उल्टा मोड़ दिया है
सबके दरवाजे पर कीचड़ ,
राह में कीचड़ ,मन में कीचड़
सबका घर जाना मुश्किल है .
पर संतोष सभी को ये है ,
अपना पडोसी परेशान है ,
कैसे ब्याहेगा वो बिटिया 
वो था गाँव जहा बाराते
शादी वाले घर तक जाती थी ..
जिस गाँव में सबकी बिटिया सबकी थी ,
कहा गया वो ?
कल सुना की फला की बबुनी भाग गयी,
गाँव के लिए बात नयी थी   .
वो शहर में ,
पढ़ी थी कम और बढ़ी थी ज्यादा ,
खूब सिनेमा देख रही थी .
हिरोइन बनने चली गयी
या फिर रिश्तो में ही छली गई वो .
कुछ आदर्श गाँव के ,
बिना बड़ो के पांव नहीं बाहर जाते थे ,
कहा गए वो ?
पहले भी बजार लगता था
और लगती  थी कुछ दूकाने ,
बढ़ते बढ़ते गाँव मुहाने आ पहुची  है .
पूरा गाँव बाजार बन गया ,
कही खो गया,ढूढ़ रहा हूँ
कहा गया वो ?
सबकी शान इसी में
मुक़दमे किसके कितने  कैसे  जीते ,
सब कुछ हो बर्बाद हमारा पर
पडोसी कि बर्बादी मजा आ गया . .
पहले तों गाँव के बूढ़े ही सब कुछ थे,
उनका ही फरमान बड़ा था
पहले शाम बैठके पर बैठक होती थी.
कुछ बुजुर्ग मानस गाते थे .
बड़े चाव से रामचरित वे समझाते थे .
वे बैठके चाय कि दूकान खा गई .
अब गाँव मुहाने देशी की दुकान खुल गई
और पूरा गाँव तरन्नुम में है .
अब बहस है लाल पारी की,
किसमे मजा है ज्यादा देशी में या अंग्रेजी में .
वो किस्से ,वो मानस ,वो चौपाई
और बुजुर्गो कि वे बहसे
कहा गए वे ?
घर ,खेत और द्वार वही पर नहीं है
गाँव वाले वो चाचा ,वो प्यारे बाबा .
जब भी मै बीमार होता था ,
कोई सवारी नहीं गाँव में
और शहर भी दस कोस था .
बाबा कंधे पर बैठाते,शहर को जाते ,
इलाज कराते ,शाम ढले गाँव आ जाते थे
अब गाड़ी है ,सब कुछ है पर नहीं है तों
मेरे बाबा ,उनको तों भगवान ले गए .
उनका प्यार ,उनकी डांट,
उनका कन्धा याद आ रहा ढूढ़ रहा हूँ
कहा गए वो .
वही गाँव है पर भूतो का डेरा लगता  है ,
नहीं कही वो बाबा चाचा और वो आजी .
गाँव तों है पर इंसानों का नहीं बसेरा .
चौबे जी का घर कितनी रौनक रहती थी,
घास उग गई .दीवार गिर गई
छत पर है जाले ही जाले
और भी घर है ,मेरा भी है
जिनमे लटके है बस ताले.
शहर में दो कमरे सपना है
यहाँ बीस कमरों का घर अपना है
लेकिन कुछ है जो बिला गया है
ढूढ़ रहा हूँ जिसकी खतिर
बार बार हम गाँव आते थे,
कहा गया वो ?
+++++++++++++++++++++++
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ मेरे गाँव को ,
खलिहानों को ,मछली वाले तालाबो को .
बूढ़े बरगद और मौलश्री कि छाव को ,
बर्फ से ठंढे मीठे पानी वाले उस कुए को
भुट्टे तोड़ते थे खेतो में फूट ,ककड़ी खा जाते थे .
वो जामुन वाला पेड़ ,बगीचा आम कि डाली ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ '
जांघिया नाच दिखाने वाली उस टोली को ,
रामायण हो या शादी हो ,
गैस जलाते ,तम्बू लगाते ,
बाजा बजाते इस्माइल को ढूढ़ रहा हूँ .
लाज हया और हसी ठिठोली में मर्यादा ,
शादी में गाली भी तों गायी  जाती थी '
थोडा कहा समझाना ज्यादा वाली भाषा ,
पंचायत पर दंड बैठको वाला अखाडा ,
लाखी पाती वाले खेले ,
कभी कही ,कभी कही के मेले ,
सुथनी और जलेबी गुड की ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ ,
कोई मुझे मेरा गाँव बता दो ,
कहा रुक गए पाव बता दो .
बहुत दिनों पर गाँव गया था
ढूढ़ ना पाया मेरे गाँव को ,
मै पागल सा ढूढ़ रहा हूँ .
कहा गया वो |




















                                                                                                       



































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यथार्थ के आसपास २



यथार्थ के आसपास २


1-मस्ती क्या है मन से जीना
चाहे जो खाना या तो पीना
भूख लगी तो पानी खाया
प्यास लगी खारा जल है
ना खाया तो टोकेगा कौन
खूब पिया तो रोकगा कौन
पट्टी  बाँध पेट पर सो जा
या अगस्त मुनी ही  हो जा

2- अब हमे जीने का मज़ा आने लगा है
खुद का दिल खुद को बहलाने लगा है
ये आंख से बहता समन्दर देखते सब
दिल आँख से पैमाना छलकाने लगा है ।

3--अभी फुरसत नहीं तुम्हारे पास आने की खुदा मुझको
अभी अपनों को दरिया पार करवाने की ख्वाहिश है ।
हम नहीं होंगे तो पता हैं सब बिखर जायेगा अपनों का
तुमको क्या तुम खुद हो ये सब तुम्हारी आजमाइश है ।

4-तुम्हारे जैसे ही छोटे है दरवाजे तुम्हारे
मैं जब जब आता हूँ मेरा सर लगता है
घायल न हो जाये मन या हो मेरा वजूद
तुम्हारे घर आने में  बहुत डर लगता है |

5--तुमने जलील कर दिया पर अब मेरा इन्तजार करो
जितना कर सकते हो तुम जी भर मुझ पर वार करो
मैं जब सामने आ जाऊंगा तब तकलीफ होगी तुम्हे
बता दे हूँ रहा तुमको तुम खुद को अब तैयार करो |

6-देखो अब दिन डूब रहा है अब हमको भी सोना है
बस सपने ही अपने होंगे बाकी सब कुछ खोना है |

7-आप को मेरे घर में चहचहाहट नहीं मिलेगी
चिड़ियाँ चली गयी अब अपने आशियाँने को

8--किसी की जुल्फों में सुबह से शाम हो जाये
इस तरह से अपने जीवन का काम हो जाये

9-पहले हमसे  यारी कर
मिल कर के गद्दारी कर
मैं  हारूं और  जीते  तू
ऐसी साज़िश भारी कर ।

10-घूस नहीं दोगे तो कानून बता देंते है
मुह माँगा दे दो तो कानून बना देते हैं

11-इस व्यवस्था में कोई भी काम हो जायेगा
हाकिम की कीमत जान लो,जेब भारी हो
क्या गलत क्या सही ये तो किताबी बाते है 
हर कोई बिकने को तैयार है बस तैयारी हो ।

१२-खुली अर्थ व्यवस्था की बयार क्या चली
घर और दफ्तर सब ही दूकान हो गए |

१३-कोई मज़ार पर चादर चढ़ा वहां राजधर्म निभा रहा
और कोई मंदिर जाकर वहां भी राजनीती चला रहा
पर जिसके कारण है आज किसी लायक बने हैं सब
उस दरिद्रनारायण के पास आज कोई नहीं जा रहा।

१४--मजबूत हो गर आप चाहे जो खरीद लो
कलम हो जुबान हो या फिर जमीर हो ।

१५-अंदाज क्या है लोगो की आशिकी का
गुलों की बात करते गोली  मार देते हैं ।

१६-चलो नया इतिहास बनाये
घूमे घामे .और पीये खाएं
चलो नया इतिहास बनाए
बस भाषण दे राशन खाए
चलो नया इतिहास बनाये
बस प्रचार का ढोल बजाये
चलो नया इतिहास बनाये
कुछ न करना ढोंग सजाए
चलो नया इतिहास बनाये |
१७-हवाए देख कर कितनो ने हम पर धूल फेकी है
हमने बस पीठ फेर ली यारो तो बुरा मान गए ।

१८-उनसे सवाल करना मुझसे जवाब लेना
उनको कुछ भी देना मुझसे हिसाब लेना

१९-जिंदगी ही इस कदर व्यापार बन गयी
चारो तरफ घर टूट कर बाजार बन रहे

२०-जब चाहो तुम किसी का भी दिल तोड़ दो मालिक हो
जब चाहो किसी का भी मुकद्दर फोड़ दो मालिक हो
जब चाहो आसमान पर उडो या जमीन पर झांक लो
जब चाहो तुम जिससे नाता जोड़ लो तुम मालिक हो |

२१-कोई सवाल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल
कोई बवाल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल
पेट  रख दे किसी सिद्धांत की किताब में तू
भूख ,ख्याल मत कर बस तू जिंदाबाद बोल |

२२-वो समझते है कोई एहसान किये बैठे है
दरअसल हमारा ही सामान लिए बैठे है |
हम तो लुटते रहे हर वक्त हर चौराहे पर
वो हर चौराहे पर ही दूकान लिए बैठे है |
हम बने सीढियां तो मीनार तक वो पहुचे
हम सीढ़ी रह गए वो भगवान् बने बैठे है |
बड़े बड़े थे वादे सबकी कहानी बदलेगी
हम पत्थर भी नहीं वो भगवान बने बैठे है |
लावारिश होते कई लोगो को हमने देखा है
स्वयंभू भगवान आज बे पहचान बने बैठे है |

२३-इतना भी मत इतराओ की आज सूरज हो
सब दफ्न होते है वो शमसान हमने देखा है |
हमारा क्या जमी पर गिर के वही रह जायेंगे
आसमां से गिरे को लहूलुहान हमने देखा है |
कर सको तो नीव की ईंटो की भी क़द्र करो
वर्ना जमीदोज होते कई मकान हमने देखा है |

२४-एक चापलूस ने एक सरकार को जमीदोज किया
लोग कहते है बहुत ख़ास है हमेशा साथ रहता है ।

२५-अन्दर इतना तूफ़ान सा क्यो है
मन इतना परेशांन सा क्यो  है
न कोई बात है,न कोई भाव ही
दर्द इतना मेहरबान सा क्यो है |

दर्द मन में,दिमाग में,लहू में भी
दर्द तन में,दिल औ वजूद में भी
दर्द साँस ,धड़कन औ रूह में भी
ये दर्द हुआ आसमान सा क्यूं है

२६--दूरी हो गयी इतनी और हमें पता ना चला
हम कह नहीं पाए और तुम सुन नहीं नहीं पाए

२७-जहा केवल एक कमाता हो बाकी सब केवल खाते और फैलाते हो
कितना भी भरा पूरा घर हो और हो आमदनी उसे कौन बचाएगा |

२८-ईमानदारी वफ़ादारी और शर्म कही मैं टांग आया हूँ
तेरी मेहनत तेरी कुर्बानिया मेरे किस काम आएँगी |

२९-तू मेहनत कर संघर्ष कर और सरकार बनाता जा
मैं खाता जाऊंगा तेरी खेती बस तू हल चलता जा |

३०--इरादे देख कर तेरे अब चौकन्ना हो गया हूँ मैं
 
या तू  मुझको मरेगा या अगला युद्ध हारेगा |
३१--छल एक जीत दे सकती पर स्थाई नहीं होती
 
टिकने के लिए तो सबका ही विश्वास चाहिए |
3२--अभिमन्यु को मारा था तो क्या युद्ध जीता था
  
कभी कुछ भेडिये मिल कर शेर को भी मार देते है
३३ -जितना तूने सबका खून बहा दिया  ,
  उससे कई गुना हमने दान कर दिया  | 
३४ -जितना तेरे घर में सब कुछ होता है ,
   उतना तो हम खेत में ही छोड़ देते है

३५-मौन मेरा कैसा लगेगा दोस्तों औ दुश्मनों को
मैं जब मौन हो जाऊंगा तभी सब जान पावोगे
न हम होंगे न शब्द होंगे न भाषण और बहस
न दिखलायी पडूंगा तब हमें पहचान जाओगे |
३६- सीढियां तुमको मुबारक हो
मैं तो जमीन पर चल रहा हूँ

३७--कोई जिंदगी से क्या गया
 
कि नीद भी साथ ले गया ।

३८-कहा हो तुम कहते थे, अब कोई नहीं
पर देखो लोग तुमसे मुझे छीन रहे है ।

३९-देखो हमारी अनुभुतियां बड़ी हो गयी
   तुम नहीं पर पैरो पर खड़ी हो गयी ।

४०-देखो ये आँखों का पानी आंसू तो नहीं है
कुछ गिर गया इसमें और बह रहा है वो ।

४१-मैं सोने की कोशिश करता हूँ, तुम्हे भूलकर
तुम्हे गलतफहमी है की तुम ही मेरी नीद हो ।
४२-साथ चलने का वादा गर दोनों ने ही निभाया होता
तो चिता दोनों की ही ज़माने ने साथ सजाया होता ।
४३- दोनों साथ गए होते दोनों ही साथ रोते
अनुभूतिया मिट जाती जिंदगी को ढोते ।
४४-देखो मजाक बहुत हो गया तुम कहा हो अब आवाज तो दो
मैं तो वही हूँ जहा तुम छोड़ गए थे अपनो के साथ देखो तो ।
४५- मैं अब हार रहा हूँ कर्त्तव्य निभा नहीं पाया
अकेला हो अपनों को राह दिखा नहीं पाया ।
४६-अच्छा थक गए न अब तुम आराम करो
अपनी सारी तकलीफे मेरे ही नाम करो ।

४७-कह देता हूँ किसी से कि जरा हाथ बढ़ाना
नासमझ मुझको अपाहिज ही मान लेते हैं ,
मान कर कमजोर मुझको वे उपदेश देते है
अज्ञानी मान कर मुझको पूरा ज्ञान देते है

४८- मैं रबड़ का पेड़ हूँ कितना गिरा दो और दबा दो
नहीं होगी मौत मेरी फिर से मैं खड़ा हो जाऊंगा |

४९-अपने जुल्म और हमारे इश्क की ये इन्तहा देखो
की मर गया मैं पर खुली आँखे तुम्हे तलाश रही |

५०-देखना मुझ पर हमला कौन करता है

अपनों की जेब में ही हैं खंजर छुपे हुए ।

५१-तुम्हारे प्रेम में बर्बाद हो गया है कौन
कोई चिंता नहीं बंसी बजा रहे हो तुम |

५२-मैं एक पत्ता नहीं हवा में उड़ा दे कोई
जमीन में धंसी मेरी जड़े इमान की,
होगी उनके पास ताकत शैतान की
पर मेरे पास है इंसानियत इंसान की |

५३- मैं हमेशा दरवाजा खुला रखता हूँ अपना
जाने कब कोई हवा का झोका आ जाये ।

५४- कौन मरना चाहता है, अपनी ख़ुशी से
मौत को मुझसे इतना प्यार हो गया   

५५- ये दिया है पर सूरज को भी ललकारेगा
अँधेरा हो कैसा भी पर ये उसको मारेगा 

५६- कुछ खास नहीं है सब आम हो गया
आदमी था काम का बेकाम हो गया ।

वो तो आये ही थे बस हाल पूछने मेरा
और मैं तो मुफ्त में बदनाम हो गया |
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५७-मैंने पाला था किसी को ख्वाबो की तरह
पर वो भूल गए हमको हिसाबो की तरह 
५८-चमचे चुगलखोर दोनों  महान है
वाह वाह देखो क्या इनकी शान है
भूखे नंगे थे ये अब करोडो वाले है
सभी को चूस गए मकड़ी के जाले है
बड़े बड़े ज्ञानी इनसे धोखा खा गए
ऐसी खास ताबीज गले में डाले है
जी हाँ सचमुच ये बहुत ही महान है

५९-कूये में धकेल कर, मेरे यार ने कहा
मजे में तो हो, पानी तो कम नहीं है |

६०- अब सोचता हूँ अब ये दुनिया ही छोड़ दूँ
बहुत हो गया खुद की जिंदगी से लड़ना |

६१- हजार बार खुद को अजमाया हमने
हमेशा खुद को मजबूत पाया हमने ,
लोग कहते है  अब की  डूब जाओगे
पर बीच समुंदर  तैरता पाया हमने 

६२-सिलसिला शुरू तो हो, परिणाम देखेंगे
दो कदम साथ चलो, खासो आम देखेंगे ,
पहले क्या तय करना क्या है नसीब में 
मेरा हाथ पकड़ो तो फिर अंजाम  देखेंगे ।

६३-असमान वाले नीचे झांक कर देख
तेरे बनाये पुतले ये क्या कर रहे है
तूने दिया था बोने को फल, फसलें
पर ये इन्सान तो बारूद बो रहें  है 
६४- कहूँ ,ना कहूँ या कह ही डालूँ
बीत जाती है, जिंदगी इसमे |


६५-कोई खामोश है, तों कोई परेशान है ,
ख़ामोशी को सहना, नही आसान है
कुछ कहें तो चाहे नफ़रत से ही सही
वो भी तो किसी पर एक अहसान है |                                                                                              

६६ -जिसे भी छूता हूँ, वो टूट जाता है,
   कुछ भी कहता हूँ तों रूठ जाता है
   क्या करू मेरी किस्मत ही ऐसी है,
   जिसे भी चाहता हूँ वो छूट जाता है |

६७ -तमाम उम्र हम चलते रहे और लोग जलते रहे ,
    अब हम जलते जा रहे है लोग चलते जा रहे है |

६८ -आइये जिन्दगी  के नए  मायने तलाश करे ,
    दिल को जोड़ा तों फिर दिल पर विश्वास करे ,
    ऐसा क्या जुड़ना कि दिल ना करे  धक् धक्,
   आइये तन मन के अहसास का अहसास करे ,

६९ -आप भी गर अच्छे है तभी मिल पाते है जनाजा उठाने वाले,
   वो भी खुशकिस्मत होते है जिन्हें मिल जाते है जलाने वाले|
   जो गैर है अपने  नही उनको क्या देखना और क्या सोचना,
   आज कल ऐसे ही होते है मतलबपरस्त तमाम ज़माने वाले|

७० -कोई  मेरे सोये दिल को जगाये तों कोई  बात बने ,
   कोई  मेरे घर में भी दीप जलाये तों कोई बात बने |
   बहुत दिन हो गया मैंने तों कोई खुशियाँ नही देखी ,
   दामन में कोई खुशियाँ ले  आये तों कोई बात बने |

७१ -अँधेरे मेरे घर के देखो दूर से ही दिखलाई पड़ते है,
   मेरे घर का अँधेरा  कोई भगाए तों कोई बात बने |
   सभी के घर बहुत रोशन, सभी के घर में  दिवाली  ,
   कोई मेरी भी दिवाली  मनवाए तों कोई  बात बने |

७२-मैं पत्थर हूँ बिना काम  का मुझे कहां ले जाओगे,


कथा हमारी मत पूछो, सुन कर पागल हो जाओगे|


क्या बतलाऊं धोखे, कांटे, विष के जंगल भरे हुए,



मत सहलाना दर्द हमारा, तुम घायल हो जाओगे|


७३ - लकीरें साथ है जिनकी जब तक
   
बुरे करम भी नहीं मार सकते है |  


७४ -इतने झूठ बोल कर अपना बनाये रखना
बाजीगरी है कैसी और क्या खूब हुनर है ।