शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

दिल के टुकड़े उठा कर क्यों सहला रहा है

उसको देखो वो आखिर कहा जा रहा है
इंसानों को देखकर क्यों  कतरा  रहा है

बहुत दिन हो चुका उसे  इंसानों में रहते
अब इंसानों को देख कर ही घबरा रहा है

वो था झूठा और दिल टूटा क्या हो गया
दिल के टुकड़े उठा कर क्यों सहला रहा है

माना जिसको भी अपना सबने भोंका छुरा है 
हद है काँटों से भी बच कर अब वो जा रहा है

कैसे बचेंगे इंसानी रिश्ते इंसानों कि दुनिया
जब हर कोई अपने ही रिश्तो को खा रहा है 

कैसे बताये कैसे समझाए कि सब ऐसे नही है
बहुत चोट खाई दर्द का गाना ही वो गा रहा है

1 टिप्पणी :

  1. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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