बुधवार, 1 सितंबर 2010

मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई

मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई
देखा मुझे करीब से तों देख कर शरमा गई

मैंने पूछा तुमको मुझसे मिलकर कैसा लगा
बोली मै भयभीत हूँ मन में  केवल भय जगा 
इतनी दीवानगी क्यों किसलिए किसके लिए
इस दुनिया में है कौन किसका कितना सगा

क्या  कोई उसको और वो किसी को भा गई 
मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा  गई

दीवानगी बोली रास्तो का क्या  बन जायेंगे
उठोगे और चल दोगे खुद  नजर आ जायेंगे
जीवन का तों उसूल है कल है भूलने के लिए 
कोई तुम्हे भूला तय करो उसको भूल जायेंगे

दरवाजे खोल कर  देखो चांदनी है  आ गई
मेरी दीवानगी को देख दीवानगी घबरा गई

मैंने कहा दीवानगी तुम मेरे पास आई क्यों 
आ गई तों देख कर इस कदर शरमाई क्यों
दीवानेपन की देवी खुद को तुम समझती थी
मै जरा सा  दीवाना हूँ देख कर घबराई क्यों

मुझे होश नही तुम्हे क्या चीज नजर आ गई 
मेरी दीवानगी को देख  दीवानगी घबरा गई

1 टिप्पणी :

  1. achchhee rachana ban gayee hai bhaai sahab. aap ka rachanatmak vyaktitv ab nikharane laga hai. deewanagee kee ghabarahat aap ke deevanepan kee takat ka bayan hai.

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