मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

१--जीवन यात्रा से ---------------------------

बैठता हूँ रोज  इस इरादे के साथ की लिखू
पर उठ जाता हूँ बस सोच कर निरर्थक
क्या लिखूँ
वो बचपन जो गाँव में बीता था
खेती में खलिहान में और बगीचों में
गाँव के तालाब में भैंस की पीठ पर
अपने मुँह से
सीधी साधी गाय के धान से सीधे दूध पीना
या भैंस को दूहते बाबा का मुँह में धार मार देना
जानवरों के चारे की मशीन चलाना शौक़ से
या घूमना बेलो के पीछे पीछे
चाहे पानी खेत में पहुँचाने की रहट हो
या गाना पेरने का कोल्हू या
खलिहॉन में अनाज की दबायी
मचान पर सो कर या बैठ कर खेत की रखवाली
या ख़ुद के सर पर भी लाद कर लाना
वो गन्ना हो , मक्का हो , धान या जौ या अरहर
ख़ुद के खेत में गन्ना पर
चुपके से दूसरे का तोड़ कर चूसना
ख़ुद के पेड़ में पर आम पर
दूसरे के पेड़ पर पत्थर मार तोड़ना
पके है नीचे कि डालियों में भी आम
पर सबसे ऊँची डाल पर चढ़ वही तोड़ने की ज़िद
क्या लिख़ू
वो कपड़ा लपेट कर बनाया गया किताबों का बसता
वो लकड़ी की पट्टी और शीशी में घुली स्याही
काले रंग से रंग कर पट्टी को चमकाने की जद्दोजहद
गाँव में बेकार उग गए
नरगट को छील कर बनायी गयी क़लम
और उसी से लिखने की कोशिश
मास्टर साहब या मुंशी जी की आवाज के साथ
समवेत सवार में क ख ग या
दो दुनी चार के पहाड़े बोलने की आवाज़ें
क्या लिखू
वो गाँव में आयीं बाढ़ जिसके खेत में शौच भी मुश्किल
या वो बूढ़ा बहुत बड़ा साँप जिसे पूर्वज मानता गाँव
हल्ला बोल कर पूरे गाँव का तालाब में उतरना
और हलचल से मिट्टी हो गए तालाब से मछली पकड़ना
गाय भैंस चराना और अपनी गाय तथा भैंस को पहचानना
आवाज देने पर अपनी ही गाय या भैंस का आ जाना
उस पेड़ पर भूत की कहानी तो पोखरी मे चुड़ैल की
क्या लिखूँ
गाँव के पास के बाज़ार पर या आसपास लगने वाले बाज़ार पर
अलग अलग जंगह लगने वाले मेलों पर
या गाँव में बिना डरे बाहर सबके सोने पर
गाँव की हवा पर या कूँए के पानी पर
पेड़ों की अमरायी पर या छप्पर की उठायी पर
गाँव के संस्कार पर या अब के रिश्तों के व्यापार पर
ये सब पूरी कविता या कहानी के विषय है
इसलिए छोड़ देता हूँ आज इसे अनुक्रमिका मान कर
हा लिखूँगा सब पर क्योंकि जिया है मैंने ख़ुद ये सब ।

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